Thursday, April 28, 2011

दुखीराम ज़ी का इंटरव्यू

कई महीनों से उनसे आग्रह कर रहा था कि वे मेरे ब्लॉग के लिए एक इंटरव्यू दें. वे राजी तो हो जाते लेकिन फिर दुखी होकर ना कह देते. आप कह सकते हैं कि इंटरव्यू के लिए दुखी होकर ना कहने वाली बात समझ में नहीं आई. तो मेरा जवाब यह है कि सारी समस्या दुःख की ही है. आपको बता दूँ कि आज उनकी गिनती टॉप के दुखियारों में होती है. वे जब-तब दुखी हो लेते हैं. दुखी होने के लिए उन्हें किसी कारण की ज़रुरत नहीं पड़ती. हालाँकि उनके ऊपर आरोप भी लगते रहते हैं. कि उनका दुःख प्रायोजित होता है. कि वे बिना मतलब के दुखी रहते हैं. कि उनका दुःख दिखावा है. कि वे इसलिए दुखी रहते हैं क्योंकि दुःख को आसानी से भजाया जा सकता है. कि....

खैर, आज पता नहीं क्या हुआ कि जब मैंने उन्हें इंटरव्यू के उनके वादे की याद दिलाई तो दुखी होते हुए तैयार हो गए. बोले; "देखो जो भी कहूँ या करूँगा वह बिना दुःख के तो हो नहीं सकता. पहले दुखी होकर इंटरव्यू के लिए मना कर देता था लेकिन आज दुखी होकर इंटरव्यू के लिए तैयार हो गया हूँ. तो इससे पहले कि मुझपर दुःख का एक नया दौरा पड़े, आज ले ही लो मेरा इंटरव्यू."

तो पेश है उनका इंटरव्यू. आप बांचिये.

शिव: नमस्कार दुखीराम जी. इंटरव्यू के लिए धन्यवाद. ये बताइए कि कैसा लग रहा है?

दुखीराम जी: दुखी हूँ. इस बात पर दुखी हूँ कि लोग़ एक इंटरव्यू के लिए इतना हलकान किये रहते हैं. ज़रूरी है कि किसी को इंटरव्यू के लिए इतना परेशान किया जाय कि वह दुखी होकर इंटरव्यू देने के लिए हाँ कर दे?

शिव: नहीं ज़रूरी तो नहीं है लेकिन चूंकि आपने वादा किया था इसलिए....वैसे मेरा सवाल यह है कि कितने साल हो गए आपको दुखी रहते? मेरा मतलब आप पहली बार दुखी कब हुए?

दुखीराम जी: ये मैं कैसे बताऊँ? अब देखिये कोई हिसाब रखकर तो दुखी होता नहीं है? दुःख का कोई लॉगबुक होता है क्या? नहीं न? ऐसा तो है नहीं कि आदमी किसी सरकारी कोटे के तहत दुखी होगा. कि भइया सरकार ने मुझे दिन में केवल ढाई घंटे का दुःख-कोटा अलॉट किया है इसलिए मुझे केवल ढाई घंटे दुखी रहना है. उससे ज्यादा दुखी हुए तो सरकार दुःख का कोटा जब्त कर लेगी..... देखा जाय तो दुःख अपने आप में इतना बड़ा होता है कि मनुष्य को यह सुध-बुध नहीं रहती कि वह दुखी है. ऐसे में इस तरह का सवाल बेमानी है. वैसे अगर मुझे इसका उत्तर देना ही पड़े तो मैं कहूँगा कि करीब छियालीस वर्षों से मैं दुखी रहता आया हूँ. दो-चार महीने इधर-उधर हो सकते हैं लेकिन....

शिव: अच्छा ये बताइए कि पहली बार कब दुखी हुए?

दुखीराम ज़ी: वैसे कुछ ठीक से याद नहीं लेकिन मुझे लगता है कि पहली बार मैं नौ साल की उमर में दुखी हुआ था जब दादाजी ने मुझे गधा कहा था. उसके बाद मुझे याद है कि मेरे भाई साहब ने जब सबके सामने मुझे अच्छा बच्चा बताया था तब मैं दुखी हुआ था. लेकिन हाँ, पहली बार दुखी होने का सारा श्रेय मैं दादाजी को ही दूंगा.

शिव: भाई साहब ने आपको अच्छा बच्चा बताया उसके लिए आप दुखी हो गए?

दुखीराम जी: यह दुखी होने की बात ही है. अगर किसी बच्चे को अच्छा बता दिया जाय तो उसके साथ उससे बुरा और क्या हो सकता है? इतने लोगों के सामने अच्छा बता देने से उसके ऊपर परफ़ॉर्म करने का प्रेशर बन जाता है. मेरे ऊपर अच्छा दिखने, अच्छा करने, अच्छा कहने का प्रेशर आया तो मैं दुखी रहने लगा.

शिव: फिर?

दुखीराम ज़ी: फिर क्या? धीरे-धीरे दुखी रहने की आदत पड़ गई.

शिव: वैसे यह बताइए कि दुखी रहने के लिए प्रैक्टिस करना कितना ज़रूरी है?

दुखीराम जी: देखिये वह तो आपके ऊपर डिपेंड करता है कि आप कितने जल्दी दुःख को अपने अन्दर समो लेते हैं. जैसे पहले-पहल मुझे सुबह-शाम कम से कम दो घंटे दुःख दुखी होने की प्रैक्टिस करनी पड़ती थी लेकिन अब ऐसा नहीं है. अब मैं कहीं भी कभी भी दुखी हो सकता हूँ.

शिव: अच्छा यह बताइए कि आप दुखी रहने की प्रैक्टिस कैसे करते थे?

दुखीराम ज़ी: दुखी होने की प्रैक्टिस के लिए तमाम इक्विपमेंट्स टाइप मुद्दे हैं जिनका इस्तेमाल करके आदमी एक दुखियारे का अपना जीवन शुरू कर सकता है. जैसे मैं शुरू-शुरू में यह कहकर दुखी होता था कि ज़माना बड़ा खराब है. फिर यह कहकर दुखी रहने लगा कि हमारा ज़माना बड़ा अच्छा था. बाद में यह कहकर रहने लगा कि जो ज़माना चला गया वह दोबारा लौट कर नहीं आएगा. फिर बेटों की दशा और दिशा को लेकर दुखी रहने लगा. जीवन आगे बढ़ा तो पोतों के चाल-चलन पर दुखी रहने लगा. कुल मिलाकर भगवान के आशीर्वाद से दुखी होने के लिए कम से कम मुझे तो मुद्दों की कमी कभी नहीं रही. आज जब मैं उम्र के इस पड़ाव पर खड़ा हूँ तो गर्व से कह सकता हूँ कि दुखी होने के लिए अब मुझे किसी बहाने की ज़रुरत नहीं रहती. दुःख के मामले में मैं अब आत्मनिर्भर हो गया हूँ.

शिव: आपसे मेरा एक सवाल यह है कि जो दुखियारा बनना चाहते हैं उनके लिए आप और क्या-क्या मुद्दे सजेस्ट कर सकते हैं जिसका इस्तेमाल करके दुखी होने की प्रैक्टिस की जा सकती है? मेरे कहने का मतलब यह है कि सभी आप जैसे भाग्यशाली तो नहीं हैं. सभी के बड़े भाई साहब नहीं होंगे जो उन्हें अच्छा बच्चा बता दें. या कह सकते हैं कि सभी के बेटे-बेटियां नहीं हो सकती या फिर सभी के पोते नहीं हो सकते जिनके सहारे वह दुःख की प्रैक्टिस करते रहें. आज जैसे...

दुखीराम ज़ी: समझ गया. समझ गया. मैं आपकी बात पूरी तरह से समझ गया हूँ. आप को सच बताऊँ तो दुखी होने के लिए मुद्दों की कमी कभी नहीं रही. आज भी नहीं है. आप छोटे से छोटे और बड़े से बड़े मुद्दे के सहारे दुखी हो सकते हैं. जैसे एक तरफ दुखी होने के लिए आप भ्रष्टाचार का सहारा ले सकते हैं तो दूसरी तरफ आप इस बात से दुखी हो सकते हैं कि आप इस देश के प्रधानमंत्री नहीं बन सके. आप इस बात से दुखी हो सकते हैं कि मसालों में मिलावट बढ़ गई. मिलावट का बहाना बड़ा व्यापक है. जैसे आप मिलावटी दूध, मिठाई, दाल, सब्जी, मसाला, हल्दी, धनियाँ वगैरह की बात करके दुखी हो सकते हैं. आपकी इच्छा हो तो आप इन्ही चीजों के मंहगे होने की बात करके दुखी हो सकते हैं. आप चाहें तो यह कहकर दुखी हो लें कि एक तरफ तो चीजें मिलावटी हैं और दूसरी तरफ इतनी दामी भी हैं....... जो बड़े दुखियारे होते हैं उनके लिए विषय और बड़े हो सकते हैं. जैसे आप इजराइल और फिलिस्तीन या चीन और तिब्बत के झगड़े को लेकर दुखी हो सकते हैं. जापान के ऊपर चीन की दादागीरी को लेकर दुखी हो सकते हैं. ईराक और अफगानिस्तान पर अमेरिकी दादागीरी एक बहुत बड़ा मुद्दा हो सकता है. साहित्य वाले भाषा की गिरावट को लेकर दुखी हो सकते हैं. आज से सत्तर साल बाद भाषा का स्वरुप अच्छा नहीं रहेगा, यह बात अपार दुःख का विस्तार कर सकती है. चूंकि दुःख जो है वह एक साधन है...

शिव: मैं समझ गया. आपकी बात मैं समझ गया. लेकिन ये बताइए कि सामाजिक बदलाव दुखी होने में कितना मदद करता है?

