Saturday, December 15, 2012

दुर्योधन की डायरी - पेज 1108

फिर से मीडिया में वही किचकिच, वही झिकझिक। अवन्ती की तीरंदाजी टीम हस्तिनापुर के दौरे पर जब से आई है, हमारी टीम के प्रदर्शन को देखते हुए मीडिया ने फिर से हाहाकार मचा रक्खा है। इसबार फिर से पितामह तीरंदाजी के अपने कौशल से प्रभावित नहीं कर सके। एक समय था जब वे एक तीर से सात पक्षियों को मार गिराते थे लेकिन इसबार तो केवल एक पक्षी को ही तीर लगा। और वह भी गिरा नहीं। उसने हवा में ही खुद को पार्क करके अपने हाथों से ही तीर खींचकर फेंक दिया। ये लगातार पांचवा वर्ष है जब पितामह लोगों की आशा के अनुरूप प्रदर्शन नहीं कर सके।

पिछले करीब दस वर्षों से मैं कह रहा हूँ कि अब समय आ गया है कि पितामह कम्पीटेटिव आर्चरी से संन्यास की घोषणा कर दें लेकिन वे हैं कि मानते ही नहीं। कहते हैं; "जब तक मैं तीरंदाजी एन्जॉय कर रहा हूँ मुझे प्रतियोगिता में हिस्सा लेने से न रोको वत्स, मुझे न रोको।"

मेरी समझ में आजतक यह नहीं आया कि जो तीरंदाज केवल एन्जॉय करने के लिए धनुष-वाण लिए प्रतियोगिता स्थल पर पधारेगा वह प्रदर्शन कैसे करेगा? उसकी सारी एनेर्जी तो एन्जॉय करने में लग जायेगी।

सात-आठ साल पहले से ही प्रतियोगिता में पितामह का निशाना चूकना शुरू हो चुका था। जब मीडिया ने उनके चुक जाने की बात शुरू की तो अगले ही साल उन्होंने काशी से आई तीरंदाजी टीम के खिलाफ एक तीर से आठ पक्षियों को मार गिराया। बस फिर क्या था, विशेषज्ञों और पत्रकारों को लगने लगा कि उन्हें उनका खोया हुआ टच मिल गया है। लेकिन अगले साल से फिर उनका प्रदर्शन फिर से लुढ़कने लगा। हाल यह है कि आठ की तो कौन कहे, एक तीर से तीन पक्षी भी नहीं गिरते अब।

कितनी बार कहा कि तीरंदाजी में उनके लिए अब कुछ भी साबित करने के लिए बचा नहीं है लेकिन वे सुनें तब तो। समझते ही नहीं कि वे अपना चरम पर प्रदर्शन कर चुके हैं और अब समय आ गया है कि वे तीरंदाजी से संन्यास लेकर घर बैठें। घर बैठें और अपनी बायोग्राफी लिखें। स्वयं लिखने का मन न हो तो किसी पत्रकार को किराए पर ले लें और उससे लिखवा लें। इन पत्रकारों को भी चार पैसे मिल जायेंगे। वैसे भी इन बेचारों को कोई पूछता नहीं। ये दिन-रात मेरा, जयद्रथ, मामाश्री, दुशाशन और पिताश्री के गुणगान करते रहते हैं। ऐसे में पितामह की बायोग्राफी लिखने का काम मिल जाएगा तो इन्हें भी चाटुकारिता करने से उपजी बोरियत से कुछ समय के लिए ही सही, छुटकारा तो मिलेगा। बोरियत से छुटकारा मिलेगा तो ये दोबारा दोगुने उत्साह के साथ नए-नए तरीके से हमारे गुण गायेंगे।

मुझे हमेशा से ही इसबात का पूरा विश्वास रहा है कि पितामह की बायोग्राफी की खूब डिमांड होगी और उन्हें कोई न कोई बड़ा प्रकाशक भी मिल ही जाएगा। मामाश्री ने तो यहाँ तक कहा कि कि प्रकाशक नहीं मिल रहे तो मैं खुद ही एक पब्लिशिंग हाउस खोल दूँ ताकि पितामह और चाचा विदुर जैसे लोग अपनी बायोग्राफी लिखने के लिए उत्साहित रहे और रोज-रोज राजकाज के कार्यों में दखल देना बंद करें। यह बात अलग है कि कर्ण के अनुसार बायोग्राफी में लिखने के लिए बचा ही क्या है? अभी तक पितामह के ऊपर दस से ज्यादा पुस्तकें पहले ही छप चुकी हैं।

न जाने कितनी बार मैंने उनसे कहा होगा लेकिन पितामह ठहरे पितामह। हर बार यह कहकर टाल देते हैं कि; "फॉर्म इज टेम्पोरैरी बट क्लास इज परमानेंट वत्स, क्लास इज परमानेंट।"

