Saturday, October 22, 2011

युग-युग में रा-वन

त्रेता युग

जामवंत जी ने हनुमान जी को याद दिलाया कि वे उड़ सकते हैं. बड़े-बुजुर्ग हमेशा से परोपकारी रहे हैं. उन्हें तो बस परोपकार करने का मौका चाहिए. वे कभी पीछे नहीं हटेंगे. दरअसल एक उम्र पर पहुंचकर उन्हें इसके अलावा कुछ और करना न तो आता है और न ही भाता है. जामवंत जी भी इसके अपवाद नहीं थे. हनुमान जी ने जामवंत जी को थैंक्स कहा और श्रीलंका की उड़ान भर ली. बैकग्राऊंड से रवींद्र जैन अपनी सुरीली आवाज़ में गाये जा रहे हैं; "राममन्त्र के पंख लगाकर हनुमत भरे उड़ान...हनुमत भरे उड़ान."

उधर हनुमान जी अपने दोनों पाँव ठीक वैसे ही ऊपर-नीचे करते उड़े जा रहे हैं जैसे पलंग पर पेट के बल लेटा डेढ़ साल का बच्चा अपने पाँव ऊपर-नीचे करता है. देखकर कोई भी बता सकता है कि वे इस समय ज्यादा ऊपर नहीं उड़ रहे हैं क्योंकि मौसम सुहाना है. बादल ऊंचाई पर हैं. रास्ता साफ़ है. दूर-दूर तक सबकुछ दिखाई दे रहा है. लिहाज़ा सामने से आते किसी राक्षस या वायुयान से टकराने की सम्भावना नगण्य है. सूर्य भगवान का पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम स्ट्रॉंग है इसलिए वे अपनी रोशनी पूरे संसार को बांटे जा रहे हैं. हिंद महासागर नीचे अविरल बहता जा रहा है.

हनुमान जी एकाग्र-चित्त उड़े जा रहे है. ठीक वैसे ही जैसे राहुल द्रविड़ पिच पर एकाग्र-चित्त होकर ऑफ स्टंप से बाहर जानेवाली गेंदों को बिना किसी छेड़-छाड़ के छोड़ दिया करते हैं. देखकर ही लग रहा है कि उन्हें उड़ने में बहुत मज़ा आ रहा है. वे किसी बच्चे की सी मुखमुद्रा लिए आनंदित दिखाई दे रहे हैं. अचानक देखते क्या हैं कि समुद्र में से सामने एक विशालकाय महिला उभरी. उसने बड़ा वीभत्स मेक-अप किया है. बड़े-बड़े बाल, माथे पर बहुत बड़ी बिंदी, मुँह के दोनों कोनों पर बड़े-बड़े तिरछे दांत और बड़ी गाढ़ी होठ-लाली से लैस यह महिला हनुमान जी के रास्ते में मुँह बाए खड़ी हो गई. उसे देख हनुमान जी ने खुद को उसके मुँह के आगे हवा में ही पार्क कर लिया. वह महिला जोर-जोर से हा हा हा करके हँसी. उसकी हँसी उसके मेक-अप से मेल खा रही है.

हनुमान जी ने उसे प्रश्नवाचक मुद्रा में देखा. उस महिला को लगा कि अब समय आ गया है कि वह अपना परिचय दे. उसने कहा; "मैं सुरसा हूँ. हा हा हा हा हा."

उसकी हँसी सुनकर कोई भी कह सकता है कि शायद उसे सुरसा होने पर बड़ा गर्व है. वैसे यह भी कह सकता है कि जैसे हनुमान जी उड़ना एन्जॉय करते हैं वैसे ही सुरसा हँसना एन्जॉय करती है. उसकी हँसी सुनकर हनुमान जी ने कहा; "वह तो ठीक है लेकिन आप इतना हँस क्यों रही हैं?"

सुरसा बोली; "हँसी ही मेरी पहचान है. मैं जब तक नहीं हँसती लोग़ मुझे राक्षसी समझते ही नहीं. अब तुम्ही सोचो कि अगर मैं हँसना बंद कर दूँ तो कौन मुझे सीरियसली लेगा?"