दुखीराम ज़ी: गुड क्वेश्चन. देखिये सामाजिक बदलाव के सहारे भारी मात्रा में दुःख पैदा किया जा सकता है. सामाजिक बदलाव का सहारा लेकर युवाओं की बात करके दुखी हो सकते हैं. भरी जवानी में अपने बुढापे के खराब होने की बात पर दुखी होने की प्रैक्टिस की जा सकती है. आपको मैं यह बताना ज़रूरी समझता हूँ कि जब जवानी में बुढापे के खराब होने की बात की जाती है तब सैकड़ों लोग़ धीरज बंधाते हैं. यह प्रोसेस अपार दुःख का संचार करता है. धार्मिक अनेकता की बात करके दुखी हुआ जा सकता है. अब तो ब्लॉग वगैरह लिखकर भी लोग़ दुखी हो लेते हैं. कवितायें लिख कर भी दुखी हुआ जा सकता है. कविता का तो यह समझिये कि आचार्यों के अनुसार पुराने जमाने से ही कविता दुःख से उपजती आयी है. लेकिन असली दुखियारा वह है जो अपनी काबिलियत दिखाते हुए कविता से दुःख निकाल लें. जैसे आप यह कहकर दुखी हो सकते हैं कि हाय मैं कविता लिखना बंद कर दूंगा तो अच्छी कवितायें कहाँ मिलेंगी?....... कुल मिलाकर यह समझिये कि दुखी होने के लिए मुद्दे तैयार करने पड़ते हैं. आपको अपने कान, आँख, नाक वगैरह का सहारा लेते रहना पड़ेगा. हमेशा तैनात रहना पड़ेगा. दुखी होने का मुद्दा आपको कहीं से भी मिल सकता है. इसके लिए बस आपको...

शिव: समझ गया. जैसा कि आपने बताया अब आपको दुखी होने के लिए प्रैक्टिस करने की ज़रुरत नहीं पड़ती. इसके क्या कारण हैं?

दुखीराम जी: देखिये यह तो परिपक्वता से हुआ है. अब दुखी होने के लिए मुझे किसी आउट-साइड सपोर्ट की ज़रुरत नहीं पड़ती. अब मैं बिना प्रैक्टिस के दुखी हो लेता हूँ. दुखी होने के मामले में अब मैं आत्मनिर्भर हो गया हूँ. और आपको सच बताऊँ तो अब मैं पाँच मिनट तक की शॉर्ट नोटिस पर दुखी हो सकता हूँ. एक दुखी आदमी के जीवन में यह स्टेज बड़ी मुश्किल से आता है. आपको यह बताते हुए मुझे अपार दुःख हो रहा है कि आज इस स्टेज पर पहुँचने वाले देश में कुछ गिने-चुने लोग़ ही हैं. पिछले वर्ष की रैंकिंग के हिसाब से मेरा नाम देश के टॉप टेन दुखी लोगों में शुमार है.

शिव: सर, आपने कविता की बात करके मुझे एक बात याद दिलाई. अच्छा ये बताइए कि आप अपनी कविताओं के सहारे भी काफी दुखी होते रहे हैं. कुछ लोगों का आरोप है कि आप ताज़ा लिखी दुःख वाली कविताओं को वर्षों पुरानी बताते हैं. क्या यह सही है? और अगर सही है तो इन कविताओं को पुरानी बताने से क्या दुःख की मात्रा में बढ़ोतरी होती है?

दुखीराम जी: यह सवाल पूछकर आपने अच्छा किया. देखिये इस सवाल के जवाब में भावी दुखियारों के के लिए एक गाइड-लाइन छिपी हुई है. होता क्या है? समझिये आपने कोई दुखी कर देने वाली कविता कल ही लिखी है. अगर आप यह बताते हैं कि आपने वह कविता कल ही लिखी है तो जो लोग़ उसे पढेंगे वे उसपर थोड़ा दुखी होंगे. यह सोचकर थोड़ा दुखी होंगे कि मैं कल से याने कविता की उम्र से दुखी हूँ. लेकिन उसी जगह अगर आप यह बता देते हैं कि मैंने यह कविता आज से बाईस साल पहले लिखी थी तो उससे उपजने वाला दुःख कई गुना बढ़ जाती है. कारण क्या है? कारण यह है कि पाठक समझता है कि अगर मैंने यह कविता बाईस साल पहले लिखी थी तो इसका मतलब यह है कि मैं पूरे बाईस साल से दुखी हूँ. दरअसल इसे ही दुःख की दुनिया में डोमिनो पिज्जा... सॉरी सॉरी डोमिनो इफेक्ट कहते हैं. तो इससे आप समझ ही....

शिव: यह आपने बहुत अच्छी बात बताई. वैसे दुखी होने का ऐसा और कोई साधन जिसकी चर्चा अभी तक इस इंटरव्यू में नहीं हो सकी?

दुखीराम ज़ी: हाँ, हैं न. बिलकुल है. आप सोच रहे होंगे कि वह क्या है? तो मेरा जवाब है कि जहाँ भी दो-चार ही-ही, ठी-ठी करने वाले इकट्ठे होते हों वहाँ एक दुखियारे को ज़रूर जाना चाहिए. वहाँ जाने का असर यह होता है कि दुखी आदमी और दुखी हो सकता है. ऊपर से अगर वहाँ जाकर उसने अपने दुःख की अभिव्यक्ति कर दी तो समझिये कि उसके दुःख का ईमेज बड़ा धाँसू होकर उभरता है. इसलिए दुखी होने के इच्छुक लोगों को ही-ही, ठी-ठी करने वालों 'उजड्डों' के बीच अवश्य जाना चाहिए. यह एक ऐसी सीख है जो मैंने दुखी होने एक हज़ार तरीके नामक किताब में पढ़ी थी इसलिए सोचा कि.....

शिव: कुछ लोगों का कहना है कि आपके ऊपर दुखी होने के दौरे पड़ते हैं. क्या यह सच है?

दुखीराम जी: अब नहीं पड़ते. अब आपसे क्या छिपाना. करीब बारह साल पहले तक पड़ते थे लेकिन अब मैं दुःख के ऐसे शिखर पर जा पहुँचा हूँ कि मुझे दुखी होने के लिए दौरों की ज़रुरत नहीं पड़ती.

शिव: कुछ लोगों का मानना है कि आपका दुःख प्रायोजित दुःख है. आप इससे कितना सहमत हैं?

दुखीराम ज़ी: देखिये इसका जवाब मैं क्या दूँ? अब देखा जाय तो आज के ज़माने में कौन सी बात प्रायोजित नहीं है? वैसे दुःख प्रायोजित हो ही सकता है. इसका बाज़ार बहुत बड़ा है. वैसे सच कहूँ तो अब ज्यादातर मेरे दुःख आयोजित ही होते हैं. अब दुःख और दुःख मिलाकर ऐसा वातारवरण बना है कि प्रायोजित होने का कोई केस ही नहीं बनता.

शिव: कोई संदेश जो आप भावी दुखियारों को देना चाहते हों?

दुखीराम जी: यही कि दुखी होने की प्रैक्टिस करते रहें. दुःख के बाज़ार को कभी छोटा न समझें. दुखी होने में बड़ी बरक्कत है. एक और बात यह कि आप हमेशा अपना दुःख बाँटते रहिये. मतलब सार्वजनिक तौर पर दुःख की नुमाइश का असर यह होता है कि दुःख बढ़ता जाता है. एक दुखियारे के लिए यह ज़रूरी है कि वह अपनी जमात में में नए-नए लोगों को शामिल करता जाए. देखिये सुख आता है तो फट से चला जाता है. क्यों? क्योंकि वह एक और बड़े सुख की तमन्ना लिए रहता है. लेकिन दुःख के साथ ऐसा नहीं है. छोटा दुःख कभी भी बड़े दुख की तमन्ना नहीं रखा. दर्शनशास्त्र के अनुसार.....

शिव: समझ गया. समझ गया. सर, आज आपने मेरी वर्षों की तमन्ना पूरी कर दी. आपने अपने बहुमूल्य समय से कुछ क्षण निकाले और यह इंटरव्यू दिया. इसके लिए मैं आपका आभारी हूँ.

दुखीराम ज़ी: वह सब तो ठीक है. आप तो आभारी हो गए लेकिन जितनी देर इंटरव्यू लेते रहे उतनी देर के लिए तो दुखी होने का मौका मेरे हाथ से जाता रहा. आज शाम को कुल बावन मिनट एक्स्ट्रा दुखी होना पड़ेगा.

तो यह था दुखीराम ज़ी का इंटरव्यू. आज चंदू चौरसिया के छुट्टी पर जाने की वजह से मुझे ही दुखीराम ज़ी का इंटरव्यू लेना पड़ा. लेकिन मैं दुखी नहीं हूँ.

Tuesday, April 26, 2011

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की कीमत

हम ब्लॉगर लोग आम आदमी हैं इसलिए ब्लॉग लिखते हैं. आते-जाते जो कुछ भी देखते हैं, ब्लॉग पर टांक देते हैं. ई ससुर गूगल ने सर्वर क्या दिया हमारी तो खिल गईं. अरे मैं बाँछों की बात कर रहा हूँ. खिल गईं. एक आईडी क्रियेट किया और शुरू हो गए.

क्या-क्या नहीं लिख डाला?

आज हमको रास्ते में यह दिखा. कल शाम को वह दिखा था. ई राजनीति बहुत गंदी हो गई है. आतंकवाद बहुत बढ़ गया है. मंहगाई बढ़ गई है. अंग्रेजी बढ़ गई है. हिंदी कम गई है. अंग्रेजी को बढावा देना गुलामी की निशानी है. आतंकवादी से सख्ती से निबटना होगा. कसाब को डायरेक्ट फांसी काहे नहीं दे देती सरकार? अफ़ज़ल गुरु की फांसी में इतना दिन काहे लग रहा है? वर्ण व्यवस्था कब ख़तम होगी? किसान काहे आत्महत्या कर रहा है? महिला आरक्षण को लेकर इतना हंगामा क्यों है? कसाब अपना बयान काहे बदल दिया? हम सेकुलर हैं, तो तुम कम्यूनल काहे हो? साध्वी प्रज्ञा के साथ इतनी बदसलूकी काहे हो रही है? हिन्दू आतंकवाद शब्द काहे इस्तेमाल किया जा रहा है? कम्यूनिष्ट इतनी बुरी तरह से काहे हारे? क्या दुनियाँ से कम्यूनिज्म के ख़तम होने की शुरुआत हो गई है? उड़ीसा में चर्च पर काहे हमला हो रहा है? मुतालिक जैसों की धुलाई काहें नहीं होनी चाहिए?

