फ़ुटबाल वर्ल्ड कप चल रहा है. चल क्या उछल रहा है. मजे लिए जा रहे हैं. पिछले कई दिनों से जानबूझ कर मैं ऐसी जगह नहीं जाता जहाँ दो-चार लोग बैठे हों. डर लगा रहता है कि कहीं कोई फ़ुटबाल के बारे में न पूछ ले. कारण यह है कि हम रविन्द्र जडेजा की बैटिंग ज्यादा इंज्वाय करते हैं. वही जडेजा जिन्होंने पिछली कई पारियों में शून्य पर आउट होकर शून्य को अमर कर दिया है. वैसे भी उस वर्ल्ड कप में कैसे मन लगेगा जहाँ अपने देश की टीम गई ही नहीं. ऐसे में अगर हम अपने शहर वालों की तरह फ़ुटबाल के मजे लेना चाहें तो हमें अर्जेंटीना को समर्थन देना पड़ेगा क्योंकि चे का जन्म उस धरती पर हुआ था और मैराडोना भी वही के हैं, या फिर ब्राजील को, क्योंकि वहाँ के सबसे महान खिलाड़ी पेले कोलकाता में खेल चुके हैं.
हमारे शहर के लोगों के हिसाब से वर्ल्डकप में दो ही टीमें खेलती हैं. अर्जेंटीना और ब्राजील.
ज्यादातर दफ्तर पूरे दिन अलसाई आँखों से भरे हुए हैं. अंग्रेजी न्यूज चैनलों के स्टूडियो में एक्सपर्ट लोग लगे हुए हैं. किसी न किसी टीम की जर्सी पहने हुए ये एक्सपर्ट रोज सुबह टीवी चैनल के स्टूडियो में कैरमबोर्ड जैसी तख्ती पर काठ के छोटे-छोटे खिलाड़ियों को इधर से उधर घुमाकर बताते हैं कि फलाना टीम आज इधर से अटैक करेगी. सामने वाली टीम के डिफेंडर्स बायें से उस अटैक का जवाब देंगे और जो टीम अटैक करेगी वह उस जवाब का तोड़ फलाना तरीके से निकालेगी और मैच जीत जायेगी. फलाना प्लेयर सबसे इम्पार्टेंट है. आज अगर वह खेल गया तो फिर उसकी टीम लास्ट सिक्सटीन में पहुँच जायेगी. एक्सपर्ट की ऐसी बातें मुझे युवराज सिंह की याद दिला देती हैं. लगता है जैसे एक्सपर्ट कह रहा है कि युवराज सिंह बहुत टैलेंटेड खिलाड़ी हैं और अगर वे आज चल गए तो भारत मैच जीत जाएगा.
टैलेंटेड खिलाड़ी की बात पर पता नहीं क्यों मुझे हमेशा ही लगता है कि क्रिकेट और फ़ुटबाल में कोई बहुत ज्यादा अंतर नहीं है.
खैर, बात कर रहा था एक्सपर्ट टाइप लोगों की. मैंने अभी तक देखा है कि अंग्रेजी न्यूज चैनल के स्टूडियो में ये एक्सपर्ट लोग जो भी बोलते हैं, ज्यादातर वैसा होता नहीं है. और जब वैसा नहीं होता है तो मुझे लगता है कि इनलोगों को न्यूज चैनल ने पैसा-वैसा देकर बुलाया होगा. क्या ज़रुरत है पैसे देने की? इनकी जगह मौसम विभाग वालों को बुला लेते. वे भी इतने ही एफिसियेंट हैं. फ़ुटबाल वर्ल्डकप के मैचों के बारे में इन एक्सपर्ट लोगों के एक्सपर्ट कमेन्ट जितने नकारा साबित हो रहे हैं उतने ही नाकारा उन मौसम विभाग वालों के भी साबित होते. ऊपर से मौसम विभाग वाले फ़ुटबाल के बारे में बोलने के लिए तड से तैयार हो जाते. पैसे कम लेते सो अलग.
मेरी तरह ही मेरा एक मित्र अंग्रेजी न्यूज चैनल के स्टूडियो में हो रहे फ़ुटबाल कार्यक्रमों को देखकर त्रस्त लगा. अब चूंकि हम भारतीयों का काम सांत्वना लेन-देन से चल जाता है इसलिए मैंने उससे कहा; "अरे यार गनीमत है कि अपने अंग्रेजी न्यूज चैनल फ़ुटबाल वर्ल्डकप के बारे में आधे घंटे का प्रोग्राम तो दिखा रहे हैं, अपने हिंदी न्यूज चैनलों को सलमान खान और ज़रीन खान के तथाकथित प्रेम सम्बन्ध से ही फुर्सत नहीं है."
वैसे मैं बता दूँ कि मित्र को सांत्वना देने के लिए कही गई बात केवल उस क्षण के लिए जायज थी. मेरा हमेशा से ऐसा मानना रहा है कि अपने हिंदी न्यूज चैनल फ़ुटबाल के बारे में कुछ नहीं दिखा सकते. कोई प्रोग्राम नहीं बना सकते. कारण मेरा वह पक्का विश्वास है जिसके तहत इंडिया टीवी और आजतक जैसे चैनलों के लिए ई पी एल (इंग्लिश प्रीमियर लीग) यूरोप का सबसे बढ़िया बाइक ब्रांड है और ला-लीगा (स्पेन का फ़ुटबाल लीग) सबसे बढ़िया आईसक्रीम ब्रांड. कोई हिंदी न्यूज चैनल फ़ुटबाल वर्ल्ड कप के बारे में बात भी करेगा तो उसे फ़ुटबाल वर्ल्ड कप न कहकर फ़ुटबाल का महाकुम्भ पुकारेगा और उस वर्ल्डकप का भारतीयकरण कर डालेगा जिसमें हमारी टीम के खेलने के चांस शायद अगले पचास सालों में न के बराबर हैं.
लेकिन मेरी बात मेरे शहर के लोगों की बात नहीं है. मेरे शहर के लोग फ़ुटबाल के पीछे पागल हैं. आज भी मोहन बागन और ईस्टबंगाल का मैच न सिर्फ देखने जाते हैं बल्कि मारपीट भी करते हैं. कहते हैं फ़ुटबाल में मारपीट बहुत ज़रूरी है. अगर मारपीट न हो तो फ़ुटबाल मैच दो कौड़ी का. हमारे शहर के लोग कोलकाता को ही फ़ुटबाल का 'मेक्का' कहते हैं. वर्ल्ड चैम्पियन इटली हो या ब्राजील, फ्रांस या अर्जेंटीना, लेकिन हमारा ऐसा मानना है कि फ़ुटबाल का जन्म कोलकाता ही में हुआ है और दुनियाँ का सबसे बढ़िया फ़ुटबाल या तो मोहनबागान वाले खेलते हैं या फिर ईस्टबंगाल वाले.ये बात अलग है कि अगर आप इन क्लबों के ग्राऊँड्स में लगी बेंचों पर बैठ जायेंगे तो बेंच नीचे टूट पड़ेगी.
हमारे यहाँ हर वर्ल्डकप के मौके पर दीवारों पर जो कलाकारी होती है उसे देखकर लगता है जैसे मेसी, काका, रूनी और ड्रोग्बा को पकड़कर किसी ने दीवार पर कैद कर दिया है. सभी अपने-अपने पाँव उठाये हुए. जैसे कह रहे हों; "फ़ुटबाल, माय फूट."
हमारे शहर के लोकल चैनलों पर बोलनेवाला फ़ुटबाल एक्सपर्ट खेल और उसकी स्ट्रेटेजी की बारीकियों को छोड़कर बाकी सारे चीजों के बारे में बोलता है. असल में हमारे शहर का फ़ुटबाल एक्सपर्ट आत्मा से दर्शनशास्त्री और व्यवहार से बुद्धिजीवी होता है. अभी दो दिन पहले की बात है लोकल टीवी चैनल पर चल रहे एक प्रोग्राम में एक एक्सपर्ट मैराडोना के बारे में बात करते हुए हर वह बात बोला जिसका फ़ुटबाल से सम्बन्ध न के बराबर है. जैसे मैराडोना जब नैपोली के लिए खेलते थे तो उन्होंने फला तारीख को वहाँ के मैनेजर से क्या कहा? कैसे उन्हें नैपोली के समाज और वहाँ के बेरोजगार युवकों के बारे में चिंता थी? और यह कि मैराडोना इसलिए महान हैं कि उन्होंने जार्ज बुश को गरिया दिया था और पेले आजतक बुश को गरिया नहीं पाए.
