Tuesday, December 24, 2013

दुर्योधन की डायरी - पेज ५८६

द्रौपदी स्वयंवर के पश्चात युवराज लिखते हैं;



फिर से पराजय. पराजय पर पराजय. लगता है जैसे मेरे भाग्य में पराजय के अलावा और कुछ लिखा ही नहीं. उधर अर्जुन तीर चलाकर द्रौपदी को वर ले गया और इधर मैं महाराज द्रुपद का धनुष तक न उठा सका. संतोष इसबात का है कि मैं अकेला योद्धा नहीं जो धनुष नहीं उठा सका. महाराज विराट, शिशुपाल, जरासंध, महाराज शल्य, भगदत्त कौन उठा सका द्रुपद के धनुष को? न ही मेरे भाई उठा सके. दुशासन, युयुत्स, दुर्मुख, विकर्ण, सब के सब धराशायी हुए लेकिन मीडिया और विशेषज्ञ हैं कि मेरे ही पीछे पड़े हुए हैं.

मैं पूछता हूँ और कुछ नहीं है दिखाने को?

मामाश्री ने कितनी कोशिश की कि मीडिया मेरी पराजय को कम और भरी सभा में द्रौपदी द्वारा मित्र कर्ण को सूतपुत्र कहे जाने वाले मामले को ज्यादा उछाले लेकिन ये मीडिया वाले मानते ही नहीं. एकबार तो मन में आया कि शायद इनलोगों को पिछले महीने का हफ्ता नहीं मिला इसलिए ये मेरे पीछे पड़े हुए हैं लेकिन खुद दुशासन ने कहा कि अभी दस दिन पहले ही उसने खुद सम्पूर्ण हस्तिनापुर की मीडिया को अपने हाथों से उनका हफ्ता थमाया था.

अब तो मुझे मामाश्री की बात में सच्चाई दिखाई दे रही हैं कि ये लोग बार-बार मेरी पराजय की चर्चा करके अपना रेट बढ़ाना चाहते हैं.

हमलोग तो इसबात पर भी राजी हो गए थे कि ठीक है मेरी पराजय की बात न करके अर्जुन द्वारा द्रौपदी को जीत लिए जाने की ही चर्चा करो. उसी पर पैनल डिस्कशन करवाओ फिर भी ये नहीं मान रहे. वो तो भला हो मामाश्री का जिन्होंने प्रजा के लोगों के नाम से अखबारों और टीवी चैनलों में सवाल उठवाये कि "जब दुर्योधन और अर्जुन, दोनों को जब गुरु द्रोण ने ही धनुर्विद्या सिखाई तो फिर ऐसा क्यों है कि अर्जुन ने तो महाराज द्रुपद द्वारा बनाये लक्ष को वेध दिया परन्तु दुर्योधन या उसका कोई भी भाई ऐसा नहीं कर सका?" या कि; "कहीं ऐसा तो नहीं कि गुरु द्रोण ने कुछ धनुर्विद्या कुरु राजकुमारों को सिखाई ही नहीं?" और "अगर यही सच है तो फिर गुरु द्रोण को अपने पद पर बने रहने का अधिकार है?"

ये सवाल उठे तब जाकर मीडिया का ध्यान गुरु द्रोण की तरफ गया और मुझे थोड़ी राहत मिली. अच्छा है इसी बहाने गुरु द्रोण की भी थोड़ी छीछालेदर हो गई. ये मेरे बचपन से ही मुझसे जलते रहे हैं.

वैसे विरोधी गुट के दो-तीन विशेषज्ञों ने तो बोलना शुरू भी कर दिया था कि मैंने तीर चलाने की कभी प्रैक्टिस ही नहीं की. कि मैं हमेशा केवल षड्यंत्र में ही बिजी रहा. कि मुझे मामाश्री के साथ मदिरापान करने और तीन पत्ते खेलने के अलावा कुछ आता ही नहीं. कि मैं ऐसा नकारा हूँ जो न तो धनुर्विद्या ही सीख पाया और न ही राजनीति. कि मेरी राजनीति का अर्थ केवल षडयंत्र करना है. कि मैंने अब तक केवल अधर्म का साथ दिया है. कि मेरी वजह से ही हस्तिनापुर अधर्म फ़ैल गया है. कि मैंने कभी इसके विरुद्ध कुछ नहीं कहा.

आखिरकार इसे रोकने के लिए मामाश्री को फिर से सामने आना पड़ा. उन्होंने अपने प्रिय टीवी ऐंकर को आज्ञा दी कि ऐसे विशेषज्ञों को बोलने ही नहीं दिया जाय. बाद में जैसे ही इन विशेषज्ञों ने ऐसे मुद्दे उठाए, ऐंकर ने शोर मचाकर उन्हें बोलने ही नहीं दिया.

ये विशेषज्ञ मेरे पीछे कई वर्षों से पड़े हुए हैं. मुझे याद है जब गुरु द्रोण ने हम राजकुमारों के शिक्षा देने के बाद गुरुदक्षिणा में हमें पांचाल नरेश द्रुपद को बंदी बनाकर उनके हवाले करने के लिए कहा था और सर्वप्रथम मैं अपने भाइयों और अपनी सेना लेकर द्रुपद को बंदी बनाने के लिए उनके राज्य पर आक्रमण कर दिया था परन्तु हार गया था. इन विशेषज्ञों ने मेरी बहुत खिल्ली उड़ाई थी. कुछ ने तो यहाँ तक कहा था कि मुझे और राजाओं के साथ संधि करके उन्हें साथ लेकर महाराज द्रुपद पर आक्रमण करना चाहिए था. अब इन्हें कौन बताये कि शिक्षा लेकर पाठशाला से निकले नौजवान के मन में पूरी दुनियां के सामने खुद को प्रूव करने का अवसर भी कुछ होता है. ऊपर से पाठशाला में गुरु द्रोण ने खुद हमसब को "लीडिंग फ्रॉम द फ्रंट" का सिद्धांत बताया था. अब ऐसे में एक राजकुमार दूसरे राजाओं के साथ संधि करके किसी राजा पर आक्रमण करेगा तो उसकी बेइज्जती नहीं होगी?

ये विशेषज्ञ तभी से मुझे नाकारा साबित करने पर तुले हुए हैं और आजतक करते जा रहे हैं. उस समय भी मामाश्री मेरी रक्षा के लिए मैदान में आये थे और उन्होंने अपनी मीडिया के थ्रू यह स्टोरी चलवाई थी कि मीडिया के लिए मेरी पराजय से ज्यादा महत्वपूर्ण है इसबात पर चर्चा करना कि जब अर्जुन ने महाराज द्रुपद को बंदी बना ही लिया था तो क्या जरूरत थी भीम को पांचाल नरेश के सैनिकों, अश्वों और हाथियों को मारने की? उधर मीडिया ने इस स्टोरी को उछाला इधर कुछ एनिमल राइट्स ऐक्टिविस्ट्स और कुछ सोल्जर राइट्स ऐक्टिविस्ट ने मामले को तूल दिया था तब जाकर लोगों का ध्यान मेरी विफलता से हटकर भीम के कर्म पर डाला गया. बड़ी ऐसी-तैसी हुई थी भीम की उस समय.

परन्तु ये विशेषज्ञ भी बड़े हेहर टाइप हैं. ये बीच-बीच में किसी न किसी मुद्दे पर मेरी आलोचना करने का मौका ढूढ़ ही लेते हैं. कभी यह कहते हैं कि मैंने लाक्षागृह में पांडवों को जलाकर मार देने का षड़यंत्र रचा तो कभी यह कहते हैं कि मैंने बचपन में भीम को खीर में जहर मिलाकर मारने का षड़यंत्र रचा. अब इन्हें कौन समझाये कि एक युवराज के लिए षड़यंत्र से महत्वपूर्ण कर्म भी कोई होता है क्या? युवराज षड़यंत्र नहीं करेंगे तो क्या खेतों में जाकर धान काटेंगे? ऊपर से कभी-कभी ये लोग यह कहते हुए नया पैतरा शुरू कर देते हैं कि अगर मौका मिलता तो दुशाला शायद कुरुवंश को मुझसे बहुत ज्यादा कुशलता से नेतृत्व देती.

मेरी भी समझ में नहीं आता कि मेरे भाग्य में केवल पराजय ही क्यों है?

खैर, मामाश्री ने आज शाम को सलाह दी कि मैं अपनी नेतृत्व की क्षमता को दर्शाने के लिए जगह-जगह जाकर लोगों से मिलूँ. कह रहे थे कि इस पराजय पर से मीडिया और प्रजा का ध्यान हटाने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि मैं हस्तिनापुर में वर्षों से चल रहे सिस्टम को बदलने की बात कर दूँ. कि मैं हस्तिनापुर वासियों को आगाह करूँ कि प्रजा को सत्य के मार्ग पर चलना चाहिए. कि उसे यह ध्यान रखना चाहिए कि वे सपने में भी अधर्म के मार्ग पर कभी न जाएँ. कि प्रजा को आपसी भाई-चारा बढ़ाने की जरूरत है. कि हमें नए मूल्य स्थापित करने की आवश्यकता है. कि आज हस्तिनापुर में सबसे बड़ी समस्या अधर्म है. कि जल्द ही मैं अपने निर्णय प्रजा से पूछकर लूँगा.

जब मामाश्री मुझे यह समझा रहे थे तो दुशासन ने खिस्स से हँस दिया. मैंने कर्ण की तरफ देखा और बनावटी गुस्सा दिखाते हुए दुशासन से पूछा; "क्यों हँसा तू?"

वो बोला; "भ्राताश्री, अब आप जो भी अधर्म के कार्य करेंगे उसमें प्रजा की भी हिस्सेदारी होगी"

और हमसब ठहाका लगाकर हँसने लगे.

अब सोने चलता हूँ. सुबह जल्दी उठकर भाषण याद करना है. कल दोपहर हस्तिनापुर चेम्बर्स ऑफ़ कॉमर्स में व्यापारियों को सम्बोधित करना है.

Wednesday, November 13, 2013

चंदू इन एक्सक्लूसिव चैट विद सचिन'स बैट

सचिन रिटायर हो रहे हैं. मुम्बई में होनेवाले टेस्ट मैच के बाद क्रिकेट नहीं खेलेंगे. मीडिया के कार्यक्रमों को देखकर लग रहा है जैसे किसी ने उनसे कह दिया है कि; "बस सात दिन, सचिन के क्रिकेटीय जीवन के सात दिन हैं तुम्हारे पास. जो लिख सकते हो लिख दो. जो कह सकते हो कह दो. जो दिखा सकते हो दिखा दो. प्राइम टाइम, लंच टाइम, टी टाइम, हर टाइम सचिन के नाम लिख दो. पिछले बीस वर्षों से जो भी दिखाते आये हो, फिर से आख़िरी बार के लिए दिखा डालो"

सब लगे हुए हैं. कोलकाता टेस्ट के ख़त्म हो जाने के बाद चंदू ने मुझसे कहा; "सब सचिन का इंटरव्यू ले रहे हैं, आप कहें तो मैं भी ले लूँ."

मैंने कहा; "बिल्कुल ले लो. सचिन के रिटायरमेंटी यज्ञ में ब्लॉगरीय हवन हो जायेगा."

वो गया. शाम को वापस आया तो मुंह लटका हुआ था. मैंने पूछा; "क्या हुआ? मुंह लटकाये खड़े हो?"

वो बोला; "लोगों ने सचिन को पुरस्कार लेने के लिए, फ़ोटो सेशन के लिए, डिनर के लिए और न जाने क्या-क्या के लिए बिजी कर दिया. उनका इंटरव्यू मिला ही नहीं."

मैंने पूछा; "फिर?"

वो बोला;"फिर क्या? ड्रेसिंग रूम के एक कोने में उनका बैट पड़ा था. मैंने कहा इसी का इंटरव्यू ले लिया जाय. वैसे भी उनके ड्राइवर, पड़ोसी, सास, बचपन के दोस्त वगैरह टीवी वालों को इंटरव्यू देंगे कि किसी ब्लॉग पत्रकार को? अब लीजिये यही छाप दीजिये. वैसे भी आपने बहुत दिनों से ब्लॉग पर कोई इंटरव्यू नहीं छापा."

तो पेश हैं सचिन के बैट का इंटरव्यू. बांचिये.

चंदू : नमस्कार बैट जी. स्वागत है आपका इस इंटरव्यू में.

बैट : आदाब चंदू भाई. आपका शुक्रिया कि आपने मुझे इस इंटरव्यू में मधो किया. कोई मुझे मुँह नहीं लगाता लेकिन आपने मुझे जो इज्जत दी है उसके लिए मैं आपका मशकूर हूँ."

चंदू : अरे आप तो उर्दू भी जानते हैं!

बैट : कैसे नहीं जानेंगे जनाब? मेरी पैदाइश कश्मीर की है. वैसे अगर आपको उर्दू के शब्द अटपटे लग रहे हों तो मैं हिंदुस्तानी जबान में इंटरव्यू दे लूँगा.

चंदू : शुक्रिया शुक्रिया. मेरा पहला सवाल है कि आपको कैसा लग रहा है?

बैट : आप क्या पहले टीवी पत्रकारिता में थे चंदू जी?

चंदू : अरे आपको कैसे पता?

बैट : यह घटिया सवाल तो टीवी वाले पूछते थे. आप तो बोले कि आप ब्लॉग पत्रकार हैं.

चंदू : अरे ऐसा नहीं है. वैसे मेरा अगला सवाल यह है कि चौबीस साल तक सचिन के साथ रहने के बाद अब आप भी रिटायर होने वाले हैं ऐसे में कैसा महसूस कर रहे हैं?

बैट : वैसा ही जैसा सचिन महसूस कर रहे हैं. अब मैं भी घरवालों के लिए समय दे सकूँगा। बेटे की शिकायत रहती थी कि पापा पैरेंट्स डे पर भी स्कूल नहीं गए कभी. अब उसके स्कूल जा सकूँगा. उसे एक सफल बैट बनने के गुर सिखा सकूँगा। लगातार इतने सालों तक गेंदो से लड़ा. अब थोडा आराम करूँगा.

चंदू : हाँ, आपने गेंदों से बहुत लड़ाई की. वैसे ये बताइये कि आपको क्या पहले से ही पता था कि आप सचिन के बैट बनेंगे?

बैट : यह अच्छा सवाल किया आपने. देखिये मैं जिस पेड़ से निकला शायद उसको पता था. बड़ी इंटरेस्टिंग स्टोरी है. कहते हैं कि जब वह छोटा था तो एकबार जंगल का एक ठेकेदार उसको काटने आया. उसने ठेकेदार से विनती करते हुए कहा मुझे इतनी कच्ची उम्र में मत काटो. मुझे भगवान के लिए छोड़ दो. और देखिये कि ठेकेदार ने उसे सचमुच भगवान के लिए ही छोड़ दिया. मेरा जनम उसी पेड़ से हुआ.

चंदू : अच्छा ये बताइये कि किस बॉलर का बाल ठोंकने में आपको खूब आनंद आता था.

बैट : चंदू जी, ये किस तरह का अश्लील सवाल कर रहे हैं आप?

चंदू : अरे बैट जी, मेरा मतलब वो नहीं था जो आप समझ रहे हैं.

बैट : नहीं, आपको सवाल पूछने से पहले याद रखना चाहिए कि आप सचिन तेंदुलकर के बैट से सवाल पूछ रहे हैं, हरभजन सिंह के बैट से नहीं. वैसे मैं आपका आशय समझ गया मैं और आपको बताऊँ कि मुझे शेन वार्न और मैग्रा का बाल पीटने में खूब मजा आता था. यू कैन से आई हैड बाल ऑफ़ अ टाइम हिटिंग वार्न एंड मैग्रा.

चंदू : और किस बॉलर के बॉल से आपको खीज होती थी?

बैट : शोएब अख्तर के बॉल से. वो इतनी दूर से दौड़ के आता था कि बॉल फेंकने से पहले जो इंतज़ार करना पड़ता था उससे मैं बोर हो जाता था.

चंदू : अच्छा ये बताएं कि आपने तो दुनियाँ भर घूम के बॉल की पिटाई की है. कौन सा शहर आपको सबसे अच्छा लगा?

बैट : सिडनी. सिडनी मुझे सबसे अच्छा लगता था. वैसे चेन्नई भी काफी अच्छा लगा मुझे.

चंदू : अच्छा ये बताइये कि चौबीस सालों में आपकी बात ड्रेसिंग रूम में और भारतीय खिलाड़ियों के बैट से होती रही होगी. किस खिलाडी के बैट से आपकी नहीं बनती थी?

बैट : अज़हरुद्दीन के बैट से. वो हमेशा हल्का रहा और जब भी बात करता, मुझे मोटू कहकर चिढ़ाता था. कहता था वेट कम कर मोटू अपना वेट कम कर मोटू अपना. बहुत चिढ़ाया उसने मुझे. फिर एक दिन मैंने दो टूक सुना दिया तब जाकर बंद हुआ.

चंदू : क्या कहा आपने उससे?

बैट : मैंने उससे कहा कि मैं वजनदार खिलाडी का बैट हूँ बे इसलिए वजनदार हूँ तू हलके खिलाडी का बैट है इसलिए हल्का है.

चंदू : और किस खिलाडी के बैट से आपकी खूब जमती थी?

बैट : धोनी के बैट से. वो भी वजनी और मैं भी वजनी. इसलिए दोनों में खूब बनती थी.

चंदू : अच्छा ये बताएं कि आपको क्या ऐसा भी लगता था कि आप का मैदान में जाना निरर्थक रहा?

बैट : हाँ, जब भी सचिन बॉल को पैड से खेलते थे तो मेरे मन में आता था कि मेरा जीवन किस काम का जब पैड से ही खेलना है तो?

चंदू: अच्छा ये बताएं कि आपको कौन सा शॉट लगाने में सबसे ज्यादा मज़ा आता था?

बैट : स्ट्रेट ड्राइव. जब वे स्ट्रेट ड्राइव लगाते थे तो मैं बॉल के साथ खुल के मिलता था. लगता था जैसे बॉल से गले मिल रहे हैं. आप खुद ही सोचिये कि खुल के गले मिलने में जो मज़ा है वह हाथ जोड़ के मिलने में कहाँ मिलेगा? हाँ जब वे डिफेंसिव शॉट खेलते थे तो मुझे लगता था जैसे मैं बॉल से हाथ जोड़ के मिलना पड़ रहा है. और बॉल से हाथ जोड़ के मिलना मुझे बिलकुल पसंद नहीं था.

चंदू : अच्छा ऐसा भी कोई शॉट था जिसकी वजह से आपको तकलीफ होती थी?

बैट : पैडल-स्वीप, वे जब पैडल-स्वीप मारते थे तो कई बार मुझे ज़मीन से घिसटना पड़ता था. फिर भी ये सोच के घिसट लेता था कि कोई बात नहीं इसबार घिसट ले. अगली बार बॉल से खुल के मिलेंगे.

चंदू : अच्छा बैट जी, ये बताइये कि सचिन की कोई आदत जिससे आपको कोफ़्त होती थी?

बैट : हाँ जब ओवर के दौरान वे मुझी पटक पटक कर क्रीज समतल बनाते थे तब थोड़ी कोफ़्त होती थी. वैसे मुझे गुस्सा उनके ऊपर नहीं आता था, मुझे पिच क्यूरेटर के ऊपर गुस्सा आता था. मुझे लगता था कि पिच क्यूरेटर ने अपनी ड्यूटी सही तरह से क्यों नहीं की?

चंदू : और कभी किसी बात के लिए आपको बुरा लगता था?

बैट : हाँ लगता था न. जब कमेंटेटर लोग सचिन के बॉटम ग्रिप की बात करते थे. मुझे लगता था कैसी अश्लील बातें कर रहे हैं ये लोग? बॉटम ग्रिप। छि.

चंदू : हा हा हा. अच्छा और कोई मौका जब आपको कुछ अच्छा नहीं लगा हो?

