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Wednesday, July 11, 2012

अंडर-अचीवर प्रधानमंत्री और ओवर-अचीवर यन्त्र.




न्यूयार्क से प्रकाशित होनेवाली टाइम पत्रिका ने हमारे प्रधानमंत्री को अंडर-अचीवर करार दे दिया. वैसे अगर शायरों और गीतकारों की मानें तो करार देना कोई बुरी बात नहीं. याद कीजिये पुरानी फिल्मों में जब नायिका तमाम बहाने बनाकर नायक से मिलने आती थी और उसे लता मंगेशकर जी की आवाज़ में बताती कि; "मैं तुमसे मिलने आई मंदिर जाने के बहाने.." तो नायक के दिल को करार मिल जाता था और वह भी फट से रफ़ी साहब या किशोर कुमार जी की आवाज़ में नायिका को बता देता था कि; "तुम मुझसे जो मिलने आई सनम, मेरे दिल को करार आया..."

लगता है विषयांतर हो गया. पोस्ट २०१० के ब्लॉगर की यही त्रासदी है. वह कहीं से भी चलता है, बालीवुड पहुँच जाता है. ठीक वैसे ही जैसे पुरानी फिल्मों में कोई भी भारत के किसी भी कोने से भागता तो मुंबई जाने वाली गाड़ी में ही बैठता था और अगले शॉट में वह वीटी स्टेशन से बाहर निकलते हुए बरामद होता था.

आप इसे बालीवुडिश हैंग-ओवर कह सकते हैं.

खैर, मैं बता रहा था कि टाइम पत्रिका ने हमारे प्रधानमंत्री को अंडर-अचीवर करार दे दिया. लेकिन यह वाला करार शायद वह वाले करार जितना मज़ेदार नहीं था. लिहाजा इसपर तमाम लोग़ बेक़रार हो गए. टीवी न्यूज चैनल समेट पूरे भारतवर्ष को बहस का एक नया मुद्दा मिला. कुछ विद्वानों ने याद दिलाया कि हम अभी भी विदेशी मानसिकता के शिकार हैं और जब कोई विदेशी कुछ कहता है तभी उसे सच मानते हैं. इन विद्वानों ने यह भी बताया कि; "टाइम पत्रिका ने तो प्रधानमंत्री को आज अंडर-अचीवर बताया है, हम तो उन्हें पहले ही अंडर-अचीवर करार दे चुके हैं."

काफी टीवी पैनल डिस्कशन हो चुके हैं. कुछ पाइप-लाइन में भी होंगे. तमाम विद्वान इस मुद्दे पर टीवी स्टूडियो में बोलने के लिए नई टाई खरीद रहे होंगे. कुछ अपनी विट को धो-मांज रहे होंगे. तैयारी जोरों पर होगी. सरकार के कुछ योद्धा यह भी देख रहे होंगे कि टाइम पत्रिका का भारत में क्या-क्या है और उसे कौन-कौन से डिपार्टमेंट से नोटिस भेजी जा सकती है? कुछ अति उत्साही योद्धा यह भी सोच सोच सकते हैं - क्या पत्रिका का पिछले ५-६ साल का इनकमटैक्स असेसमेंट री-ओपन किया जा सकता है? मनीष तिवारी जी जैसे प्रवक्ता सरकार और प्रधानमंत्री के बचाव के लिए पुरानी टाइम पत्रिका की कॉपी खोज रहे होंगे जिसमें पत्रिका ने अटल बिहारी बाजपेयी या अडवाणी की बुराई की होगी.

ऐसे में यह जानने के लिए कि और तमाम विद्वानों का इस मुद्दे पर क्या मत है, चंदू चौरसिया ने दिल्ली और कई शहरों में जाकर लोगों की राय इकठ्ठा की. पेश है उनमें से कुछ वक्तव्य;

लालू प्रसाद जी; "इसमें का राय जानना चाहता है तुम? ...आ सुनो पहिले.. बीच में मत बोलो. आ ई जो प्रधानमंत्री को ई लोग़ बताया है...का बताया है? अंडर? का? टेकर? अंडरटेकर?..अंडरअचीभर? अच्छा...अरे वोही अंडरअचीभर. देखो ई कुछ खराब नहीं है. एकदम्मे कुछ नहीं अचीभ करने से बढ़िया है अंडरअचीभ करना. आ देखो सरकार चलाने का मतलब ई नहीं होता कि कुछ अचीभ करना ही है. देखो प्रधानमंत्री हैं बिदबान... बूझो की डिग्री है उनके पास, उनका ईज़त पूरा दुनियाँ में है...सो जब जो चाहेंगे ऊ अचीभ कर लेंगे..जल्दी कौन बात का है? ... आ सबसे बड़ा बात है कि सेकुलर हैं..प्रधानमंत्री जे हैं से सेकुलर आदमी हैं. आ देश को सेकुलर आदमी का ज़रुरत पहिले है अचीभर का बाद में. सेकुलर लोग़ सत्ता में नहीं रहेगा तो फ्रिकाप्रस्त लोग़ राज करने लगेगा... आ फिर सोनिया जी भी हैं साथ में... जो चीज परधानमंत्री नहीं अचीभ कर पाए ऊ सोनिया जी अचीभ कर लेंगी... बैलेंस हो जाएगा न. केतना टाइम लगता है कुछ अचीभ करने में? आ हामी को देखो, रेलमंत्री थे तब केतना कुछ अचीभ कर लिए थे.. त हमारा कहना एही है ई पत्रिका फत्रिका का कहता है उसपर मत जाओ...ई सब सच नहीं बोलता...देखो न, हम रेलमंत्री होकर एतना कुछ अचीभ किये, हमरा लिए त नहीं लिखा कि हम ओभर-अचीभर हैं. ज़रूरी बात है कि सेकुलर हाथ में देश का बागडोर है."

मनीष तिवारी; "मेरा यह कहना है कि विदेशी पत्रिकाओं की बात को हमें तभी सच मानना चाहिए जब वे हमारी सरकार की प्रशंसा करें. हमारा यह मानना है कि जब ये पत्रिकाएँ आलोचना करती हैं तब ये झूठ बोल रही होती हैं. यह हमारी पार्टी का ऑफीशियल स्टैंड है जिसे भारत के हर नागरिक का समर्थन है. हमारी पार्टी अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गाँधी जी के नेतृत्व में सरकार ने बहुत कुछ अचीव किया है जिसे टाइम पत्रिका ने तवज्जो ही नहीं दी. उन्ही के नेतृत्व में ही मनरेगा जैसा प्लान चलाकर सरकार ने कितना अचीव किया है सबके सामने है. एक प्लान चलाकर हमने देश को गड्ढों से भर दिया, वह तो टाइम को दिखाई नहीं देता. और फिर अंडर-अचीवर की बात पर मैं टाइम के एडिटर से पूछता हूँ कि रिचर्ड बाबुराव स्टेंजेल, तुम्हें क्या हक है कि तुम दूसरों को अंडर-अचीवर कहो? तुम खुद सर से पाँव तक अंडर-अचीवमेंट में डूबे हुए हो. मैं केवल इतना जानना चाहता हूँ कि भारत जैसे बड़े देश में टाइम की कितनी कॉपी बेंचते हो तुम? टाइम को कितने भारतीय जानते हैं? ऐसे में अंडर-अचीवर कौन हुआ, तुम कि डॉक्टर मनमोहन सिंह?...क्या कहा? एडिटर के नाम में बाबुराव नहीं है? अच्छा मैं गूगल करके पता करता हूँ कि एडिटर के फादर का क्या नाम है?"

प्रधानमंत्री; "मैं ग़ालिब को कोट करना चाहूँगा और टाइम मैगेजीन से यही कहूँगा कि; माना कि तेरी दीद के काबिल नहीं हैं हम, तू मेरा शौक तो देख, मेरा इंतज़ार तो देख."

अन्ना जी; "देखो लोकशाही है..लोकशाही में कोई किसी को कुछ भी कह सकता है. पंथ-प्रधान को भी कुछ भी कह सकता है. आज अगर सरकार जनलोकपाल बिल पारित कर देती तो जनलोकपाल इस मामले की जांच कर के बता सकता था कि पंथ-प्रधान अंडर-अचीवर है या नहीं? और एक बार ये बात गलत साबित हो जाती तो फिर हम टाइम पत्रिका की आफिस के सामने अनशन कर देते. पत्रिका से पूछते कि उसने हमारे पंथ-प्रधान को ऐसा कैसे कहा?"

हिंदी रक्षक प्रोफ़ेसर मनराज किशोर; "पहले तो मुझे इस बात का जवाब चाहिए कि टाइम नामक पत्रिका का कोई हिंदी संस्करण भी है क्या? अगर नहीं है तो क्या अधिकार है इस पत्रिका को उस देश के प्रधानमंत्री को अंडर-अचीवर बताये जिसमें अस्सी करोड़ से ज्यादा लोग़ हिंदी बोलते हैं? क्या टाइम के सम्पादक यह बता सकते हैं कि अंडर-अचीवर शब्द के लिए हिंदी का कौन सा शब्द है? क्या उन्हें पता है? अगर नहीं तो उन्हें यह अधिकार नहीं है कि वे ऐसा कहें. जो पत्रिका का हिंदी संस्करण तक नहीं निकलता उस पत्रिका ने क्या कहा यह बात हमारे लिए जरा भी महत्वपूर्ण नहीं है."

दिग्विजय सिंह जी; "अभी मैं कुछ नहीं कहना चाहूँगा. फिलहाल मैं यह पता करने की कोशिश कर रहा हूँ कि टाइम मैगेजीन और आर एस एस के बीच क्या सम्बन्ध हैं? कल मुझे अजीज बरनी ने बताया है कि प्रधानमंत्री को अंडर-अचीवर बताने में आर एस एस का हाथ है. एकबार मैं यह कन्फर्म कर लूँ फिर मैंने प्रेस कान्फरेन्स करके बताऊंगा कि असल मामला क्या है?"

अरनब गोस्वामी; "वेट फॉर अ डे ऐज आई ऍम ट्राइंग तो गेट लीजा कर्टिस अलांग विद कुमार केतकर, विनोद शर्मा, लॉर्ड मेघनाद देसाई एंड सुहेल सेट ऑन न्यूज-आवर. ओनली दे विल बी एबुल टू टेल हाउ करेक्ट इज टाइम्स असेसमेंट ऑफ आर प्राइममिनिस्टर. आई अस्योर यू एंड आल आर व्यूवर्स दैट आई विल पुट सम डायरेक्ट एंड टफ क्वेश्चंस टू दिस वेरी एमिनेंट पैनल."

येदुरप्पा जी; "आई डिक्लाइन टू कमेन्ट ऐज माई एस्ट्रोलॉजर हैज एडवाइज्ड मी टू नॉट स्पीक ऑन द इश्यू टिल ट्वेल्व थर्टी पीएम ऑफ फोरटेंथ जुलाई."

प्रनब मुख़र्जी जी; "ओलदो, आई हैभ स्टाप कोमेंटिंग ऑन पोलिटिकल मैटार्स बाट सीन्स इयु आर सेयिंग दैट ईट इज ए मैटोर रिलेटेड टू ओभरआल आचीभमेंट ईंक्लुडिंग इकोनोमी, आल आई हैभ टू से ईज, इभेन ऐन अचीभमेंट आफ एट पारसेंट आफ दा टोटल मैटोर ईज नाट बैड. सो, उइ शूड नाट फारगेट दैट दीस सो कोल्ड अंडरअचीभमेंट ईज ओल्सो ड्यू टू दा फैल्योर आफ दा यूरोपीयन इकोनोमी ओल्सो."

श्री कपिल सिबल; "ये तो देखिये इस पर एक बैलेंस व्यू लेने की ज़रुरत है. एक सरकार का लीडर क्या अचीव करता है उसको उसके बाकी मंत्रियों के अचीवमेंट के साथ देखना होगा. अगर आप यह कहते हैं कि प्रधानमंत्री जी अंडरअचीवर हैं तो वहीँ पर मेरे जैसे मंत्री भी हैं जो ओवर-अचीवर हैं. ऐसे में टाइम मैगेजीन को यह भी देखने की ज़रुरत है कि कुल मिलाकर मामला बैलेंस हो जाता है. और फिर टाइम के इस कमेन्ट को सीरियसली लेने की ज़रुरत नहीं है. जब हमारे पास अचीवमेंट और ओवर-अचीवमेंट हैं, तो फिर हम अंडर-अचीवमेंट की बात क्यों करें? वैसे भी टाइम के इस असेसमेंट का इम्पैक्ट इलेक्शंस में जीरो रहने वाला है और जिस बात का इम्पैक्ट इलेक्शन में जीरो है उसको सीरियसली वैसे भी नहीं लेना चाहिए."

श्री चन्दन सिंह हाटी, मैनेजर हिमालय रुद्राक्ष प्रतिष्ठान; "क्या आप अंडर-अचीवर कहे जाने से परेशान रहते हैं? क्या आप अंडर-अचीवर कहे जाने से दुखी रहते हैं? क्या आप ओवर-अचीव करते हैं और फिर भी लोग़ आपको अंडर-अचीवर कहते हैं? क्या इसकी वजह से आपका दिन का चैन और रात की नींद गायब हो जाती है? तो फिर खुश हो जाइए क्योंकि हिमालय रुद्राक्ष प्रतिष्ठान पहली बार लेकर आया है ओवर-अचीवर यन्त्र. जी हाँ, यह ओवर-अचीवर यन्त्र वैदिक मन्त्रों के जाप और उनकी शक्ति से परिपूर्ण है. आपको ओवर-अचीवर कहलाने के लिए अब मेहनत करने की जरूरत नहीं है. आपको बस यह यन्त्र हमारे द्वारा बताये गए विधि के अनुसार अपने कार्यालय में पूजा के बाद लगा लेना है. फिर देखिएगा कि दुनियाँ कैसे आपको न सिर्फ ओवर-अचीवर मानने लगेगी बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर की पत्र-पत्रिकाएँ आपकी तस्वीर कवर-पेज पर छापकर नीचे बड़े-बड़े अक्षरों में लिखकर आपको ओवर-अचीवर बतायेंगी. जी हाँ, भारतवर्ष में पहली बार....."

अभी तो इतने ही महान लोगों के वक्तव्य से काम चलिए. पब्लिक डिमांड पर और लोगों के वकतव्य छाप दिए जायेंगे:-)

Monday, March 19, 2012

बजट २०१२ - कुछ अन-ऑफिशियल रिएक्शन...




बजटोत्सव आया. पूरे देश में लोगों ने अपने-अपने बजटोत्सव धर्म का पालन किया. मीडिया ने उसे को सबसे बड़ा इवेंट बनाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी. मैंने मीडिया की इस उपलब्धि पर उसे बधाई दी. ये अलग बात है कि ज्यादातर मीडिया वाले आजकल बधाई-वधाई में इंटरेस्ट नहीं दिखाते. उन्हें प्रिंसिपल की ज्यादा फिक्र रहती है. बजट लोकसभा में प्रस्तुत होता है लिहाजा लोकसभा स्पीकर ने सांसदों को बैठ जाने के लिए कहा. सांसद उनका कहना मानते हुए बैठे. वित्तमंत्री श्री प्रनब मुख़र्जी ने बजट पढ़ा. बजट पाठन कार्यक्रम के दौरान सांसदों ने प्रैक्टिसानुसार मेजें थपथपाई. कुछ सांसदों ने हो-हो का शोर मचाया. हमेशा की तरह ही प्रधानमंत्री डॉक्टर सिंह ने संसद में शिला-धर्म का पालन किया.

वित्तमंत्री ने इस बार कविता नहीं पढ़ी. बजट के साथ कविता फ्री न मिले तो बड़ा अजीब सा लगता है. मेरे ख़याल से बिना कविता के बजट अधूरा रहता है. मैंने तो आजतक वित्त और रेलमंत्रियों को बिना कविता वाला बजट पढ़ते हुए नहीं देखा. देखा जाय तो कुछ मौके ऐसे भी आये जब लगा कि वित्तमंत्री हमें कविता के साथ बजट फ्री में दे गए. लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ. वित्तमंत्री शायद पिछले कई महीनों से बिजी थे इसलिए बजट के लिए कविता की खोज नहीं हो सकी. १९९१ के बाद विपक्षी पार्टियों ने हमारे वित्तमंत्रियों पर हमेशा पश्चिमी देशों का अजेंडा लागू करने का आरोप लगाया है. शायद इसीलिए इस बार वित्तमंत्री ने भारतीय कवियों की कवितायें नहीं कोट की और सीधा शेक्सपीयर को कोट किया. बोले; "आई मास्ट बी क्रूएल, ओनोली टू बी काइंड."

अपने वादे के मुताबिक़ वे किसी के साथ क्रुएल तो किसी के साथ काइंड. किसी-किसी के साथ तो क्रुएल और काइंड दोनों हुए. उनके बजट प्रपोजल सुनकर एक स्टॉक ट्रेडर बोला; "हम बहुत लकी हैं कि वित्तमंत्री हमारे साथ क्रुएल और काइंड दोनों रहे. सर्विस टैक्स का रेट बढ़ाकर क्रुएल हुए ही थे कि फट से एसटीटी का रेट घटाकर काइंड हो लिए."

आखिर में हमें एक अदद बजट की प्राप्ति हो ही गई.

उसके बाद बजट की रेटिंग हुई. मजाक हुआ. टीवी पैनल डिस्कशन हुए. टीवी स्क्रीन पर घरेलू और इम्पोर्टेड दोनों तरह के विशेषज्ञों के दर्शन हुए. अरनब गोस्वामी की मानें तो हाल ही में हुए चुनावों में उनका चैनल (वैसे कुछ लोग़ उसे अदालत कहते हैं) टाइम्स नाऊ विजयी रहा था. अभी तक यह नहीं पता चल सका है कि बजट में किसकी विजय हुई? खैर, आपने तमाम लोगों के वक्तव्य सुने और देखे. लेकिन मुझे लगता है कि टीवी स्टूडियो में बजट के ऊपर जो रिएक्शन दिखाई देता है वह उतने महत्वपूर्ण नहीं हैं जो वे रिएक्शन हैं जो प्राइवेटली दिए जाते हैं. इसीलिए हमारे ब्लॉग पत्रकार चंदू चौरसिया ने पिछले ३ दिनों तक देश भर की यात्रा की और बजट पर तमाम लोगों के रिएक्शन इकठ्ठा किये. आप बांचिये.

वित्तमंत्री प्रनब मुखर्जी: "लूक, दीस इज हाऊ ईट भार्क्स. नो-बोडी ईज एभर आबसोलुटाली सैटिस्फाइड उविथ दा बाजेट. आई मास्ट रिमाइंड इयु दैट उइ हैभ लिमिटेड मैंडेट. सो उइ उविल हैभ टू टेक आभार एलाइज इनटू कोंफ़िडेंस. सो, उइ डीड नोट टाक एबाऊट मेजोर रिफोर्म्स. बाट लेट मी टेल इयु दैट ओन दा मैटर आफ फिस्कोल डेफिसिट उइ उविल डू सामथिंग आउट साइड ओफ दा बाजेट. पीपुऊल उवांटेड मी टू बाईट दा बुलेट बाट दे मास्ट टेक माई एज ऐंड माई टीथ ईन टू कोंसीडारेशोंन."

प्रधानमंत्री: "वी हैव द नम्बर्स. जो बजट श्री प्रनब मुख़र्जी ने प्रस्तुत किया है वह न सिर्फ ग्रोथ को बढ़ाएगा बल्कि वह देश को नई दिशा देगा. वी हैव द नम्बर्स. जब भी जरूरत पड़ेगी हम संसद में नम्बर्स प्रूव करेंगे. हमारे पास नम्बर्स हमेशा रहे. आपको याद हो तो अभी एक साल पहले तक हमारे पास आठ परसेंट था. जो कि एक बड़ा सेक्रेड नम्बर था. उसके पहले जुलाई २००८ में हमारे पास २७२ की संख्या थी, जो अपने आप में सबसे बड़ा डेमोक्रेटिक नंबर है. तो मैं यही कहना चाहूँगा कि हमारे पास नम्बर्स है. आप लगे हाथों यह भी बताता चलूं कि हमारे पास सी बी आई भी है."