अलग तरीके का फ़ुटबाल प्रेम है हमारे शहर का. आप आइये. पायेंगे कि मिठाई की दूकान पर मिठाइयाँ कहीं फ़ुटबाल के आकार की हैं तो कहीं वर्ल्डकप के आकार की. लगता है जैसे हम यह साबित करना चाह रहे हों कि; "अरे ओछे हैं वे लोग जो वर्ल्डकप जीतना चाहते हैं. हम तो वर्ल्ड कप खाकर संतुष्ट हो लेंगे."
नई-नई मिठाइयाँ बन रही हैं और किसी का नाम मेसी रख दिया गया है तो किसी का काका. लोग मेसी और काका को घर लिए जा रहे हैं. फ्रीज में रख रहे हैं और मैच देखते हुए उन्हें खा ले रहे हैं. खाने के साथ-साथ फ़ुटबाल प्रेम दिखाकर हाथ झाड़ लिया.
हमारी फुटबाली कला का असली नमूना मिठाइयों और चित्रकलाओं में दिखाई दे रहा है. विश्व फ़ुटबाल के लिए यह हमारा सांस्कृतिक योगदान है. ऐसे में कह सकते हैं कि फ़ुटबाल संस्कृति में जितनी भी संस्कृति है, सब हमारी ही देन है.
हमारे मोहल्ले के एंट्रेंस पर दो बड़े-बड़े कटआउट लगाये गए हैं. एक तरफ काका और दूसरी तरफ मेसी. फोटो में दोनों टांग उठाकर तैयार हैं. जब गाड़ी उन कटआउट के सामने से गुजरती है तो डर लगा रहता है कि कहीं ये लोग अपनी टांग न चला दें. इतने बड़े कटआउट कि अगर करूणानिधि देख लें तो अपने पुत्र स्टालिन को तुरंत बुलाकर दो तमाचे रसीद कर देंगे. यह कहते हुए कि; "अन्ना नगर में जो चालीस कटआउट कल लगवाए वे इतने बड़े क्यों नहीं बनवाये?"
हमारे शहर के बप्पी लाहिड़ी जी ने एक बार फिर से फ़ुटबाल वर्ल्डकप के मौके पर अपना 'म्यूजीक' विडियो बनाया है. बनाया तो बनाया उसे रिलीज भी करवा दिया है. गाने के बोल हैं; "बोले बोले बोले बोले..फुटबोल फुटबोल फुटबोल..फुटबोल ईज आवर लाइफ..." साथ ही बप्पी दा ने वह फ़ुटबाल भी खरीद लिया है जिसपर दुनियाँ के तमाम बड़े खिलाड़ियों का आटोग्राफ है. टीवी पर देखकर लगा कि बप्पी दा को थैंक्स बोल डालू. यह कहते हुए कि; "आपसे ही फ़ुटबाल है."
असली भारतीय फ़ुटबाल दीवारों, मिठाइयों और 'म्यूजीक' विडियो में कैद होकर विश्व फ़ुटबाल को हमारे योगदान की गाथा सुना रहा है. प्रियरंजन दाशमुंशी ने जब से होश संभाला, भारतीय फ़ुटबाल की देख-रेख की. अब वे नहीं हैं. अब पता नहीं कौन देख-रेख कर रहा है. हाँ, मुझे हमेशा यह भय सताए रहता है कि सत्तासी वर्षीय के करूणानिधि कल से इंडियन फ़ुटबाल फेडरेशन को संभालने न लग जाएँ.
अब चूंकि हम सांत्वना के लेन-देन से खुश हो लेते हैं तो मैं आपको एक सांत्वना देता हूँ और कहता हूँ; "फ़ुटबाल वह नहीं जो वर्ल्डकप में खेला जा रहा है. असली फ़ुटबाल वह है जो हम खेलते हैं. सांस्कृतिक फ़ुटबाल. और यही विश्व फ़ुटबाल को हमारी देन है."
Wednesday, June 23, 2010
सांस्कृतिक फ़ुटबाल.
Thursday, September 25, 2008
सिंगुर ...माने उर में सींग
सूचना:
आज मेरे ब्लॉग के गेस्ट राईटर हैं रतीराम चौरसिया 'पानवाले'. देश, काल, समाज पर दृष्टि रखे रहते हैं. पान के साथ-साथ चूना भले लगायें, लेकिन हर मुद्दे पर अपने विचार व्यक्त करने से नहीं चूकते. आज सिंगुर पर अपने विचार व्यक्त कर रहे हैं.
आप पढिये.
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उर में सींग घुस गया. उर का टुकड़ा-टुकड़ा हो गया. ऊ भी एक-दो नहीं, न जाने केतना. एतना कि कोई हिया गिरा आ कोई हुआं. सिंगुर में मनई आते-जाते रस्ता पर बचाकर चल रहा है सब. न जाने किसका उर का टुकड़ा किसका तलुआ तरे आ जाए.
पुराना मुख्यमंत्री का उर छोटा हो चुका था. मुख्यमंत्री बदला गया. पचीस साल में आक्सीजन का कमी से नया मुख्यमंत्री के उर का कंडीशन भी कोई बहुत अच्छा नहीं था. आकार छोटा हो गया था. उनका पार्टी वाला बोला सब कि उर बढ़ा लो. पचीस साल से हम लोगन का उर इतना छोटा हो गया है कि साँस रुकने का चांस है.
मुख्यमंत्री प्राणायाम वगैरह करके उर थोड़ा बड़ा किए. चार-पाँच साल में उका उर का आकार बढ़ा. आकार बढ़ गया तो लगा कि साँस का तकलीफ अब नहीं होगा. फिर भी डॉक्टर का दरकार तो होइबे करेगा. ऊ टाटा जी से बोले; "हमरा उर तो बड़ा हो गया है. तुम भी अपना उर बड़ा कर ल्यो त दोनों का उर एक साथ काम करे अऊर दुन्नो मिल के 'सिंग-उर' में कुछ करें."
टाटा तो जनमजात उर वाले. ऊ बोले; "हमरा उर त १९१० से बड़ा ही है. बड़ा आक्सीजन है हमरा उर में. बोलो त कुछ तुम लोगन का दे दें."
मुख्यमंत्री बोले; "ई भी पूछने का बात है? नेकी और पूछ-पूछ के?"
टाटा जी आक्सीजन लेकर आए. मुख्यमंत्री के लगा कि अब चिंता है नाही. अब आक्सीजन का कमी होगा नाही. अब त दस साल में इन लोगन के एतना आक्सीजन मिलेगा कि अगला पचास साल तक जियेंगे. पूरा बंगाले का उर आक्सीजन से भर जायेगा. उका पार्टीवाला सब भी उर फुलाए घूमने लगा.
किंतु 'बोंधुगोन' जे मनई सब पहले फेफड़ा से काम चलाता था, ऊका अब खाली उर से चलने से रहा. पाहिले ई लोग फेफड़ा फाड़कर चिल्लाता था. ई चिल्लाने वाला धरम अब ममता जी को ट्रान्सफर कर दिया त मुसीबत होइबे करेगा.
ई सी पी एम पार्टी वाला भूल गया सब कि बिधानचंद हों आ चाहे सिद्धार्थ शंकर, ई लोग केहू को छोड़ा था नाही. अब ई लोग भले ही भगवान पर विशबास न करे, बाकी होता एही है कि सबकुछ एहिं पर भोग के जाना पड़ता है. एही धरा पर.
जो ई लोग पहिले करता था सब, अब ऊ काम ममता जी उर आ फेफड़ा, दुन्नो लगाकर कर रही हैं. अऊर वोईसे भी, ममता जी त हैं बर्तमान में जीने वाली. पब्लिक सब भले ही कहे कि इलेक्शन में उनका हालत ख़राब हो जायेगा, लेकिन इलेक्शन त भाभिश्यत में होगा.
अभी त ममता जी सिंगुर का उर में सींग घुसा दिए हैं. अऊर ई सींग घुसाने से सब गड़बड़ा गया है. जो टरक सब खड़ा था छोटकी गाड़ी ले जाने के लिए ओही टरक सब में फैक्टरी का फोडन सब भर के निकल रहा है. कहाँ जायेगा उहो मालूम नहीं है.
ई एक सिंगुर न जाने केतना के उर में सींग घुसा दिया. का मुख्यमंत्री, का टाटा अऊर का सी पी एम पार्टी, सबका उर का टुकड़ा बिखरा पड़ा है सिंगुर में. आ जे लोग भारी-भारी कीमत देकर ज़मीन सब खरीद लिया था, ऊ लोगन का त सबकुछ बिखरा पड़ा देखा हम.
का कहें ई सब देख के त मन में एक ही बात आता है....कभी-कभी उर के हटा के दिमाग से काम लेना चाहिए.
Friday, September 5, 2008
उद्योग वाला आलू और आलू वाली उद्योगनीति....