उसकी बात शायद हनुमान जी की समझ में आ गई इसीलिए उन्होंने उसकी हँसी की बाबत और कोई सवाल नहीं किया. आगे बोले; "लेकिन मुझसे क्या चाहती हो?"

वो बोली; "आज देवताओं ने तुम्हें मेरा आहार बनाकर भेजा है. आशा है मेरी बात तुम्हारी समझ में आ गई होगी. नहीं आई हो तो फिर मैं काव्य में सुनाऊं कि; आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा..."

उसकी बात सुनकर हनुमान जी डर गए. उन्होंने सोचा जल्दी से हाँ कर दें नहीं तो कहीं ऐसा न हो कि यह अपनी बात काव्य में सुनाना शुरू करे तो साथ में आगे-पीछे की दस-पंद्रह चौपाई और सुना दे. आखिर उन्हें भी पता है कि कविता सुनाने वाला अगर सुनाने के मोड में आ जाए तो फिर सामनेवाले के ऊपर विपत्ति का पहाड़ टूट पड़ता है.

वे झट से बोले; "नहीं-नहीं मैं समझ गया. लेकिन हे माता अभी तो मैं भगवान श्री राम के कार्य हेतु श्रीलंका जा रहा हूँ. इसलिए आप मुझे छोड़ दें. मुझे बहुत बड़ा कार्य करना है. माता सीता की खोज करनी है. हे माता आप समझ गईं या काव्य में बताऊँ कि; "राम काजु करि फिरि मैं आवौं...."

हनुमान जी की बात सुनकर अब डरने की बारी सुरसा जी की थी. वे बोलीं; "समझ गई मैं. तुम्हारी बात पूरी तरह से मेरी समझ में आ गई."

अभी वे बात कर ही रहे थे कि आस-पास बकरी की सी आवाज़ सुनाई दी. हनुमान जी और सुरसा दोनों को बड़ा आश्चर्य हुआ कि समुद्र के ऊपर इस समय बकरी कहाँ से आ सकती है? वे इस आवाज़ के बारे में अभी सोच ही रहे थे कि उन्होंने देखा कि उनके सामने सूट-बूट पहने, छोटी सी चोटी बांधे एक मनुष्य खड़ा हुआ है.

उसने हनुमान जी को प्रणाम किया और बोला; "हे बजरंगबली, आप तो श्रीलंका जा रहे हैं. मैं यह बताने आया था कि मेरी फिल्म रा-वन कोलम्बो के सैवोय थियेटर में रिलीज होनेवाली है. आप से रिक्वेस्ट है कि आप वह फिल्म ज़रूर देखें."

इस मनुष्य को देखकर शायद हनुमान जी पहचान गए. बोले; "अरे तुम तो वही हो न जो परसों किष्किन्धा के आस-पास के इलाके में अपनी फिल्म का प्रचार करने वाये थे? महाराज सुग्रीव की सेना के कई बानर उसदिन अपना कर्त्तव्य भुलाकर तुम्हारा नाच-गाना देखने चले गए थे?"

उनकी बात सुनकर वह मनुष्य बोला; "हाँ, भगवन मैं वही हूँ. दरअसल मैं अपनी मूवी का प्रचार करने आपके इलाके में गया था. मेरा आपसे अनुरोध है कि आप मेरी मूवी ज़रूर देखें."

इस बार हनुमान जी बिदक गए. बोले; "तुमने पिछले वर्षा ऋतु से ही परेशान करके रख दिया है. जहाँ दृष्टि जाती है बस तुम्ही दिखाई देते हो. चित्रकूट हो या किष्किन्धा, अयोध्या हो या जनकपुर सब जगह तुम्ही दिखाई दे रहे हो. पागल कर दिया है तुमने सबको."

"लेकिन प्रभु, मेरी बात तो सुनिए. इस मूवी में रजनीकांत भी हैं. मैंने विदेशी गायक से इसमें गाना गवाया है. आप ज़रूर देखिएगा यह मूवी. आपको अच्छा लगेगा"; वह मनुष्य गिडगिडाने लगा.