बैट : हाँ ऐसे कई मौके आये. जैसे टेस्ट मैच के पहले वाली रात वे होटल रूम में बॉल लटका कर प्रैक्टिस करते थे तो मुझे अच्छा नहीं लगता था. अरे कल सुबह टेस्ट मैच है और रात भर बैट को सोने नहीं दोगे तो वह सुबह जाकर कैसे परफॉर्म करेगा?

चंदू : अच्छा कोई ऐसी इनिंग जब उसके दौरान आपको कष्ट हुआ हो?

बैट : कष्ट कभी नहीं हुआ मुझे. मैं सचिन का बैट था, किसी आम खिलाडी का नहीं. हाँ वैसे आपने पूछ ही लिया है तो बता दूँ कि शारजाह वाली इनिंग में जब आंधी आ गई थी तब सचिन ने मुझे पिच पर लिटा दिया था और मेरी आँख में रेत घुस गई थी. मैंने उनको बताया तो बोले कि नाराज मत हो, अभी होटल चलेंगे तो तुझे नहला देंगे और सब ठीक हो जाएगा.

चंदू : और कोई यादगार दिलचस्प बात जो आपको हमेशा याद रहेगी?

बैट : एक-दो नहीं, बहुत सी बातें हैं. वैसे एक बात बड़ी हंसने वाली बताता हूँ आपको. जब उनको टेनिस एल्बो हुआ तो मैंने उनसे कहा कि आप क्रिकेट के इतने बड़े खिलाडी हैं. मैं आपके साथ हमेशा से रहा हूँ. मैंने आजतक चलने से कभी मना नहीं किया. ऐसे में आपको टेनिस खेलने की क्या जरूरत थी जिससे आपका एल्बो हर्ट हो गया. मेरी बात सुनकर खूब हँसे. तब जब उन्होंने मुझे बताया कि टेनिस एल्बो क्या होता है तो मुझे भी अपनी बेवकूफी पर पर बड़ी हंसी आई.

चंदू : हा हा हा. अच्छा ये बताएं कि सचिन के रिटायर होने से इफेक्टिवेली आप भी रिटायर हो जायेंगे. कैसे बीतेंगे आपके दिन अब?

बैट : सच कहें तो सचिन के बिना मेरा कोई वजूद ही नहीं है चंदू जी. जैसे सचिन कई बार कह चुके हैं कि क्रिकेट के बिना वे अपना जीवन अधूरा मानते हैं वैसे ही मैं आपको बता दूँ कि मुझे सचिन के हाथों में रहने के अलावा और कुछ नहीं आता. फिर भी वे रिटायर हो जायेंगे तो मैं भी पहले कुछ दिन आराम करूँगा. अपना समय अपने परिवार को दूँगा. वैसे मैंने उनसे कहा कि मुझे अर्जुन की सेवा में लगा दें. लेकिन अगर वे नहीं लगाएंगे तो मैं अपने बेटे को एक सफल बैट बनाकर अर्जुन की सेवा में अर्पित कर दूँगा. मैंने सचिन के लिए काम किया. मेरा बेटा अर्जुन के लिए काम करेगा. हो सकता है उसका बेटा आगे चलकर अर्जुन के बेटे के लिए काम करे. तो जीवन तो देखिये किसी तरह से कट ही जायेगा. सचिन के घर में ही एक कोने में पड़ा रहूँगा. अब इस उमर में कहाँ जाऊँगा?

चंदू : चलिए मेरी भी शुभकामनाएं आपके साथ हैं. हम सभी यह चाहेंगे कि आपका आगे का जीवन अच्छे से कटे. इस इंटरव्यू के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद.

बैट : आपका भी इंटरव्यू लेने के लिए धन्यवाद चंदू जी.


Tuesday, October 1, 2013

गाँधी जी थैंक यू


हर साल की तरह इस साल भी २ अक्टूबर आ ही गया. हर साल की तरह इस साल भी भाषणों की झड़ी लगेगी, टीवी पर गाँधी फिल्म दिखाई जाएगी, रेडिओ पर "दे दी हमें आज़ादी बिना खडग बिना ढाल.…." बजेगा और टीवी पर चल रहे रियलिटी शो में लोग गाँधी जी के बहाने ऐ मेरे वतन के लोगों ………….गायेंगे. ऐसे में पेश है एक नेता का भाषण जो उसने २ अक्टूबर २०१२ के दिन अपनी जनता पर चेंप दिया था. आप बांचिये.

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सभा में उपस्थित देशवासियों, आज गाँधी जी का जन्मदिन है. यह न सिर्फ गाँधी जी के लिए बल्कि हमारे लिए भी सौभाग्य की बात है कि आज यानि २ अक्टूबर को गाँधी जी का जन्मदिन है. आज अगर उनका जन्मदिन नहीं होता तो न ही हमारे लिए यह सौभाग्य की बात होती और न ही हम उनका जन्मदिन मना पाते. ऐसे में हम कह सकते हैं कि आज के दिन जन्म लेकर उन्होंने हमसब को उनका जन्मदिन मनाने का चांस दिया जिसके लिए हम उनके आभारी हैं. भाइयों, देखा जाय तो मौसम के हिसाब से भी अक्टूबर के महीने में जन्म लेकर उन्होंने हमें एक तरह से उबार लिया. फर्ज करें अगर वे मई या जून के महीने में पैदा हुए होते तो गरमी की वजह से उनके जन्मदिन पर मैं शूट नहीं पहन पाता. अब आप खुद ही सोचिये कि बिना शूट के गाँधी जी जैसे महान व्यक्ति का जन्मदिन समारोह कितना फीका लगता. सच बताऊँ तो बिना शूट के मैं गाँधी जी का जन्मदिन मना ही नहीं पाता और अगर ऐसा नहीं होता तो बहुत बड़ा नुक्सान हो जाता. मुझे भाषण देने का चांस नहीं मिलता और आपको भाषण सुनने का चांस नहीं मिलता. ऐसे में हमारी और आपकी मुलाक़ात नहीं हो पाती. और आपतो जानते ही हैं कि नेता और जनता की मुलाकात न हो तो लोकतंत्र को क्षति पहुँचती है. इससे साबित होता है कि २ अक्टूबर लोकतंत्र के लिए भी शुभ है.

इन सारे संयोंग पर गहरे से सोचें तो कह सकते हैं कि गांधी जी हमसब का थैंक्स डिजर्व करते हैं. आइये लगे हाथ हम उन्हें थैंक्स कह ही दें. मैं कहूँगा गांधी जी और आपसब एक स्वर में कहेंगे थैंक यू.

गांधी जी
थैंक यू

गाँधी जी
थैंक यू

भाइयों, आपका तो नहीं पता लेकिन हमें बचपन से ही सिखाया गया कि हमें गांधीजी के रस्ते पर चलना है. हमारे पिताजी ने तो हमें यह सीख चार वर्ष की उम्र में ही दे दी थी कि हमें गाँधीजी के रस्ते पर चलने की जरूरत है. यह मैं आपको तब की बात बता रहा हूँ जब वे अपने एरिया के म्यूनिसिपल काउंसिलर थे. मुझे अच्छी तरह से याद है उन्होंने म्यूनिसिपल कारपोरेशन में संघर्ष करके हमारे मोहल्ले में पाँच सौ मीटर की एक सड़क बनवाई और उसका नाम गाँधी जी के नाम पर एम जी रोड रखा. मैं और मेरा छोटा भाई दोनों उस रोड पर चलकर स्कूल जाते थे. बाद में जब पिताजी ने म्यूनिसिपल कारपोरेशन में मेयर का पद हथिया लिया तब हम दोनों भाई उनकी आफिसियल कार में बैठकर उसी एम जी रोड के ऊपर से जाते थे. वैसे मोहल्ले के कुछ दुष्ट लोगों ने कानाफूसी करके यह बात फैला दी थी कि चूंकि मेरे दादाजी का नाम मुकुंदीलाल गुप्ता था इसलिए पिताजी ने रोड का नाम एम जी रोड रखा था. पिताजी और भगवान को पता है कि यह सच नहीं है.

भाइयों, आप खुद देखें कि अपने पिताजी के पढाये पाठ पर हम कितनी छोटी उम्र से अमल कर रहे हैं.

भाइयों, यह तो हुई मेरे पिताजी और मेरी बात. लेकिन आपलोग उनके रस्ते पर चलें उसके लिए सबसे पहले जरूरत है कि आप गाँधी जी के बारे में जानें. आखिर उनके बारे में बिना जाने आप उनके रस्ते पर कैसे चलेंगे? इसलिए मैं अब आपको गाँधी जी के बारे में बताता हूँ. भाइयों, गांधी जी ने वकालत की पढाई की थी जिससे वे वकील बन सकें. आप पूछ सकते हैं वे डॉक्टर या इंजिनियर क्यों नहीं बने? तो इसका जवाब यह है कि उन दिनों वकालत में जितना पैसा था, उतना डाक्टरी में नहीं था. दूसरी बात कह सकते हैं कि वकालत करना उस ज़माने में फैशन की तरह था. ऊपर से गाँधी जी इंटेलिजेंट थे और उनको पता था वकालत में बहुत पैसा था. भाइयों, वकालत में पैसा था तभी गांधी जी उस जमाने में फर्स्ट क्लास में चलते थे.

भाइयों, वकील बनकर उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में अपनी प्रैक्टिस शुरू की. वही दक्षिण अफ़्रीका जहाँ के हैन्सी क्रोनिये थे. हैन्सी क्रोनिये से याद आया कि जब मैं क्रिकेट बोर्ड का अध्यक्ष था तब एकबार दक्षिण अफ्रीकी टीम भारत के दौरे पर आई और मुझे हैन्सी क्रोनिये से मुलाकात करने का सौभाग्य प्राप्त …… (पब्लिक शोर करती हैं)

अच्छा अच्छा मैं मुद्दे पर आता हूँ. मैं जरा अलग लैन पर चला गया था. नहीं.. नहीं.. ऐसा न कहें, मैंने सोचा कि मैं आपसे अपना अनुभव बाटूंगा तो आपलोगों को प्रेरणा मिलेगी. वैसे आप चाहते हैं तो मैं वापस मुद्दे पर आता हूँ. तो भाइयों मैं कह रहा था कि गाँधी जी ने दक्षिण अफ्रीका में अपनी वकालत की प्रैक्टिस शुरू की. आप तो जानते ही हैं कि दक्षिणी अफ्रीका सोने की खानों के लिए प्रसिद्द है. इसीलिए मैंने गाँधी जी से प्रेरणा ली और आज आप खुद ही देखिये कि सोना मुझे कितना प्रिय है. मैं न सिर्फ सोना पहनता हूँ बल्कि संसद में भी सोने का कोई चांस हाथ से जाने नहीं देता.

भाइयों दक्षिणी अफ्रीका की बात चली हैं तो मैं आपको गांधी जी से संबंधित एक संस्मरण सुनाता हूँ. गाँधी जी हमेशा फर्स्ट क्लास में ही सफ़र करते थे. पैसे की कोई कमी तो थी नहीं उनको. तो एकबार वे फर्स्ट क्लास में बैठे कहीं जा रहे थे तो हुआ क्या कि वहां के एक अँगरेज़ टीटी ने उन्हें डिब्बे से बाहर फेंक दिया. मुझे पता है आपके मन में यह उत्सुकता होगी कि उस टीटी ने गाँधी जी को डिब्बे से बाहर कैसे फेंका? तो मैं कहना चाहूँगा कि जिन्होंने गाँधी फिल्म देखी है उन्हें तो पता होगा ही कि उस टीटी ने गाँधी जी को डिब्बे के बाहर कैसे फेंका था लेकिन जिन्होंने वह फिल्म नहीं देखी है उनके लिए मैं बताता चलूँ कि उस टीटी ने उन्हें वैसे ही फेंका जैसे हमलोग कई बार इमरजेंसी पड़ने पर फर्स्ट क्लास या सेकंड क्लास के यात्रियों को डिब्बे से बाहर फेंक देते हैं. अब देखिये हमने इतना बता दिया. जो नहीं बताया वो आपलोग कल्पना कर लीजिये.

तो मैं कह रहा था कि उस अँगरेज़ टीटी ने गाँधी जी को डब्बे से बाहर फेंक दिया. सच तो ये है कि उन दिनों वहां अंग्रेजों का राज था. और अँगरेज़ बहुत ख़राब होते थे. बहुत ख़राब माने बहुत खराब. लेकिन इसका मतलब क्या वे कुछ भी करते और गाँधी जी बर्दाश्त कर लेते? कदापि नहीं. अब वे अगर गाँधी जी को डिब्बे से बाहर फेंकेंगे तो क्या गाँधी जी चुप रहते? क्यों चुप रहते? क्या कोई विदाउट टिकेट चल रहे थे जो चुप रहते? बस जब टीटी ने उन्हें बाहर फेंका उसी दिन से गाँधी जी का अंग्रेजों से लफड़ा शुरू हो गया. उन्होंने उसी दिन कसम खाई कि वे अंग्रेजों को भारत में नहीं रहने देंगे. उनको पता था कि जो अँगरेज़ दक्षिण अफ्रीका में राज करते थे वहीँ अँगरेज़ भारत में भी राज करते थे. फिर क्या था, अंग्रेजों से बदला लेने के लिए वे भारत वापस आ गए. भारत आकर उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया. जाकर उनसे सीधा-सीधा कह दिया कि अंग्रेजों भारत छोड़ दो. अँगरेजों ने आना-कानी तो की लेकिन गाँधी जी भी कहाँ छोड़ने वाले थे? उन्होंने उनको भारत से भगा कर ही दम लिया. वो गाना तो सुना ही होगा आपने. अरे वही जो आज के दिन खूब बजता है. अरे वही बस मुंह में है याद नहीं ……हाँ, याद आ गया. वो गाना था न कि दे दी हमें आजादी बिना खडग बिना ढाल साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल.

मुझे पता है आपके मन में सवाल उठा रहा होगा कि ये साबरमती का संत कौन है? तो मैं आपको बता ही देता हूँ कि ये और कोई नहीं खुद गाँधी जी ही थे. वो क्या था कि साबरमती में ही उनका आश्रम था और आपतो जानते ही हैं कि आश्रम में संत रहते हैं इसलिए उनको साबरमती का संत कहा जाता है.

भाइयों, अब मैं आपको गांधी जी से सम्बंधित अन्य पहलुओं के बारे में बताता हूँ. आपको जानकर हैरानी होगी कि उनको बंदरों से बहुत प्यार था. आपके मन में बात आती होगी कि बन्दर भी कोई प्यार करने की चीज हैं? तो इसका जवाब मैं ये दूंगा कि दरअसल गाँधी जी श्री रामचन्द्र से बहुत प्रभावित थे इसलिए वे कई बार न सिर्फ रामराज की बात करते थे बल्कि वे श्री रामचन्द्र जी की तरह ही बंदरों से प्यार भी करते थे. सच तो ये हैं कि उन्हें बंदरों से उतना ही प्यार था जितना आजकल हम कुत्तों, गधों वगैरह से करते हैं.

आप पूछ सकते हैं कि गाँधी जी को बन्दर ही प्रिय क्यों थे? हमारी तरह उन्हें कुत्ते या गधे प्रिय क्यों नहीं थे? भाइयों, इस सवाल का जवाब जानने के लिए आपको थोडा इतिहास की पढाई करनी पड़ेगी. लेकिन चूँकि पढाई करने के लिए आपका साक्षर होना जरूरी है और हमने आपको साक्षर होने नहीं दिया इसलिए हमारी जिम्मेदारी बनती है कि हम आपको बताएं कि इतिहास में क्या लिखा गया गया है या फिर गाँधी जी के इस पहलू को लेकर इतिहासकार क्या कहते हैं? क्या विचार रखते हैं? तो भाइयों वैसे तो इतिहासकारों में इसको लेकर भिन्न-भिन्न मत हैं लेकिन ज्यादातर इतिहासकार यह मानते हैं कि उन दिनों देश के कुत्तों और गधों पर राजाओं और नवाबों का कब्ज़ा था. उन लोगों ने ही सारे कुत्तों और गंधों को पाल रखा था.

ऐसे में गाँधी जी ने बंदरों को चुना. आप ने देखा भी होगा कि उनके तीन बन्दर थे जो अपना कान, मुंह और आँख बंद रखते थे. भाइयों, वैसे तो बहुत लोग इन बंदरों से बहुत इम्प्रेस्ड रहते हैं लेकिन मैं आपको अपना पर्सनल विचार बताऊँ तो मुझे ये तीनों बन्दर कोई बहुत इम्प्रेसिव नहीं लगे. मैं पूछता हूँ कि जब भगवान ने आँख, कान, मुंह वगैरह दिए हैं तब उनको बंद रखने का क्या तुक है? मैं पूछता हूँ कि खुला रखने में कौन सा पैसा खर्च हो जाता? ऊपर से अगर आप साइंस के लिहाज से देखें तो वैज्ञानिक बताते हैं कि अगर अंगों का इस्तेमाल न हो तो उनके नष्ट हो जाने का भय रहता है. अब इन सब बातों को देखा जाय तो ये बन्दर सच में कोई इम्प्रेसिव बन्दर नहीं थे.

भाइयों, वैसे तो गाँधी जी महान थे लेकिन एक बात में वे कच्चे थे. वे अपने बेटों को आगे नहीं बढ़ा सके. देखा जाय तो एक पिता का असली कर्त्तव्य नहीं निभा सके. आप तो जानते ही हैं कि वे राष्ट्रपिता थे. मतलब भारत उनका था. ऐसे में उन्हें चाहिए था कि वे अपने बेटों को, पोतों को आगे बढाते. उन्हें प्रेजिडेंट, प्राइम मिनिस्टर, मिनिस्टर बनाते. लेकिन वे ऐसा नहीं कर पाए. मैं पूछता हूँ कि एक पिता का कर्त्तव्य क्या केवल अपने बच्चों का लालन पालन ही होता है? क्या पिता का यह कर्त्तव्य नहीं कि वह उसे पद दिलाये? अपने प्रभाव से जमीन का प्लाट दिला दे? कोई कंपनी खोल दे? यह सब वे नहीं कर सके तो यही एक बात है जहाँ वे न सिर्फ कच्चे साबित हुए बल्कि हमलोगों से पीछे रह गए. आखिर बच्चों का भला करना एक पिता का कर्त्तव्य है. आज मुझे ही देख लीजिये. मैं खुद केन्द्रीय मंत्री हूँ. मेरा एक बेटा सांसद है. दूसरा बेटा स्टेट कैबिनेट में है. उसका बेटा अपने शहर का मेयर …… भाइयों अब आप ही बताइए, इस मामले में हम बड़े कि वे?

फिर मैं यह सोचकर संतोष कर लेता हूँ भाइयों कि मैं भी तो उन्ही की संतान हूँ. अरे जो राष्ट्रपिता है उसकी संतान तो उस राष्ट्र का एक-एक नागरिक है. अब मैं आगे बढ़कर नेता बन गया तो समझ लीजिये कि उन्होंने मुझे आशीर्वाद दिया. आप वहीँ रह कर जनता बने रहे तो समझ लीजिये कि उन्होंने आपको आशीर्वाद नहीं दिया. सब आशीर्वाद का खेल है. मुझे तो गाँधी जी के अलावा मेरे पूज्यनीय पिताजी का भी आशीर्वाद प्राप्त था.