शहर में जगह-जगह होर्डिंग गडे हैं. सरकार ने गड़वा रखे हैं. होर्डिंग पर ढेर सारे गोल-मटोल, सुडौल, लंबे, चौड़े आलुओं की तस्वीर चिपकी है. तस्वीर में कुछ आलू आराम से बैठे हैं तो कुछ लुढ़कने को तैयार दिखते हैं. कुछ को देखकर ये अनुमान लगाना मुश्किल है कि ये लुढ़केगा तो किस तरफ़ बैठेगा? या फिर बैठेगा ही नहीं और ढुलमुलाते हुए वहां से निकल लेगा.
तस्वीर में आलू बिठाकर सरकार हमको बता रही है; "कृषि हमारी जड़ है और उद्योग हमारा भविष्य." (होर्डिंग में में कुछ-कुछ ऐसा ही लिखा हुआ है.). कुल मिलाकर पूरा शहर ही आलूमय है. इन तस्वीरों को देखकर कोई भी इतिहासकार आलुओं के महत्व को इतिहास में दर्ज कर सकता है. समाजशास्त्री आलू को 'सर्व-अहारा' से जोड़ सकता है. कवि कविता लिख सकता है. लालू जी होर्डिंग को देखकर अपने वे दिन याद कर सकते हैं जब वे कहा करते थे; "जब तक रहेगा समोसे में आलू, तबतक रहेगा बिहार में लालू."
सरकार को आलू की तस्वीर की सहायता से तैयार किये गए इस विज्ञापन पर बहुत भरोसा है. शायद सरकार की निगाह में आलू न सिर्फ़ एक कृषि उत्पाद है, बल्कि उद्योग का परिचायक भी है. आख़िर आलू के टुकड़े करके चिप्स बना सकते हैं. और आलू चिप्स उद्योग का सबसे बड़ा द्योतक बन बैठा है.
वैसे अभी तक जो भी देखा गया उसके आधार पर आप कह सकते हैं कि पश्चिम बंगाल सरकार की उद्योग नीति पूरी तरह से आलू टाइप है. अगर कोल्ड स्टोरेज नहीं मिला तो सड़ना तय है. वैसे सड़ना तय ही समझिये. आख़िर स्टोरेज रहने से क्या होगा, अगर बिजली ही नहीं रहे.
क्या कहा? डीजल से जनरेटर चला कर बिजली पैदा कर लेंगे? डीजल की कीमत देखी है?
पश्चिम बंगाल सरकार ने आलू को उद्योग का द्योतक क्यों बनाया? क्या इसलिए कि मिदनापुर में बहुत आलू होता है और नंदीग्राम मिदनापुर में है? या इसलिए कि तीस सालों से शासन में बैठे लोग आलू खाकर अपना पेट बड़ा कर चुके हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि ये आईडिया उन्होंने 'साम्राज्यवादी' कंपनी पेप्सी से लिया है? आख़िर पेप्सी वाले एक आलू के दस चिप्स बनाकर बीस रूपये में बेंच डालते हैं. ये अलग बात है कि उसके बावजूद भारतवर्ष में कंपनी निर्धारित समय में ब्रेकएवेन नहीं कर पाती.
कहीं ऐसा तो नहीं कि आलू को उद्योग का परिचायक बताकर किसानों को बहलाया जा रहा है. ये कहते हुए कि; "हे किसान, ये वही आलू है, जिसे तुम अपने खेतों में पैदा करते हो. क्या हुआ जो तुम्हारा खेत उद्योगधंधों के लिए ले लिया गया तो? आख़िर उद्योग का परिचायक भी वही आलू है."
ऐसा भी हो सकता है कि आलू का फोटो छापकर सरकार अपनी उद्योग नीति का खुलासा कर रही है? मतलब ये कि हमारी उद्योग नीति को आप आलू देखकर पहचान सकते हैं. जब इच्छा हुई, हम आलू की तरह ढुलक जायेंगे. टिकने की क्या ज़रूरत है? आज इस करवट और कल उस करवट.
आख़िर बुद्धदेब बाबू जिस दिन कहते हैं कि हम उद्योग को बढावा देने के लिए कटिबद्ध हैं, उसी दिन उनकी अपनी पार्टी एक बंद का 'डाक' दे देती है. बाहर से आनेवाले उद्योगपति उलाहना देते हुए कह सकते हैं; "आपके सरकार की नीतियां तो आपके पार्टी की नीतियों से क्लैश कर रही हैं?" मुख्यमंत्री जवाब दे सकते हैं कि; "देखिये उद्योग को बढ़ावा देना हमारा कर्तव्य है और बंद करना हमारा धर्म."
बुद्धदेब बाबू एक दिन कहते हैं; "मैं राज्य में होनेवाले बंद और हड़ताल के ख़िलाफ़ हूँ. फिर ये बंद चाहे मेरी पार्टी द्वारा ही क्यों न किया गया हो." दूसरे दिन उनकी पार्टी वाले कहते हैं; "ज्यादा मत बोलो. पार्टी है तो तुम मुख्यमंत्री हो. इसलिए पार्टी की नीतियों के बारे में कुछ मत बोलो." बेचारे मुख्यमंत्री जी को कहना पड़ता है कि; "मेरे स्टेटमेंट को ग़लत ढंग से मीडिया में उछाला गया. मैंने बंद के ख़िलाफ़ कुछ नहीं कहा था."
उनकी भी गलती नहीं है. नेताओं के वक्तव्य को मीडिया ग़लत ढंग से ही प्रस्तुत करता है. बाजपेई जी याद हैं न?
बड़े मजे की बात है. दो साल पहले तक पश्चिम बंगाल में आईटी क्षेत्र में काम करने वालों की यूनियन नहीं थी. मुख्यमंत्री की पार्टी वालों ने यूनियन बनाया. और इस यूनियन के नेता कौन हैं? पैंसठ साल पुराने एक एमपी. अब इन साहब को आईटी के क्षेत्र का इतना बढ़िया ज्ञान कहाँ से मिला है, किसी को नहीं पता.
कोई उनसे पूछ देगा तो शायद जवाब मिले; "मुझसे ही क्यों पूछते हो? यही सवाल केन्द्र के मंत्रियों से किया है कभी? जब तक इच्छा होती है, जसवंत सिंह विदेश मंत्री रहते हैं और फिर एक दिन वित्तमंत्री बन जाते हैं. जब उन्हें केवल एक दिन लगता है फाइनेंस और अर्थशास्त्र का ज्ञान लेने में, तो मैं तो आधा दिन में आई टी के उत्पत्ति से लेकर उसके विकास के बारे में जान सकता हूँ."
एक साल पहले तक जो सरकार छाती तानकर चलती थी, ये बताते हुए कि राज्य में उद्योग की पुनर्स्थापना होकर रहेगी या बड़ी तेजी से हो रही है, वही सरकार नंदीग्राम और सिंगुर के बाद दुबकी नज़र आ रही है. और फिर ऐसा क्यों नहीं होगा? पिछले दो सालों में बहुत सारे दलाल उपजे हैं. कुछ तो बाहर के देशों में रहते हैं और विदेशी उद्योग समूहों को ज़मीन दिलाने का काम करते हैं. इंडोनेशिया से आया एक उद्योग समूह कितनी ज़मीन हथिया चुका है, ये किसी से छिपा नहीं है. मजे की बात ये कि इन ज़मीनों को बाऊन्डरी वाल में कैद करके छोड़ दिया गया है. न तो अभी तक किसी उद्योग की शुरुआत हो सकी है और न ही निकट भविष्य में होने की संभावना है. नंदीग्राम में इसी इण्डोनेशियाई उद्योग समूह को जल्दी-जल्दी में ज़मीन दिलाने के चक्कर में पूरा महाभारत हुआ.
इस महाभारत का असर सिंगुर पर दिखाई दे रहा है. वो भी तब जब टाटा ग्रुप ज़मीन लेने के बाद काम शुरू करता है. काम शुरू होने के बाद बखेड़ा खड़ा किया जाता है. मजे की बात ये कि जहाँ किसानों की ज़मीन हड़पने में दलालों का हाथ है, वहीँ ज़मीन वापस दिलाने का ड्रामा करने वाले भी दलाल ही हैं. मर्सडीज पर चढ़कर लोग किसानों की लड़ाई लड़ने आते हैं. वही लोग जो दो साल पहले ख़ुद टाटा को निमंत्रण दे रहे थे कि; "आओ, और यूपी का भला करो."
जो कुछ भी हो रहा है उसके लिए केवल दलाल-समाज ही दोषी नहीं है. सरकार की अपनी नीतियां आलू की तरह लुढ़कती रहती हैं. आजतक ज़मीन अधिग्रहण के लिए एक नीति निर्धारित नहीं कर सके लोग अगर उद्योग के विकास की बात करें तो उन्हें क्या कहेंगे?