मायावती जी: "यह बजट देश के गरीब और दलित वर्ग के खिलाफ है. हमने सोचा था कि नोटों का हार बनाने वालों के लिए इस बजट में ऋण माफी योजना की घोषणा की जायेगी प्रंतू ऐसा नहीं हुआ. न ही केंद्र सरकार ने पत्थर की मूर्तियाँ बनानेवालों को आयकर की सीमा में कोई छूट दी. मैंने अपने सुझाव में कहा था कि जैसे अभियान चलाकर शेरो और बाघों की रक्षा की जा रही है वैसे ही एक अभियान चलाकर हाथियों की रक्षा की जानी चाहिए. मैंने सोचा था कि वित्तमंत्री इसी बजट में "बाबा साहेब अम्बेदकर हाथी रक्षा अभियान" की घोषणा करेंगे लेकिन वह भी नहीं हुआ. यह बजट दलित विरोधी है. इसलिए बहुजन समाज इसका विरोध करता हैं."

ममता जी: "जोब रेल बाजेट हुआ तोभी हामको लगा कि जोनोराल बाजेट भी खाराब होगा. होमारा पाटी पार्लामेंट में जैसा रेल बाजेट का बिरोधिता किया ओइसा ही एहि बाजेट का भी करेगा. देखो, हाम कोमोन मैन का बात कारता है. गोरीब, मोज्दूर, पूअरेस्ट ओफ दा पुआर का बात कारता है. इस बाजेट में उसका लिए कुछ भी नेही है? होम डीमांड किया था कि सोरकार को आर्ट औउर काल्चर को प्रोमोट करना है. उसका बास्ते सोरकार ऊ सब लोगों को इन्काम टैक्स में छूट देना चाहिए जो नेता लोगों का पेंटिंग्स ख़रीद करता है वो भी इसी सोरकार ने नेही किया. हाम ए भी डीमांड किया था कि ह्वाईट और ब्लू पेंट पार सोरकार एक्साइज ड्यूटी कोम करे. वो भी नेही हुआ. अपना साथी दोल का साथ सोरकार ऐसा करेगा तो फीर तो मुश्कील है. होम दिल्ली जा रहा है. वित्तमोंत्री से एक बार फीर बात करेगा."

राम जेठमलानी, कानूनविद : "उच्चतम न्यायालय के लिए सरकार और उसके मंत्रियों के मन में कोई आदर नहीं रहा. वोडाफ़ोन केस में उच्चतम न्यायालय के निर्णय को सरकार ने एक नियम लाकर निरस्त्र कर दिया. ऊपर से वित्तमंत्री कहते हैं कि वोडाफोन जैसे केस पर आयकर लगाने के लिए लाया गया कानून १९६१ से लागू होगा और यह माना जाएगा कि सरकार इस तरह का आयकर १९६१ से लगाना चाहती है. अगर ऐसा ही है तो हम मांग करते हैं कि आज़ादी के बाद पाकिस्तान को दिए गए ७५ करोड़ रूपये को भी रेट्रोस्पेक्टिव इफेक्ट से देखा जाय और सरकार उसपर पाकिस्तान से टी डी एस का पैसा वापस ले. ब्याज के साथ. हम बाबा रामदेव से कहेंगे कि वे इस मुद्दे को लेकर आन्दोलन करें."

बी एस येदुइराप्पा : "बजट अच्छा नहीं है. सरकार को चाहिए था कि बजट में ऐसा प्रावधान करती जिससे प्राइवेट ट्रस्ट को मिलने वाले कंट्रीब्यूशन पर इनकम टैक्स डिपार्टमेंट कोई जांच न कर सके. और यह प्रावधान भी लाना चाहिए था कि प्राइवेट ट्रस्ट को खाता-बही रखने की ज़रुरत नहीं हो. दूसरा जो सबसे महत्वपूर्ण बात है वह है कि सरकार ऐसे रेसोर्ट और होटल को टैक्स में छूट दे जो असंतुष्ट विधायकों को अपने रेसोर्ट में रहने और ज़रुरत पड़ने पर छिपने में सहायता करते हैं. कम से कम फिनांस मिनिस्टर ये तो कर ही सकते थे कि क्राइसिस के समय असंतुष्ट विधायकों से होने वाले आय पर दस साल के लिए छूट दे. नए रेसोर्ट खुलने पर उन्हें सर्विस टैक्स होलीडे भी दिया जा सकता था. आई कम्प्लीटली अपोज दिस बजट."

रॉबर्ट वाडरा : "ऑफिसियली तो नहीं बट अन-ऑफिसियली मैं इस बजट से खुश नहीं हूँ. इसमें प्रोस्पेक्टिव पॉलीटिशियन के लिए कुछ है ही नहीं. आज पोलिटिक्स में अच्छे लोगों की ज़रुरत है. इसीलिए मैं खुद पोलिटिक्स में आना चाहता हूँ. ऐसे में सरकार की ड्यूटी है कि वह नए पॉलीटिशियन को एनकरेज करने के लिए कुछ छूट वगैरह दे. जैसे सरकार यह कर सकती है कि अगर कोई पोलिटिक्स ज्वाइन करता है तो उसे दस सालों तक इनकम टैक्स का रिटर्न फ़ाइल करने की ज़रुरत ही न हो. फिनांस मिनिस्टर एक काम और कर सकते थे. अगर कोई अपनी वाइफ के साथ पोलिटिक्स में आना चाहे तो उसे २० साल तक इनकम टैक्स रिटर्न फ़ाइल करने की ज़रुरत न रहे. अगर ऐसा हुआ तो अच्छे हसबंड-वाइफ एक साथ पोलिटिक्स ज्वाइन करेंगे और फिर इस देश का भला होने से कोई रोक नहीं पायेगा."

रंजना कुमारी, डायरेक्टर ऑफ द सेंटर फॉर सोशल रिसर्च: "देश को आज़ाद हुए पैंसठ बरस हो गए लेकिन आज भी बजट आम आदमी के लिए ही बनता है. मुझे आश्चर्य होता है कि जिस कोलीशन की चेयर-परसन एक महिला हो वह कोलीशन कम से कम अपना बजट तो आम औरत के लिए बना सकता है. ऐसी तरक्की किस काम की जो आज़ादी के पैंसठ साल बाद भी आम औरत के लिए बजट न बनवा सके. मेरा विरोध इसी मुद्दे पर है. बाकी बातें बजट में ठीक है."

राहुल गाँधी: "हमने तय किया था कि इस बजट में हम उन गाँव वालों को मेहमान भत्ता देने का प्रावधान लायेंगे जिनके यहाँ मैंने खाना खाया और पानी पीया था लेकिन यूपी में चुनाव नहीं जीत पाने से हमने वह प्रोग्राम ड्रॉप कर दिया. हाँ, मैं ऐसा मानता हूँ कि वित्तमंत्री उन एडवरटाइजिंग एजेंसियों के लिए कुछ टैक्स होलीडे की घोषणा कर सकते थे जो नेताओं की इमेज बिल्डिंग का काम करती हैं. खैर, हम अमेंडमेंट लाकर भी ऐसा कर सकते हैं. और हम चाहेंगे कि बजट सेशन में हि ऐसा हो."

मनोहर भइया कांग्रेसी: "प्रनब दा ने शानदार बजट दिया है. वे हमारे सचिन तेंदुलकर हैं. आई टेल यू, दिस बजट विल फुएल ग्रोथ टिल वी रन आइदर आउट ऑफ फुएल ऑर आउट ऑफ बजट."

बप्पी लाहिरी: "सुना है बाजेट का बजह से सोना आब कॉस्टली हो जाएगा. ऐसा हुआ तो हमारा नेटवर्थ बाढ़ जाएगा. हाम अपना इश्टाइल में प्रानब दा के लिए कुछ कहेगा कि प्रानब दा आआआआ, वी लाभ यू.

मुलायम सिंह जी; "बजट जो है वो हमें नई देखा. केंद सअकार से आशा ही कि अखियेश के औजवानों को दिए आने वाले भत्ता घोषणा में कुछ जो है वो सहायता कएगी. लेकिन पनब दा ने कुछ किया ही नई. ये सअकार अपसंखक, गईब, केसान के लिए काम ही नई कअती. हम तो आहते थे कि यूपी में जो बाहुबई सब मंती बने हैं, उनको बाहुबई भत्ता मिलता तो ठीक रअता."

सीताराम बजरंगी, दूधवाले; "हम सरकार को धन्यवाद देते हैं जो यूरिया क दाम घटाए हैं. यूरिया से दूध तैयार करने में लागत बढ़ गया था. प्राफिट मार्जिन कम हो गया था. अब एही डिमांड है कि जैसे यूरिया क दाम घटायें हैं ओइसे ही डिटर्जेंट और बाकी केमिकल क दाम भी घटा दें त ठीक रहेगा. बड़ा राहत मिला है यूरिया का दाम घटने से. हम तो कहते हैं कि वित्तमंत्री राजी हों त हमसब मिलि के उनका सार्वजनिक अभिनन्दन कर दें."

लॉर्ड इन्द्रजीत देसाई, लन्दन वाले ; "यूरिया प्रोड्यूस करने वाली मशीन पर कस्टम्स ड्यूटी कम करने से फार्मर्स क इनकम बढ़ेगा. अब फार्मर्स के बेटर डेज आयेंगे. ये फिनांस मिनिस्टर ने ठीक ही किया. कभी-कभी फार्मर्स के बारे में भी सोचना चाहिए और उसका भी इनकम बढ़ाना चाहिए."

श्री पी चिदंबरम: "आई थैंक, फिनांस मिनिस्टर फॉर नॉट रेजिंग एक्साइज ड्यूटी ऑन चेविंग गम्स एंड बगिंग इक्विपमेंट. दिस विल गो अ लॉन्ग वे टू एनकरेज बगिंग..."

सुब्रमनियम स्वामी; "मैं किसी भी मुद्दे पर अपने विचार ट्वीट करके व्यक्त करता हूँ. बजट पर मेरे रिएक्शन के लिए ट्विटर पर मेरी टाइम-लाइन देखें."

Saturday, October 22, 2011

युग-युग में रा-वन




त्रेता युग

जामवंत जी ने हनुमान जी को याद दिलाया कि वे उड़ सकते हैं. बड़े-बुजुर्ग हमेशा से परोपकारी रहे हैं. उन्हें तो बस परोपकार करने का मौका चाहिए. वे कभी पीछे नहीं हटेंगे. दरअसल एक उम्र पर पहुंचकर उन्हें इसके अलावा कुछ और करना न तो आता है और न ही भाता है. जामवंत जी भी इसके अपवाद नहीं थे. हनुमान जी ने जामवंत जी को थैंक्स कहा और श्रीलंका की उड़ान भर ली. बैकग्राऊंड से रवींद्र जैन अपनी सुरीली आवाज़ में गाये जा रहे हैं; "राममन्त्र के पंख लगाकर हनुमत भरे उड़ान...हनुमत भरे उड़ान."

उधर हनुमान जी अपने दोनों पाँव ठीक वैसे ही ऊपर-नीचे करते उड़े जा रहे हैं जैसे पलंग पर पेट के बल लेटा डेढ़ साल का बच्चा अपने पाँव ऊपर-नीचे करता है. देखकर कोई भी बता सकता है कि वे इस समय ज्यादा ऊपर नहीं उड़ रहे हैं क्योंकि मौसम सुहाना है. बादल ऊंचाई पर हैं. रास्ता साफ़ है. दूर-दूर तक सबकुछ दिखाई दे रहा है. लिहाज़ा सामने से आते किसी राक्षस या वायुयान से टकराने की सम्भावना नगण्य है. सूर्य भगवान का पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम स्ट्रॉंग है इसलिए वे अपनी रोशनी पूरे संसार को बांटे जा रहे हैं. हिंद महासागर नीचे अविरल बहता जा रहा है.

हनुमान जी एकाग्र-चित्त उड़े जा रहे है. ठीक वैसे ही जैसे राहुल द्रविड़ पिच पर एकाग्र-चित्त होकर ऑफ स्टंप से बाहर जानेवाली गेंदों को बिना किसी छेड़-छाड़ के छोड़ दिया करते हैं. देखकर ही लग रहा है कि उन्हें उड़ने में बहुत मज़ा आ रहा है. वे किसी बच्चे की सी मुखमुद्रा लिए आनंदित दिखाई दे रहे हैं. अचानक देखते क्या हैं कि समुद्र में से सामने एक विशालकाय महिला उभरी. उसने बड़ा वीभत्स मेक-अप किया है. बड़े-बड़े बाल, माथे पर बहुत बड़ी बिंदी, मुँह के दोनों कोनों पर बड़े-बड़े तिरछे दांत और बड़ी गाढ़ी होठ-लाली से लैस यह महिला हनुमान जी के रास्ते में मुँह बाए खड़ी हो गई. उसे देख हनुमान जी ने खुद को उसके मुँह के आगे हवा में ही पार्क कर लिया. वह महिला जोर-जोर से हा हा हा करके हँसी. उसकी हँसी उसके मेक-अप से मेल खा रही है.

हनुमान जी ने उसे प्रश्नवाचक मुद्रा में देखा. उस महिला को लगा कि अब समय आ गया है कि वह अपना परिचय दे. उसने कहा; "मैं सुरसा हूँ. हा हा हा हा हा."

उसकी हँसी सुनकर कोई भी कह सकता है कि शायद उसे सुरसा होने पर बड़ा गर्व है. वैसे यह भी कह सकता है कि जैसे हनुमान जी उड़ना एन्जॉय करते हैं वैसे ही सुरसा हँसना एन्जॉय करती है. उसकी हँसी सुनकर हनुमान जी ने कहा; "वह तो ठीक है लेकिन आप इतना हँस क्यों रही हैं?"

सुरसा बोली; "हँसी ही मेरी पहचान है. मैं जब तक नहीं हँसती लोग़ मुझे राक्षसी समझते ही नहीं. अब तुम्ही सोचो कि अगर मैं हँसना बंद कर दूँ तो कौन मुझे सीरियसली लेगा?"

उसकी बात शायद हनुमान जी की समझ में आ गई इसीलिए उन्होंने उसकी हँसी की बाबत और कोई सवाल नहीं किया. आगे बोले; "लेकिन मुझसे क्या चाहती हो?"

वो बोली; "आज देवताओं ने तुम्हें मेरा आहार बनाकर भेजा है. आशा है मेरी बात तुम्हारी समझ में आ गई होगी. नहीं आई हो तो फिर मैं काव्य में सुनाऊं कि; आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा..."

उसकी बात सुनकर हनुमान जी डर गए. उन्होंने सोचा जल्दी से हाँ कर दें नहीं तो कहीं ऐसा न हो कि यह अपनी बात काव्य में सुनाना शुरू करे तो साथ में आगे-पीछे की दस-पंद्रह चौपाई और सुना दे. आखिर उन्हें भी पता है कि कविता सुनाने वाला अगर सुनाने के मोड में आ जाए तो फिर सामनेवाले के ऊपर विपत्ति का पहाड़ टूट पड़ता है.

वे झट से बोले; "नहीं-नहीं मैं समझ गया. लेकिन हे माता अभी तो मैं भगवान श्री राम के कार्य हेतु श्रीलंका जा रहा हूँ. इसलिए आप मुझे छोड़ दें. मुझे बहुत बड़ा कार्य करना है. माता सीता की खोज करनी है. हे माता आप समझ गईं या काव्य में बताऊँ कि; "राम काजु करि फिरि मैं आवौं...."

हनुमान जी की बात सुनकर अब डरने की बारी सुरसा जी की थी. वे बोलीं; "समझ गई मैं. तुम्हारी बात पूरी तरह से मेरी समझ में आ गई."

अभी वे बात कर ही रहे थे कि आस-पास बकरी की सी आवाज़ सुनाई दी. हनुमान जी और सुरसा दोनों को बड़ा आश्चर्य हुआ कि समुद्र के ऊपर इस समय बकरी कहाँ से आ सकती है? वे इस आवाज़ के बारे में अभी सोच ही रहे थे कि उन्होंने देखा कि उनके सामने सूट-बूट पहने, छोटी सी चोटी बांधे एक मनुष्य खड़ा हुआ है.

उसने हनुमान जी को प्रणाम किया और बोला; "हे बजरंगबली, आप तो श्रीलंका जा रहे हैं. मैं यह बताने आया था कि मेरी फिल्म रा-वन कोलम्बो के सैवोय थियेटर में रिलीज होनेवाली है. आप से रिक्वेस्ट है कि आप वह फिल्म ज़रूर देखें."

इस मनुष्य को देखकर शायद हनुमान जी पहचान गए. बोले; "अरे तुम तो वही हो न जो परसों किष्किन्धा के आस-पास के इलाके में अपनी फिल्म का प्रचार करने वाये थे? महाराज सुग्रीव की सेना के कई बानर उसदिन अपना कर्त्तव्य भुलाकर तुम्हारा नाच-गाना देखने चले गए थे?"

उनकी बात सुनकर वह मनुष्य बोला; "हाँ, भगवन मैं वही हूँ. दरअसल मैं अपनी मूवी का प्रचार करने आपके इलाके में गया था. मेरा आपसे अनुरोध है कि आप मेरी मूवी ज़रूर देखें."

इस बार हनुमान जी बिदक गए. बोले; "तुमने पिछले वर्षा ऋतु से ही परेशान करके रख दिया है. जहाँ दृष्टि जाती है बस तुम्ही दिखाई देते हो. चित्रकूट हो या किष्किन्धा, अयोध्या हो या जनकपुर सब जगह तुम्ही दिखाई दे रहे हो. पागल कर दिया है तुमने सबको."

"लेकिन प्रभु, मेरी बात तो सुनिए. इस मूवी में रजनीकांत भी हैं. मैंने विदेशी गायक से इसमें गाना गवाया है. आप ज़रूर देखिएगा यह मूवी. आपको अच्छा लगेगा"; वह मनुष्य गिडगिडाने लगा.

उसकी बातें हनुमान जी को विरक्त कर रही थीं. बहुत नाराज़ होते हुए बोले; "हे माता, इस मनुष्य ने पूरी पृथ्वी पर हाहाकार मचा कर रखा है. मैं इसकी मूवी देखूँ उससे अच्छा तो यह होगा कि आप मुझे अपना आहार बना लें. माता सीता की खोज अंगद कर लेंगे."

कट टू द्वापर युग.

महाभारत की लड़ाई चल रही है.

महाराज धृतराष्ट्र के सारथी संजय उन्हें युद्ध के मैदान से आँखों देखा हाल बता रहे हैं. अचानक देखते क्या हैं कि उनकी स्क्रीन पर महाभारत की लड़ाई दिखनी बंद हो गई. सामने सूट-बूट में लैस एक मनुष्य नृत्य करते हुए गाने लागा; छम्मक छल्लो...चम्मक छल्लो..."

संजय की समझ में नहीं आ रहा कि यह कौन है? अभी वे कुछ सोच पाते कि आवाज़ आई; "महाराज धृतराष्ट्र की जय हो. महराज आज दिन भर युद्ध की रनिंग कमेंट्री सुनकर जब आप थक जायें तो आज रात्रिकालीन शो में मेरी मूवी रा-वन देखना न भूलें. बहुत बढ़िया मूवी है. बहुत पैसा खर्च करके मैंने यह मूवी बनाई है. आप आनंद से सरा-बोर हो जायेंगे."

उसकी आवाज़ सुनकर धृतराष्ट्र को लगा कि यह कौन है जो उनका मज़ाक उड़ा रहा है. आखिर जो व्यक्ति अँधा हो वह मूवी कैसे देखेगा? वे नाराज़ होते हुए बोले; "संजय यह कौन धृष्ट है जो मेरी हँसी उड़ा रहा है?"

