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Monday, April 27, 2009

हजारों साल.....एक माइक्रो पोस्ट

पिछले करीब दो महीने से जब भी कुछ दोस्तों के साथ राजनीति की बात होती है तो यह शेर हमेशा याद आ जाता है;

हजारों साल 'नर्गिस' अपनी बेनूरी पे रोती है
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा

16 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

क्या बात है शिव भाई! आप ने तो शेर का मिजाज ही बदल दिया।

Anil Pusadkar said...

शिव भैया इस चुनाव मे भी नर्गिस रोती ही नज़र आ रही है और मुश्किल ये है दीदावर भी नज़र नही आ रहा है।

Arvind Mishra said...

शिव भाई सच बताऊँ इस शेर का सही सही अर्थ मुझे आज तक समझ में नहीं आया ! व्याख्या करेंगें प्लीज !

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

इस पोस्ट पर जद्दनबाई कसमसा रही होंगी अपनी कब्र में!

संजय बेंगाणी said...

हम जैसे उर्दू न जानने वालों के लिए हिन्दी में अर्थ लिखेंगे तो हम भी आनन्द ले पाएंगे.

डॉ .अनुराग said...

हमारी भावनाओं को शेर में ढाल दिया मिश्रा जी.................एक ठो पान थाम ले इसी बात पे

Udan Tashtari said...

एक नया स्वाद दिया इस शेर का.

काजल कुमार Kajal Kumar said...

वो सुबह कभी तो आएगी.

ताऊ रामपुरिया said...

क्या कहें मिश्राजी? यहां तो कुछ भी नही पैदा होने वाला.

रामराम.

अभिषेक ओझा said...

पूरा का पूरा तो मुझे भी समझ में नहीं आया था... पर मतलब खोज के ले आया मैं. वैसे इतनी आसानी से समझ में आ जाता तो शेर काहे का :-)

[नर्गिस:.आँख की आकृति से मिलता-जुलता फूल.
बेनूरी: ज्योतिविहीनता.
दीदावर: आँख रखने वाला (पारखी)]

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

हुउम्म! वैसे हम त कहेंगे कि नहिए होता सरवा दीदावर पैदा त निम्मन रहता न.

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

वाह वा..खूब कहा शिव भाई !
- लावण्या

Arvind Mishra said...

अभिषेक भाई ,
तब्भी समझ नहीं पाया -धुरंधर लोग तो समझे ही बैठे हैं -उनसे पूंछने पर जगहसाई निश्चित है -आप ऐसा करो भाई ह्पके से इसकी व्याख्या मेरे मेल बॉक्स में सरका दो ! बहुत दिनों से हातिम ताई की नाईं खोज रहा था उसे जो इसके सही अर्थ को मुझे हृदयंगम करा सके सोदाहरानार्थ ! अब मिल गये हो तो छोडेंगें नहीं -कस के पकड़ रहे हैं !
नैतिक जिम्मेदारी तो शिव भाई की ही बनती थी पर वे बड़ी ऊंची बात कह मित्रों की वाह वाही में पुलकित हैं उन्हें जवाब देने की फिकर ही नहीं !

गौतम राजरिशी said...

सच कहा आपने, किंतु मुश्किल तो ये है जब ये दीदावर पैदा भी होता हजार साल बाद तो जल्द ही पट्टी भी बाँध लेता है आँखों पर

सुमन्त मिश्र ‘कात्यायन’ said...

वाह! लुच्ची गांधीगिरी की तो आपनें हवा ही निकाल दी।

नीरज गोस्वामी said...

हमें तो: " हों जो दो चार शराबी तो तौबा करलें....कौम की कौम है डूबी हुई मैखाने में...."याद आता है...अब आप हमारा क्या कर लेंगे?
नीरज

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