भाइयों, गाँधी जी तो महान थे. इतने महान थे कि उनकी गाथा का कोई अंत नहीं है. खुद मैं पिछले चालीस साल से आज के दिन उनके बारे में भाषण देता आ रहा हूँ लेकिन हर साल मुझे लगता है कि अभी कितना कुछ है उनके बारे में कहने को. हर साल मुझे सुनाने में मज़ा आता है और आपको सुनने में. इसका एक फायदा यह है कि उनकी गाथा पीढ़ी दर पीढ़ी चलती जा रही है. मुझे आशा है कि अगले वर्ष भी हमलोग इसी मैदान में मिलेंगे और मैं आपको उनके बारे में और बहुत सारी बातें बताऊँगा. तबतक चांस यह है कि मैं गृहराज्य मंत्री से प्रमोट होकर कोल मिनिस्ट्री में चला जाऊं. आजकल सबसे मलाईदार मिनिस्ट्री वही है. मैं कोयला मंत्री बन गया तो फिर गाँधी जी के बारे में कहानियां सुनाने का मजा और आएगा. भाइयों, कहानी जितनी पुरानी हो, उतनी मज़ा देती है. इसलिए मैं अपने इस वादे के साथ कि अगले साल इसी मैदान आपको फिर से कहानी सुनाऊंगा, आपसे विदा लेता हूँ.

तबतक के लिए बोलो गाँधी जी की जय!


डिस्क्लेमर: मैंने गाँधी-जयंती पर एक नेता का भाषण साल २००८ में लिखा था. अब आप नेताओं के स्पीच राइटर्स को तो जानते ही हैं. किसी ने उस नेता के भाषण को ब्लॉग से कॉपी कर के थोड़ी-बहुत हेर-फेर करके अपने मंत्री को दे दिया और उस मंत्री ने यह भाषण अपनी जनता पर २ अक्टूबर २०१२ के दिन चेंप दिया. यह वही भाषण है. यह डिस्क्लेमर मैंने उन लोगों के लिए लिखा है जिन्होंने २००८ वाला भाषण पढ़ रक्खा है:-)



Tuesday, September 24, 2013

दुर्योधन की डायरी - पेज १३७७

आज दिन भर बहुत व्यस्त रहा. प्रजा के लिए बनी महाराज भरत मुफ्त में पेट भरो योजना का उद्घाटन करने के लिए पिताश्री के साथ जाना पड़ा. जयद्रथ और दुशासन ने उद्घाटन समारोह के सारे इंतजाम बहुत मस्त किये थे. राजकवि तो काशीनरेश द्वारा आयोजित किसी कवि सम्मलेन में गए थे इसलिए योजना के लिए नारा लिखने का काम उप राजकवि ने किया. उन्होंने जो नारा लिखा वह भी ठीक-ठाक ही लगा. वैसे सिस्टर दुशाला ने सजेस्ट किया कि मुफ्त का गेंहू दो किलो, कार्ड दिखाओ और ले लो की जगह अगर दान का गेंहू दो किलो, कार्ड दिखाओ और ले लो होता तो अच्छा रहता. उसका कहना था कि ऐसा करने से बिना किसी मेहनत के यह बात प्रजा के बीच साबित हो जाती कि हमलोग दानी भी हैं. साथ ही यह बात एकबार फिर से बता दी जाती कि हम राजा है.

वह कह रही थी कि यह बात बीच बीच में प्रजा पर जाहिर करते रहना चाहिए क्योंकि कई बार प्रजा की हरकतों से लगता है जैसे वह हमारे राजत्व पर सवाल कर रही है.

राजमहल ने योजना के विज्ञापन के लिए कुल सत्रह अखबारों का फ्रंट पेज बुक कर लिया था. हस्तिनापुर एक्सप्रेस का तो फ्रंट और बैक-पेज दोनों ही बुक कर लिया गया था. एक समय था जब यह अखबार राजमहल के विरुद्ध खूब लिखा करता था. वो तो भला हो मामाश्री का जिन्होंने इसके नए संपादक को साध लिया और तब से अखबार हमारे पक्ष में लिखने लगा. मुझे याद है पहली बार इसी संपादक के साथ मिलकर मैंने और मामाश्री ने भीम को बदनाम किया था. गुप्तचरों द्वारा खींचकर लाई गई भीम और हिडिम्बा के विवाह की तस्वीरें सबसे पहले इसी संपादक के लिए लीक की गई थीं. साथ ही इस संपादक ने तमाम संपादकीय लिखकर साबित कर दिया था कि कैसे एक आर्य ने राक्षस कुल की एक कन्या के साथ विवाह कर घोर अपराध किया है. बड़ी थू थू हुई थी भीम की.

लिखना पड़ेगा कि प्रेस मैनेजमेंट के जो गुर मामाश्री ने तब सिखाये वह आजतक काम आ रहा है. आज ये अखबार न होते तो प्रजा को यह बताना कितना मुश्किल होता कि हाल ही में हमने चाय-पान की दुकानों पर जो स्पेशल मनोरंजन कर लगाया है वह कितना जरूरी था. इसी अखबार ने लोगों में यह बात फैलाई कि राजमहल का घाटा किस तरह से इतना बढ़ गया है कि नए कर जरूरी हो गए हैं. कैसे नहीं लगाता चाय-पान की दुकानों पर कर? प्रजा के लोग इन्हीं दुकानों पर बैठकर राजमहल और उसके लोगों की आलोचना करते हैं. जिसे देखो वह मुझे गाली देता है. मुझे अत्याचारी कहता है. दुशासन को अधर्मी कहता है. जयद्रथ के बारे में अनाप-सनाप बकता है. दुशासन ने यहाँ तक सुझाव दिया कि हस्तिनापुर में चाय-पान की दुकानों पर बैन लगा देना चाहिए. मैं तो तैयार हो गया था, वो तो कर्ण और मामाश्री ने बताया कि अगर इन दुकानों पर बैन लगा दिया गया तो लोगों में असंतोष बढ़ेगा. मामाश्री ने उसी दिन यह रहस्योद्घाटन किया कि प्रजा को आपस में बात करने से कभी रोकना नहीं चाहिए. बातचीत करने से उनके मन की भड़ास निकल जाती है. बोले; "हमें चाय और पान की दुकानों का आविष्कार करने वाले को धन्यवाद कहना चाहिए भांजे जिसने बहुत सोच समझकर इसका आविष्कार किया. अगर ये दुकानें न होंगी तो प्रजा अपनी भड़ास कहाँ निकालेगी? और यदि भड़ास न निकली तो उसके आन्दोलन का रूप लेने का खतरा हमेशा मंडराता रहेगा"

मामाश्री द्वारा सिखाये गए इसी पाठ का कमाल है कि प्रेस मैनेजमेंट में आजतक कोई दिक्कत नहीं आई. मुझे याद है, एकबार दुशासन ने पितामह और काकाश्री विदुर के हस्ताक्षर फोर्ज कर काशीनरेश को पत्र लिखकर आग्रह किया कि वे भीम को काशी नगरी में प्रवेश की अनुमति न दें क्योंकि उसने गुरु द्रोण की पाठशाला में मेरी और दुशासन की कुटाई की थी. पता नहीं कैसे वह पत्र हस्तिनापुर टाइम्स के हाथों लग गया और जब बात प्रजा के बीच निकल आई तब इसी संपादक ने अपने अखबार में तरह तरह से सम्पादकीय लिखकर यह बात फैलाई कि दरअसल वह पत्र दुशासन ने नहीं बल्कि पांडवों के दल में से ही किसी ने लिखा था क्योंकि पांडव एक-दूसरे को पसंद नहीं करते थे. जब यह लगा कि प्रजा को इसबात का विश्वास नहीं हो रहा है तब इस मामले को दबाने के लिए यह बात फैलाई गई कि माताश्री मुझसे, दुशासन और मामाश्री से बहुत रुष्ट हैं. खुद मामाश्री ने सम्पादक को यह आईडिया दिया कि वह ऐसा छापेगा तो लोगों का ध्यान उसपर चला जायेगा और काशीनरेश के नाम लिखे जाने वाले पत्र की बात दब जायेगी।

वैसे तो आज के कार्यक्रम के समय लिए जाने वाली तस्वीरों से कल के अखबार भरे रहेंगे लेकिन सुनने में यह भी आया है कि कुछ लोग इस योजना का विरोध कर रहे हैं. इन लोगों से निपटना मुझे अच्छी तरह से आता है. अगर यह भी नहीं कर सका तो फिर मामाश्री के रहने का क्या फायदा? मामाश्री ने चुनकर इक्यावन अर्थशास्त्री, इक्कीस अख़बारों के सम्पादक, ग्यारह बुद्धिजीवी, पाँच नाट्यकर्मी और एक सौ एक गुप्तचर को भाड़े पर ले लिया है जो यह फैलायेंगे कि यदि यह योजना लागू नहीं हुई तो प्रजा भूख से मर जाएगी और किस तरह से यह योजना महाराज भरत को असली श्रद्धांजलि होगी। मामाश्री ने प्लान बनाया है कि चूंकि आगे चलकर मुझे ही हस्तिनापुर का राज बनना है इसलिए प्रजा में यह सन्देश जाना जरूरी है कि इस योजना की रूपरेखा न सिर्फ मैंने तैयार की है बल्कि मैं ही यह निश्चित करूंगा कि यह योजना पूरी तरह से लागू हो और हर हस्तिनापुरवासी का कल्याण हो.

अब सोने चलता हूँ क्योंकि कल सुबह ही इन अर्थशास्त्रियों, संपादकों और बुद्धिजीवियों की क्लास लेकर उन्हें बताना है कि इस योजना के बारे में क्या-क्या बातें फैलानी हैं.

Friday, September 6, 2013

कबीर के दोहों के ट्विटरीय अर्थ

कबीरदास जी दोहे लिखते थे. तमाम लोग उनके दोहे पढ़कर बड़े हुए. कुछ ने उन दोहों से कुछ तो कुछ ने बहुत कुछ सीखा. इन दो के अलावा तीसरी तरह के लोगों ने उन्हें दूसरों के सामने बोलकर खुद के लिए ज्ञानी की उपाधि पक्की कर ली. इन तीनो के अलावा एक और प्रजाति है जिसने उनके दोहों का ब्लॉग खोल लिया और ट्विटर पर अकाउंट बनाकर उन्हें ट्वीट भी करते रहे.

ट्विटर पर कबीरदास जी के दोहे पढ़कर हमलोगों के मन में एकदिन आया कि अगर वे आज रहते तो ट्विटर पर जरूर होते और अपने दोहे ट्वीट करते तो उन्हें खूब आरटी मिलती. दोहों का साइज भी ऐसा कि ट्विटर पर एक सौ चालीस करैक्टर की शर्त में फिट बैठता है. फिर मन में आया कि अगर वे अपने दोहे ट्वीट करते तो तमाम लोग उन दोहों को स्लाई समझकर अपने-अपने हिसाब से उसका अर्थ निकालते. सोचकर देखिये कि कैसे कैसे भावार्थ निकाले जाते। यह पोस्ट कुछ ऐसे ही संभावित भावार्थों का संकलन है. आप बांचिये।

नोट: यह पोस्ट बीबीपी यानि ब्लॉगर-ब्लॉगर पार्टनरशिप की पोस्ट है जिसे मैंने और विकास गोयल जी ने लिखा है.


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पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।

उपरोक्त दोहे के माध्यम से कबीर दास जी सन्देश देना चाहते हैं कि हे ट्वीपल न ही मोटी-मोटी पुस्तकें पढने से और न ही अपने ट्विटर बायो में आईआईटी/आईआईएम लिख देने से ट्विटर पर पंडित या विद्वान कहलाये जाओगे. यह न भूलो कि ज्ञान नहीं, अपितु ज्ञान की बातें ट्विटर पर तुम्हारे विद्वान या पंडित कहे जाने का मार्ग प्रशस्त करती है. इसलिए हे ट्वीपल अगर विद्वान कहलाने की लालसा है तो फिर ट्वीट लिखकर बताओ कि ‘Just got my copy of ‘Human Psychology’ from flipkart, #nowreading.

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय,
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय।

उपरोक्त दोहे के माध्यम से कबीरदास ट्वीपल से कह रहे हैं कि टेक इट ईजी डूड. बार-बार मेंशन या प्लीज आरटी लिखने से कुछ नहीं होगा. हे ट्वीपल वैसे तो आईफ़ोन, आईपैड, एस-फोर वगैरह रखना ईजी है और धीरज रखना कठिन, किन्तु सफलता की कुंजी बताती है कि धीरज ही रखने की जरूरत है. जब तुम्हारा समय आएगा और सामने वाले को पता चल जायेगा कि तुम बड़ी कंपनी में उच्च-पद पर कार्यरत हो, तब तुम्हें आरटी अपने आप मिलने लग जाएगी क्योंकि सामनेवाला जबतक आरटी नहीं करेगा वह तुम्हें लिंक्ड-इन पर इनवाईट नहीं कर पायेगा.

निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय,
बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।

उपरोक्त दोहे के माध्यम से कबीरदास जी यह सन्देश देना चाहते हैं कि हे ट्वीपल अपने आलोचक को न केवल फालो करो अपितु उसे अपने और पास रखने के लिए उसके साथ डीएम का आदान-प्रदान भी करो. क्योंकि ट्विटर पर असली आलोचक वह होता है जो तुम्हारी गल्तियाँ तुम्हें बताकर उनमें सुधार कर पाए या न कर पाए, अपनी आलोचना से तुम्हें फेमस जरूर कर देता है.

जहाँ एक तरफ कुछ विद्वान इस दोहे का भावार्थ यह निकालते हैं वहीँ सोशल मीडिया के कुछ और भावार्थ-वीरों का मानना है कि यह दोहा कबीरदास जी ने एक्स्क्लुसिवली ऐसे ट्विटर सेलेब के लिए लिखा है जिन्हें अपनी असाधारण रूप से साधारण ट्वीट के लिए भी एपिक नामक टिप्पणी पढने का नशा होता है. कबीरदास जी ऐसे ट्विटर सेलेब्स को इस दोहे के माध्यम से सन्देश दे रहे हैं कि हे ट्वीपल तुम मानो या न मानो लेकिन सत्य यही है कि हरबार तुम ऐसा ट्वीट नहीं ठेल सकते जो एपिक हो और एपिक के अलावा कुछ भी न हो. इसलिए जब तुम्हारा कोई फालोवर उसे रद्दी करार दे दे, तो उसकी आलोचना का सम्मान करो और उसे कुछ मत कहो क्योंकि तुम्हारे बाकी चेले-चपाटे उससे खुद ही निपट लेंगे.

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान,
मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।

उपरोक्त दोहे के माध्यम से कबीरदास जी ट्वीपिल को संदेश देते हैं कि ट्विटर पर फालोवर से यह पूछने की जरूरत नहीं कि वह रागां का फैन है या नमो का. कौन किसका फैन-शैन है यह जानने में कुछ आनी-जानी नहीं है. असल ज्ञान यह जानना है कि कौन से फैन फालोविंग से ज्यादा आरटी मिल सकती है? जिस ग्रुप से ज्यादा आरटी मिले, बस उसी के फैन बन जाओ, फालोवर भला करेंगे.

हिन्दू कहे मोहि राम पियारा, तुरक कहे रहमाना,
आपस में दोउ लडि लडि मुए, मरम न कोऊ जाना।

इस अत्यंत महत्वपूर्ण दोहे के माध्यम से कबीरदास जी कहते हैं कि ट्विटर पर कोई शाहरुख़ का भक्त है तो कोई सलमान का. इन दोनों के भक्तों की मंडली सुबह-शाम आपस में लडती-भिड़ती रहती है. यह साबित करने के लिए दोनों में से कौन महान है? लेकिन लड़ने-भिड़ने में बिजी दोनों ग्रुप आजतक इस मरम का पता नहीं लग पाए कि लाखों लोग जस्टिन बीबर और केआरके दीवाने क्यों हैं?

सात समंदर मसि करौ, लेखनि सब बनराइ,
धरती सब कागद करौ, हरि गुन लिखा न जाइ।

कबीरदास जी कहते हैं सात समंदर की स्याही घोल लो और संसार भर के वनों के पेड़ से कलम बना लो फिर भी ट्विटर पर विराजमान उस फ़िल्मी भगवान की रिप्लाई के जवाब के एवज में उसकी महिमा का बखान नहीं कर सकोगे जो उसने तुम्हारे एक हज़ारवें ट्वीट के बाद तुम्हें दिया है. हे ट्वीपल जब यह करके भी तुम धन्य नहीं हो सकते तो ट्वीट तो केवल एक सौ चालीस करैक्टर का होता है. ऐसे में अपने उस फ़िल्मी स्टार रुपी भगवान की रिप्लाई का बखान करने के लिए एक हज़ार ट्वीट लिखकर उसे थैंक यू बोलोगे तो भी उसका कर्ज नहीं उतार पाओगे.

जो जल बाढ़े नाव में, घर में बाढ़े दाम,
दोऊ हाथ उलीचिए, यही सयानो काम।

कबीरदास जी कहते हैं कि जब तुम्हारे फ़लोवर्स की संख्या हजारों में हो जायेगी और तुम अपने घर वालों को दिखाते हुए बताओगे तो तुम्हारे घर में तुम्हारा दाम बढेगा. अपना दाम बढाने के लिए तुम्हें और फ़ालोवर्स चाहिए और इसका एक ही मन्त्र है कि तुम नए नए फलोवार्स की ट्वीट की रिप्लाई दोनों हाथ से उलीच कर करते रहो. फालोवर्स की संख्या बढ़ती रहेगी और घर में तुम्हारा दाम भी बढ़ता रहे.

अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप,
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।

श्री कबीरदास का उपरोक्त दोहा ऐसे ट्वीपल के लिए नीतिवचन टाइप है जो दिनभर में दो ढाई सौ ट्वीट ठेल देता है. उपरोक्त दोहे में कबीरदास जी ऐसे ट्वीपल को इशारा करते हुए बताना चाहते हैं कि हे ट्वीटयोद्धा दिनभर ट्वीट करने से कुछ नहीं मिलेगा. ऊपर से लोग जान जायेंगे कि तुम्हारे पास और कोई काम-धंधा नहीं है इसलिए तुम सारा दिन ट्विटर से चिपके रहते हो. साथ ही वे ऐसे ट्वीपल को भी इशारा करके समझा रहे हैं जो दिन भर सरकार और मीडिया पर बरसते रहते हैं. वे उन्हें हिदायत दे रहे हैं कि ज्यादा बरसना ठीक नहीं है क्योंकि इधर तुम बरसोगे और उधर सरकार और मीडिया धूप करके इस बरसात को सुखा देंगे.

सांई इतना दीजिये जामे कुटुंब समाय,
मैं भी भूखा न रहूं, साधु न भूखा जाय।

इस दोहे के माध्यम से संत कबीरदास ने ट्वीटबाजों के लिए नहीं अपितु फेसबुकियों के लिए सन्देश दिया है. कबीरदास जी फेसबुकी से कहते हैं कि वह अपने सांई से फेसबुक के फोटो और एलबम वाले सेक्शन में उतनी जगह मांगे जिसमें उसके और उसके कुटुंब यानी परिवार के हर सदस्य की हर होलीडे की फोटो लग जाए और उसका पूरा कुटुंब उन अलबमों में समा जाय. वह फेसबुक प्रोफाइल पर इतनी फोटो डाल दे कि फिर उसे फोटो डालने की भूख न रहे. साथ ही फ्रेंड रुपी साधु उन फोटो को देखकर इतनी लाइक दे कि लाइक देने से उसका पेट भर जाए और उसे भूखा वापस जाने की जरूरत न पड़े.

रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय,
हीरा जन्म अमोल था, कोड़ी बदलेजाय।

इस दोहे के माध्यम से कबीरदास जी कटाक्ष करते हुए कहते हैं कि हे ट्वीपल रात को सोकर और दिन को खाकर अपना जीवन व्यर्थ न करो. असल मज़ा लेने के लिए पूरी-पूरी रात ट्वीट करो. यह चिंता न करो कि रात हो गई है और तुम्हारी ट्वीट कोई नहीं पढ़ेगा। अरे भारत में रात है तो क्या हुआ, ऑस्ट्रेलिया में तो दिन है और कैनाडा में शाम. इसलिए दिन रात ट्विटर पर लगे रहो. परिवार, मित्र वगैरह तो आते-जाते रहेंगे लेकिन ट्विटर पर फालो करने वाला एकबार चला गया तो फिर वापस नहीं आएगा और ट्विटर पर ही नहीं, घर में भी तुम्हारा मोल घट जायेगा.