संजय बोले; "महाराज यह एक चलचित्र अभिनेता है जो अपनी मूवी का विज्ञापन करते नहीं थक रहा. इसने पूरी पृथ्वी पर सबको परेशान करके रख दिया है. यह चाहता है कि आप इसकी मूवी देखें."

महाराज धृतराष्ट्र को बहुत गुस्सा आया. बोले; "क्या इसे यह नहीं मालूम कि मैं देख नहीं सकता?"

संजय अभी कुछ बोलते कि वह अभिनेता बोला; "महाराज आप केवल बैठे रहिये. संजय जी पूरी मूवी का वर्णन आपके सामने रखते जायेंगे. आप उसे फील करते रहिएगा. और हाँ, छम्मक छल्लो को अच्छी तरह से फील करियेगा. अब मैं जा रहा हूँ. मुझे पांडवों के शिविर में भी अपनी मूवी का विज्ञापन करना है."

इतना कहकर संजय की स्क्रीन से वह गायब हो गया. महाराज रात्रिकालीन शो का इंतजार करने लगे.

Friday, August 19, 2011

गवरनेंस बाइ मैजिक वैंड - ए बुक बाइ मैजिकानो वैंडलोई





नई दिल्ली से चंदू चौरसिया, मुंबई से निर्भय सावंत और बैंगलुरू से रजत चिनप्पा

आज एक ऐतिहासिक निर्णय देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने फेडरेशन ऑफ इंडियन चेम्बर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (फिक्की) को आदेश दिया कि वह एक जांच करके बताये कि केंद्र सरकार, उसके मंत्रियों और प्रधानमंत्री के लिए मैजिक वैंड देश में ही कैसे उपलब्ध कराया जा सकता है. ज्ञात हो कि प्रधानमंत्री और उनके कई मत्रियों ने मैजिक वैंड उपलब्ध न होने के कारण पिछले ढाई वर्षों में कई बार समस्याओं को सुलझाने में असमर्थता जताई थी. अभी तीन दिन पहले ही स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले से बोलते हुए प्रधानमंत्री ने असमर्थता जताते हुए अपने भाषण में कहा था; "भ्रष्टाचार मिटाने के लिए हमारे हाथ में कोई मैजिक वैंड नहीं है."

करीब दो महीने पहले सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर करते हुए अखिल भारतीय सरकार सताओ आन्दोलन के प्रमुख श्री अशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया था कि न्यायालय सी बी आई को आदेश दे कर सरकार और उसके मंत्रियों के खोये हुए मैजिक बैंड को बरामद करवाए. कालांतर में सी बी आई ने एक जांच कर के सुप्रीम कोर्ट को दिए गए अपने हलफनामे में यह खुलासा किया सरकार या उसके किसी भी मंत्री के पास कभी कोई मैजिक वैंड था ही नहीं. दरअसल सरकार और उसके मंत्री चाहते हैं कि या तो देश में ही मैजिक वैंड का उत्पादन शुरू हो या फिर उसे विकसित देशों से आयात करके उन्हें मंत्रियों को उपलब्ध करवाया जाय. सी बी आई के इस हलफनामे के बाद मैजिक वैंड को लेकर देशवासियों में व्याप्त कई तरह के भ्रम ख़त्म हो गए.

यहाँ पर यह बता देना उचित है कि देशवासियों में यह भ्रम था कि सरकार और उसके मंत्रियों के मैजिक वैंड चोरों ने चुरा लिए हैं जिसके कारण मंत्रीगण समस्याएं नहीं सुलझा पा रहे हैं.

ज्ञात हो कि पिछले ढाई वर्षों में वित्तमंत्री, कृषिमंत्री, गृहमंत्री, रक्षामंत्री वगैरह ने कई बार कहा कि उनके पास कोई मैजिक वैंड नहीं है जिससे देश की समस्याओं को सुलझाया जा सके. जहाँ वित्तमंत्री ने मंहगाई को रोक पाने में असमर्थता जताते हुए मैजिक वैंड की अनुपलब्धता की बात बताई वहीँ गृहमंत्री ने आतंकवाद की रोकथाम न कर पाने का श्रेय मैजिक वैंड की अनुपलब्धता को दिया. उधर हाथ में मैजिक वैंड न होने के कारण कृषिमंत्री हर बार चीनी, प्याज, सब्जी, तेल वगैरह के दाम को कंट्रोल नहीं कर पाए.

मैजिक वैंड के बल पर शासन करने की बात नई नहीं है लेकिन इस तरह के सभी शासक हमेशा केवल किस्से-कहानियों में पाए जाते रहे हैं. पुराने किस्से-कहानियों के जादूगर वगैरह मैजिक वैंड के बल पर लोगों के ऊपर शासन करते हुए बरामद होते रहे हैं. लेकिन पाँच साल पहले इटली के समाजशास्त्री, लेखक और विचारक श्री मैजिकानो वैडलोई ने गवरनेंस बाइ मैजिक वैंड नामक किताब लिखकर शासन के इस तरीके को एक बार फिर से विश्व के राजनीतिक पटल पर ला खड़ा किया. वर्तमान भारतीय सरकार श्री वैंडलोई के इस सिद्धांत से इतना प्रभावित हुई कि उसे हर समस्या का समाधान मैजिक वैंड में ही नज़र आने लगा. यह बात अलग है कि देश में अभी तक मैजिक वैंड का न तो उत्पादन शुरू हुआ और न ही इसके आयात के लिए रास्ता खोला गया.

उधर आज दिल्ली में अखिल भारतीय निज-भाषा उन्नति समिति के अध्यक्ष श्री रामप्रवेश शुक्ला ने सरकार और उसके मंत्रियों की यह कहते हुए आलोचना की है कि मंत्रीगण अपनी भाषा पूरी तरह से भूल गए हैं जिसके चलते वे देश के विशाल जनमानस से कट चुके हैं. श्री शुक्ला ने अपने आरोप को सही ठहराते हुए बताया कि सरकार और उसके मंत्रियों को मैजिक वैंड न कहकर जादुई छड़ी कहना चाहिए. मंत्रियों के ऐसा न करने की वजह से हिंदी रसातल में चली जा रही है. श्री शुक्ला ने राष्ट्रपति को एक ज्ञापन देते हुए आग्रह किया कि सरकार के मंत्री अब से केवल और केवल जादुई छड़ी की बात करें.

उधर आज बैंगलुरू में डिफेन्स रिसर्च ऐंड डेवलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन (डीआरडीओ) की तरफ से दायर हलफनामे में संस्थान ने मैजिक वैंड का उत्पादन करने में असमर्थता जताई है. ज्ञात हो कि सुप्रीम कोर्ट ने अखिल भारतीय सरकार सताओ आन्दोलन द्वारा दायर जनहित याचिका के बाद डी आर डी ओ से हलफनामा माँगा था कि संसथान मैजिक वैंड के उत्पादन के तरीके पर विचार करके एक रिपोर्ट फाइल करे. संस्थान ने सुप्रीम कोर्ट में दायर हलफनामे में कहा है कि; "यह संस्थान ऐसी कोई चीज के उत्पादन के बारे में विचार नहीं करेगा जिसके साथ मैजिक जुडा हो. संस्थान और उसमें काम करने वाले वैज्ञानिकों को मैजिक में कोई विश्वास नहीं है. संस्थान ने कसम खाई है कि वह केवल और केवल वैज्ञानिक दृष्टि से प्रमाणिक चीजों का ही उत्पादन करेगा."

डी आर डी ओ के इस हलफनामे के बाद सुप्रीम कोर्ट के पास और कोई रास्ता नहीं बचा था. यही कारण है कि मैजिक वैंड के उत्पादन या आयात के बारे में अध्ययन और रिपोर्ट का काम उसने फिक्की को सौंप दिया है.

मैजिक वैंड के बारे में प्रधानमंत्री और उनेक मंत्रियों द्वारा पिछले ढाई वर्षों से लगातार बात करने की वजह से पूरे देश के सरकारी विभाग और उनके कर्मचारी जाग गए हैं और उन्होंने मांग रखी है कि उन्हें भी मैजिक वैंड उपलब्ध करवाया जाय जिससे वे अपने-अपने विभागों की समस्याओं का समाधान कर सके. यही कारण है कि पिछले पंद्रह दिनों से, शिक्षा, रक्षा, रेल, खेल, ट्रांसपोर्ट, एयरपोर्ट, डी डी ए, पी डब्ल्यू डी, सेल्स टैक्स, इनकम टैक्स, नगर पालिका, और ऐसे ही तमाम विभागों के कर्मचारियों ने सरकार के सामने मांग रखी है कि सरकार जल्द से जल्द उन्हें मैजिक वैंड उपलब्ध करवाए जिससे पूरे भारत को एक बार फिर से सोने की चिड़िया बनाकर उसे लूट लिया जाय.

सरकारी कर्मचारियों द्वारा इतनी बड़ी संख्या में मांग रखने के कारण देश के प्रमुख औद्योगिक घराने हरकत में आ गए हैं. कई औद्योगिक घराने मैजिक वैंड के उत्पादन पर विचार करने लगे हैं. अलायंस उद्योग समूह के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की एक मीटिंग में कल फैसला लिया गया कि भारी मात्रा में मैजिक वैंड की डिमांड को देखते हुए कंपनी जल्द ही उसके उत्पादन के क्षेत्र में उतारेगी. सूत्रों के अनुसार कुछ भारतीय उद्योग समूहों ने मैजिक वैंड के क्षेत्र में निवेश करने के लिए मॉरिसश के रास्ते देश में पैसे लाने का इंतज़ाम शुरू कर दिया है. बाहर के कुछ निवेशक समूह इस बात पर कयास लगा रहे हैं कि इस क्षेत्र में सरकार कितने प्रतिशत एफ डी आई पर राजी होगी. भारतीय उद्योग समूहों के अलावा कुछ विदेशी निवेशकों ने भी मैजिक वैंड के उत्पादन में निवेश की घोषणा की है. प्रसिद्द निवेशन श्री वारेन बफेट ने कल बताया कि उनका समूह भारतीय मैजिक वैंड क्षेत्र में पहले चारण में करीब सात करोड़ डॉलर इन्वेस्ट करेगा.

सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक निर्णय के बाद देश के लोगों में ख़ुशी की लहर दौड़ गई है. आल इंडिया कॉमन-मेन एशोसियेशन के अध्यक्ष श्री प्रशांत अभ्यंकर ने कल मुंबई में एक संवाददाता सम्मलेन को संबोधित करते हुए कहा; "इस देश के नागरिकों का अब केवल सुप्रीम कोर्ट पर ही विश्वास रह गया है. हमें विश्वास है कि सुप्रीम कोर्ट के इस कदम की वजह से देश में जल्द ही मैजिक वैंड का उत्पादन शुरू हो जाएगा. देश की सारी समस्याएं छू-मंतर हो जायेंगी और भारत पूरे विश्व में एक इकॉनोमिक सुपर पॉवर बनकर उभरेगा."


Monday, July 18, 2011

लोकपाल पिल






एक था लोकतंत्र. अब लोकतंत्र है तो जाहिर सी बात है कि प्रधानमंत्री भी होंगे ही. अक्सर देखा गया है कि प्रधानमंत्री में लोकतंत्र हो या न हो, लोकतंत्र में प्रधानमंत्री होते ही हैं. यह बात तो पाकिस्तान के केस में भी सच होते दीखती है. खैर, प्रधानमंत्री होंगे तो मंत्री भी होंगे. दोनों होंगे तो मीटिंग भी होगी. ज्यादातर लोकतंत्र मीटिंग प्रधान होते हैं. बिना मीटिंग के लोकतंत्र की सफलता पर ग्रहण लग सकता है. लोकतंत्र आज एक बार फिर से सफल हो रहा था.

कहने का मतलब यह कि मीटिंग हो रही थी.

प्रधानमंत्री ने मंत्री जी से पूछा; "आप क्या कहते हैं? जनता में किसकी क्रेडिबिलिटी ज्यादा है? सिविल सोसाइटी की या हमारी?"

मंत्री जी बोले; "ऑफकोर्स वी एन्जॉय बेटर क्रेडिबिलिटी...आई हैव स्पेसिफिक इंटेलिजेंस इनपुट्स दैट वी एन्जॉय बेटर क्रेडिबिलिटी दैन सिविल सोसाइटी. आर जर्नलिस्ट्स हैव आल्सो टोल्ड मी दैट पीपुल ट्रस्ट अस मोर दैन दोज...लुक, वी कैन आल्सो वेरीफाई दोज इंटेलिजेंस इनपुट्स बाइ टैपिंग सम कनवर्सेशंस ऑफ आर सिटीजंस अंडर नेशनल सिक्यूरिटी ...वी कैन आल्सो बग सिटीजंस टू कम टू अ कन्क्लूजन... "

उनकी बात सुनकर पास बैठे एक और मंत्री बोले; "नो नो..इयु डोंट नीड टू डू आल दोज थींग्स. आई नो, हुवाट हैपेन्स हुवेन सामबोडी ईज इस्पाइड . आई नो ईट, सीन्स माई आफिस वाज इस्पाइड..."

प्रधानमंत्री जी बोले; "नहीं-नहीं. वो सब करने की जरूरत नहीं है. आपके इंटेलिजेंस इनपुट्स पर मुझे पूरा भरोसा है. आजतक आपके इनपुट्स कभी गलत साबित नहीं हुए हैं. आप तो मुझे यह बताएं कि सिविल सोसाइटी को कैसे कंट्रोल किया जाय? ये लोग़ मीडिया में बड़ा हो-हल्ला मचा रहे हैं."

उनकी बात सुनकर मंत्री जी बोले; "फॉर दैट, आई नीड समटाइम. सी, आई ऐम बिजी फॉर नेक्स्ट टू डेज ऐज आई हैव टू मैनेज लीकिंग सम स्टोरी अगेंस्ट कलावती जी इन सरताज कोरिडोर केस टू आर जर्नलिस्ट्स. आई विल सर्टेनली कमअप विद अ सजेशन, डे आफ्टर टूमारो."

दो दिन बाद मंत्री जी ने अपने ब्रेनवेव के सहारे यह तरीका निकाला कि सिविल सोसाइटी को इस लोकपाल बिल की ड्राफ्टिंग कमिटी से निकालने का एक ही तरीका है कि लोकपाल बिल ही न बनाया जाय. उनकी बात सुनकर प्रधानमंत्री ने शंका जाहिर की. बोले; "अगर लोकपाल बिल नहीं बना तो जनता नाराज़ हो जायेगी. सोचेगी कि बिना लोकपाल के भ्रष्टाचार फैलता ही जाएगा."

प्रधानमंत्री की बात सुनकर मंत्री जी बोले; "सी, वी विल नॉट हैव टू अप्वाइंट अ लोकपाल. दैट मीन्स, वी विल नॉट हैव टू पास लोकपाल बिल. आल वी हैव टू डू इज टू मैनुफैक्चर लोकपाल पिल. ऐज वी नो, आर साइंटिस्ट्स आर वर्ल्ड क्लास एंड ऑन द डाइरेक्शन ऑफ एच आर डी मिनिस्ट्री, दे हैव कमअप विद अ ड्रग फॉरर्मुलेशन व्हिच विल हेल्प अस वाइप आउट करप्शन फ्रॉम कंट्री. लेट अस पास अ रिजोल्यूशन एंड पब्लिश दैट इन गैजेट, स्टेटिंग दैट गवर्नमेंट विल मैनुफैक्चर लोकपाल पिल व्हिच विल बी गिवेन टू द सिटिजेन्स जस्ट लाइक पोलिओ वैक्सीन ड्राप्स ऑन सिक्स कांजीक्यूटिव संडेज. ट्व्लेव पिल्स पर सिटिज़न एंड वी विल वाइप आउट करप्शन फ्रॉम कंट्री."

प्रधानमंत्री ने अपने मंत्री की ओर तारीफ भरी नज़रों से देखा. बोले; "वाह! इसिलए मैं कहता हूँ कि आप मेरी सरकार के खेवनहार हैं. आप जो कर सकते हैं वह कोई नहीं कर सकता. मैं आज आपसे वादा करता हूँ कि मैं आपको देशरत्न का सम्मान दिलाकर ही प्रधानमंत्री का पद छोडूंगा."

मंत्री जी प्रधानमंत्री को ऐसे देखा जैसे कह रहे हों; "यू डोंट हैव टू वरी फॉर माई देशरत्न. आई विल अवार्ड माईसेल्फ विद देशरत्न, द डे आई बिकम प्राइम मिनिस्टर."

पंद्रह दिन बाद सरकारी गैजेट में सरकारी फैसला छप गया. देशवासी खुश हो गए. जनता इस बात से खुश थी कि अब देश से भ्रष्टाचार ख़त्म हो जाएगा. भ्रष्टाचारी इस बात से दुखी थे कि अब देश से भ्रष्टाचार ख़त्म हो जाएगा. कुछ लोग़ ऐसे भी थे जिन्हें समझ नहीं आ रहा था कि खुश हुआ जाय या दुखी? लोकतंत्र में खुद के ऊपर डाउट करने वाले लोगों का रहना बहुत ज़रूरी है. अगर वे नहीं रहें तो लोकतंत्र लोकतंत्र न लगकर राजतंत्र लगे.

गैजेट से पता चला कि स्वास्थ्य मंत्रालय इस लोकपाल पिल की मैनुफैक्चरिंग से लेकर छ रविवार तक उसे जनता को खिलाने तक पूरा काम देखेगा.

अब पढ़िए कि उसके बाद कैसे-कैसे वार्तालाप हुए;

०१. स्वास्थ्य मंत्री और सुकेश केशवानी के बीच एक वार्तालाप;

सुकेश जी; "नमस्कार. हे हे हे..बहुत दिनों बाद बात हो रही है. सुना है देश से भ्रष्टाचार हटाने का काम आपका मंत्रालय कर रहा है?"
मंत्री जी; "हे हे हे...अब तो देखिये, यह बात तो है."
सुकेश जी; "मतलब अब भ्रष्टाचार हटा के ही मानेंगे...हा हा हा.. वैसे कितने का प्रोजेक्ट है?"
मंत्री जी; "अरे प्रोजेक्ट का क्या है? जितने का कहें, उतने का बनवा दें."
सुकेश जी; "अरे मेरे कहने का फायदा भी क्या? हमें तो कुछ मिलना है नहीं."
मंत्री जी; "क्यों? क्यों नहीं मिलना है?"
सुकेश जी; "इस प्रोजेक्ट के लिए तो केवल फार्मा कम्पनियाँ बिड कर सकती हैं."
मंत्री जी; "केवल फार्मा ही क्यों? ड्रग फौर्मुलेशन के केमिकल्स बनाने वाली कंपनी भी तो बिड कर सकती हैं."
सुकेश जी; "अब हम तो इस फील्ड में हैं नहीं. इसलिए..."
मंत्री जी; "अरे तो आप भी तो केमिकल्स का काम करते ही हैं. भले ही पेट्रोकेमिकल्स का है तो क्या हुआ?"
सुकेश जी; "मतलब कुछ किया जा सकता है?"
मंत्री जी; "क्यों नहीं. टेंडर पेपर चेंज करवा देता हूँ. बिडर का डिफिनेशन ही तो चेंज करना है. अरे केवल लिखवाना ही तो है कि "बिडर इन्क्लूड्स कंपनीज व्हिच हैव लाइसेंस टू मैनुफैक्चर ड्रग्स, केमिकल्स इन्क्लूडिंग पेट्रोकेमिकल्स....."
सुकेश जी; "अच्छा वो नेटवर्थ रिक्वायरमेंट बढ़ा दीजिये. बढ़ाकर साठ हज़ार करोड़ कर दीजिये. ऐसा कीजिए कि और कोई टेंडर कंडीशन पूरा ही न कर सके..."
मंत्री जी; "कल आप आइये तो सही....चलिए फिर कल बारह बजे मिलते हैं..."

