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Saturday, August 6, 2011

मॉंनसून स्कैम - पार्ट २




जैसा कि मैंने अपनी पिछली पोस्ट में बताया कि बारिश स्कैम के लिए जिम्मेदार सभी लोगों की प्रेस कांफ्रेंस के बारे में लिखूँगा. पिछली बार आपने कोलकाता के प्रभारी बादल की प्रेस कांफ्रेंस की रिपोर्टिंग देखी. आज पेश है कोलकाता के आकाश में छाने वाले बादलों को कंट्रोल करने वाले देवता की प्रेस कांफ्रेंस.

पत्रकार आ चुके हैं. देवता के सेक्यूरिटी गार्ड चाहते थे कि पत्रकार अपने जूते कांफ्रेंस हाल से बाहर उतार कर अन्दर घुसें. देवता ने मना कर दिया. बोले; "पत्रकार भी अपने हैं और जूते भी अपने ही हैं. जो अपने हैं उनसे कैसा खतरा? जूते समेत ही इन्हें अन्दर जाने दो."

उनकी बात सुनकर उनका एक सलाहकार बोला; "हे देव, चूंकि मामला बहुत गरमाया हुआ है और आपके द्वारा साध ली गई मीडिया को देखकर पूरे देवलोक के निवासी यह सोचते हैं कि आपकी यह प्रेस कांफ्रेंस केवल खानापूर्ती है, इसलिए मैं आपको एक सलाह देना चाहूँगा. अगर ऐसे मौकों पर मैं सलाह नहीं दे सकता तो फिर मेरे सलाहकार रहने का क्या फायदा? और तो और, हे देव, बिना सलाह लिए मैं अपनी सैलेरी लेकर गिल्टी फील करूँगा."

देव बोले; "सलाह दीजिये. जरूर दीजिये. सलाह के लिए ही तो आपको स्वर्ण मुद्राएं मिलती हैं. सलाह देने का आपका अधिकार बनता है."

अपने देव से ग्रीन सिग्नल मिलते ही सलाहकार बोला उठा; "तो हे देव, यह रही मेरी सलाह. ध्यान देकर सुनें.... मेरी सलाह यह है कि यहाँ उपस्थित पत्रकारों में से किसी एक को कहकर अपने ऊपर जूता फेंकवा लें. इससे दो बातें होंगी. एक तो आपकी अपनी मीडिया की क्रेडिबिलिटी बनी रहेगी और दूसरा उस पत्रकार को क्षमा करके आप अपना कद बढ़ा लेंगे."

सलाहकार की बात सुनकर देव प्रसन्न हो गए. बोले; "वाह! वाह! तुम्हारी सलाह पाकर हम धन्य हुए. ऐसा सलाहकार किसी और देवता के पास कहाँ? कहो तो अभी गैजेट साइन करके तुम्हें देवलोक महारत्न सम्मान दिलवा दूँ?"

सलाहकार हमेशा की तरह लजाने की एक्टिंग करने लगा. 'लजाते' हुए बोला; "सेवक को केवल देव का आशीर्वाद चाहिए. महारत्न सम्मान तो मिल ही जाएगा. महारत्न सम्मान देव के आशीर्वाद से ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है."

देवता अपने सलाहकार के चमचत्व गुण से भाव विभोर हो गया. वातावरण में चारों तरफ चमचत्व के कण तैर रहे थे. ऊपर से बाकी देवता इस दृश्य को देखकर खुश हुए जा रहे थे. एक देवता ने इस प्रेस कांफ्रेंस पर पुष्पवर्षा कर डाली. सलाहकार ने एक पत्रकार को इस बात के लिए पटा लिया कि कोई कठिन सवाल पूछकर देवता से उचित उत्तर की कामना भंग होने का अभिनय करते हुए वह पत्रकार देवता के ऊपर जूता फेंकेगा. बाद में देवता उसे क्षमा कर देंगे. मीडिया की क्रेडिबिलिटी भी बन जायेगी और उधर उस देवता का कद भी एवेरेस्ट टाइप हो जाएगा.

प्रेस कांफ्रेंस शुरू हुई. देव बोले; "फ्रेंड्स, ऐज यू आर अवेयर, देयर हैव बीन सम....."

अभी देवता ने बोलना शुरू ही किया था कि तीन-चार पत्रकारों ने देवता से देवभाषा में बोलने के लिए कहा. उनकी बात सुनकर देवता बोले; "देवताओं से क्यों देवभाषा बोलवाना चाहते है आपलोग? हम देवता हैं. हमें आंग्ल भाषा में बोलना ही शोभा देता है."

इधर-उधर की बातें हुई. मौका देखते हुए देवता ने अपने सेन्स ऑफ ह्यूमर का प्रदर्शन किया. कुछ ठहाके लगे. उसके बाद पत्रकारों ने प्रश्न दागना शुरू किया. नमूना देखिये;

पत्रकार: क्या यह सही है कि आपके आदेश पर ही कोलकाता के बादलों ने कोलकाता पर वर्षा नहीं करके वहाँ के पानी का कोटा किसी और जगह दे दिया?

देवता: देखिये, यह पहली बार नहीं हुआ है. ऐसा पहले भी होता आया है. मुझसे पहले कोलकाता के प्रभारी देव ने ऐसा कई बार किया था. एक जगह के पानी को दूसरी जगह गिरवा देना कोई नई बात नहीं है.

पत्रकार: लेकिन पहले जो होता आया है उसकी आड़ में ऐसा करना आपको शोभा देता है क्या?

देवता: देखिये, देवों के काम करने का एक तरीका है. हमारा हर फैसला पहले किये गए फैसलों के आधार पर होता है. और जैसा कि मैंने बताया कि हमारे पहले भी वहाँ के प्रभारी देव यह करते रहे हैं....

पत्रकार: क्या यह सच है कि आपने इस बात का फैसला बिना किसी और को बताये कर लिया? क्या यह तानाशाही का प्रतीक नहीं है?

देवता: देखिये, यह तानाशाही है या नहीं वह तो आप पूरा सच जानकर ही निश्चित करें.

पत्रकार: लेकिन डी बी आई (देवलोक ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन) की इन्टेरिम रिपोर्ट में यह कहा गया है कि आपने यह फैसला खुद ही लिया है.

देवता: यह सच नहीं है. यह फैसला लेने से पहले जीओडी यानि ग्रुप ऑफ देवाज की कम से कम तीन मीटिंग्स हुई. इन मीटिंग्स की जानकारी देवराज को भी थी.

पत्रकार: परन्तु देवराज का कहना है कि उन्हें इस फैसले की जानकारी नहीं दी गई. आपने उन्हें अँधेरे में रखा.

देवता: यह सच नहीं है. देवराज को इसकी जानकारी थी. जिस दिन मैंने मिनट्स ऑफ मीटिंग्स उन्हें भेजी थी, वे डांस कंसर्ट में बिजी थे और शायद इसीलिए उन्होंने मिनट्स बुक नहीं देखा.

पत्रकार: आपके ऊपर यह आरोप भी है कि आप मेनका के दूर के रिश्तेदार हैं और इसीलिए उसने देवराज को कहकर आपको कोलकाता जैसे मलाईदार इलाके का प्रभारी बनाया गया. क्या यह रिश्तेदारवाद को बढ़ावा देना नहीं हुआ?

देवता: किसी का रिश्तेदार होना कोई अपराध नहीं है. वैसे हम आपको बता दें कि हमारी नियुक्ति हमारी योग्यता की वजह से हुई है.

पत्रकार: यह अफवाह भी है कि उड़ीसा के कुछ इलाकों से पिछले महीने आपको करीब सात हज़ार घंटे की पूजा-अर्चना मिली और इसलिए आपने कोलकाता का पानी उड़ीसा के उन्ही इलाकों को दे दिया?

देवता: देखिये, देवताओं में चूंकि मैं बहुत पॉपुलर हूँ इसलिए मेरे भक्त हर इलाके में हैं. आप उड़ीसा की बात करते हैं? मेरे भक्त तो रांची में भी हैं. मुझे वहाँ से भी कई हज़ार घंटे की पूजा-अर्चना मिलती रहती है. लेकिन कोलकाता में बरसात न होने की बात को मुझे मिली पूजा से जोड़ना उचित नहीं होगा.

पत्रकार: लेकिन ऐसी खबर आई है कि डीबीआई ने देवराज इन्द्र से ख़ास तौर इस ऐंगिल की जांच करवाने की सिफारिश की है?

देवता: अब यह तो देवराज पर निर्भर करता है कि वे क्या करते हैं. लेकिन मैं यहाँ बता देना चाहता हूँ कि देवराज हमारे देव हैं. हमें उनमें पूरा विश्वास है.

पत्रकार: आपके ऊपर यह आरोप भी हैं कि आपके क्षेत्र के बादल बहुत उद्दंड हो गए हैं. उनके अन्दर डिसिप्लिन नाम की कोई चीज ही नहीं रही. इसी की वजह से वे ढंग से बरसात नहीं कर पाते.

देवता: यह भी गलत आरोप है. जब मैंने अपने इलाके का कार्यभार संभाला था तब वहाँ बादलों की पैदावार बहुत कम होती थी. ऐसे में पानी भी कम ही बरसता था. अब ऐसा नहीं है. अब बादल भी खूब पैदा होते हैं और पानी भी खूब बरसता है.

पत्रकार: कहाँ खूब बरसता है? अगर खूब ही बरसता तो फिर इतना बवाल क्यों होता?