Friday, July 26, 2013

आइये बवाल काटें

बवाल काटने के दिन हैं. जिसको जब इच्छा हो वह बवाल काट सकता है. उधर पैंसठ सांसदों ने अमेरिकी राष्ट्रपति को चिट्ठी लिखकर नरेन्द्र मोदी को वीजा न देने का बवाल उठाया. बवाल उठा तो उन्हें पता चला कि लोग मीर जाफर और जयचंद को याद करने लगे. ऐसे में जरूरी था कि कुछ ऐसा कहा जाय जिससे लोग किसी और को याद करने लगें. इसी प्रयास के तहत राज बब्बर, रशीद मसूद और फारुख अब्दुल्ला ने क्रमशः १२ रूपये, ५ रूपये और १ रूपये में लोगों को खाने की थाली परोस दी. नया बवाल खड़ा हुआ. लोगों ने जयचंद वगैरह को भुलाकर फ्रांस की रानी साहिबा मारिया एंटोनिया को याद करना शुरू कर दिया. कुछ न्यूज़ चैनल्स की चाँदी और कुछ का सोना हो गया.

ऐसे में हमारे ब्लॉग संवाददाता चंदू चौरसिया ने इस मुद्दे पर तमाम लोगों के विचार इकठ्ठा किये. पेश है उन्ही विचारों से कुछ चुने हुए विचार. आप बांचिये.


लालू जी; "का मिलता है पाँच रुपिया में? ई देश के बुरबक बना रहा है लोग. आ ऊ बोल दिया अउर तुमलोग भी उसको लेकर बतियाने लगा. आज का ज़माना में मंहगाई जइसा बढ़ा है, पाँच रुपिया में त गाय का एक बखत का चारा नै मिलेगा आ ई लोग आदमी का चारा … कहने का मतलब आदमी का खाना का बात कर रहा है सब? सरकार अपना तरफ से कुछ देगा तब न मिलेगा जी? बाकी हमारा सरकार आया त हम दू रुपिया में खाना देंगे पब्लिक सब को. गरीब-गुरबा, माइनोरिटी भाई लोग के, वोमेन चिल्ड्रेन एंड भीकर सेक्शन आफ़ द सोसाइटी को खाली हमारा सरकार जो है सो दू रुपिया में खाना देगी …. अरे बीच में मत टोको … आ इधर देखो इधर … ई केतना अंगुली दिखाई दे रहा है? है न दू गो? त हमको कांग्रेस का नेता सब पर शक है बाकी हमारा सरकार एही दू रुपिया में पेटभर के खान देगा …. "

अमिताभ बच्चन; "देखिये हम नेता नहीं हैं. हम ठहरे अभिनेता. लोग बारह रुपया में खाना क्यों खाना चाहते हैं जब वे कौन बनेगा करोड़पति पर आकर पाँच करोड़ जीत सकते हैं? तो फिर फ़ोन उठाइये … और चंदू जी, आप भी पांच करोड़ जीत सकते हैं. क्योंकि बारह रूपये या पाँच रूपये में भोजन मिले या न मिले, लेकिन आपका ज्ञान जो है बस वही आपको ढंग का भोजन खिला सकता है. वैसे इस बारह रूपये वाले बयान पर मुझे पूजनीय बाबूजी की मधुशाला की एक रुबाई याद आ रही है. उन्होंने लिखा था;

बारह रुपये रख पॉकेट में निकला है खानेवाला
पस्त हो गया, नहीं मिला उसको फिर भी भोजन आला
बारह घंटे बीत चुके हैं, भूख गई, अब प्यास गई
इन रुपयों को खर्च करेगा अब जाकर वह मधुशाला


मुलायम सिंह जी; "अखियेश से जो है हमयें पूछा कि किसी अफसअ से पता लगाकअ बताएं कि बाअह में खाआं मिअ सकता ऐ? अखियेश एं बताआ कि नई मिएगा. राअ बब्बअ जब समाअवादी पाअटी में थे तो केवअ अमअ सिंअं जी के खिआफ़ बोअते थे कांगेस में गए ऐं तो पब्बइक के खिआफ बोअ अहे ऐं. केंद सअकाअ के लोग जनता से कट गए ऐं. ऐसा कएंगे तो संपदाइक शक्तिओं को बहावा मिएगा. हमाआ समअथन इस सअकाअ को सांपदाइक शक्तिओं को ओकने के लिए अहेगा "

भाग मिल्खा भाग वाले मिल्खा सिंह जी; "हम अभी बात नहीं कर सकते. हमसे हमारे डायरेक्टर राकेश ओमप्रकाश मेहरा जी ने कहा कि भाग मिल्खा भाग और जाकर देख कि कहाँ बारह रूपये में भोजन मिल रहा है? उन्होंने मुझे चार रूपये पानी के लिए एक्स्ट्रा दिए और अब हम सोलह रूपये लेकर पूरे इंडिया में भाग रहे हैं. यह जानने के लिए इन रुपयों में कहाँ भोजन और पानी मिलेगा? मैंने इसीलिए जर्सी भी सोलह नंबर की पहन रखी है और जर्सी पर लिखा इंडिया यह बता रहा है कि हमें वह जगह पूरे इंडिया में भागकर देखना है. परसों मिलोगे तब हम बता पाएंगे कि वह ढाबा मिला या नहीं."

बरखा दत्त जी ; "टू से दैट वन कैन गेट अ मील फॉर ट्वेल्व रुपीज वाज सर्टेनली ऐन एरर ऑफ़ जजमेंट ह्विच राज बब्बर डिड नॉट रियेलाइज. हाउएवर आई ऐम स्योर दिस इज नॉट ऐन ऑफिसियल स्टैंड ऑफ़ द कांग्रेस पार्टी एंड वी गिव इट अ बेनिफिट ऑफ़ डाऊट हीयर "

मिथुन दा; "राज बब्बर के बयान पर मैं कहूँगा; क्या बात! क्या बात! क्या बात!

संजय झा; "मैं राज बब्बर के बयान पर कुछ नहीं कहना चाहूँगा. जरूर उनका कोई फेवरिट रेस्टोरेंट होगा जिसमें बारह रूपये में खाना मिलता होगा. वे झूठ नहीं बोल सकते. वे तो क्या कोई कांग्रेसी कभी झूठ नहीं बोलता. हाँ, मैं रशीद मसूद के बयान पर जरूर कहूँगा कि बारह रूपये में खाना मिले या न मिले पाँच रूपये में खाना पक्का मिलेगा क्योंकि पंजे में पाँच अंगुलियाँ होती हैं. आप तो देख ही रहे हैं कि मेरे पीछे मेरी पार्टी का हाथ है. वैसे मैं यहाँ आपको डेल कार्नेगी का एक प्रसिद्द कोट बताना चाहूँगा. डेल ने कहा था ; हैपीनेस डजन्ट डिपेंड ऑन एनी एक्सटर्नल कंडीशंस. इट इज गवर्रन्ड बाई आवर मेंटल ऐटीच्यूड. डेल और मेरे कहने का मतलब है कि खुश होने के लिए खाने की क्या जरूरत है? अगर आप आप अपने मन में सोच लें कि आपने खाना खा लिया है तो फिर आपको पाँच रूपये खर्च करने की जरूरत नहीं. अब जो लोग यह रहस्य समझ जायेंगे उन्हें किसी भोजन से क्या लेना-देना?"

नितीश कुमार जी; "आ पाँच रुपया वाला आदमी त स्पेशल स्टेटस का हकदार हो जाता है. आप हमारे बिहार को ही ले लें. हमारे इहाँ त बिना पइसा के ही मिड डे मील मिलता है. त जब बिना खर्च किये ही भोजन मिल रहा है त ई पाँच रुपया या बारह रुपया पर बहस जो है ऊ बेमानी है. और देखने वाली बात यह है कि ये सब बात बोल कौन है? तीनो लीडर सेक्युलर हैं. आ सेक्युलर कभी गलत बोल ही नहीं सकता."

रॉबर्ट वाड्रा ; "इफ यू हैव प्रॉपर चैनल, यू कैन बाई टू बनानाज फॉर फ़ाइव रुपीज. एंड ह्वाट वुड बी बेटर फ़ूड दैन बनाना इन अ बनाना रिपब्लिक? रशीद मसूद इज राईट."

राहुल गाँधी; "यूथ कांग्रेस ने मुझे बताया है कि बारह रूपये में चार किलो आलू मिलता है. और क्या चाहिए आपको? चार किलो आलू आप चार दिन तक खा कर भी ख़तम नहीं कर सकते. मुझे तो लगता है कि राज बब्बर ने जो कुछ भी कहा है वह सही कहा है. और अब हम डायरेक्ट आलू ट्रान्सफर प्रोग्राम ला रहे हैं. जिसके पास भी आधार कार्ड है उसके आलू अकाउंट में रोज सुबह चार किलो आलू डायरेक्टली ट्रान्सफर हो जायेगा. इससे यह होगा कि जिसका आलू है वह उसके पास पहुंचेगा और बिचौलिये उसमें से कुछ भी नहीं ले सकेंगे. अभी परसों मैंने पार्टी प्रवक्ताओं को बताया कि अगर यह डायरेक्ट आलू ट्रान्सफर प्रोग्राम सक्सेसफुली लागू कर लेते हैं तो अगला तीन चुनाव जीत सकते हैं."

चन्दन मित्रा; "राज बब्बर का यह बयान भारत के गरीबों का अपमान है. बीजेपी २०१४ में चुनाव जीत जाएगी तो हमलोग उनको मिला हर अवार्ड वापस ले लेंगे."

अडवाणी जी; "देखें इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर मैं कुछ कह नहीं सकता. इसपर कल मैं एक ब्लॉग पोस्ट लिखूंगा. आप मेरे विचार वहीँ से ले लीजियेगा."

योगेन्द्र यादव; "मैं हमेशा से कार्टूनों के द्वारा फ्री स्पीच का हिमायती रहा हूँ. जिन्होंने जो बयान दिया है वह देने का उनका अधिकार उनसे कोई छीन नहीं सकता. जहाँ तक मेरी पार्टी के स्टैंड का सवाल है तो मैं यही कहना चाहूँगा कि बारह रूपये में एक फ्रूटी भी नहीं आती जिसे पीकर हमारे नेता अरविन्द केजरीवाल अनशन तोड़ सकें. अब आ जाते हैं इन बयानों से होने वाले फायदे और नुक्सान पर. मेरा मानना है कि आनेवाले विधानसभा चुनावों में इन बयानों का असर साफ़ दिखाई देगा. राज बब्बर के बारह रूपये वाले बयान से निश्चित तौर पर कांग्रेस को यादवों और कुर्मियों के वोट कम मिलेंगे. राजपूत वोट की जहाँ तक बात है वह बंटने के आसार हैं. अगर राज बब्बर ने पाँच रुपया कहा होता तो कांग्रेस को ब्राह्मणों का वोट मिलता क्योंकि ब्राह्मण पांच की संख्या को शुभ मानते हैं. जहाँ तक दलितों का सवाल है तो मुझे लगता है कि दलित मायावती को ही वोट देंगे."

दिग्विजय सिंह; "हिंदुस्तान के कोने-कोने से लोगों ने मुझे फोन करके बताया कि बारह रूपये में बहुत अच्छा भोजन मिलता है. अगर कहीं न मिलता हो तो समझ जाइये कि उस जगह पर आरएसएस वालों ने साजिश के तहत खाने को मंहगा कर दिया होगा. जैसे मैं बटला हाउस पर अपने बयान पर कायम हूँ वैसे ही राज बब्बर के बयां पर भी कायम हूँ."

मायावती जी; "राज बब्बर का बयान दलितों के खिलाफ है. बारह रूपये में खाने की जहाँ तक बात है तो वह कहीं नहीं मिलेगा. ये देखिये मेरे हार तक में एक भी नोट दस रूपये का नहीं है. सारे हज़ार के नोट हैं. इसलिए मुझे लगता है कि खाना हज़ार रूपये में ही मिल सकता है."

अरनब गोस्वामी; "तमाम रिकार्ड्स, रेट-चार्ट, एक्सपर्ट्स ओपिनियन, बयान पढने के बाद और हमारी पोलिटिकल एडिटर नाबिका से सलाह लेने के बाद अदालत इस नतीजे पर पहुंची है कि बीजेपी भी इन बयानों के लिए उतनी ही जिम्मेदार है जितना कांग्रेस के नेता राज बब्बर, रशीद मसूद और फारुख अब्दुल्ला हैं. अदालत पोलिटिकल पार्टीज को यह सलाह भी देती है कि इन मुद्दों को पोलिटिसाइज न किया जाय और न ही अदालत ऐसा होने देगी. और चूंकि आज न्यूज़-आवर पर राज बब्बर नहीं आये और बिकॉज नेशन वांट्स टू नो द ट्रुथ, हम इस मुद्दे पर तबतक न्यूज-आवर करते रहेंगे जबतक कोई और मुद्दा ……"

Wednesday, June 26, 2013

भारतीय राजनीति का शेरकाल

नेताजी जी गठबंधन टूटने की ब्रेकिंग न्यूज दान में देते हुए पत्रकारों से बोले; "ऊ लोग त दवा देते मरने की, आ दुआ देते हैं जीने की।"

पत्रकार लोग उन्हें लगातार देखे जा रहे थे। शायद इस आशा के साथ की वे शेर की दूसरी लाइन भी बोलेंगे जो शायद "टीने की" या फिर "पीने की" पर आ रुके। खैर, ऐसा हुआ नहीं और पत्रकार लोग निराश हो गए। कईयों ने अपनी रपट में लिखा तो नहीं लेकिन मन ही मन जरूर सोचा होगा कि कैसा नेता है जो शेर भी पूरा नहीं करता? जो नेता पत्रकारों के सामने शेर पूरा नहीं कर सकता वह जनता को किया गया वादा कैसे निभाएगा? जो पत्रकारों का नहीं हुआ वह जनता का क्या होगा? अगर यही हाल रहा तो न ही पालिटिक्स मजबूत रहेगी और न ही सेकुलरिज्म। क्या होगा इस देश का? आखिर आज पॉलिटिक्स में शेर के अलावा बचा ही क्या है जिसे थाम के रक्खेगा ये नेता?

वैसे देखा जाय तो इसमें पत्रकारों की भी क्या गलती है? नेता कहीं भी जाता है तो शेर से लैस होकर जाता है। पार्लियामेंट में बजट पढ़ रहा है तो टैक्स का प्रपोजल देते हुए शेर दे मारता है। टैक्स रिबेट अबोलिस कर रहा है उसपर भी शेर बक डालता है। नया गठबंधन बना रहा होता है तो उसके जस्टिफिकेशन के सवाल को शेर मारकर धरासाई कर डालता है। किसी दूसरे नेता की प्रशंसा करना चाहता है तो उसपर शेर कुर्बान कर देता है। किसी नेता की बुराई करनी हो तब भी एक शेर पिला देता है। संसद में घोटाले की बात होती है तो उसका जवाब शेर से देता है। स्कैम पर शेर, कैम पर शेर।

उधर विपक्ष का नेता भी शेर का जवाब देने के लिए शेर ठोंक देता है। प्रेस कांफ्रेंस की शुरुआत शेर से करता है। प्रेस कांफ्रेंस के बीच में शेर भर देता है। प्रेस कांफ्रेंस का अंत शेर से कर देता है। पिछले कई वर्षों से शेर ही भारतीय नेताओं का कवच-कुंडल बना हुआ है।

कुल मिलकर कहा जा सकता है कि फिलहाल भारतीय राजनीति का शेरकाल चल रहा है।

कई बार सोचता हूँ कि मंत्री जी संसद में प्रश्नकाल के लिए तैयारी करते हुए अपने पीए से बोलते होंगे; "अरे भाई, आज संसद में सड़क घोटाले पर प्रश्न का जवाब देना है। आंकड़ों के साथ शेर वाले पेज रक्खे या नहीं?"

पीए बोलेगा; "सर, मैंने ग़ालिब के तीन शेर चुने थे। आप उन्हें देख लेते तो ठीक रहता। अगर आपको पसंद न हों तो फिर मीर के शेर चुनकर रख देता। मैं मीर का दीवान साथ ही लाया हूँ। कोई टेंशन की बात नहीं है, बस मुझे पंद्रह मिनट लगेंगे।"

पीए की बात सुनकर मंत्री जी कहेंगे; "अरे, ये मीर और ग़ालिब के शेर समझने में मुश्किल होती है। ऐसा शेर दो जो मुझे भी समझ में आये और विपक्षी सांसद को भी।"

पीए बोलेगा; "सर, फिर तो मेरा सुझाव है कि बशीर बद्र साहब के शेर इसके लिए उपयुक्त रहेंगे। उनका लिखा समझ में आ जाता है। अपने शेर सलाहकार राशिद साहब भी यही कह रहे थे।"

मंत्री जी हाँ कर देंगे और पीए नए शेर चुनने निकल जाएगा। यह हिदायत देते हुए कि; "सर, आप पिछले दो प्रश्नकाल के दौरान "मैं तो दरिया हूँ मुझे अपना हुनर मालूम है, जिस तरफ से चल पडूँगा रास्ता हो जायेगा" कह चुके है। इसलिए इसको इसबार मत कहियेगा क्योंकि अमर सिंह ये दो लाइनें इतनी बार बोल चुके हैं कि कुछ लोग समझते हैं कि ये उन्ही का शेर है।"

हाल यह है कि प्रधानमंत्री, मंत्री और सांसद ही नहीं, राजनीतिक दलों के प्रवक्ता भी जब-तब शेर ठेलते रहते हैं। कोई सी एम पार्टी अध्यक्ष से नाराज है या नहीं इसका जवाब शेर से देते हैं। सी एम के ऊपर अध्यक्ष का हाथ है या नहीं, इस सवाल का जवाब भी शेर में ही दिया जाता है। पार्टी के भीष्मपितामह कोप भवन में हैं या शरशैय्या पर, यह बताने के लिए शेर का इस्तेमाल किया जाता है। और सी एम को अमेरिकी वीजा की जरूरत है या नहीं यह बताने के लिए भी शेर ही ठोंका जाता है। मुझे तो लगता है की पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में कुछ इस तरह की बातें होती होंगी;

अध्यक्ष; "देखिये, उनको प्रवक्ता बनाने के आपके प्रस्ताव से मैं सहमत हूँ लेकिन मेरे लिए यह जानना जरूरी है कि उनका शायरी और गजलों का ज्ञान कैसा है?"