०२. एक करप्शन एरैडीकेशन बूथ पर;

-- अबे ये क्या किया?
-- क्यों क्या हुआ?
-- अबे रिकार्ड गलत लिख दिया है.
-- क्या गलत है?
-- अबे आज की रिपोर्ट में लिखा हुआ है कि इस बूथ पर १७५६० लोगों को लोकपाल पिल खिलाई गई.
-- ज्यादा लिख दिया क्या?
-- अबे बेवकूफ इस पूरे इलाके की जनसँख्या ही केवल चार हज़ार सात सौ इक्कीस है.
--क्या करना है अब?
--छोड़ अब लिख ही दिया है तो रिपोर्ट सबमिट करते हुए वहाँ मामला सेटिल कर लेंगे. खर्चा लगेगा तो क्या हुआ? बिल भी चार गुना बनेगा.

०३. ड्रग केमिकल्स सप्लायर और मैन्यूफैक्चरर के बीच बातचीत

-- सर, मेरा बिल पास नहीं हो रहा है. आप जरा ऑर्डर डे दीजिये न तो बिल पास हो जाए.
-- ऐसे ही बिल पास करवाना चाहते हैं?
-- नहीं सर, ऐसे ही क्यों? आपका जो बनता है वो तो आपको मिलेगा ही.
-- और वो जो एक्सपायर्ड क्रोसीन का चूरा बनाकर भेज दिया था लोकपाल पिल बनाने के लिए, वो?
-- क्या बात करते हैं सर?
-- बात तो करेंगे ही. क्या समझते हैं कि हमें पता नहीं है?

०४. प्रधानमन्त्री और सम्पादक की बातचीत;

-- अब देश से भ्रष्टाचार ख़त्म हो जाएगा?
-- नहीं ख़त्म होगा, यह मानने का कोई कारण नहीं है.
-- आपको लगता है कि लोकपाल पिल काम करेगा?
-- पिल काम नहीं करेगा, यह मानने का मेरे पास कोई कारण नहीं है.
-- आपने भी भ्रष्टाचार की पिल ली है?
-- नहीं, हमने नहीं ली. मैं तो लेना चाहता था लेकिन हमारे मंत्रियों ने लेने से मना कर दिया.
-- आपके मंत्रियों ने ली?
-- नहीं उन्होंने भी नहीं ली.
-- क्यों नहीं ली?
-- मैंने उनसे पूछा कि क्या वे भ्रष्टाचार में लिप्त हैं? उन्होंने बताया कि नहीं वे लिप्त नहीं हैं. इसलिए मैंने कहा कि जब वे लिप्त नहीं हैं तो फिर पिल लेने की उन्हें ज़रुरत नहीं.पिल का साइड इफेक्ट्स भी तो हो सकता है.
-- अब अगर कोई मंत्री भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरा तो?
-- हमें चिंता नहीं है. कोलीशन धर्म है न.

Saturday, February 26, 2011

बजटोत्सव




जैसा कि हम जानते हैं, ये बजट का मौसम है. टीवी न्यूज चैनलों ने अपनी-अपनी औकात के हिसाब से बजट पर आम आदमी, दाम आदमी, माल आदमी, हाल आदमी, बेहाल आदमी वगैरह की डिमांड और सुझाव वगैरह वित्तमंत्री तक पहुंचाने शुरू कर दिए हैं. कोई 'डीयर मिस्टर फाइनेंस मिनिस्टर' के नाम से प्रोग्राम चला रहा है, कोई 'डीयर प्रणब बाबू' तो कोई 'वित्तमंत्री हमारी भी सुनिए' नाम से.

मुझे याद आया, एक आर्थिक संस्था द्बारा साल २००८ में आयोजित किया गया एक कार्यक्रम. 'सिट एंड राइट' नामक इस कार्यक्रम में प्रतियोगियों को बजट के ऊपर निबंध लिखने के लिए उकसाया गया था. पेश है उसी प्रतियोगिता में भाग लेने वाले एक प्रतियोगी का निबंध. सूत्रों के अनुसार चूंकि इस आर्थिक संस्था को सरकारी ग्रांट वगैरह मिलती थी, लिहाजा इस प्रतियोगी के निबंध को रिजेक्ट कर दिया गया था. आप निबंध पढिये.

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बजट एक ऐसे दस्तावेज को कहते हैं, जो सरकार के न होनेवाले इनकम और ज़रुरत से ज्यादा होनेवाले खर्चे का लेखा-जोखा पेश करता है. इसके साथ-साथ बजट को सरकार के वादों की किताब भी माना जा सकता है. एक ऐसी किताब जिसमें लिखे गए वादे कभी पूरे नहीं होते. सरकार बजट इसलिए बनाती है जिससे उसे पता चल सके कि वह कौन-कौन से काम नहीं कर सकती. जब बजट पूरी तरह से तैयार हो जाता है तो सरकार अपनी उपलब्धि पर खुश होती है. इस उपलब्धि पर कि आनेवाले साल में बजट में लिखे गए काम छोड़कर बाकी सब कुछ किया जा सकता हैं.

सरकार का चलना और न चलना उसकी इसी उपलब्धि पर निर्भर करता है. कह सकते हैं कि सरकार है तो बजट है और बजट है तो सरकार है.

सरकार के तमाम कार्यक्रमों में बजट का सबसे ऊंचा स्थान है. बजट बनाना और बजटीय भाषण लिखना भारत सरकार का एक ऐसा कार्यक्रम है जो साल में सिर्फ़ एकबार होता है. सरकार के साथ-साथ जनता भी पूरे साल भर इंतजार करती है तब जाकर एक अदद बजट की प्राप्ति होती है. वित्तमंत्री फरवरी महीने के अन्तिम दिन बजट पेश करते हैं. वैसे जिस वर्ष संसदीय लोकतंत्र की मजबूती जांचने के लिए चुनाव होते हैं, उस वर्ष 'सम्पूर्ण बजट' का मौसम देर से आता है.

भारतीय बजट का इतिहास पढ़ने से हम इस नतीजे पर पहुँचते हैं कि पहले बजट की पेशी शाम को पाँच बजे होती थी. बाद में बजट की पेशी का समय बदलकर सुबह के ११ बजे कर दिया गया. ऐसा करने के पीछे मूल कारण ये बताया गया कि अँग्रेजी सरकार पाँच बजे शाम को बजट पेश करती है लिहाजा भारतीय सरकार भी अगर शाम को पाँच बजे बजट पेश करे तो उसके इस कार्यक्रम से अँग्रेजी साम्राज्यवाद की बू आएगी.

कुछ लोगों का मानना है कि बजट सरकार का होता है. वैसे जानकार लोग यह बताते हैं कि बजट पूरी तरह से उसे पढ़ने वाले वित्तमंत्री का होता है. बजट लिखने से ज्यादा महत्वपूर्ण काम बजट में 'कोट' की जाने वाली कविता के सेलेक्शन का होता है. ऐसा इसलिए माना जाता है कि बजट पढ़ने पर तालियों के साथ-साथ कभी-कभी गालियों का महत्वपूर्ण राजनैतिक कार्यक्रम भी चलता है लेकिन बजटीय भाषण के दौरान जब मेहनत करके छांटी गई कविता पढ़ी जाती है तो केवल तालियाँ बजती हैं.

बजट में कोट की जाने वाली कविता किसकी होगी, ये वित्त मंत्री के ऊपर डिपेण्ड करता है. जैसे अगर वित्तमंत्री तमिलनाडु राज्य से होता है तो अक्सर कविता महान कवि थिरु वेल्लूर की होती है. अगर वित्तमंत्री पश्चिम बंगाल का हो तो फिर कविता कविगुरु रबिन्द्रनाथ टैगोर की होती है. लेकिन वित्तमंत्री अगर उत्तर भारत के किसी राज्य या तथाकथित 'काऊ बेल्ट' का होता है तो कविता या शेर किसी भी कवि या शायर से उधार लिया जा सकता है, जैसे दिनकर, गालिब वगैरह वगैरह.

नब्बे के दशक तक बजटीय भाषणों में सिगरेट, साबुन, चाय, माचिस, मिट्टी के तेल, पेट्रोल, डीजल, एक्साईज, सेल्स टैक्स, इन्कम टैक्स, सस्ता, मंहगा जैसे सामाजिक शब्द भारी मात्रा में पाये जाते थे. लेकिन नब्बे के दशक के बाद में पढ़े गए बजटीय भाषणों में आर्थिक सुधार, डॉलर, विदेशी पूँजी, एक्सपोर्ट्स, इम्पोर्ट्स, ऍफ़डीआई, ऍफ़आईआई, फिस्कल डिफीसिट, मुद्रास्फीति, आरबीआई, ऑटो सेक्टर, आईटी सेक्टर, इन्फ्लेशन, बेल-आउट, स्कैम जैसे आर्थिक शब्दों की भरमार रही. ऐसे नए शब्दों के इस्तेमाल करके विदेशियों और देश की जनता को विश्वास दिलाया जाता है कि भारत में बजट अब एक आर्थिक कार्यक्रम के रूप में स्थापित हो रहा है.

वैसे तो लोगों का मानना है कि बजट बनाने में पूरी की पूरी भूमिका वित्तमंत्री और उनके सलाहकारों की होती है लेकिन जानकारों का मानना है कि ये बात सच नहीं है. जानकार बताते हैं कि बजट के तीन-चार महीने पहले से ही औद्योगिक घराने और अलग-अलग उद्योगों के प्रतिनिधि 'गिरोह' बनाकर वित्तमंत्री से मिलते हैं जिससे उनपर दबाव बनाकर अपने हिसाब से बजट बनवाया जा सके.

जानकारों की इस बात में सच्चाई है, ऐसा कई बार बजटीय भाषण सुनने से और तमाम क्षेत्रों में भारी मात्रा में दी जाने वाली छूट और लूट वगैरह को देखकर पता चलता है. कुछ जानकारों का यह मानना भी है कि सरकार ने कई बार बजट निर्माण के कार्य का निजीकरण करने के बारे में भी विचार किया था लेकिन सरकार को समर्थन देनेवाली पार्टियों के विरोध पर सरकार ने ये विचार त्याग दिए.

बजट का भाषण कैसे लिखा जाए, यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि कौन से पंथ पर चलने वाले सरकार को समर्थन दे रहे हैं. जैसे अगर सरकार को वामपंथियों से समर्थन मिलता है तो निजीकरण, सुधार जैसे शब्द भारी मात्रा में नहीं पाए जाते. उस स्थिति में सुधार की जगह उधार जैसे शब्द ले लेते हैं. वहीँ, अगर सरकार को समर्थन की ज़रुरत न पड़े तो फिर वो जो चाहे, जहाँ चाहे वैसे शब्द सुविधानुसार लिख लेती है.

बजट के मौसम में सामाजिक और राजनैतिक बदलाव भारी मात्रा में परिलक्षित होते हैं. 'बजटोत्सव' के कुछ दिन पहले से ही वित्तमंत्री के पुतले की बिक्री बढ़ जाती है. ऐसे पुतले बजट प्रस्तुति के बाद जलाने के काम आते हैं. कुछ राज्यों में 'सरकार' के पुतले जलाने का कार्यक्रम भी होता है. पिछले सालों में सरकार के वित्त सलाहकारों ने इन पुतलों की मैन्यूफैक्चरिंग पर इक्साईज ड्यूटी बढ़ाने पर विचार भी किया था लेकिन मामले को यह कहकर टाल दिया गया कि इस सेक्टर में चूंकि छोटे उद्योग हैं तो उन्हें सरकारी छूट का लाभ मिलना अति आवश्यक है.

पुतले जलाने के अलावा कई राज्यों में बंद और रास्ता रोको का राजनैतिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होता है. बजट का उपयोग सरकार को समर्थन देने वाली राजनैतिक पार्टियों द्वारा समर्थन वापस लेने की धमकी देने में भी किया जाता है.

बजट प्रस्तुति के बाद पुतले जलाने, रास्ता रोकने और बंद करने के कार्यक्रमों के अलावा एक और कार्यक्रम होता है जिसे बजट के 'टीवीय विमर्श' के नाम से जाना जाता है. ऐसे विमर्श में टीवी पर बैठे पत्रकार और उद्योगपति बजट देखकर वित्तमंत्री को नम्बर देने का सांस्कृतिक कार्यक्रम चलाते हैं. देश में लोकतंत्र है, इस बात का सबसे अच्छा उदाहरण बजट के दिन देखने को मिलता है. एक ही बजट पर तमाम उद्योगपति और जानकार वित्तमंत्री को दो से लेकर दस नम्बर तक देते हैं. लोकतंत्र पूरी तरह से मजबूत है, इस बात को दर्शाने के लिए ऐसे कार्यक्रमों में बीच-बीच में 'आम आदमी' का वक्तव्य भी दिखाया जाता है.

भारतीय सरकार के बजटोत्सव कार्यक्रम पर रिसर्च करने के बाद हाल ही में कुछ विदेशी विश्वविद्यालयों ने अर्थशास्त्र के विद्यार्थियों के पाठ्यक्रम में भारतीय बजट के नाम से एक नया अध्याय जोड़ने पर विमर्श शुरू कर दिया है. कुछ विश्वविद्यालयों का मानना है; 'अगर भारत सरकार के बजट को पाठ्यक्रम में रखा जाय तो न सिर्फ अर्थशास्त्र के विद्यार्थियों को लाभ मिलेगा अपितु राजनीतिशास्त्र के विद्यार्थी भी लाभान्वित होंगे.'

आशा है भारतीय सरकार के बजट की पढ़ाई एकदिन पूरी दुनियाँ में कम्पलसरी हो जायेगी. भारतीय बजट दिन दूनी और रात चौगुनी तरक्की करेगा.

जय हिंद का बजट

Monday, December 6, 2010

ठेकेदार की कहानी




इलाके के बड़े ठेकेदार हैं अपनी कहानी सुना रहे थे. सफलता की कहानी. बोले; "सब भगवान की कृपा है चाचाजी. सब उन्ही का आशीर्वाद है. कभी नहीं सोचा था कि बी एच यू के सामने डेढ़ करोड़ में ज़मीन खरीदेंगे. स्कॉर्पियो में चलेंगे. और इस्कूल की ही बात ले लीजिये. सपने में भी नहीं सोचा था कि इतना बड़ा इस्कूल खोलेंगे. लेकिन सब भगवान का आशीर्वाद है. आज किसी चीज की कमी नहीं है. अब समझ लीजिये कि एक ठेका जो पचास लाख का होता है उसमें नेट प्रोफिट करीब चालीस का बैठता है. सब आपलोगों का आशीर्वाद है....."

लीजिये भगवान को अपनी सफलता का श्रेय कितनी बार देते? शायद यही सोचते हुए थोड़ा सा श्रेय लगे हाथ हमारे पिताजी के आशीर्वाद को भी दे डाला. सुनकर लगा जैसे कोई बड़ा पैसेवाला सेठ श्रेय बांटने निकला है और आज उसके रस्ते में जो भी आएगा, बच नहीं पायेगा. हर एक को ज्यादा नहीं तो ढाई सौ ग्राम श्रेय तो लेना ही पड़ेगा.

अपने विनय की बात ऐसे कर रहे थे कि पूछिए मत. बोले; "इतना सब होने के बावजूद आज भी न तो मेरे अन्दर और न ही छोटे भाई के अन्दर जरा भी घमंड है. आज भी चाचाजी, मंगलवार को इंडिया में कहीं भी रहूं लेकिन विन्ध्याचल की देवी के दरबार में ज़रूर पहुँचता हूँ. छोटे भी कुछ कम धार्मिक नहीं हैं. कम से कम तीन घंटा पूजा करते हैं. कुछ भी हो जाए...."

उनकी बात को कोरोबोरेट करने के लिए पास बैठे उनके दांयें बोल पड़े; "एकदम सही कह रहे हैं. रंजीत को आप देखेंगे तो लगेगा ही नहीं कि यही रंजीत हैं. जरा भी घमंड नहीं."

सुनकर अनुमान लगा सका कि इस आदमी के विनय का अहंकार कितना बड़ा है.

सफलता की कहानी बताते-बताते अपने बिजनेस मॉडल पर पहुंचे. बोले; "खर्चा निकाल कर इतना बच जाता है कि क्या कहें? सोनभद्र है भी तो नक्सली इलाका. अब समझ लीजिये कि एक करोड़ का ठेका है तो कम से कम सत्तर लाख तक का प्रोफिट है. साटिफिकेट ही तो लेना है."

यह बिजनेस का सरकारी मॉडल है. प्रोफिट मार्जिन इतनी कि बड़ी-बड़ी अमेरिकेन कंपनियों के सी ई ओ को शर्म आ जाए और वे तीन दिन तक यह सोचते हुए पेप्सी न पीयें कि; "पढाई-लिखाई करके हमने क्या किया?" कुछ सी ई ओ के तो डिप्रेशन में चले जाने का चांस बना रहेगा.

मैं तो कहता हूँ कि भारतीय ठेकेदारों के बिजनेस मॉडल को दुनियाँ भर की बड़ी कंपनियों के सी ई ओ को एक बार ज़रूर देखना चाहिए. उन्हें यह विचार करने की ज़रुरत है कि केलोग्स और एम आई टी में पढ़कर उन्होंने क्या किया? ऐसी पढाई करके क्या फायदा अगर वे भारतीय ठेकेदारों की एफिसिएंसी तक नहीं पंहुच सकते?

वे आगे बोले; "लेकिन बड़ी मेहनत भी की है चाचाजी."

मेहनत वाली उनकी बात सुनकर विचार मन में आया कि बन्दे ने इतना बड़ा बिजनेस खड़ा किया तो मेहनत तो किया ही होगा. लेकिन अगले ही क्षण जब उन्होंने अपनी मेहनत की कहानी सुनाई तो मेरा विचार धराशायी हो गया. वे बोले; "पास में पैसा नहीं था उस समय. किसी का क्रेडिट कार्ड लेकर, किसी से उधार लेकर, इधर से उधर से करके आठ लाख रुपया जुटाया. एक एक्जक्यूटिव इंजिनियर को दे दिया. बात यह हुई थी कि वह ठेका दिलवाएगा. पैसा लेकर स्साला बैठ गया. समझ में यही आया कि अब पीछे जाने का कोई रास्ता नहीं है. अब या तो हम मर जायेंगे या फिर वो मरेगा. एक दिन शाम को बाज़ार में निकला. पुलिसवाले साथ थे. छोटे भाई ने गोली चला कर वहीँ पर ढकेल दिया. (ढकेल दिया से उनका मतलब जान से मार दिया.)

आगे बोले; "तीसरे दिन छोटे ने कोर्ट में सलिंडर कर दिया. जेल में गए तो वहाँ नक्सली नेता गिरजा से मुलाकात हुई. वो बोला कि जितना काम करना हो करो. जितना ठेका लेना हो लो. बस दस परसेंट मुझे चाहिए. वो दिन है और आज का दिन है एक बार भी तकलीफ नहीं हुई. उसका हिस्सा उसके पास पहुँचा देते हैं.... बाद में जज को साधा गया. वो मुकदमा अभी भी चल रहा है लेकिन उसके बाद छोटे मर्डर के और किसी केस में नहीं फँसा. अब तो...."

मैंने कहा; "यह बढ़िया है. एक मर्डर कर दिया और धाक जमा ली."

बोले; "ऐसी बात नहीं है गुरूजी. ऐसा नहीं कि उसके बाद मर्डर नहीं किये. हाँ, लेकिन फंसे नहीं."

आगे बोले; "और अब पैसा भी तो दुसरे-दुसरे धंधे में लगा रहे हैं. एक इस्कूल खोल दिए हैं और अब दूसरे की तैयारी है. बड़ा पैसा है शिक्षा में......"

सफलता की उनकी कहानी सब बड़े ध्यान से सुन रहे थे. उनमें कुछ ऐसे भी थे जो न जाने कितनी बार सत्यनारायण भगवान की कथा की तरह वह कहानी सुन चुके होंगे लेकिन चेहरे पर भाव ऐसे कि पहली बार सुन रहे थे. ठेकेदार के श्रोता बने हुए हैं. समय बीतते उनमें कुछ और जुड़ जाते हैं. उनकी कहानी भी उनके बिजनेस की तरह चली जा रही है.