देवता: आप कदाचित उत्तेजित हो रहे हैं. आप बात समझ नहीं रहे हैं. अगर आप देखेंगे तो....

अभी वे बोल ही रहे थे कि पत्रकार ने दाहिने हाथ से अपने दाहिने पाँव का जूता उठाकर इस तरह से देवता की तरफ फेंका कि वह जूता उनके दाहिनी कनपटी के दाहिने तरफ से निकल गया. वहाँ उपस्थित बाकी पत्रकारों, देवता के सिक्यूरिटी गार्ड्स और उसके सलाहकार ने इस पत्रकार को पकड़ लिया. इधर देवता के सिक्यूरिटी गार्ड्स उस पत्रकार को पुलिस को सौंपने की धमकी दे ही रहे थे कि देवता ने कहा; "जाने दो. जाने दो. इस पत्रकार को देखकर लगता है जैसे इसे बहकाया गया है. इसकी गलती नहीं है. किसी ने इसे बहका कर हमारे ऊपर यह आक्रमण करवाया है. इसमें असुरों का हाथ है. यह तो निष्कपट निश्छल पत्रकार मात्र है. इसे छोड़ दो. मैं देवराज से भी आग्रह करूँगा कि वे इसके विरुद्ध कोई कार्यवाई न करें. इसे कारवास की सजा न मिले."

देवता की बात सुनकर उसके सलाहकार ने पत्रकार को देखते हुए अपनी बाएँ आँख दबा दी. पत्रकार मुस्कुरा उठा.

दूसरे दिन ही देवलोक वासियों ने मीडिया की भरपूर सराहना की. उस पत्रकार का नागरिक अभिनन्दन किया गया. देवलोक वासियों में मीडिया की क्रेडिबिलिटी एकबार फिर से वापस आ गई थी. सब इस बात से आश्वस्त थे कि जबतक मीडिया है तबतक उनके अधिकारों की रक्षा होती रहेगी.

Thursday, August 4, 2011

मॉंनसून स्कैम




कोलकाता में करीब पंद्रह-बीस दिनों तक बरसात नहीं हुई. ऐसा नहीं कि बादल छाये नहीं. ऐसा भी नहीं कि बादल भाये नहीं. जब-जब बादल छाये तब-तब बादल भाये (इस कहते हैं आँसू कविता. लिखने वाला लिखे और पढनेवाला आँसू बहाए). ट्विटर पर हजारों ट्वीट दिखाई दीं, जिनमें ट्विटर योद्धाओं ने कोलकाता के आसमान पर छाए गोरे, भूरे, काले, लाल, पीले, सब तरह के बादलों को इतना खूबसूरत बताया कि अगर कटरीना कैफ पढ़ लेतीं तो डिप्रेशन में चली जातीं. जरा सी रिम-झिम हुई तो इन ट्विटर योद्धाओं ने ट्वीट करके अपने पछतावे के बारे में बताया कि क्या बिडम्बना है कि; "ऐसे मौसम में आफिस जाना पड़ेगा." मन ही मन गरम पकौड़े और चाय के संहार का सपना देखा और मन ही मन उन सपनों पर पसीना फेर दिया.

न जाने कितनो ने ने रवींद्र संगीत सुना. कितने तो गुनगुनाते पकड़े गए कि; "पागला हवा बादोल दिने पागोल आमार मोन जेगे उठे.." कवि-हृदय मानवों ने श्री सुमित्रा नंदन पन्त से इंस्पायर होते हुए कवितायें लिखीं. रेन-कोट की बिक्री बढ़ी. दूकान में रखे छातों को घरों का कोना नसीब हुआ. टैक्सी वालों ने टैक्सी यात्रियों से बरसात में एक्स्ट्रा भाड़ा मांगने के प्लान बनाये. प्यासी सड़कों ने पानी पीने के सपने देखे. महानगर पालिका ने भारी बरसात की संभावना को देखते हुए अपने कर्मचारी और पम्प तैयार किये जिससे रास्तों और गलियों में जमे पानी को जल्द-जल्द से निकाला जा सके.

लेकिन बरसात नहीं हुई. सारी तैयारियों पर बादल फिर गए.

कोलकाता के नागरिकों ने देवराज इंद्र को गरियाना शुरू किया. पहले पाँच दिन तो देवलोक की मीडिया ने यह मुद्दा उठाया ही नहीं. कारण यह था कि तमाम बड़े पत्रकार, सम्पादक वगैरह देवराज के साथ डांस कर्सर्ट देखने में बिजी थे. बाद में जब मीडिया को लगा कि बीच-बीच में उसे मीडिया-धर्म का पालन भी करते रहना है, तब उसने यह मुद्दा उठाया. पहले तो देवराज इन्द्र के चेले-चमचों ने साफ़-साफ़ कह दिया कि उनकी इंटीग्रिटी पर सवाल उठाने का अधिकार किसी को नहीं है. कुछ संपादकों ने भी देवराज का बचाव यह कहते हुए किया कि; "देवलोक के छोटे-मोटे कर्मचारियों की लापरवाही के लिए लिए उन्हें दोषी करार देना उचित नहीं है. वे तो दैवीय कार्यों में व्यस्त रहते हैं. किसी इलाके में बारिश हुई या नहीं, ऐसी टुच्ची बात से उनका का क्या लेना-देना?

उनके कुछ चमचों ने तो यहाँ तक कह दिया कि "देवराज को इस मामले में फंसाया जा रहा है. यह शुक्राचार्य की चाल है."

लेकिन तब तक मामला गरमा गया था. मामले ने इतना तूल पकड़ा कि देवराज का मन डांस और सोमरस से भटकने लगा. बाद में उनके सलाहकारों ने उन्हें सलाह दी कि दो-चार प्रेस कांफेरेंस करके मामले को दफनाया जा सकता है. इन्ही परिस्थियों में तमाम लोगों ने प्रेस कांफेरेंस की.

पेश है उन्ही में से एक प्रेस कांफेरेंस कोलकाता के प्रभारी बादल ने किया जिसे कोलकाता में बारिश मैनेजमेंट का प्रभार सौंपा गया था;

कोलकाता के प्रभारी बादल की प्रेस कांफेरेंस:

पत्रकार: आपके ऊपर जो आरोप हैं, क्या वह सही हैं?

बादल: देवलोक के कर्मचारियों पर लगे आरोप कभी सही होते हैं क्या?

पत्रकार: क्या यह सच नहीं है कि देवलोक से कोलकाता के लिए जल लेकर तो आप चले लेकिन कोलकाता के ऊपर बरसात न करके आपने कहीं और बरसात कर दी?

बादल: यह सही नहीं है.

पत्रकार: परन्तु कोलकाता की सूखी सड़कें इस बात की गवाह हैं कि आपने वहाँ बरसात नहीं की.

बादल: हमने तो बरसात की थी. अब ग्लोबल वार्मिंग की वजह से पृथ्वी की ऊपरी सतह पानी सोख ले, तो हम क्या कर सकते हैं?

पत्रकार: लेकिन लोगों ने आपको बरसात करते नहीं देखा.

बादल: देखिये, यह आरोप बदले की भावना से लगाया जा रहा है. पिछले वर्ष जो सूखा पड़ा था उसकी वजह से पत्रकार हमसे बदला लेना चाहते हैं.

पत्रकार: यह आरोप केवल पत्रकारों का नहीं है. कोलकाता के लोगों ने भी आरोप लगाया है.

बादल: लोग़ तो आरोप लगाते रहते हैं लेकिन उन आरोपों में सच्चाई कितनी होती है? अगर लगता है कि जांच की ज़रुरत है तो हम किसी भी तरह की जांच के लिए तैयार हैं.

पत्रकार: जांच की क्या ज़रुरत है? यह तो सीधा-सीधा दिखाई दे रहा है कि पानी कहीं नहीं है. आप चाहें तो अपने हाथों से मिट्ठी छूकर देख लें. किसी तालाब में पानी नहीं है. झील में पानी का स्तर नहीं बढ़ा. सबकुछ तो वैसे ही देखा जा सकता है. इसके लिए जांच की क्या ज़रुरत है?

बादल: देखिये, देवलोक के काम करने का अपना एक तरीका है. हम बिना सुबूत के कुछ नहीं मानते. हाथ से छूकर हम नहीं देखेंगे.

पत्रकार: तो फिर आप क्या चाहते हैं?

बादल: देवराज डी बी आई को निर्देश दें, वह जांच करे. वे चाहे तो किसी अवकाश प्राप्त देवता की अध्यक्षता में एक कमीशन बैठा दें. हमें कोई आपत्ति नहीं.

पत्रकार: जब तक कमीशन जांच करेगा, तब तक अगर आप पानी लाकर फिर से बारिश कर देंगे तो?

बादल: कोलकाता के लिए जितना कोटा इस महीने का था, वह सब ख़त्म हो गया है. अब अगले महीने जितना मिलेगा हम वही आपको दे सकेंगे.

पत्रकार: ऐसी बात है? कोलकाता का कोटा तो आपने कहीं और दे दिया.

बादल: आप चाहें तो ओवर-ड्राफ्ट के लिए अप्लाई कर दें. कोटा बढाया जा सकता है.

पत्रकार: आपके पास कोई सुबूत है कि आपने पानी बरसाया?

बादल: हाँ, हमारे पास सुबूत है. मैं अकेले तो बरसात करने नहीं आया था. मेरे साथ इस समय जो चार बादल और दो बदली बैठी हुई हैं, उनसे पूछ लीजिये. वे आपको बतायेंगे कि पानी बरसाया गया था.