भारतीय भुजंग काट लेगा तो क्या होगा? वेद में व्यवस्था को लेकर ई कहा गया है. जंगल की आग से छुटकारा कैसे पाया जा सकता है? पर्यावरण खराब क्यों हो रहा है? हबीब तनवीर को श्रद्धांजलि. आदित्य जी को श्रद्धांजलि. गत्यात्मक ज्योतिष खराब है. फलित ज्योतिष अच्छा है. जलित ज्योतिष उससे भी अच्छा है. हम ऐसा मानते हैं तुम क्या कर लोगे? हिन्दू कौन थे? हिंदी भाषा किधर जा रही है? किस रफ़्तार से जा रही है? परसों तक कहाँ पहुँच जायेगी? कविता क्या है? कविता इंसान को जगाती है या फिर गौरैया के लिए लिखी जाती है?

काहे? काहे? काहे?

मतलब यह है कि आम आदमी हैं तो यही सब लिखेंगे न. ख़ास होते तो किसी मैगजीन में लिख रहे होते. केंचुकी फ्रायड चिकेन और मैकडोनाल्ड की वजह से एक ख़ास समाज किस दिशा में जा रहा है उसका विश्लेषण कर रहे होते. तब अगर कसाब के मुक़दमे की बात करते तो इस बात को ध्यान में रखकर करते कि अंतर्राष्ट्रीय कूटिनीति का इस मुक़दमे पर क्या असर पड़ता है. अमेरिका का मीडिया क्या चाहता है? एमनेस्टी इंटरनेशल के लोग इस मुद्दे पर क्या विचार रखते हैं? अफ़ज़ल गुरु को फांसी देने की बात करते तो यह ध्यान में रखते कि यूरोपियन यूनियन भारत से क्या चाहता है? मैकडोनाल्ड की किसी खास वर्ग के लोगों पर पड़े प्रभाव को देखते तो उससे उपजने वाली आर्थिक नीतियों का अध्ययन करते हुए लिखते.

लेकिन भैया, हम तो आम आदमी हैं. ऐसे में जो कुछ लिखेंगे वह सब आम आदमी की भाषा में ही होगा. हम तो यह सुनकर लिखना शुरू किये थे कि; "ब्लॉग अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम है."

किसी ब्लॉग विशेषज्ञ ने यह लाइन गढी होगी. लेकिन हमें तो मरवाने पर उतारू दीखता है यह ब्लॉग विशेषज्ञ. यह वाक्य सुनकर हम तो उड़ने लगे. जो मन में आया, लिख डाला. ऊपर से संविधान ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी वाला सर्टिफिकेट दिया है. अब इस सर्टिफिकेट और कुछ टूटे-फूटे विचारों से लैस हम निकल लिए ब्लॉग लिखने. आम आदमी छोटे-छोटे काम कर के महान होने के सपने देखता रहता है. वही बात हम ब्लॉगर लोगों के साथ है. सोचते हैं;"चलो ब्लॉग लिखकर महान हो लेते हैं."

अब ऐसे में अगर कोई आकर यह कहे कि ऐसा करने से फंस जाओगे तो? हमें तो लगेगा न कि यहाँ हम ब्लॉग लिखकर महान हुए जा रहे थे और आप आ गए बीच में हमारी महानता पर ताला लगाने? महान होने का हमारा प्लान चौपट करने? आम आदमी को महान होने का हक़ नहीं है क्या?

हम ब्लॉग लिखेंगे तो आम आदमी की तरह. इसलिए जब अफ़ज़ल गुरु की बात करते हैं तब केवल यह याद रहता है कि उसे फांसी की सज़ा हो गई है. यह भी याद रहता है कि कुछ नेताओं ने और कुछ मानवाधिकार वालों उसे बचाने की मुहिम छेड़ रखी है. हमें इस बात से क्या लेना-देना कि यूरोपियन यूनियन अफ़ज़ल गुरु के मामले में भारत पर क्या दबाव डाल रहा है?

ऐसे में हम क्या लिखें?

हम जब किसानों की आत्महत्या की बात करेंगे तो यही न लिखेंगे कि सरकार की नीतियों की वजह से किसान मारा जा रहा है? हमें नहीं मालूम कि विदर्भ और बुंदेलखंड की आर्थिक दशा क्या है? किसान किस फसल की खेती करता है? वहां उपलब्ध साधन क्या हैं? हम तो जी आम आदमी की तरह यही सोचते मरे जा रहे हैं कि न जाने कितने लोग अपना जीवन ख़त्म कर ले रहे हैं.

हम जब न्याय-व्यवस्था पर लिखेंगे तो एक आम आदमी की धारणा लिए लिखेंगे. हमें तो केवल इतना पता है कि अदालतें न जाने कितने वर्षों से चल रहे न जाने कितने मुकदमें निबटा नहीं पा रही. क्यों नहीं निबटा पा रही, उसपर दिया जलाकर रौशनी दिखाना ख़ास लोगों का काम है. हमें केवल इतना जानते हैं कि वकील अपने दांव-पेंच कैसे चलाते हैं. हमें केवल इतना पता है कि इसकी वजह से मुकदमें कैसे खिंचते हैं.

हमें क्या पता कि आम आदमी की सोच लिए हम अगर कुछ लिख देंगे तो उससे अदालत की अवमानना होगी? हमें तो बस इतना मालूम है कि नेता टाइप लोग न जाने कितनी बार उच्चतम न्यायालय तक की अवमानना करते नहीं अघाते. लेकिन उनके खिलाफ कुछ नहीं होता. हमें तो बस इतना पता है कि आये दिन न्याय पालिका में भ्रष्टाचार की बातें होती रहती हैं.

इन मुद्दों के फ़ाइनर पॉइंट्स पर प्रकाश डालने का काम किसी प्रशांत भूषण, किसी फली नारीमन या किसी सोली सोराबजी के जिम्मे है.

ऐसे में हम और क्या लिखेंगे? ब्लॉग लिखने से बदलाव होता है, ऐसा कोई गुमान नहीं पाल रक्खा है हमने. हमें तो यही समझ में आता है कि टीवी के पैनल डिस्कशन या फिर सेमिनार आयोजित करने से अगर बदलाव नहीं आ पाया तो फिर शायद ब्लॉग का नंबर आये..:-)

लेकिन अब क्या अनिवार्य हो जाएगा कि ब्लॉग लिखने से पहले भारतीय अचार संहिता की धाराएं रट लो? साइबर कानूनों को घोंट डालो. हमारे लेख से किस-किस को नाराजगी होगी उसकी एक लिस्ट बना लो. इतना सबकुछ कर लो उसके बाद लिखना. चार साल लग जायेंगे सारी तैयारी करने में. हो सकता है उसके बाद जब लिखने की बारी आये तो पता चले कि गूगल जी ने फ्री की सुविधा हटा ली. ऐसे में हमारा ब्लॉग कैरियर तो शुरू होने से पहले ही ख़त्म हो जाएगा.

अभिव्यक्ति का माध्यम क्या केवल ब्लॉग ही है?

यह तो अभी आया है. हाल ही में. इससे पहले जो लोग व्यंग वगैरह लिख डालते थे उन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं थी? क्या होता अगर कोई अधिकारी, कोई मास्टर, कोई नेता, कोई राजनीतिक पार्टी, कोई डॉक्टर, कोई वकील, कोई थानेदार, कोई गवर्नर, कोई मुख्यमंत्री किसी परसाई जी, किसी शरद जोशी जी या किसी श्रीलाल शुक्ल जी से नाराज़ हो जाता तो?

समाज में न जाने किन-किन विसंगतियों पर इन लोगों ने लिखा. किसी को छोड़ा नहीं. लेकिन मैंने तो नहीं सुना कि किसी ने इन्हें अदालत में घसीट लिया हो. ऐसा होता तो क्या-क्या हो सकता था?

देखते कि सन पचहत्तर से ही परसाई जी केवल अदालतों के चक्कर काट रहे हैं. किसी दिन जबलपुर में मुक़दमे की सुनवाई रहती तो यह कहते सुने जाते कि;"क्या कहें, वकालत में व्याप्त विसंगतियों के बारे में लिख दिया था. गवाह कैसे तोडे जाते हैं. तारीख कैसी ली जाती है. जबलपुर बार असोसिएशन ने मुकदमा ठोक दिया. अब तो झेलना पड़ेगा ही. मेरी भी मति मारी गई थी. काहे व्यंग लिखने गए?"

कोई कहता कि; " कोई बात नहीं. ऐसा होता रहता है. सब ठीक हो जाएगा."

इस बात पर शायद बोलते; "अरे क्या ख़ाक ठीक हो जाएगा? अभी कल ग्वालियर में मुक़दमे की सुनवाई है. रानी नागफनी की कहानी में डॉक्टर भाई लोगों के बारे में लिख दिया था कि कैसे जब मार्केट में कोई दवाई भारी मात्रा में आ जाती है डॉक्टर लोग हर रोग में मरीज को वही दवाई प्रिस्क्राईब कर देते हैं. कल की तारीख निबट जाए तो अगले मंगलवार को हैदराबाद जाना है. राजनीति पर लिखे गए एक लेख में चेन्ना रेड्डी को खींच लिए थे. भाई ने आंध्रप्रदेश हाई कोर्ट में मुकदमा दायर कर दिया है."

देखते कि सन पचहत्तर के बाद उन्होंने कुछ लिखा ही नहीं. तब से सन पंचानवे तक बेचारे मुकदमों में उलझे-उलझे इस असार संसार से कूच कर जाते.

कैसा लगता अगर ऐसा कुछ हो जाता तो?

संजय गांधी की खिंचाई न जाने कितनी बार की होगी उन्होंने. अशोक मेहता से लेकर राम मनोहर लोहिया, और जय प्रकाश नारायण से लेकर राज नारायण तक किसी को नहीं छोड़ा. लेकिन क्या इन लोगों ने उनको मुकदमों में फंसाकर जोत डालने की कसम खाई?

या फिर उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के कुछ और मायने थे? या कहीं ऐसा तो नहीं कि परसाई जी अपने समय के बाहुबली थे जिनसे सब डरते थे इसलिए किसी ने डर के मारे मुकदमा नहीं दायर किया?

आखिर एक आम आदमी की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की कीमत क्या है? जेलयात्रा?

Monday, April 25, 2011

जनलोकपाल बिल की ड्राफ्टिंग कमिटी में हलकान भाई

"ड्राफ्टिंग कमिटी में ब्लॉगर समाज के प्रतिनिधि को जगह दिए जाने की आपकी मांग क्या उचित है?"; एक पत्रकार ने सवाल किया.