नेता...या दलाल?
Thursday, August 21, 2008
कल हमारे शहर में हुए 'औद्योगिक बंद' के कुछ दृश्य....
कल हमारा शहर बंद रहा. कोई नई बात नहीं है. अगर दस दिन भी बिना बंद के निकल जाए तो लोग व्याकुल होने लगते हैं. एक-दूसरे से पूछना शुरू कर देते हैं; "क्या बात है? दस दिन हो गए, एक भी बंद नहीं?" राजनैतिक दलों की क्षमता पर ऊँगली उठाने लगते हैं. लोगों के ऐसा करने से राजनैतिक दलों को शर्म आती है और वे बंद कर डालते हैं.
बंद और हड़ताल सामाजिक जागरूकता की निशानी हैं. वैसे हर बंद के दिन मैं आफिस जरूर जाता हूँ. मेरा मानना है कि साल के ३६५ दिन मेरा आफिस मेरे हिसाब से चलेगा. किसी राजनैतिक पार्टी के हिसाब से नहीं. ये अलग बात है कि कल मुझे पैदल चलकर आफिस आना पड़ा और शाम को पैदल चलकर ही घर जाना पड़ा. कुल मिलाकर २० किलोमीटर पैदल चले. दोस्तों ने गाली भी दी. लेकिन मैंने सोचा अगर साठ किलोमीटर पैदल चलकर लोग सावन के महीने में 'भोले बाबा' को में जल चढ़ा आते हैं तो दस किलोमीटर पैदल चलकर मैं आफिस जा ही सकता हूँ.
इस आने-जाने में कुछ दृश्य दिखाई दिए. मैंने सोचा हमारे शहर के इन दृश्यों से ही शहर की पहचान बनी है. आप लोग भी ये दृश्य पढ़ें (देखेंगे कैसे?) और भविष्य में जब भी इस तरह के दृश्य दिखाई दें तो समझें कि कलकत्ते में हैं.
दृश्य-१
घर से निकलकर जैसे ही सड़क के हवाले हुए हमें आभास हो गया; "बहुत कठिन है डगर आफिस की." सड़क पर आठ-दस क्रांतिकारी टाइप लोग एक जगह खड़े थे. व्यवस्था और अवस्था से नाराज़ ये लोग केन्द्र सरकार को गालियाँ दे रहे थे. ये अलग बात है कि केन्द्र सरकार की तरफ़ से कोई भी इन गालियों को रिसीव कर नहीं आया था. इन क्रातिकारियों ने कुछ गाडियाँ रोककर उनकी हवा निकाल दी थी. एक टैक्सी भी खड़ी थी जिसकी हवा निकल गयी थी. टैक्सी ड्राईवर इस बात से खुश था कि उसकी धुनाई नहीं हुई. टैक्सी की हालत से उसे कोई परेशानी नहीं थी. हम छोटी-छोटी खुशियों से कितने खुश हो जाते हैं. ऐसा होने से हमें बड़े दुखों की परवाह नहीं रहती.
दृश्य - २
मैं करीब चार किलोमीटर पैदल चलकर मेट्रो स्टेशन पहुँचा. जब तक स्टेशन तक नहीं पहुंचे थे तब तक ख़ुद को हौसला देते रहे कि बस कुछ मेहनत और मेट्रो रेल मेरी थकावट दूर करेगा. वहां पहुंचकर देखा कि स्टेशन को बंद कर दिया गया है. स्टेशन के गेट पर पुलिस वाले खड़े थे. उनलोगों ने मुझे अन्दर जाने से रोकते हुए बताया; "ट्रेन सर्विस बंद है." मैंने सोचा बंद करने वाले कहीं दिखाई नहीं दे रहे हैं. आस-पास देखा तो कुछ झंडे लगे हुए थे. ध्यान से देखा तो कुछ दूर पर कामरेड (काम पर रेड मारने वाले) लोग बैठे दिखाई दिए. मैंने पुलिस जी से पूछा; "क्या बात है, आज आप ही बंद करवा रहे हैं?"
वे बोले; "हाँ, आज हम ही बंद करवा रहे हैं." उसके बाद उन्होंने कामरेडों की तरफ़ इशारा करते हुए कहा; " वैसे भी एक ही बात है. हम बंद करायें चाहे वे"
मैंने कहा; "आप पुलिस हैं कि कामरेड?"
वे बोले; "जो समझ लें. आप हमें पुलिसरूपी कामरेड भी कह सकते हैं. या फिर कामरेडरुपी पुलिस."
उनकी बात सुनकर हम उनसे बड़े प्रभावित हुए. कामरेड से पिटने का जितना डर बना रहता है, उसका दो गुना ज्यादा इस पुलिसरुपी कामरेड से लगा. इतने में देखा कि अचानक एक लोकल टीवी न्यूज चैनल की गाड़ी आकर रुकी. जैसे ही गाड़ी के अन्दर से हाथ में कैमरा लिए संवाददाता उतरा, सारे कामरेड एक होकर मेट्रो रेल के गेट के सामने आ गए और नारा लगाने लगे; "इन्कलाब जिंदाबाद."
पता नहीं कैसा इन्कलाब है जिसे हर दिन नारा लगाकर री-न्यू करना पड़ता है.
दृश्य - ३
मैंने निश्चय किया कि अब तो आफिस जाऊंगा ही. पैदल जाऊंगा. मेट्रो स्टेशन से आफिस की तरफ़ पैदल चल दिया. कुछ दूर चलने पर देखा कि कलकत्ते की सबसे चौड़ी सड़कों में से एक पर क्रिकेट का मैच खेला जा रहा है. टुपलू, बापी, देबू, सोना, खोका टाइप लड़के अपने क्रिकेटीय गुड़ों का प्रदर्शन करने में जुटे हैं. बैट को घुमाया जा रहा है. बैट की मार खाकर गेंद मुहल्ले भर की सैर कर रही है.
इन खिलाड़ियों की हौसला आफजाई के लिए पाड़ा (मोहल्ला) के तमाम संतू काकू, सुजीत काकू टाइप बुजुर्ग बैठे हुए हैं. इनका चेहरा देखने से लग रहा है कि इन्हें सचिन तेंदुलकर को बैट करते देख उतनी खुशी नहीं होती जितनी इन टुपलू और सोना टाइप खिलाड़ियों के लिए हो रही है.
ये काकू लोग वही हैं जो सरकारी नौकरी से रिटायर हो चुके हैं. जब तक नौकरी में थे, इनलोगों ने केवल फाईलें बनाने का काम किया. एक दिन इन्हें पता चला कि ये साठ साल के हो चुके हैं. ख़ुद की बनाई गई फाईलों को सरकारी आफिस के हवाले कर वहाँ से चलते बने. अब ये अपने सारे गुण मुहल्ले के इन लड़कों को दे रहे हैं. जिस दिन गुणों का ट्रान्सफर पूरा हो जायेगा, ये इस दुनियाँ से सटक लेंगे. ये तो केवल इसलिए जी रहे हैं ताकि गुणों को ट्रान्सफर पूरा कर सकें.
दृश्य - ४
हम करीब दो किलोमीटर और पैदल चले. रास्ता कम करने के चक्कर में गली कूचों से होकर निकल रहे थे. अचानक एक जगह देखा कि हमारे मुहल्ले के सुमू दा टाइप एक व्यक्ति तीन-चार लोगों को लिए बैठे थे. चाय की दूकान खुली हुई थी. उसी दूकान पर पान का भी इंतजाम था. मैं पान खाने के लिए रुका तो 'सुमू दा' को बात करते सुना. कह रहे थे; "अफगानिस्तान में असल में क्या हुआ वो मैं बताता हूँ. देखो, वहाँ तो पहले शासन में सारे भारतीय और रूसी लोग थे. अमरीका को ये बात अच्छी नहीं लगी इसलिए उसने अफगानिस्तान को अपने कब्जे में ले लिया."
विश्व राजनीति के उनके ज्ञान से प्रभावित बाकी के लोग उन्हें बड़े ध्यान से सुन रहे थे. मैंने सोचा 'सुमू दा' से अगर मैं कुछ बात करता तो बात-चीत कैसी रहती. शायद ऐसी;
- सुमू दा नमस्कार.
- ऐ, क्या करता है? आदमी देखकर अभिवादन करना नहीं आता तुम्हें?
- क्यों, क्या हुआ? नमस्कार करना आपको ठीक नहीं लगा.
- तुम्हें मेरी भेष-भूषा देखनी चाहिए और उसके हिसाब से अभिवादन करना चाहिए.
- मतलब?
- मतलब ये कि तुम्हें हमें कहना चाहिए; 'कामरेड सुमू दा, लाल सलाम.'