पत्रकार: ये तो सब आपके मातहत काम करते हैं. वो छुटकी बदली बेचारी आपके खिलाफ कैसे जा सकती है?

बादल: हम देवलोक के बादल हैं. हमारे यहाँ सबको छूट है कहीं भी जाने की. वो बादल हो या बदली.

पत्रकार: आप मुद्दे से हमें भटका रहे हैं.

बादल: हम आपको मुद्दे से क्या भटकायेंगे? आपलोग मुद्दे पर थे ही कब?

पत्रकार: आप कहना क्या चाहते हैं?

बादल: हम यही कहना चाहते हैं कि हमें इस बारे में और कुछ नहीं कहना. अब आपको जो कुछ पूछना है वह हमारे बॉस, यानि कोलकाता के प्रभारी देव से पूछिए. उन्होंने हमें जो करने के लिए कहा, हमने किया. अब हम और कोई सवाल नहीं लेंगे.

प्रेस कांफेरेंस ख़त्म हो गई. मामला गरमाया हुआ है. पत्रकार अब कोलकाता के प्रभारी देव से सवाल करेंगे. देव के प्रेस कांफेरेंस के लिए एक दिन का इंतजार कीजिये.

Monday, May 16, 2011

नई दिल्ली, ५ जून, २०१६




दिल्ली से संवाददाता चंदू चौरसिया, चेन्नई से आर राजारामन और मुंबई से रजत सावंत

कल लगातार सत्रहवें दिन सड़क जाम, हड़ताल और हिंसा से देश भर में जनजीवन अस्त-व्यस्त रहा. हालाँकि देश के कुछ प्रमुख शहरों में जनता द्वारा निकाले गए ज्यादातर जुलूस शांतिपूर्ण रहे परन्तु कुछ छोटे शहरों में स्थिति पहले जैसी बनी रही. जहाँ एक तरफ इलाहाबद में प्रदर्शनकारियों ने बुंदेलखंड एक्सप्रेस के तीन डिब्बे आग के हवाले कर दिए वहीँ आगरा में जनशताब्दी एक्सप्रेस के गार्ड और ड्राईवर को किडनैप कर लिया गया. मेरठ में जनता और पुलिस के बीच जमकर झड़पें हुईं जिनमें करीब सैतीस लोगों के घायल होने की खबर है. चंडीगढ़, जालंधर, जयपुर, वाराणसी, पटना, रायपुर, भोपाल, इंदौर, गुवाहाटी, औरंगाबाद, बंगलौर, हैदराबाद और कई महत्वपूर्ण शहरों में हिंसा की घटनाओं की वजह से जाना-माल को भारी क्षति पहुँची है.

उधर दक्षिण भारत के प्रमुख शहरों में भी हिंसा की खबर है. जहाँ चेन्नई में स्थिति कुल मिलाकर शांतिपूर्ण रही वहीँ मदुरै और कोयंबटूर में पुलिस और जनता के बीच संघर्ष में करीब सत्तर लोगों के घायल होने की खबर है. आज एक संवाददाता सम्मलेन में केन्द्रीय गृहमंत्री ने देशवासियों से अपील की है कि वे हिंसा का रास्ता त्यागकर सरकार के साथ बातचीत करें जिससे हिंसा के अलावा एक और रास्ता निकाला जा सके. उधर आज अपनी सरकार के दो वर्ष पूरे होने पर एक स्वागत समारोह में प्रधानमंत्री ने एक बार फिर से दोहराया कि देश में हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं.

प्रधानमंत्री के इस वक्तव्य की आलोचना करते हुए अखिल भारतीय जनता महासभा के अध्यक्ष श्री मानेक राव बाबू राव पाटिल ने मुंबई में एक संवाददाता सम्मलेन में कहा; "प्रधानमंत्री का यह बयान बेहद बचकाना है जब वे कहते हैं कि देश में हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं है. अभी हमारे कार्यकर्ताओं ने कल ही कोल्हापुर, सतारा और वर्धा में हिंसा की है. इससे यह साबित होता है कि हमेशा की तरह इस बार भी प्रधानमंत्री को देश के बारे में कोई जानकारी नहीं है."

उधर चेन्नई में एक जनसभा को संबोधित करते हुए अखिल भारतीय जनता महासभा की तमिलनाडु इकाई के अध्यक्ष श्री रंगनाथन एम श्रीनिवास ने कहा; "जब तक हमारी मांगे पूरी नहीं होंगी हम तमिलनाडु में हिंसा करते रहेंगे. केंद्र सरकार की तरफ से टेलीकम्यूनिकेशन मिनिस्टर ने लोकसभा में अपने एक भाषण में देश को विश्वास दिलाया था कि फोर-ज़ी स्पेक्ट्रम के ऑक्शन में उनकी तरफ से बहुत बड़ा घोटाला किया जाएगा और देश को करीब तीन लाख चौहत्तर हज़ार करोड़ रूपये का चूना लगेगा परन्तु जब हमने आर टी आई के थ्रू जानकारी हासिल की तो हमें पता चला कि यह मिनिस्टर पूरी तरह से निकम्मा है और इसके निकम्मेपन की वजह से देश को केवल एक लाख सत्तर हज़ार करोड़ का नुकशान हुआ. आपको अगर याद हो तो टू-ज़ी स्पेक्ट्रम में ही देश को कुल एक लाख सतहत्तर हज़ार करोड़ का नुकशान हुआ था. ऐसे में हम यह बर्दाश्त नहीं कर सकते कि फोर-ज़ी में किया गया घोटाला टू-ज़ी घोटाले से छोटा हो. मिनिस्टर के इस निकम्मेपन की वजह से पूरी दुनियाँ में भारतवर्ष की साख को भारी धक्का पहुँचा है."

ज्ञात हो कि सरकार और जनता के बीच हिंसा की वारदातें उस दिन से शुरू हुई हैं जब देश भर में जुलूस निकालकर जनता ने सरकार के ऊपर आरोप लगाया कि अपने दो वर्ष के अभी तक के शासनकाल में इस सरकार की तरफ से उतना भ्रष्टाचार नहीं किया जा सका जितना सरकार ने देश की जनता से वादा किया था. जनता के प्रतिनिधियों का यह आरोप है कि यह सरकार भ्रष्टाचार के मामले में किसी भी मंत्रालय के अपने टारगेट पूरा नहीं कर सकी है.

कल इंदौर में बोलते हुए अखिल भारतीय जनता महासभा की मध्यप्रदेश इकाई के महासचिव शिवभंजन सिंह ने कहा; "वर्ष २०१४ के लोकसभा चुनावों के अवसर पर इस सरकार के घोषणा पत्र पर भरोसा करते हुए हमने इसे एक बार फिर से सत्तासीन करवाया परन्तु यह सरकार अपने घोषणा पत्र में किये वादों में से कोई भी वादा ढंग से पूरा नहीं कर पाई है. एक मिनट..एक मिनट..आज आपके समक्ष मैं इस सरकार के घोषणा पत्र की एक कॉपी लेकर आया हूँ. इस घोषणा पत्र के पेज चार पैराग्राफ तीन में सरकार ने वादा करते हुए लिखा था कि अगर इसे सत्ता में पुनः वापस लाया गया तो सरकार रक्षा सौदों में करीब साठ हज़ार करोड़ रूपये का घोटाला करेगी. आप को जानकारी दूँ कि दो वर्ष हो गए इस सरकार को काम करते हुए लेकिन सी ए ज़ी की रिपोर्ट के अनुसार अभी तक केवल इक्कीस हज़ार करोड़ के घोटालों की ही जानकारी मिल पाई है. मैं पूछता हूँ जब अपने वादे के मुताबिक पाँच साल में केवल साठ हज़ार करोड़ के छोटे-मोटे घोटाले करने के अपने वादे को इस सरकार के मंत्री नहीं पूरा कर पा रहे हैं तो हम इस सरकार से क्या उम्मीद करें? ऐसे में हम चाहते हैं कि यह सरकार जल्द से जल्द इस्तीफ़ा दे जिससे देश इससे भ्रष्ट सरकार चुन सके."

उधर मध्यप्रदेश इकाई की अध्यक्षा सुश्री रेवती पटेल ने सरकार की आलोचना करते हुए कहा; "यह सरकार बेशर्म हो गई है. सात महीने पहले जब हमने अपनी मांग रखते हुए यह कहा था कि सरकार जल्द से जल्द पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी करे तो सरकार ने हमें आश्वासन दिया था कि हमारी इस मांग को मानते हुए सरकार पंद्रह दिन के भीतर पेट्रोल की कीमत १८० रूपये प्रति लीटर और डीजल की कीमत १६० रूपये प्रति लीटर करे देगी. लेकिन आज सात महीने बीत गए और अभी तक सरकार ने पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढाने की हमारी मांग को नहीं माना है. हम एक बार फिर से इस सरकार को आगाह करना चाहेंगे कि अगर अगले तीन दिन के भीतर पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढाई नहीं गईं तो हमारा आन्दोलन और हिंसक हो जाएगा."