हलकान भाई ने सवाल को धीरज-मुद्रा में सुना. कुछ सोचा और बोले; "क्यों नहीं? हमारी मांग को अनुचित कैसे ठहराया जा सकता है? आज ब्लॉगर समाज का इस देश की सिविल सोसाइटी में महत्वपूर्ण योगदान है. अगर अनुसूचित जाति और जन-जाति के प्रतिनिधियों को शामिल करने की मांग की जा सकती है तो फिर ब्लॉगर समाज ऐसा क्यों नहीं कर सकता?"

उनकी बात सुनकर एक और पत्रकार ने सवाल दागा; "आपको लगता है कि ब्लॉगर समाज में योग्य व्यक्ति हैं जिन्हें इस कमिटी में शामिल किया जा सकता है?"

"क्यों नहीं? एक से बढ़कर एक योग्य ब्लॉगर हैं जो इस ड्राफ्टिंग कमिटी के मेम्बर होने लायक हैं. कितने लोग़ हैं जो बड़े ब्लॉगर एशोसियेशन के हेड हैं. कई लोग़ हैं जो ब्लॉगर पुरस्कार वितरण संस्था के मालिक हैं. कई ब्लॉग इतिहासकार हैं. पत्रकार, लेखक, वकील हैं. हजारों की संख्या में कवि हैं. इतिहास बताता है कि जब-जब देश पर संकट आया है तब-तब कवि ने देश को जगाया है. और फिर ये लोग़ तो हैं ही, मैं खुद भी हूँ. मैंने अपने ब्लॉग पर भ्रष्टाचार के ऊपर कई बार हमला किया है. करीब अट्ठारह-उन्नीस ब्लॉग पोस्ट लिखकर भ्रष्टाचारियों पर करारा 'पोस्टिक' प्रहार किया है. आपको यह जानकार ख़ुशी होगी कि मेरा नाम हिंदी ब्लागिंग की इतिहास नामक पुस्तक में पेज ४ पर है. इंडीब्लॉगर ने मुझे इकहत्तर की रैंकिंग दी है. मेरी एक कविता वाली पोस्ट पर सतहत्तर कमेन्ट मिले थे. आपको नहीं लगता कि मेरे ये अचीवमेंट मुझे इस लायक बनाते हैं कि मैं इस कमिटी में शामिल हो सकूँ?"; हलकान भाई ने पत्रकार से उल्टा सवाल कर डाला.

उनका सवाल सुनकर पत्रकार सकपका गया. कुछ कहने के लिए अपने मन में शब्दों को गूंथकर कोई वाक्य बना ही रहा था कि किसी और पत्रकार ने पूछा लिया; "लेकिन यह भी सुनने में आ रहा है कि आपको पीलीभीत हिंदी ब्लॉगर महासभा का समर्थन नहीं मिला है?"

"ऐसी बात नहीं है. मतभेद कहाँ नहीं होते? ब्लॉगर समाज में मतभेद उसमें मज़बूत लोकतंत्र का एक बड़ा उदहारण है. वैसे आपको बता दूँ कि झारखण्ड ब्लॉगर एशोसियेशन, धनबाद आंचलिक ब्लॉगर एशोसियेशन, छत्तीसगढ़ हिंदी ब्लॉगर महासभा, पानीपत ब्लॉगर एशोसियेशन, दिल्ली हिंदी ब्लॉगर एशोसियेशन, गाजियाबाद ब्लागिंग कम्यूनिटी, अखिल भारतीय सॉफ्टवेयर डेवलपर्स ब्लॉगर एशोसियेशन, आल इंडिया न्यू जनरेशन इंडस्ट्री ब्लॉगर एशोसियेशन, बैंक एम्प्लोयीज ब्लॉगर एशोसियेशन और ऐसे ही भारत भर से करीब अठहत्तर ब्लॉगर एशोसियेशन का समर्थन हासिल है मुझे. जहाँ तक पीलीभीत ब्लॉगर महासभा के समर्थन ना मिलने की बात है तो उसके बार में यही कहूँगा कि यह सरकार के कुछ मंत्रियों द्वारा फैलाई गई अफवाह है और इसमें कोई तथ्य नहीं है. दरअसल मैं यह बता देना उचित समझता हूँ कि सरकार चाहती है कि ब्लॉगर समाज की डिमांड को दफन कर दिया जाय"; हलकान भाई से स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा.

हलकान भाई हिंदी ब्लाग समाज के प्रतिनिधि के रूप में एक प्रेस कांफ्रेंस कर रहे थे और पत्रकार उनसे सवाल पूछ रहे थे.

जनलोकपाल बिल की ड्राफ्टिंग कमिटी को और व्यापक बनाने के लिए देश भर के तमाम तथाकथित समाज से आवाजें उठनी लगी थीं. सूचित जाति, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन-जाति, ब्राह्मण महासभा, अखिल भारतीय क्षत्रिय अन्तराष्ट्रीय महासभा, भोजपुर इंटरनॅशनल सिटिज़न्स फोरम, इस्टर्न यूपी बाहुबली एशोसियेशन, तमिल क्लैशिकल इंटरनेशनल कांफ्रेंस, रेड्डी ब्रदर्स माइंस एम्प्लोयीज एशोसियेशन, आल इंडिया पब्लिक रिलेशंस ऑपरेटर्स फोरम, राडिया ट्रस्ट, टीवी न्यूज ऐंकर्स एशोसियेशन और ऐसे ही ना जाने कितने संगठनों ने अपने प्रतिनिधियों की भर्ती के लिए आन्दोलन शुरू कर दिया था. जाट महासभा ने एयरपोर्ट के रन-वे पर चक्का जाम कर दिया था और गुर्जर महासभा ने रेल लाइंस अपने नाम कर ली थी.

कई देसी-विदेशी पत्रकार यह कल्कुलेशन करने में बिजी थे कि अगर इस तरह का व्यापक आन्दोलन किया जा रहा है तो भारत में भ्रष्टाचार कैसे पनपा? लोग़ दंग थे. सबको इस बात का आश्चर्य था कि इतने ईमानदारों के बावजूद देश में भ्रष्टाचार फैला तो कैसे फैला? पी एचडी के लिए रजिस्ट्रेशन करवाने के इच्छुक कुछ छात्र इसी विषय पर पी एचडी करने के लिए कमर कस रहे थे. इन तमाम सभा, जनसभा और महासभा को देखकर हलकान भाई ने ब्लॉगर समाज का प्रतिनिधित्व अपने हाथ में ले लिया था और इस बात पर अड़े थे कि उन्हें ड्राफ्टिंग कमिटी में भर्ती मिलनी ही चाहिए.

सरकार इन तमाम समाज और महासभाओं के प्रतिनिधि को ड्राफ्टिंग कमिटी में जगह ना देने पर कमर कसी बैठी थी. कारण यह नहीं था कि इन संस्थाओं के प्रतिनिधियों के बैठने के लिए कुर्सी की कमी थी. असली कारण यह था सरकार का काम करने का तरीका. अगर इन संस्थाओं के प्रतिनिधियों को जगह दे दी जाती तो फिर सरकार को उतनी ही संख्या में मंत्री भिडाने पड़ते और यहाँ सरकार के लिए मुश्किल खड़ी हो जाती. हज़ारों मंत्रियों की खोज आखिर बहुत बड़ी समस्या थी.

सरकार के ज़ीओएम की एक मीटिंग हुई. मीटिंग का एजेंडा यह था कि इतने प्रतिनिधियों को कैसे टरकाया जाय? मीटिंग में कानून मंत्रालय के सेक्रेटरी को भी बुलाया गया था. कानून मंत्रालय में यह सेक्रेटरी ताजा-ताजा अर्बन डेवेलपमेंट मिनिस्ट्री से ट्रान्सफर हुआ था. सरकार के माथे से पसीना पोंछते हुए उसने तुरंत अपना आईडिया दे डाला. बोला; "सर, बड़ा मुँह और बड़ी बात होगी. इन संस्थाओं को टरकाने का एक तरीका यह है कि ड्राफ्टिंग कमिटी में जगह केवल एक संस्था को दी जाय और उसके लिए हमें लॉटरी का सहारा लेना चाहिए. मैंने अर्बन डेवेलपमेंट मिनिस्ट्री में रहते हुए सरकारी फ़्लैट अलाटमेंट में यह सीखा है. क्या बोलते हैं?"

उसकी बात सुनकर कानून मंत्री ने उसका माथा चूम लिया. बोले; "हर बात की तरह ही इस बात पर भी हमें तुमपर गर्व है."

दूसरे दिन सरकार ने लॉटरी कर डाली. लॉटरी में ब्लॉगर समाज के प्रतिनिधि को ड्राफ्टिंग कमिटी में जगह मिल गई. हलकान भाई बहुत खुश थे. इतिहास का निर्माण हो रहा था. उधर हिंदी ब्लागिंग का इतिहास लिखा जा रहा था और इधर उसी समाज का एक ब्लॉगर देश से भ्रष्टाचार मिटाने के लिए अपने हथियार चमका रहा था. हलकान भाई अब अक्सर भारतीय संविधान, लोकपाल, लोकतंत्र, जनतंत्र, अम्बेदकर, भ्रष्टाचार, टू ज़ी स्कैम, प्रधानमंत्री के कर्त्तव्य, राष्ट्रपति के अधिकार, स्पेन की राजनीति में लोकपाल जैसे विषयों के बारे में बात करते पाए जाते. वे अपना ज्ञान भी बढ़ाते जा रहे थे.