महासचिव; "अध्यक्ष जी, उनका शायरी और ग़ज़लों का ज्ञान कमाल का है। अभी हाल ही में एक टीवी पैनल डिस्कशन में उन्होंने विपक्षी प्रवक्ता को ऐसे-ऐसे शेर खींच कर मारे कि मैं भी हथप्रभ रह गया। यह सोचते हुए कि ये बिजनेसमैन होते हुए भी इतना टाइम कब निकाल पाए कि ऐसे-ऐसे शेर याद कर लिया? माने इनकी शेरो शायरी का टैलेंट देखकर एंकर की भी बोलती बंद हो गई थी।"

अध्यक्ष; "फिर तो ये कमाल के प्रवक्ता साबित होंगे। आखिर एक प्रवक्ता को और किस चीज का ज्ञान चाहिए? ग़ज़लों और शेरो का ज्ञान ही सबसे उत्तम ज्ञान है।"

अध्यक्ष जी उनको पार्टी प्रवक्ता बना देंगे।

हालात ऐसे हैं कि आनेवाले समय में पार्टियों की प्राइमरी मेम्बरशिप देते हुए पार्टी की सारी कवायद इसबात पर टिकी होगी कि मेंबर का कविताओं और ग़ज़लों का ज्ञान कैसा है? इस ज्ञान को जांचने परखने के लिए पार्टियाँ समय-समय पर ग़ज़ल ऑडिशन करवाएंगी। उसके लिए पार्टी के मेंबर दिनों तक ग़ज़लों और कविताओं की किताबें रटेंगे। हर मौके के लिए चुनचुन कर शेर नोट करेंगे और रात-रात भर उन्हें याद करेंगे ताकि पार्टी नेताओं को खुश किया जा सके। उधर नेता खुश हुआ और इधर मेंबर का प्रवक्ता बनना तय।

पार्टियाँ अपने-अपने कार्यालय में नए-नए शायर रिक्रूट करेंगी ताकि जिन सदस्यों को मीर, ग़ालिब, जौक वगैरह के शेर समझ में नहीं आते उन्हें उनका मतलब समझाया जा सके। मंत्री, सांसद और महासचिवों के लिए कम्पलसरी हो जायेगा कि सीनियोरिटी को ध्यान में रखते हुए वे जब भी कोट करें किसी बड़े शायर के शेर ही कोट करें। अगर भूल से भी वे कम मशहूर शायरों के शेर कहें तो उन्हें अगली कार्यकारिणी में वार्निंग दे दी जाएगी कि अगर वे दूसरी बार ऐसा करेंगे तो अप्रेजल के समय इसबात को ध्यान में रखते हुए उन्हें डिमोट भी किया जा सकता है। वहीँ अगर छोटा नेता बड़े शायरों के शेर कोट करेगा तो चाहे वे शेर उसकी समझ कें आये या न आये, उसके इस कृत्य को अप्रेजल के समय ध्यान में रखा जाएगा और अगर उसके ग्रहों का संयोग ठीक रहा तो उसे प्रमोशन भी दिया जायेगा।

अगर कोई प्रवक्ता या नेता प्रेस कांफ्रेंस में या टीवी पैनल डिस्कशन में शेर को गलत ढंग से पढ़ेगा तो पार्टी उपाध्यक्ष को अधिकार रहेगा की वह उस प्रवक्ता या नेता को मेमो इश्यू करे और उससे जबाब-तलब करे। बड़े मजेदार दृश्य दिखाई देंगे। जैसे;

उपाध्यक्ष; "ये क्या सुन रहा हूँ मैं? कल आपने प्रेस कांफ्रेंस में शेर पढ़ते हुए गलती कर दी?"

प्रवक्ता; "वो क्या था कि गलती हो गई।"

उपाध्यक्ष; "इस तरह की गलती की अपेक्षा आपसे नहीं थी मुझे। आपको पता है कि पूरा मीडिया हंसी उड़ा रहा है। आपकी भी और पार्टी की भी।"

प्रवक्ता; "दरअसल वो शेर पढने से पहले पत्रकार ने कोल स्कैम की बाबत सवाल पूछा और उसमें कानूनमंत्री को दोषी साबित करने की कोशिश की, इसलिए मुझे गुस्सा आ गया। आप तो जानते ही हैं कि विज्ञान ने भी साबित कर दिया है कि गुस्से में मनुष्य का दिमागी संतुलन खराब हो जाता है। इसलिए मैं शेर पढ़ते हुए गलती कर बैठा।"

उपाध्यक्ष; "देखिये बहाने मत बनाइये। शेर कहना एक कला है। जब मैं कला की बात कर रहा हूँ तो आप विज्ञान की बातें कर के मुझे बहकाने की कोशिश न करें।"

प्रवक्ता; "मैं आपके सामने ऐसी धृष्टता कदापि नहीं कर सकता।"

उपाध्यक्ष; "पहले तो आप ऐसे शब्द न बोलें जो मुझे समझ में न आयें। और सबकुछ छोड़कर पहले मुझे धृष्टता और कदापि का मतलब समझाइये। वैसे आपसे गलती क्या हुई थी?"

प्रवक्ता; "वो दरअसल हुआ ऐसा कि माना कि तेरी दीद के काबिल नहीं हूँ मैं की जगह मैं माना कि तेरी ईद के काबिल नहीं हूँ मैं पढ़ गया।"

उपाध्यक्ष; "अरे तो यह तो छोटी से गलती थी। इसको आप संभाल नहीं पाए?"

प्रवक्ता; "मैंने कोशिश की थी कि ईद की बात करके इसे सेकुलरता का मोड़ दे दूँ लेकिन आप तो जानते ही हैं कि कई पत्रकार आजकल विरोधी पार्टी की तरफ से भी काम करने लगे हैं।"

उपाध्यक्ष प्रवक्ता को मेमो इश्यूं कर देगा जिसमें लिखा होगा; "आप मुझे एक सप्ताह के अन्दर जवाब दें कि प्रेस कांफ्रेंस में शेर को गलत ढंग से बोलने के लिए आपको सस्पेंड क्यों न किया जाय? जबतक आप जवाब नहीं देते, आपकी जगह माखनलाल जी पार्टी प्रवक्ता का काम करेंगे।"

कुल मिलाकर पूरी भारतीय राजनीति शेर-ओ-शायरी प्रधान होगी।

मोहल्ले के वे शायर जिन्हें मुशायरों में कोई नहीं सुनता और जिनके माँ-बाप उन्हें उठते-बैठते शायर बनने के नुकशान गिनाते रहते हैं वे राजनीतिक पार्टियों द्वारा रिक्रूट कर लिए जायेंगे। जाहिल जौनपुरी, नवाब आसनशोला और कट्टा कानपुरी को रोजगार मिल जाएगा। उन्हें सफल होने के लिए मोहल्ले के लोकल मुशायरों का मुंह नहीं ताकना पड़ेगा। अमेरिकी प्रेसिडेंशियल एलेक्शन में होने वाले डिबेट की तर्ज पर राजनीतिक पार्टियाँ शेर डिबेट करवाएंगी। पूरा भारत तुकबंदी की गिरफ्त में आ जायेगा।

लोकतंत्र को मजबूत करने का एक और रास्ता मिल जाएगा।

इस मौके पर आपको कट्टा कानपुरी के एक शेर के साथ छोड़ जाता हूँ। वे लिखते हैं;

जो चाहो कर बैठो स्कैम या घोटाला
क्यों डरना जब साथ है ये शेर-ओ-शायरी।

--कट्टा कानपुरी

Monday, June 17, 2013

नितीश कुमार जी की ट्विटर टाइमलाइन - Nitish Kumar's Twitter Timeline

नितीश कुमार जी अपनी पार्टी लेकर एन डी ए से कूच कर गए। कल शाम से ही लोग विश्लेषण किये जा रहे हैं। ऐसे में अगर नितीश बाबू की ट्विटर टाइमलाइन पर क्या बमचक मची है, वह आप बांचिये:

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नोट: और भी लोगों की ट्विटर टाइमलाइन बांच सकते हैं।

ममता बनर्जी की ट्विटर टाइमलाइन।

राष्ट्रपति चुनाव बमचक पर एक ट्विटर टाइमलाइन।

अरविन्द केजरीवाल की ट्विटर टाइमलाइन।

राहुल गांधी जी की पहली ट्विटर टाइमलाइन

Friday, April 26, 2013

फ़िल्मी प्रेम-प्रसंग में दिल ..

तमाम चीजें समाज का दर्पण होती हैं। किस काल में कौन सी चीज समाज का दर्पण हो, यह उस काल के समाज पर निर्भर करता है। प्राइमरी या मिडिल स्कूल के विद्यार्थी के लिए पहले साहित्य समाज का दर्पण होता था। अब नहीं है। साहित्यकार, आलोचक और प्रकाशक की तिकड़ी की भूमिका ने रहने नहीं दिया। कालांतर में समाज को और लोगों ने दर्पण दिया। एक तरफ सिनेमा वालों ने दिया तो दूसरी तरफ राजनीति वालों ने भी अपनी औकात के अनुसार समाज को दर्पण प्रदान किया। आगे चलकर क्रिकेट वालों ने भी इस दर्पण दान में अपनी भूमिका निभाई। उनके बाद तमाम माध्यम भी पीछे नहीं रहे।

पिछले कुछ वर्षों से अब यह काम हिंदी सिनेमा के गानों ने वापस अपने हाथ में ले लिया है। वे हर एक-दो महीनों में समाज को दर्पण थमाते रहते हैं। समाज इन गानों में अपनी छवि देखकर मस्त रहता है। आज से साठ-सत्तर वर्ष बाद अगर कोई शोध करने वाला इस विषय पर शोध करेगा तो बड़ी तन्मयता के साथ हमारे काल के गानों को आगे रखकर सिद्ध कर देगा कि इस काल का समाज कैसा था।

प्रेम में दिल के महत्व जैसे विषय पर काम करने वाले शोधार्थी के पास गानों की कमी कभी नहीं रहेगी।

जैसे नब्बे के दशक के गाने; "धीरे-धीरे आप मेरे दिल के मेहमां हो गए, पहले जान, फिर जान-ए-जान, फिर जान-ए-जाना हो गए" की चीर-फाड़ करते हुए लिखेगा; "इस गीत के बोल से साबित होता है कि इस काल का नायक अपनी नायिका को एकदम से दिल का मेहमां नहीं बनने देता था। वह इस काम को धीरे-धीरे करने में विश्वास रखता था। वह नायिका को पहले जान बनाता था, फिर जान-ए-जान और अंतिम स्टेप में ही जान-ए-जाना बनने देता था। इस काल का नायक 'लउ' एट फर्स्ट साईट में विश्वास नहीं रखता था। इस गीत से यह प्रमाण भी मिलता है कि प्रेम के तमाम चरणों में नायिका के लिए जान-ए-जाना सबसे महत्वपूर्ण पदवी होती थी। कुछ समाजशास्त्रियों का ऐसा मानना है कि इस काल का नायक चूंकि ज्यादातर नौकरीशुदा होता था इसलिए वह कंपनियों के एच आर डिपार्टमेंट द्वारा प्रतिपादित तरक्की के सिद्धांतों में विश्वास रखता था। कुछ एच आर एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर इस गाने के बोल को एक नौकरीशुदा इंसान के नौकरी में लगने से लेकर उसके प्रमोशन से तुलना की जाय तो जान की तुलना अप्वाइंटमेंट, जान-ए-जान होने की तुलना नौकरी के परमानेंट होने और जान-ए-जाना होने की तुलना असिस्टेंट मैनेजर बनने से की जा सकती है।

इस गीत की अपनी चीर-फाड़ को सही ठहराने के लिए वह उसी काल के गीत; "आँखों में बसे हो तुम, तुम्हें दिल में बसा लूंगा ...." का भी सहारा ले सकता है। वह आगे लिख सकता है; "इस गीत से इसे गाने वाले नायक के भी नौकरीशुदा होने के प्रमाण मिलते हैं। इस गीत में नायक अपनी नायिका को सूचना देते हुए बता रहा है कि नायिका फिलहाल आँखों में ही बसी है और दिल में बसने के लिए उसका प्रमोशन होना ज़रूरी है। वह कहना चाहता है कि नायिका एकदम से दिल में नहीं बस सकती। कि नायक की एच आर पॉलिसी के अनुसार नायिका का आँखों में बसी है याने उसे अभी केवल अप्वाइंटमेंट लेटर मिला है और कुछ महीनों बाद जब उसका अप्रेजल होगा और तब अगर नायक संतुष्ट हुआ तभी वह नायिका को दिल में बसने देगा।"

नायक और नायिका के गुणों में अंतर बताते समय शोधार्थी यह भी साबित कर सकता है कि नायिका चूंकि नौकरीशुदा कम ही होती थी इसलिए वह नायक फट से दिल में बसा लेती थी। अपनी इस थ्योरी के समर्थन में वह "दिल में तुझे बसा के, कर लूंगी मैं बंद आँखें ..." जैसे गीत का सहारा ले सकता है। वह यह साबित कर सकता है कि नायक ज्यादातर प्रेम में घुटे हुए रहते थे लिहाजा जहाँ नायिका अपने नायक को फट से दिल में बसाकर आँखें बंद कर लेती थी, वहीँ नायक पहले नायिका को आँखों में बसाता था और पूरी तरह से देखने परखने के बाद ही दिल में बसने देता था। "पल-पल दिल के पास तुम रहती हो" नामक गाने के बोल से साबित कर सकता है कि दिल में बसने से पहले नायक अपनी नायिका को दिल के पास बसाता था। नायक का यह स्वभाव उनदिनों उसके प्रेम में सावधानी बरतने की बात को पुख्ता करता है। इससे यह साबित होता है कि नायक लोग प्रेम में सावधानी रखते थे।

प्रेम में लिप्त नायक के जीवन में दिल का क्या महत्व रहता था इसबात पर प्रकाश डालते हुए शोधार्थी लिख सकता है; "प्रेम में गिरे नायक के दिल में झरोखा भी रहता था जिसमें वह यदाकदा नायिका को बिठाता था। प्रसिद्द गीत दिल के झरोखे में तुझको बिठाकर यादों को तेरी मैं दुल्हन बनाकर रखूँगा मैं दिल के पास ....गीत से यह प्रमाण मिलता है कि प्रेम में असफल नायक जब सत्य से समझौता कर लेता था तब वह नायिका को अपने दिल से निकाल कर दिल के झरोखे में बिठा देता था और नायिका को दुल्हन न बना पाने की स्थिति में उसकी यादों को ही दुल्हन बनाकर संतुष्ट हो लेता था। संतोषगति प्राप्त नायक के पास और कोई चारा नहीं होता था इसलिए वह नायिका को सूचना देते हुए बताता था कि नायिका को उदास होने की ज़रुरत नहीं है क्योंकि वह दुल्हन न बन सकी तो क्या हुआ, उसकी यादें तो नायक की दुल्हन बन ही सकती हैं।"

प्रेम में दिल के महत्व को समझाते हुए शोधार्थी लिख सकता है कि ; "दिल का हाल सुने दिलवाला ..." नामक गीत से इसबात का प्रमाण मिलता है कि उनदिनों हर दिल का कोई न कोई हाल होता था जिसको कोई दिलवाला ही सुनता था। अगर कोई किसी के दिल का हाल नहीं सुनता तो यह साबित हो जाता था कि हाल सुनाने वाले के पास तो दिल है लेकिन उसे न सुनने वाले के पास दिल नहीं है। वह आगे लिख सकता है; "हालांकि, इसबात का रिकॉर्ड नहीं मिलता कि बिना दिलवाले जिन्दा कैसे रहते थे? किसी वैज्ञानिक ने इसबात पर रिसर्च नहीं किया कि दिल का हाल न सुनने वाले दिलहीन इंसानों के शरीर में खून की आवाजाही कैसे होती थी?"

एक प्रश्न कि ; "जीवन में दिल ज्यादा महत्वपूर्ण है या जान?" पर शोधार्थी लिख सकता है; "तमाम गीतों की चीरफाड़ करने पर यह पता चला है कि प्रेम-प्रसंग में जान दिल से ज्यादा महत्वपूर्ण होती है। फिल्म उमराव जान के गीत 'दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिये ..' से यह बात साबित हो जाती है कि उनदिनों जान की कीमत दिल से ज्यादा होती थी। हाँ, यह मानना पड़ेगा कि हालाँकि जान दिल से कीमती होती थी लेकिन प्रेम में पागल नायिका वह भी देने के लिए तैयार रहती थी और उसके के लिए भी उसकी बहुत छोटी सी शर्त रहती थी। शर्त यह कि नायक बस एक बार उसका कहा मान ले तो उसे जान देने में कोई गुरेज़ नहीं है। इससे इस बात के प्रमाण भी मिलते हैं कि नायक लोग नायिकाओं की बड़ी मुश्किल से मानते थे। नब्बे के दशक के एक और गीत 'दिल क्या चीज़ है जानम अपनी जान तेरे नाम करता है ..' से भी यह बात साबित होती है कि प्रेम में लिप्त नायक जान के आगे दिल को कुछ नहीं समझता था और अपनी जान नायिका के नाम करने के लिए तत्पर रहता था। एक और गीत दिल, नज़र, जिगर क्या है, मैं तो तेरे लिए जान भी दे दूँ ...गीत से यह साबित होता है कि जान केवल दिल से ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं थी बल्कि नज़र और जिगर से भी ज्यादा महत्वपूर्ण होती थी और श्रेष्ठ प्रेम में जान देने को भी सबसे ऊंचा दर्ज दिया गया है।

नब्बे के दशक के ही एक और गीत 'मुझे नींद न आये मुझे चैन न आये, कोई जाए जरा ढूंढ के लाये न जाने कहाँ दिल खो गया , न जाने कहाँ दिल खो गया ..' को आगे रखकर शोधार्थी लिख सकता है; "इस गीत से नायक-नायिका के यदाकदा दिल खोने का प्रमाण मिलता है। साथ ही यह भी पता चलता है कि दिल खोने के बाद ये लोग पुलिस में रपट लिखाने की बजाय गाना गाते थे। इससे यह साबित हो जाता है कि भारतीय नायक या नायिका को जब नींद नहीं आती थी तो उन्हें फट से पता चल जाता था कि यह इनसोम्निया की समस्या नहीं है बल्कि ऐसा दिल खोने के कारण हुआ है। नीद या चैन न आने के बावजूद वे कभी डॉक्टर के पास नहीं जाते थे। उन्हें विश्वास रहता था कि दिल खो जाने की वजह से उपजी ऐसी स्थित में न तो डॉक्टर के पास जाने की जरूरत है न पुलिस के पास जाने की। इस समस्या को गाना गाकर सॉल्व किया जा सकता है क्योंकि गाने में ' कोई जाए जरा ढूंढ के लाये ' कहने से कोई न कोई दिल ढूंढ कर ला देगा और नींद न आने की समस्या सुलझ जायेगी।"

प्रेम-प्रसंग में दिल के महत्व की और जांच-पड़ताल करके शोधार्थी लिख सकता है; "शोध से हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि उनदिनों दिल दिए और लिए तो जाते ही थे, वे तोड़े भी जाते थे। एक प्रसिद्द गीत 'दिल के टुकड़े-टुकड़े करके मुस्कुराते चल दिए ...' से हम इस निष्कर्ष पर पहुँच सके। यह बात अलग है कि किसी ने इस बात पर कोई शोध नहीं किया कि दिल टूटने के बाद कैसी आवाज़ सुनाई देती थी? कई गीतों से ऐसे प्रमाण मिलते हैं कि अक्सर दिल टूटने का इलज़ाम नायिका के ऊपर मढ़ दिया जाता था लेकिन कुछ ऐसे केस भी हुए जब नायक ने खुद ही अपना दिल तोड़ लिया हो। जैसे एक गीत 'जिस दिल में बसा था प्यार तेरा उस दिल को कभी का तोड़ दिया ...' से यह पता चलता है कि कभी-कभी नायक खुद ही अपना दिल तोड़ लिया करता था। वैसे टूटने के बाद दिल के टुकड़े कैसे दिखाई देते थे इसबात पर कहीं कोई दस्तावेज़ नहीं मिलता। 'दिल ऐसा किसी ने मेरा तोड़ा बरबादी की तरफ ....' नामक गीत से यह प्रमाण मिलता है कि दिल टूट जाने के बाद आबादी की तरफ चलते रहने वाले नायक बर्बादी की तरफ मुड़ जाता था और अपना सत्यानाश कर लेता था।"