जब वित्तमंत्री से इस बाबत सवाल पूछा गया तो उन्होंने बताया; "जनता की मांग जायज नहीं है. ऐसा नहीं है कि हम पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ाना नहीं चाहते. हम अपने वादे पर अभी भी टिके हुए हैं. मामला इस बात पर आकर अटक गया कि कीमतों में कितनी बढ़ोतरी की जाय? हम चाहते थे कि पेट्रोल की कीमत केवल बारह रूपये साठ पैसे और डीजल की केवल आठ रूपये दस पैसे बढें वहीँ जनता के प्रतिनिधि इस बात पर अड़े थे कि पेट्रोल की कीमत कम से कम सत्रह रूपये अस्सी पैसे और डीजल की कीमत कम से कम बारह रूपये पचास पैसे बढाई जाय. हम जनता के प्रतिनिधियों से बात कर रहे हैं और जल्द ही एक समझौता करके पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ा दी जायेंगी. इस बीच हम जनता से अपील करते हैं कि वह अपना आन्दोलन वापस ले ले. सरकार पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ाने के लिए वचनबद्ध है."

करीब पंद्रह दिनों से ज्यादा समय से चल रहे इन आन्दोलनों में रोज नई कड़ियाँ जुडती जा रही है. कल दोपहर नागपुर में विदर्भ किसान महासभा और पुलिस के बीच हुई झड़प में बारह पुलिस वाले और सत्रह किसान घायल हो गए. ज्ञात हो कि सरकार विदर्भ के किसानों को फर्टीलाइज़र सब्सिडी, लोन-माफी और बाकी की सहूलियतें देना चाहती है मगर किसान लेने के लिए राजी नहीं हैं. महाराष्ट्र के सबसे कद्दावर नेता श्री जवार ने सरकार की तरफ से किसानों से बातचीत करने की कोशिश की थी परन्तु किसानों ने उन्हें फटकार के भगा दिया था. श्री जवार चाहते थे कि विदर्भ के किसान करीब दो लाख करोड़ रूपये की सराकरी मदद लेने के लिए राजी हो जायें वहीँ किसान इस बात पर अड़े रहे कि उन्हें किसी सरकारी मदद की जरूरत नहीं है. अब करीब दस दिन पुराने मामले ने इतना तूल पकड़ लिया है कि किसान हिंसा पर उतारू हो गए हैं.

ज्ञात हो कि पिछले दिनों वर्तमान सरकार के दो वर्ष पूरे होने पर पी सी मेल्सन और बाउटलुक पात्रिका द्वारा किये गए सर्वेक्षण में जो तथ्य सामने आये थे उनके अनुसार भ्रष्टाचार के मामले में वर्तमान सरकार पूरी तरह से विफल रही है. सर्वे के अनुसार देश की करीब सत्तासी प्रतिशत जनसँख्या यह मानती है कि सरकार ने अपने घोषणा पत्र में किये गए भ्रष्टाचार संबंधी वादे पूरे नहीं किये. वहीँ तेरह प्रतिशत लोगों का यह मानना था कि इस सरकार को भ्रष्टाचार फ़ैलाने के अपने टारगेट को अचीव करने के लिए एक चांस देना चाहिए. ऐसे लोगों का मानना था कि भ्रष्टाचार को फ़ैलाने के अपने वादे पूरे करें के लिए केवल दो वर्ष का समय काफी नहीं है. इसलिए सरकार को और समय देना चाहिए.

आज इस अखबार के सम्पादक से बात करते हुए महान भ्रष्टाचार विशेषज्ञ श्री प्रमोद मेहता ने बताया; "हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस सरकार को पाँच साल के लिए चुना गया है. ऐसे में केवल दो सालों के भ्रष्टाचार के रेकॉर्ड्स देखकर उसे नाकारा बता देना उचित नहीं होगा. हमें धीरज रखना चाहिए. मुझे पूरा विश्वास है कि अगले तीन वर्षों के अपने शासनकाल में यह सरकार भ्रष्टाचार की स्पीड बढ़ाएगी और अपना टारगेट ज़रूर अचीव करेगी. भ्रष्टाचारियों के एक प्रतिनिधिमंडल ने हाल ही में प्रधानमंत्री से मुलाकात की है और उन्हें भ्रष्टाचार के कुछ नए तरीकों को ट्राई करने की सलाह दी है. मेरे सोर्स बताते हैं कि प्रधानमन्त्री जल्द ही उन सलाहों को लागू करेंगे और अगर जरूरत पड़ी तो वे कैबिनेट रि-सफल भी करेंगे. आज जरूरत है कि देश की जनता द्वारा धैर्य न खोने की. आज ज़रुरत है कि देश की जनता प्रधानमंत्री में अपने विश्वास को कायम रखे."

विश्वस्त सूत्रों के अनुसार सरकार जल्द ही भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने देने वाली वर्तमान कैबिनेट कमिटी को रद्द कर देगी. सूत्रों का ऐसा मानना है कि प्रधानमंत्री इस हाइ-पावर्ड कैबिनेट कमिटी के कार्यों से संतुष्ट नहीं हैं. प्रधानमंत्री चाहते हैं कि इस कैबिनेट कमिटी की अध्यक्षता अब वित्तमंत्री नहीं बल्कि गृहमंत्री करें. खबर यह भी है कि अध्यक्ष बदले जाने के बाद जल्द ही यह कैबिनेट कमिटी हायती, इराक, उज्बेकिस्तान, बांग्लादेश और सूडान के दौरे पर जायेगी ताकि भ्रष्टाचार के नए तरीकों पर काम किया जा सके. ऐसी खबर भी है कि इस कमिटी के कुछ सदस्य ऐसे देशों में जाने से बच रहे हैं क्योंकि ऐसे देशों के दौरे में मज़ा नहीं आता. हाल ही में प्रधानमंत्री ने ऐसे सदस्यों को लताड़ लगाई है क्योंकि प्रधानमंत्री का मानना है कि सरकार की भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने की प्राथमिकता मंत्रियों के मौज-मजे से ऊपर है.

हाल ही में संसद को दिए गए अपने बयान में प्रधानमंत्री ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा था; "भ्रष्टाचार और घोटालों का अपना टारगेट न अचीव करने की वजह से जिस तरह से हमारी सरकार की किरकिरी हुई है वह किसी भी हालत में मान्य नहीं है. हम कोशिश करेंगे कि अगले वित्तवर्ष में हम घोटालों और भ्रष्टाचार के हमारे टारगेट पूरे करें. हम स्वीकार करते हैं कि इस वित्तवर्ष के दौरान हमारे मंत्रालयों में घोटालों की संख्या कुल ३६५ रही जो पिछले वित्तवर्ष के मुकाबले केवल तीन प्रतिशत ज्यादा है. ऐसे में हमारी कोशिश यह रहेगी कि घोटालों की ग्रोथ कम से कम जी दी पी ग्रोथ से तो ज्यादा रहे. आज मैं न सिर्फ संसद को बल्कि देश की जनता को भी विश्वास दिलाना चाहूँगा कि हमारी सरकार घोटालों में वांछित वृद्धि न होने की वजह से आहत है और हम कोशिश करेंगे कि अगले वित्तवर्ष में कुछ ज्यादत घोटाले करें जिससे इस वर्ष कम हुए घोटालों की भरपाई हो जाए."

अखिल भारतीय जनता महासभा ने प्रधानमंत्री के इस वादे पर विश्वास करने से मना कर दिया है. महासभा का मानना है कि देश की सरकारें किये गए वादे कभी पूरा नहीं करती इसलिए इस बार महासभा ने सरकार को सबक सिखाने के लिए हिंसा का सहारा लिया है. कल देश के कुछ गणमान्य व्यक्तियों से हस्तक्षेप की अपील करते हुए सरकार ने कहा है कि बुद्धिजीवी, पत्रकार और महान लोग़ आगे आयें और जनता को समझाएं. कुछ बुद्धिजीवियों ने कल राजघाट पर एक सभा की और हारमोनियम, तबले और झांझ की धुन पर प्रसिद्द भजन रघुपति राघव राजाराम, पतित पावन सीताराम गाकर देश की जनता को समझाने का प्रयास किया.

वैसे जनता इन बुद्धिजीवियों की बात मानेगी इस बात की संभावना कम ही है.

Wednesday, March 23, 2011

स्टिंग ऑपरेशन की चिरकुटई




जुलाई २००८ में विश्वास मत के बाद की पोस्ट है.

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देश में आजकल दो ही बातों पर चर्चा हो रही है. एक है अमर सिंह और दूसरा है स्टिंग आपरेशन. पिछले कुछ सालों में स्टिंग आपरेशन इस तरह से फ़ैल चुका है जैसे पहले हैजा और प्लेग जैसी बीमारियाँ फैलती थीं. ऊपर से संसंद में हुए विश्वास प्रस्ताव समारोह ने स्टिंग आपरेशन को एक अलग ऊंचाई प्रदान कर दी है. आज हालत यह है कि कबाड़ चुनते-चुनते अगर किसी कबाड़ी को कोई सीडी मिल जाती है तो वह उस सीडी को धो-पोंछ कर डीवीडी प्लेयर पर चढ़ा लेता है. इस आशा के साथ कि अगर सीडी में किसी नेता का स्टिंग आपरेशन स्टोर्ड होगा तो सीडी को किसी न्यूज चैनल को बेंचकर कुछ पैसा कमाया जा सकता है.

कल सुदर्शन से बात हो रही थी. सुदर्शन ने कहा; "अरे सर, ये उमा भारती तो फंस गई. उन्होंने जिस सीडी का उदघाटन इतने ताम-झाम के साथ किया उसमें तो पोस्टर दिखने की वजह से सब गड़बड़ हो गया."

मेरे मुंह से निकला; "कोई बात नहीं. उस पोस्टर को दीवार से हटाकर फिर से शूटिंग कर लेंगे ये लोग."