ड्राफ्टिंग कमिटी की पहली मीटिंग में करीब दस दिन बाकी थे. सबकुछ प्लान के मुताबिक़ चल रहा था कि कांग्रेस के एक महामंत्री ने हलकान भाई के ऊपर एक प्रेस कांफ्रेंस में आरोप लगा दिया. बोले- ब्लॉगर हलकान 'विद्रोही' को भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है. जब पत्रकारों ने इस बात पर उनसे रौशनी डालने के लिए कहा तो उन्होंने कहा - हमारे पास प्रूफ है कि हलकान 'विद्रोही' ने अपने ब्लॉग पर कमेन्ट करने के लिए फर्जी आईडी बनाई. उनके ब्लॉग पर कुल अट्ठाईस हज़ार चार सौ चौंसठ कमेन्ट हैं जिनमें से कुल तीन हज़ार पाँच सौ सोलह कमेन्ट हलकान 'विद्रोही' ने खुद बनाई गई फर्जी आई डी से किये हैं. उन्होंने श्री अमर सिंह के हिंदी ब्लॉग पर उनकी बुराई भी की है. पिछले साल ही एक ब्लॉगर एशोसियेशन के महामंत्री ने उनके ऊपर ब्लॉगर सम्मलेन के दौरान इकठ्ठा किये चंदे की रकम में हेर-फेर का आरोप लगाया था. उनके ऊपर एक एशोसियेशन के चुनाव के दौरान.....

अमनेस्टी इंटरनेशनल और ऐसी ना जाने कितनी संस्थाएं हलकान 'विद्रोही' समर्थन में आगे आ रही थीं.

दूसरे दिन ही टीवी चैनलों के पत्रकारों ने हलकान 'विद्रोही' के खिलाफ एक पुराना केस निकाला जब स्कूल की एक पिकनिक में उन्होंने दो समोसे और दो जलेबियाँ ज्यादा खा ली थीं. अब उनके ऊपर आरोपों की झड़ी लगने लगी थी. वे प्रेस कांफ्रेंस करके सफाई देते फिर रहे थे. देश के कई ब्लॉगर एशोसियेशन से उन्हें हताश ना होने की सलाह मिल रही थी. वे एक प्रेस कन्फ्रेसं कर रहे थे. मैं उन्हें टीवी पर देख रहा था. टीवी देखते-देखते मैंने घर से आवाज़ लगाई हलकान तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं. इतना कहकर मैंने हाथ उठाया ही था कि चाय की बढ़िया खुशबू मेरे नाक में घुसी. अचानक नींद खुल गई.

पता चल चुका था कि मैं सपना देख रहा था.

Saturday, April 23, 2011

बैटिंग की बातें चलें फट कवित्त दे ठेल....




कल रात को सोचा कि इस सप्ताह को दोहा सप्ताह के रूप में मना लिया जाय. इससे पहले सीडियात्मक दोहे लिखे थे. अब प्रस्तुत है सिद्धुआत्मक दोहे.

जैसा कि आपसब जानते हैं, मैं सिद्धू ज़ी महाराज का बहुत बड़ा फैन हूँ. उन्हें सुनकर मन प्रफुल्लित हो जाता है. मेरा ऐसा विश्वास है कि वे जन्म से ही दार्शनिक थे. बचपन की कुसंगति के कारण क्रिकेटर बन गए.

एक फैन होने के नाते मेरा यह धर्म है कि मैं उनके ऊपर कुछ लिखूं. इसलिए ये अभी कुछ धोये सॉरी दोहे लिखकर टांग दे रहा हूँ. अगर सौ-दो सौ ग्राम तुकबंदी और इकठ्ठा हुई तो और टांग दूंगा. फिलहाल तो यही है. झेलिये.



एक रंग का पहनकर पगड़ी, 'टाई-नेक',
बात-बात पर मारते हमें कहावत फेंक

सुन सवाल वे क्रिकेट का दर्शन दे चिपकाय
उक्ति-सूक्ति बस ठेलकर पग-पग पर पगलाय

बैटिंग की बातें चलें फट कवित्त दे ठेल
अंट-संट बकते रहें खेलें अपना खेल

प्लेयर नेट प्रैक्टिस करें वो किताब रट लेय
जंह-जंह पर मौका मिले, सबको चौंका देय

कहत-कहत दो हाथ की अंगुली देय उठाय
बोल-बोल कर ओय गुरु निज थ्योरी समझाय

अगर रटे पुस्तक सदा जड़मति लगे सुजान
इस महान सिद्धांत का वे ही हैं पहचान

लाफ्टर शो औ खेल में नहीं करें वे भेद
जैसे समझे चुटकुले वैसे बल्ला-गेंद

जब बोलें तो सभी को चुप होना पड़ जाय
टोनी ग्रेग हों या सनी सबसे वे लड़ जाय

एमपी हैं, जज थे कभी और कभी एक्सपर्ट
जब चाहे, जिसमें जंचे, हो जायें कन्वर्ट

अफवाहें यह कह रही नासा की है मांग
करना चाहे स्टडी उनका बड़ा दिमाग

हो कवित्त या शायरी, चाहे गायें गान
हर कोई है सुन रहा उनको यही गुमान

असली गुरु-बानी कहाँ सबको यह संदेह
जो वे बोलें वही है, या जो नानकदेव

बनकर अब एक्सपर्ट वे फैलाते आतंक
प्रेमी जो हैं खेल के समझें उन्हें कलंक

न्यायालय अब कुछ करे सबकी यही गुहार
उससे ही बच सके है यह क्रिकेट-संसार

आई सी सी को चाहिए कर दे उनको बैन
यह डिमांड उससे करें दुनियाँ भर में फैन

Thursday, April 21, 2011

सीडी सीडी सब करें सीडी सुने न कोय...

पिछले कई दिनों से सीडी काण्ड चल रहा है. प्रेस कान्फरेंस की जा रही हैं. सीडी जारी की जा रही हैं. पप्पू के पापा की खोज हो रही है. ऐसे में ब्लागरीय धर्म यह है कि सीडी पर कुछ लिखा जाय. तो पेश हैं कुछ सीडीयात्मक धोये..सॉरी दोहे.



सीडी सीडी सब करें सीडी सुने न कोय,
जो कोऊ सीडी सुने मन भीतर ही रोय

सीडी उतनी ही भली जा में बात समाय
इधर-उधर एडिट करे मुद्रा लेव कमाय

सीडी को कर दे 'अमर' नेता की कांफ्रेंस
कल तक जिनसे दुश्मनी कहाँ आज डिफरेंस

सीडी देती है दिशा राजनीति को आज
इसे उसे बदनाम कर बनता जाए काज

सीडी चमके जहाँ पर वहीँ उजाला होय
दो सीडी चमकाय के निज चरित्र को धोय

सीडी जो जारी करे उसको बड़ा गुमान
उसकी सबसे दोस्ती उड़ा रहा पकवान

सीडी चली बाज़ार में बढ़ता चला बवाल
पप्पू के पापा कहाँ चहुँ दिश एक सवाल

सीडी अन्दर कैद हैं नेता और वकील
इक दूजे में गाड़ते लम्बी-लम्बी कील

सीडी ही शाश्वत यहाँ बाकी मायाजाल
बातचीत को टेप कर बना उसे कंगाल

सीडी ही करवा रहा राजनीति में न्याय
करे धुलाई इस तरह जैसे लाइफबॉय

सीडी की आकृति हमें बता रही यह भेद
जिस थाली में खा रहे उसमें कर दो छेद

सीडी उल्टी ना चले उल्टा चले दिमाग
कभी-कभी यूँ जार दे जैसे जारे आग

सीडी जो जारी करे सदा उड़ाये मौज
डील करे कानून से है चमचों की फौज

सीडी नेता के लिए जैसे हो ब्रह्मास्त्र
और सजाये आधुनिक राजनीति का शास्त्र

सीडी तो सस्ती यहाँ सस्ता साथ विचार
लगे टेस्टी इस कदर जैसे कोई अचार

सीडी सुविधा दे रही छेड़-छाड़ कर देउ
प्रश्न अगर उठ खड़ा हो शरण लैब की लेउ

सीडी देखन से लगे जैसे पहिया गोल
पर रहता उसमें सदा किसी ढोल की पोल

सीडी बिके बाज़ार में जैसे लेमनचूस
खोल कभी षड्यंत्र और कभी किसी का घूस

सीडी की बातें यहाँ सदा निराली होय
कभी फंसे नेता कभी बैरिस्टर भी रोय

सीडी का फ्यूचर सदा ब्राइट बीच बाज़ार
कभी काम है कलम का और कभी तलवार

सीडी तो घूमे यहाँ महिमा लिए अनंत
हर मौसम में हिट रहे बारिश, शरद, बसंत

Wednesday, April 13, 2011

विक्रम की चेन्नई विजिट

कल से बप्पी दा का 'गान' याद आ रहा है; "आना-जाना लगा रहेगा, 'दूख' जाएगा, 'सूख' आएगा...."

दुःख को 'दूख' लिखकर मैं बताना चाहता था कि बाप्पी दा का गाया 'गान' पढ़ने के लिए नहीं बल्कि सुनने के लिए है. आज तक उन्होंने दुःख का उच्चारण दुःख कहकर नहीं किया, हमेशा दूख कहकर ही किया है. इसके पीछे शायद यह कारण भी हो सकता है कि वे दुःख से कभी दुखी न हुए हों. देखा जाय तो उनके दुखी होने का कारण भी नहीं है. बल्कि खुश होने का सबसे बड़ा कारण है सोने के भाव में विकट उछाल. दुनियाँ भर के कमोडिटी एक्सपर्ट्स का मानना है कि पिछले डेढ़-दो साल में सोने के भाव में जो उछाल आया है उसका सबसे बड़ा फायदा उन्हें ही पहुँचा है.

बात चली है तो लगे हाथ बता दूँ कि मैं उनका बहुत बड़ा फैन हूँ. बाथरूम में नहा रहा होता हूँ तो मुँह से अनायास ही फूट पड़ता है; "कहाँ हाम कहाँ तूम हुए तूम कहाँ गूम, आ भी जा आ भी जा एक्के बार..." जब दोस्तों की मीटिंग होती है तो कई मित्र मुझसे बप्पी दा का 'गान' गाने के लिए कहते हैं. मैं गा देता हूँ. वे हँस लेते हैं. बात यह कहते हुए ख़त्म कर दी जाती है कि - तुम ब्लॉगर नहीं होते तो बप्पी दा के सबसे बड़े डुप्लीकेट होते. चेहरे-मोहरे की बात नहीं हो रही. बाप्पी दा के शब्दों में कहें तो "यहा 'सूर' का बात हो रहा है."

मैं क्या करूं? वे यहाँ को 'यहा' और सुर को 'सूर' कहते नहीं थकते.

