Monday, August 27, 2007

हरिशंकर सिंह जी जैसे चरित्र कम हो रहे हैं क्या?


हरिशंकर सिंह जी के विषय में शिव कुमार मिश्र ने इस ब्लॉग पर कल अपनी पोस्ट में लिखा है. गांव के अभावग्रस्त वातावरण में हरिशंकर सिंह जैसे लोगों ने निस्वार्थ भाव से अपने शिष्यों को योग्य बनाने का कार्य किया. अब यह कार्य ट्यूशन के माध्यम से पैसे के बल पर होता है. उस शिक्षण की गुणवत्ता पर तो टिप्पणी करना उचित नहीं है - एक विश्वविद्यालय के वाइसचांसलर मुझसे ट्यूशन की उपयोगिता के पक्ष में कह रहे थे! पर मैं निस्वार्थ भाव से उत्कृष्ट कार्य की बात कर रहा हूं. मुझे लगता है कि मार्केट इकॉनॉमी के प्रबल होने से अब समाज के सभी क्षेत्रों में हरिशंकर सिंह जी जैसे चरित्रों का उत्तरोत्तर टोटा होता चला जायेगा. विज्ञापन, अपने को चमका कर प्रस्तुत करना, धड़ाधड़ पैसा पीटने की प्रवृत्ति नैसर्गिक समाजकल्याण की बात को सेकेण्डरी बनाने लगेगी.

गांवों में भी वातावरण तेजी से बदल रहा है. बाजार अपनी पैठ बना रहा है. टेलीवीजन ने सुविधासम्पन्नता को फोर-फ्रण्ट पर ला खड़ा किया है. मैं एक ऐसे नौजवान को जानता हूं जो मन्दसौर जिले के एक गांव में उत्तरप्रदेश से बेरोजगारी के चलते गया और मेहनत कर 250 विद्यार्थियों का एक स्कूल बनाने में सफल रहा. उसका मॉडल निस्वार्थता का नहीं अपने लिये उपयुक्त रोजगार बनाना था. मन्दसौर जिले की अफीम की खेती से आयी समृद्धि, लोगों में स्तरीय शिक्षा की ललक और उपयुक्त शिक्षा व्यवस्था के अभाव का इस नौजवान ने प्रयोग बखूबी किया. वह मेहनत भी बहुत करता है. पर हरिशंकर सिंह जी जैसी निस्वार्थता तो नहीं ही है उसमें.

सही क्या है, गलत क्या है - कहना कठिन है. पर मुझे भय है कि हरिशंकर सिंह जी जैसे व्यक्तित्व उत्तरोत्तर कम होते जायेंगे. मेरा भय निराधार हो तो मुझे खुशी होगी!

Sunday, August 26, 2007

हरिशंकर सिंह जी की याद


पिछले कई सालों में शायद ही कभी हुआ हो कि मुझे हरिशंकर सिंह जी की याद न आई हो। पढ़-लिख कर कर्म क्षेत्र में उतरने के बाद शिक्षकों की याद शायद कुछ ज्यादा आती है। कारण जो भी हो, मैं उन्हें बहुत याद करता हूँ। लेकिन आज उनकी याद आने का कुछ अलग ही कारण है। असल में आज मेरे एक मित्र ने फ़ोन किया। उसने बताया कि उसको एक एसोसिएशन द्वारा निकाली जानेवाली पत्रिका का एडिटर चुन लिया गया है। उसने मुझे बताया कि मैं 'अच्छी' अंग्रेजी लिखता हूँ और मैं उसके लिए एडिटोरियल की घोस्ट राईटिंग कर दूं। अब पता नहीं उसने कितना सही कहा मेरे बारे में, लेकिन मुझे तुरंत हरिशंकर सिंह जी की याद आ गई।

हरिशंकर सिंह मेरे शिक्षक थे, जब मैं गाँव के स्कूल में पढ़ता था। मुझे याद है, सन १९७८ में हमारे गाँव में पहली बार एक 'मिडिल स्कूल' की स्थापना हुई। उसके पहले गाँव में एक प्राईमरी स्कूल था। पांचवी तक पढ़ने के बाद गाँव के बच्चों को आगे की पढाई के लिए दूर जाना पड़ता था। कारण था आगे की पढाई के लिए गाँव में स्कूल का न होना। गाँव के लोगों ने चन्दा इकट्ठा करके एक स्कूल की स्थापना की। पहले साल केवल छठवीं कक्षा की पढाई की व्यवस्था हो सकी। स्कूल का अपना कोई भवन नहीं। गाँव वालों से जितना चन्दा इकठ्ठा हुआ, सारा टाट की पट्टी, ब्लैकबोर्ड और चाक पर खर्चा हो गया। हम लोग कुल मिलाकर छत्तीस विद्यार्थी। भवन के अभाव में महुआ के पेड के नीचे बैठकर पढते थे। स्कूल में कुल मिलाकर दो अध्यापक। उनमें से एक थे हरि शंकर सिंह जी और दूसरे थे पूर्णमासी 'पंकज'। साथ में एक चपरासी। नाम था कड़ेदीन। कड़ेदीन ने अपना एक छोटा सा घर स्कूल को दान कर दिया था। जब स्कूल दिन के अंत में बंद हो जाता था, तो स्कूल की जमा-पूंजी, याने तीन टाट की पट्टी, दो ब्लैकबोर्ड और कुछ चाक उस छोटे से घर में रखकर ताला लगा दिया जाता। दो अध्यापकों के इस स्कूल के हेडमास्टर थे हरि शंकर सिंह जी।