तीरंदाजी के एक्सपर्ट्स और पत्रकारों ने मिलकर तीन-चार ऐसे जुमले गढ़ डाले हैं कि उन्हें आगे रखकर पितामह बीस-पच्चीस वर्ष तक और प्रतियोगिताओं में भाग ले सकते हैं। ऊपर से बीच-बीच में कृपाचार्य और गुरु द्रोण इनकी तीरंदाजी प्रतिभा की बड़ाई कर देते हैं तो उन्हें और बहाना मिल जाता है। कई बार तो मुझे खुद लगता है कि आचार्यों की बात आगे रखकर अभी बहुत समय तक वे प्रतिस्पर्धात्मक तीरंदाजी में अपने करतब दिखा सकते हैं। लगता है जैसे इच्छा मृत्यु की तरह ही इच्छा तीरंदाजी का वरदान भी दबाकर बैठे हैं।

समझ में नहीं आता कि अब दिखाने के लिए क्या बचा है? कुछ साबित करने के लिए भी किसी न नहीं कहा। विश्व भर में तो अपने करतब दिखा चुके हैं। क्या काशी और क्या मथुरा, क्या गंधार और क्या विदर्भ, कोई ऐसी जगह नहीं बची है जहाँ लोगों को उन्होंने अपनी प्रतिभा के दर्शन नहीं करवाए। जब पहली बार मैंने तीरंदाजी से संन्यास लेने की तरफ इशारा किया तो बोले; "वत्स दुर्योधन, मैं तुम्हारी बात समझता हूँ लेकिन मुझे अपने उस वचन की रक्षा करनी है जो मैंने पिताश्री को दिया था वत्स, जो मैंने अपने पिताश्री को दिया था। मैं इस बात को कैसे भूल जाऊं कि राष्ट्र की सुरक्षा का तात्पर्य केवल बाहर के राजाओं से सुरक्षा नहीं है वत्स, केवल बाहर के राजाओं से सुरक्षा नहीं है। राष्ट्र की सुरक्षा का तात्पर्य अन्य देश के तीरंदाजों को प्रतियोगिता में पराजित करना भी है वत्स, पराजित करना भी है।"

आजतक समझ में नहीं आया कि क्षण भर में आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत लेने वाले पितामह के लिए तीरंदाजी से संन्यास लेना इतना कठिन क्यों है? कितनी बार तो परशुराम जी ने कहा कि वे खुद प्रतियोगिता में भाग न लेकर राजकुमारों और युवराजों को तीरंदाजी के गुर सिखाएं परन्तु पितामह टस से मस नहीं हुए। पिछली बार परशुराम जी जब हस्तिनापुर पधारे थे तब उन्होंने फिर से संन्यास की बात की तरफ इनका ध्यान इंगित करते हुए कहा था; "हे भीष्म, एक तीरंदाज को उस समय तीरंदाजी से संन्यास की घोषणा कर देनी चाहिए जब वह अपने चरम पर प्रदर्शन कर रहा हो। जब लोग यह प्रश्न करें कि ये संन्यास क्यों ले रहे हैं?"

पितामह का उत्तर था; "मैं आपकी भावनाओं को प्रणाम करते हुए अनुरोध करना चाहूँगा कि अपने चरम पर रहते हुए अगर मैंने तीरंदाजी को त्याग दिया तो पूरा विश्व कहेगा कि मैं स्वार्थी हूँ। और अगर मैंने ऐसा किया तो पिताश्री की आत्मा मुझे कभी क्षमा नहीं करेगी महर्षि, कभी क्षमा नहीं करेगी।"

अब इन्हें कौन समझाये कि चाहे हस्तिनापुर के सारे तीरंदाजों का प्रदर्शन घटिया हो परन्तु मीडिया इन्ही के बारे में बात करेगी। इन्ही का विरोध करेगी। देखा जाय तो मैंने या दुशासन ने भी अवंती के तीरंदाजों के साथ होने वाली प्रतियोगिता में कोई तीर नहीं मारा परन्तु सब इन्ही को भला-बुरा कह रहे हैं। सब इन्ही के पीछे पड़े हैं। जितने तरह के विशेषज्ञ उतनी बातें।

एक विशेषज्ञ कह रहे थे कि ; "किंचित ऐसा हो रहा है कि उम्र के इस पड़ाव पर जब पितामह धनुष-वाण से लैस प्रतियोगिता स्थल पर जाते हैं उस क्षण दर्शकों की तालियों से उनका ह्रदय भर आता है और भावनाएं उन्हें अपने बाहुपाश में ले लेती हैं जिससे पितामह अपना लक्ष्य भूल जाते हैं।"

