Tuesday, October 9, 2007

हिंदी-रक्षा अभियान


तमाम संगठनों की जायज-नाजायज मांगों को मानने का सरकार का रेकॉर्ड अच्छा था। ये देखते हुए कि हिन्दी-सेवी भी संगठन बनाकर आए थे, सरकार ने उनकी माँग भी मान ली. सरकार इस बात से आश्वस्त थी कि इंसान की सेवा तो हर कोई कर सकता है लेकिन भाषा की सेवा करने की योग्यता बहुत कम लोगों में होती है. हिन्दी-सेवियों ने सरकार को बताया; " सरकार, हिन्दी केवल बोल-चाल की भाषा बनकर रह गई है. इसकी हालत बड़ी ख़राब है. इसकी ऐसी ख़राब हालत के लिए आपकी नीतियाँ भी जिम्मेदार हैं. केवल बोलने से भाषा कैसे बचेगी. हम अपने खोज से इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि अगर ऐसा ही चलता रहा तो हिन्दी ५० साल में खत्म हो जायेगी."

"लेकिन इतने सारे लोग हिन्दी बोलते हैं। हिन्दी इन्टरनेट पर भी प्रचलित हो रही है. अब तो हिन्दी में ब्लागों की संख्या भी बढ़ रही है. हिन्दी फिल्में सारी दुनिया में देखी जा रही हैं. अब तो रूस और स्पेन में भी लोग हिन्दी गानों पर नाचते हैं.", सरकार ने समझाने की कोशिश की.

"देखिए, यही बात है जिससे हिन्दी की ये दुर्दशा हुई है। आप चिट्ठे को ब्लॉग कहेंगे तो हिन्दी का विकास कैसे होगा?" हिन्दी-सेवियों ने समझाते हुए कहा.

"ठीक है ठीक है। आप हमसे क्या चाहते हैं?", सरकार ने खीझते हुए पूछा.

"सरकार हमारा सोचना है कि हिन्दी के इस्तेमाल को व्यापक बनाने के लिए हमें त्वरित कदम उठाने चाहिए। हमारी माँग है कि विज्ञानं और तकनीकी की पढाई हिन्दी में हो. सरकार का काम हिन्दी में हो. व्यापार और वाणिज्य का सारा काम हिन्दी में हो. हिन्दी को बचाने की जिम्मेदारी आज हमारे कन्धों पर है. अपने खोज से हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि अगर ऐसा हुआ तो हिन्दी बच जायेगी", हिन्दी-सेवियों ने सरकार को माँग-पूर्ण शब्दों में समझाया.

सरकार ने कहा; "ठीक है हम आपकी माँग कैबिनेट कमिटी के सामने रखेंगें। आप लोग दो महीने बाद हमसे मिलिये."

हिन्दी-सेवियों की मांगों को सरकार की कैबिनेट कमेटी के सामने रखा गया। मध्यावधि चुनावों को देखते हुए कमेटी ने सरकार को सलाह दी; "हिन्दी-भाषी क्षेत्रों में हमारे गिरते हुए वोट-बैंक को संभालना है तो हमें हिन्दी-सेवियों की इन माँगों को तुरंत मान लेना चाहिए. वैसे तो हम दिखाने के लिए भगवान् में विश्वास नहीं करते, लेकिन सच कहें तो हिन्दी-सेवियों को भगवान् ने ही हमारे पास भेजा है. हम कहेंगे कि उनकी माँगों को मान लेना चाहिए."

हिन्दी-सेवियों की माँगों को मान लिया गया। सरकार ने हुक्म दिया कि वाणिज्य और व्यापार, शिक्षा और सरकारी कामों में केवल हिन्दी का प्रयोग अनिवार्य होगा. जल्दी-जल्दी में वोट बटोरने के चक्कर में सरकार ने अपना हुक्म लागू कर दिया. ऐसा पहली बार नहीं हुआ था. ऐसा पहले भी देखा गया था कि फैसला लागू करने के बाद सरकार को मुद्दे पर बहस करने की जरूरत महसूस हुई थी. एस.ई.जेड. के मामले में ऐसा देखा जा चुका था. उद्योग घरानों को जमीन देने के बाद सरकार को याद आया कि एस.ई.जेड. को लेकर पहले एक नीति बनाने की जरूरत है.