हरिशंकर सिंह जी के पास एम. ए., बी. एड. की डिग्री थी। नौकरी नहीं मिलने के कारण बेकार थे। गाँव में रहकर खेती-बारी का काम करते थे। उन्होंने एक बार बताया था कि; 'नौकरी करने के लिए एक बार कलकत्ते आए थे, लेकिन कुछ तबीयत खराब होने की वजह से और कुछ नौकरी न पसंद आने की वजह से उन्हें गाँव वापस जाना पड़ा था'। स्कूल खुलने पर उन्हें गाँव में अध्यापक की 'नौकरी' मिल गई। तनख्वाह भी मिलती थी। साठ रुपये महीना। बाद में हमारा स्कूल 'बड़ा' हो गया। आगामी साल गाँव वालों की मदद से और कुछ बाहर से चन्दा इकठ्ठा करके स्कूल के लिए दो कमरे बनाए गए। विद्यार्थियों की संख्या में वृद्धि हुई। अब स्कूल में दो और अध्यापक आ गए थे। अध्यापकों की तनख्वाह भी बढ़कर एक सौ बीस रुपये हो गई थी। पूरे सौ प्रतिशत की वृद्धि।

हरिशंकर सिंह जी अंग्रेजी पढाते थे। पढाने की शैली निहायत ही बढ़िया। हमलोग सुनते थे कि स्कूल आने से पहले खेती का सारा काम भी करते थे। गाँव के कुछ लोग उनका मजाक भी उडाते थे कि 'अभी तो खेतों में हल चलाकर लौटे और तुरंत स्कूल भी पहुंच गए'। हमारे कोर्स में कृषि विज्ञान की पढाई होती थी। वे हमलोगों को कृषि विज्ञान भी पढाते थे। उन्होंने कितनी मेहनत करके हमें पढ़ाया, इसका एहसास आज होता है। उन्हें मिलने वाली तनख्वाह से वे कितना खुश (या फिर दुखी) होते होंगे ये तो नहीं पता, लेकिन उन्होने मेहनत में कभी कोई कमी नहीं दिखाई। अच्छे संस्कार सिखाये। गाँव के माहौल में हमें अंग्रेजी बोलने और लिखने के लिए प्रेरित करते, बिना इस बात की परवाह किये कि कुछ लोग उनके प्रयासों का मजाक भी उडाते थे। हमें धर्मनिरपेक्षता की समझ उन्होंने बड़ी ईमानदारी से दी। गाँव में जातिवादी संस्कारों का पाया जाना उस समय एक आम बात होती थी। लेकिन उन्होंने हमें ऐसी शिक्षा और संस्कार सिखाये कि ऐसी बातों के लिए हमारे मन में कोई जगह नहीं रही।

संसाधनों की कमी और सरकारी अनुदान न मिलने के बावजूद उन्होंने अच्छे विद्यार्थी तैयार करने में कहीँ कोई कसर नहीं छोडी। कालांतर में स्कूल बड़ा हुआ। स्कूल के सभी कर्मचारी हर साल बात करते कि 'इस साल स्कूल को सरकारी मान्यता मिल जायेगी और उनकी की गई मेहनत का कुछ फल शायद उन्हें मिले। आजतक ऐसा नहीं हुआ। करीब उनतीस साल हो गए स्कूल की स्थापना हुए लेकिन सरकारी मान्यता ने आजतक स्कूल में कदम नहीं रखा। सरकारी मान्यता वाला गाँव का प्राईमरी स्कूल अब नहीं रहा। लेकिन हरिशंकर सिंह जी का शुरू किया हुआ स्कूल आज भी चल रहा है। हरिशंकर सिंह जी अभी भी उतने ही उत्साह के साथ स्कूल में पढाते हैं। अब शायद किसी सरकारी मान्यता की आशा के बिना ही।


Tuesday, August 21, 2007

उदय प्रताप सिंह जी को 'सुनिये' -भाग 2


उदय प्रताप सिंह जी ने ये कविता कलकत्ते में उसी कवि सम्मेलन में सुनाई थी, जिसका जिक्र मैंने अपनी पिछली पोस्ट में किया था। मैं ये कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ। प्रासंगिकता शायद इसलिये और बढ़ जाती है, कि हमने हाल में ही आजादी की वर्षगांठ मनाई है।

कोई खुशबू, न कोई फूल, न कोई रौनक
उसपर कांटों की जहालत नहीं देखी जाती
हमने खोली थीं इसी बाग में अपनी आंखें
हमसे इस बाग की हालत नहीं देखी जाती

बुलबुलें खुश थीं उम्मीदों के तराने गाये; कि
लेकर पतझड से बहारों को चमन सौंप दिया
अब तो मासूम गुलाबों की ये घायल खुशबू
शीश धुनाती कि खारों को चमन सौंप दिया

रात बस रात जो होती तो कोई बात न थी
उसका आकार मगर दूना नजर आता है
कितने चमकीले सितारे थे, कहां डूब गये
सारा आकाश बहुत सूना नजर आता है

कवि की आवाज बगावत पर उतर आई है
दल के दलदल से हमें कोई सरोकार नहीं
तुमने इस देश की तस्वीर बिगाडी ऐसे
जैसे इस देश की मिट्टी से तुम्हें प्यार नहीं

तुमने क्या काम किया ऐसे अभागों के लिए
जिनकी मेहनत से तुम्हें ताज मिला, तख्त मिला
उनके सपनों के जनाजों में तो शामिल होते
तुमको शतरंज की चालों से नहीं वक्त मिला

तुमने देखे ही नहीं भूख से मरते इन्सान
सिलसिले मौत के जो बन्द नहीं होते हैं
इनके पैबन्द लगे चिथडे ये गवाही देते; कि
इनके किरदार में पैबन्द नहीं होते हैं

जिस जगह बूंद पसीने की गिरा देते हैं
ठौर सोने के उसी ठौर निकल आते हैं
किंतु बलिहारी व्यवस्था की है जिसमे बहुधा
मुंह में बच्चों के दिये कौर निकल आते हैं

पूछता हूं मैं बता दो ऐ सियासत वालों
आदमी अपने ही ईमान का दुश्मन क्यों है
एक ईश्वर है पिता उसपर सगी दो बहनें
आरती और नमांजों में ये अनबन क्यों है

इनकी आदत में नहीं खून से कपडे रंगना
कोई मजबूरी रही होगी यंकीदा तो नहीं
अपने दामन में जरा झांक कर तुम ही कह दो
अपने मतलब के लिये तुमने खरीदा तो नहीं