उसकी बातें हनुमान जी को विरक्त कर रही थीं. बहुत नाराज़ होते हुए बोले; "हे माता, इस मनुष्य ने पूरी पृथ्वी पर हाहाकार मचा कर रखा है. मैं इसकी मूवी देखूँ उससे अच्छा तो यह होगा कि आप मुझे अपना आहार बना लें. माता सीता की खोज अंगद कर लेंगे."

कट टू द्वापर युग.

महाभारत की लड़ाई चल रही है.

महाराज धृतराष्ट्र के सारथी संजय उन्हें युद्ध के मैदान से आँखों देखा हाल बता रहे हैं. अचानक देखते क्या हैं कि उनकी स्क्रीन पर महाभारत की लड़ाई दिखनी बंद हो गई. सामने सूट-बूट में लैस एक मनुष्य नृत्य करते हुए गाने लागा; छम्मक छल्लो...चम्मक छल्लो..."

संजय की समझ में नहीं आ रहा कि यह कौन है? अभी वे कुछ सोच पाते कि आवाज़ आई; "महाराज धृतराष्ट्र की जय हो. महराज आज दिन भर युद्ध की रनिंग कमेंट्री सुनकर जब आप थक जायें तो आज रात्रिकालीन शो में मेरी मूवी रा-वन देखना न भूलें. बहुत बढ़िया मूवी है. बहुत पैसा खर्च करके मैंने यह मूवी बनाई है. आप आनंद से सरा-बोर हो जायेंगे."

उसकी आवाज़ सुनकर धृतराष्ट्र को लगा कि यह कौन है जो उनका मज़ाक उड़ा रहा है. आखिर जो व्यक्ति अँधा हो वह मूवी कैसे देखेगा? वे नाराज़ होते हुए बोले; "संजय यह कौन धृष्ट है जो मेरी हँसी उड़ा रहा है?"

संजय बोले; "महाराज यह एक चलचित्र अभिनेता है जो अपनी मूवी का विज्ञापन करते नहीं थक रहा. इसने पूरी पृथ्वी पर सबको परेशान करके रख दिया है. यह चाहता है कि आप इसकी मूवी देखें."

महाराज धृतराष्ट्र को बहुत गुस्सा आया. बोले; "क्या इसे यह नहीं मालूम कि मैं देख नहीं सकता?"

संजय अभी कुछ बोलते कि वह अभिनेता बोला; "महाराज आप केवल बैठे रहिये. संजय जी पूरी मूवी का वर्णन आपके सामने रखते जायेंगे. आप उसे फील करते रहिएगा. और हाँ, छम्मक छल्लो को अच्छी तरह से फील करियेगा. अब मैं जा रहा हूँ. मुझे पांडवों के शिविर में भी अपनी मूवी का विज्ञापन करना है."

इतना कहकर संजय की स्क्रीन से वह गायब हो गया. महाराज रात्रिकालीन शो का इंतजार करने लगे.

Saturday, October 8, 2011

चंदू'ज एक्सक्लूसिव चैट विद पैरिस हिल्टन...


पैरिस हिल्टन भारत आईं. वैसे अब यह नॉर्मल बात हो गई है. कोई न कोई भारत आता ही रहता है. पैरिस नहीं आती तो ब्रिटनी आ जाती. ब्रिटनी नहीं आती तो अंजेलिना जोली आ जाती. अपने यहाँ आनेवालों की कमी नहीं है. पिछले साल इन्ही दिनों सुश्री पामेला एन्डरसन आई थीं. अभी हाल ही में शोएब अख्तर अपना किताबी मंजन बेंचने आये थे. उसके लिए उन्होंने सचिन को बिना कुछ दिए अपना ब्रांड अम्बेसेडर बना लिया. पैरिस भी आईं थीं कुछ बेंचने ही. पता चला बैग बेचने आई थीं.

मेरे कहने का मतलब यह था कि अब हम ऐसे कंज्यूमर देश हो चुके हैं कि आनेवाले लोगों की कमी नहीं है.