मेरी बात सुनकर सुदर्शन हंसने लगा. लेकिन मुझे लगा कि ये भी अजीब बात है. कितना सरल हो गया है 'स्टिंग आपरेशन' करना. फिर मन में आया कि अगर आज से कुछ सालों बाद रि-डिस्कवरी चैनल पर अगर भारत में स्टिंग आपरेशन के इतिहास पर एक डाक्यूमेंट्री दिखाई जायेगी तो कैसे होगी? शायद कुछ ऐसी;

भारत में स्टिंग आपरेशन का इतिहास पुराना है. स्टिंग आपरेशन के पुरातन होने की पुष्टि इस बात से होती है कि भागलपुर में हुए आँख-फोडू काण्ड का भेद सबसे पहले स्टिंग आपरेशन के चलते ही खुला था. इसके आलावा इंडियन एक्सप्रेस नामक समाचार पत्र ने एक स्टिंग आपरेशन की मदद से राजस्थान में लगने वाली औरतों की एक मंडी का पर्दाफाश किया था. शुरू में स्टिंग आपरेशन में स्टिल कैमरे और टेप रिकॉर्डर का उपयोग किया जाता था लेकिन बाद में विडियो शूटिंग के प्रयोग की वजह से स्टिंग आपरेशन में एक क्रांतिकारी बदलाव देखने को मिला.

इक्कीसवीं शताब्दी के आरम्भ में तहलका ने स्टिंग आपरेशन के जरिये ढेर सारे क्रिकेट खिलाड़ियों और नेताओं के भ्रष्ट होने के सुबूत इकठ्ठा किए. हथियारों में दलाली की बात हो या फिर क्रिकेट में पैसा लेकर न खेलने का साहसिक कार्य, सबकुछ स्टिंग आपरेशन की मदद से सामने लाये गए. स्टिंग आपरेशन को नई ऊंचाई तब मिली जब तमाम टीवी न्यूज चैनल स्टिंग आपरेशन के धंधे में उतर गए. पैसे लेकर संसद में सवाल पूछने का कार्यक्रम हो या फिर शारीरिक शोषण के जरिये हिन्दी फिल्मों में हिरोइन का रोल दिलाने के वादे, सब स्टिंग आपरेशन करके जनता के सामने लाये गए.

स्टिंग आपरेशन का विकास कुछ इस तरह से हुआ कि इसके जरिये बहुत सारे लोगों को सताने की प्रथा भी चल निकली. हालत यह हो गयी कि जो समाजशास्त्री पहले स्टिंग आपरेशन को इलाज समझते थे, साल २००८ आते-आते उन्ही समाजशास्त्रियों ने स्टिंग आपरेशन को एक बीमारी मानना शुरू कर दिया. साल २००८ में तत्कालीन सरकार द्बारा विश्वास मत प्राप्ति हेतु लेन-देन के मामले को स्टिंग आपरेशन करके सामने लाने की कोशिश हुई.

स्टिंग आपरेशन के फैलते प्रभाव की वजह से बहुत सारी विदेशी कम्पनियों को भारत एक नए बाज़ार के रूप में दिखने लगा. साल २००८ में संसद में विश्वास मत प्राप्ति कार्यक्रम में स्टिंग आपरेशन के रोल ने विदेशी उद्योगपतियों को बहुत प्रभावित किया. वित्त मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार साल २००८ के सितम्बर महीने में विदेशी पूंजी निवेश के कुल अट्ठारह प्रस्ताव आए जिनमें से आठ सीडी निर्माण, तीन स्पाई विडियो कैमरा निर्माण और चार स्टिंग आपरेशन की शिक्षा हेतु कालेज स्थापना के थे. सरकार ने विदेशी पूँजी निवेश के इन प्रस्तावों को बड़े उत्साह के साथ पास कर दिया. साल २०११ तक विदेशी तकनीक को और आगे बढाते हुए भारतीय उद्योगपतियों ने स्टिंग आपरेशन में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों में क्रांतिकारी बदलाव किया.

साल २००९ तक लगभग सभी राजनैतिक दलों ने अपने-अपने दल में माईनोरिटी सेल, इकनॉमिक सेल, सोशल जस्टिस सेल की तर्ज पर स्टिंग आपरेशन सेल भी स्थापित किए. इन पार्टियों ने अपने इस सेल में काम करने के लिए उन नेताओं को लगाया जिन्हें स्टिंग आपरेशन में फंसने का गौरव प्राप्त था. इन राजनैतिक पार्टियों का मानना था कि स्टिंग आपरेशन में फंसा हुआ नेता ही ऐसे सेल की अध्यक्षता करने का पर्याप्त अनुभव रखता था. कुछ राजनैतिक दलों ने तो विज्ञापन के जरिये अपने स्टिंग आपरेशन सेल के लिए स्क्रिप्ट राईटर्स और कैमरा मैन की भर्ती भी की.

साल २०१० तक लगभग सारे राजनैतिक दल इस बात बार सहमत हो चुके थे कि स्टिंग आपरेशन की पढाई को देश में हाई स्कूल से अनिवार्य कर दिया जाय. नतीजा यह हुआ कि स्टिंग आपरेशन की पढाई करने वाले छात्रों को सरकार की तरफ़ से वजीफे देने का कार्यक्रम शुरू हुआ. विशेषज्ञों का मानना था कि साल २०२० तक रोजगार के सबसे ज्यादा अवसर स्टिंग अपारेशन की पढाई करने वाले छात्रों के लिए ही उपलब्ध होने वाले थे.

स्टिंग आपरेशन की सफलता ने हिन्दी फ़िल्म उद्योग के पुराने निर्देशकों और पटकथा लेखकों को रोजगार के अवसर दिए. कुछ पुराने निर्देशक जिन्हें कोई काम नहीं था, उन्होंने स्टिंग आपरेशन के निर्देशन में हाथ आजमाया और उनमें से कुछ तो काफी सफल भी हुए. इन लोगों को सबसे ज्यादा रोजगार के अवसर टीवी न्यूज चैनल ने उपलब्ध करवाए.

आज भारत में स्टिंग आपरेशन उद्योग का कारोबार करीब सत्तर हजार करोड़ रूपये तक पहुँच चुका है. भारतीयों द्बारा किए गए स्टिंग आपरेशन की ख्याति दुनियाँ भर में फैली हुई है. यही कारण है कि अमेरिका, यूरोप और दक्षिण पूर्व एशिया के कई देश स्टिंग आपरेशन की आउटसोर्सिंग के लिए भारतीय आपरेटरों पर सबसे ज्यादा विश्वास दिखाते हैं. साल २०४५ तक भारतीय स्टिंग आपरेशन उद्योग का कारोबार बढ़कर एक लाख आठ हज़ार करोड़ रूपये तक पहुँच जाने की संभावना है.

Monday, January 10, 2011

तेलंगाना समाचार, १० जनवरी २०१८.




नए राज्य बनाने की कवायद ने हाल के वर्षों में एक उद्योग का रूप ले लिया है. प्लान और बजट बनाकर अभियान चलाये जा रहे हैं. मीडिया में पब्लिक ओपिनियन बनाई जा रही है. भूख हड़ताल की जा रही है. गाँधी जी के रास्ते पर चलने का दावा करते हुए मारपीट भी की जा रही है. यह एक तरह से अच्छा भी है. सरकार अगर किसी राज्य को अच्छी तरह से गवर्न नहीं कर सके तो नया राज्य बना देना अच्छी नीति है. पेश है तेलंगाना राज्य के सन्दर्भ में साल २०१८ की एक न्यूजपेपर रिपोर्ट;

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आज पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश और तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चन्द्रशेखर राव के बीच कटुता ने तब एक नया रूप ले लिया जब श्री राव ने रमेश को यह कहते हुए लताड़ दिया कि; "रमेश को अब शाहजहाँ के परिवार वालों को यह कहते हुए नोटिस भेज देना चाहिए कि उन्होंने ताजमहल बनवाने से पहले पर्यावरण मंत्रालय से क्लीयरेंस नहीं लिया था. साथ ही ताजमहल को गिराने का ऑर्डर भी पास कर देना चाहिए."

ज्ञात हो कि तीन दिन पहले श्री जयराम रमेश ने यह कहकर सबको चौंका दिया था कि तेलंगाना राज्य बनाने के लिए न ही केंद्र सरकार ने और न ही आंध्र प्रदेश सरकार ने साल २०११ में पर्यावरण मंत्रालय से क्लीयरेंस लिया. एक राज्य बनाने के आठ वर्ष बाद श्री रमेश के इस तरह के बयान को राजनीतिक हलकों में बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है. जानकारों का मानना है कि पर्यावरण मंत्रालय जल्द ही सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल कर तेलंगाना राज्य पर स्टे ले लेगा और तब पूरा तेलंगाना ही ठप हो जाएगा.

श्री रमेश के तेलंगाना राज्य बनाने के समय इनवायर्नमेंट क्लीयरेंस न लेने के बयान के बाद तेलंगाना का मुद्दा अंतर्राष्ट्रीय स्तर बहुत महत्वपूर्ण हो गया है. कल शाम भूतपूर्व अमेरिकी उपराष्ट्रपति अल गोर ने भारतीय सरकार की यह कहते हुए आलोचना की है कि; "बिना इनवायर्नमेंट क्लीयरेंस लिए एक राज्य बना देना एक ऐसी बात है जो आने वाले वर्षों में विश्व पर्यावरण के लिए खतरा साबित होगी."