बात करने को उसूलों की सभी करते हैं
वोट लेने का ये नाटक हैं इसे खत्म करो
ऐसी आजादी, गुलामी से बहुत बदतर है
ये वो चिंतन है, जो घातक है, इसे खत्म करो

वर्ना अंजाम वही होगा, जो पहले भी हुआ
कुर्सी तो कुर्सी, निगाहों से उतर जाओगे
मौत जब आयेगी तब आयेगी तुम्हारी खातिर
वक्त से पहले, बहुत पहले ही मर जाओगे।

Saturday, August 18, 2007

उदय प्रताप सिंह जी को 'सुनिए' -भाग १



उदय प्रताप सिंह जी को मैं सन 2004 से पहले तक नहीं जानता था. उनके बारे में मुझे पहली बार अक्टूबर 2004 में पता चला जब कलकत्ते के एक कवि सम्मेलन में उन्हें पहली बार कविता पाठ करते हुए देखा. वहाँ मुझे पता चला कि उदय जी राज्यसभा के सदस्य हैं. अंगरेजी के प्रोफेसर थे. मैं नजदीक से उन्हें नहीं जानता, लेकिन उन्हें सुनकर और देखकर एक बात जो मन में आती है, वो है कि बडे अच्छे इन्सान हैं.


मेरा मानना है कि कविता के प्रति एक आम आदमी के रुचि की शुरुआत छन्द और तुकबन्दी के प्रति उसके आकर्षण से होती है और इस मामले में उदय जी की गिनती हमारे समय के सबसे अच्छे कवियों में की जा सकती है. उनके द्वारा लिखे गए छन्दों को सुनकर मन प्रसन्न हो गया था मेरा. उनके बारे में सबसे अच्छी बात उनकी कविता-पाठ की शैली है. जिस तरह से वे अपने छन्दों की व्याख्या करते हैं, देखने लायक होता है. बहुत सारे मित्रों ने उदय जी को जरूर सुना होगा, और मुझे विश्वास है कि वे सभी मुझसे सहमत होंगे.

मैं उनके द्वारा लिखी गई कुछ कवितायें, जो मुझे बेहद पसन्द हैं, प्रस्तुत कर रहा हूं, इस आशा के साथ कि हमारे मित्रों को भी पसन्द आयेंगी.

(एक प्रयोग के तौर पर मैं उनके द्वारा छन्दों की व्याख्या, उन्हीं के लहजे में प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहा हूं....)

उदय जी के शब्दों में...
" देखिए, भरत भी रघुकुल के थे, और उन्हें ये पता था कि उनके कुल में किसी ने भी दिया हुआ वचन कभी नही तोडा. न दशरथ ने. न दिलीप ने. न यती ने. तो फिर उनको क्यों लगा कि श्री राम अपना दिया हुआ वचन तोड़ देंगे और वन से वापस आ जायेंगे. फिर मुझे लगा कि बात ये नहीं थी.ऐसा कर के भरत कैकेयी को कुछ समझाना चाहते थे. उसपर मैने ये छन्द लिखा "


जननी ने किये हैं जघन्य से जघन्य पाप
भक्ति-भाव से भरे भरत को ये भान है; कि
प्राण से अधिक प्रण धारते हैं रघुनाथ
वन या वचन न तजेंगे अनुमान है
किंतु जग के प्रलोभनों में फंसी कैकेयी को
पादुका-प्रसंग एक मौन समाधान है; कि
राम के चरण-रज का मिले जो एक कण
सुर-राज का भी पद धूल के समान है.

एक और छन्द सुनाते हुए उन्होने कहा;


"सीता जी कोई मामूली स्त्री नहीं थीं. मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की पत्नी थीं. विदेह की पुत्री वैदेही थीं. लेकिन एक सोने के हिरन पर मोहित हो गईं. और राम समझा रहे हैं कि सोने का हिरन होता नहीं है. लेकिन सीता जी की जिद. राम सोने के हिरन का शिकार करने जाते हैं और सीता जी अशोक वाटिका में पहुंच जाती हैं. जब उनके पास राम थे तो उन्हें सोना चाहिए था, और जब उनके पास सोना ही सोना है तो उन्हें राम चाहिए. सारे संसार की यही कहानी है. हमपर जब राम होते हैं तो हमें सोना चाहिए और जब हमारे पास सोना होता है तो हमें राम चाहिए. तो इसपर मैंने एक छन्द लिखा. बहुत ध्यान से सुनियेगा. खासकर बहनें"।

विश्वमोहिनी सी स्वरूपा को मोह लिया
जाने कौन मोहिनी थी सोने के हिरन में
सीता जी बैठी सोच रही अशोक वाटिका में
कुबेर-बंद रावण के कंचन सदन में
एक ओर मायावी मारीच छद्म-वेश धारे
एक ओर सारा जग जिनकी शरण में
और की तो कौन कहे जानकी न जान पाई
ग्राह-अनुग्राह कौन जग के चयन में।

आगे बोले;

"देखिए, रामचरित मानस हो या बाल्मीकि रामायण. दोनो में आपने राम के मुँह से रावण की प्रशंसा सुनी होगी. लेकिन रावण के मुँह से राम की प्रशंसा शायद नहीं सुनी होगी. यहाँ मैंने एक छन्द लिखा. प्रसंग ये है कि रावण सीता जी कहता है कि मेरी पटरानी बन जाओ और सीता जी उसे तिनके के ओट से जवाब दे देती हैं. रावण वापस चला जाता है. उसे देखकर मंदोदरी व्यंग करती है कि आ गए मुँह लटका के।"


व्यंग मंदोदरी ने किया एक रावण पर; कि
आप जैसी ज्यों मैं प्रेम-अग्नि में सुलगती
मायावी स्वरूप ठीक राम जैसा धार लेती
देखूं कैसे जानकी की प्रीति ना उमगती
बोला दसशीश ये भी चाल चल देख चुका
ठगनी कुचाल मेरी मुझको ही ठगती
जब-जब राम का रुप धारता हूँ तो
हर पराई नारि मुझे जननी ही दीखती।


बोले;

"ऐसा कैसे हो सकता है कि राम का रुप धार ले और प्रवृत्ति राक्षसी बनी रही।"