कई लोगों ने मुझसे कहा कि चंदू को भेजकर पैरिस हिल्टन का इंटरव्यू लूँ. अब मैं ठहरा ब्लॉगर. अगर अपने पाठकों के आदेश का पालन न करूं तो ब्लॉगर-धर्म का निर्वाह कैसे करूँगा? मैंने चंदू को मुंबई भेज तो दिया लेकिन इंटरव्यू लेकर आने में उसने काफी समय लगा दिया. वैसे तो उसने बताया कि वह मुंबई भ्रमण कर रहा था इसलिए देर हो गई लेकिन सूत्रों ने बताया कि उसने फिल्म निर्माताओं से मुलाक़ात की है. शायद फ़िल्मी लेखक बनने का प्लान है उसका.

खैर, पेश है चंदू इन एक्सक्लूसिव चैट विद पैरिस हिल्टन.

चंदू: पेरिश जी नमस्कार.

पैरिस हिल्टन: चंदू जी, पेरिश मत कहो न. पेरिश का मतलब कुछ और ही होता है. पेरिश कहने से लगता है जैसे में...

चंदू: (सकपकाते हुए) सॉरी सॉरी मैडम. मैं समझ गया. मुझको याद आ गया कि डिक्शनरी में पेरिश का मतलब सड़ जाना होता है. माफ़ कीजियेगा.

पैरिस हिल्टन: कोई बात नहीं.

चंदू: सबसे पहले तो ये बताइए मैडम कि इंडिया आकर कैसा लग रहा है?

पैरिस हिल्टन: चंदू जी, आप तो ब्लॉग पत्रकार हैं. आप तो कभी टीवी पत्रकार नहीं रहे. फिर भी आप "आपको कैसा लग रहा है" टाइप सवाल कर रहे हैं?

चंदू: वो क्या है मैडम कि यह सवाल भारतीय जर्नलिस्ट का शास्वत सवाल है. अगर यह पूछा न जाय तो इंटरव्यू की तो जाने दें, बाईट भी नहीं पूरी होती. वैसे मैडम जी, हम बहुत खुश हुए कि आपको हमारे बारे में इतना पता है. हम इमोशनल टाइप हो गए यह जानकर कि आपको हमारे बारे में भी पता है.

पैरिस हिल्टन: अरे चंदू जी, हमें पता नहीं रहेगा आपके बारे में? हम सब कुछ जांच-परख कर इंटरव्यू के लिए राजी होते हैं. अब आप यही देख लें कि एक अंग्रेजी ब्लॉग से रिक्वेस्ट आई थी कि हम उन्हें भी इंटरव्यू दें लेकिन हमने मना कर दिया. हमारे एजेंट ने बताया कि उस ब्लॉगर ने अपने ब्लॉग पर हमारे ऊपर पोस्ट लिखी है लेकिन फोटो लगाई है बिनोद काम्बली की. अब आप ही बताइए, यह ठीक है क्या? हमारे अमेरिका में लोग़ सुनेंगे तो क्या कहेंगे? और आपके बारे में कौन नहीं जानता? आपने हमारे प्रेसिडेंट का इंटरव्यू लिया था. ...वैसे अब मैं आपके सवाल का जवाब देती हूँ. इंडिया आकर मुझे बहुत अच्छा लग रहा है.

चंदू: यह अच्छी बात है मैडम. इंडिया आकर बाहरवालों को अब अच्छा ही लगता है. पहले की बात और थी जब बाहर वालों को इंडिया आने पर खराब के साथ-साथ कभी-कभी पत्थर तक लग जाता था.

पैरिस हिल्टन: अरे नहीं, हमें तो बहुत अच्छा लगा.

चंदू: वैसे इंडिया आने से पहले आपने क्या-क्या तैयारी की?

पैरिस हिल्टन: बहुत तैयारी की. बिना तैयारी के मैं कहीं नहीं जाती. दो दिन तो मैंने दोनों हाथ जोड़कर नमास्टे बोलने की प्रैक्टिस की. फिर दो दिन मैंने दो लाइन; "इंडिया इज अ ग्रेट नेशन.....वेस्ट ओ सो मच टू इंडिया" जैसे सेंटेंस याद किये. मेरे एजेंट ने तो कहा कि मैं गूगल करके महात्मा गांधी के बारे में भी जान लूं लेकिन उसदिन पार्टी में देर हो जाने के कारण मैं उसकी बात भूल गई.

