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Saturday, December 25, 2010

बापी दास का क्रिसमस




यह निबंध नहीं बल्कि कलकत्ते में रहने वाले एक युवा, बापी दास का पत्र है जो उसने इंग्लैंड में रहने वाली अपने एक नेट-फ्रेंड को लिखा था. इंटरनेट सिक्यूरिटी में हुई गफलत के कारण यह पत्र लीक हो गया. ठीक वैसे ही जैसे सत्ता में बैठी पार्टी किसी विरोधी नेता का पत्र लीक करवा देती है. आप पत्र पढ़ सकते हैं क्योंकि इसमें ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे 'प्राइवेट' समझा जा सके.

दिसम्बर २००७ में लिखा था. फिर से पब्लिश कर दे रहा हूँ. जिन्होंने नहीं पढ़ा होगा वे पढ़ लेंगे:-)

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प्रिय मित्र नेटाली,

पहले तो मैं बता दूँ कि तुम्हारा नाम नेटाली, हमारे कलकत्ते में पाये जाने वाले कई नामों जैसे शेफाली, मिताली और चैताली से मिलता जुलता है. मुझे पूरा विश्वास है कि अगर नाम मिल सकता है तो फिर देखने-सुनने में तुम भी हमारे शहर में पाई जाने वाली अन्य लड़कियों की तरह ही होगी.

तुमने अपने देश में मनाये जानेवाले त्यौहार क्रिसमस और उसके साथ नए साल के जश्न के बारे में लिखते हुए ये जानना चाहा था कि हम अपने शहर में क्रिसमस और नया साल कैसे मनाते हैं. सो ध्यान देकर सुनो. सॉरी, पढो.

तुमलोगों की तरह हम भी क्रिसमस बड़े उत्साह के साथ मनाते हैं. थोडा अन्तर जरूर है. जैसा कि तुमने लिखा था, क्रिसमस तुम्हारे शहर में धूम-धाम के साथ मनाया जाता है, लेकिन हम हमारे शहर में घूम-घाम के साथ मनाते हैं. मेरे जैसे नौजवान छोकरे बाईक पर घूमने निकलते हैं और सड़क पर चलने वाली लड़कियों को छेड़ कर क्रिसमस मनाते हैं. हमारा मानना है कि हमारे शहर में अगर लड़कियों से छेड़-छाड़ न की जाय, तो यीशु नाराज हो जाते हैं. हम छोकरे अपने माँ-बाप को नाराज कर सकते हैं, लेकिन यीशु को कभी नाराज नहीं करते.

क्रिसमस का महत्व केक के चलते बहुत बढ़ जाता है. हमें इस बात पर पूरा विश्वास है कि केक नहीं तो क्रिसमस नहीं. यही कारण है कि हमारे शहर में क्रिसमस के दस दिन पहले से ही केक की दुकानों की संख्या बढ़ जाती है. ठीक वैसे ही जैसे बरसात के मौसम में नदियों का पानी खतरे के निशान से ऊपर चला जाता है.

क्रिसमस के दिनों में हम केवल केक खाते हैं. बाकी कुछ खाना पाप माना जाता है. शहर की दुकानों पर केक खरीदने के लिए जो लाइन लगती है उसे देखकर हमें विश्वास हो जाता है दिसम्बर के महीने में केक के धंधे से बढ़िया धंधा और कुछ भी नहीं. मैंने ख़ुद प्लान किया है कि आगे चलकर मैं केक का धंधा करूंगा. साल के ग्यारह महीने मस्टर्ड केक का और एक महीने क्रिसमस के केक का.

केक के अलावा एक चीज और है जिसके बिना हम क्रिसमस नहीं मनाते. वो है शराब. हमारी मित्र मंडली (फ्रेंड सर्कल) में अगर कोई शराब नहीं पीता तो हम उसे क्रिसमस मनाने लायक नहीं समझते. वैसे तो मैं ख़ुद क्रिश्चियन नहीं हूँ, लेकिन मुझे इस बात की समझ है कि क्रिसमस केवल केक खाकर नहीं मनाया जा सकता. उसके लिए शराब पीना भी अति आवश्यक है.