"एक छन्द और सुन लीजिये. प्रसंग ये है कि समुद्र पर सेतु बन रहा था.नल-नील पत्थरों को जल पर रखते जाते थे ओ पत्थर तैरने लगते थे. राम देख रहे थे. उन्हें लगा कि उन्हें भी कुछ करना चाहिए. वे एक कंकर उठाते हैं और और पानी में डालते हैं. लेकिन कंकर डूब जाता है. श्री राम सकुचा जाते हैं और किस तरह से हनुमान जी उनके संकोच को दूर करते हैं।"



नल-नील पाहनों पर राम-नाम लिख-लिख
सेतु बांधते हैं और फूले न समाते हैं
भारी-भारी शिलाखंड डूबना तो दूर रहा
भार-हीन काठ जैसी नौका बन जाते हैं
देखा देखी राम ने भी कंकरी उठाई एक
फेंकी वहीँ डूब गयी बहुत सकुचाते हैं
तभी राम-भक्त हनुमान ने कहा कि नाथ
आपके करों से छूट सभी डूब जाते हैं।


आगे बोले;

"जब मैं ये सब लिख रहा था, उसी समय अयोध्या का विवाद शुरू हो गया. मुझे लगा कि मंदिर बने या ना बने लेकिन राम छोटे नहीं होने चाहिए. आज सुबह जब मैं आ रहा था तो मुझे भाई नन्द लाल शाह जी ने बहुत डराया. उन्होने कहा कि अपने आप को बहुत बड़ा विद्वान मत समझना. वहाँ तुम्हारे आगे तुमसे बडे विद्वान बैठे होंगे. तो मैं बडे होशो हवाश में कह रहा हूँ कि रामचरित मानस हो या बाल्मीकि रामायण दोनो में यही लिखा गया है कि जब राम का जन्म हुआ तो पुष्पवर्षा पूरी पृथ्वी पर हुई. फिर से कह रहा हूँ, पूरी पृथ्वी पर हुई थी, केवल अयोध्या और फैजाबाद में नहीं. और मैंने ये छन्द लिखा।"


सारी धरा-धाम राम-जन्म से हुई है धन्य
निर्विवाद सत्य को विवाद से निकालिए
रोम-रोम में बसें हैं विश्वव्यापी राम
राम का महत्व एक वृत्त में डालिए
वसुधा कुटुंब के सम्मान देखते रहे वे
ये घड़ा के सर्प आस्तीन में ना पालिए
राम-जन्म भूमि को तो राम ही संभाल लेंगे
हो सके तो आप मातृभूमि को संभालिए।

जिन नन्द लाल शाह जी का जिक्र उदय जी ने किया वे ही इस कवि सम्मेलन के प्रमुख आयोजक थे.


(और एक बात. चूंकि ये सारा कुछ लिखने के लिए मुझे पूरी तरह से अपनी याददाश्त पर निर्भर होना पड़ा तो हो सकता है कि कहीँ कुछ छूट गया हो.)

Friday, August 17, 2007

भारत भूषण जी की कविता - "पाप"


ज्ञान भैया (ज्ञानदत्त पाण्डेय) की पोस्ट "बुद्ध को पैदा होने से रोक लेंगे" पर टिप्पणी में मैने भारत भूषण जी की कविता "पाप" की कुछ पंक्तियां लिखी थीं. वास्तव में ईश्वर के अवतरण में जितना हाथ पुण्य का है, पाप का उससे कम नहीं है.

मैं ज्ञान भैया के कहे पर पूरी कविता (जितनी और जिस रूप में मुझे याद है) प्रस्तुत कर रहा हूं:न जन्म लेता अगर कहीं मैं
धरा बनी ये मशान होती
न मन्दिरों में मृदंग बजते
न मस्जिदों में अजान होती


लिए सुमिरनी डरे हुए से
बुला रहे हैं मुझे पुजेरी
जला रहे हैं पवित्र दीये
न राह मेरी रहे अन्धेरी
हजार सजदे करें नमाजी
न किंतु मेरा जलाल घटता
पनाह मेरी यही शिवाला
महान गिरजा सराय मेरी
मुझे मिटा के न धर्म रहता
न आरती में कपूर जलता
न पर्व पर ये नहान होता
न ये बुतों की दुकान होती


न जन्म लेता अगर कहीं मैं...


मुझे सुलाते रहे मसीहा
मुझे मिटाने रसूल आये
कभी सुनी मोहनी मुरलिया
कभी अयोध्या बजे बधाये
मुझे दुआ दो बुला रहा हूं
हजार गौतम, हजार गान्धी
बना दिये देवता अनेकों
मगर मुझे तुम ना पूज पाये
मुझे रुला के न सृष्टि हंसती
न शूर, तुलसी, कबीर आते
न क्रास का ये निशान होता
न ये आयते कुरान होती


न जन्म लेता अगर कहीं मैं....


बुरा बता दे मुझे मौलवी
या दे पुरोहित हजार गाली
सभी चितेरे शकल बना दें
बहुत भयानक, कुरूप, काली
मगर यही जब मिलें अकेले
सवाल पूछो, यही कहेंगे कि;
पाप ही जिन्दगी हमारी
वही ईद है वही दिवाली
न सींचता मैं अगर जडों को
तो न जहां मे यूं पुण्य खिलता
न रूप का यूं बखान होता
न प्यास इतनी जवान होती


न जन्म लेता अगर कहीं मैं
धरा बनी ये मशान होती
न मन्दिरों में मृदंग बजते
न मस्जिदों में अजान होती



Thursday, August 16, 2007

पन्द्रह अगस्त गया


मैं तो सरकारी जीव. मेरे तो कर्तव्यों में है स्वतंत्रता दिवस मनाना. सरकारी फंक्शन से लौटते हुये मैने शिवकुमार मिश्र को कलकत्ता फोन किया पन्द्रह अगस्त मनाया?

उत्तर था, नहीं भैया; कुछ भी नहीं किया.