चंदू: आप तो सचमुच बहुत तैयारी से आई हैं. वैसे मेरे मन में एक सवाल है पेरिश जी. आप असल में क्या हैं?

पैरिस हिल्टन: चंदू जी, पेरिश मत कहो न. पेरिश सुनने से लगता है...

चंदू: सॉरी सॉरी मैडम, मैं फिर से भूल गया. वैसे मेरा सवाल यह था कि आप क्या हैं? मॉडल हैं, टीवी एक्टर हैं, सिनेमा एक्टर हैं, होटल मालकिन हैं....आप हैं क्या? हम आपको क्या समझें?

पैरिस हिल्टन: गुड क्वेश्चन चंदू जी. वैसे ये बताइए कि आप मुझे समझना क्यों चाहते हैं?

चंदू: (सकपकाते हुए) वो अब मैं कैसे बताऊँ आपको? मेरा मतलब यह था हम क्या मानें कि आप क्या हैं?

पैरिस हिल्टन: यह तो बड़ा कठिन सवाल कर दिया आपने. आजतक हमें भी नहीं पता चला कि मैं क्या हूँ. दरअसल में खुद को खोज रही हूँ. इसीलिए मैं हमेशा बदलती रहती हूँ. अब किसे पता कि कौन से किरदार में खुद को खोज लूँ? इसीलिए मैं कभी ये बनती रहती हूँ तो कभी वो. आप समझ रहे हैं न? वैसे भी आप तो फिलास्फी और योगा के देश के हैं तो आशा है कि आपको मेरी बात समझ में आ गई होगी.

चंदू: हाँ-हाँ समझ में आ गई. आपकी बात समझ में आ गई. वैसे ये बताएं कि आप इस बार इंडिया क्यों आई हैं?

पैरिस हिल्टन: मैं बैग बेचने आई हूँ. मैंने एक बैग लॉन्च किया तो सोचा कि इसे इंडिया में बेंचा जाय.

चंदू: लेकिन आपको क्यों लगा कि इंडिया में आपका बैग बिक जाएगा?

पैरिस हिल्टन: वो अभी हाल ही में आपके फिनांस मिनिस्टर हमारे देश में थे. उन्होंने वहाँ बताया कि इंडिया एट प्वाइंट फाइव परसेंट से ग्रो करेगा. उनकी बात हमारे एजेंट ने कहीं सुन ली और हमसे बोला कि अगर ऐसा है तो सारा रुपया तो इंडिया में होगा. और अगर सारा रुपया इंडिया में होगा तो उसे रखने के लिए बैग की सबसे ज्यादा ज़रुरत इंडिया के लोगों को होगी. ऐसे में इंडिया मेरे बैग के लिए सबसे बड़ा मार्केट है.

चंदू: बहुत बढ़िया. और आप यहाँ आई हैं तो किस-किस से मिलना चाहेंगी आप?

पैरिस हिल्टन: मैं राखी सावंत से मिलना चाहूँगी. मैंने उनके बारे में बहुत सुना है. हमारे देश में मुझे लोग़ यूएस का राखी सावंत कहते हैं तो मैंने सोचा कि इस महान हस्ती से मिलना चाहिए मुझे. और मिलने की बात है तो मेरे पास सिमी गरेवाल के शो पर जाने की ऑफर आई थी लेकिन मेरे एजेंट ने जाने से मना कर दिया. मैंने सुना है कि उनके शो पर चाहे हमारे प्रेसिडेंट ओबामा भी चले जायें तो भी लोग़ सिमी गरेवाल को ही देखेंगे. अब आप ही बताएं कि ऐसे शो पर जाने का क्या फायदा?

चंदू: आपने बिलकुल सही कहा मैडम. एक बार क्या हुआ कि एक बहुत बड़ा टीवी पत्रकार, मैं नाम नहीं लेना चाहूँगा, वह सिमी गरेवाल के शो पर गया और वापस आकर मुँह लटका कर बैठ गया. तीन दिन तक घर से नहीं निकला. बाद में लोगों ने पूछ तो उसने बताया कि सिमी के शो पर लोग़ उसे नहीं बल्कि सिमी गरेवाल को देख रहे थे. आपने बिलकुल ठीक किया. वैसे एक सवाल यह था मैडम कि सुना कि आपने एक भिखारी को सौ डॉलर दिए? क्या यह सच है?