- अच्छा अच्छा. मैं करेक्ट कर देता हूँ. कामरेड सुमू दा, लाल सलाम.
- लाल सलाम. बोलो क्या बात करनी है?
- ये आपने औद्योगिक बंद क्यों किया?
- देखो, जब से बुद्धदेव बाबू मुख्यमंत्री बने हैं, वे उद्योग को बढावा देना चाहते हैं, इसलिए हमने ये औद्योगिक बंद किया.
- लेकिन उद्योग को बढावा देने के लिए कहा है उन्होंने.
- नहीं समझे तुम. उन्होंने कहा था कि जो कुछ भी करो, वो सब औद्योगिक होना चाहिए.
- फिर?
- फिर क्या? हम औद्योगिक क्रान्ति नहीं कर सकते तो औद्योगिक बंद कर रहे हैं. आख़िर औद्योगिक ही तो करना है.
- अच्छा, अब बात समझ में आई.
- ठीक है. मैंने आपकी बात समझ ली. अब मैं चलता हूँ.
- अरे, चाय तो पीकर जाओ.
- नहीं चाय नहीं, मैं तो केवल पान खाऊंगा.
- क्यों? केवल पान क्यों खाओगे?
- मुझे बहुत दूर तक पैदल चलना है. पान खाऊंगा तो लाल-पीक थूकते हुए आफिस तक पहुँच जाऊंगा.
- ऐ, ये तुम्हारा लाल-पीक थूकने में मुझे राजनीति की गंध आ रही है.
- नहीं-नहीं सुमू दा. आप ऐसा न समझें. पान खाना और पीक थूकना मूलरूप से मानवीय काम है. इसमें कोई राजनीति नहीं है.
- तुम सच बोल रहे हो?
- बिल्कुल सच.
- तब ठीक है. तुम पान खा सकते हो.
पान खाकर मैं चल दूँगा. ये सोचते हुए कि पिछले कई सालों में जिस तरह से 'कामरेडी' बढ़ी है, आनेवाले पचास सालों के बाद बंगाल में इंसान पैदा ही नहीं होंगे. यहाँ केवल कामरेड पैदा होंगे.
Wednesday, May 21, 2008
सुमू दा
उम्र पचास-बावन के आस-पास होगी. सिर पर ढेर सारे कच्चे-पक्के बाल. बुद्धिजीवियों वाली दाढ़ी के मालिक. कुर्ता खद्दर वाला. कुर्ते के साथ ज्यादातर जींस धारण करते हैं. कुर्ते और जींस में देखकर लगता है जैसे समाज को याद दिला रहे हों; "मैं ऐसा ही हूँ. स्थापित मान्याताओं को पूरी तरह से ध्वंस करने वाला. फिर वो चाहे कपड़े धारण करने की विशेष प्रक्रिया से हो या फिर दाढ़ी रखने से". सुमन नाम है. इनके 'लड़के' इन्हें सुमू दा कहकर पुकारते हैं. करीब डेढ़ सौ 'लड़को' की फौज है इनकी. लोग बताते हैं कि सत्तर के दशक में फुलटाइम नक्सली थे. पुलिस इनकी तलाश में रहती थी. उन दिनों राज्य के मुख्यमंत्री इनसे डरते थे. उन दिनों लाकअप में धुनाई के किस्से मुहल्ले के क्लब द्वारा प्रकाशित की जाने वाली पत्रिका में अभी भी लिखते हैं. शायद अपने 'लड़कों' को प्रेरणा देने के लिए.
खूब पढ़ाई की है. सेमिनार वगैरह आयोजित करने का का काम बखूबी जानते हैं. सेमिनार के मोशन के लिए हेडलाइन लिखने में महारत हासिल है. इलाके की दीवारों पर नारे लिखकर साम्राज्यवाद का नाश इन्ही की देख-रेख में होता है. बात करते हैं तो लगता है कविता कह रहे हों. क्लब क्या होता है और उसके सहारे साम्यवाद कैसे लाया जाता है, इलाके के लोगों को इन्होने ही बताया. ज्यादातर क्लब में बैठे रहते हैं और वहाँ रखे कैरमबोर्ड से बतियाते रहते हैं. नारे लिखने में माहिर. लोग बताते हैं इनके लिखे नारे सोवियत रूस तक पढ़े जाते थे. विश्व साहित्य पर बड़ी जोरदार पकड़ है. जब क्रांतिकारी साहित्य की बात करते हैं तो लगता है जैसे तमाम क्रांतिकारी लेखकों और कवियों लिखा हुआ इन्होने डायरेक्ट पाण्डुलिपि से पढ़ लिया था. तकरीरों में भाषा के इस्तेमाल को लेकर घंटो बहस कर सकते हैं. लेनिन ने २१ अक्टूबर, १९२० को चार बजकर बीस मिनट पर किससे क्या कहा था, इन्हें जुबानी याद है. कुल मिलाकर युवा क्रांतिकारियों को कंट्रोल करने वाले 'अनुभवी' क्रांतिकारी.
लेकिन उनका ये चेहरा दिखाने के लिए है. डराने के लिए एक और चेहरा है इनके पास. अपने दिखाने वाले चेहरे का मुखौटा अक्सर बायीं जेब में रखते हैं. जरूरत पड़ने पर निकाल कर पहन लेते हैं. ऐसा नहीं है की जरूरत कभी-कभी पड़ती है. चुनाव न भी हों तो भी पाड़ा (मोहल्ला) में 'गरीबों' के उत्थान के लिए या फिर दुर्गा पूजा के लिए चंदा इकठ्ठा करते हुए कई बार इनके डराने वाले चेहरे को देखा जा सकता है. साथ में आम आदमी के डरे हुए चेहरे को भी. जो इन्हें जानते हैं वे इनसे डरते हैं. सबको इस बात की चिंता रहती है कि बात करते-करते पता नहीं कब मुंह से कविता की सप्लाई बंद हो जाए और गाली की सप्लाई शुरू हो जाए. नुक्कड़ सभाओं में कई बार विपक्षियों की आलोचना करते-करते थक जाते हैं तो गाली-फक्कड़ शुरू कर देते हैं. जानकार बताते हैं कि पाँच-सात साल में एमएलए पद के उम्मीदवार साबित हो सकते हैं.
आज सुबह मिल गए. मैंने पूछा; "सुमन दा, कैसे हैं? पिछले दस दिनों से दिखाई नहीं दिए. क्लब में भी नहीं दिखे. कहीं गए थे क्या?"
बोले; "हाँ हाँ. पंचायत इलेक्शन था न. हमारा ड्यूटी इस बार बहरमपुर में था. हम अपना लड़का लोगों के साथ उधर ही था. इसलिए दिखाई नहीं दिया. तुम कैसा है?"
मैंने कहा; "मैं ठीक हूँ."
इतना कहकर मैं चल दिया. उनकी बात सुनकर मुझे याद आया कि रविवार को बहरमपुर में पंचायत चुनावों के दौरान हुई हिंसा में बीस लोग मारे गए.
चलते-चलते
ऐसा बहुत कम होता है कि मंत्री और नेता दुखी हो जाएँ. और ऐसे मंत्री जिनकी पार्टी तीस सालों से शासन में दही की तरह जम जाए, उसके दुखी होने का क्या कारण हो सकता है? लेकिन हमारे प्रदेश की सरकार के एक मंत्री श्री क्षिति गोस्वामी हाल में ही बहुत दुखी दिखाई दिए. उन्होंने सार्वजनिक तौर पर अपने दुःख के बारे में बताया. गोस्वामी जी इस बात से दुखी थे कि उनकी पार्टी, आर एस पी के कार्यकर्ताओं के पास पंचायत चुनावों में इस्तेमाल के लिए केवल हाथ से बनाए गए बम हैं. जब कि सरकार में सबसे बड़ी पार्टी सी पी आई (एम) के कार्यकर्ताओं के पास लाईट मशीनगन, पिस्तौल, रिवाल्वर वगैरह हैं. उनकी इस बात को सुनकर मेरा क्या मानना है वो मैं आपको बताता चलूँ.
मुझे लगा तीस साल तक शासन में रहकर ये साम्यवादी जब चुनावों के दौरान इस्तेमाल किए जाने वाले हथियारों के मामले में साम्यवाद नहीं ला सके तो समाज में साम्यवाद कैसे ले आयेंगे? दिल्ली दूर लग रही है. नहीं?
आज से ठीक एक साल पहले मैंने अपने ब्लॉग पर पहली पोस्ट लिखी थी. एक साल हो गए जब मैंने ये सोचकर लिखना शुरू किया था कि देवनागरी कंप्यूटर पर लिखना कठिन है तो क्या हुआ, मैं रोमनागरी में ही लिखूंगा. लिखते-लिखते एक साल बीत गया. एक साल तक मुझे झेलने के लिए सभी मित्रों को नमन.