Friday, April 2, 2010

चेयरमैन फैक्ट्री विजिट पर हैं




"अरे, ये तो फिर आ धमके" एक असिस्टेंट जनरल मैनेजर उदास होते हुए बोला.

"हाँ सर, अभी बीस दिन ही तो हुए थे, जब बाबू पिछली बार आए थे. फिर अचानक कैसे पधारे. कुछ प्राब्लम है क्या?" उनके पीए ने पूछा.

"अरे प्राब्लम-वाब्लम कुछ नहीं है. काम धंधा कोई है नहीं. घर वालों ने परेशान होने से मना कर दिया होगा तो इम्प्लाई लोगों को परेशान करने आ पहुंचे", असिस्टेंट जनरल मैनेजर ने कहा.

बात इतनी सी थी कि चेयरमैन एक ही महीने में दुबारा आ धमके थे. आस्सी साल उमर हो गई है. इनकी परेशानी ये है कि इन्हें कोई परेशानी नहीं है. सफारी पहनकर चंदन लगाकर जब-तब फैक्ट्री विजिट पर पहुँच जाते हैं. जब तक हेड आफिस में रहते हैं तो भी इन्हें कोई काम नहीं रहता. लेकिन सबको दिखाते हैं कि बहुत काम करते हैं. रात के आठ-आठ बजे तक आफिस में बैठे रहते हैं ताकि कोई कर्मचारी अपने घर ठीक समय पर नहीं जा सके. अब चेयरमैन आफिस में बैठा रहेगा तो कर्मचारी आफिस से निकलकर घर जायेगा भी कैसे.

आज फैक्ट्री विजिट पर आ धमके हैं. आते ही पाण्डेय जी को तलब किया. पाण्डेय जी सबेरे से ही साहब के साथ हैं. साहब इधर-उधर और न जाने किधर-किधर की बातों से पाण्डेय जी को बोर कर रहे हैं. पाण्डेय जी भी क्या करें कुछ नहीं कर सकते. साहब की बातें सुनकर अन्दर ही अन्दर खिसिया रहे हैं. साहब आए तो हैं फैक्ट्री विजिट पर लेकिन जायजा ले रहे हैं मन्दिर के खर्चे का.

"अच्छा पाण्डेय जी, मन्दिर में जो पूजा होती है उसमे एक दिन में कितना लड्डू लगता है?" चेयरमैन साहब ने पूछा.

"सर, तीन किलो लगता है एक दिन की पूजा पर", पाण्डेय जी ने बताया.

"लेकिन पिछले साल तो दो किलो में हो जाता था न. फिर ये तीन किलो?" चेयरमैन साहब लड्डू की मात्रा को लेकर चिंतित लग रहे हैं.

"सर, वो क्या है कि लोगों को जब पता चला कि पूजा में प्रसाद के लिए लड्डू का इस्तेमाल होता है तो ज्यादा लोग आने लगे"; पाण्डेय जी ने लड्डू के ज्यादा खपत होने का कारण बतात हुए कहा.

"लेकिन ये तो ठीक बात नहीं है. शेयरहोल्डर्स को एजीएम में जवाब तो मुझे देना पड़ता है न. ऊपर से ज्यादा लोग आते हैं पूजा में तो आफिस के काम का नुकसान भी होता होगा. एक काम कीजिये, कल से पूजा के प्रसाद में बताशा मंगाईये. इसके दो फायदे होंगे. एक तो खर्चा कम होगा और दूसरा लोग भी कम आयेंगे"; बाबू ने हिदायत दे डाली.

पाण्डेय जी ने उनकी बात सुनकर मन ही मन अपना माथा पीट लिया. ये सोचते हुए कि 'देखो कैसा इंसान है. जब परचेज का नकली बिल बनवाकर कम्पनी से कैश निकालता है तो शेयरहोल्डर्स की चिंता नहीं सताती इसे लेकिन प्रसाद में दो की जगह तीन किलो लड्डू आ जाए तो शेयरहोल्डर्स का बहाना करता है.'

अभी पाण्डेय जी सोच ही रहे थे कि बाबू ने कहा; " क्या सोच रहे हैं पाण्डेय जी? देखिये बूँद-बूँद से ही सागर बनता है. मुझे ही देखिये, इस उमर में भी बारह घंटे काम करता हूँ. आज मूंगफली भी खाता हूँ तो ख़ुद ही अपने हाथ से तोड़कर. आज भी रात के आठ बजे तक आफिस में बैठता हूँ. बोलिए, है कि नहीं?"

पाण्डेय जी क्या करते. हाँ करना ही पडा. भले ही मन में सोच रहे थे कि 'आफिस में बैठकर तुम करते ही क्या हो? माडर्न मैनेजमेंट की एक भी टेक्निक मालूम है तुम्हें? आफिस में बैठे-बैठे केवल कर्मचारियों को सताते हो तुम. मेरी ही हालत देखो न. इंजीनीयरिंग की पढाई की. बाद में एमबीए भी किया. दोनों कालेज में किसी गुरु ने यह नहीं पढ़ाया कि चेयरमैन जब फैक्ट्री विजिट पर आकर मन्दिर में होने वाले पूजा और प्रसाद के बारे में पूछेंगे तो उन्हें कैसे जवाब दिया जाय. मैं एक इंजिनियर. तुम्हारी कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट हूँ लेकिन दिन बुरे चल रहे हैं तो पूजा के खर्च पर बात करनी पड़ रही है.'

यह सोचते-सोचते पाण्डेय जी को अचानक ध्यान आया कि लंच का टाइम हो गया है. उन्होंने कहा; "सर लंच का समय हो गया है. चलिए लंच कर लीजिये."

पाण्डेय जी की बात सुनकर 'बाबू' बोले; "अरे, आपको तो बताना भूल ही गया. आजकल मैं लंच में केवल चना और गुड खाता हूँ. हमारे गुरुदेव ने खाना खाने से मना किया है."

उनकी बात सुनकर पाण्डेय जी का कलेजा मुंह को आ गया. सोचकर परेशान हो गए कि ऐसे वक्त में चना और गुड कहाँ से लायें? थोड़ी देर का समय लेकर फौरन गेस्ट हाऊस की तरफ़ दौड़े. पूछने पर पता चला कि चना मिलना तो बहुत मुश्किल है और गुड मिलना उससे भी कठिन. लेकिन पाण्डेय जी भी ठहरे मैनेजर. उन्हें मालूम था कि फैक्ट्री से थोड़ी दूर ही देसी शराब की दुकान है जहाँ फैक्ट्री के वर्कर्स थकान मिटाते हैं. वहाँ पर प्यून को भेजकर चना मंगवाया गया. लेकिन गुड का इंतजाम नहीं हो सका. चार प्यून दौडाये गए बाज़ार में गुड खोजने के लिए. करीब एक घंटे के बाद गुड भी मिल ही गया.

चेयरमैन साहब चना और गुड प्लेट में सजाये बैठे हैं. बात करते-करते एक चना मुंह रख लेते हैं.

पाण्डेय जी सोच रहे हैं; 'भगवान दया करो और इस आदमी को आज ही यहाँ से रवाना करो.'

आख़िर छोटे-मोटे पद का कोई कर्मचारी होता तो उसे पाण्डेय जी ख़ुद ही रवाना कर देते लेकिन ये तो ठहरे चेयरमैन. और चेयरमैन से बड़े केवल भगवान होते हैं.

नोट:

यह एक पुरानी पोस्ट का री-ठेल है.

Saturday, August 22, 2009

एक मुलाकात कृषि मंत्री के साथ




इस वर्ष मानसून की कमी हो गई है. अपना देश ही ऐसा है. यहाँ भ्रष्टाचार को छोड़कर आये दिन किसी न किसी चीज की कमी होती रहती है. इस कमी वाली वर्तमान संस्कृति में शायद कमी के लिए और कुछ नहीं बचा था इसीलिए इस बार मानसून की कमी हो गई. दाल की कमी, चीनी की कमी, प्याज-आलू की कमी को देश कितने दिन झेलेगा? कुछ नया भी तो कम होना चाहिए.

विद्वान बता रहे हैं कि बादलों की कमी नहीं है लेकिन बादलों में पानी की कमी ज़रूर है. आश्चर्य इस बात का है कि अभी तक सरकार ने यह नहीं कहा कि मानसून की कमी के पीछे विदेशी ताकतों का हाथ है. शायद सरकार अभी तक इतनी काबिल नहीं हुई कि मानसून की कमी के लिए विदेशी ताकतों को जिम्मेदार बता दे.

लेकिन यह सब मैं क्यों लिख रहा हूँ? इसी को कहते हैं घटिया ब्लॉग-लेखन.

अब देखिये न, मुझे प्रस्तुत करना है हमारे कृषि मंत्री का साक्षात्कार और मैं प्रस्तावना में न जाने क्या-क्या ठेले जा रहा हूँ. इसलिए प्रस्तावना को यहीं खत्म करता हूँ और हमारे कृषि मंत्री का साक्षात्कार प्रस्तुत करता हूँ.

आप यह मत पूछियेगा कि इस साक्षात्कार के ट्रांसक्रिप्ट मुझे कहाँ मिले? मैं नहीं बताऊँगा. मैंने (ब्लॉगर) पद और गोपनीयता की कसम खाई है.आप साक्षात्कार पढिये.

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पत्रकार: नमस्कार मंत्री जी.

मंत्री जी: नमस्कार. बाहर आसमान साफ़ है. मौसम अच्छा है....अब यहाँ कोई अंपायर तो है नहीं कि वो हाथ नीचे करके इंटरव्यू शुरू करने का इशारा करेगा. जब मैं खुद ही जसवंत सिंह बन गया हूँ तो अंपायर का रोल भी खुद ही निभा देता हूँ.....वैसे भी क्रिकेट चलाने के लिए मैं ही अध्यक्ष बना रहता हूँ. मैं ही सेलेक्टर भी बन जाता हूँ. मैं ही...इसलिए यहाँ भी मैं ही अंपायर भी बन जाता हूँ... ये लीजिये. मैंने हाथ नीचे किये. अब आप पहला सवाल फेंक सकते हैं.

पत्रकार: जसवंत सिंह? ये वही जिन्हें पार्टी से...

मंत्री जी: सॉरी सॉरी. जसदेव सिंह की जगह मेरे मुंह से जसवंत सिंह निकल गया. कोई बात नहीं. आप सवाल फेंकिये.

पत्रकार: सबसे पहले मेरा सवाल यह है कि आप कृषि मंत्री भी हैं और इस देश की क्रिकेट भी चलाते हैं. क्या आप दोनों काम एक साथ कर पाते हैं?

मंत्री जी: जी हाँ. बिलकुल कर पाता हूँ.... वैसे भी क्रिकेट में पॉलिटिक्स है और पॉलिटिक्स में क्रिकेट..कृषि मंत्रालय में भी पॉलिटिक्स है...जब सब जगह पॉलिटिक्स ही है तो फिर और क्या चाहिए? डबल रोल करने से समय का बेहतर तरीके से मैनेजमेंट होता है...

पत्रकार: वह कैसे? अपनी बात पर प्रकाश डालेंगे?

मंत्री जी: अब देखिये. अगर मैं क्रिकेट देखने दक्षिण अफ्रीका जाऊंगा तो साथ-साथ वहां की कृषि के बारे में भी जानकारी हो जायेगी...... मान लीजिये मैं श्रीलंका में कोई टूर्नामेंट देखने गया. अब हो सकता है वहां यह देखने को मिले कि श्रीलंका वालों ने समुद्र के पानी से खेती करने के लिए कोई नया कैनाल प्रोजेक्ट कर लिया हो. ऐसे में श्रीलंका जाना तो हमारे मंत्रालय के लिए लाभकारी तो साबित होगा ही न?

पत्रकार: जी हाँ. आपकी बात से सहमत हुआ जा सकता है.

मंत्री जी: सहमत हुआ जा सकता है से क्या मतलब है आपका? आपको कहना चाहिए कि आप मेरी बात से सहमत हैं.

पत्रकार: ठीक है. वही समझ लीजिये.

मंत्री जी: हाँ, ये ठीक है. अब आगे का सवाल पूछिए.

पत्रकार: मेरा सवाल यह है कि आप कृषि और क्रिकेट, दोनों को चला सकते हैं इसके बारे में आपने प्रधानमंत्री को कैसे कन्विंस किया?

मंत्री जी: फोटो खिंचवा कर.... आप मेरा यह वाला फोटो देखिये. देख लिया? अब आप बताइए, पगड़ी पहनकर मैं मिट्टी से जुडा हुआ किसान लग रहा हूँ कि नहीं? ये वाला फोटो देख लिया?... अब आप मेरा ये वाला फोटो देखिये. इस फोटो को देखने से क्या आपको नहीं लगता कि मैं आई सी सी का भावी अध्यक्ष लग रहा हूँ?

पत्रकार: जी हाँ. मैं आप की बात से सहमत हूँ. बल्कि इस फोटो में आप आईसीसी के भावी नहीं बल्कि प्रभावी अध्यक्ष लग रहे हैं.

मंत्री जी: है न. कन्विंस करना कितना इजी है, आपको समझ में आ ही गया होगा.

पत्रकार: जी हाँ, समझ में आ गया.... अब मेरा सवाल यह है कि इस वर्ष पहले चरण में मानसून पूरे बासठ प्रतिशत कम रहा. मानसून की इस कमी से उत्पन्न होने वाली परिस्थितियों से निबटने के लिए आपके मंत्रालय ने क्या किया है?

मंत्री जी: देखिये, अभी तक तो कुछ नहीं किया. और कुछ नहीं करने के पीछे एक कारण है. हम कोई भी काम जल्दबाजी में नहीं करते. आपको ज्ञात हो कि जब से मैंने देश की क्रिकेट को चलाना शुरू किया है तब से अगर कोई बैट्समैन अपने पहले टेस्ट में असफल रहे तो हम उसे और मौका देते हैं. हम उसे तुंरत टीम से नहीं निकालते. इसी तरह से हम मानसून को और मौका दे रहे हैं.... अब हम दूसरे चरण के मानसून का परफॉर्मेंस देखेंगे. अगर वह दूसरे चरण में भी कम रहा फिर हम स्थिति से निबटने पर सोचेंगे. क्रिकेट चलाने की वजह से हमने बहुत कुछ नया सीखा है जिसे हम मंत्रालय में भी लागू कर रहे हैं.

पत्रकार: हाँ, वह तो दिखाई दे रहा है. अच्छा यह बताइए कि इतने वर्षों से आपकी पार्टी देश पर शासन कर रही है लेकिन किसानों के लिए आधारभूत योजनायें क्यों नहीं लागू की जा सकी?

मंत्री जी: देखिये, जहाँ तक मेरी पार्टी द्बारा देश पर शासन करने की बात है तो आपको मालूम होना चाहिए कि मेरी पार्टी तो एक रीजनल पार्टी है. मेरी पार्टी ने देश पर शासन नहीं किया है. आपको इतनी छोटी सी बात का पता नहीं है? किसने आपको पत्रकार बना दिया?

पत्रकार: नहीं...., वो तो मैं डिग्री लेकर पत्रकार बना हूँ. लेकिन एक बात तो सच है न कि आप पहले कांग्रेस पार्टी में थे तो यह कहा ही जा सकता है कि आपकी पार्टी ने वर्षों से देश पर शासन किया है.

मंत्री जी: अच्छा अच्छा. आप उस रस्ते से आ रहे हैं. तब ठीक है. आगे का सवाल पूछिए.

पत्रकार: सवाल तो मैंने पूछ ही लिया है. आधारभूत योजनायें...

मंत्री जी: यह कहना गलत है. वैसे भी जब लोन-माफी से काम चल जाए तो फिर आधारभूत योजनाओं की क्या ज़रुरत है? ....अभी हाल में ही हमारी सरकार ने किसानों द्बारा लिया गया सत्तर हज़ार करोड़ रूपये का क़र्ज़ माफ़ किया है....आपको पता है कि कर्ज माफी का यह आईडिया भी मुझे एक क्रिकेट मैच के दौरान मिला?

पत्रकार: कैसा आईडिया? आप प्रकाश डालेंगे?

मंत्री जी: वो हुआ ऐसा कि मैं नागपुर में एक क्रिकेट मैच देख रहा था. क्रिकेट मैच देखने के लिए स्टेडियम में पहुँचने से पहले मैंने विदर्भ के किसानों के एक प्रतिनिधिमंडल से मुलाक़ात की थी. मैच देखते हुए मैंने देखा कि बैट्समैन ने शाट मारा और उसे कवर का फील्डर नहीं रोक सका. संयोग देखिये कि सजी हुई फील्ड में एक्स्ट्रा-कवर था ही नहीं. नतीजा यह हुआ कि बाल बाउंड्री लाइन से बाहर चली गई. चौका हो गया....यह देखते हुए मुझे लगा कि अगर किसानों को एक एक्स्ट्रा-कवर दिया जाय...मेरा मतलब अगर लोन-माफी का एक्स्ट्रा-कवर उन्हें मिल जाए तो फिर...

पत्रकार: समझ गया-समझ गया. सचमुच आप क्रिकेट की वजह से बहुत कुछ सीख गए हैं...लेकिन कुछ आधारभूत योजनायें नहीं बनीं. डॉक्टर एम एस स्वामीनाथन का कहना है कि...

मंत्री जी: मैं भी समझ गया कि आप क्या कहना चाहते हैं. आप डॉक्टर स्वामीनाथन के हवाले से यही कहना चाहते हैं न कि उनके सुझाव पर सरकार ने ध्यान नहीं दिया?

पत्रकार: हाँ. मेरा मतलब यही है.

मंत्री जी: देखिये डॉक्टर स्वामीनाथन हरित क्रान्ति ले आये वह एक अलग बात है. लेकिन उनके सुझाव बहुत लॉन्ग टर्म प्लानिंग की बात लिए हुए हैं और यहाँ हमें चाहिए तुंरत समाधान वाले सुझाव. ऐसे में कर्ज-माफी से बेहतर और क्या हो सकता है? डॉक्टर स्वामीनाथन को यह समझने की ज़रुरत है कि अब ज़माना ट्वेंटी-ट्वेंटी क्रिकेट का है. टेस्ट मैच देखकर पब्लिक बोर हो जाती है. हमें तुंरत रिजल्ट चाहिए.

पत्रकार: लेकिन डॉक्टर स्वामीनाथन की बात में प्वाइंट तो है ही.

मंत्री जी: कोई प्वाइंट नहीं है. आप जिसे प्वाइंट कह रहे हैं, वे सारे सिली प्वाइंट हैं.

पत्रकार: आपके कहने का मतलब लॉन्ग टर्म योजनायें नहीं लागू की जा सकती? यहाँ भी वही क्रिकेट?

मंत्री जी: जी बिल्कुल. अब बिना क्रिकेट के इस देश में कुछ चलता है क्या? वैसे भी डॉक्टर स्वामीनाथन की उम्र हो गई है अब....आप खुद ही सोचिये न. सचिन तेंदुलकर इतने बड़े खिलाड़ी हैं लेकिन क्या वे पचपन साल की उम्र में भी क्रिकेट खेल सकते हैं?...मानते हैं न कि नहीं खेल सकते...बस वैसा ही कुछ डॉक्टर स्वामीनाथन के साथ भी है...अब कृषि-विज्ञान के क्षेत्र में हम यंग टैलेंट लाना चाहते हैं...आप जानते हैं कि यंग टैलेंट लाने का आईडिया मुझे ट्वेंटी-ट्वेंटी क्रिकेट की वजह से मिला?...मैं आपको बताता हूँ कि क्रिकेट की वजह से हमारे मंत्रालय में बहुत कुछ बदल दिया है मैंने.

वैसे, ये आप बार-बार लॉन्ग टर्म, लॉन्ग टर्म की रट क्यों लगा रहे हैं? लॉन्ग टर्म सुनने से मुझे लॉन्ग लेग, लॉन्ग ऑन, लॉन्ग ऑफ वगैरह की याद आती है.