लीजिये, कहाँ से कहाँ पहुँच गए? बात गाने से शुरू हुई थी और दो-चार गलियों से होते हुए देखिये कैसे शेम-लेस सेल्फ प्रमोशन तक पहुँच गई. केवल ब्लॉगर कहला कर संतोष नहीं है इसलिए समय-समय पर और कुछ बन जाने की इच्छा उछल कर बाहर आ ही जाती है. आदमी कहाँ-कहाँ कंट्रोल करेगा?

हाँ, तो आना-जाना लगा रहेगा नामक गाने की बात हो रही है. दरअसल विक्रम अपने तीन दिन के चेन्नई विजिट के बाद सोमवार को कोलकाता पहुँचा. उसकी चेन्नई और गाँव विजिट पर काफी देर तक बातें हुईं. तमाम जानकारियाँ मिलीं जो इलाके को नज़दीक से देखने वाला ही दे सकता है. इन तमाम बातों की एक पोस्ट लिख दे रहा हूँ. आप भी पढ़िए. चेन्नई विजिट की कहानी विक्रम की जुबानी....

...अरे सर, स्टालिन है लेकिन कमाल का बन्दा. फ्लाईओवर ही फ्लाईओवर बना डाले हैं भाई ने. अगर कहीं एक बस के आने-जाने की भी जगह है तो उसने यह गारंटी दे दी है कि वह बस फ्लाईओवर के ऊपर से ही जायेगी. वैसे भी फ्लाईओवर पर आने-जाने वाली गाड़ियाँ बड़ी क्यूट लगती है. नीचे से देखने पर कई तो एरोप्लेन की फीलिंग देती हैं. कई इस रफ़्तार से भागती हैं जिसे देखकर लगता है जैसे अभी टेक-ऑफ कर जायेंगी. ऊपर से फ्लाईओवर विकास का द्योतक भी होता है........... अगर आप चेन्नई से बाहर भी जा रहे हैं और बीच में कोई टाऊन पड़ गया तो आपको ट्रैफिक जाम से घबराने की ज़रुरत नहीं है. वहाँ आपके लिए फ्लाईओवर रेडी है. अगर आप उस टाऊन में कोई सौदा नहीं करना चाहते तो आप वाया फ्लाईओवर निकल लीजिये. उस टाऊन के लोगों से आपका न उधो का लेना और न माधो का देना...

आप देखिएगा एक दिन ऐसा आएगा जब भारतवर्ष की तमाम राज्य सरकारें स्टालिन को अपने शहरों के लिए बनने वाले फ्लाईओवर की कंसल्टेंसी के लिए बुलाएंगी. वे दिन भी दूर नहीं जब इंजीनियरिंग कालेजों में सिविल इंजीनियरिंग के कोर्स में स्टालिन के ऊपर एक चैप्टर होगा जिसमें फ्लाईओवर क्षेत्र में दिए गए उनके योगदान के ऊपर सबकुछ लिखा हुआ मिलेगा......एक दिन ऐसा भी आएगा जब...

.... जैसे अपने यहाँ क्या है? एयरकंडीशनर चलाने के लिए आपने स्विच और एम सी बी लगा रखा है. आपने इधर स्विच दबाया और उधर एसी ने अपना काम करना शुरू किया. थोड़ी देर में रूम ठंडा हो जाता है. लेकिन चेन्नई में ऐसा नहीं है. वहाँ मैं जितने घर में भी गया वहाँ यह देखा कि हर एसी का कनेक्शन स्टेबिलाइजर से ज़रूर है. एसी चलाने के लिए पहले स्टेबिलाइजर चलाना पड़ता है. स्टेबिलाइजर का स्विच दबाते ही उसमें करीब दस मिनट तक तरह-तरह की आवाजें आती हैं. कई आवाजें सुनकर लगता है जैसे यह स्टेबिलाइजर किसी मिमिक्री आर्टिस्ट की नक़ल कर रहा है. कई बार कुछ देर तक आने वाली आवाज़ अचानक किसी और आवाज़ में कन्वर्ट हो जाती है जिसे सुनकर लगता है जैसे यह स्टेबिलाइजर अपनी जगह बैठे-बैठे ही टेक-ऑफ कर जाएगा...... चार-चार घंटे चलने के बाद भी कमरा ठंडा नहीं होता है. देखकर लगता है जैसे एसी अपने रोल को लेकर कन्फ्यूज्ड है. जैसे कई बैट्समैन कई-कई बार यह सोचते हुए कन्फ्यूज्ड हो जाते हैं कि उन्हें स्ट्रोक खेलना चाहिए या डिफेंड करना चाहिए.....चेन्नई के एसी को वहाँ की बिजली की ऐसी आदत पड़ चुकी है जिसे देखकर लगता है कि आप वहाँ के एसी को अगर कुछ रिश्वत वगैरह भी दे देंगे तो भी वह चेन्नई की बिजली को छोड़कर कहीं नहीं जाएगा.....

बाद में सड़क पर लगे ट्रांसफॉर्मर देखा तो बात समझ में आई. आप देख लेंगे तो अपना माथा पीट लेंगे. देखकर लगता है जैसे एक्सपेरिमेंट के बाद दुनियाँ में ट्रांसफॉर्मर के कॉमर्शियल प्रोडक्शन की जो पहली खेप थी वह चेन्नई शहर में ही लगी थी और अभी तक चल रही है. कई ट्रांसफॉर्मर के ऊपर कुछ ऐसे आड़े-तिरछे लोहे-लक्कड़ और इक्विपमेंट्स नज़र आये जिन्हें देखकर लगा कि ये माल-असबाब इसलिए लगाये गए ताकि अंतरिक्ष में सैर कर रहे तमाम भारतीय सैटलाइट्स को कंट्रोल किया जा सके...

......लोग़ अस्पताल में खूब भर्ती होते हैं. एक पार्टी में रिश्तेदारों से मिला. उनकी बातें सुनकर इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि यहाँ उपस्थित लोगों में से फिफ्टी परसेंट तो पिछले एक-दो महीने में किसी न किसी बीमारी के बहाने अस्पताल में रह आये हैं. मेरे एक रिश्तेदार वृहस्पतिवार तक अस्पताल में भर्ती थे और शनिवार को पार्टी अटेंड कर रहे थे. देखकर लगा कि ये टीवी और पत्र-पत्रिकाओं में भारत को जो मेडिकल टूरिज्म का महान डेस्टिनेशन बताया जा रहा है उसका पहला प्रयोग लोकल लोगों पर किया जाता है. कई तो बुखार से पीड़ित होकर अस्पताल में भर्ती हो लेते हैं.....

हाल यह है कि तमाम डाक्टर्स अपने रोगियों को अपने दोस्त, भाई, चचा, ताऊ जैसे ट्रीट करते हैं. मतलब यह कि उन्हें लूटने का कोई मौका हाथ से जाने नहीं देते.

...... बात इलेक्शन की शुरू हुई तो तमाम बातें सुनने को मिलीं. जीजाजी ने बताया कि वोट का रेट इस बार पाँच हज़ार रुपया पर फॅमिली का चल रहा है. पार्टी वाले एडवांस देने पर राजी हैं. नोट लो और वोट दो. वोट का रेट इस बार पर फॅमिली शायद इसलिए बांधा गया क्योंकि करूणानिधि इज अ फॅमिलीमैन...मिक्सर, टीवी, लैपटॉप की बातें पुरानी हो गईं हैं. चावल तो और पुराना हो गया है.... इस बार ३५ किलो पर फॅमिली पर मंथ पर सौदा पक्का हुआ है....चावल की बात पर मुझे ए राजा की याद आ गई. एक इंटरव्यू में टू-ज़ी और थ्री-ज़ी के अंतर को समझाते हुए उन्होंने बताया था कि "त्री ज़ी यिज्ज लइक बासमती रईस येंड टू ज़ी यिज लइक यार्डिनरी रईस." .......

.......जब सभा में पीकर भाषण देने की बात उठी तो विजयकान्त ने सीधा कह दिया कि इस गर्मी में पीयेंगे नहीं तो चुनाव प्रचार कैसे करेंगे?..एक सभा में भाषण दे रहे थे. किसी विरोधी के बारे में मुँह से कुछ उल्टा-सीधा निकल आया. पास खड़े चमचे ने कान में कुछ कहकर उनका ध्यान खीचने की कोशिश की. उन्होंने अपने चमचे को वहीँ धुनक कर धर दिया. जब विरोधी दल वालों ने अपने टीवी चैनलों पर इस मामले को उछाला तो सीधा कह दिया; "मैंने आजतक जिसे भी पीटा वह एम एल ए बन गया. मैंने जिसे पीटा जब उसे कोई प्रॉब्लम नहीं है तो तुम्हारे बाप का क्या जाता है? वह इसलिए पिटना चाहता था ताकि उसका एम एल ए बनना पक्का हो जाए."

......पार्टी में कुछ नेताओं की वल्दियत को लेकर भी बातचीत हुई. एक नेता के बारे में यह कहा गया कि वे उनके (मतलब एक बड़े नेता जिन्हें उनका बाप माना जाता है) पुत्र नहीं हैं. दरअसल ये उनके (मतलब एक नेता जो पहले थे लेकिन अब नहीं हैं) के पुत्र हैं. ध्यान से चेहरा देखो तो पता चलेगा...बाद में यह कहकर बात ख़त्म की गई कि चेहरा कम्पेयर करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी है क्योंकि उनका (मतलब एक नेता जो पहले थे लेकिन अब नहीं हैं) आधा चेहरा काले चश्में में छिपा रहता था...

.....हमारे गाँव में सभी ने अपनी खेती-बाड़ी वाली करीब सौ एकड़ ज़मीन बड़े आराम से ज़मीन के किसी व्यापारी को बेंच दी. उस व्यापारी ने उनके इन जमीनों के कई प्लाट बनवा कर "एक बंगला बने न्यारा" गाने वाले कई खरीददारों को चेंप दिया. बाद में जब ज़मीन के कन्वर्जन के लिए अप्लिकेशन दिया गया तो स्टेट गवर्नमेंट ने यह कहकर सब गुड गोबर कर दिया कि एग्रीकल्चरल लैंड को किसी भी हालत में ......

Thursday, April 7, 2011

रेडियो गाता रहा...