खालिस कलकत्तिया रिस्पॉंस! जो काम करने की बाध्यता सी हो और उसे कलकत्तावासी (पढ़ें बंगालवासी) न करे तो प्रसन्न रहता है. उसमें क्रांति की अनुभूति जो होती है!

अमुक जी को लें. उनका बच्चा मंथली टेस्ट में तीन विषयों में फेल है. मम्मीजी को स्कूल तलब किया गया है. मन मार कर दर्जा एक में स्कूल की ही मैथ्स की टीचर की कोचिंग लगानी पड़ रही है. नहीं तो टुन्नू का सत्रांत परीक्षा में फेल होना तय है. पर उसी टुन्नू जी का जन्मदिन अमुक दम्पति पूरे शौक (जबरन शोक न पढ़ें) से मनाते हैं. तब पन्द्रह अगस्त क्यों नहीं मनाया जाये?

ऐसा नहीं है कि देश की मार्क शीट में जीरो बटा सन्नाटा ही हो. एक समय था जब सब चीजों की किल्लत ही किल्लत थी. पीएल 480 को गायत्री मंत्र की तरह रटा जाता था. हर चीज में लाइन लगती थी और ब्लैक हुआ करती थी चाहे रसोई गैस हो या वैस्पा स्कूटर. रेलवे का रिजर्वेशन का यह हाल था कि एक एक बर्थ पर तीन तीन दावेदार होते थे और यात्रा चौथा ही करता था. डायल वाले फोन पर डायल करते-करते उंगलियां टूट जाती थीं. नेट बैंकिंग और नेट ट्रेडिंग तो स्वप्न ही थे.

मोची का बेटा मोची ही होता था और रिक्शे वाले का रिक्शा ही खींचता था. अब थानेदार हो रहा है. कोई-कोई तो प्रशासनिक सेवा में भी आ जा रहा है.

आधा ग्लास खाली है जरूर; पर आधा भरा भी है. आधे भरे को देखा जाये.


Friday, August 10, 2007

आज़ादी की एक और वर्षगांठ नहीं मना पायेंगे।



आजादी की साठवीं वर्षगांठ है। मतलब पिछले साठ साल में देश के हिस्से आजादी के साठ दिन पक्के। लोग अपने-अपने तरह से मनाने के लिए तैयार हो रहे हैं। 'फिल्मी चैनल' बॉर्डर, अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों, तिरंगा और ना जाने ऐसी कितनी फिल्में दिखाएँगे। शहरों में कवि सम्मेलन आयोजित किये जा रहे हैं। देश के लगभग सारे कवि 'बुक्ड' हो चुके हैं। प्रधानमंत्री ने शेरवानी पहनकर सलामी लेने की प्रैक्टिस शुरू कर दी है। अब्दुल कलाम साहब भी राजनीति के चुंगल से छूट कर आज़ाद महसूस कर रहे हैं। मोहल्ले के क्लब चन्दा इकठ्ठा कर रहे हैं। कई जगह अभी से लाऊडस्पीकर पर 'मेरे देश की धरती सोना उगल रही है'। पूरे साल टैक्स की चोरी करने का प्लान बनाने वालों ने भी अपनी कारों में झंडे गाड़ लिए हैं। न्यूज़ चैनल वाले सडकों पर उतर चुके हैं और लोगों से पूछना शुरू कर दिया है कि 'गाँधी जी का पूरा नाम क्या था' और 'हमारे देश का पहला प्रधानमंत्री कौन था'। एक -दो दिन में ही बहुत सारे आतंकवादी जो विस्फोटक लेकर देश की सीमा में स्वतंत्रता दिवस मनाने आये हैं, अरेस्ट होने शुरू हो जायेंगे। कुल मिलाकर देश में एक बार फिर से आज़ादी का मौसम आ गया है।

कल शाम आफिस से घर जाते वक्त ट्रैफिक सिग्नल पर कुछ हाकर तिरंगा बेचते हुए मिल गए। एक ने हमारी कार के पास आकर तिरंगा खरीदने की अपील की। मुझे याद आया, यही आदमी तीन-चार दिन पहले तक फल बेचा करता था। मैंने उससे पूछा; "क्या हुआ, आज फल नहीं बेच रहे हो"? उसने अपनी व्यापारिक नीति का खुलासा करते हुए बताया; "देखिए आदमी को मौसम के हिसाब से व्यापार करना चाहिए। अब क्या करें, अभी आजादी का मौसम है, तो तिरंगा बेच रहे हैं"। मेरे तिरंगा नहीं खरीदने पर वो चला गया और थोड़ी दूर पर एक और हाकर से बात करने लगा। दोनो के हाव-भाव से लगा जैसे दोनो कह रहे थे; 'ये क्या खरीदेगा तिरंगा। देख नहीं रहे, ऐसे मौसम में भी कार में 'ऐ दिल-ए-नादान आरजू क्या है' बजा रहा है। ऐसे मौसम में, जब बाक़ी लोग अपनी कार में 'मेरे देश की धरती सोना उगले' बजा रहे हैं।

आज सुबह मोहल्ले के क्लब वाले आ धमके। आते ही बोले; "इस साल बड़ी धूम-धाम से स्वतंत्रता दिवस मनाएंगे। इस लिए इस बार बजट बहुत बड़ा है। यही कारण है कि इस साल काफी पहले से तैयारी शुरू कर दी है"। इतना कहते हुए उन्होने चंदे की स्लिप पकड़ा दी। मुझे चंदे की रकम ज्यादा लगी। मैंने उनसे कुछ कम करने के लिए कहा। उनमें से एक बोला; "आप खुद ही सोचिये, दस हज़ार तो केवल खाने-पीने में खर्च हो जाएगा। उसके बाद ऑर्केस्ट्रा वालों का खर्च अलग। कुर्सी, शामियाना, फूल-माला सब लेकर कितना बजट हो जाएगा आपको अंदाजा है"? मुझे उनकी डिमांड पूरी करनी ही पडी। चन्दा लेकर चले गए। उनकी कोशिश देखकर मन ग्लानि से भर गया। एक ये हैं जो देश के लिए इतनी मेहनत कर रहे हैं, और एक मैं हूँ जो आफिस जाने की तैयारी में जुटा हूँ। फिर ये सोचकर संतोष कर लिया कि चलो, मैं किसी क्लब का सदस्य तो हूँ नहीं, मैं कैसे स्वतंत्रता दिवस मना सकता हूँ। मैं कैसे देश के लिए कुछ कर सकता हूँ।