पत्रकार: हाँ, वह तो है. वैसे एक सवाल का जवाब दीजिये. अगर मानसून दूसरे चरण में भी ढीला रहा तो आपका प्लान क्या रहेगा?

मंत्री जी: उसके लिए मैंने सेलेक्टर नियुक्त कर दिए हैं.

पत्रकार: सेलेक्टर नियुक्त कर दिया है आपने? क्या मतलब?

मंत्री जी: माफ़ कीजिये, आप पत्रकार तो हैं लेकिन आपका दिमाग नहीं चलता. केवल कलम चलाने से कोई पत्रकार नहीं हो जाता....सेलेक्टर नियुक्त करने से मेरा मतलब यह है कि मैंने अपने मंत्रालय के अफसरों को सेलेक्टर बना दिया है. वे देश के जिलों का सेलेक्शन करके एक लिस्ट देंगे. फिर मैं एक प्रेस कांफ्रेंस में उन जिलों को सूखा-ग्रस्त घोषित कर दूंगा...आपने बीसीसीआई के सचिव द्बारा टीम सेलेक्शन की सूचना वाला प्रेस कांफ्रेंस अटेंड किया है कभी?

पत्रकार: नहीं. मैं तो कृषि मामलों का पत्रकार हूँ. मैं केवल कृषि मामलों पर रिपोर्टिंग करता हूँ.

मंत्री जी: इसीलिए तो आपके अखबार का सर्कुलेशन ख़तम है...अपने एडिटर से कहें कि वे आपको क्रिकेट मामलों को कवर करने का भी मौका दें....आप देखेंगे कि आपकी एफिसिएंसी बढ़ जायेगी...जैसे मेरी बढ़ गई है...अखबार का सर्कुलेशन भी बढ़ जाएगा. क्रिकेट की वजह से एफिसिएंसी बढ़ जाती है.

पत्रकार: जी. मैं सम्पादक महोदय से आपके सुझाव के बारे में बात करूंगा. वैसे एक प्रश्न मेरा यह है कि अगर कम मानसून की वजह से देश में अनाज की कमी हुई तो क्या आप इसबार भी आस्ट्रेलिया से गेंहू का आयात करेंगे?

मंत्री जी: गेंहूँ का आयात करने के लिए देश में अनाज की कमी का होना ज़रूरी नहीं है.गेंहूँ का आयात तो हमने तब भी किया था जब अनाज की कमी नहीं थी...हाँ इस बात की गारंटी नहीं दे सकता कि इस बार भी आस्ट्रेलिया से ही गेंहूँ का आयात करूंगा.

पत्रकार: ऐसा क्यों? मेरा मतलब क्या ऐसा आप इसलिए करेंगे क्योंकि पिछली बार आस्ट्रलिया वालों ने सडा गेंहूँ भेज दिया था?

मंत्री जी: नहीं वो बात नहीं है....मैं ऐसा इसलिए करूंगा कि एक बार फोटो खिचाने के चक्कर में आस्ट्रलियाई खिलाड़ियों ने मुझे मंच पर धक्का दे दिया था...इसी बात को ध्यान में रखते हुए हमारे बीसीसीआई के पदाधिकारियों ने मुझे सजेस्ट किया कि आस्ट्रलिया से बदला लेने का यही तरीका है कि आप कृषि मंत्री के रोल में उनसे गेंहूँ मत मंगवाईये.

पत्रकार: वैसे आपको नहीं लगता कि गेंहू का आयात करके तबतक कोई फायदा नहीं होगा जब तक आप सार्वजनिक वितरण प्रणाली, मेरा मतलब पब्लिक डिस्ट्रीव्यूशन सिस्टम को ठीक नहीं करेंगे. वैसे क्या कारण है कि पब्लिक डिस्ट्रीव्यूशन सिस्टम ठीक से काम नहीं कर रहा?

मंत्री जी: असल में पब्लिक डिस्ट्रीव्यूशन सिस्टम थर्ड मैन के होने की वजह से काम नहीं कर रहा.

पत्रकार: लेकिन अगर सिस्टम में थर्ड मैन हैं तो उन्हें हटाने की जिम्मेदारी भी तो आपकी ही है.

मंत्री जी: अब देखा जाय तो थर्ड मैन भी तो ज़रूरी होते हैं. पब्लिक डिस्ट्रीव्यूशन से थर्ड मैन हटाने के बारे में मैंने बैठक की थी लेकिन सलाहकारों का विचार था कि थर्ड मैन का रहना दोनों के लिए ज़रूरी है. क्रिकेट में भी और पब्लिक डिस्ट्रीव्यूशन सिस्टम में भी. हमने सुझाव मानते हुए थर्ड मैन नहीं हटाये...देखा आपने? डबल रोल कितने काम की चीज है?

पत्रकार: जी हाँ. वो तो मैं देख रहा हूँ. अच्छा मेरा एक और सवाल यह है कि इस बार सरकार ने किसानों के लिए मिनिमम सपोर्ट प्राइस की घोषणा फसल होने से पहले ही कर दी. ऐसा पहले तो नहीं हुआ था. तो इसबार ऐसा करने का कारण क्या इलेक्शन था?

मंत्री जी: जी नहीं. मिनिमम सपोर्ट प्राइस पहले ही घोषणा करने का आईडिया मुझे क्रिकेट चलाने की वजह से ही मिला......आपके मन में सवाल ज़रूर उभर रहा होगा...उसका जवाब यह है कि क्रिकेट खिलाड़ियों को जब से कान्ट्रेक्ट सिस्टम के तहत पेमेंट होना शुरू हुआ है तब से फीस की घोषणा कान्ट्रेक्ट साइन करने से पहले ही हो जाती है...मिनिमम सपोर्ट प्राइस का आईडिया मुझे वहीँ से मिला...देखा आपने कि क्रिकेट...

पत्रकार: हाँ देखा मैंने कि क्रिकेट चलाने की वजह से आप एक अच्छे कृषि मंत्री बन पाए. वैसे मेरा एक आखिरी सवाल है. आये दिन क्रिकेट खिलाड़ी आपके कहने पर तमाम लोगों के सहायतार्थ मैच खेलते रहते हैं. ऐसे में आपने कभी किसानों की सहायता के लिए क्यों नहीं मैच आयोजित किये?

मंत्री जी: अरे वाह. आप एक कृषि पत्रकार होते हुए भी इतना दिमाग रखते हैं. हमने तो सोचा था कि....चलिए आपके सुझाव को मैं याद रखूँगा और आज ही अपने मंत्रालय के अफसरों की एक मीटिंग बुलाकर इस मसले पर विचार करूंगा.

पत्रकार: लेकिन इस बात पर विचार करने के लिए तो आपको बीसीसीआई की मीटिंग बुलानी चाहिए.

मंत्री जी: वही तो बात है न. मेरे लिए दोनों एक सामान हैं. मैं मंत्रालय वालों से क्रिकेट डिस्कस कर सकता हूँ और क्रिकेट वालों से कृषि...आप नहीं समझेंगे...आप समझते तो क्रिकेट के पत्रकार नहीं बन जाते...खैर, अब मेरे पास और सवाल के लिए वक्त नहीं है...मुझे क्रिकेट असोसिएशन की मीटिंग में जाना है...

Tuesday, August 18, 2009

वाइन फ्लू - एक भविष्यात्मक (ये क्या होता है?) पोस्ट




शुक्रवार १८ अगस्त, २०८१

पूरा अमेरिका वाइन फ्लू से परेशान है. प्राप्त ताजा समाचारों के अनुसार कल रात लास वेगास में वाइन पीकर सत्रह लोग इस फ्लू के शिकार हो गए. अभी तक लगभग सात लाख लोग इस फ्लू के शिकार हो चुके हैं. अमेरिकी गृह मंत्रालय ने कल एक प्रस्ताव पारित करके भारत के उद्योग समूह यूनाइटेड वाइन के उत्पादों पर अमेरिका में इंट्री से रोक लगा दिया है. ज्ञात हो कि यूनाइटेड वाइन प्रख्यात वाइन उद्योगपति जयजय माल्या की कंपनी है.

अमेरिकी गृह मंत्रालय द्बारा जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि भारतीय समूह की इस कंपनी के उत्पादों को जानबूझ कर इस तरह से बनाया गया ताकि ज्यादा से ज्यादा अमेरिकी नागरिक वाइन फ्लू के शिकार हो जाएँ. कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यह भारतीय उद्योग समूह ऐसा करके अमेरिका से बदला लेना चाहता है. विशेषज्ञों के अनुसार इस भारतीय उद्योग समूह का ऐसा मानना है कि साल २००९ में भारत में स्वाइन फ्लू एक ख़ास अमेरिकी साजिश की वजह से फैला था.

अमेरिकी विशेषज्ञों की इस सोच का आधार इस बात को माना जा रहा है कि यूनाइटेड उद्योग समूह की गिनती देशभक्त उद्योग समूह में होती आई है. ज्ञात हो कि साल २००८ में इस उद्योग समूह के तत्कालीन मालिक ने तत्कालीन राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की नीलाम होने वाली वस्तुएं जैसे चश्मा, चप्पल वगैरह खरीद कर देशभक्त होने का सबूत दिया था.

भारतीय व्यापार मंत्री सुश्री डिम्पल नाथ ने अमरीकी सरकार के इस कदम की आलोचना करते हुए कहा कि इस तरह के कदम विश्व व्यापार संगठन की नीतियों के खिलाफ हैं. सुश्री नाथ ने एक प्रेस कांफ्रेंस में बयान जारी करते हुए कहा कि; " अमेरिकी सरकार के इस फैसले की वजह से भारत संयुक्त राष्ट्र संघ में अमेरिका की वाट लगा देगा."

ज्ञात हो कि संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत का दबदबा दुनियाँ के तमाम देशों से ज्यादा है.

सुश्री डिम्पल नाथ ने बताया कि वाइन फ्लू पर अमेरिकी सोच एक कम्प्लेनात्मक मुद्दा हो सकता है लेकिन यूनाइटेड ग्रुप के उत्पादों पर रोक लगाकर अमरीका ने अपने लिए मुश्किलें खड़ी कर ली हैं. भारतीय व्यापर मंत्री ने यहाँ तक कहा कि अमरीका अगर अपने फैसले पर टिका रहता है तो भारत अमेरिका को दी जाने वाली सहायता राशि कम करने पर विचार करेगा.

उधर अमरीकी खुफिया एजेन्सी का मानना है कि यूनाइटेड समूह की फार्मा कंपनी प्रिवेंटिस ने पिछले वर्ष से ही वाइन फ्लू की वैक्सिन पर खोज शुरू कर दी थी. एजेन्सी का मानना है कि यूनाइटेड ग्रुप ने एक साजिश के तहत पहले वाइन फ्लू के वायरस ईजाद किये और उसके बाद अपनी ही फार्मा कंपनी से वैक्सिन बनाने के लिए कहा.

वाइन फ्लू का आतंक अमेरिका में इस तरह से छाया है कि अभी तक अमेरिकी ब्लॉग स्फीयर में लगभग तीन लाख सत्तावन हज़ार ब्लॉग पोस्ट वाइन फ्लू, उसके कारणों और उससे बचने की तमाम विधियों पर लिखी जा चुकी हैं.

ज्ञात हो कि वाइन फ्लू की बीमारी फैलने का मुख्य कारण यह है कि वाइन फ्लू से बीमार लोग और ज्यादा वाइन पीना चाहते हैं. जहाँ डॉक्टर यह चाहते हैं कि लोग वाइन पीना छोड़ दें, वहीं वाइन फ्लू से बीमार लोग और ज्यादा वाइन पीना चाहते हैं.

इधर भारत के योग गुरु स्वामी ज्ञानदेव का मानना है कि वाइन फ्लू से बचने के उपायों में सबसे बढ़िया उपाय यह है कि पीड़ित व्यक्ति को सुबह तीन चम्मच तुलसी के पत्ते का रस आंवले के पत्ते के रस में मिलाकर पीना चाहिए. बाबा ज्ञानदेव ने यह भी बताया कि उनके कारखाने में तैयार तुलसी-आंवला पत्रक रस का व्यवहार करने से सुबह-सुबह मेहनत करने से बचा जा सकता है. अमेरिकी सरकार ने बाबा ज्ञानदेव की कंपनी को दो लाख लीटर पत्रक रस का आर्डर दिया है. विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस बार बाबा ओंड इस कंपनी का मुनाफा पूरे साढ़े सात सौ प्रतिशत से बढ़ जाएगा. इस खबर के आने के बाद कंपनी के शेयर के मूल्य में कल बत्तीस प्रतिशत का उछाल देखा गया.

प्रिवेंशन इज बेटर दैन क्योर नामक मुहावरे से प्रभावित यूरोपीय संघ की आज बैठक होने वाली है. संघ का मानना है कि यूनाइटेड वाइन के उत्पादों पर रोक लगाने की प्रक्रिया अगर पहले ही शुरू कर दी जाय तो...........

Wednesday, July 15, 2009

"हम नौ-दस परसेंट की रेट से ग्रो करेंगे"




सरकार आज देश की जनता के मन में उभरने वाले सवालों का जवाब देने के लिए तैयार हो गए थे. असल में सरकार की तैयारी पर लोगों ने सवाल उठाना शुरू कर दिया था. ऐसे में सरकार के लिए यह ज़रूरी हो गया था कि वे सवालों का जवाब देने के लिए तैयार हों.

वैसे भी सरकार हमेशा विदेश यात्रा पर रहते हैं. अब विदेश यात्रा पर रहेंगे तो जनता कैसे सवाल पूछेंगी? आखिर विदेश यात्रा के दौरान सरकार का हवाई जहाज जितने पत्रकारों को लेकर उड़ सकता है, उतने ही पत्रकार तो सवाल पूछ पायेंगे. सरकार ने अपनी इसी मजबूरी के चलते देश की जनता के सवालों का जवाब देने का मन बनाया था.

सवालों को प्राप्त करने के लिए सरकारी टीवी चैनल तैयार था. सरकार आज उसी टीवी चैनल पर देश की जनता के सवाल कैच करने के लिए बैठे थे. करीब एक घंटे के डिस्कशन के बाद इस फैसले पर पहुंचा गया कि किस क्षेत्र के लोग सबसे पहले सवाल पूछेंगे?

पता चला कि मुंबई के लोग सबसे पहले सवाल पूछ सकते हैं.

लगभग पूरी मुंबई सवाल पूछने के लिए टेलीफोन लेकर तैयार थी. लेकिन इतने सारे सवाल और सरकार एक. ऐसे में सबकुछ भाग्य के भरोसे छोड़ दिया गया. बात भी ठीक थी. आखिर हम इकनॉमिक सुपर पॉवर भी बन जाएँ तो भी भाग्य के सहारे ही बनेंगे.

अँधेरी, मुंबई के मंगेश देशमुख का भाग्य बढ़िया था. सवाल वाला उनका फोन कनेक्ट हो गया. उन्होंने सवाल दाग दिया. बोले; "सरकार, आपने कहा था कि मुंबई को शंघाई बना देंगे. मैं तो कभी शंघाई गया नहीं. ऐसे में क्या यह बात कही जा सकती है कि शंघाई में दो घंटे की बरसात के बाद ही जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है? लोकल ट्रेन्स बंद हो जाती हैं? पूरा शहर पानी से भर जाता है? और ऐसा क्या वहां हर साल होता है?"

सरकार कुछ कहते इससे पहले ही संवाददाता ने कहा; "देखिये, आपको केवल एक सवाल पूछने का अधिकार है. आपने चार सवाल पूछे हैं. आप इनमें से कोई एक सवाल पूछिए."

मंगेश देशमुख कुछ कहते उसके पहले ही सरकार बोले पड़े; "कोई बात नहीं. जनता है. जनता को चार तो क्या, चालीस सवाल पूछने का हक़ है. वे चाहें तो चालीस सवाल भी पूछ सकते हैं."

मंगेश जी लाइन पर ही थे. उन्होंने कहा; "नहीं सरकार, मैं चालीस सवाल नहीं पूछूंगा. आप मेरे इन्ही सवालों का जवाब दे दें."

स्टूडियो में बैठे संवाददाता ने कहा; "ठीक है. मंगेश जी, अब आप अपने सवाल का जवाब सुनिए. हाँ, सरकार अब हमने मंगेश जी की लाइन काट दी है. अब आप उनके सवाल का जवाब दे सकते हैं."

सरकार ने जवाब दिया. बोले; "हम नौ-दस परसेंट की रेट से ग्रो करेंगे"

इतना कहकर सरकार चुप हो गए. संवाददाता ने सरकार की तरफ देखा. जैसे पूछ रहा हो; " जवाब क्यों नहीं देते, सरकार?"

सरकार उनके मन की बात शायद भांप गए. बोले; "नेक्स्ट. अगला सवाल क्या है?"

संवाददाता जी सकपका गए. उन्हें थोड़ी न पता था कि सरकार जवाब दे चुके हैं. वे कुछ सोच ही रहे थे कि घंटी बज गई. उधर से आवाज़ आई; "हलो, हम बनारस से चन्द्र मोहन मिश्रा बोल रहे हैं. नमस्कार. हमारा प्रश्न है कि मंहगाई पर लगाम लगाने के लिए सरकार क्या कर रहे हैं? धन्यवाद ."

संवाददाता ने सरकार की तरफ देखा. सरकार भी जवाब देने के लिए तैयार दिखे. वे बोले; "देखिये, हम नौ-दस परसेंट के रेट से ग्रो करेंगे."

चन्द्र मोहन जी की लाइन संयोग से कटी नहीं थी. वे बोले; "वो तो ठीक है, सरकार लेकिन हमारे सवाल का जवाब दीजिये. मंहगाई पर लगाम......."

इतने में उनकी लाइन काट दी गई. संवाददाता बोले; "ठीक है, चन्द्र मोहन जी. अब सरकार का जवाब सुनिए."

सरकार बोले; "जवाब तो हमने दे दिया. हम नौ-दस परसेंट की रेट से ग्रो करेंगे."

संवाददाता फिर से भौचक्के. मन में तो उनके भी बहुत सारे प्रश्न जन्मे. फिर उन्हें याद आया कि वे तो सरकार के मुलाजिम हैं. उनके मन में उठ रहे प्रश्न हवा हो गए. प्रश्न हवा हुए ही थे कि एक और फोनकॉल आ गया.

दूसरी तरफ से आवाज़ आई; "हेलो, सरकार मैं रायपुर से अनिल पुसदकर बोल रहा हूँ. मेरा आपसे सवाल है कि नक्सलियों के खिलाफ कार्यवाई कब होगी? हमारे राज्य में पुलिसवालों की मौत कब रुकेगी?"

सरकार बोले; "गुड क्वेश्चन. हम नौ-दस परसेंट की रेट से ग्रो करेंगे."

सरकार के पास बैठे संवाददाता बेहोश होते-होते बचे. किसी तरह से संभले. सामने रखे गिलास से पानी पीया. कुछ संभले तो बोल पड़े; "सरकार, लगता है आपको जनता के सवाल सुनाई नहीं दे रहे."

सरकार बोले; "मैं उनके सवाल न भी सुन सकूँ तो भी मुझे पता चल जाएगा कि जनता कैसे-कैसे सवाल पूछ सकती है. आप मेरे जवाब पर कम और जनता के सवाल पर ज्यादा ध्यान दें."

संवाददाता जी क्या करते, सिवाय इसके कि वे जनता का अगला सवाल कैच करते. वे कुछ सोच ही रहे थे कि स्टूडियो वालों ने फोनकॉल कनेक्ट कर दिया. उधर से आवाज़ आई; "हेलो, मैं विश्वदीपक रसिया बोल रहा हूँ. सरकार से मेरा सवाल है..."