"दिल केवल टूटते ही नहीं थे, वे गाने भी गाते थे। 'हर दिल जो प्यार करेगा, वो गाना गायेगा ..' जैसे गीत से इसबात का पता चलता है कि केवल नायक प्यार नहीं करता था। किसी-किसी केस में दिल भी प्यार कर बैठता था और हर वो दिल जो प्यार कर बैठता था वह गाना भी गाता था। यह बात अलग है कि दिल के गाये गाने कैसे होते थे इस बात की कहीं चर्चा नहीं हुई है। इतिहास में कहीं इस बात का उल्लेख नहीं है कि मोहम्मद रफ़ी, लता मंगेशकर वगैरह अच्छा गाते थे या फिर दिल। वैसे कुछ फ़िल्मी इतिहास्यकारों का मानना है कि वैसे तो उन्होंने दिल को गाते हुए कभी नहीं सुना लेकिन उन्हें पूरा विश्वास है कि साबुत दिल की तो छोडें, टूटा हुआ दिल भी किसी अनु मालिक, शब्बीर कुमार, मोहम्मद अज़ीज़ या कुमार सानू से अच्छा गाता होगा। इतिहास्यकारों के इस निष्कर्ष पर पहुँचने से ऐसे गायकों के गायिकी के स्टार की बात भी सामने आती हैं। उनदिनों दिल गा सकता था या उससे आवाज़ आती थी, इसबात का प्रमाण 'दिल की आवाज़ भी सुन, मेरे फ़साने पे न जा ...' नामक गीत से मिलता है। नायक नायिका से नायिका नायक से अक्सर रिक्वेस्ट करते थे कि दोनों अपने माँ-बाप की बात सुनने की बजाय दिल की आवाज़ सुने तो प्रेम की वैतरणी पार करने में आसानी रहेगी।"

जहाँ दिल के गाने की बात साबित होती है वहीँ दिल के शायर होने की बात का भी पता चलता है। दिल आज शायर है, गम आज नगमा है ..गीत से पता चलता है कि दिल के अन्दर गाने का तो टैलेंट होता ही है, वह चाहे तो शायरी भी कर सकता है और गम को नगमों में परिवर्तित कर प्रेम में अपना योगदान दे सकता है।

कहीं-कहीं दिल के मंदिर होने की बात भी सामने आती हैं। जैसे 'दिल एक मंदिर है, प्यार की इसमें होती है पूजा, ये प्रीतम का घर है ...' गीत से ऐसा प्रतीत होता है कि नायिका का दिल के मंदिर होने में प्रगाढ़ विश्वास है। इसके पहले कि किसी के मन में यह प्रश्न उठे कि; अगर दिल मंदिर है तो उसमें कौन से भगवान् विराजमान हैं?; नायिका खुद ही गीत के आगे की पंक्तियों के माध्यम से इस बात का खुलासा कर देती है कि इस मंदिर में प्यार की पूजा होती है। दिल रुपी मंदिर अन्य मंदिरों से इस मामले में अलग है कि प्यार की पूजा में फूल, दीपक, घी, अगरबत्ती वगैरह के प्रयोग की ज़रुरत नहीं पड़ती। कुछ इतिहास्यकारों ने प्रीतम की पूजा की बात करके यह साबित करने की कोशिश की थी कि नायिका इस गीत के माध्यम से संगीतकार प्रीतम की पूजा करने की बात कर रही है लेकिन इस थ्योरी को यह प्रमाण देकर मार गिराया गया कि संगीतकार प्रीतम का जन्म उस समय नहीं हुआ था जब नायिका ने यह गीत गाय था।

दिल केवल टूटते नहीं थे। कुछ गीतों से पता चलता है कि दिल कहीं भी आ जा सकते थे। जैसे ऐ मेरे दिल कहीं और चल ...गीत से पता चलता है कि नायक जब कभी भी किसी एक जगह से बोर-सोर हो जाता था तो दिल को सजेस्ट करता था कि वह कहीं और चले। वह कहीं और चलेगा तभी नायक को भी उसके साथ नई जगह जाने का मौका मिलेगा और उसकी बोरियत दूर हो सकेगी। इस गीत में नायक दिल को उकसाते हुए उससे कहता है कि वह न सिर्फ कहीं और चले बल्कि कोई नया घर भी ढूंढ ले। कुछ इतिहास्यकारों का मानना है कि शायद नायक वन रूम किचेन में रहकर बोरियतगति को प्राप्त हो गया था और उससे निकलने का यही तरीका था कि वह दिल को उकसाए ताकि वह न सिर्फ खुद कोई नया घर ढूंढें बल्कि नायक को भी उपलब्ध करवाए। वैसे इतिहास्यकारों का एक ग्रुप यह भी मानता है कि नायक ऐसा करके दिल की मदद कर रहा था क्योंकि उसने अपने लिए गम की दुनियां का चुनाव तो कर लिया था लेकिन कालांतर में गम की उसी दुनियां से उसका दिल भर गया था। कुछ वैज्ञानिक ऐसा मानते हैं कि भरा हुआ दिल भारी होता है लिहाज भारी दिल के कहीं और जाने की बात वैज्ञानिक दृष्टिकोण से तर्कसंगत नहीं जान पड़ती।

टूटने और आने-जाने के अलावा दिल जलते भी थे। नायक द्वारा गाये गीत; 'दिल जलता है तो जलने दो ...' से यह बात सामने आती है कि नायक को इस बात से कोई गुरेज नहीं होता था कि उसका दिल जल रहा है? उसे इस बात की चिंता नहीं थी कि अगर अगर दिल जलने लगा तो हो सकता है आग उसके कुर्ते में भी लग जायेगी और कहीं उसको बीच बाज़ार सबसे सामने कुर्ता उतार फेंकना न पड़ जाए। कुछ इतिहास्यकारों ने इस गीत के बारे में अनुमान लगते हुए लिखा है कि शायद नायक के मित्र ने उसके दिल को जलते हुए देखा होगा और जब उसने बताया कि नायक का दिल जल रहा है तो बिंदास नायक ने उसको दो टूक कह दिया कि दिल जलता है तो जलने दो। ऐसे नायक को कालांतर में लोगों ने दिलजला कहकर पुकारना शुरू किया। इस गीत से प्रेरित होकर तमाम नायक खुद को दिलजले कहलाना पसंद करने लगे थे।

दिल में किसी के लिए प्यार-स्यार तो रहने की बात आम थी लेकिन आश्चर्य की बात यह कि कभी-कभी नायक के दिल में भंवरा भी रहता था। जैसे गीत 'दिल का भंवर करे पुकार, प्यार का राग सुनो, प्यार का राग सुनो रे ...' से प्रमाण मिलता है कि नायक के दिल में भंवरा रहता था और वह केवल प्यार का राग गाता था। उसे मालकौस, भीमपलासी, मल्हार वगैरह गाने में जरा भी दिलचस्पी नहीं थी। दिल में रहने वाला भंवर जब भी गाता प्यार का राग ही गाता था और नायक नायिका से कहता था कि वह प्यार का राग ही सुने और बाकी के रागों को अनसुना कर दे।

हो सकता है शोधार्थी आखिर में अपना शोधपत्र यह लिखते हुए खत्म करे कि ; "कालांतर में परिवर्तन ऐसा हुआ कि पहले के दिनों में दिल में रहने वाले नायक-नायिका को बाद में दिल में जगह नहीं मिल पाती थी। यही कारण है कि बाद के दिनों में नायिका ने इस बात से समझौता कर लिया कि नायक के दिल में जगह की कमी है। ऐसी स्थिति में उसे लगा कि चूंकि अन्दर बसना ईजी नहीं रहा इसलिए अगर नायक मुझे दिल में बसाने की जगह मेरी फोटो ही अपने सीने से लगा ले तो भी बहुत बड़ी बात होगी। ऐसे में उसने गाना शुरू किया; 'मेरे फोटो को सीने से यार चिपका ले सैयां फेविकोल से ....मैं तो कब से हूँ रेडी-तैयार पटा ले सैयां मिस्ड काल से ..." इस गीत से यह साबित होता है कि पहले नायक के दिल में बसने वाली और अपने दिल को मंदिर माननेवाली नायिका अब दिल कॉन्सस होने के बाजे ब्रांड कॉन्सस हो चुकी थी। वह अब इस बात से ही संतोष कर लेती थी कि नायक उसे दिल में बसाने की बजाय उसके फोटो को ही सीने से चिपका ले तो भी बहुत बड़ी बात होगी। हाँ, वह ब्रांड कॉन्सस ऐसी है कि किसी भी लोकल अढ़ेसिव ब्रांड से अपनी फोटो नहीं चिपकने देगी बल्कि यह साफ़ बता देना चाहती है कि अढ़ेसिव की बात पर केवल फेविकॉल ही .............................................................

Monday, April 1, 2013

चंदू' ज एक्सक्लूसिव चैट विद जस्टिस काटजू

"अदालत की वजह से कभी-कभी बड़े लोगों को सज़ा भी होनी चाहिए" नामक सिद्धांत के तहत संजय दत्त को सजा हो गई। इस सज़ा ने तमाम लोगों को एक्टिव कर दिया। कुछ अति-एक्टिव भी हुए। इसने लोगों को गुटबाजी के लिए भी प्रेरित किया। प्रेरणा लेकर दो गुट उभरे। एक वह जो यह चाहता है कि संजय दत्त को जेल होनी चाहिए और दूसरा वह जो चाहता है कि संजय को जेल नहीं होनी चाहिए बल्कि उन्हें राज्यपाल से माफी मिल जानी चाहिए।

इस दूसरे गुट का प्रतिनिधित्व जस्टिस काटजू कर रहे हैं। उन्होंने प्रण टाइप किया है कि वे राज्यपाल से अपील करके संजय दत्त जी को माफी दिलाकर ही दम लेंगे। लोग उनके विरोध में भी बात कर रहे हैं।

ये मैं क्या लिख रहा हूँ? मुझे यहाँ जस्टिस काटजू का इंटरव्यू छापना है और मैं कुछ भी अंट-संट लिख रहा हूँ। वैसे आप मन ही मन सोचने के लिए स्वतंत्र हैं कि जस्टिस काटजू के इंटरव्यू की बात पर अंट-संट लिख दिया जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं। तो आप बांचिये जस्टिस काटजू का इंटरव्यू जिनके साथ बात की हमारे ब्लॉग संवाददाता चंदू चौरसिया ने।


चंदू: नमस्कार सर।

जस्टिस काटजू : नमस्कार? क्या कह रहे हैं आप? आपको तमीज नहीं है? यू आर मच यंगर टू मी फिर भी आप नमस्कार कर रहे हैं। क्या आपको नहीं लगता कि आपको प्रणाम करना चाहिए?

चंदू : नहीं, ऐसी बात नहीं है सर। दरअसल मुझे लगा कि "सर" के साथ नमस्कार ही ठीक जाता है। "प्रणाम सर" कहने से कैसा तो फील होता है। फिर भी आपने याद दिलाया तो मैं अपना नमस्कार वापस लेता हूँ और उसके बदले प्रणाम देता हूँ।

जस्टिस काटजू : ये ठीक है। वैसे आपका नाम क्या है और आप किस चैनल से हैं?

चंदू : सर, मेरा नाम चंदू चौरसिया है और मैं किसी चैनल से नहीं बल्कि ब्लॉग संवाददाता हूँ।

जस्टिस काटजू : अच्छा!! आप भी चौरसिया हैं?

चंदू : आप भी से क्या तात्पर्य था सर आपका?

जस्टिस काटजू : आप भी से मेरा मतलब ...दरअसल आपका सर-नेम सुनकर मुझे दीपक चौरसिया याद आ गए इसलिए मेरे मुंह से निकल आया। अभी हाल में मैंने एक इंटरव्यू में दीपक चौरसिया को बेवकूफ कहा था और बीच में भी इंटरव्यू छोड़कर बाहर निकल आया था ..... आप भी क्या उसी तरह के सवाल करेंगे?

चंदू : अरे नहीं सर। सोशल मीडिया वाले अभी तक मेनस्ट्रीम मीडिया वालों की तरह ज्यादा बेवकूफ नहीं हुए हैं। ऐसे में .....सोशल मीडिया वालों को वहां तक पहुँचने में अभी समय लगेगा।

जस्टिस काटजू : अरे हाँ मैं तो भूल ही गया कि आप सोशल मीडिया से हैं। खैर, पूछिए आप अपना सवाल। मुझे जल्दी है। कई न्यूज चैनल्स पर मुझे पैनल डिस्कशन के लिए जाना है।

चंदू: जरूर सर जरूर। मेरा पहला सवाल यह है कि आपने ये संजय दत्त की माफी के लिए गवर्नर से रिक्वेस्ट किया है, वह कहाँ तक जायज है?

जस्टिस काटजू : कहाँ तक जायज है से क्या मतलब आपका? वह संविधान तक जायज है। माफी की बात हमारे संविधान में है और यह हमारा अधिकार है।

चंदू: सर, लेकिन कुछ लोग मानते हैं कि ये आपका अधिकार कैसे हुआ? सज़ा संजय दत्त को हुई है, अधिकार तो उनका है।

जस्टिस काटजू : एक ही बात है। संजय दत्त और मुझमें क्या अंतर ..अरे, ये मैं क्या बोल ... मेरा मतलब था कि अब जब मामला मैंने उठाया है तो अधिकार भी तो मेरा ही हुआ। वैसे भी जो लोग ऐसा मानते हैं वे उसी नब्बे प्रतिशत में से होंगे जिन्हें मैं बेवकूफ समझता हूँ।

चंदू: लेकिन सर, संजय दत्त जी ने संवाददाता सम्मलेन करके बताया कि वे चूंकि सुप्रीम कोर्ट का बहुत आदर करते हैं इसलिए सज़ा भुगतने के लिए तैयार हैं। उन्होंने ये भी कहा कि वे कोई अपील फाइल नहीं करेंगे।

जस्टिस काटजू : संजय दत्त के कहने से क्या होता है? वे भी तो उसी नब्बे प्रतिशत ...उनके अन्दर अभी बहुत बचपना है। और फिर अपील मैं न फाइल कर रहा हूँ, उनके कहने से क्या होगा? मेरा मैसेंजर मेरी अपील राष्ट्रपति तक पहुंचा भी चुका है और मैं यहाँ संत मानिक दास को कोट करना चाहूँगा जिन्होंने कहा था कि ; "कमान से निकला तीर और संवैधानिक अधिकार वाले के हाथ से निकली अपील वापस नहीं आते।"

चंदू: आपके कहने का मतलब अब संजय दत्त जी को यह अपील स्वीकार करनी ही पड़ेगी?

जस्टिस काटजू : किस तरह का बेतुका सवाल है ये? अपील तो गवर्नर को स्वीकार करनी है। मैंने अपील की और गवर्नर ने स्वीकार की, इसमें संजय दत्त बीच में कहाँ से आ गए?

चंदू : आपके विरोधी यह भी कहते हैं कि आप इसलिए अपील कर रहे हैं क्योंकि संजय एक सेलेब्रिटी हैं।

जस्टिस काटजू : यह बकवास बात है। मैंने इसके पहले तमाम अपील की हैं। लोगों को पता नहीं कि मैंने गोपालदास के लिए भी अपील की है। मैंने सरबजीत के लिए भी अपील की है। मैंने बनवारी लाल, अशफाक चेम्बूरी और रामजतन के लिए भी अपील की है। वे तो सेलेब्रिटी नहीं है।

चंदू : वैसे सर, आप ये जो अपील कर रहे हैं, ऐसा क्यों कर रहे हैं? तमाम कोर्ट्स से निकल कर केस का फैसला हुआ है। अगर सब ऐसे ही माफी की अपील करते रहेंगे तो कोर्ट का क्या औचित्य रह जाएगा?

जस्टिस काटजू : यही तो समझने की बात है लेकिन आप कैसे समझेंगे? आप तो उसी नब्बे .... देखिये, ये जो अपील का रूट मैंने अपनाया है वह देश के लिए मेरी सेवा भावना से पैदा हुआ है। इतने वर्षों तक न्याय प्रक्रिया से जुड़े रहकर मैंने देखा कि कोर्ट्स में मुकदमों की भरमार है। जजों को समय नहीं मिलता। इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी है। केस वर्षों तक लटके रहते हैं। वर्षों के बाद फैसले होते हैं। ऐसे में मुकदमों की संख्या कम करने का सबसे बढ़िया तरीका यह है कि जब फैसला हो तो उसके खिलाफ माफी की अपील फाइल करके मुजरिम को माफी दिला देनी चाहिए।

चंदू: इससे क्या हासिल होगा?

जस्टिस काटजू : थोड़ी देर पहले तो आपने कहा कि सोशल मीडिया वाले अभी तक बड़े बेवकूफ नहीं हुए हैं।

चंदू: मैंने समझा नहीं?

जस्टिस काटजू: मैं इसीलिए तो कह रहा हूँ कि अगर आप बेवकूफ नहीं हैं तो फिर मेरी सीधी बात आपकी समझ में क्यों नहीं आई? आपको क्यों समझ में नहीं आया कि जब सजा होने के बाद आपील की वजह से मुज़रिम को जेल नहीं जाना पड़ेगा तो लोग अदालत में यह सोचकर जाना बंद कर देंगे कि क्या फायदा वहां जाने से जब सज़ा ही नहीं होगी तो? यह होना शुरू होगा तो फिर मुक़दमे अदालत तक जायेंगे ही नहीं। ऐसा हुआ तो न्याय-प्रक्रिया में 'लिप्त' लोगों को राहत मिलेगी। अदालतों पर बोझ कम होगा।यहाँ मैं कवि कैलाश गौतम की कविता की पंक्तियाँ कोट करना चाहूँगा जिन्होंने लिखा था ;

कचहरी हमारी तुम्हारी नहीं है
कहीं से कोई रिश्तेदारी नहीं है
....................................

कचहरी की महिमा निराली है बेटे
कचहरी वकीलों की थाली है बेटे
................................................

खुले आम कतिल यहाँ घूमते हैं
सिपाही दरोगा चरण चूमते हैं
यहाँ झूठ की ही कमाई है बेटे
यहाँ झूठ का रेट हाई है बेटे

अब आपही बताइए कि मेरा प्लान क्या बुरा है? क्या मैं अपील इंडस्ट्री चलाकर देशसेवा नहीं कर रहा हूँ? वैसे आपने कैलाश गौतम के बारे में सुना था पहले?

चंदू: हाँ, सर गौतम जी के बारे में मैंने सुना है। उनकी कवितायें भी पसंद है।

जस्टिस काटजू : यह तो कमाल हो गया। हमारे बीच ऐसे संवाददाता भी हैं तो कैलाश गौतम के बारे में जानते हैं!!! अच्छी बात है कि आपने उनके बारे में सुना है। और शेक्सपीयर के बारे में भी सुना है क्या?

चंदू: हाँ सर, उनके बारे में भी सुना है। फिर आपने अपनी दलील में शेक्सपीयर जी को कोट करके उन्हें फेमस भी तो कर दिया है।

जस्टिस काटजू : वे मेरे कोट किये जाने से फेमस हुए, यह तो महज संयोग है। वैसे फेमस तो मैंने तुलसीदास को भी कर दिया है। मेरी इस अपीली प्रक्रिया की वजह से कबीर भी फेमस हो गए हैं। लेकिन मुद्दा माफी का है, ये कोट्स वगैरह तो महज तरीके हैं।

चंदू: लेकिन सर केवल लेखकों और कवियों को कोट करके अपील का माहौल बनाना ठीक है क्या?

जस्टिस काटजू : मैंने केवल कोट्स का सहारा तो नहीं लिया। मैंने तो यह खुलासा भी किया है कि संजय दत्त की अब शादी हो गई है। उनके बच्चे हो गए हैं। ऐसे में उनको ...

चंदू: लेकिन सर, शादी को कई मुजरिमों की होती है। बच्चे भी होते हैं। तो क्या इस तरह के सारे मुज़रिम सजा होने के बाद छोड़ दिए जायेंगे?

जस्टिस काटजू : लेकिन हर शादी-शुदा और बच्चों वाला मुज़रिम एक्टर तो नहीं होता न। दूसरी बात यह है कि संजय दत्त के पिता जी और माताजी ने समाज सेवा की है। वे सैनिकों का मनोरंजन करते थे। संजय दत्त ने खुद मुन्नाभाई जैसी फिल्म करके देश को गांधीगीरी का महत्वपूर्ण सिद्धांत दिया है। उन्होंने पूरी दुनियाँ में मेडिकल प्रोफेशन के लिए जादू की झप्पी जैसा एक पाथ-ब्रेकिंग इलाज दिया है जो हर मर्ज में फायदेमंद है।

चंदू : लेकिन सर, आप सबसे कहते फिर रहे हैं कि आपने पिछले चालीस वर्षों में एक भी फिल्म नहीं देखी। ऐसे में ये यह मुन्नाभाई जैसी फिल्म को आगे रखकर आप बात कर रहे हैं, यह कहाँ तक जायज है?