घर पर आये क्लब के सदस्यों की मेहनत देखकर मन में जो ग्लानि हुई, उसने सारा दिन मुझे परेशान किये रखा। आख़िर स्वतंत्रता दिवस कैसे मनाया जाय। ऐसा नहीं है कि ये विचार आज पहली बार मन में आया। इसके पहले हर पन्द्रह अगस्त पर यही बात सामने आती रही है। मुझे इस बात का डर रहता है कि लोग मुझे पता नहीं क्या-क्या कहते होंगे। एक बार मन में आया कि कविता लिखूं। सुना है कवि की कलम में बड़ी ताक़त होती है। एक कवि अपनी कविता से समाज को बदल सकता है। ये विचार इस लिए भी आया कि मेरे कई दोस्त मुझे इससे पहले कविता लिखने के लिए उकसा चुके हैं। लेकिन ये विचार भी जाता रहा। कारण केवल इतना था कि कई बार कोशिश करने के बाद भी मैं आजतक एक भी कविता पूरी नहीं लिख पाया। फिर मैंने ये सोचकर संतोष किया कि दिनकर जी जैसे कवि की कविता समाज को नहीं बदल सकी तो मेरी क्या औकात।

बहुत सारे तरीकों पर विचार करने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचे; 'एक दिन की छुट्टी मिलेगी। परिवार के साथ रहेंगे। सब एक दूसरे की बातें सुनेंगे। किसी को कोई समस्या रहेगी तो उसका समाधान करने की कोशिश की जायेगी। ऐसा पिछले कई सालों से होता आया है। इस बार भी सही'। इस बार भी पन्द्रह अगस्त नहीं 'मना' पायेंगे। अगले साल आज़ादी की एक और वर्षगांठ आएगी ही। फिर विचार करेंगे। निष्कर्ष चाहे जो भी निकले।

Monday, August 6, 2007

नारे ने काम किया, देश महानता की राह पर अग्रसर है।


सत्तर और अस्सी के दशक के सरकारी नारों को पढ़कर बड़े हुए। उस समय समझ कम थी। अब याद आता है तो बातें थोड़ी-थोड़ी समझ में आती हैं। ट्रक, बस, रेलवे स्टेशन और स्कूल की दीवारों पर लिखा गया नारा, 'अनुशासन ही देश को महान बनाता है' सबसे ज्यादा दिखाई देता था। भविष्य में इतिहासकार जब इस नारे के बारे में खोज करेंगे तो इस निष्कर्ष पर पहुंचेंगे कि 'एक समय ऐसा भी आया था जब अचानक पूरे देश में अनुशासन की कमी पड़ गई थी। अब गेंहूँ की कमी होती तो अमेरिका से गेहूं का आयात कर लेते (सोवियत रूस के मना करने के बावजूद), जैसा कि पहले से होता आया था। लेकिन अनुशासन कोई गेहूं तो है नहीं।' इतिहासकार जब इस बात की खोज करेंगे कि अनुशासन की पुनर्स्थापना कैसे की गई तो शायद कुछ ऐसी रिपोर्ट आये:-

'सरकार' के माथे पर पसीने की बूँदें थीं। अब क्या किया जाय? इस तरह की समस्या पहले हुई होती तो पुराना रेकॉर्ड देखकर समाधान कर दिया जाता। चिंताग्रस्त प्रधानमंत्री ने नैतिकता और अनुशासन को बढावा देने वाली कैबिनेट कमिटी की मीटिंग बुलाई। चिंतित मंत्रियों के बीच एक 'इन्टेलीजेन्ट' अफसर भी था। सारी समस्या सुनने के बाद उसके मुँह से निकला "धत तेरी। बस, इतनी सी बात? ये लीजिये नारा"। उसके बाद उसने 'अनुशासन ही देश को महान बनाता है' नामक नारा दिया। साथ में उसने बताया; "इस नारे को जगह-जगह लिखवा दीजिए और फिर देखिए किस तरह से अनुशासन देश के लोगों में कूट-कूट कर भर जाएगा"।

मंत्रियों के चेहरे खिल गए। सभी ने एक दूसरे को बधाई दी। प्रधानमंत्री ने उस अफसर की भूरि-भूरि प्रशंसा की।एक मंत्री ने नारे के सफलता को लेकर कुछ शंका जाहिर की। उस मंत्री की शंका का समाधान अफसर ने तुरंत कुछ इस तरह किया। "आप चिन्ता ना करें, नारा पूरा काम करेगा। काबिल नारों को लिखने का अपना पारिवारिक रेकॉर्ड अच्छा है। मेरे पिताजी ने ही साम्प्रदायिकता की समस्या का समाधान 'हिंदु-मुस्लिम भाई-भाई' नामक नारा लिखकर किया था"।

इस अनुशासन वाले नारे ने अपना काम किया। लोगों में अनुशासन की पुनर्स्थापना हो गई। हम ऐसे निष्कर्ष पर इस लिए पहुंच सके क्योंकि नब्बे के दशक के बाद ये नारा लगभग लुप्त हो गया। ट्रकों पर नब्बे के दशक में इस नारे की जगह 'विश्वनाथ ममनाथ पुरारी, त्रिभुवन महिमा विदित तुम्हारी' और 'नाथ सकल सम्पदा तुम्हारी, मैं सेवक समेत सुत नारी' जैसे नारों ने ले ली। जहाँ तक रेलवे स्टेशन की बात है तो वहाँ इस नारे की जगह 'जहर खुरानों से सावधान' और 'संदिग्ध वस्तुओं को देखकर कृपया पुलिस को सूचित करें' जैसे नारों ने ले ली। ये अनुशासन वाला नारा कहीँ पर लिखा हुआ नहीं दिखा। दिखने का कोई प्रयोजन भी नहीं था। जब अनुशासन की पुनर्स्थापना हो गई तो नारे का कोई मतलब नहीं रहा।'