सरकार को आवाज़ कुछ जानी-पहचानी लगी. उन्होंने विश्वदीपक जी को टोकते हुए कहा; "रसिया जी, अभी तो आपने कल हवाई जहाज में मुझसे सवाल किया था. आप तो पत्रकार हैं. यहाँ तो मैं केवल जनता के सवालों का जवाब देने के लिए बैठा हूँ. आपने तो कल ही 'शार्क' शिखर सम्मलेन के दौरान मुझे दस मिनट तक सवाल पूछ-पूछ कर बोर किया है. यह जनता का मंच है. यहाँ मैं आपके सवालों का जवाब नहीं दूंगा. आपको सवाल पूछने हैं तो हवाई जहाज में मिलें."

सरकार जब चुप हुए तब लोगों को समझ में आया कि असल में ये आवाज़ प्रसिद्द टीवी पत्रकार विश्वदीपक रसिया की थी. सरकार के पास बैठे संवाददाता जी बोले; "क्या ज़माना आ गया है. टीवी पत्रकार को भी बीच-बीच में जनता बनने की लालसा जाग जाती है."

उनकी बात सुनकर सरकार मुस्कुराने लगे.

मुस्कराहट का दौर चला ही था कि फोन की घंटी फिर बजने लगी. संवाददाता अब तक सरकार के जवाब सुनकर बोर हो चुके थे. उबासी लेते हुए उन्होंने कहा; "हाँ जी, पूछिए. सरकार से. क्या सवाल है आपका?"

दूसरी तरफ से आवाज़ आई; "सरकार, मैं दिल्ली से मुकेश बंसल बोल रहा हूँ. मेरा प्रश्न है...."

बंसल साहब ने अपना प्रश्न पूरा भी नहीं किया कि सरकार बोल पड़े; "देखिये हम नौ-दस परसेंट की रेट से ग्रो करेंगे."

बंसल साहब का सवाल पूरा नहीं हुआ था. लिहाजा उनकी लाइन कटी नहीं थी. वे बोले; " सरकार, नौ-दस परसेंट की रेट से कैसे ग्रो करेंगे? निर्माणाधीन ब्रिज टूट जाता है. लोग मर जाते हैं. मलवे को उठाने के लिए जो क्रेन आती है वो खुद ही टूट जाती है. ये राजधानी में बसे अमेरिका, इंग्लैंड, जर्मनी के एम्बेसेडर वगैरह अपने देश के निवेशकों को क्या रिपोर्ट भेजते
होंगे? आप खुद ही सोचें...."

अचानक बंसल साहब की लाइन कट गई.

सरकार बोले; " हें..हें..वो सब तो ठीक है बंसल साहब. लेकिन मैं आपको बता रहा हूँ न कि हम नौ-दस परसेंट की रेट से ग्रो करेंगे."

जवाब देकर सरकार अगले सवाल का इंतजार करने लगे. संवाददाता जी भी साथ में इंतजार करने लगे लेकिन फिर फोन की घंटी नहीं बजी.

अपने-अपने सवाल से लैस देश भर के लोग अब "हम नौ-दस परसेंट की रेट से ग्रो करेंगे"; इस कविता का भावार्थ खोज रहे हैं.

Monday, June 29, 2009

बजटोत्सव पर निबंध




जैसा कि हम जानते हैं, ये बजट का मौसम है. टीवी न्यूज चैनलों ने अपनी-अपनी औकात के हिसाब से बजट पर आम आदमी, दाम आदमी, माल आदमी, हाल आदमी, बेहाल आदमी वगैरह की डिमांड और सुझाव वगैरह वित्तमंत्री तक पहुंचाने शुरू कर दिए हैं. कोई 'डीयर मिस्टर फाइनेंस मिनिस्टर' के नाम से प्रोग्राम चला रहा है, कोई 'डीयर प्रणब बाबू' तो कोई 'वित्तमंत्री हमारी भी सुनिए' नाम से.

मुझे याद आया, एक आर्थिक संस्था द्बारा साल २००८ में आयोजित किया गया एक कार्यक्रम. 'सिट एंड राइट' नामक इस कार्यक्रम में प्रतियोगियों को बजट के ऊपर निबंध लिखने के लिए उकसाया गया था. पेश है उसी प्रतियोगिता में भाग लेने वाले एक प्रतियोगी का निबंध. सूत्रों के अनुसार चूंकि इस आर्थिक संस्था को सरकारी ग्रांट वगैरह मिलती थी, लिहाजा इस प्रतियोगी के निबंध को रिजेक्ट कर दिया गया था. आप निबंध पढिये.

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बजट एक ऐसे दस्तावेज को कहते हैं, जो सरकार के न होनेवाले इनकम और ज़रुरत से ज्यादा होनेवाले खर्चे का लेखा-जोखा पेश करता है. इसके साथ-साथ बजट को सरकार के वादों की किताब भी माना जा सकता है. एक ऐसी किताब जिसमें लिखे गए वादे कभी पूरे नहीं होते. सरकार बजट इसलिए बनाती है जिससे उसे पता चल सके कि वह कौन-कौन से काम नहीं कर सकती. जब बजट पूरी तरह से तैयार हो जाता है तो सरकार अपनी उपलब्धि पर खुश होती है. इस उपलब्धि पर कि आनेवाले साल में बजट में लिखे गए काम छोड़कर बाकी सब कुछ किया जा सकता हैं.

सरकार का चलना और न चलना उसकी इसी उपलब्धि पर निर्भर करता है. कह सकते हैं कि सरकार है तो बजट है और बजट है तो सरकार है.

सरकार के तमाम कार्यक्रमों में बजट का सबसे ऊंचा स्थान है. बजट बनाना और बजटीय भाषण लिखना भारत सरकार का एक ऐसा कार्यक्रम है जो साल में सिर्फ़ एकबार होता है. सरकार के साथ-साथ जनता भी पूरे साल भर इंतजार करती है तब जाकर एक अदद बजट की प्राप्ति होती है. वित्तमंत्री फरवरी महीने के अन्तिम दिन बजट पेश करते हैं. वैसे जिस वर्ष संसदीय लोकतंत्र की मजबूती जांचने के लिए चुनाव होते हैं, उस वर्ष 'सम्पूर्ण बजट' का मौसम देर से आता है.

भारतीय बजट का इतिहास पढ़ने से हम इस नतीजे पर पहुँचते हैं कि पहले बजट की पेशी शाम को पाँच बजे होती थी. बाद में बजट की पेशी का समय बदलकर सुबह के ११ बजे कर दिया गया. ऐसा करने के पीछे मूल कारण ये बताया गया कि अँग्रेजी सरकार पाँच बजे शाम को बजट पेश करती है लिहाजा भारतीय सरकार भी अगर शाम को पाँच बजे बजट पेश करे तो उसके इस कार्यक्रम से अँग्रेजी साम्राज्यवाद की बू आएगी.

कुछ लोगों का मानना है कि बजट सरकार का होता है. वैसे जानकार लोग यह बताते हैं कि बजट पूरी तरह से उसे पढ़ने वाले वित्तमंत्री का होता है. बजट लिखने से ज्यादा महत्वपूर्ण काम बजट में 'कोट' की जाने वाली कविता के सेलेक्शन का होता है. ऐसा इसलिए माना जाता है कि बजट पढ़ने पर तालियों के साथ-साथ कभी-कभी गालियों का महत्वपूर्ण राजनैतिक कार्यक्रम भी चलता है लेकिन बजटीय भाषण के दौरान जब मेहनत करके छांटी गई कविता पढ़ी जाती है तो केवल तालियाँ बजती हैं.

बजट में कोट की जाने वाली कविता किसकी होगी, ये वित्त मंत्री के ऊपर डिपेण्ड करता है. जैसे अगर वित्तमंत्री तमिलनाडु राज्य से होता है तो अक्सर कविता महान कवि थिरु वेल्लूर की होती है. अगर वित्तमंत्री पश्चिम बंगाल का हो तो फिर कविता कविगुरु रबिन्द्रनाथ टैगोर की होती है. लेकिन वित्तमंत्री अगर उत्तर भारत के किसी राज्य या तथाकथित 'काऊ बेल्ट' का होता है तो कविता या शेर किसी भी कवि या शायर से उधार लिया जा सकता है, जैसे दिनकर, गालिब वगैरह वगैरह.

नब्बे के दशक तक बजटीय भाषणों में सिगरेट, साबुन, चाय, माचिस, मिट्टी के तेल, पेट्रोल, डीजल, एक्साईज, सेल्स टैक्स, इन्कम टैक्स, सस्ता, मंहगा जैसे सामाजिक शब्द भारी मात्रा में पाये जाते थे. लेकिन नब्बे के दशक के बाद में पढ़े गए बजटीय भाषणों में आर्थिक सुधार, डॉलर, विदेशी पूँजी, एक्सपोर्ट्स, इम्पोर्ट्स, ऍफ़डीआई, ऍफ़आईआई, फिस्कल डिफीसिट, मुद्रास्फीति, आरबीआई, ऑटो सेक्टर, आईटी सेक्टर, इन्फ्लेशन, बेल-आउट, स्कैम जैसे आर्थिक शब्दों की भरमार रही. ऐसे नए शब्दों के इस्तेमाल करके विदेशियों और देश की जनता को विश्वास दिलाया जाता है कि भारत में बजट अब एक आर्थिक कार्यक्रम के रूप में स्थापित हो रहा है.

वैसे तो लोगों का मानना है कि बजट बनाने में पूरी की पूरी भूमिका वित्तमंत्री और उनके सलाहकारों की होती है लेकिन जानकारों का मानना है कि ये बात सच नहीं है. जानकार बताते हैं कि बजट के तीन-चार महीने पहले से ही औद्योगिक घराने और अलग-अलग उद्योगों के प्रतिनिधि 'गिरोह' बनाकर वित्तमंत्री से मिलते हैं जिससे उनपर दबाव बनाकर अपने हिसाब से बजट बनवाया जा सके.

जानकारों की इस बात में सच्चाई है, ऐसा कई बार बजटीय भाषण सुनने से और तमाम क्षेत्रों में भारी मात्रा में दी जाने वाली छूट और लूट वगैरह को देखकर पता चलता है. कुछ जानकारों का यह मानना भी है कि सरकार ने कई बार बजट निर्माण के कार्य का निजीकरण करने के बारे में भी विचार किया था लेकिन सरकार को समर्थन देनेवाली पार्टियों के विरोध पर सरकार ने ये विचार त्याग दिए.

बजट का भाषण कैसे लिखा जाए, यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि कौन से पंथ पर चलने वाले सरकार को समर्थन दे रहे हैं. जैसे अगर सरकार को वामपंथियों से समर्थन मिलता है तो निजीकरण, सुधार जैसे शब्द भारी मात्रा में नहीं पाए जाते. उस स्थिति में सुधार की जगह उधार जैसे शब्द ले लेते हैं. वहीँ, अगर सरकार को समर्थन की ज़रुरत न पड़े तो फिर वो जो चाहे, जहाँ चाहे वैसे शब्द सुविधानुसार लिख लेती है.

बजट के मौसम में सामाजिक और राजनैतिक बदलाव भारी मात्रा में परिलक्षित होते हैं. 'बजटोत्सव' के कुछ दिन पहले से ही वित्तमंत्री के पुतले की बिक्री बढ़ जाती है. ऐसे पुतले बजट प्रस्तुति के बाद जलाने के काम आते हैं. कुछ राज्यों में 'सरकार' के पुतले जलाने का कार्यक्रम भी होता है. पिछले सालों में सरकार के वित्त सलाहकारों ने इन पुतलों की मैन्यूफैक्चरिंग पर इक्साईज ड्यूटी बढ़ाने पर विचार भी किया था लेकिन मामले को यह कहकर टाल दिया गया कि इस सेक्टर में चूंकि छोटे उद्योग हैं तो उन्हें सरकारी छूट का लाभ मिलना अति आवश्यक है.

पुतले जलाने के अलावा कई राज्यों में बंद और रास्ता रोको का राजनैतिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होता है. बजट का उपयोग सरकार को समर्थन देने वाली राजनैतिक पार्टियों द्वारा समर्थन वापस लेने की धमकी देने में भी किया जाता है.

बजट प्रस्तुति के बाद पुतले जलाने, रास्ता रोकने और बंद करने के कार्यक्रमों के अलावा एक और कार्यक्रम होता है जिसे बजट के 'टीवीय विमर्श' के नाम से जाना जाता है. ऐसे विमर्श में टीवी पर बैठे पत्रकार और उद्योगपति बजट देखकर वित्तमंत्री को नम्बर देने का सांस्कृतिक कार्यक्रम चलाते हैं. देश में लोकतंत्र है, इस बात का सबसे अच्छा उदाहरण बजट के दिन देखने को मिलता है. एक ही बजट पर तमाम उद्योगपति और जानकार वित्तमंत्री को दो से लेकर दस नम्बर तक देते हैं. लोकतंत्र पूरी तरह से मजबूत है, इस बात को दर्शाने के लिए ऐसे कार्यक्रमों में बीच-बीच में 'आम आदमी' का वक्तव्य भी दिखाया जाता है.

भारतीय सरकार के बजटोत्सव कार्यक्रम पर रिसर्च करने के बाद हाल ही में कुछ विदेशी विश्वविद्यालयों ने अर्थशास्त्र के विद्यार्थियों के पाठ्यक्रम में भारतीय बजट के नाम से एक नया अध्याय जोड़ने पर विमर्श शुरू कर दिया है. कुछ विश्वविद्यालयों का मानना है; 'अगर भारत सरकार के बजट को पाठ्यक्रम में रखा जाय तो न सिर्फ अर्थशास्त्र के विद्यार्थियों को लाभ मिलेगा अपितु राजनीतिशास्त्र के विद्यार्थी भी लाभान्वित होंगे.'

आशा है भारतीय सरकार के बजट की पढ़ाई एकदिन पूरी दुनियाँ में कम्पलसरी हो जायेगी. भारतीय बजट दिन दूनी और रात चौगुनी तरक्की करेगा.

जय हिंद का बजट

Friday, June 5, 2009

साहेब, यूरिया पर सब्सिडी बढा देते तो......




अस्सी और नब्बे के दशक तक दूध वाला घर पर दूध दे जाता था. गाय का 'प्योर' दूध. बेचारा कभी-कभी पानी मिलाना भूल जाता था. जिस दिन पानी मिलाना भूल जाता था, हम सब को दूध के प्योर होने पर शंका होने लगती थी. उस दिन कहना नहीं भूलते थे कि; "आज दूध कुछ ठीक नहीं लग रहा."

दूसरे दिन जब उससे कहते कि कल का दूध ठीक नहीं लगा तो हंसते हुए बोलता; " कल पानी मिलाना भूल गए थे."

दूध वाले से हमेशा शिकायत ही रहती थी. उसके सामने तो कुछ नहीं कहते थे लेकिन उसके जाने के बाद शुरू हो जाते थे; "इसकी बदमाशी बढ़ गई है. पहले केवल पानी मिलाता था, आजकल मूंगफली पीस कर दूध में मिला देता है जिससे दूध गाढा दिखे. इसे अब छुड़ाना ही पडेगा."

लेकिन दूसरे दिन फिर पानी वाला दूध पीकर संतोष कर लेते थे.

आजकल दूध वाले को गाली देना बंद हो गया है. आज तो उस दूध वाले को याद करके आँखों में आंसू आ जाते हैं. यह कहते हुए ठंडी सांस लेते हैं कि; "अब कहाँ मिलेंगे ऐसे ईमानदार दूधवाले? कितना ईमानदार था बेचारा. दूध में केवल पानी और मूंगफली मिलाता था."

सच में. अगर ऐसे दूध वाले मिल जाते तो पूरा मोहल्ला मिलकर राष्ट्रपति को एक ज्ञापन दे डालता कि; "इस ईमानदार दूधवाले को गोल्ड मेडल दिलवाईये क्योंकि यह दूध में केवल पानी और मूंगफली मिलाता है."

आखिर ऐसा क्यों न हो?

अब बाजार से पैकेट वाला दूध आता है. सालों तक ये कहकर पीते रहे कि "दूध ताजा तो नहीं रहता लेकिन प्योर रहता है."

लेकिन यह क्या? टीवी न्यूज चैनल ने स्टिंग ऑपरेशन करके बताया कि दूध में यूरिया, डिटर्जेंट, शैंपू वगैरह मिलाया जाता है. कहते हैं यूरिया मिलाने से दूध ज्यादा गाढा और सफ़ेद लगता है. उसके प्योर दिखने में कोई शक नहीं रहता.

जब से पता चला है, गिलास में रखे दूध को शक की निगाह से देखते हैं. खुद से मन ही मन 'लाऊडली' सवाल पूछ लेते हैं; "दूध पी रहे हो कि यूरिया?"

सरकार के लोगों के अलावा टीवी पर दूध कंपनी के कर्मचारियों को देखा. एक मंत्री बता रहे थे कि किसी को छोडेंगे नहीं. अब इसपर क्या कहा जाय? राजू श्रीवास्तव की तरह खीसें निपोरते हुए पूछ लें कि; " भैया छोड़ने की बात तो तब आएगी जब पहले पकड़ोगे."

मिलावटी मामलों पर सरकार के एक अफसर को टीवी पर बोलते हुए देखा. उन्होंने समझाया कि किस तरह से खाने की चीजों में मिलावट रोक पाना आसान नहीं है. कह रहे थे "देखिये, हमारे देश में कानून ढीला है. सालों से बदलाव नहीं हुआ है. फ़ूड इंसपेक्टर कम हैं. नगर निगम ध्यान नहीं देता. ये मिलावट करने वाले एक्सपर्ट होते हैं. पुलिस भी इनसे मिली हुई है. फिर भी हम कोशिश तो कर ही रहे हैं."

मैं अपने आपसे बहुत नाराज हुआ. मन में अपने आपको धिक्कारा. मैंने सोचा "एक ये हैं जिन्हें देश में होने वाले हर वाकये की जानकारी है और एक मैं हूँ जिसे कुछ नहीं पता. कम से इतना तो पता कर सकता हूँ कि मिलावट करने वाले बड़े एक्सपर्ट होते हैं. देश का कानून पुराना और ढीला है."

टीवी वाले बता रहे थे कि लगभग पूरे उत्तर भारत में बिकने वाला दूध इसी तरह का है.

मतलब यह कि पूरी तरह से आर्गेनाइज्ड ऑपरेशन है. यही हाल रहा तो आने वाले दिनों में कुछ ऐसा देखने को मिलेगा.

टीवी पर दूध में मिलावट करने वाले गिरोह के लोग शिकायत भरे लहजे में कह रहे हैं; "अब इस मिलावट के धंधे में भी ज्यादा कुछ प्राफिट नहीं रहा अब. पानी के अलावा बाकी सब कुछ मंहगा है. सरकार ने यूरिया पर से जब से सब्सिडी घटाई
है, हमारा तो धंधा ही चौपट हो गया. डिटर्जेंट पर एक्साईज ड्यूटी इतनी बढ़ गयी है कि अब दूध के मिलावट वाले धंधे में मुनाफा कमाना बहुत कठिन हो गया है. "

मानवाधिकार वाले कहेंगे; " क्या कर रही है सरकार? समाज के किसी वर्ग को तो मंहगाई की मार से बचाए. इन लोगों के लिए कम से कम यूरिया और डिटरजेंट तो सस्ता करवा सकती है."

भाई लोग यह भी कह सकते हैं कि; "धंधा करने के लिए पुलिस से लेकर इलाके के नेता को पैसा देना पड़ता है. कम से कम नेताओं और पुलिस वालों से तो कह सकती है कि भैया, इन लोगों का ख़याल रखो. इनके लिए अपनी 'फीस' में से कुछ छोड़कर इन्हें राहत दो."

बजट आ रहा है. प्रणब बाबू जल्द ही बजट पेश कर देंगे. अभी दो दिन पहले ही उद्योगपतियों का एक दल गिरोह बनाकर वित्त मंत्री से मिल चुका है. ये भाई लोग अपने-अपने उद्योगों के लिए कस्टम और एक्साईज में कटौती की मांग वांग तैयार कर चुके होंगे.