क़रीब दो महीने बीते होंगे। नागरिकों के एक प्रतिनिधिमंडल ने प्रधानमंत्री से मुलाक़ात की. उस प्रतिनिधिमंडल में लगभग सभी क्षेत्रों के लोग थे. उनकी शिकायतों को सुनकर प्रधानमंत्री के माथे पर पसीने आ गए. प्रतिनिधिमंडल में से सबसे पहले एक बैंक मैनेजर सामने आया. बहुत दुखी था. सामने आकर और उत्तेजित हो गया. उसने बताया:

"सर जब से हमने हिन्दी में रेकॉर्ड रखने शुरू किए हैं, तब से हमें बहुत समस्या हो रही है। कल की ही बात लीजिये. हमने एक कस्टमर को अकाउंट स्टेटमेंट भेजते हुए लिखा; 'हमारे यहाँ रखे गए बही-खातों से पता चलता है कि आप हमारे बैंक के ऋणी हैं. और ऋण की रकम रुपये ५१४७५ है.' सर वह कस्टमर तुरंत बैंक में आया. बहुत तैश में था. उसने मेरी पिटाई करते हुए कहा; 'मैंने ख़ुद को कभी अपने बाप का ऋणी नहीं समझा, तुम्हारे बैंक की हिम्मत कैसे हुई ये कहने की, कि मैं तुम्हारे बैंक का ऋणी हूँ.' अब आप ही बताईये, कैसे काम करेगा कोई."
अभी बैंक मैनेजर अपनी बात बता ही रहा था कि एक महिला प्रोफेसर सामने आयी। बहुत गुस्से में थी. अपनी समस्या बताते हुए बोली;

"मेरी बात भी सुनिये. मैं फिजिक्स पढाती हूँ. जब से हिन्दी में पढ़ाना शुरू किया है, किस तरह की समस्याएं झेलनी पड़ रही हैं, कैसे बताऊँ आपको. कुछ तो ऐसी समस्याएं है कि बताते हुए भी शर्म आती है."

प्रधानमंत्री ने उन्हें ढाढस बधाते हुए कहा; "आप अपनी बात बेहिचक बताईये. क्या समस्या है आपको?" महिला प्रोफेसर बहुत गुस्से में थीं, बोलीं:

"क्या बताऊँ। क्लास में ग्रेविटी के बारे में पढ़ाना था. मैं क्लास में गई और मैंने छात्रों से कहा कि आज हम गुरुत्वाकर्षण के बारे में पढायेंगे. जानते हैं, बच्चों में खुसर-फुसर शुरू हो गयी. छात्रों ने मजाक उड़ाते हुए कहा, गुरुत्वाकर्षण माने हम गुरू के तत्वों में आकर्षण के बारे में पढेंगे. मैं गति के नियम पढाने की बात करती हूँ तो छात्र मजाक उड़ाते हुए कहते हैं कि गति के तीन प्रकार हैं, अगति, दुर्गति और सत्गति. अब आप ही बताईये, कोई कैसे पढायेगा?"
ये महिला प्रोफेसर अपनी शिकायत बता रही थी कि एक मानवाधिकार कार्यकर्त्ता सामने आया। उसने बताया;
"मुम्बई के 'भाई' लोगों ने हमारे संगठन से शिकायत की है. उनका कहना है कि जब से सरकार ने व्यापार और पेशे में हिन्दी में काम करना 'कम्पलसरी' किया है, तब से 'भाई' लोगों का व्यापार खर्च पढ़ गया है. इन लोगों के पास फ़ोन पर धमकी देने के लिए अच्छी हिन्दी बोलने वाले लोग नहीं हैं. बाहर से आदमी रेक्रूट करना पड़ रहा है. आप उनके बारे में भी जरा सोचिये. सरकार का कर्तव्य है कि वह समाज के हर वर्ग के हित के बारे में सोचे."

लगभग सभी ने अपनी शिकायत प्रधानमंत्री से दर्ज की। इन लोगों ने प्रधानमंत्री से आग्रह भी किया कि तुरंत सरकार के 'हिन्दी रक्षा अभियान' पर रोक लगाई जाय. लेकिन प्रधानमंत्री अपनी बात पर अड़े हुए थे. उन्हें आने वाले चुनावों में वोट बैंक दिखाई दे रहा था. उन्होंने लोगों के अनुरोध को ठुकरा दिया. लोग निराश होकर लौटने ही वाले थे कि प्रधानमंत्री का निजी सचिव दौड़ते हुए आया. बहुत परेशान दिख रहा था.

आते ही उसने प्रधानमंत्री से कहा; "डीएमके से सरकार की बातचीत टूट गई है. डीएमके वाले अपनी बात पर अड़े हुए थे. उनका कहना था कि अगर सरकार ने अपना हिन्दी कार्यक्रम वापस नहीं लिया तो वे सरकार से अपना समर्थन वापस ले लेंगे. सरकार का गिरना लगभग तय है."