ये तो थी इतिहासकारों की वो रिपोर्ट जो आज से पच्चास साल बाद प्रकाशित होगी और इस रिपोर्ट पर शोध करके छात्र 'इतिहास के डाक्टर' बनेंगे। लेकिन नब्बे के दशक से इस नारे का सही उपयोग हमने शुरू किया। अनुशासन शब्द का व्यावहारिक अर्थ हो सकता है 'खुद के ऊपर शासन करना' या एक तरह 'लगाम लगाना'। (व्यावहारिकता की बात केवल इस लिए कर रहा हूँ क्योंकि ये नारा केवल हिंदी के डाक्टरों' के लिए नहीं लिखा गया था)। लेकिन शार्टकट खोजने की हमारी सामाजिक परम्परा के तहत हमने इस शब्द का 'शार्ट अर्थ' भी निकाल लिया। हमने इस अर्थ, यानी 'खुद के ऊपर शासन करना' में से 'के ऊपर' निकाल दिया। 'शार्ट अर्थ' का सवाल जो था। उसके बाद जो अर्थ बचा, वो था 'खुद शासन करना'। और ऐसे अर्थ का प्रभाव हमारे सामने है।

हम सभी ने खुद शासन करना शुरू कर दिया। होना भी यही चाहिए। जब अपने अन्दर 'शासक' होने की क्षमता है, तो हम सरकार या फिर किसी और को अपने ऊपर शासन क्यों करने दें? अब हम रोज पूरी लगन से अपनी शासकीय कार्यवाई करते हैं। आलम ये है कि हम सड़क पर बीचों-बीच बसें खडी करवा लेते हैं। इशारा करने पर अगर बस नहीं रुके तो गालियों की बौछार से ड्राइवर को धो देते हैं। आख़िर शासक जो ठहरे। हमारे शासन का सबसे उच्चस्तरीय नज़ारा तब देखने को मिलता है जब कोई मोटरसाईकिल सवार सिग्नल लाल होने के बावजूद सांप की तरह चलकर फुटपाथ का सही उपयोग करते हुए आगे निकल जाता है।

कभी-कभी सामूहिक शासन का नज़ारा देखने को मिलता है। हम बरात लेकर निकलते हैं। पूरी की पूरी सड़क पर कब्जा कर लेते हैं और आधा घंटे में तय कर सकने वाली दूरी को तीन घंटे में तय करते हैं। ट्रैफिक जाम करने का मौका बसों और कारों को नहीं देते। वैसे भी क्यों दें, जब हमारे अन्दर इतनी क्षमता है कि हम खुद ही जाम कर सकते हैं। सामूहिक शासन के तहत रही सही कसर हमारे धार्मिक शासक पूरी कर देते हैं। बीच सड़क पर दुर्गा पूजा से लेकर शनि पूजा तक का प्रायोजित कार्यक्रम पूरी लगन के साथ करते हैं। पूजा ख़त्म होने के बाद मूर्तियों का भसान और उसके बाद नाच-गाने का 'कल्चरल प्रोग्राम', सब कुछ सड़क पर ही होता है। हर महीने ऐसे लोगों को देखकर हम आश्वस्त हो जाते हैं कि देश में डेमोक्रेसी है।

हमारे इस कार्यवाई में पुलिस भी कुछ नहीं बोलती। बोलेगी भी क्यों? ट्रैफिक मैनेजमेंट का तरीका भी नारों के ऊपर टिका है। रोज आफिस जाते हुए पुलिस द्वारा बिछाए गए कम से कम बीस नारे देखता हूँ। ट्रैफिक के सिपाही को उसके बडे अफसर ने हिदायत दे रखी है कि कुछ करने की ज़रूरत नहीं है। हाँ, जनता को नारे दिखने चाहिए। बाक़ी तो जनता अनुशासित है ही। मैं इस बात से पूरी तरह आश्वस्त हूँ कि 'पुलिस आफिसर आन् स्पेशल ड्यूटी' होते हैं जिनका काम केवल नारे लिखना है। नारे पढ़कर मैं कह सकता हूँ कि ये आफिसर अपना काम बडे मनोयोग के साथ करते हैं। रोज आफिस जाते हुए मेरी मुलाक़ात कोलकता पुलिस के एक साइनबोर्ड से होती है जिसपर लिखा हुआ है; 'लाइफ हैज नो स्पेयर, सो टेक वेरी गुड केयर'। इस बोर्ड को सड़क के एक कोने में रखकर ट्रैफिक का सिपाही गप्पे हांक रहा होता है। उसे इस बात से शिक़ायत है कि पिछले मैच में मोहन बागान के स्ट्राईकर ने पास मिस कर दिया नहीं तो ईस्ट बंगाल मैच नहीं जीत पाता।

आशा है कि नारे लिखकर समस्याओं का समाधान खोजने की हमारी क्षमता भविष्य में और भी निखरेगी। नारे पुलिस के लिए भी काम करते रहेंगे। जरूरत भी है, क्योंकि आने वाले दिनों में भी ईस्ट बंगाल मोहन बगान को हराता रहेगा। हम अपने अनुशासन (या फिर शासन) में नए-नए प्रयोग करते रहेंगे।

Friday, August 3, 2007

अखिल भारतीय निंदक महासभा



लोगों ने उन्हें उपनाम दे दिया था; 'निंदक'। कारण था उनका 'गुण' जिसकी वजह से वे सभी की निंदा करते हुए सुने जा सकते थे। चौरसिया की पान-दुकान पर मिल गए। हाथ में १२० जर्दा वाला मघई पत्ता पान। मुँह में रखते ही रती राम की निंदा शुरू कर दी, "आजकल पान ठीक नहीं लगाता। मेटिया देता है। किमाम पत्ता पर घिसने में का जाता है? खाली पत्ता पर गोबर जईसन रख देता है। जब एतना मेहनत करके सोपारी काटता है तो फिर किमाम घिसने में का जाता है"? रती राम के होंठों पर कुछ सुगबुगाहट सुनाई दी। शायद कह रहा था कि; "तीन महीना हो गया, पुराना हिसाब खतम करते नहीं; किमाम घिसवाने आये हैं"।