जस्टिस काटजू : यह किस तरह का बेहूदा सवाल है? यह तरीका है क्या अपने एल्डर्स से बात करने का? अगर इस तरह की बेवकूफी वाली बातें करनी है तो मैं इंटरव्यू छोड़कर चला जाऊंगा।

चंदू: माफ़ कीजिये सर ...

जस्टिस काटजू : ऐसे कैसे माफ़ कर दें? मैं माफी दिलवाता हूँ, माफ़ करता नहीं। और फिर मुन्नाभाई द्वारा प्रतिपादित सारे सिद्धांत क्या देशहित में नहीं हैं?

चंदू : आप कहते हैं तो यह सही ही होगा। वैसे मेरा एक सवाल यह है कि ये आपने जो अपील इंडस्ट्री खोली है, उसे क्या और व्यापक करेंगे? क्या आनेवाले समय में हम उसका फैलाव देखेंगे?

जस्टिस काटजू : जरूर देखेंगे, क्यों नहीं देखेंगे? अभी मेरे साथ मजीद मेमन जुड़े हैं। आनेवाले समय में और लोग जुड़ेंगे। मेरी इच्छा है कि अखिल भारतीय अपील महासभा का कार्यालय हर राज्य और हर महत्वपूर्ण शहर में हो ताकि आनेवाले समय में ज्यादा से ज्यादा लोगों को माफी दिलाई जा सके। मुझे आशा ही नहीं बल्कि पूरा विश्वास है कि एक दिन इस देश के हर उस मुजरिम को, जो आतंकवादी न हो, किसी न किसी तरह की माफी मिलकर रहेगी।

चंदू : मेरा अगला सवाल इस केस से हटकर है सर। सोशल मीडिया में आपकी बहुत आलोचना हो रही है। आपने हाल ही में कहा था कि सोशल मीडिया को रेगुलेट किये जाने की आवश्यकता है। तो क्या आप ऐसा कोई प्रस्ताव सरकार को भेज रहे हैं?

जस्टिस काटजू : जरूर भेजेंगे। और मेरा यह मानना कि सोशल मीडिया को रेगुलेट की आवश्यकता है, बिलकुल सही है। दूसरी बात यह है कि सोशल मीडिया के लिए कानून बने यह मैं इसलिए चाहता हूँ ताकि उस कानून के तहत सोशल मीडिया वालों को सज़ा मिले। जब तमाम लोगों को उस कानून के तहत सज़ा मिलेगी तो मैं उनको माफी दिल दूंगा। तो आप यह समझें कि मेरी इच्छा कानून बनवाकर सजा दिलाने की नहीं बल्कि कानून बनवाकर सजा दिलाकर माफी दिलवाने की है।

चंदू : आपने अपनी दलील में मर्चेंट ऑफ़ वेनिस से पोर्सिया को कोट किया। शाईलॉक को कोट किया। तुलसीदास को कोट किया। ऐसे में ....

जस्टिस काटजू : मैंने इनलोगों को इसलिए कोट किया कि आज की पीढी को संस्कृत का ज्ञान नहीं है। अगर होता तो मैंने संस्कृत के श्लोक कोट करता। अब आप ही समझिये कि कहा गया है; "येषां न विद्या, न तपो, न दानं, ज्ञानं न शीलं, न गुणो न ...."

चंदू: सर ये क्या कर रहे हैं आप? इस श्लोक का आपकी दलील से क्या लेना-देना है?

जस्टिस काटजू : मतलब ये कि आपको संस्कृत आती है? पहले क्यों नहीं बताया, मैं रेलीवेंट श्लोक कोट करता। क्या बेवकूफी है ये?

चंदू: सर, आपने शेक्सपीयर, तुलसीदास, कबीर वगैरह को कोट किया और जैसा कि आपने बताया कि वे फेमस हो गए, लेकिन आपने हमारे समय के किसी कवि को कोट नहीं किया। ऐसा क्यों?

जस्टिस काटजू : मैं तो चाहता था कि मैं कविवर अमर सिंह को कोट करूँ लेकिन तबतक वे जयाप्रदा के साथ गवर्नर से संजय दत्त की माफी के लिए मिलने चले गए। इसलिए मैंने डिसाइड किया कि मैं उनको कोट नहीं करूंगा।

चंदू : सर, आपने यह भी कहा है कि आप सलमान खान और सैफ अली खान को भी माफी दिलवाएंगे। क्या आप ऐसा करेंगे?

जस्टिस काटजू : बिलकुल करूंगा। अब मैंने अपना जीवन माफी और अपील इंडस्ट्री को समर्पित कर दिया है।

चंदू: लेकिन सर, सलमान खान तो शादी-शुदा नहीं है और सैफ अली खान के बच्चे नहीं हैं। इन दोनों ने मुन्नाभाई की तरह कोई महत्वपूर्ण सिद्धान्त भी नहीं दिया है।

जस्टिस काटजू : देखिये सलमान खान का गैर शादी-शुदा होना ही मेरी अपील का आधार रहेगा। कि सज़ा होने के डर से उन्होंने शादी नहीं की। उधर सैफ का शादी-शुदा होना मेरी अपील का आधार होगा। कि उन्होंने करीना कपूर से शादी की जो राजकपूर की के खानदान से हैं। और फिर सैफ अली खान ने एजेंट विनोद जैसी फिल्म की जिसमें उसने भारत और पाकिस्तान के आपसी संबंधों को सुधारने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

चंदू: सर, आपने ही कहा कि आपने चालीस साल से कोई फिल्म नहीं देखी। ऐसे में एजेंट विनोद ...

जस्टिस काटजू : किस तरह का बेहूदा सवाल है ये? आपने फिर बेवकूफी शुरू कर दी। मैं ये इंटरव्यू करूंगा ही नहीं। मैं जा रहा हूँ। गेट आउट फ्रॉम हीयर।

इतना कहकर जस्टिस काटजू उठ गए और कमरे से बाहर जाने लगे। चंदू डर गया था फिर भी उसने उनके जाते-जाते एक सवाल दाग ही दिया। उसने पूछा; "सर, आप अभी तक शेक्सपीयर, तुलसीदास, कबीरदास, मानिक दास वगैरह को कोट कर चुके हैं। अगर इससे काम न बना तो?

जस्टिस काटजू जाते-जाते चिल्लाकर बोल गए कि ; "इन सबको कोट करने से काम न बना तो फिर मैं ऑस्कर वाइल्ड, बर्नार्ड शा, ओ हेनरी, ओसोलन मोशावा, कीट्स, ग़ालिब को कोट करूंगा। ये समझ लो कि चाहे मुझे रतिराम चौरसिया को कोट करना पड़े लेकिन मैं हारने वाला नहीं हूँ। मैं कोट्स के सहारे संजय दत्त को माफी ......."

Tuesday, March 26, 2013

नेताओं का गुझिया कम्पीटीशन - पार्ट २

........आगे का हाल

रविशंकर प्रसाद बोले; "मैं माननीय लालू जी से पूछना चाहता हूँ कि प्राचीन भारत के समय से ही गुझिया के मसाला में जो गरी काटकर डाली जाती थी वह रंगी नहीं जाती थी। यहीं देख लीजिये कि इन्होने जो मसाला यहाँ रखा है उसमें इस्तेमाल होने वाली गरी को इन्होने हरे रंग में रँग दिया है।"

रविशंकर प्रसाद की बात पर लालू जी बोले; "आ जो हरे रंग से रंगी गरी देख रहे हैं, ऊ रंगी नहीं है। उसको कहते हैं सेकुलर गरी ... आपका निगाह ही हरा हो गया है। आ अंधे को सब जगह गरी की हरियाली ही दिखाई देती है।"

लालू जी की बात पर जोर का ठहाका लगा।

अपनी पार्टी के एम पी को समर्थन देने आये प्रकाश करात बोले; "यह बात केसरिया गुझिया बनाने वालों को समझ कैसे आएगी लालू जी?"

रविशंकर प्रसाद कुछ कहते उससे पहले मोदी जी बोल पड़े; "मित्रों केसरिया रंग ही नहीं, केसरिया गुझिया भी भारतीय राष्ट्रखाद्य का प्रतीक है। और यही कारण है कि माननीय अटल बिहारी बाजपेयी जी के नेतृत्व में हमारी पार्टी ने मित्रों पांच वर्षों में उतनी गुझिया बनाई जितनी बाकी की पार्टियों ने पचास वर्षों में नहीं बनाई थी। आपको जानकार आश्चर्य होगा कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय भी यह मानता है .... और फिर प्रश्न यह है मित्रों ....."

वे बोल ही रहे थे कि तभी कांग्रेस पार्टी को रिप्रेजेंट करनेवाले राहुल गाँधी बोल पड़े; "प्रश्न वह नहीं जो आप कह रहे हैं मोदी जी। महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि भारत में गुझिया कौन लाया? और फिर आप अपनी पार्टी की गुझिया की बात कर रहे हैं। हमारी पार्टी ने पिछले नौ वर्षों से देश में जिस मात्रा में गुझिया बनाया है ...."

राहुल गाँधी के प्रश्न पर कि "देश में गुझिया कौन लाया?" पैवेलियन में बैठे किसी दर्शक ने कहा; "राजीव जी लाये। और कौन ला सकता है?"

उनको काटते हुए मोदी जी ने कहा; "राहुल जी कि मैं इज्ज़त करता हूँ लेकिन ये यह भूल रहे हैं कि जिन मसालों का इस्तेमाल करके इनकी पार्टी ने गुझिया बनाया, मित्रों वे सारे मसाले आदरणीय अटल जी के नेतृत्व में हमारी पार्टी ने भारी मात्रा में खरीदे थे। अगर हमारी पार्टी ने उन मसालों का भारी मात्रा में स्टॉक नहीं किया होता तो राहुल जी की पार्टी इतनी गुझिया का निर्माण नहीं कर सकती।"

उधर अपनी पार्टी की तरफ से मुलायम जी आये थे। गुझिया बनाने के लिए सारा सामान साइकिल पर ले आये थे ताकि जमीन से जुड़े प्रतियोगी लगें। मोदी जी की बात सुनकर बोले; "आपएं मासाला खईदा था तो गोईया भी बआं एते।"

उनकी बात पर रविशंकर प्रसाद बोले; "मैं माननीय मुलायम सिंह जी से कहना चाहूँगा कि लोकतान्त्रिक गुझिया ऐसे ही बनती है। मसाला कोई और खरीदे और गुझिया कोई और तले, ऐसा हो ही सकता है।"

तभी अचानक अरनब ने देखा कि डीएमके की तरफ से आये एलेंगोवन जी बड़ी अजीब आकार की गुझिया बना रहे थे जो कुछ-कुछ तिकोनी थी और श्रीलंका के आकार से मिलती-जुलती थी। अरनब ने पूछा; "आई हैव अ डायरेक्ट क्वेश्चन टू यू मिस्टर एलेगोवन। ह्वाई आर यू मेकिंग गुझियाज व्हिच रेजेम्बेल श्रीलंकाज शेप ऑन वर्ल्ड मैप?"

उनके इस डायरेक्ट सवाल के जवाब में एलेंगोवन जी बोले; "सी यारनाब, आवर ल्यीड्डर, डाक्टर कलयैङ्गार सार वास यगेंस्ट्स आवर पार्टिसिपेशन यिन दिस्स गुजिया क्याम्पीटीशन यैज यिट्ट यिज्ज टाटली यागेंस्ट्स आवर द्रविड़ काल्चार। बाट ऐट लास्ट ई याग्रीड़ टू यिट्ट यान द क्यान्डीश्यान दैट हूयेव्वर वुड रिप्रेसेन्ट द पार्टी वुड्ड कुक गुजिया याफ द शेप याफ़ श्रीलंका येन्ड यीट दोज गुजियास देन्न यैंड देय्यर। आवर ल्यीड्डर डाक्टर कलैङ्गार सार टोल्ड दैट डूइंग दिस्स वुड येसटेब्लिशड आवर येट पार श्रीलंका येण्ड यिट्स प्रेजिडेंट। यिन्न पैक्ट यिट्ट यिज्ज आवर वे ऑफ़ प्रोटेयेस्ट यगेंस्ट्स ह्वाट श्रीलंकन गावंमेंट ड्यिड्ड टू आवर तामिल ब्रेदार्न।"

एलेंगोवन जी को चीयर करने आये एम्डीएमके के वाईको ने ताली बनाई।

एलेंगोवन जी की तरफ मुखातिब होते हुए लालू जी बोले; "आ आपलोग सेकुलर रसोई में एतना बरस से हमलोग का साथ मिलकर गोझिया बनाए आ खाए, बाकी आज खाली ई बात पर छोड़कर चले गए कि कांग्रेस जो है सो आपको छोहाड़ा खाने नै दिया? आपलोग को नहीं बुझाया कि ई सेकुलर रसोई का अपमान है?"

लालू जी की बात पर नितीश कुमार बोले; "अभी भी रसोई का याद नहीं गया है? आ सही भी है, देश को गोझिया का पहिला किचेन कैबिनेट देने वाला सब याद नहीं रक्खेगा त कौन याद रक्खेगा?"

नितीश कुमार की किचेन कैबिनेट वाली बात पर राहुल जी को लगा कि शायद उनके घर के बारे में कुछ कहा गया। वे क्या करते, उनका दिमाग जहाँ तक दौड़ा वहां तक वे सोच लिए। अचानक कुर्ते की बांह चढाते हुए बोले; "नितीश जी, सार्वजनिक जगह पर व्यक्तिगत बातें नहीं करनी चाहिए। देखिये हमने पिछले कई वर्षों से इतना गोझिया बनाया। अगर आप चाहें तो हम कुछ गोझिया स्पेशल कूरियर से आपके प्रदेश पहुंचवा देंगे।"

नितीश कुमार बोले; "आ आपकी पार्टी लगातार गोझिया नहीं बनाएगी तो कौन बनाएगा? और फिर कितना बना लिए है? पहले जिस रफ़्तार से बना रहे थे, अब तो वह रफ़्तार भी नहीं रही। ऊपर से गोझिया का सामान और मसाला लाने के लिए आपके पास सीबीआई है। जब चाहें आप उनसे मसाला मंगवा लेते है। तेल ख़तम हो जाए तो सी बी आई ला देती है। मैदा ख़तम हो जाए तो भी .... ऐसे में आप गोझिया नहीं बनायेंगे तो कौन बनाएगा?"

मुलायम जी को लगा कि यहाँ उन्हें सी बी आई का पक्ष लेने की ज़रुरत है। बोले; "एखिये, ऐसी बात नई ऐ। हअबाअ सी बी आई जो ऐ मासाआ नई लाती। असोई चअती अहे, उसके लिए दूकानदाअ कई बाअ खुदै मसाआ पौंचा जाता ऐ। हमयें खुद अपई आँखों से जो ऐ सो देखा ऐ।"

पास खड़े रविशंकर प्रसाद बोले पड़े; "माननीय मुलायम सिंह जी फर्स्ट हैण्ड इनफार्मेशन दे रहे हैं। उनसे बेहतर कोई नहीं जानता कि कई दुकानदार खुद गुझिया का मसाला कांग्रेस पार्टी को दे जाते हैं। लेकिन अरनब, मैं ये भी कहना चाहता हूँ कि सी बी आई कुछ दुकानदारों को परेशान भी करती है। इसबात के लिए कि वे अगर मसाला नहीं पहुंचाएंगे तो फिर उनकी दूकान पर छापा भी ......"

राहुल जी बोले; "लेकिन सी बी आई के बारे में कहीं गई बात से मैं सहमत नहीं हूँ। दुकानदार स्वतंत्र हैं इसबात के लिए कि वे चाहें तो मसाला दें और न चाहें तो न दें। हम किसी न किसी तरीके से मसाला ले ही लेंगे।"

मोदी जे बोले; "मित्रों राहुल जी एकबात भूल रहे हैं और वह ये कि मुद्दा दुकानदारों की स्वतंत्रता का नहीं बल्कि सी बी आई की स्वतंत्रता है।"

मोदी जी की बात पर पास ही खड़े नारायणसामी बोले;"लेट मी रिमाइन्ड एवरीबॉडी प्रेजेंट हीयर दैट सी बी आई ईज्ज मोस्ट यिंडीपेंडेंट गाब्म्येंट बाड़ी।"

सबने एकसाथ ठहाका लगाया। राहुल जी को समझ नहीं आया कि सब लोगों ने एकसाथ ठहाका क्यों लगाया। वे कुछ पूछने ही वाले थे कि अचानक अरनब की निगाह उनकी बनाई गुझिया पर गई जिन्हें देखकर अरनब चौंक गए। सबने देखा कि राहुल जी ने गुझिया में सारे मसाले डाले तो हैं लेकिन उन्होंने एक भी गुझिया बंद नहीं की है।

सब हंसने लगे। सब मन ही मन राहुल जी का मजाक उड़ा रहे थे। अरनब ने पूछा; "राहुल, आपने इतनी सारी गुझिया बनाई लेकिन एक को भी बंद नहीं किया। इसके पीछे क्या कारण हो सकता है? ह्वाट कैन बी द रीजन बिहाइंड दिस स्ट्रेटेजी?"

राहुल कुछ एक्सप्लेन करते उनसे पहले केतकर जी बोल पड़े। जिस चपलता के साथ उन्होंने सफाई देनी शुरू की, देखकर लगा कि उन्हें वहां हाईकमान की तरफ से भेजा गया था। शायद यह कहकर कि कुछ गड़बड़ हो तो संभाल लीजियेगा।

वे बोले; "इन खुली हुई गुझिया के पीछे क्या कारण है वह मैं समझाता हूँ अरनब। मैं यहाँ केवल एक जज ही नहीं बल्कि कांग्रेस पार्टी के शुभचिंतक की हैसियत से भी आया हूँ। दरअसल राहुल जी ने जो बनाया है वह कांग्रेसी गुझिया है। इसे बंद नहीं किया जाता। बंद न करके पार्टी बताना चाहती है कि वह जब भी चाहे गुझिया में से कोई एक मसाला निकालकर दूसरा मसाला फिट कर सकती है। यहाँ मसालों को छूट है कि वे जब चाहें गुझिया छोड़कर जा सकते हैं। हाँ यह बात अलग है कि पार्टी गुझिया छोड़कर जाने वाले मसालों को ही फ्राई कर देती है। अभी हाल में आपने देखा होगा कि चेन्नई में किस तरह से स्टालिन के घर की रसोई में ......"

उनकी एनाल्यसिस से सभी प्रभावित थे। लालू जी बोले; "आ खाली टीभी पर समाचार पढने से नै न होता है अरनब। आ, जिस तरह से केतकर जी एनेलाइसिस किये हैं कंग्रेस का गोझिया का, उससे बुझा ही गया होगा कि केतना फरक है आपका औउर केतकर जी का कैपेभिलिटी में। अनुभव का बड़ी महत्व है।"

अरनब ने लालू जी के साथ हामी भरी।

रविशंकर प्रसाद बोले; "मित्रों, अनुभव का तो महत्व है ही। केतकर जी कांग्रेसी गुझिया का स्वाद आज से नहीं ले रहे हैं, वे तो इमरजेंसी के जमाने से कांग्रेसी गुझिया खा रहे हैं। ऐसे में अनुभव तो बोलेगा ही।"

किसी ने पास ही कड़ी ममता जी से पूछा; "दीदी, आपकी पार्टी ने किसी को गुझिया बनाने के लिए नहीं भेजा? क्या आपकी पार्टी चुनाव से पहले अपनी गुझिया नहीं खोलना चाहती?"