जानकार लोग बताते हैं कि साहित्य समाज का दर्पण होता है. साहित्य रुपी इस दर्पण में समाज अपनी तस्वीर देख सकता था लेकिन सच्चाई यह है कि कभी देखा नहीं. तस्वीर में ख़ुद को देखकर तकलीफ होती होगी इसीलिए साहित्य को समाज ने देखना ही बंद कर दिया. साहित्यकार कहते रह गए कि; "हम दर्पण लाये हैं, देख लो" लेकिन समाज कहाँ सुनने वाला? उसे मालूम था कि दिनों-दिन उसका चेहरा ख़तम होता जा रहा है. ऐसे में देखना उचित नहीं रहेगा. डर जाने का चांस रहता था.

उन दिनों के दर्पण भी ऐसे थे कि झूठ बोलना नहीं जानते थे. समाज को भी मालूम था कि ये विकट ईमानदार दर्पण हैं, झूठ नहीं बोलते. असली कांच के बने थे. पीछे में सॉलिड सिल्वर कोटिंग. ऐसे में इसे देखेंगे तो तकलीफ नामक बुखार के शिकार हो जायेंगे. साहित्यकार भी ढिंढोरा पीटते रह गए. वे ख़ुद ईमानदार भी थे. समाज को लगा कि ईमानदार साहित्यकार का दर्पण मिलावटी नहीं होगा. ऐसे में इस दर्पण को घूस देकर हम इससे झूठ नहीं बुलवा सकते. ऐसे में ये दर्पण तो हमें सुंदर दिखाने से रहा. हटाओ, क्या मिलेगा देखने से? कौन अपना ख़तम होता चेहरा देखना चाहेगा? दर्पण की बिक्री बंद. साहित्य का साढ़े बारह बज गया.

वैसे साहित्य समाज का दर्पण है, यह बात पहले के जानकार बताते थे. बाद के जानकारों ने बताया कि अब भारत आगे निकल चुका है. अब सिनेमा समाज का दर्पण है. इतिहास गवाह है कि हर थ्योरी की काट भी पेश की जाती है. काट पेश न की जाए तो इतिहास का निर्माण नहीं हो सकेगा. इसी बात को ध्यान में रखकर बड़े ज्ञानियों और जानकारों ने बताया कि सिनेमा समाज का नहीं बल्कि समाज सिनेमा का दर्पण होता है. विकट कन्फ्यूजन.

जानकारों का काम ही है कन्फ्यूजन बनाए रखना.

बाद में सिनेमा के गानों को समाज का दर्पण बनाने की कवायद शुरू हुई. मनोरंजन का साधन? आकाशवाणी. बिनाका गीतमाला. रात को खाना मिले या न मिले, रेडियो लेकर तकिया के पास ज़रूर रख सकते हो. इसलिए रख लो, मनोरंजन होता रहेगा.

रेडियो चालू हुआ और इधर खटिया पर आकर जानकार जी बैठ गए. देश में भ्रष्टाचार की बात शुरू ही होती कि तीन हफ्ते से तीसरे पायदान पर बैठा गाना बज उठता; "मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे-मोती. मेरे देश की धरती."

सुनने वाला भौचक्का! सोचता; "देश की धरती इतना सोना और हीरा-मोती उगल रही है तो वो जा कहाँ रहा है?"

लेकिन किससे करे ये सवाल? अब ऐसे में कोई बुद्धिजीवी और जानकार टाइप आदमी आ जावे तो उससे पूछ लेता; " अच्छा ई बताओ, ये देश की धरती इतना सोना, हीरा वगैरह उगल रही है तो ये कहाँ जा रहा है?"

जानकार के पास कोई जवाब नहीं. कुछ देर सोचने की एक्टिंग करता होगा और बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचे कह देता होगा; "अरे सोना, हीरा वगैरह उगल रही है, यही क्या कम है? तुमको इस बात से क्या लेना-देना कि किसके पास जा रहा है. तुम तो यही सोचकर खुश रहो कि उगल रही है. आज जाने दो जिसके पास जा रहा है. कल तुम्हारा नंबर भी आएगा. रहीम ने ख़ुद कहा है कि; रहिमन चुप हो बैठिये देख दिनन के फेर...."

सवाल को दफना दिया? नहीं. डाऊट करने वाले इतनी जल्दी हार नहीं मानते. अगला सवाल दाग देता होगा; "अच्छा, ये गेंहूं की बड़ी किल्लत है. अमेरिका से जो गेहूं आया है, वो खाने लायक नहीं है. क्या होगा देश का?"

जानकार कुछ कहने की स्थिति में आने की कोशिश शुरू ही करता होगा कि रेडियो में दूसरे पायदान का गाना बज उठता होगा; 'मेरे देश में पवन चले पुरवाई...हो मेरे देश में.'

जानकार को सहारा मिल जाता होगा; "ले भैये गेहूं की चिंता छोड़ और इस बात से खुश हो जा कि तेरे देश में पुरवाई पवन चलती है. बाकी के देशों में पछुआ हवा धूम मचाती है. वे साले निकम्मे हैं. भ्रष्टाचारी हैं. पश्चिमी सभ्यता वाले. देख कि हम कितने भाग्यवान हैं जो हमारे देश में पुरवाई पवन चलती है. ये गेंहूं की चिंता छोड़ और इस पुरवाई पवन से काम चला. इसी को खा जा."

डाऊट करने वाले के पास एक और सवाल है. पूछना चाहता होगा कि लोगों के रहने के लिए मकान नहीं है. सरकार कुछ कर दे तो मकान मिल जाए. सोच रहा है कि बुद्धिजीवी ज़ी से ये बात पूछे कि नहीं? अभी सोच ही रहा है कि रेडियो का रंगारंग कार्यक्रम चालू हो गया. गाना सुनाई दिया; 'जहाँ डाल-डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा, वो भारत देश है मेरा...' वगैरह-वगैरह.

डाऊट करने वाला हतप्रभ. मन में सवाल पूछ रहा है कि गुरु भारत देश में चिड़िया डाल-डाल पर बसेरा करती है. और बाकी के देशों में? वहां क्या चिड़िया के रहने के लिए दस मंजिला इमारत होती है?

ये वे दिन थे जब भ्रष्टाचार अपनी जड़ें जमा रहा था. लेकिन देशवासी गाने सुनकर खुश थे. देश में पवन पुरवाई चलती थी और देश की धरती सोना वगैरह उगल रही थी. किसी को नहीं मालूम कि उगला हुआ इतना सोना वगैरह कौन दिशा में गमनरत है?

कोई अगर किसी दिशा की तरफ़ तर्जनी दिखा देता तो चार बोल उठते; "छि छि. ऐसा सोचा भी कैसे तुमने? जिस दिशा को तुमने इंगित किया है, उस दिशा में सारे ईमानदार लोगों के घर हैं. उनकी गिनती तो बड़े त्यागियों में होती है. तुम्हें शर्म नहीं आती ऐसे त्यागियों को इस तरह से बदनाम करते? देशद्रोही कहीं के."

यह नहीं देखा कि त्यागियों ने भवन देकर देश ही हथिया लिया.

उसी समय रेडियो पर बज उठता होगा; 'है प्रीत जहाँ की रीत सदा, मैं गीत वहां के गाता हूँ.........'

ऐसे ही रेडियो गाता रहा और हम ..........आज भी गा रहा है. फर्क सिर्फ इतना कि आज आई पी एल के स्कोर बताता है.

Saturday, April 2, 2011

जिससे पूरा भारत बोरियत से बचे

डियर माही,

इससे पहले कि 'डियर माही' जैसा संबोधन तुम्हारे मन में किसी तरह की गलतफहमी को जन्म दे, मैं साफ़-साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मैं कोई 'टीनेजर गर्ल' नहीं बल्कि एक पुरुष हूँ. मेरे इस स्पष्टीकरण के पीछे कारण यह है कि तमाम टीवी चैनलों के संवाददाताओं ने मेरे सामान्य ज्ञान में बढ़ोतरी करते हुए मुझे न जाने कितनी बार बताया है कि ज्यादातर लड़कियां ही तुम्हें माही कहकर पुकारती हैं. वैसे भी अगर मैं डियर महेंद्र सिंह धोनी जैसे किसी संबोधन का इस्तेमाल करता तो उसे देखकर मुझे ही नहीं बल्कि औरों को भी लगता जैसे मैं तुम्हें कानूनी नोटिस भेज रहा हूँ. पढ़ने में भी यह संबोधन 'कूल' नहीं लगता.

नतीजा यह हुआ कि मैं तुम्हें डियर माही लिखकर संबोधित कर रहा हूँ.

तो डियर माही, मेरे इस पत्र लिखने के पीछे एक कारण है. नहीं-नहीं, जो तुम सोच रहे हो, वह कारण नहीं है. वर्ल्डकप फाइनल से पाँच घंटे पहले तुम्हारे सामने कोई डिमांड रखकर मैं तुम्हें नर्वस नहीं करना चाहता. दरअसल कारण यह है कि, मैं यह चिट्ठी लिखकर अपने ब्लॉग पर लगाना चाहता हूँ जिससे मुझे एक अदद ब्लॉग पोस्ट की प्राप्ति हो जाए. आखिर एक ब्लॉगर को और क्या चाहिए? एक पोस्ट, और क्या?

वैसे मैं चाहता तो तुम्हारी टीम और क्रिकेट वर्ल्ड कप पर सवा सौ ग्राम की अशुद्ध तुकबंदी वाली एक चवन्नी कविता लिख डालता और किसी हिंदी न्यूज़ चैनल को फोन कर देता तो वे मेरी कविता कवर करने तुरंत आ जाते और वह तुम्हारे पास पहुँच जायेगी, मैं यह सोचकर अपने मन में दर्जन भर लड्डू फोड़ लेता. शायद तुम्हें पता न हो लेकिन एक अनुमान के अनुसार इस प्रोसेस से हमारे हिंदी न्यूज चैनलों ने पिछले दस वर्षों में करीब चार हज़ार सात सौ अट्ठावन हिंदी कवि पैदा किये हैं.