श्री अल गोर की इस बात का समर्थन करते हुए नोबल पुरस्कार विजेता श्री आर के पचौरी ने कहा कि वे श्री रमेश और श्री गोर के साथ हैं और जल्द ही तेलंगाना के मुद्दे पर एक बड़ा आन्दोलन शुरू करेंगे. ज्ञात हो कि पिछले महीने ही श्री पचौरी ने यह घोषणा करते हुए विवाद खड़ा कर दिया था कि पूरे तेलंगाना के ग्लेसियर अगले तीन महीने में ही ख़त्म ही जायेंगे. जब लोगों ने उन्हें याद दिलाया कि तेलंगाना में ग्लेसियर नहीं हैं तब उन्होंने कहा था कि अगर ग्लेसियर नहीं हैं तो पानी ख़त्म हो जाएगा.

श्री पचौरी का मानना है कि पर्यावरण के हिसाब से तेलंगाना अन्टार्कटिका जितना महत्वपूर्ण है.

उधर तेलंगाना के मुख्यमंत्री श्री राव और गृहमंत्री श्री कपिल सिबल में उस समय झगड़ा हो गिया जब श्री सिबल ने अपने एक अद्भुत फ़ॉर्मूले का इस्तेमाल करते हुए यह साबित कर दिया कि तेलंगाना राज्य में अब केवल सत्रह गाँव हैं इसलिए इस राज्य को केंद्र सरकार द्वारा दी जाने वाली सहायता राशि और करों की अदायगी उसी के अनुसार होनी चाहिए. ज्ञात हो कि पिछले सप्ताह तक तेलंगाना में कुल सत्ताईस हज़ार गाँव थे.

विद्वानों का मानना है कि श्री सिबल ने राज्य के गाँवों की संख्या बताने के लिए उसी फ़ॉर्मूले का इस्तेमाल किया है जिसका इस्तेमाल करके साल २०११ में उन्होंने साबित कर दिया था कि टू-ज़ी स्पेक्ट्रम घोटाला एक लाख सतहत्तर हज़ार करोड़ की जगह शून्य रूपये का था. वैसे कुछ विद्वान यह मानते हैं कि श्री सिबल से फ़ॉर्मूला इस्तेमाल करने में कोई भूल हुई है नहीं तो तेलंगाना में गावों की संख्या सत्रह की जगह शून्य होती. कुछ पत्रकार मानते हैं कि आज रात श्री सिबल अपना असली फ़ॉर्मूला इस्तेमाल कर सकते हैं.

सूत्रों का मानना है कि केंद्र और राज्य सरकार के बीच यह झगड़ा एक नया रूप ले सकता है. ऐसे कयास लगाये जा रहे हैं प्रधानमंत्री श्री सिंह इस बात से नाराज़ हैं कि जहाँ देश के बाकी राज्यों में प्याज तीन सौ रूपये किलो बिक रही है वहीँ तेलंगाना में दो सौ नब्बे रूपये किलो बिक रही है. उनका मानना है कि प्याज की दरों में इतना बड़ा अंतर उन्हें बर्दाश्त नहीं है.

केंद्र और राज्य सरकारों के बीच इस झगड़े को सुलझाने के लिए कल प्रधानमंत्री ने जस्टिस श्री कृष्णा के नेतृत्व में एक कमीशन का गठन किया है जो यह सुझाव देगा कि झगड़े को सुलझाने के कितने रास्ते हैं? लोगों का अनुमान है कि झगड़े को सुलझाने के लिए जस्टिस श्री कृष्णा करीब अट्ठारह रास्ते निकालेंगे. उसके बाद सरकारों पर निर्भर करेगा कि वे एक रास्ते पर चलकर झगड़ा सुलझाएं या फिर सारे अट्ठारह रास्तों पर चलकर. ज्ञात हो कि तेलंगाना राज्य के गठन पर जस्टिस श्री कृष्णा ने कुल छ सुझाव दिए थे उन सारे सुझावों पर चलकर तेलंगाना का गठन किया गया था.

Wednesday, December 30, 2009

.... और महाभारत का युद्ध ही नहीं हुआ.




"कदाचित यह कहना उचित नहीं रहेगा वत्स. युवराज दुर्योधन, अपने तातश्री के वचन याद रखना, तुम्हारा अटल रहना सम्पूर्ण हस्तिनापुर के लिए शुभ संकेत नहीं है वत्स. शुभ संकेत नहीं है"; भीष्म पितामह दुर्योधन को समझा रहे थे.

"मैं आपकी बात से सहमत नहीं हूँ पितामह. वासुदेव कृष्ण पांडवों के साथ है तो क्या हुआ? कौरव सेना में वीरों का अभाव है क्या?"; दुर्योधन ने जवाब दे दिया.

मानो चेता रहा हो कि;"राही मासूम रज़ा के लिखे गए डायलाग बोलकर आप मुझे प्रभावित नहीं कर सकते पितामह. और आप राही मासूम रज़ा के लिखे डायलाग बोलेंगे तो मैं भी तो उन्ही का लिखा डायलाग बोलूंगा."

टीवी पर बी आर चोपड़ा द्वारा निर्देशित सीरियल चल रहा था. तबियत खराब हो और घर से बाहर जाना मुश्किल हो तो ऐसे सीरियल बड़ा सहारा देते हैं. भीष्म पितामह का ज्ञान सिरे से नकार देने वाले दुर्योधन को अब समझाने की बारी कर्ण की थी. लेकिन यहाँ भी वही बात. लगता था जैसे दुर्योधन ने कर्ण की बातों को भी न मानने की कसम खा रखी है.

सीरियल देखते-देखते मुझे लगा अजीब आदमी है. अपनों की सीधी-सादी बात इसे समझ में नहीं आ रही है. हिंदी में कही गई बात. आखिर किसकी बात समझ में आएगी इसे? एक बार के लिए लगा कि काश दुर्योधन के समय में डॉक्टर ए पी जे अब्दुल कलाम होते तो दुर्योधन को समझा देते. अपनी बातों को खुद तीन बार बोलते और एक बार दुर्योधन से बुलवाते. इतने में दुर्योधन जी की बुद्धि ठिकाने लग जाती.

फिर मन में आया कि और कौन लोग हैं जो दुर्योधन को समझाने की हैसियत रखते हैं? साथ ही यह भी सोचा कि अगर सीधी बात समझ में नहीं आती तो क्या इसके ऊपर मुहावरे की वर्षा होगी तब इसकी समझ में आएगा कि पांडव को पाँच गाँव देकर झमेला ख़तम करें और युद्ध से बचें.

अचानक एक नाम दिमाग में कौंधा. सिद्धू जी महाराज का. मुझे लगा अपनों की सीधी बात को पत्ता न देने वाले दुर्योधन को अगर सिद्धू जी महाराज समझाते तो क्या होता? शायद कुछ ऐसा सीन होता...

दुर्योधन राजसभा में पितामह की बात न मानने के लिए तर्क दिए जा रहा है. पितामह हलकान च परेशान हैं. अब क्या किया जाय? किसे बुलवाया जाय जिसकी बात दुर्योधन मानेगा? अभी पितामह सोच ही रहे हैं कि अचानक वहां कुछ धुआं उठता है. धुआं छटने के बाद उसमें से सिद्धू जी महाराज प्रकट होते हैं. उन्हें देखकर सभी चकित हैं. सिद्धू जी महाराज की बात "ओए गुरु..." से सबसे के चकित चेहरे सामान्य हुए. महाराज को देखकर दुर्योधन ने कहा; "प्रणाम साधु महाराज. आप कृपा करके अपना परिचय दें और यहाँ आने का प्रयोजन बताएं."

उसकी बात सुनकर सिद्धू जी महाराज ने कहा; "ओये गुरु, परिचय तो यह है कि हमें लोग सिद्धू जी महराज कहते हैं. साधु शब्द की उत्पत्ति सिद्धू शब्द से हुई है. और गुरु, जहाँ तक प्रयोजन की बात है तो सुन ले; कुछ देर पहले जब शाम की चाय ख़त्म करके मैं मुहावरे याद करने के लिए मुहावरा समग्र नामक किताब लेकर बैठा उसी वक्त आकाशवाणी हुई कि; "सिद्धू जी महाराज से प्रार्थना की जाती है कि वे अपने ज्ञान से दुर्योधन की आंखें खोलें और साथ ही युद्ध की तरफ बढ़ रहे हस्तिनापुर के युवराज को उचित मार्ग दिखलायें." बस आकाशवाणी सुनकर मैं आ गया."

"परन्तु यदि साधु महाराज यह सोच रहे हैं कि वे अपने ज्ञान से प्रभावित कर मुझे युद्ध से विमुख कर देंगे तो कदाचित वे ठीक नहीं सोच रहे"; दुर्योधन पूरे सेल्फ कांफिडेंस से बोला.

उसकी बात सुनकर सिद्धू जी महाराज बोले; "माई डीयर दुर्योधन, एक बात अपने दिमाग में बिलकुल क्लीयर कर ले कि गुलकंद कितना भी टेस्टी क्यों न हो उसे रोटी पर रखकर खाया नहीं जाता."

उनकी बात सुनकर न सिर्फ दुर्योधन बल्कि पितामह, विदुर और द्रोणाचार्य जैसे विद्वान् भी चकित रह जाते हैं. साधु की बात तो ठीक लगी लेकिन उन्हें सन्दर्भ समझ में नहीं आया. यही सोचते हुए कि सिद्धू जी महराज की बात का सन्दर्भ क्या है दुर्योधन ने सवाल दागा; "परन्तु साधु महाराज, आपकी बात का सन्दर्भ क्या है? गुलकंद का उदाहरण देते हुए आपके मन-मस्तिष्क में क्या चल रहा था?"