उसके इस सवाल पर लालू जी बोले; "आ इनका पार्टी अभी बांगाल में लपसी बना रही है। गोझिया बनाने के लिए ई लोग के पास समय कहाँ है?"

दीदी को यह बात अच्छी नहीं लगी। उन्होंने कहा; "आइसा बात नेही है लालू जी। हामारा पार्टी भी गोझिया बनाने सोकती है किन्तु बनाना नेही चाहती। एही बास्ते कि हामसोब मीलकर जो गोझिया बनाएगा, सोब वालमार्ट ख़रीद लेगा ऊ भी आधा दाम में। हामारा पार्टी को एही बात मोंजूर नही है। औउर जे बात है कि हामारा बेंगोल में गुझिया नही बनता है। उहाँ पे पीठे बनता है। कोभी पीठे बनाने का कोम्पीटीशोन होगा तोब हामलोग सोचेगा।"

पता नहीं कहाँ से पास खड़े वाड्रा जी को दीदी की बात "हामारा पार्टी गुझिया बनाना नेही चाहती" धंस गई। वे फट से बोले; "बनाना की जो बात ममता दीदी आज कह रही हैं वो मैंने तो पहले ही ...."

उनकी बात को लालू जी कटते हुए बोले; "आ चुप रहो, ई गोझिया का बात हो रहा है। ई तुम्हारा रीयल एस्टेट नै न है कि जहाँ चाहो ओहीं बोल ...."

खैर, सारी कलाएं दिखाने के बाद जुरी ने सबकी गुझिया चेक की। जुरी के अध्यक्ष कुमार केतकर जी बोले; "अरनब, मैंने सबकी गुझिया चेक की। मुलायम सिंह जी और लालू जी की गुझिया अच्छी लगी मुझे। नरेन्द्र मोदी की गुझिया कुछ ख़ास नहीं लगी। मुझे तो यह समझ नहीं आता कि अगर मोदी की गुझिया अच्छी है ही, तो गुजरात में में बच्चों में इतना कुपोषण क्यों है? वे गुझिया क्यों नहीं खा रहे? यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब शायद तीश्ता जी दे पाएं। एलेंगोवन जी की गुझिया मैं चेक नहीं कर सका क्योंकि प्रोटेस्ट रजिस्टर करने के चक्कर में वे सारी गुझिया खा गए। हाँ, जो सबसे ज्यादा पसंद आई मुझे, वह राहुल जी की गुझिया है। क्या गुझिया बनाया है उन्होंने। स्वादिष्ट, मीठी और पूरी तरह से सेक्युलर गुझिया। मुझे यह लगता है कि राहुल जी बहुत बड़े अंतर से जीते हैं इस कम्पीटीशन में।"

दूसरे दिन अखबारों में छपा;"राहुल गांधी ने गुझिया कम्पीटीशन जीता। नौजवानों में आशा का नया संचार"

Saturday, March 23, 2013

टाइम्स नाऊ का मास्टर शेफ इंडिया - नेताओं का गुझिया कम्पीटीशन




"आ हम गोझिया कम्पीटीशन में तभिये आयेंगे जब ई बात किलियर हो जाएगा कि बीजेपी का तरफ से कोई आएगा या एनडीए का तरफ से"; लालू जी ने अपना दो टूक फैसला अरनब गोस्वामी को फ़ोन पर सुना डाला।

उनकी बात सुनकर अरनब गोस्वामी बोले; "लालू जी, आप अपने पार्टी को रिप्रेजेंट कीजिए न। आपको इससे क्या कि बीजेपी से कोई आएगा या एनडीए से? फिर तो मैं कहूँगा कि आर जे डी की बजाय केवल यूपीए से कोई आये।"

"ऐसा नै न होता है। आ यूपीए अलग है औ आरजेडी अलग। उप्पर से ई ..."

"लेकिन लालू जी, मेरा आपसे एक डायरेक्ट सवाल ये है ....."

अभी अरनब ने इतना ही कहा था कि लालू जी भड़क गए। बोले; "आ सुनो पाहिले। बात सुनो, ई तुम्हारा न्यूजआवर नै न है जो पब्लिक सब को बोलने नहीं देगा। ई अभी तुम टेलीफोन पर न बतिया रहा है। ता हमको पूरा बोलने देगा कि नहीं?"

अरनब गोस्वामी के चैनल ने होली पर नेताओं का एक गुझिया कम्पीटीशन आयोजित करने का फैसला किया और गोस्वामी जी ने नेताओं और विशेषज्ञों को फ़ोन पर इनवाईट करना शुरू कर दिया। कुछ को इनवाईट कर लेने के बाद वे लालू जी से बात कर रहे थे। उन्होंने लालू जी से कहा; "लेकिन लालू जी, आप तो यूपीए के साथ इतने सालों से हैं।"

"देखो, ई साला लोग का बात नै करो। आ ऊ लोग से हमरा कोई बास्ता नै है अब"; लालू जी फिर भड़क गए।

उनकी भड़क से अरनब गोस्वामी एकबार के लिए चुप हो गए। आगे बोले; "आप मुझे गलत समझ रहे हैं लालू जी। मैं आपके सालों की बात नहीं कर रहा था। मैं तो आपको रिमाइन्ड कर रहा था कि आप यूपीए के साथ इतने सालों से थे।"

वे बोले; "आछा ऊ बात कह रहे थे? देखो, हम यूपीए का साथ एही खातिर हैं कि हम सोनिया जी का बड़ा ईजत करते हैं। आ नै रहेंगे त केंद्र में फ्रिकापरस्त ताकत, सांप्रदायिक ताकत आ जाएगा।"

खैर काफी मान मनौव्वल के बाद लालू जी आने के लिए राजी हो गए। समारोह कब होगा, कैसे होगा, कौन आयेंगे यह सब फाइनल हो गया। टाइम्स नाऊ पर विज्ञापन आने लगे। उन विज्ञापनों को देखकर राजदीप सरदेसाई ने ट्वीट किया; "महाराष्ट्रा इज रीलिंग अंडर ड्राऊट ऑफ़ द डबल सेंचुरी बट पीपुल आर ओर्गेनाइजिंग गुझिया कम्पीटीशन। कांट वी डू विदाऊट सच ...ऑर इज इट अस्किंग टू मच?"

उनकी इस ट्वीट पर अरनब गोस्वामी ने एक न्यूज-आर कर डाला और विनोद मेहता, कुमार केतकर, आर्यमा सुन्दरम, लार्ड मेघनाद देसाई, सुहेल सेठ, मारूफ रज़ा और पाकिस्तानी एक्सपर्ट ज़फर हिलाली के साथ मुद्दे को डिस्कश करके इस नतीजे पर पहुंचे कि भारत के लोकतंत्र में उनके मीडिया हाउस के योगदान को देखते हुए यह गुझिया कम्पीटीशन आयोजित करने का अधिकार उनके पास है।

कम्पीटीशन के दिन रामलीला मैदान में बड़ी भीड़ थी। दर्शक, पुलिस, जेड केटेगरी सिक्यूरिटी, नेता, नारे, बेचारे और चौबारे, सब एक जगह जमे थे। कम्पीटीशन शुरू होने वाला था। हर पार्टी की तरफ से एक नेता कम्पीटीशन में हिस्सा ले रहा था लेकिन उसे चीयर करने के लिए उसके पार्टी के और नेता वहां थे। उधर विशेषज्ञों का दल भी वहां था जिसे नेताओं की गुझिया देखकर उन्हें नंबर देना था। भारत के सबसे बड़े एक्सपर्ट सुहेल सेठ थे। उनके साथ आर्यमा सुन्दरम थे। चूंकि कम्पीटीशन दिन में था और विनोद शर्मा अपना ड्रिंक दिन में सिप नहीं कर सकते थे इसलिए उन्होंने जूरी में रहने से इनकार कर दिया था।

कुल मिलाकर भारत दर्शन टाइप माहौल की सृष्टि हो गई थी।

हरतोष सिंह बाल थे। अरनब गोस्वामी के हाथ में माइक था। उन्होंने ऐन्करीय धर्म का पालन करते हुए श्रीगणेश किया; "लेडीज एंड जेंटिलमैन, इट्स होली टाइम एंड टूनाईट ऑन न्यूजआवर ........."

अभी उन्होंने इतना ही कहा था कि लालू जी बोल पड़े; "आरे ई तुम गोझिया कम्पीटीशन कर रहा है कि अपना रात वाला प्रोग्राम चला रहा हैं? हे अरनब, अरे इधर इधर ... आ इहाँ टीबी पर नै न हो। इहाँ त कम्पीटीशन न कराना है ..."

उनकी बात सुनकर अरनब जी लजा टाइप गए। बोले; "लालू जी क्या करें, आदत पड़ गई है।'

लालू जी बोले; "आ देखो, तुम लोग हम लोग के त बोलता है ..हमलोग के देखो, चुनाब परचार में एतना बोलता है चुनाब जीतने के बाद संसद में बोलते सुना है हमलोग को?"

अरनब गोस्वामी बोले; "सॉरी लालू जी।"

आगे बोले; "लेडीज एंड जेंटलमैन, जैसा कि आपसब जानते हैं हमारे चैनल ने इस गुझिया कम्पीटीशन को ऑर्गेनाइज किया है ताकि भारत में लोकतंत्र मजबूत हो सके और नेक्स्ट ईयर होने वाले एलेक्शन की फील मिल सके कि कौन सी पार्टी क्या करने वाली है ..."

अभी वे इतना बोले थे कि बीजेपी के रविशंकर प्रसाद बोले; "माई गुड फ्रेंड अरनब गोस्वामी, लेट मी टेक दिस ऑपरच्यूनिटी टू थैंक यू एंड योर चैनल फॉर ऑर्गेनाइजिंग दिस कम्पीटीशन ...और अरनब, यह कम्पीटीशन आयोजित करके टाइम्स नाऊ की टीम ने एकबार फिर से साबित कर दिया कि पिछले आठ-नौ वर्षों में देश में जो भी जो कुछ भी अच्छा हुआ है वह केवल टाइम्स नाऊ ने किया है।"

उनकी इस बात पर कहीं से आवाज़ आई; "पिछले नौ वर्षों का तो नहीं पता लेकिन पिछले दो-तीन वर्षों में अर्नब ही भारत की एक मात्र अपोजीशन पार्टी रहे हैं।"

रविशंकर प्रसाद की बात पर लालू जी बोले; "आ आपलोग भी त अपोजिशने में थे, आपने काहे कुछ आछा नहीं कर दिया?"

रविशंकर प्रसाद बोले; "लालू जी की मैं बड़ी इज्ज़त करता हूँ लेकिन मैं कहना चाहूँगा कि हमारी पार्टी ने पिछले नौ वर्षों में कन्स्ट्रक्कटिव अपोजीशन की भूमिका का निर्वाह किया है और एक नहीं कई बार गुझिया बनाया है। और यही नहीं, जब भी यूपीए ने घटिया गुझिया बनाई, हमारी पार्टी ने उसे नहीं खाया।"

लालू जी ने में पूछा; "आ कह त ऐसे रहे हैं जैसे अपोजीशन में रहकर भारत को गोझिया से भर दिए हैं। कौन जगह गोझिया का महल कन्स्ट्रक्ट किये तानी हमें भी बताइए?"

अरनब ने देखा कि मामला फिसल रहा है तो बोले; "प्लीज प्लीज लालू जी, आई विल नॉट अलाऊ दिस कम्पीटीशन टू गेट पौलिटीसाइज्ड। हमें गोझिया के इश्यू पर ही रहना चाहिए।"

उधर बी जे पी की तरफ से भाग ले रहे नरेन्द्र मोदी जी ने गुझिया बनाना शुरू भी कर दिया था। उनके पास पहुंचकर अरनब ने ध्यान से सबकुछ देखा और बोले; "मोदी जी, सुना है आपकी पार्टी का एक फैक्सन नहीं चाहता था कि आप इस कम्पीटीशन में भाग लें। हमारे सोर्सेस तो यहाँ तक बताते हैं कि संघ के कुछ लोगों ने आपके द्वारा यहाँ यूज किया जाने वाला मैदा भी कहीं चुराकर रखा दिया था ताकि आपके हाथ न आये और आप गुझिया न बना सकें। उधर शिवसेना वाले भी चाहते थे कि सुषमा जी यहाँ ......"

मोदी जी बोले; "मित्रों, मैं कुछ करने में विश्वास रखता हूँ। मित्रों मैं गुझिया बनाता हूँ, उसे बनाने के सपने नहीं देखता। और मेरा कर्त्तव्य मुझसे यह कहता है कि मैं छ करोड़ गुजरातियों के लिए गुझिया बनाऊँ। वैसे मैं पार्टी का सिपाही हूँ और पार्टी जहाँ चाहेगी मैं वहां गुझिया बनाने के लिए तैयार हूँ। मुझे तो आश्चर्य होता है मित्रों कि आपके पास ये अफवाहें आती कहाँ से हैं?"

उनकी बात सुनकर केतकर बोले; "मोदी जी, ये अफवाहें नहीं हैं। ये सच है। और फिर पूरा भारतवर्ष, इन्क्लूडिंग तीश्ता सेतलवाड और संजीव भट्ट, यह मानता है कि आप जिस तरह की गुझिया बनाते हैं, वह पूरे भारतवर्ष को पसंद नहीं आएगी।"

मोदी जी बोले; "मेरे मीडिया के मित्र ऐसा मानते होंगे लेकिन ये बात सच नहीं है। मेरी बनाई गुझिया हर गुजराती को पसंद है। और मित्रों, मेरे गुजरात की गुझिया तो अब यूरोप तक जाती है। सिंगापुर तक जाती है। आपको जानकार आश्चर्य होगा मित्रों कि आज से बारह साल पहले तक गुजरात में गुझिया बहुत कम मात्रा में बनती थी। मैंने इस बारे में एक प्रयास किया। मैंने मेरे गुजरात के अफसरों के साथ मिलकर ऐसा प्रोग्राम बनाया जिसके तहत मित्रों गुझिया बनाने का मसाला से लेकर पानी तक, उस जगह पर उपलब्ध करवाया जहाँ मैदे की मिलें है। इसका फायदा यह हुआ मित्रों कि हर चीज एक ही जगह .... और आज मेरा गुजरात पूरे विश्व में गुझिया के लिए जाना जाता है। ...मित्रों आज से एक वर्ष पहले की बात है, मेरे पास एक आदमी आया। बोला साहब, हमें नवसारी में गुझिया बनाने का कारखाना खोलना है। मैंने कहा ......"

वे बोल रहे थे कि लालू जी ने उन्हें टोक दिया। बोले; "आ बस कीजिये। भार्टन के लिए जो लेक्चर का तइयारी किये थे ऊ एहीं डेलिभर कर देंगे का?"

यह सुनकर सब हंसने लगे। सुषमा स्वराज ने कहा; "अध्यक्ष जी, मैं ऐसा मानती हूँ कि संसद में केवल गुझिया पर बात हो। व्यक्तिगत आक्षेपों के लिए संसद के मंच का प्रयोग वर्जित किया जाना चाहिए।"

लालू जी बोले; "आ ए सुषमा जी, बिपच्छ का नेता रहने का एतना आदत पड़ गया है कि ई भी भूल गई हैं आप इहाँ कम्पीटीशन में हैं, संसद में नहीं। अइसा आदत पड़ जाएगा त रह जाएँगी विपच्छ में ही। आ उप्पर से मोदी जी रेसकोर्स रोड में गोझिया बनाना त दूर प्रगती मैदान में भी नहीं बना पायेंगे।"

उनके बात सुनकर मोदी जी बोले; "मित्रों, मेरा विश्वास गुझिया बनाने में है। वह रेसकोर्स रोड में बने या प्रगति मैदान में, मुझे उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। और मैं तो कहता हूँ मित्रों कि हमें केवल गुझिया के विकास की ही बात करनी चाहिए। हम कबतक पुराने तरीके से गुझिया बनाते रहेंगे? मित्रों, मेरे गुजरात ने पूरे देश को विकसित गुझिया बनाने का रास्ता दिखाया है। मेरे गुजरात ने इस क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है। मित्रों आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि जब यूरोपियन यूनियन के राजदूत ने हमारे अहमदाबाद की गुझिया का रंगरूप देखा तो वे आश्चर्य में पड़ गए। कहने लगे ....."

अभी वे इतना बोले थे कि कुमार केतकर कुछ कहने लगे। ऐसे में अरनब गोस्वामी ने मोदी जी को रोकते हुए कहा; "मोदी जी, मोदी जी, कुमार केतकर वांट्स टू रिबट यू। गो अहेड मिस्टर केतकर।"

कुमार केतकर बोले; "मोदी जी, आप तो ऐसा कह रहे हैं कि आपके आने के बाद ही गुजरात में अच्छी गुझिया बननी शुरू हुई। इतिहास गवाह है कि गुजराती श्रीकृष्ण के जमाने में, याने द्वारिका नगरी के समय से ही अच्छी गुझिया बनाते रहे हैं। और फिर जहाँ तक गुजरात के बाहर दिल्ली का सवाल है तो मैं अभी भी मानता हूँ कि श्रीमती गांधी सबसे बढ़िया गुझिया बनाती थी। मुझे तो इमरजेंसी के समय में भी उनकी बनाई गुझिया बहुत पसंद आई थी। मैं उन चाँद पत्रकारों में से हूँ जो आज भी यह मानते हैं कि उसके बाद उतनी बढ़िया गुझिया पूरे भारत में कहीं नहीं बनी।"

अभी वे यह कह हे रहे थे कि नितीश कुमार जो अपनी पार्टी को रिप्रजेंट कर रहे थे और स्पेशल बिहारी गुझिया बना रहे थे उन्होंने केतकर को टोंक दिया। बोले; "आ पता है कैसी गोझिया बने थी उन्होंने। आप जैसे लोगों की बजह से ही उनकी पूरी गोझिया तेल में डूबी रहती थी। मुझे भी पता है सबकुछ। मैंने भी उसी क्रांति से ही गोझिया बनाना शुरू किया। जैप्रकाश बाबू के साथ हमने गांधी मैदान पटना से ही गुझिया का मसाला सब इकठ्ठा किया आ दिल्ली आते-आते गोझिया तल डाली। ये बात औउर है कि कुछ और मित्र जो जैप्रकाश बाबू से गोझिया बनाना सीखे थे, अब भूल गए हैं और बहुत ज्यादा तेल वाली गोझिया बनाने लगे हैं।"

उनकी बात सुनकर लालू जी बोले; "जादा तेल बाला गोझिया जो है ऊ फ्रिकाप्रस्त गोझिया से तो नीक ही है। आ आप बीच में रास्ता भूलकर ऐसे लोगों के साथ रसोईया शेयर करने लगे जो गोझिया में भी केसर इस्तेमाल करता है। समाजवादी होकर भी आप केसरिया गोझिया खाने लगे। इसका बारे में काहे नै सोचते कभी? आ ई सोचे है कि पराचीन भारत से ही गोझिया में कभी केसर नहीं पड़ता था?"

उनकी बात सुनकर वहीँ खड़े सुशिल कुमार शिंदे बोल पड़े; "यह तो मैंने अखबारों में पढ़कर देश को बताया ही था कि बीजेपी और आरएसएस वाले केसरिया गुझिया बनाने का कैम्प चलाते हैं। और केसरिया गुझिया के कैम्प की बात दिग्विजय सिंह ने भी की थी।"

रविशंकर प्रसाद बोले; "मैं माननीय लालू जी से पूछना चाहता हूँ कि प्राचीन भारत के समय से ही गुझिया के मसाला में जो गरी काटकर डाली जाती थी वह रंगी नहीं जाती थी। यहीं देख लीजिये कि इन्होने जो मसाला यहाँ रखा है उसमें इस्तेमाल होने वाली गरी को इन्होने हरे रंग में रँग दिया है।"

........आगे का हाल अगले एपिसोड में।