अब इस विशेषज्ञ को कौन समझाये कि उनका यह प्रदर्शन तो है आखिर उम्र की वजह से। वर्षों से इन्हें देखने वाले और आदर देने वाले दर्शक अपनी भावनाओं का प्रदर्शन तो करेंगे ही। इन्हें तो अपने लक्ष्य की तरफ देखना होगा। आखिर हाल यह हो गया है कि जिसने पूरे जीवन में धनुष-वाण को हाथ नहीं लगाया होगा वह भी कह रहा है कि पितामह तीरंदाजी भूल गए हैं। हर पान की दूकान पर, चाय की दूकान पर, हर हाट में, हर घाट पर, सब इन्ही के बारे में बात कर रहे हैं। लोग ऐसी बात करते हैं कि मुझे तक शर्म आ रही है।

एक और विशेषज्ञ का कहना है कि ; "पितामह का ध्यान अब तीरंदाजी से हटकर तमाम और विषयों पर चला गया है। अब तो राजमहल ने उन्हें उस कमिटी का अध्यक्ष भी बना दिया है जिसे हस्तिनापुर में न्याय प्रणाली की प्रक्रिया पर इन्क्वायरी करके एक रिपोर्ट देनी है। इसके पहले कम से कम ग्यारह कमिटियों पर वे थे ही। ऊपर से रोज-रोज इन्हें कुछ न कुछ करने बाहर जाना पड़ता है। कभी किसी विद्यालय में किसी डिपार्टमेंट का उदघाटन करने तो कभी कहीं और।"

मामाश्री का कहना है कि अब समय आ गया है कि आचार्य द्रोण, कृपाचार्य वगैरह इनसे बात करें। हो सकता है कल दरबार में इस विषय में कुछ बात हो।

11 comments:

  1. उत्‍तम ही नहीं अतिउत्‍तम। पितामह को कौन समझाए?

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  2. पितामह अभी और खेलेंगे :) :) :)

    हा हा हा हा...मस्त है सर :)

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  3. एक दिन पितामह तानों से अपमानित हो कर सन्यास लेंगे. तब तक संजय से लक्ष्य पूछ पूछ कर तीर चलाएंगे, क्योंकि खुद की आँखे कमजोर हो गई है. मगर सन्यास नहीं लेंगे.

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  4. कल ही आप को याद दिलाने वाला था नई पोस्ट के लिए ...और ये पोस्ट हाज़िर ...
    काश ये पोस्ट विनोद काम्बली के सन्यास लेने के पहले लिखी होती, कुछ दिन और
    खेलते :)

    वर्तमान पीढ़ी आप के पोस्ट से जरुर प्रेरणा लेगी इसी उम्मीद के साथ
    प्रणाम : गिरीश

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  5. अगर पितामह ने आपके व्यंगवाण सुन लिए तो जल्द ही सन्यास पक्का मानिये| क्या खूब लिखा है!

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  6. आचार्य की जय हो।

    आचार्य जी लगता है तीरांदाजी को एन्जॉय करके ही छोड़ेंगे। आचार्य का तीरंदाजी से लगाव अद्भुत है।

    दुर्योधन सरीखे जागरुक लेखक न होते तो भला हमको आचार्य के इस प्रेम के बारे में कैसे पता चलता। जय हो।

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  7. दुर्योधन सब पहले ही देख चुके हैं, उन्हें अब डेजा वू हो रहा होगा।

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  8. Pitamah ko Hastinapur Ratna ke Pashchimottayan hone ka intezar hoga shayad

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  9. "हे भीष्म, एक तीरंदाज को उस समय तीरंदाजी से संन्यास की घोषणा कर देनी चाहिए जब वह अपने चरम पर प्रदर्शन कर रहा हो। जब लोग यह प्रश्न करें कि ये संन्यास क्यों ले रहे हैं?"

    आदि काल से चली आ रही इस बात पर अमल करना महान लोगों द्वारा हमेशा से ही दुविधा पूर्ण रहा है,,,पितामह के लिए भी ये निर्णय लेना कठिन रहा होगा,,,तभी इतना समय लगा दिया,,,
    आप लकी एक तीर से दो शिकार करने की आदत पता नहीं कब जाएगी,,,लोगों को लपेट लपेट के मारने की कला में आप सा पारंगत व्यक्ति हमने इस धरा पर नहीं देखा,,,जय हो।

    नीरज

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  10. हर जमाने की बात है। खेल ही नहीं हर जगह :) एक शाश्वत सत्य है।

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टिप्पणी के लिये अग्रिम धन्यवाद। --- शिवकुमार मिश्र-ज्ञानदत्त पाण्डेय