Thursday, January 31, 2008
बुक फेयर नहीं हुआ तो क्या, उसका उद्घाटन तो हो ही सकता है
भगवान ने इंसान को बनाया और इंसान ने सरकार. भगवान को इंसान बनाने के लिए नोबल प्राईज मिल सकता है तो इंसान को सरकार बनाने के लिए. ऐसा कहने के पीछे मेरे पास कारण हैं. ये बात दावे के साथ कही जा सकती है कि इंसान द्वारा किए गए आविष्कारों में सबसे बड़ा और गूढ़ आविष्कार है इंसान का सरकार बनाना. मैं वैसे भी सरकार को नज़दीक से देखता हूँ. मेरा आफिस कलकत्ते में सरकार के आफिस मतलब राईटर्स बिल्डिंग के पास ही है. लिहाजा सड़क पर आते-जाते सरकार के दर्शन हो ही जाते हैं. अगर किसी दिन नहीं दर्शन नहीं होता तो सरकार घर में रखे टेलीविजन सेट पर अपना दर्शन देकर धन्य कर जाती है.
सरकार के बारे में ऐसे विचार कल एक अखबार में एक समाचार पढ़कर आए. समाचार में लिखा था; 'इस साल कलकत्ते में बुक फेयर का उद्घाटन तो होगा लेकिन बुक फेयर नहीं होगा.' सरकार के लिए जरूरी है की बुक फेयर का उद्घाटन हो. बुक फेयर नहीं होने से भी काम चल जायेगा. ये उद्घाटन का सरकारी काम होना बहुत जरूरी है. हमारे शहर में सरकार ने कई ऐसे फ्लाई ओवर और पुल का उद्घाटन कर डाला है जो अभी तक बन रहे हैं. खैर, बात हो रही थी बुक फेयर की.
कलकत्ते में हर साल एक बुक फेयर होता है. साल १९७६ से होता रहा है. लेकिन पिछले कई सालों से किताबों का ये मेला किताबी मेला बनकर रह गया है. पिछले चार सालों से सरकार जनवरी महीने में केवल बुक फेयर और उससे संबंधित विवाद पर काम करती है. बाकी के सरकारी काम लगभग बंद रहते हैं. और फिर सरकार ही क्यों, पिछले चार सालों से बुक फेयर के मौसम में सरकार, कोर्ट, आर्मी, अखबार, जनता, नेता, पब्लिशर्स गिल्ड, सबके सब एक ही मुद्दे को ओढ़ते-बिछाते हैं, बुक फेयर. यह बुक फेयर पहले जिस स्थान पर होता था, वहाँ का मालिकाना आर्मी के पास है. पहले आर्मी को बुक फेयर के आयोजन पर कोई आपत्ति नहीं थी. लेकिन शायद हाल के वर्षों में आर्मी कुछ ज्यादा मुस्तैद और चुस्त-दुरुस्त हो गई है. आर्मी के मुस्तैद होने का नतीजा यह है कि सरकार बुक फेयर नहीं करवा पा रही.
आर्मी का मानना है कि बुक फेयर की वजह से उसका मैदान दूषित हो जाता है. सरकार का मानना है कि किताबों से वातावरण दूषित नहीं होता. आर्मी अपनी बात लेकर कोर्ट में चली जाती है. लिहाजा सरकार को भी कोर्ट में जाना पड़ता है. सरकार कोर्ट में हार जाती है क्योंकि आर्मी का वकील साबित कर देता है कि बुक फेयर की वजह से वातावरण दूषित हो जाता है. मजे की बात ये है कि जो मैदान बुक फेयर की वजह से दूषित होता है, वही मैदान राजनैतिक पार्टियों की रैलियों के आयोजन के बावजूद दूषित नहीं होता. ऐसी रैलियों में बीस लाख लोग आते हैं जो माछ-भात से लेकर चना-चबैना और प्लास्टिक की थैलियाँ इसी मैदान में विसर्जन कर जाते हैं. कहते हैं और ऐसी मान्यता भी है कि सरकारी चीजें सस्ती होती हैं. लिहाजा सरकार का वकील भी सस्ता ही होगा नहीं तो अदालत को बताता कि; 'योर आनर, अगर बीस लाख लोगों की रैली के बावजूद मैदान साफ-सुथरा रहता है तो बुक फेयर की वजह से दूषित कैसे हो सकता है.'
इस बार बुक फेयर का आयोजन सरकार ने एक और मैदान में करवाने की बात की. तैयारी हो चुकी थी. लेकिन जब उद्घाटन की बात आई, तो और लोग सामने आए और बताया कि ये मैदान भी दूषित हो जायेगा. फिर मामला उसी कोर्ट में पहुँच गया. कोर्ट ने भी बताया कि बुक फेयर की वजह से मैदान दूषित हो जायेगा. साल में एक बार आयोजित किया जानेवाला बुक फेयर, इस बार नहीं हो सकेगा. मजे की बात ये है कि आर्मी के मैदान में राजनैतिक रैलियां होती हैं तो इस मैदान में भी दुर्गा पूजा का पंडाल लगता है. सर्कस लगता है. लेकिन इन आयोजनों से मैदान दूषित नहीं होता. हर साल कलकत्ता बुक फेयर का विषय किसी अन्य देश को बनाया जाता है. कभी वियतनाम, कभी क्यूबा, कभी पोलैंड. मेरा सुझाव ये है कि जिस देश को विषय के रूप में चुना जाय, वहीं जाकर कलकत्ता बुक फेयर का आयोजन भी कर लिया जाय तो ठीक रहेगा.
सड़कों पर प्रदूषण, पार्कों में प्रदूषण, तालाबों में तैरती प्लास्टिक की थैलियाँ, लगभग सब जगह प्रदूषण बिखरा पड़ा है. उसकी फिक्र न तो कोर्ट को है न ही पर्यावरण मंत्रालय को. न ही आम आदमी को और न ही सरकार को. लेकिन बुक फेयर से होनेवाले प्रदूषण से सबको ख़तरा नज़र आता है. लेकिन सरकार की हिम्मत की भी दाद देनी पड़ेगी. उसकी इस सोच की, कि बुक फेयर नहीं हुआ तो क्या, उसका उद्घाटन तो हो ही सकता है.
Friday, November 9, 2007
नंदीग्राम - आज का सियाचीन
अस्सी के दशक में एक जगह के बारे में बहुत सुनते थे. नाम था सियाचीन. आए दिन वहाँ कब्जा करने का साप्ताहिक कार्यक्रम चलता रहता था. कभी भारत का कब्जा तो कभी पाकिस्तान का. ये 'कब्जात्मक' कार्यवाई सालों चली. उन दिनों भूगोल के प्रश्नपत्र में सियाचीन को लेकर प्रश्न नहीं पूछा जाता था. छात्रों की हालत ख़राब हो जाती. शायद भारत और पाकिस्तान के शिक्षा मंत्रियों ने आपस में समझौता कर लिया था कि; 'स्कूल की परीक्षाओं में सियाचीन को लेकर सवाल नहीं पूछे जायेंगे.'
कुछ दिनों के बाद सियाचीन पर कब्जे की समस्या जाती रही. बाद में ये समस्या शहरों में लोगों के मकान पर गुंडों और किरायेदारों द्वारा किए गए कब्जे तक सीमित रही. अखबार और टीवी चैनल पर ऐसी समस्याएं न पाकर लोग बोर होने लगे. 'कब्जात्मक' कार्यक्रम में आया सूखा अब जाकर ख़त्म हुआ है. हमारे राज्य में एक जगह है नंदीग्राम. आज का सियाचीन. अन्तर केवल इतना है कि सियाचीन में कब्जे का फेर-बदल दो देशों के बीच होता था लेकिन यहाँ दो दलों के बीच.
हम तो यह सोचते थे की नंदीग्राम नामक जगह हमारे देश में ही है. इसलिए यहाँ भी देश का कानून और संविधान चलेगा. लेकिन यह क्या? पश्चिम बंगाल सरकार पिछले कई महीनों से बता रही है कि वहाँ सरकार का राज नहीं रहा. पुलिस वहाँ जा नहीं सकती. सी पी एम को समर्थन देने वालों को वहाँ से बाहर कर दिया गया है. बेचारे अपना घर-बार छोड़कर स्कूल में रह रहे हैं. स्कूल बंद हैं. बच्चे महीनों से स्कूल नहीं गए. कभी किसी ने नहीं सोचा होगा कि हमारे ही देश में एक ऐसी जगह होगी जहाँ देश का क़ानून नहीं चलेगा. आए दिन यहाँ कब्जा बदलता रहता है. कभी सीपीएम वाले कब्जा कर लेते हैं कभी उनके विरोधी. गोलियों का आदान-प्रदान महीनों से जारी है.