लेकिन मैंने सोचा कि ऐसा कुछ किया जाय जिससे मुझे एक ब्लॉग पोस्ट भी मिल जाए और तुम्हारा मोटिवेशन भी हो जाए. माही, मुझे पता नहीं कि भारत जब पिछली बार २००३ वर्ल्डकप के फाइनल में पहुँचा था तो हमारे कोच जॉन राइट ने कप्तान सौरव गांगुली को कैसे मॉटिवेट किया था? मुझे यह भी नहीं पता कि जब इसबार हम फिर से फाइनल में पहुँच गए हैं तो गैरी कर्स्टन क्या कर रहे हैं? मैं तुम्हें बताना चाहता हूँ कि तुम्हरी टीम के लिए वर्ल्डकप जीतना क्यों ज़रूरी है? वे कौन से कारण हैं जिनके लिए १२१ करोड़ भारतीय तुम्हें आशीर्वाद और प्यार देंगे.

तो हे अधिनायक, ध्यान लगाकर सुनो;

जैसा कि तुम्हें मालूम है हम २५ जून, १९८३ में क्रिकेट वर्ल्डकप जीते थे. वैसे कुछ चिरकुटों ने पिछले २-३ दिनों से यह भ्रम फैला रखा है कि हमें उस वर्ल्डकप में विजयश्री की प्राप्ति २ अप्रैल १९८३ के दिन हुई थी लेकिन यह सही नहीं है. खुद गूगलदेव ने यह बात कन्फर्म की है. और हे अधिनायक, आज की तारीख में गूगल से बढ़कर कौन है?

तो मैं कह रहा था कि २५ जून, १९८३ के दिन हम वर्ल्डकप जीते थे और उसके बाद केवल स्पोर्ट्स चैनलों पर लगातार जीतते जा रहे हैं. हाल यह है कि एक अनुमान के अनुसार हम स्पोर्ट्स चैनलों पर १९८३ का वर्ल्डकप १९८३ बार जीत चुके हैं. वैसे कुछ सूत्रों का मानना है कि यह आंकड़ा करीब आठ हज़ार दो सौ तक पहुँच सकता है. हम अगर इन दो सख्याओं का औसत भी निकालें तो हे अधिनायक, हम स्पोर्ट्स चैनलों पर करीब पाँच हज़ार बार वर्ल्डकप जीत चुके हैं. और तो और स्पोर्ट्स चैनलों के फुटेज के सहारे हमारे हिंदी न्यूज चैनल भी करीब ढाई हज़ार बार टीवी पर हमें वर्ल्डकप दिलवा चुके हैं.

हे अधिनायक, मुझे तो लगता है कि पिछले कई वर्षों में इन स्पोर्ट्स चैनलों के ट्रांसमिशन सेंटर में कुछ इस तरह का वार्तालाप होता होगा;

क्लर्क अपनी कुर्सी छोड़कर नीचे रतिराम चौरसिया की पान दूकान पर पान खाने जा रहा है. बीच में प्रोग्राम डायरेक्टर मिल जाता है. डायरेक्टर पूछता हा; "कहाँ जा रहे हो?"

क्लर्क'; "पान खाने नीचे जा रहा हूँ. आधे घंटे में वापस आता हूँ."

डायरेक्टर; "तो एक काम करो न. जाने से पहले वो १९८३ वर्ल्डकप फाइनल की सीडी लगाते जाओ. तुम जबतक पान खाकर वापस आओगे इंडिया फाइनल जीत जाएगा."

हे अधिनायक, हाल यह है कि बाथरूम में जाने से पहले एक भारतीय देख रहा है कि स्पोर्ट्स चैनल इंग्लिश प्रीमियर लीग का हाइलाइट्स दिखा रहा है और जब वह बाथरूम से बाहर आता है तो देखता क्या है कि मोहिंदर अमरनाथ माइकल होल्डिंग्स को एल बी डब्लू करके स्टंप लिए भागे जा रहे हैं. देख कर लगता है जैसे अगर वे आज इतनी जोर से न भागेंगे तो उन्हें स्टंप चोरी के इल्जाम में अरेस्ट कर लिया जाएगा. हे अधिनायक, तुम्हें यह जानकार आश्चर्य होगा कि १९८३ वर्ल्डकप फाइनल टीवी पर देखने की वजह से बेटा माँ के बार-बार कहने के बावजूद सब्जी लेने बाज़ार नहीं जाता और घर वालों को उस दिन केवल दाल-रोटी से गुज़ारा करना पड़ता है. वैसे सत्य यह है कि बेटा सोचता है कि क्या पता स्पोर्ट्स चैनल कल से भारत को जितवाना ही बंद कर दे. ऐसे में जब तक जितवा रहा है तब तक तो जीतते रहो.

हे अधिनायक माही, १२१ करोड़ लोग़ अट्ठाइस वर्षों से कपिल देव को दौड़ कर रिचर्ड्स का कैच लेते हुए देख रहे हैं. मानता हूँ कि गावस्कर के अनुसार; "कपिल वाज अ ग्रेट एथिलीट" लेकिन अब उनकी उमर भी तो देखो. पचास के पार पहुँच गए हैं. ऐसे में जब वे आजकल हाइलाइट्स में दौड़ते हैं तो धड़का लगा रहता है कि इस बार वे कैच नहीं पकड़ सके तो? अगर इस बार कैच छूट गया तो फिर रिचर्ड्स बड़ी दुर्गति करेगा हमारी. अभी तक तो कपिल कैच पकड़ते आये हैं लेकिन हे अधिनायक, यह क्रिकेट ही तो है. क्या पता अगली हाइलाइट्स में उनसे कैच छूट जाए और उसके बाद रिचर्ड्स ऐसा मारे कि आउट ही न हो? बीस ओवर भे नहीं लगेंगे वेस्ट- ईंडीज को मैच जीतने में.

और फिर हे अधिनायक, तुम्हें तो पता ही है कि हमारी संस्कृति और दर्शन में ऐसा बताया गया है कि हर चीज में जान होती है. अगर हम इस लिहाज से देखें तो क्या तुम्हें नहीं लगता कि हमें गोर्डन ग्रीनिज के उस स्टंप की रक्षा करनी चाहिए जिसे पिछले अट्ठाइस वर्षों से बलविंदर सिंह संधू अपने इन-स्विंगर से उखाड़ते आ रहे हैं. एक बार ठहरो और सोचो कि हर बार बॉल से धक्का खाने के बाद उस स्टंप की क्या दशा होती होगी? और फिर यह भी तो सोचो कि क्या होगा अगर अगली हाइलाइट्स में संधू का बॉल स्विंग ही न किया? क्या होगा तब? ग्रीनिज हमारी बड़ी दुर्गति करेगा. १९८३ में ही उसके पास बड़ा अनुभव था अब तो पूरे अट्ठाइस वर्षों का अनुभव उसमें जुड़ गया है. ऐसे में अगर वह अगले हाइलाइट्स में स्क्वायर ड्राइव लगाकर चौका मार दे तो? पता नहीं तुम्हें मालूम है कि नहीं लेकिन मुझे मालूम है कि उसने एक इंटरव्यू में कहा था कि; "अगर बॉल मेरे बैट पर ठीक से नहीं आती तो चौका हो जाता है. अगर आ जाती है तो फिर छक्का तो है ही."

हे अधिनायक, कभी तुमने माइकल होल्डिंग्स के पैड की दुर्गति के बारे में सोचा है? मोहिंदर अमरनाथ की बॉल पिछले अट्ठाइस वर्षों से उसके पैड पर एक ही जगह लग रही है. उसके पैड की दुर्दशा के बारे में सोचते हुए लगता है जैसे बेचारा पैड न जाने कितनी बार मरा होगा. उसके बाद मोहिंदर जिस तरह से भागते हैं और भीड़ उनका पीछा करती है वह देखकर लगता है जैसे अगर भीड़ इनके ऊपर टूट पड़ी और ये घायल हो गए तो फिर अगले हाइलाइट्स में कौन जेफरी डुजों को बोल्ड करेगा और कौन मार्शल को आउट करेगा? जिस तरह से डुजों टिक गया था, वह तो अगली हाइलाइट्स में मैच जीत ले जाएगा और हमारा जीता हुआ एक मात्र वर्ल्डकप हमसे छिन जाएगा.

और फिर अब समय आ गया है कि हम भारतीय मोहिंदर की उमर का लिहाज करे और उन्हें बार-बार लगातार दौड़ने की जिम्मेदारी न दें. अब तो उनके लिए यही सही रहेगा कि वे किसी टीवी स्टूडियो में बैठकर अपनी बेसुरी आवाज़ में मैच के दिन "मेरा रंग दे बसंती चोला" की गुहार लगायें और पूरे भारत का मनोरंजन करें.

हे अधिनायक, अगर ध्यान से देखो तो लॉर्ड्स की बालकोनी पर वर्ल्डकप उठाये हुए कपिल देव फबते तो बहुत हैं लेकिन हर बार मुझे ये खटका लगा रहता है कि इतनी भीड़ में कहीं कोई वेस्टइंडियन धक्का-मुक्की करके उनके हाथ से कप लेकर भाग न ले. आजकल चूंकि राजा लोग़ किसी एक्सक्लूसिव जगह पर कप उठाकर जीतने वाले कैप्टन के हाथ में नहीं रखते इसलिए ये डर नहीं रहता कि कोई धक्का-मुक्की में कप लेकर निकल लेगा. आजकल तो बाकायदा मैदान के बीच में कप दिया जाता है जहाँ भीड़-भाड़ कम रहती है.

इसलिए हे अधिनायक, और किसी बात के लिए नहीं तो कम से १२१ करोड़ भारतीयों को पिछले इतने वर्षों की बोरियत से तो बचाओ. किसी को केवल ख़ुशी देना ही महान काम नहीं होता. मैं तो समझता हूँ कि उसे बोरियत से बचाना महानतम काम होता है और आज पूरा भारत तुमसे यह चाहता है कि तुम और तुम्हारी टीम उसे ख़ुशी तो दे ही साथ ही आनेवाले वर्षों में उसे बोरियत से भी बचाए. मेरा तो ऐसा मानना है कि हमारे पूर्व राष्ट्रपति ए पी ज़ी अब्दुल कलाम के ट्वेंटी-ट्वेंटी मिशन (क्रिकेट से मत जोड़ लेना इसे) को अचीव करने के लिए यह भी महत्वपूर्ण है कि पूरा भारत बोरियत से बचा रहे.

इसलिए हे अधिनायक, पूरे भारत की शुभकामनाएं तुम्हारे और तुम्हारी टीम के साथ हैं. कप जीतो हमें बोरियत से उबारो.

May God of cricket save us from this boriyat!!