ऐसे में मैं तो इस बात के पक्ष में हूँ कि मिलावट उद्योग के लोगों को भी वित्तमंत्री से मिलना चाहिए. दूध में मिलावट करने वाले कम से कम यूरिया पर मिलने वाली सब्सिडी को बढ़ाने की मांग कर ही सकते हैं. साथ में डिटरजेंट और बाकी के 'रा मैटीरियल' पर सेल्स टैक्स, कस्टम, एक्साईज वगैरह कम करने की मांग भी जरूर करें. भाई, सरकार को भी इनकी मांगें माननी चाहिए.

क्या पता? आज ये लोग यूरिया, डिटर्जेंट, शैंपू मिला रहे हैं. हो सकता है कल को इनका कोई प्राइवेट वैज्ञानिक यह खोज कर ले कि दूध में एसिड मिलाने से दूध न सिर्फ सुन्दर दीखता है बल्कि स्वादिष्ट भी हो जाता है.

सोचिये, तब क्या होगा?

Saturday, May 30, 2009

तरही कविता - मंदी के मारे उर्वशी और पुरुरवा




तरही कविता लिखने के दूसरे चरण में इस बार दिनकर जी द्बारा रचित उर्वशी पर नज़र गई. मुझे लगा कुछ तुकबंदी फिर से इकठ्ठा हो सकती है. फिर ट्राई किया तो तुकबंदी इकठ्ठा हो गई. आप झेलिये.

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रात का समय. आकाश मार्ग से जाती हुई मेनका, रम्भा, सहजन्या और चित्रलेखा पृथ्वी को देखकर आश्चर्यचकित हैं. उन्हें आश्चर्य इस बात का है कि मुंबई के साथ-साथ और भी शहरों के शापिंग माल सूने पड़े हैं. मल्टीप्लेक्स में कोई रौनक नहीं है. दिल्ली में कई निवास पर कोई हो-हल्ला नहीं सुनाई दे रहा. लेट-नाईट पार्टियों का नाम-ओ-निशान नहीं है.

पिछले कई सालों से शापिंग माल और मल्टीप्लेक्स की रौनक देखने की आदी ये अप्सराएं हलकान च परेशान हो रही हैं.

सहजन्या

लोप हुआ है जाल रश्मि का, है अँधेरा छाया
रौनक सारी कहाँ खो गई, नहीं समझ में आया
शापिंग माल में लाईट-वाईट नहीं दीखती न्यारी
कार पार्किंग दिक्खे सूनी, सोती दुनिया सारी

तुझे पता है रम्भे, क्या इसका हो सकता कारण?

रम्भा

कैसा प्रश्न किया सहजन्ये, कैसे करूं निवारण?

हो सकता है इसका उत्तर दे उर्वशी बेचारी
पर अब महाराज पुरु की भी दिक्खे नहीं सवारी

सहजन्या

अरे सवारी कैसे दिक्खे, महाराज सोते हैं
मैंने सुना है, वे भी अब तो दिवस-रात्रि रोते हैं
पृथ्वी पर मंदी छाई है, ठप है अर्थ-व्यवस्था
नहीं पता था, हो जायेगी ऐसी विकट अवस्था

मेनका

अर्थ-व्यवस्था की मंदी तो, दुनियाँ ले डूबेगी

सहजन्या

अगर हुआ ऐसा तो फिर उर्वशी बहुत ऊबेगी

महाराज पुरु की चिंताएं उसे ज्ञात हो शायद
दिन उसके दूभर हो जाएँ स्याह रात हो शायद
मर्त्यलोक की सुन्दरता पर मिटी उर्वशी प्यारी
किसे पता था होगी दुनियाँ इस मंदी की मारी?

पता नहीं किस हालत में उर्वशी वहां पर होगी

मेनका

सच कहती है सहजन्ये वो जाने कहाँ पर होगी

सहजन्या

वह तो होगी वहीँ, जहाँ पर महाराज होते हैं
दिन में विचरण करते हैं, और रात्रि पहर सोते हैं
पिछली बार गए थे दोनों, गिरि गंधमादन पर
हो सकता है अब जाएँ वे, किसी धर्म-साधन पर
लेकिन उनका आना-जाना, अब दुर्लभ हो शायद
मंदी के कारण न उनको, अर्थ सुलभ हो शायद

चित्रलेखा

अरी कहाँ तू भी सहजन्ये मंदी-मंदी गाती
महाराज को कैसी मंदी, दुनियाँ उनसे पाती

मेनका

पाने की बातें करके, ये अच्छी याद दिलाई
सखी उर्वशी को क्या मिलता, उत्सुकता जग आई
तुझे याद हो शायद, उसका कल ही जन्मदिवस है

सहजन्या

महाराज क्या देंगे उसको, मंदी भरी उमस है.

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महाराज पुरुरवा के साथ उर्वशी उद्यान में विचरण कर रही है. कल उसका जन्मदिवस है. महाराज चिंतित हैं. उसे इस बार क्या उपहार दें? पिछले बार इक्यावन तोले का नौलखा हार दिया था. पाश्चात्य देशों से मंगाया गया बढ़िया परफ्यूम और चेन्नई से मंगाई गई नेल्ली चेट्टी की साडियां दी थी.

लेकिन इस बार छाई मंदी की वजह से प्रजा से भी धन वगैरह की प्राप्ति नहीं हुई है. खजाने में केवल एक सप्ताह के आयात के लिए ही फॉरेन एक्सचेंज बचा है. ऐसे में इम्पोर्टेड चीजें मंगाकर उपहार स्वरुप उर्वशी को देना संभव नहीं है. महाराज सोच रहे हैं कि उर्वशी कुछ मांग न बैठे. इसलिए वे आज के लिए उर्वशी से विदा होना चाहते हैं.....

पुरुरवा

चिर-कृतज्ञ हूँ, साथ तुम्हारा मन को करता विह्वल
जब से हम-तुम मिले, लगे ये धरा हो गई उज्जवल
मन के हर कोने में, बस तुम ही तुम हो हे नारी
लेकिन हमको करनी है, अब चलने की तैयारी

उर्वशी

चलने की तैयारी! लेकिन क्योंकर कर ऐसी बातें?
चाहें क्या अब महाराज, हो छोटी ही मुलाकातें?
शायद हो स्मरण कि मेरा जन्मदिवस है आया
एक वर्ष के बाद हमारे लिए, ख़ुशी है लाया
पिछले बरस मिला था मुझको हार नौलखा,साड़ी
मैं तो चाहूँ मिले इस बरस, बी एम डब्यू गाड़ी


पुरुरवा

गाड़ी दूं उपहार में कैसे, मंदी बड़ी है छाई
ज्ञात तुम्हें हो अर्थ-व्यवस्था, है सकते में आई
खाली हुआ खजाना मेरा, समय कठिन है भारी
अब तो हमको करनी है, बस चलने की तैयारी

उर्वशी

फिर-फिर से क्यों बातें करते हमें छोड़ जाने की?
जाना ही था कहाँ ज़रुरत थी वापस आने की?
या फिर देख डिमांड गिफ्ट का छूटे तुम्हें पसीना
समझो नहीं मामूली नारी, मैं हूँ एक नगीना

समझो भाग्यवान तुम खुद को, मिली उर्वशी तुमको

पुरुरवा

नाहक ही तुम रूठ रही हो, थोड़ा समझो मुझको

पैसे की है कमी और अब लिमिट कार्ड का कम है
धैर्यवान हो सुनो अगर, तो बात में मेरी दम है
मुद्रा की कीमत भी कम है, ऊपर से यह मंदी
क्रेडिट क्रंच साथ ले आई, पैसे की यह तंगी

उर्वशी

ओके, समझी बात तुम्हारी, मैं भी अब चलती हूँ
वापस जाकर देवलोक में, सखियों से मिलती हूँ
जब तक मर्त्यलोक में मंदी, यहाँ नहीं आऊँगी
देवलोक में रहकर, सारी सुविधा मैं पाऊँगी
थोड़ा धीरज रखो, शायद अर्थ-व्यवस्था सुधरे
हो सुधार गर मर्त्यलोक में, और अवस्था सुधरे
अगर तुम्हें ये लगे, कि सारी सुविधा मैं पाऊँगी
एक मेल कर देना मुझको, वापस आ जाऊंगी


इतना कहकर उर्वशी आकाश में उड़ गई. पुरुरवा केवल उसे देखते रहे.

अब पृथ्वी पर अर्थ-व्यवस्था में सुधार की राह देख रहे हैं. कोई कह रहा था कि अर्थ-व्यवस्था जल्द ही सुधरने वाली है.

Friday, May 29, 2009

तरही कविता ---मंदी लाई दिन काला




आजकल तरही गजल की बात खूब हो रही है. कई बार सोचा कि तरही कविता की बात क्यों नहीं होती. आज सोचा तरही कविता ट्राई की जाए. ट्राई किया तो ये पाव-किलो तुकबंदी इकट्ठी हो गई. आप झेलिये.

पाठक बन्धुवों को अगर बुरा लगे तो उसके लिए एडवांस में क्षमा प्रार्थी हूँ.

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ग्रोथ रुक गई जीडीपी की, मंदी ने मारा पाला
मील-फैक्टरी सूनी पड़ गई, उनपर लटक रहा ताला
लोन लिया था बैंकों से जो, एक्सपेंशन की खातिर वो
ब्याज जोड़कर डबल हो गया, मंदी लाई दिन काला

खूब कमाया डॉलर में, था फारेन ट्रैवेल का मतवाला
यू एस ए हो चाहे यूके, सबको ही सलटा डाला
आज हाल तो ये है, शिमला जाना भी दूभर है अब
लिमिट ख़तम है आज कार्ड का, मंदी लाई दिन काला

आर्डर बुक में जो आर्डर थे, तुरत-फुरत निपटा डाला
डॉलर आया घर में जब, बस शेयर में लगवा डाला
गिरा हुआ है शेयर प्राईस, आर्डर भी अब हाथ नहीं
कैसे खर्च चलेगा भगवन, मंदी लाई दिन काला

एक समय था मिनट-मिनट पर, मिलता था काफी प्याला
वीक-एंड की शामें, ले जाती थी सीधे मधुशाला
बंद हुई ये परिपाटी अब, सारी रौनक चली गई
नहीं मिले अब चाय-वाय भी, मंदी लाई दिन काला

शर्म-ग्रंथि सब जला चुकी हो, जिसके अंतर की ज्वाला
जिसका अंतर्मन ये बोले, दुनियाँ एक धरमशाला
जिसने चमड़ी मोटी कर ली, जो उधार ले जीता हो
वही टिकेगा इस दुनियाँ में, मंदी लाई दिन काला

मुसलमान हो चाहे हिन्दू, सबको घायल कर डाला
मंहगाई की राह पर चलकर, पाँव पड़ा दर्जन छाला
चावल चीनी एक भाव के, दाल की बातें कौन करे
आलू सोलह रूपये किलो, मंदी लाई दिन काला

मृदु भावों वाले जीवन में, कटुता भाव जगा डाला
मीठी स्मृतियों पर पड़ गया, तीखा सा मोटा जाला
ऐसे दिन भी आने थे ये ज्ञात नहीं था हे बंधु
रातों का कटना दूभर है, मंदी लाई दिन काला

बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ मिट गईं, कोई नहीं रोने वाला
बैंक-वैंक तो कितने डूबे, कोई नहीं गिनने वाला
दशकों लगे जिन्हें बनने में, घंटों में वे उखड़ गए
जो हैं बचे डरे जीते हैं, मंदी लाई दिन काला

अर्थ-व्यवस्था की मंदी ने, खेला चौपट कर डाला
बची-खुची थी राजनीति, उसपर भी अब छाया पाला
बन-ठन कर तैयार खड़े थे, शासन में जम जायेंगे
आज खड़े हैं चुप्पी साधे, मंदी लाई दिन काला

पीएम इन वेटिंग थे अब तक, नहीं पहन पाए माला
दांव आख़िरी काम न आया, उलट गया सत्ता प्याला
जीवन भर की सारी मंशा, पल भर में बस हवा हुई
गया रसों से स्वाद सभी अब, मंदी लाई दिन काला

Thursday, April 23, 2009

आम आदमी तो पापी साबित हो जायेगा




आजकल विदेशी बैंकों में अपने देश के वीरों द्बारा रखा गया कालाधन बहुत चर्चा में है. और हो भी क्या सकता है? विदेशी बैंक डूब गए. ऐसे में विदेशी बैंकों में रखे काले धन की ही चर्चा कर डालो. हम चर्चाकार लोग हैं. हमें तो कोई कुछ पकड़ा दे, हम चर्चा कर डालते हैं. 'करके डाल देते हैं.'

अनुमान पर अनुमान लग रहे हैं. कोई कहता पचहत्तर लाख करोड़ रुपया जमा है. कोई कहता है," केवल पचहत्तर लाख करोड़? पता है कि नहीं? पिछले पॉँच साल में ही सात लाख करोड़ जमा हुए हैं. नया-पुराना हिसाब लगाने से कम से कम एक सौ दस लाख करोड़ रुपया होगा."

कितने तो बोलते-बोलते कन्फ्यूजिया जा रहे हैं. पचहत्तर लाख करोड़....कुछ ज्यादा नहीं हो गया? शायद पचहत्तर हज़ार करोड़ होगा....नहीं-नहीं रुकिए बताता हूँ. ऊँगली पर फिर से गणना शुरू हो गई....इकाई.. दहाई... सैकडा..हज़ार.. दस हज़ार..लाख...नहीं नहीं ठीक है. पचहत्तर लाख करोड़ ही है.

लिखते समय लग रहा है कि कुछ गड़बड़-सड़बड़ तो नहीं लिखा जा रहा है?

आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ तो इस बात पर मशगूल हैं कि कितना पैसा आएगा. कहाँ-कहाँ जायेगा. लेकिन कुछ लोग हैं जो इस बात का अनुमान लगा रहे हैं कि इतना पैसा है किसका? नेताओं का? उद्योगपतियों का? अफसरों का?

हम भी यही अनुमान लगा रहे हैं.

कल एक टीवी कार्यक्रम पर एक नेता जी को बोलते देखा. वे बता रहे थे; "देखिये हम सभी राजनीतिक दल के लोग इस बात पर तो राजी ही हैं कि यह कालाधन देश में वापस आ जाए."

उनकी बात सुनकर आश्वस्त हो लिया कि भाई जिनके ऊपर शक किया जा रहा है कि पैसा उनका है, उनमें से एक वर्ग तो चाहता ही है कि पैसा देश में आ जाये. मतलब इस वर्ग का पैसा तो नहिये होगा. अब उद्योगपति और अफसर बचे. उन्हें भी मौका मिले तो वे भी यह बोलकर फारिग हो लें कि वे भी चाहते हैं कि यह कालाधन देश में वापस आ जाए. मतलब यह धन उनका भी नहीं है.

फिर किसका है? शायद देश की आम जनता का हो.

कोई कह रहा है कि शासन में आते ही वे सौ दिन के भित्तर पूरा कालाधन अपने देश में ला पटकेंगे. ठीक वैसे ही जैसे गाँव-देश में लोग गर्मी के दिनों में खांची या बोरे में भूसा ढोते हैं. खलिहान में भरा और दुआरे लाकर पटक दिया. भूसे का अम्बार लग जाता है.

ठीक वैसे ही देश में भूसा सॉरी कला धन का पहाड़ खड़ा हो जायेगा.

अब इतनी बड़ी मात्रा में कालाधन लाने की बात होगी तो तमाम विशेषज्ञ और आर्थिक मामलों के जानकार, एनालिस्ट वगैरह पेन और कल्कुलेटर लेकर बैठेंगे ही. बस, भाई लोग बैठ गए हैं. कोई कह रहा है कि पूरा काला धन आ जायेगा तो भारत की गरीबी दूर हो जायेगी. देश में कोई गरीब रहेगा ही नहीं.

बहुत डराते हैं ये एनालिस्ट लोग. भाई, डरने की तो बात ही है. अब ऐसी बातों से न जाने कितने साहित्यकार, लेखक, ब्लॉगर वगैरह परेशान हैं. ये लोग इसलिए परेशान हैं कि कहीं ऐसा हो गया तो वे निबंध, किस्से, कहानी, पोस्ट वगैरह किसके ऊपर लिखेंगे? जब कोई गरीब ही नहीं रहेगा तो लेखक बेचारा तो मारा गया न. अमीर भी कोई लिखने की चीज है? वो तो अमीर है. उसके पास पैसा है. वो तो खुद ही लेखक बन सकता है.

पैसेवाला भगवान बन सकता है, लेखक तो कुछ भी नहीं.

राजनीतिज्ञ भी परेशान हैं. सोचकर हलकान हुए जा रहे हैं कि जब कोई गरीब रहेगा ही नहीं तो वे लडेंगे किसके लिए? किसके लिए आरक्षण वगैरह को लेकर मारामारी करेंगे? सामाजिक न्याय तो नैनो की बैकसीट पर चला जायेगा. संसद में काम होने लगेगा. संसद रोकने का एक उपाय तो निकल जायेगा हाथ से.

इन राजनीतिज्ञों का यह जनम तो व्यर्थ चला जायेगा. पुराने नेता टाइप लोग इसलिए भी परेशान हैं कि उनके बेटा-बेटी अब क्या करेंगे? इन नेताओं ने अपने बेटे-बेटियों को राजनीति का पाठ पढ़ाकर तैयार किया कि वे लोग गरीबों की लड़ाई लडेंगे. और समय की मार देखिये (या फिर काले धन की मार?) कि देश से गरीब ही गायब हो जायेगा.

मंदी के इस दौर में ऐसे लोग तो बेरोजगार हो जायेंगे. मतलब बेरोजगारी रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच जायेगी. नेता बेरोजगार हो जाए तो समाज में अपराध बढ़ने का चांस और बढ़ जायेगा.

एक स्टॉक ब्रोकर से बात चली. वे बोले; "मज़ा आ जायेगा. सोचिये कि मार्केट में कितना पैसा आ जायेगा. अंधाधुंध खरीदारी होगी. सेंसेक्स पचास हज़ार पहुँच जायेगा."

एक बार के लिए लगा कि ये इतने उत्तेजित हो गए हैं. कहीं यह न कह दें कि सेंसेक्स पचास हज़ार करोड़ पहुँच जायेगा.

सब अपने-अपने स्तर पर खुश नज़र आ रहे हैं. मैं भी अपने स्तर पर खुश हूँ.

मेरे एक मित्र से बात हो रही थी. वे बोले; "जानते हो, अगर पूरा कालाधन आ गया तो हर परिवार को तीन-तीन लाख बांटने पर भी धन ख़त्म नहीं होगा."

उनकी बात सुनकर मैंने तो कह दिया कि; "भैया, मैं तो अपने तीन लाख में से एक लाख का फिक्स्ड डिपॉजिट करूंगा और बाकी जो बचेगा उससे घर के लिए सोफा और एक नैनो गाड़ी खरीदूंगा."

मेरी बात सुनकर हंसने लगे. बोले; "जब देश में इतना पैसा आ ही जायेगा तो तुम्हें फिक्स्ड डिपॉजिट पर ब्याज कौन देगा? एक्कौ परसेंट ब्याज नहीं मिलेगा."

लीजिये, प्लान फेल. पैसा भी क्या-क्या करवाता है. न रहे मुसीबत. ज्यादा रहे तो और मुसीबत. मैंने मन मारकर कहा; "ठीक है. तब खर्चा कर डालेंगे."

वे बोले; "खर्चा कर डालोगे तो फिर पैसा वहीँ चला जायेगा जहाँ से आया था."

लीजिये. मुसीबत ही मुसीबत. हमें क्या मालूम था कि हमारे खर्चने की वजह से ही इतना कालाधन तैयार हो रहा है. मतलब आम आदमी खर्चा करने गया नहीं कि कालाधन बनना शुरू हो जायेगा.

अब तो शायद ऐसा भी दिन देखने को मिले जब नीति-निर्धारण करने वाले काले धन की उत्पत्ति के लिए आम आदमी को दोषी ठहरा सकते हैं. आम आदमी तो पापी साबित हो जायेगा.