मैंने सुना है कि कुछ लोग क्रिसमस के दिन चर्च भी जाते हैं और यीशु से प्रार्थना वगैरह भी करते हैं. तुम्हें बता दूँ कि मेरी और मेरे दोस्तों की दिलचस्पी इन फालतू बातों में कभी नहीं रही. इससे समय ख़राब होता है.

अब आ जाते हैं नए साल को मनाने की गतिविधियों पर. यहाँ एक बात बता दूँ कि जैसे तुम्हारे देश में नया साल एक जनवरी से शुरू होता है वैसे ही हमारे देश में भी नया साल एक जनवरी से ही शुरू होता है. ग्लोबलाईजेशन का यही तो फायदा है कि सब जगह सब कुछ एक जैसा रहे.

नए साल की पूर्व संध्या पर हम अपने दोस्तों के साथ शहर की सबसे बिजी सड़क पार्क स्ट्रीट चले जाते हैं. है न पूरा अंग्रेजी नाम, पार्क स्ट्रीट? मुझे विश्वास है कि ये अंग्रेजी नाम सुनकर तुम्हें बहुत खुशी होगी. हाँ, तो हम शाम से ही वहाँ चले जाते हैं और भीड़ में घुसकर लड़कियों के साथ छेड़-खानी करते हैं.

हमारा मानना है कि नए साल को मनाने का इससे अच्छा तरीका और कुछ नहीं होगा. सबसे मजे की बात ये है कि मेरे जैसे यंग लड़के तो वहां जाते ही हैं, ४५-५० साल के अंकल टाइप लोग, जो जींस की जैकेट पहनकर यंग दिखने की कोशिश करते हैं, वे भी जाते हैं. भीड़ में अगर कोई उन्हें यंग नहीं समझता तो ये लोग बच्चों के जैसी अजीब-अजीब हरकतें करते हैं जिससे लोग उन्हें यंग समझें.

तीन-चार साल पहले तक पार्क स्ट्रीट पर लड़कियों को छेड़ने का कार्यक्रम आराम से चल जाता था. लेकिन पिछले कुछ सालों से पुलिस वालों ने हमारे इस कार्यक्रम में रुकावटें डालनी शुरू कर दी हैं. पहले ऐसा ऐसा नहीं होता था. हुआ यूँ कि दो साल पहले यहाँ के चीफ मिनिस्टर की बेटी को मेरे जैसे किसी यंग लडके ने छेड़ दिया. बस, फिर क्या था. उसी साल से पुलिस वहाँ भीड़ में सादे ड्रेस में रहती है और छेड़-खानी करने वालों को अरेस्ट कर लेती है.

मुझे तो उस यंग लडके पर बड़ा गुस्सा आता है जिसने चीफ मिनिस्टर की बेटी को छेड़ा था. उस बेवकूफ को वही एक लड़की मिली छेड़ने के लिए. पिछले साल तो मैं भी छेड़-खानी के चलते पिटते-पिटते बचा था.

नए साल पर हम लोग कोई काम-धंधा नहीं करते. वैसे तो पूरे साल कोई काम नहीं करते, लेकिन नए साल में कुछ भी नहीं करते. हम अपने दोस्तों के साथ ट्रक में बैठकर पिकनिक मनाने जरूर जाते हैं. वैसे मैं तुम्हें बता दूँ कि पिकनिक मनाने में मेरी कोई बहुत दिलचस्पी नहीं रहती. लेकिन चूंकि वहाँ जाने से शराब पीने में सुभीता रहता है सो हम खुशी-खुशी चले जाते हैं. एक ही प्रॉब्लम होती है. पिकनिक मनाकर लौटते समय एक्सीडेंट बहुत होते हैं क्योंकि गाड़ी चलाने वाला ड्राईवर भी नशे में रहता है.

नेटाली, क्रिसमस और नए साल को हम ऐसे ही मनाते हैं. तुम्हें और किसी चीज के बारे में जानकारी चाहिए, तो जरूर लिखना. मैं तुम्हें पत्र लिखकर पूरी जानकारी दूँगा. अगली बार अपना एक फोटो जरूर भेजना.

तुम्हारा,
बापी

पुनश्च: अगर हो सके तो अपने पत्र में मुझे यीशु के बारे में बताना. मुझे यीशु के बारे में जानने की बड़ी इच्छा है, जैसे, ये कौन थे?, क्या करते थे? ये क्रिसमस कैसे मनाते थे?