पैरिस हिल्टन: हाँ यह सच है.

चंदू: आपने भिखारी के साथ फोटो भी खिंचाया या नहीं?

पैरिस हिल्टन: चंदू जी, आपतो जानते ही हैं. मैंने उसके साथ फोटो खिंचाने के लिए ही तो उसे पैसे दिए. हमें हमारी फोटो बहुत प्यारी लगती हैं. और मैं अपने फोटो के लिए कुछ भी कर सकती हूँ.

चंदू: वैसे मैडम एक सवाल था. सुना है आप कन्वर्ट हो गई हैं और आपने इस्लाम धर्म क़ुबूल कर लिया है?

पैरिस हिल्टन: क़ुबूल तो हम कुछ नहीं करते चंदू जी. हाँ, कन्वर्ट हो सकते हैं. हे हे हे ....आप समझ रहे हैं न.

चंदू: हाँ-हाँ, मैडम मैं समझ गया. वैसे आख़िरी सवाल यह था कि आपन अगली बार कब आएँगी इंडिया? और क्या बेचने आएँगी?

पैरिस हिल्टन: हे हे हे..चंदू जी आप तो जानते ही हैं. हम अमेरिका वाले हैं. ऐसे में बेचने के लिए हमारे पास बहुत कुछ है. जब इच्छा हुई कुछ न कुछ बेंचने वापस आ जायेंगे.

चंदू: अगली बार आएँगी तो मैं मिलूंगा मैडम आपसे. फिर से ज़रूर इंटरव्यू दीजियेगा.

पैरिस हिल्टन: अरे चंदू जी, ज़रूर. आपके लिए तो मेरी...

चंदू: मेरी क्या? मेरी क्या मैडम? आपके लिए मेरी क्या?

पैरिस हिल्टन: अरे अरे...मेरा मतलब यह था कि आपके लिए मेरी इंटरव्यू भी हाज़िर है.

चंदू: मेरी इंटरव्यू नहीं मैडम, मेरा इंटरव्यू. ओके मैडम आपको धन्यवाद.

पैरिस हिल्टन: ओके धान्यवाद. नमास्टे.

Thursday, October 6, 2011

यहाँ का रावण इतना छोटा है कि इसे तो शत्रुघ्न ही मार लेंगे...

आज विजयदशमी है. सुनते हैं भगवान राम ने आज ही के दिन (ग़लत अर्थ न निकालें. आज ही के दिन का मतलब ९ अक्टूबर नहीं बल्कि दशमी) रावण का वध किया था. अपनी-अपनी सोच है. कुछ लोग कहते हैं आज विजयदशमी इसलिए मनाई जाती है कि भगवान राम आज विजयी हुए थे. कुछ लोग ये भी कहते हुए मिल सकते हैं कि आज रावण जी की पुण्यतिथि है. आँखों का फरक है जी.

हाँ तो बात हो रही थी कि आज विजयदशमी है और आज ही के दिन राम ने रावण का वध कर दिया था. आज ही के दिन क्यों किया? इसका जवाब कुछ भी हो सकता है. ज्योतिषी कह सकते हैं कि उसका मरना आज के दिन ही लिखा था. यह तो विधि का विधान है. लेकिन शुकुल जी की बात मानें तो ये भी कह सकते हैं कि भगवान राम और उनकी सेना लड़ते-लड़ते बोर हो गई तो रावण का वध कर दिया.

आज एक विद्वान् से बात हो रही थी. बहुत खुश थे. बोले; "भगवान राम न होते तो रावण मरता ही नहीं. वीर थे राम जो रावण का वध कर पाये. अरे भाई कहा ही गया है कि जब-जब होई धरम की हानी...."