उसकी बात सुनकर सिद्धू जी महाराज बोले; "ओये गुरु, एक बात याद रखना कि; मनुष्य कितना भी बलशाली क्यों न हो, वो हिमालय को हिला नहीं सकता...औषधि कैसी भी हो उसे इस्तेमाल करके वैद्य मरे हुए आदमी को जिला नहीं सकता...कुम्भ के मेले में खोये हुए भाई को डायरेक्टर क्लाइमेक्स से पहले मिला नहीं सकता...और सच तो यह है गुरु कि खाना खाकर पेट भरने के बाद कोई कसम तक भी खिला नहीं सकता.."

राजसभा में बैठे विद्वान, कवि, लेखक, वगैरह सब चकित. सब मन ही मन सोच रहे हैं कि साधु महाराज की बातों का अर्थ क्या है? आपस में करीब दस मिनट कानाफूसी करने के बाद विद्वान इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि साधु महाराज की बातों का अर्थ समझने के लिए शायद विदेशों से विद्वान इम्पोर्ट करने पड़ेंगे.

अचानक दुर्योधन ने महाराज से एक बार फिर सवाल दागा; "साधु महाराज क्षमा करें परन्तु उनकी कही गई बातें बहुत गूढ़ हैं. क्या वे सरल शब्दों में अपनी बात नहीं रख सकते?"

दुर्योधन की बात सुनकर सिद्धू जी महाराज बमक गए. बोले; "दुर्योधन तुझे तो मैं इंटेलिजेंट समझता था. लेकिन आज पता चला कि शकल से इंटेलिजेंट होने में और अकल से इंटेलिजेंट होने में सिर्फ उतना ही फरक होता है जितना सर की चोटी और जूड़े में. जितना धारीवाले कच्छे और बरमूड़े में. दिमाग की ट्यूबलाईट की चोंक को जरा सा हिलाने की ज़रुरत होती है गुरु, ज्ञान रसोईघर के काकरोचों की भांति बढ़ता चल जाता है और ऊन का एक ही सिरा हाथ आ जाए तो पूरा का पूरा स्वेटर उधड़ता चला जाता है. क्या यार दुर्योधन, अगर तुझे मेरी बात समझ में नहीं आती तो अब मैं तुझसे वही कहूँगा जो हरभजन सिंह ने श्रीसंत से कहा था. सुन ले बड़े पते की बात कर रहा हूँ, दुबारा नहीं बोलूंगा. ओये गुरु, सच तो यह है कि गन्ने में फूल नहीं होता. राजा दीर्घजीवी नहीं होता. पहाड़ ऊंचा होता है. समंदर गहरा होता है. चिड़िया आसमान में उड़ती है लेकिन आदमी जमीन पर चलता है. आया है सो जाएगा, राजा, रंक, फ़कीर..कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता, कभी जमीं तो कभी आसमां नहीं मिलता...."

इतना कहकर सिद्धू जी महाराज गायब हो जाते हैं. वहां धुएं की एक परत रह जाती है. हस्तिनापुर के तमाम विद्वान घंटों तक माथा लगाने के बाद भी यह पता नहीं लगा सके कि सिद्धू जी महाराज की सूक्तियों का क्या अर्थ था? दो दिन तक सब बड़े चिंतित रहते हैं कि साधु महाराज की बातें क्या किसी विनाश की ओर इशारा कर रही हैं.

आखिर हारकर पाँच लोगों का एक कमीशन बना दिया जाता है जिसमें कृपाचार्य, द्रोणाचार्य, पितामह, विदुर और कर्ण हैं. कमीशन को सिद्धू जी महाराज की सूक्तियों का अर्थ खोजने के लिए कहा जाता है. सत्रह सालों तक कामकर के भी कमीशन महाराज की सूक्तियों का अर्थ नहीं पता कर पाता. नतीजा यह होता है कि महाभारत का युद्ध ही नहीं हुआ.

रैंडम थाट्स...ये सब युधिष्ठिर की वजह से है......

Wednesday, October 21, 2009

ओलंपिक और एथेलेटिक्स अमरत्व




सुरेश कलमाडी को हम सब जानते हैं. न जाने कितने वर्षों से वे भारतीय एथेलेटिक्स और भारतीय ओलंपिक संघ की गाड़ी हांक रहे हैं. भारत में एथेलेटिक्स और ओलंपिक की बात होती है तो एक ही चेहरा आँख के सामने घूम जाता है और वो है सुरेश कलमाडी जी का. ठीक वैसे ही जैसे पहले भारतीय क्रिकेट की बात होने पर एक ही चेहरा आँख के सामने घूमता था और वो था जगमोहन डालमिया जी का. अब उस चेहरे को ललित मोदी के चेहरे ने रिप्लेस कर दिया है.

वैसे भारतीय क्रिकेट की बात होने पर बीच-बीच में सचिन तेंदुलकर का चेहरा भी आँख के सामने घूम जाता है. लेकिन एथेलेटिक और ओलंपिक की बात पर किसी पी टी ऊषा या फिर किसी मिल्खा सिंह का चेहरा आँख के आगे नहीं घूमता. मुझे तो लगता है कि कभी-कभी खुद मिल्खा सिंह भी मन में सोचते हुए लाउडली बात करते होंगे कि; "जब से होश संभाला, कलमाडी को सामने पाया."

कलमाडी साहब हैं कि उन्हें देखकर लगता है जैसे वे ओलंपिक और एथेलेटिक्स अमरत्व को प्राप्त कर गए हैं.

अब आपको एक राज की बात बताता हूँ. कल मेरी नज़र अचानक युवराज दुर्योधन की डायरी के पेज ९०३ पर पड़ गई. लिखा था;

"आज गुरु द्रोणाचार्य, पितामह और चचा विदुर के विरोध के बावजूद मामाश्री और पिताश्री ने सुरेश कलमाडी को एक बार फिर से भारतीय ओलंपिक संघ का अध्यक्ष बना दिया. सुरेश कलमाडी पिछले दस सालों से इस पद पर जमे हुए हैं. भारतीय ओलंपिक संघ की स्थापना दस साल पहले ऋषि भृगु के कहने पर हुई जिन्होंने एक दिन अपने कमंडल के पानी में भविष्य दर्शन करके बताया था ग्रीस में करीब तीन हज़ार साल बाद ओलंपिक के खेल शुरू होंगे इसलिए खेल-कूद में महान महाराज भरत के योगदान को याद रखते हुए भारतीय ओलंपिक संघ की स्थापना अभी कर देनी चाहिए."

युवराज दुर्योधन की डायरी का पेज ९०३ के अंश पढ़कर मुझे अचानक एक घटना याद आ गई. पिछले साल कोलकाता के इंडियन म्यूजियम से एक विदेशी एजेंट कुछ न्यूजपेपर कटिंग्स के साथ गिरफ्तार हुआ था. पूछताछ से पता चला था कि न्यूजपेपर कटिंग्स की चोरी करके वह क्रिष्टीज के एक ऑक्शन में बेचने का प्लान बनाकर आया था.

आप पढ़ना चाहेंगे कि ये न्यूजपेपर कटिंग्स में क्या लिखा हुआ था? तो पढिये.

लेकिन मुझसे यह मत पूछिए कि ये कटिंग्स मुझे कहाँ से मिलीं? मैंने (ब्लॉगर) पद और गोपनीयता की कसम खाई है इसलिए मैं नहीं बताऊंगा. आप अलग-अलग तारीख की न्यूजपेपर कटिंग्स पढ़िये.

काशी, ईसा पूर्व तारीख २० अक्टूबर, २३९

हमारे खेल संवाददाता द्बारा

आज सारनाथ में एक रंगारंग कार्यक्रम में सम्राट अशोक ने एक बार फिर सुरेश कलमाडी को भारतीय ओलंपिक संघ का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया. ज्ञात हो कि सुरेश कलमाडी को पहली बार महाराज धृतराष्ट्र ने भारतीय ओलंपिक संघ का अध्यक्ष बनाया था. सुरेश कलमाडी तब से इस पद पर जमे हुए हैं. अपनी नियुक्ति पर प्रसन्न होते हुए श्री कलमाडी ने सम्राट अशोक को धन्यवाद दिया और एक बार फिर से विश्वास दिलाया कि वे पहले भी राष्ट्र के लिए समर्पित थे और आगे भी समर्पित रहेंगे..........

दिल्ली, तारीख ७ अक्टूबर, १२०८

आज बादशाह कुतुबुद्दीन ऐबक ने एक बार फिर से सुरेश कलमाडी को भारतीय ओलंपिक संघ का अध्यक्ष बना दिया. बसद रसूल ने श्री कलमाडी के एक बार फिर अध्यक्ष बनाने पर अपना विरोध यह कहते हुए दर्ज करवाया कि श्री कलमाडी पिछले चार हज़ार से ज्यादा सालों से इस पद पर जमे हुए हैं. उनके इस विरोध को बादशाह ने ज्यादा तवज्जो नहीं दिया. बादशाह का मानना है कि श्री कलमाडी जैसा प्रशासक इतना काबिल है कि वह दस हज़ार सालों तक इस पद पर बने रहने लायक है..................