Wednesday, June 23, 2010

सांस्कृतिक फ़ुटबाल.




फ़ुटबाल वर्ल्ड कप चल रहा है. चल क्या उछल रहा है. मजे लिए जा रहे हैं. पिछले कई दिनों से जानबूझ कर मैं ऐसी जगह नहीं जाता जहाँ दो-चार लोग बैठे हों. डर लगा रहता है कि कहीं कोई फ़ुटबाल के बारे में न पूछ ले. कारण यह है कि हम रविन्द्र जडेजा की बैटिंग ज्यादा इंज्वाय करते हैं. वही जडेजा जिन्होंने पिछली कई पारियों में शून्य पर आउट होकर शून्य को अमर कर दिया है. वैसे भी उस वर्ल्ड कप में कैसे मन लगेगा जहाँ अपने देश की टीम गई ही नहीं. ऐसे में अगर हम अपने शहर वालों की तरह फ़ुटबाल के मजे लेना चाहें तो हमें अर्जेंटीना को समर्थन देना पड़ेगा क्योंकि चे का जन्म उस धरती पर हुआ था और मैराडोना भी वही के हैं, या फिर ब्राजील को, क्योंकि वहाँ के सबसे महान खिलाड़ी पेले कोलकाता में खेल चुके हैं.

हमारे शहर के लोगों के हिसाब से वर्ल्डकप में दो ही टीमें खेलती हैं. अर्जेंटीना और ब्राजील.

ज्यादातर दफ्तर पूरे दिन अलसाई आँखों से भरे हुए हैं. अंग्रेजी न्यूज चैनलों के स्टूडियो में एक्सपर्ट लोग लगे हुए हैं. किसी न किसी टीम की जर्सी पहने हुए ये एक्सपर्ट रोज सुबह टीवी चैनल के स्टूडियो में कैरमबोर्ड जैसी तख्ती पर काठ के छोटे-छोटे खिलाड़ियों को इधर से उधर घुमाकर बताते हैं कि फलाना टीम आज इधर से अटैक करेगी. सामने वाली टीम के डिफेंडर्स बायें से उस अटैक का जवाब देंगे और जो टीम अटैक करेगी वह उस जवाब का तोड़ फलाना तरीके से निकालेगी और मैच जीत जायेगी. फलाना प्लेयर सबसे इम्पार्टेंट है. आज अगर वह खेल गया तो फिर उसकी टीम लास्ट सिक्सटीन में पहुँच जायेगी. एक्सपर्ट की ऐसी बातें मुझे युवराज सिंह की याद दिला देती हैं. लगता है जैसे एक्सपर्ट कह रहा है कि युवराज सिंह बहुत टैलेंटेड खिलाड़ी हैं और अगर वे आज चल गए तो भारत मैच जीत जाएगा.

टैलेंटेड खिलाड़ी की बात पर पता नहीं क्यों मुझे हमेशा ही लगता है कि क्रिकेट और फ़ुटबाल में कोई बहुत ज्यादा अंतर नहीं है.

खैर, बात कर रहा था एक्सपर्ट टाइप लोगों की. मैंने अभी तक देखा है कि अंग्रेजी न्यूज चैनल के स्टूडियो में ये एक्सपर्ट लोग जो भी बोलते हैं, ज्यादातर वैसा होता नहीं है. और जब वैसा नहीं होता है तो मुझे लगता है कि इनलोगों को न्यूज चैनल ने पैसा-वैसा देकर बुलाया होगा. क्या ज़रुरत है पैसे देने की? इनकी जगह मौसम विभाग वालों को बुला लेते. वे भी इतने ही एफिसियेंट हैं. फ़ुटबाल वर्ल्डकप के मैचों के बारे में इन एक्सपर्ट लोगों के एक्सपर्ट कमेन्ट जितने नकारा साबित हो रहे हैं उतने ही नाकारा उन मौसम विभाग वालों के भी साबित होते. ऊपर से मौसम विभाग वाले फ़ुटबाल के बारे में बोलने के लिए तड से तैयार हो जाते. पैसे कम लेते सो अलग.