उन्हें देखकर लगा कि सच में बहुत खुश हैं. रावण से बहुत घृणा करते हैं. राम के लिए इनके मन में सिर्फ़ और सिर्फ़ आदर है. लेकिन उन्होंने मेरी धारणा को दूसरे ही पल उठाकर पटक दिया. बोले; "लेकिन देखा जाय तो एक तरह से धोखे से रावण का वध किया गया. नहीं? मेरे कहने का मतलब विभीषण ने बताया कि रावण की नाभि में अमृत है तब जाकर राम भी मार पाये. नहीं तो मुश्किल था. और फिर राम की वीरता तो तब मानता जब वे बिना सुग्रीव और हनुमान की मदद लिए लड़ते. देखा जाय तो सवाल तो राम के चरित्र पर भी उठाये जा सकते हैं."

उनकी बात सुनकर लगा कि किसी की प्रशंसा बिना मिलावट के हो ही नहीं सकती. राम की भी नहीं. यहाँ सबकुछ 'सब्जेक्ट टू' है.

शाम को घर लौटते समय आज कुछ नया ही देखने को मिला. इतने सालों से कलकत्ते में रहता हूँ लेकिन आज ही पता चला हमारे शहर में भी रावण जलाया जाता है. आज पहली बार देखा तो टैक्सी से उतर गया. बड़ी उत्सुकता थी देखने की. हर साल न्यूज़ चैनल पर दिल्ली के रावण को जलते देखते थे तो मन में यही बात आती थी; "हमारे शहर में रावण क्यों नहीं जलाया जाता. भारत के सारे शहरों में रावण जलाया जाता है लेकिन हमारे शहर में क्यों नहीं? कब जलाया जायेगा? "

दिल्ली वालों से जलन होती थी ऊपर से. सोचता था कि एक ये हैं जो हर साल रावण को जला लेते हैं और एक हम हैं कि पाँच साल में भी नहीं जला पाते.

लेकिन आज जो कुछ देखा, मेरे लिए सुखद आश्चर्य था. खैर, टैक्सी से उतर कर मैदान की भीड़ का हिस्सा हो लिया. बड़ी उत्तम व्यवस्था थी. भीड़ थी, मंच था, राम थे, रावण था और पुलिस थी. हर उत्तम व्यवस्था में पुलिस का रहना ज़रूरी है. अपने देश में जनता को आजतक उत्तम व्यवस्था करते नहीं देखा.

जनता सामने खड़ी थी. जनता की तरफ़ राम थे और मंच, जहाँ कुछ नेता टाइप लोग बैठे थे, उस तरफ़ रावण था. मंच के चारों और पुलिस वाले तैनात थे. देखकर लग रहा था जैसे सारे के सारे रावण के बॉडी गार्ड हैं.

मैं भीड़ में खड़ा रावण के पुतले को देख रहा था. मन ही मन भगवान राम को प्रणाम भी किया. रावण को देखते-देखते मेरे मुंह से निकल आया; "रावण छोटा है."

मेरा इतना कहना था कि मेरे पास खड़े एक बुजुर्ग बोले; "ठीक कह रहे हैं आप. रावण छोटा है ही. इतना छोटा रावण भी होता है कहीं?"

मैंने कहा; "मुझे भी यही लगा. जब वध करना ही है तो बड़ा बनाते."

वे बोले; "अब आपको क्या बताऊँ? मैं तेरह साल दिल्ली में रहा हूँ. रावण तो दिल्ली के होते हैं. या बड़े-बड़े. कम से कम चालीस फीट के. हर साल देखकर लगता था कि इस साल का रावण पिछले साल के रावण से बड़ा है."

मैंने कहा; "दिल्ली की बात ही कुछ और है. वहां का रावण तो बहुत फेमस है. टीवी पर देखा है."

मेरी बात सुनकर उन्होंने अपने अनुभव बताने शुरू किए. बोले; "अब देखिये दिल्ली में बहुत पैसा है. वहां रावण के ऊपर बहुत पैसा खर्च होता है. और फिर वहां रावण का साइज़ बहुत सारा फैक्टर पर डिपेंड करता है."

उनकी बातें और अनुभव सुनकर मुझे अच्छा लगा. भाई कोई दिल्ली में रहा हुआ मिल जाए तो दिल्ली की बातें सुनने में अच्छा लगता है. मैंने उनसे कहा; "जैसे? किन-किन फैक्टर पर डिपेंड करता है रावण का साइज़?"