दिल्ली ९ सितम्बर, १६०४

आज बादशाह अकबर द्बारा आयोजित एक कार्यक्रम में श्री सुरेश कलमाडी को एक बार फिर से भारतीय ओलंपिक संघ का अध्यक्ष चुन लिया गया. इस मौके पर राजा बीरबल ने कुल इक्कीस चुटकुले सुनाये. अबुदुर्रहीम खानखाना ने अपने ताजे दोहे पेश किये जिनमें श्री कलमाडी के भारतीय ओलंपिक संघ के अध्यक्ष के रूप में दिए गए उनके योगदान की सराहना की गई है. श्री कलमाडी ने भारतीय ओलंपिक संघ के अध्यक्ष के रूप में अपनी प्रतिबद्धता को एक बार फिर से दोहराया......................

ज्ञात हो कि ऐसा वे लगभग पैंतालीस सौ सालों से करते आ रहे हैं.

दिल्ली १६ सितम्बर, १८४६

आज दरबार में आयोजित एक समारोह में जहाँपनाह बहादुर शाह ज़फर ने सुरेश कलमाडी को एक बार फिर से भारतीय ओलंपिक संघ का अध्यक्ष बना दिया. श्री कलमाडी ने जहाँपनाह को धन्यवाद देते हुए आभार प्रकट किया. इस मौके पर जनाब मिर्जा असदुल्लाह बेग खान 'गालिब' ने जनाब कलमाडी की शान में एक शेर भी पढा. शेर कुछ यूं था;

तुम जियो हजारों साल
साल के दिन हों पचास हज़ार

श्री कलमाडी ने मिर्जा गालिब को धन्यवाद देते हुए भारतीय ओलंपिक संघ के अध्यक्ष के रूप में किये गए आपने कार्यों का लेखा-जोखा पेश किया. लेखा-जोखा देखने के बाद एक बार फिर से साबित हो गया कि इस पद के लिए उनसे काबिल और कोई न तो पहले था और न ही होगा....

दिल्ली, १३ जून, १९४७

आज लार्ड माउंटबेटन ने अंतिम नियुक्ति करते हुए श्री सुरेश कलमाडी को भारतीय ओलंपिक संघ का अध्यक्ष बना दिया. श्री कलमाडी अपनी इस नियुक्ति पर बहुत खुश हुए. कुछ खेल पत्रकारों का अनुमान है कि क्वीन विक्टोरिया की पहल पर अंग्रेजी शासकों ने भारतीय शासकों से किये गए एक समझौते में यह वचन ले लिया है कि भारतीय सरकार कभी भी श्री कलमाडी को उनके पद से नहीं हटाएगी. सुनने में आया है कि प्रधानमंत्री श्री नेहरु यह बात मान गए हैं.

और अब आज की न्यूजपेपर रिपोर्ट..

नई दिल्ली, तारीख २० अक्टूबर, २००९

राष्ट्रमंडल खेल महासंघ (सीजीएफ) और आयोजन समिति के बीच राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारियों को लेकर चरम पर पहुंच गए गतिरोध को तोड़ने की कोशिशों में लगे खेलमंत्री एमएस गिल ने आयोजन समिति के प्रमुख सुरेश कलमाडी से मंगलवार को मुलाकात करके विवादास्पद मुद्दों पर लंबी बातचीत की।

कलमाडी मंगलवार की सुबह गिल के घर पहुंचे और उन्हें इन खेलों की तैयारियों की मौजूदा स्थिति तथा सीजीएफ और आयोजन समिति के बीच उठे विवाद के बारे में जानकारी दी। गिल ने कलमाडी से मुलाकात के बाद कहा ‘मेरी आज उनसे मुलाकात हुई और हम दोनों ने सभी मुद्दों पर विस्तापूर्वक बातचीत की। मैं जल्दी ही सीजीएफ के अध्यक्ष माइक फेनेल से............

Tuesday, August 18, 2009

वाइन फ्लू - एक भविष्यात्मक (ये क्या होता है?) पोस्ट




शुक्रवार १८ अगस्त, २०८१

पूरा अमेरिका वाइन फ्लू से परेशान है. प्राप्त ताजा समाचारों के अनुसार कल रात लास वेगास में वाइन पीकर सत्रह लोग इस फ्लू के शिकार हो गए. अभी तक लगभग सात लाख लोग इस फ्लू के शिकार हो चुके हैं. अमेरिकी गृह मंत्रालय ने कल एक प्रस्ताव पारित करके भारत के उद्योग समूह यूनाइटेड वाइन के उत्पादों पर अमेरिका में इंट्री से रोक लगा दिया है. ज्ञात हो कि यूनाइटेड वाइन प्रख्यात वाइन उद्योगपति जयजय माल्या की कंपनी है.

अमेरिकी गृह मंत्रालय द्बारा जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि भारतीय समूह की इस कंपनी के उत्पादों को जानबूझ कर इस तरह से बनाया गया ताकि ज्यादा से ज्यादा अमेरिकी नागरिक वाइन फ्लू के शिकार हो जाएँ. कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यह भारतीय उद्योग समूह ऐसा करके अमेरिका से बदला लेना चाहता है. विशेषज्ञों के अनुसार इस भारतीय उद्योग समूह का ऐसा मानना है कि साल २००९ में भारत में स्वाइन फ्लू एक ख़ास अमेरिकी साजिश की वजह से फैला था.

अमेरिकी विशेषज्ञों की इस सोच का आधार इस बात को माना जा रहा है कि यूनाइटेड उद्योग समूह की गिनती देशभक्त उद्योग समूह में होती आई है. ज्ञात हो कि साल २००८ में इस उद्योग समूह के तत्कालीन मालिक ने तत्कालीन राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की नीलाम होने वाली वस्तुएं जैसे चश्मा, चप्पल वगैरह खरीद कर देशभक्त होने का सबूत दिया था.

भारतीय व्यापार मंत्री सुश्री डिम्पल नाथ ने अमरीकी सरकार के इस कदम की आलोचना करते हुए कहा कि इस तरह के कदम विश्व व्यापार संगठन की नीतियों के खिलाफ हैं. सुश्री नाथ ने एक प्रेस कांफ्रेंस में बयान जारी करते हुए कहा कि; " अमेरिकी सरकार के इस फैसले की वजह से भारत संयुक्त राष्ट्र संघ में अमेरिका की वाट लगा देगा."

ज्ञात हो कि संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत का दबदबा दुनियाँ के तमाम देशों से ज्यादा है.

सुश्री डिम्पल नाथ ने बताया कि वाइन फ्लू पर अमेरिकी सोच एक कम्प्लेनात्मक मुद्दा हो सकता है लेकिन यूनाइटेड ग्रुप के उत्पादों पर रोक लगाकर अमरीका ने अपने लिए मुश्किलें खड़ी कर ली हैं. भारतीय व्यापर मंत्री ने यहाँ तक कहा कि अमरीका अगर अपने फैसले पर टिका रहता है तो भारत अमेरिका को दी जाने वाली सहायता राशि कम करने पर विचार करेगा.

उधर अमरीकी खुफिया एजेन्सी का मानना है कि यूनाइटेड समूह की फार्मा कंपनी प्रिवेंटिस ने पिछले वर्ष से ही वाइन फ्लू की वैक्सिन पर खोज शुरू कर दी थी. एजेन्सी का मानना है कि यूनाइटेड ग्रुप ने एक साजिश के तहत पहले वाइन फ्लू के वायरस ईजाद किये और उसके बाद अपनी ही फार्मा कंपनी से वैक्सिन बनाने के लिए कहा.

वाइन फ्लू का आतंक अमेरिका में इस तरह से छाया है कि अभी तक अमेरिकी ब्लॉग स्फीयर में लगभग तीन लाख सत्तावन हज़ार ब्लॉग पोस्ट वाइन फ्लू, उसके कारणों और उससे बचने की तमाम विधियों पर लिखी जा चुकी हैं.

ज्ञात हो कि वाइन फ्लू की बीमारी फैलने का मुख्य कारण यह है कि वाइन फ्लू से बीमार लोग और ज्यादा वाइन पीना चाहते हैं. जहाँ डॉक्टर यह चाहते हैं कि लोग वाइन पीना छोड़ दें, वहीं वाइन फ्लू से बीमार लोग और ज्यादा वाइन पीना चाहते हैं.

इधर भारत के योग गुरु स्वामी ज्ञानदेव का मानना है कि वाइन फ्लू से बचने के उपायों में सबसे बढ़िया उपाय यह है कि पीड़ित व्यक्ति को सुबह तीन चम्मच तुलसी के पत्ते का रस आंवले के पत्ते के रस में मिलाकर पीना चाहिए. बाबा ज्ञानदेव ने यह भी बताया कि उनके कारखाने में तैयार तुलसी-आंवला पत्रक रस का व्यवहार करने से सुबह-सुबह मेहनत करने से बचा जा सकता है. अमेरिकी सरकार ने बाबा ज्ञानदेव की कंपनी को दो लाख लीटर पत्रक रस का आर्डर दिया है. विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस बार बाबा ओंड इस कंपनी का मुनाफा पूरे साढ़े सात सौ प्रतिशत से बढ़ जाएगा. इस खबर के आने के बाद कंपनी के शेयर के मूल्य में कल बत्तीस प्रतिशत का उछाल देखा गया.

प्रिवेंशन इज बेटर दैन क्योर नामक मुहावरे से प्रभावित यूरोपीय संघ की आज बैठक होने वाली है. संघ का मानना है कि यूनाइटेड वाइन के उत्पादों पर रोक लगाने की प्रक्रिया अगर पहले ही शुरू कर दी जाय तो...........