प्रधानमंत्री ने सोचा कि चुनाव तो बाद में होंगे, पहले तो मौजूदा सरकार को बचाना जरूरी है। उन्होंने जनता के प्रतिनिधियों को रोकते हुए कहा; "हमने आप की बातें सुनी. हमें आपसे पूरी हमदर्दी है. हम अपने 'हिन्दी रक्षा अभियान' को आज ही वापस ले लेंगे."

दूसरे दिन समाचार पत्रों में ख़बर छपी; "सरकार ने समाज के हर वर्ग के प्रतिनिधियों की बात सुनने के बाद फैसला किया कि सभी कार्य-क्षेत्रों में हिन्दी में काम करने के फैसले को वापस ले लेना चाहिए क्योंकि आम जनता को वाकई बड़ी तकलीफ हो रही थी।"

हिन्दी-सेवी अब एक ऐसी सरकार के आने का इंतजार कर रहे हैं जो बहुमत में हो.


11 comments:

  1. ठीक है हम इंतजार कर रहे हैं.

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  2. जो सरकार बहुमत में हो उसे हिन्दी नहीं चाहिये,जिसे हिन्दी चाहिये वो बहुमत में नहीं.

    किसी काम को यदि ना करवाना हो तो सरकार पर छोड़ दो वो कभी नहीं होगा.

    मजेदार व्य़ंग्य. आपको भी गुरु बना लिया जी.

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  3. भई गुरुत्वाकर्षण का जवाब नहीं है जी।
    वाह वाह।

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  4. हा हा मस्त!!

    सटीक लिखे हो भैय्या!!

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  5. हमारे तो आप ही सरकार हो माईबाप .

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  6. सरकार जो चाहे करे हम हिंदीवाले अगर उसे नहीं डुबाएँगे तो वह बची रहेगी....
    बहुत अच्छा लिख रहे हैं.....लिखते रहें....शिव भाई

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  7. आप चिट्ठे को ब्लॉग कहेंगे तो हिन्दी का विकास कैसे होगा?"

    हा हा!! बिल्कुल सही.

    अब तो इन्तजार सा लग गया बहुमत की सरकार का-काश, कभी बन पाये.

    बहुत सटीक व्यंग्य. बधाई.

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  8. सही है। इसीलिये मास्टर मोतीराम कहते थे- साइंस साला बिना अंगेजी के आयेगा?

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  9. बहुत ही बढिय़ा लिखा है ।ऋणी और गुरुत्वाकर्षण कमाल है।

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  10. बंधू
    सच कहते हो ,हिन्दी बोलने में बहुत समस्या है. सोचिये की यदि डॉन "अबे ओ श्याने खाली पीली बूम मारने का नहीं ,समझा क्या ? वरना तेरा गेम बजा दूँगा " की बजाय ये कहे की " श्रीमान बुद्धिमान जी आप कृपया व्यर्थ का वार्तालाप न कीजिये अन्यथा हमें आप को मृत्यु की गोद में सुलाना पड़ेगा " तो ऐसा लगेगा जैसे कोई शेर धहाड़ ने की बजाय मिमिया रहा हो.
    हिन्दी को राष्ट्र भाषा की कुर्सी पर बिठा कर बच्चों को "बाबा ब्लैक शीप ...." सिखाईये इसी में राष्ट्रहित है .

    नीरज

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  11. काहे ? इहाँ बात भासा की बाटे,अउर सभै जानत हैं कि भासा के हमेसा दुई ठो रूप होत हैं , एक जन -बोली लोगन के बतियावे वाली ,दुईसर 'साहित ' यानि किस्सा कहानी अउर पढ़े लिखे वाली भासा ; एकरे ही बारे मा कहा जात है ,'दुई कोस पै बदलै पानी , दस कोस पै बदलै बानी | , अपन खाली -पीली बोम उसी बोली कि श्रेणी में आता है यह भाषा का डेलिक्ट या डिलिक्ट है और लोक -बानी कि श्रेणी में आता है |
    वास्तव में राष्ट्र भाष का दर्जा कोई हिन्दी जैसी विकासशील भाषा ही पा सकती है पूरे भारत कि भाषाओं में से हिन्दी को छोड़ कर हर भाषा एक परिमार्जित स्थापित भाषाएँ हैं | ग्रामर का जो लचीलापन चाहिए कि भारत का हर भाषा - भाषी उसे अपने ढंग से बोल सके , और सामने वाला समझ जाए ,यह गुण केवल हिन्दी में है |

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टिप्पणी के लिये अग्रिम धन्यवाद। --- शिवकुमार मिश्र-ज्ञानदत्त पाण्डेय