स्थानीय स्तर पर अपने कैडरों को क़ानून अपने हाथ में लेने की छूट देने वाली सीपीएम पार्टी ने शायद ही सोचा हो कि बात-बात पर कानून को हाथ में लेने वाले ये कैडर इतने आगे निकल जायेंगे कि कानून इनका कुछ नहीं बिगाड़ पायेगा. ऐसा पहली बार हुआ है कि इन महारथियों को टक्कर देने वाले और भी लोग खड़े हो गए हैं. ऐसा भी हो सकता है कि जो लोग इनके विरोध में खड़े हुए हैं, वे लोग भी कुछ महीने पहले शायद सी पी एम् पार्टी के कार्यकर्ता थे. कितने लोग मारे जा चुके हैं, किसी को नहीं पता. पता भी कैसे चले जब वहाँ प्रशासन का तंत्र जा ही नहीं सकता.
हमारे राज्य में एक नेता पाई जाती हैं. नाम है ममता बनर्जी. ममता जी जब कलकत्ते में रहते-रहते बोर होने लगती हैं तो पिकनिक मनाने नंदीग्राम चली जाती हैं. इनके आने-जाने में कई लोगों की जान खर्च हो जाती है. वहाँ भूमि के अधिग्रहण की खिलाफत करने वाली एक संस्था है. ममता जी इस संस्था को समर्थन देती हैं. सरकार का कहना है कि; 'जब हमने जमीन न लेने का एलान कर दिया है तो फिर ऐसी किसी संस्था की जरूरत नहीं है. भारत सरकार के वाणिज्य मंत्रालय ने भी कह दिया है कि नंदीग्राम में किसानों की जमीन नहीं ली जायेगी.'
सरकार चाहती है कि उनका यह लॉजिक ममता बनर्जी समझ जाएँ. लेकिन दूसरों की लॉजिक न समझने वाली सी पी एम पार्टी को कौन समझाये कि 'जैसे आप अपने 'तर्कों' से दूसरों की बातें नहीं समझते, ठीक वैसे ही ममता बनर्जी भी नहीं समझेंगी.' इन लोगों को अब समझ में आ रहा होगा कि 'अगर सामने वाला लॉजिक समझने के लिए तैयार न हो, तो कोई उसे समझाया नहीं सकता.' कुछ दिनों पहले राज्य के मुख्यमंत्री को थोडा जोश आया तो उन्होने केन्द्र सरकार से सुरक्षा बलों की माँग कर डाली. अब कह रहे हैं कि केन्द्रीय सुरक्षा बलों को नंदीग्राम में घुसने की इजाज़त नहीं दी जा सकती. शायद नवम्बर महीने का असर है. सुना था इसी महीने में 'क्रांति' हुई थी. लगता है राज्य सरकार सोच रही है कि नंदीग्राम में भी कोई क्रांति हो जाये और स्थिति सुधर जाये.
बड़ी अजीब स्थिति है. सालों से लोग गुजरात और मोदी के पीछे पड़े हैं. कहते हैं मोदी ने राजधर्म का पालन नहीं किया. लेकिन नंदीग्राम के बारे में राजधर्म का पालन करने के लिए कहने वाला कोई नहीं है.
नीरो पश्चिमी देश के सम्राट थे. जाहिर है कि उनकी तुलना केवल पश्चिमी प्रदेश के किसी 'शासक' के साथ होनी है. हमें तो केवल ये देखना है कि नीरो का नाम दूरी तय कर के पूरब तक पंहुचता है कि नहीं.
Wednesday, October 31, 2007
दलों का दलदल और बंद का कीचड
कुछ साल पहले एक प्रस्ताव आया था की पश्चिम बंगाल का नाम बदल कर बंग प्रदेश रख दिया जाय.जिन लोगों ने प्रदेश के लिए ये नाम सुझाया था, उनका कहना था कि ऐसा नाम रखने से राज्य ज्यादा देसी लगेगा और हमारी संस्कृति की रक्षा भी हो जायेगी.बाद में राज्य की 'बंद संस्कृति' का मजाक उडाते हुए लोगों ने कहा कि बंग प्रदेश क्यों, इस राज्य का नाम तो बंद प्रदेश होना चाहिए.खैर, नाम बदलो अभियान रोक दिया गया और राज्य का नाम पश्चिम बंगाल ही रहा.मतलब, 'संस्कृति' पर ख़तरा बना हुआ है.
मेरा मानना है कि राज्य का नाम 'बंद प्रदेश' रख देना चाहिए।देखिये न, कल बंद था.आज बंद है.शायद कल भी रहे.वैसे अभी तक किसी पार्टी ने कल बंद कराने का एलान अभी तक तो नहीं किया, लेकिन शाम तक समय है.कोई भी पार्टी कल बंद का एलान कर सकती है.बंद की वजह से आज सात बजे ही आफिस आना पडा.बंद कराने वाले भी आलसी होते हैं.बेचारे नौ बजे तक सो कर उठेंगे, तब सडकों पर उतरेंगे बंद कराने.मैंने थोड़ा उनके आलसी होने का फायदा उठाया और थोड़ा अपने आलस्य को दूर करते हुए आफिस पहुँच गया.
आज का बंद ममता बनर्जी ने किया है।आप ये सोच रहे हैं कि मैंने ये क्यों नहीं कहा कि बंद का एलान उनकी पार्टी ने किया है.मतलब साफ है.ममता बनर्जी माने ही त्रिनामूल कांग्रेस.बंद भी बड़ी अनोखी बात का सहारा लेकर किया गया.ममता का कहना है कि जब वे नंदीग्राम जा रही थीं तो उनके ऊपर किसी ने गोली चलाई.ये और बात है कि उनकी 'बुलेट थ्योरी' में काफ़ी बड़ा 'होल' है.उन्होंने एक जिंदा कारतूस लेकर फोटो खिचाई और बंद का एलान कर दिया.पुलिस का कहना है कि जब गोली चलती है तो गोली का खोखा हथियार के पास रहता है, न कि दूर जाकर गिरता है.लेकिन राजनीतिज्ञों (?) की बातें हमेशा से ही निराली रहती हैं.
जिनको अपने नौकरी प्यारी है, वे बेचारे तो ऐसे बंद में भी आफिस जाते ही हैं।आज भी लोग निकलेंगे, मुझे इस बात का पूरा भरोसा है.लेकिन शाम को ममता जी एक प्रेस कांफ्रेंस बुलाएंगी और बंद की सफलता के लिए जनता को धन्यवाद देंगी.साथ में बुद्धदेव भट्टाचारजी इस्तीफे की मांग भी कर डालेंगी,ये कहते हुए कि 'आज जनता ने हमारे बंद को सफल बनाते हुए साबित कर दिया है कि आपको शासन करने का अधिकार नहीं रहा.'
अद्भुत ढंग से सब कुछ चल रहा है।आगे भी चलता रहेगा.लेकिन एक बात मेरी समझ में नहीं आती.कोई पार्टी सामने आकर क्यों नहीं कहती कि कुछ सालों के लिए बंद की राजनीति बंद की जानी चाहिए.लेकिन कहेगा कौन.वामपंथी इस मामले में ममता के ताऊ हैं.वे भी बंद करते हैं.मजे की बात ये कि अगर ममता बनर्जी बंद करती हैं तो सरकार पुलिस का ख़ास इंतजाम करती है.ज्यादा से ज्यादा सरकारी बसें चलाई जाती हैं.लेकिन जब ये वामपंथी बंद करते हैं तो न पुलिस का इंतजाम और न ही बसों का.ऐसे में कोई बंद करने की खिलाफत करेगा, इस बात की आशा बहुत कम है.
हमारे एक 'ब्लॉगर मित्र' एक बार इन बंद कर्मियों के हाथों पिट चुके हैं।बेचारे बंद के दिन आफिस जा रहे थे.वामपंथियों ने रोक लिया.इन्होने समझाने की कोशिश की.ये कहते हुए कि 'बंद से बड़ा नुकसान वगैरह होता है.देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचता है.लोगों को तकलीफ होती है.' बस फिर क्या.बंद कर्मियों को लगा कि 'ये तो भाषण दे रहा है.कहीं ऐसा न हो कि आगे चलकर नेता बन जाए.और उन्होंने हमारे मित्र की पिटाई कर दी.बेचारे उसके बाद से बंद के दिन घर से बाहर नहीं निकलते.
लेकिन मैं ऐसे बंद को एक चैलेन्ज के रूप में लेता हूँ.मेरा मानना है कि अगर साल के तीन सौ साठ दिन मेरा आफिस मेरे हिसाब से चलता है तो बंद के दिन भी मेरे हिसाब से ही चलेगा.किसी ममता बनर्जी या वामपंथियों के हिसाब से नहीं.