मेरा सवाल सुनकर वे खुश हो गए. शायद अकेले ही थे. कोई साथ नहीं आया था. लिहाजा उन्हें भी किसी आदमी की तलाश होगी जिसके साथ वे बात कर सकें.

'दो अकेले' मिल जाएँ, बस. दुनियाँ का कोई मसला नहीं बचेगा. मेरा सवाल सुनकर उनके चेहरे पर ऐसे भाव आए जिन्हें देखकर लगा कि बस कहने ही वाले हैं; "गुड क्वेश्चन."

लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा बल्कि बड़े उत्साह के साथ बोले; "बहुत सारे फैक्टर हैं. देखिये वहां तो रावण का साइज़ नेता के ऊपर भी डिपेंड करता है. समारोह में जितना बड़ा नेता, रावण का कद भी उसी हिसाब से बड़ा समझिये. अब देखिये कि जिस समारोह में प्रधानमन्त्री जाते हैं, उसके रावण के क्या कहने! या बड़ा सा रावण. चालीस-पचास फीट का रावण. उसके जलने में गजब मज़ा आता है. कुल मिलाकर मैंने बारह रावण देखे हैं जलते हुए. बाजपेई जी के राज में भी रावण बड़ा ही रहता था."

मैंने कहा; "सच कह रहे हैं. वैसे दिल्ली में पैसा भी तो खूब है. यहाँ तो सारा पैसा दुर्गापूजा में लग जाता है. ऐसे में रावण को जलाने में ज्यादा पैसा खर्च नहीं कर पाते."

मेरी बात सुनकर बोले; "देखिये, बात केवल पैसे की नहीं है. दिल्ली में बड़े-बड़े रावण केवल पैसे से नहीं बनते. रावण बनाने के लिए पैसे से ज्यादा महत्वपूर्ण है डेडिकेशन. कम पैसे खर्च करके भी बड़े रावण बनाये जा सकते हैं. सबकुछ डिपेंड करता है बनानेवालों के उत्साह पर. और इस रावण को देखिये. देखकर लगता है जैसे इसे मारने के लिए राम की भी ज़रूरत नहीं है. इसे तो शत्रुघ्न ही मार लेंगे."

मैंने कहा; "हाँ, वही तो मैं भी सोच रहा था. सचमुच काफी छोटा रावण है."

मेरी बात सुनकर बोले; "लेकिन देखा जाय तो अभी यहाँ नया-नया शुरू हुआ है. जैसे-जैसे फोकस बढ़ेगा, यहाँ का रावण भी बड़ा होगा..."

अभी वे अपनी बात पूरी करने ही वाले थे कि राम ने अग्निवाण दाग दिया. वाण सीधा रावण के दिल पर जाकर लगा. रावण जलने लगा.

चलिए हमारे शहर में भी रावण जलने लगा. अगले साल फिर जलेगा. फिर विजयदशमी आएगी....... और रावण की पुण्यतिथि भी.


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नोट: पुरानी पोस्ट है. साल २००८ की.

Saturday, October 1, 2011

अमन की बात करे जब, करे तकरार के साथ....

कट्टा कानपुरी की तथाकथित ग़ज़ल बांचिये. पूरे डेढ़ सौ ग्राम शुद्ध तुकबंदी है.



अमन की बात करे जब, करे तकरार के साथ,
मिला करे है गले भी, मगर तलवार के साथ.

बताये मार्क्स, माओ, लेनिन को अपना रहबर
दौड़ता रहता है वो भी, इसी बाज़ार के साथ.

वक़्त के साथ पैमाना भी खाली,महफ़िल भी
लिपटकर रोयेगा फिर वो किसी दीवार के साथ

मिटाकर चंद गरीबों को हुकूमत समझे
मुल्क अब दौड़ेगा तेजी से इस संसार के साथ

न समझा है, न समझेगा वो खामोशी की ताक़त
पड़ोसी फिर मिलेगा झूठी इक ललकार के साथ

हमें उम्मीद थी जिससे कि, उठाएगा सवाल
दिखाई रोज देता है वही सरकार के साथ

समझते हैं सभी 'कट्टा' को सितमगर लेकिन
खड़ा मिलेगा हमेशा किसी हकदार के साथ