मेरी तरह ही मेरा एक मित्र अंग्रेजी न्यूज चैनल के स्टूडियो में हो रहे फ़ुटबाल कार्यक्रमों को देखकर त्रस्त लगा. अब चूंकि हम भारतीयों का काम सांत्वना लेन-देन से चल जाता है इसलिए मैंने उससे कहा; "अरे यार गनीमत है कि अपने अंग्रेजी न्यूज चैनल फ़ुटबाल वर्ल्डकप के बारे में आधे घंटे का प्रोग्राम तो दिखा रहे हैं, अपने हिंदी न्यूज चैनलों को सलमान खान और ज़रीन खान के तथाकथित प्रेम सम्बन्ध से ही फुर्सत नहीं है."

वैसे मैं बता दूँ कि मित्र को सांत्वना देने के लिए कही गई बात केवल उस क्षण के लिए जायज थी. मेरा हमेशा से ऐसा मानना रहा है कि अपने हिंदी न्यूज चैनल फ़ुटबाल के बारे में कुछ नहीं दिखा सकते. कोई प्रोग्राम नहीं बना सकते. कारण मेरा वह पक्का विश्वास है जिसके तहत इंडिया टीवी और आजतक जैसे चैनलों के लिए ई पी एल (इंग्लिश प्रीमियर लीग) यूरोप का सबसे बढ़िया बाइक ब्रांड है और ला-लीगा (स्पेन का फ़ुटबाल लीग) सबसे बढ़िया आईसक्रीम ब्रांड. कोई हिंदी न्यूज चैनल फ़ुटबाल वर्ल्ड कप के बारे में बात भी करेगा तो उसे फ़ुटबाल वर्ल्ड कप न कहकर फ़ुटबाल का महाकुम्भ पुकारेगा और उस वर्ल्डकप का भारतीयकरण कर डालेगा जिसमें हमारी टीम के खेलने के चांस शायद अगले पचास सालों में न के बराबर हैं.

लेकिन मेरी बात मेरे शहर के लोगों की बात नहीं है. मेरे शहर के लोग फ़ुटबाल के पीछे पागल हैं. आज भी मोहन बागन और ईस्टबंगाल का मैच न सिर्फ देखने जाते हैं बल्कि मारपीट भी करते हैं. कहते हैं फ़ुटबाल में मारपीट बहुत ज़रूरी है. अगर मारपीट न हो तो फ़ुटबाल मैच दो कौड़ी का. हमारे शहर के लोग कोलकाता को ही फ़ुटबाल का 'मेक्का' कहते हैं. वर्ल्ड चैम्पियन इटली हो या ब्राजील, फ्रांस या अर्जेंटीना, लेकिन हमारा ऐसा मानना है कि फ़ुटबाल का जन्म कोलकाता ही में हुआ है और दुनियाँ का सबसे बढ़िया फ़ुटबाल या तो मोहनबागान वाले खेलते हैं या फिर ईस्टबंगाल वाले.ये बात अलग है कि अगर आप इन क्लबों के ग्राऊँड्स में लगी बेंचों पर बैठ जायेंगे तो बेंच नीचे टूट पड़ेगी.

हमारे यहाँ हर वर्ल्डकप के मौके पर दीवारों पर जो कलाकारी होती है उसे देखकर लगता है जैसे मेसी, काका, रूनी और ड्रोग्बा को पकड़कर किसी ने दीवार पर कैद कर दिया है. सभी अपने-अपने पाँव उठाये हुए. जैसे कह रहे हों; "फ़ुटबाल, माय फूट."

हमारे शहर के लोकल चैनलों पर बोलनेवाला फ़ुटबाल एक्सपर्ट खेल और उसकी स्ट्रेटेजी की बारीकियों को छोड़कर बाकी सारे चीजों के बारे में बोलता है. असल में हमारे शहर का फ़ुटबाल एक्सपर्ट आत्मा से दर्शनशास्त्री और व्यवहार से बुद्धिजीवी होता है. अभी दो दिन पहले की बात है लोकल टीवी चैनल पर चल रहे एक प्रोग्राम में एक एक्सपर्ट मैराडोना के बारे में बात करते हुए हर वह बात बोला जिसका फ़ुटबाल से सम्बन्ध न के बराबर है. जैसे मैराडोना जब नैपोली के लिए खेलते थे तो उन्होंने फला तारीख को वहाँ के मैनेजर से क्या कहा? कैसे उन्हें नैपोली के समाज और वहाँ के बेरोजगार युवकों के बारे में चिंता थी? और यह कि मैराडोना इसलिए महान हैं कि उन्होंने जार्ज बुश को गरिया दिया था और पेले आजतक बुश को गरिया नहीं पाए.