Tuesday, October 16, 2007
दुर्गा पूजा पर एक रिजेक्टेड निबंध
जहाँ स्टैण्डर्ड एण्ड पूअर का मानना था कि 'अगर इस निबन्ध को चुना गया और प्रसारित किया गया तो श्रद्धेक्स ('एस एंड बी लोकल इंडेक्स', यानी श्रद्धा और भक्ति का स्थानीय सूचकांक - सेंसेक्स से कंफ्यूज़ न करें!) में 300 प्वाइण्ट की गिरावट तय है, वहीं देवी-भक्तों का मानना था कि 'किसी 'पापी' द्वारा लिखे गए निबंध को शामिल नहीं किया जा सकता क्योंकि ऐसे निबंध पढ़ने से श्रद्धा स्खलित हो सकती है'.
आप लेख का अवलोकन कृपया उक्त राइडर के साथ करें:
दुर्गा-पूजा वैसे तो देश में एक त्यौहार की तरह मनाया जाता है, लेकिन पश्चिम बंगाल में इसे उद्योग का दर्जा मिल चुका है। अस्सी के दशक में राज्य से बाकी उद्योगों के ख़त्म होने के बाद सरकार और नागरिकों के सामने प्रश्न था कि कौन से उद्योग की स्थापना की जाय, जो राज्य से लुप्त होते उद्योगों का स्थान ले सके। इसी योजना के तहत दुर्गा-पूजा नामक उद्योग की स्थापना हुई. इस उद्योग के विकास के साथ-साथ इससे जुड़े बाकी के एंसीलरी उद्योगों का भी विकास हुआ. चन्दा उद्योग और गुंडा उद्योग इनमें से प्रमुख हैं. चन्दा उद्योग के विकास ने कालांतर में पूजा-उद्योगपतियों की चाल-ढाल और बोल-चाल पर भी गहरा प्रभाव डाला. हर साल दुर्गा-पूजा आने के क़रीब एक महीना पहले से ही इस उद्योग में काम करने वाले उद्योगपतियों और उनके कर्मचारियों की भाषा में अद्भुत बदलाव आ जाता है जिसका प्रभाव पूजा ख़त्म होने के क़रीब एक महीने बाद तक रहता है. इन लोगों के शब्दकोष में क़रीब दस से पन्द्रह गाली-सूचक शब्द जुड़ जाते हैं जो चन्दा उद्योग को चलाने में मदद करते हैं. जहाँ इन शब्दों से काम नहीं चलता वहाँ सामाजिक व्यवस्था में त्वरित बदलाव का सहारा लिया जाता है. जैसे अगर कोई 'पापी' मनुष्य पूजा के लिए मुँह माँगा चन्दा नहीं दे तो उसकी उचित धुलाई के साथ-साथ उसका सामजिक बहिष्कार किया जाता है. इसका परिणाम ये होता है कि मुहल्ले में रहने वाले लोग उससे बात नहीं करते और मुहल्ले का जनरल स्टोर्स उन्हें अपनी दूकान से सामान नहीं देता.
दुर्गा-पूजा के आने पर कलकत्ता शहर में लोकतंत्र उफान पर रहता है। पंडाल बनाने से लेकर नाच-गाने का कल्चरल प्रोग्राम बीच सड़क पर होता है। शहर की एक-चौथाई सडकों पर बसों और कारों का स्थान कुर्सी और शामियाने ले लेते हैं। पूजा ख़त्म होने के बाद मूर्ति-भसान के सांस्कृतिक कार्यक्रम के लिए भी सडकों को पूजा उद्योगपतियों को सौंप दिया जाता है. मूर्ति-भसान के लिए जाते हुए जुलूस को देखकर अंतर्राष्ट्रीय संगठन भी इस बात से आश्वस्त हो जाते हैं कि पश्चिम बंगाल और देश में लोकतंत्र न केवल जिंदा है, बल्कि आगे भी बढ़ रहा है.
दुर्गा-पूजा पर दुर्गा माँ और उनके परिवार के अपने सिंहासन पर विराजने का कार्यक्रम भी बड़ा निराला है। दुर्गा माँ अपने पूरे परिवार के साथ ट्रक-यात्रा कर पूजा पंडाल के द्वार तक आ कर रुक जाती हैं। उन्हें ख़ुद आगे जाने की इजाजत नहीं है। आगे जाने के लिए उन्हें किसी रीमा सेन, राईमा सेन जैसे फिल्मी कलाकार या किसी नेता का परमिशन लेना पड़ता है। ये लोग एक कैंची लेकर आते हैं और रीबन काट कर उन्हें आगे जाने की इजाजत देते हैं। इन्हें कैंची लेकर आते देख कर प्रतीत होता है जैसे ये 'उदघाटक' दुर्गा माँ का रास्ता काटने आते हैं। दुर्गा-पूजा के उद्घाटन पर साल २००५ तक केवल फिल्मी हस्तियों, क्रिकेट खिलाडियों और नेताओं की मोनोपोली थी. उनकी इस मोनोपोली को खत्म करने का काम पहली बार सन २००६ में हुआ जब कुरुक्षेत्र निवासी और अपनी 'कुआँ-यात्रा' के लिए मशहूर बालक 'प्रिन्स' ने कलकत्ते में कुछ पूजा पंडालों में जाकर उद्घाटन का काम किया.
पश्चिम बंगाल में दुर्गा-पूजा समय का भी सूचक होता है। सरकार के टेंडर से लेकर कलकत्ता कार्पोरेशन के सड़क के ठेके का टेंडर इसी मौसम में निकलता है. अगर कोई सड़क ख़राब हो जाती है तो लोग ये सोचकर संतोष कर लेते हैं कि 'इस पूजा को जाने दो, अगले पूजा में सड़क की मरम्मत हो जायेगी.' साथ-साथ कई सारे सामजिक परिवर्तन भी दृष्टिगोचर होते हैं. साल में ११ महीने १५ दिन तक न दिखाई देने वाला जमादार अचानक सक्रिय हो जाता है. उसे दस दिन के काम का बक्शीश लेना रहता है. पूरे साल देर से अखबार देने वाला भी दस दिन के लिए अति सक्रिय हो जाता है. बक्शीश का सवाल जो है. अन्य परिवर्तनों में सबसे बड़ा परिवर्तन शराब की बिक्री में दिखाई देता है. साथ ही दवाईयों की बिक्री बढ़ जाती है क्योंकि शराब के साथ-साथ बिरियानी का सेवन अचानक बढ़ जाता है जिसकी वजह से दवाईयों की बिक्री बढ़ जाती है.
दुर्गा-पूजा अन्य लोगों के साथ-साथ वयस्क होते लड़कों के लिए भी अच्छे दिन लेकर आता है। पूरे साल शराब के सेवन का इंतजार कर रहे ये बच्चे अपनी शराब-सेवन की महत्वाकांक्षा को हकीकत में परिवर्तित होते देख पाते हैं। शराब-सेवन के पश्चात पूजा परिक्रमा का आनंद लेते हैं। आध्यात्मिकता और शराब की जुगलबंदी का ये ड्रामा देखने लायक रहता है. पूजा का इंतजार उन साम्यवादियों को भी रहता है जो साल भर जनता को बताते रहते हैं कि उन्हें देवी-देवताओं पर विश्वास नहीं रहता. ये साम्यवादी पूजा पंडालों के बाहर अपनी साम्यवादी साहित्य की दुकान खोलकर बैठ जाते हैं. अपनी बात जनता तक पंहुचाने के लिए इन्हें भी देवी दुर्गा के सहारे की जरूरत पडती है. ये मौसम टैक्सी वालों के लिए भी अच्छे दिन लेकर आता है. जो टैक्सी वाले पूरे साल ग़लत मीटर लगाकर जनता को लूटते हैं, इस मौसम में टैक्सी के मीटर ही बंद कर देते हैं और जनता से भाडे के साथ-साथ प्रीमियम भी चार्ज करते हैं.
बहुत सारे मामलों में दुर्गा-पूजा को नेताओं के नाम से भी जाना जाता है. कलकत्ते शहर में हमें सुब्रत मुख़र्जी का पूजा और सौमेन मित्र का पूजा के साथ-साथ और बड़े नेताओं के पूजा पंडाल के दर्शन होते हैं. इन नेताओं द्वारा आयोजित पूजा के बारे में सुनकर जनता को भ्रम हो जाता है कि 'यहाँ माँ दुर्गा की पूजा होती है या नेताओं की.' रोशनी का इंतजाम इतना विकट होता है कि सब कुछ साफ-साफ देखा जा सकता है.
लेकिन शायद माँ दुर्गा की आंखें इतनी भीषण रोशनी में चौधिया जाती हैं।