मुझे देखते ही दुआ-सलाम का बाजा बजाया। इधर-उधर की बातें हुईं। बात-बात में पता चला कि सचिन तेंदुलकर से बहुत नाराज हैं। मैंने कारण पूछा तो बोले; "पहिले मैच में देखा नहीं आपने; केतना खराब खेले ई। हम सोचे थे कि एनके टीम से हटाने का माँग कर डालेंगे। लेकिन दुसरा मैच में रन बना दिए ई। विरोध करने का मौका भी नहीं दिए"।

मैंने कहा; "लेकिन शतक तो बनाया नहीं, सचिन ने। शतक नहीं बनाने को लेकर माँग कर देते। कितने दिन हो गए, एक भी शतक नहीं लगाया"।

बोले; "विचार आया था हमरे मन में भी। लेकिन टीवी वाला बोला सब कि इनके खेलने से ही टीम का कन्डीशन मजबूत हुआ था। हम सोचे; जब एही लोग साथ नहीं देगा तो हम अकेलही का करेंगे"।

बात आगे चली तो पता चला कि प्रतिभा पाटिल से भी नाराजगी चल रही है। और कुरेदने पर बोले; "हम तो सोच लिए रहे कि इनका उम्मीदवारी को लेकर शहर में रैली निकालेंगे। एक दिन का चक्का जाम कर देंगे। बताईये अइसन लोग अगर राष्ट्रपति बन जाएगा तो देश का हाल का होगा"।

मैंने कहा; "लेकिन रैली निकाली नहीं आपने। विरोध अगर था ही तो दर्ज कराना चाहिए था"।

बोले; "विरोध दर्ज कराने का बात कर रहे हैं आप। हम तो राम बरन उकील से बात भी कर लिए रहे। पूरा प्रोग्राम बन गया था कि प्रतिभा पाटील के खिलाफ एक ठो जनहित याचिका दायर करेंगे। राम बरन भी तैयार हो गए थे। ऊ तो बाद में खर्चा को लेकर थोडा प्राब्लम खड़ा हो गया। आ नहीं तो हम छोड़ने वाले नहीं थे प्रतिभा पाटिल को"।

मैंने कहा; "चक्का जाम कर देते। एक रैली निकाल देते तो देश वालों की नज़र में एक बार आपत्ति तो दर्ज हो जाती। और भी फायदा हो सकता था। मेरा मतलब भविष्य में इलेक्सन वगैरह लड़ते तो एक तरह से पहचान से मदद ही मिलती"।

बोले; "सोचे तो हम भी थे। लेकिन राज का बात कहें तो बाद में हम इरादा बदल दिए। सोचे कि ई राष्ट्रपति बनेंगी जरूर ही। कोई रोक तो सकेगा नहीं"। आगे बोले; "अब तो सोच रहे हैं कि अब्दुल कलाम का विरोध करते तो अच्छा होता। उनका विरोध करने से एक ठो अलग ही पहचान बनता"।

मैं सोच ही रहा था कि ये ऐसा क्यों बोल रहे हैं। तभी उन्होने अपनी सोच का खुलासा किया। बोले; "अब देखिए। प्रतिभा पाटिल का विरोध तो सभी कर रहे थे। त अईसे में सभी का आवाज सुनाई नहीं देता। लेकिन अब्दुल कलाम का विरोध एक दो लोग करते हैं। आ अईसे में सभी का आवाज सुनाई देता है। अईसा लोग एक दो दिन में ही फेमस हो जाता है। आप देखे नहीं। ऊ पत्रकार। का नाम है उनका। अरे वही स्मिता गुप्ता। कैसे दो दिन में ही फेमस हो गई"।

मैंने कहा "आप जैसे लोग ही समाज में जागरूकता ला सकते हैं। नेताओं की करतूत जनता के सामने ला सकते हैं"।

बोले; "ज़रूरी है। जागरूकता पैदा करना ही है। आ नहीं तो ई नेता सब देश बेंच कर खा जाएगा। जागरूकता नहीं आने से कोई बदलाव का आशा नहीं कर सकते। आपको मालूम है कि नहीं? हमरे दादाजी भी ऐसे ही थे। पूरा शहर में नेहरू का विरोध ओही किये थे। एक बार नेहरू का विरोध में शहर में रैली निकाले थे। बाबूजी बताते हैं ऊ जमाने में दादाजी का वक्तव्य पेपर में छपता था, 'नगर की हलचल' कालम में"।

"अच्छा, मुझे मालूम नहीं था। आपके दादाजी भी समाजसेवा में थे"? मैंने उनसे पूछा।

बोले; "दादाजी ही क्यों। हमरे बाबूजी भी कभी नेता लोगन का बात बर्दास्त नहीं किये। सन् सतहत्तर में खुद वो इन्द्रा गांधी का विरोध किये थे। ईमर्जेंसी में धारा १४४ तोड़े थे। गिरफ्तार हो गए थे। दैनिक 'तूफान' में फोटो छपा था उनका। तीन महीना जेल में थे। त ई मत सोचिये कि आज का बात है। घर में देश के लिए कुछ करने का बात पहिले से ही है"। आगे बोले; "लेकिन हम सोच रहे हैं कि अकेले का आवाज़ सुनाई कम देता है अब। एही वास्ते हम सोच रहे हैं कि अब संस्था बना कर विरोध का स्वर ऊंचा करना पड़ेगा"।

मैं उनसे बात करके घर आ गया। दो दिन बाद बाजार से गुजरते हुये देखा कि बहुत सारे लोग रामलीला मैदान की तरफ जा रहे थे। मैंने पूछ-ताछ किया। पता चला 'निंदक' जी कोई सभा करने वाले हैं। और जानकारी लेने पर लोगों ने बताया कि आज रामलीला मैदान में 'अखिल भारतीय निंदक महासभा' के स्थापना का एलान होने वाला है।