अलग तरीके का फ़ुटबाल प्रेम है हमारे शहर का. आप आइये. पायेंगे कि मिठाई की दूकान पर मिठाइयाँ कहीं फ़ुटबाल के आकार की हैं तो कहीं वर्ल्डकप के आकार की. लगता है जैसे हम यह साबित करना चाह रहे हों कि; "अरे ओछे हैं वे लोग जो वर्ल्डकप जीतना चाहते हैं. हम तो वर्ल्ड कप खाकर संतुष्ट हो लेंगे."

नई-नई मिठाइयाँ बन रही हैं और किसी का नाम मेसी रख दिया गया है तो किसी का काका. लोग मेसी और काका को घर लिए जा रहे हैं. फ्रीज में रख रहे हैं और मैच देखते हुए उन्हें खा ले रहे हैं. खाने के साथ-साथ फ़ुटबाल प्रेम दिखाकर हाथ झाड़ लिया.

हमारी फुटबाली कला का असली नमूना मिठाइयों और चित्रकलाओं में दिखाई दे रहा है. विश्व फ़ुटबाल के लिए यह हमारा सांस्कृतिक योगदान है. ऐसे में कह सकते हैं कि फ़ुटबाल संस्कृति में जितनी भी संस्कृति है, सब हमारी ही देन है.

हमारे मोहल्ले के एंट्रेंस पर दो बड़े-बड़े कटआउट लगाये गए हैं. एक तरफ काका और दूसरी तरफ मेसी. फोटो में दोनों टांग उठाकर तैयार हैं. जब गाड़ी उन कटआउट के सामने से गुजरती है तो डर लगा रहता है कि कहीं ये लोग अपनी टांग न चला दें. इतने बड़े कटआउट कि अगर करूणानिधि देख लें तो अपने पुत्र स्टालिन को तुरंत बुलाकर दो तमाचे रसीद कर देंगे. यह कहते हुए कि; "अन्ना नगर में जो चालीस कटआउट कल लगवाए वे इतने बड़े क्यों नहीं बनवाये?"

हमारे शहर के बप्पी लाहिड़ी जी ने एक बार फिर से फ़ुटबाल वर्ल्डकप के मौके पर अपना 'म्यूजीक' विडियो बनाया है. बनाया तो बनाया उसे रिलीज भी करवा दिया है. गाने के बोल हैं; "बोले बोले बोले बोले..फुटबोल फुटबोल फुटबोल..फुटबोल ईज आवर लाइफ..." साथ ही बप्पी दा ने वह फ़ुटबाल भी खरीद लिया है जिसपर दुनियाँ के तमाम बड़े खिलाड़ियों का आटोग्राफ है. टीवी पर देखकर लगा कि बप्पी दा को थैंक्स बोल डालू. यह कहते हुए कि; "आपसे ही फ़ुटबाल है."

असली भारतीय फ़ुटबाल दीवारों, मिठाइयों और 'म्यूजीक' विडियो में कैद होकर विश्व फ़ुटबाल को हमारे योगदान की गाथा सुना रहा है. प्रियरंजन दाशमुंशी ने जब से होश संभाला, भारतीय फ़ुटबाल की देख-रेख की. अब वे नहीं हैं. अब पता नहीं कौन देख-रेख कर रहा है. हाँ, मुझे हमेशा यह भय सताए रहता है कि सत्तासी वर्षीय के करूणानिधि कल से इंडियन फ़ुटबाल फेडरेशन को संभालने न लग जाएँ.

अब चूंकि हम सांत्वना के लेन-देन से खुश हो लेते हैं तो मैं आपको एक सांत्वना देता हूँ और कहता हूँ; "फ़ुटबाल वह नहीं जो वर्ल्डकप में खेला जा रहा है. असली फ़ुटबाल वह है जो हम खेलते हैं. सांस्कृतिक फ़ुटबाल. और यही विश्व फ़ुटबाल को हमारी देन है."