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Saturday, September 15, 2007

हिंदी ब्लागिंग का इतिहास (साल २००७)- भाग ३






(सं)वैधानिक अपील: ब्लॉगर मित्रों से अनुरोध है कि इस अगड़म-बगड़म पोस्ट को केवल मनोरंजन की दृष्टि से देखें.
साल २००७ के अगस्त महीने में इलाहबाद में घटी एक सड़क दुर्घटना को केन्द्र में रखकर नवोदित चिट्ठाकार श्री ज्ञान दत्त पाण्डेय के 'उच्च-मध्य वर्ग की अभद्र रुक्षता' शीर्षक से प्रकाशित लेख ने समाजिक वर्गीकरण के अलावा वित्त मुद्दों और आयकर के ऊपर नए सिरे से बहस का दरवाजा खोल दिया। श्री पाण्डेय के लेख के अन्तिम भाग में पाठकों के लिए सुझाए गए 'निम्नलिखित' 'तत्त्व-ज्ञान' का सबसे बड़ा उपयोग भारत सरकार के वित्त मंत्रालय ने किया.
तत्त्व-ज्ञान - आप झाम में फंसें तो वार्ता को असम्बद्ध विषय (मसलन पैन नम्बर, आईटीसीसी) की तरफ ले जायें। वार्ता स्टीफेंस वाली (अवधी-भोजपुरी उच्चारण वाली नहीं) अंग्रेजी में कर सकें तो अत्युत्तम! उससे उच्च-मध्य वर्ग पर आपके अभिजात्य वाला प्रभाव पड़ता है.
इस तत्त्व-ज्ञान को आधार बनाकर वित्त मंत्रालय ने नागरिकों से कर वसूलने का नया रास्ता निकाला। वित्त मंत्रालय ने कुल २६ आयकर आधिकारियों को ट्रैफिक सिपाही के वेश में इलाहबाद की सडकों पर ट्रैफिक नियंत्रण के आड़ में कर वसूलने के काम पर लगा दिया. ये आयकर अधिकारी कार वालों से पैन कार्ड की डिमांड करते थे. पैन कार्ड न मिलने पर ये अधिकारी वहीँ पर कार की साईज के हिसाब से कर निर्धारण करके कर वसूल लेते थे. शुरू-शुरू में इन अधिकारियों को अवधी और भोजपुरी उच्चारण वाली अंग्रेजी बोलने की वजह से कुछ दिक्कत हुई लेकिन बाद में इन अधिकारियों को रैपीडेक्स अंग्रेजी कोर्स में भर्ती कर दिया गया जिससे इनकी अंग्रेजी में वांछित बदलाव आ गया. वित्त मंत्रालय के इस तरीके से सरकार ने एक साल में ही क़रीब ३०० करोड़ रुपये वसूल किए. बाद में मंत्रालय ने अपने इस प्लान को इन्दौर में भी लागू किया जहाँ ॥(आगे का पन्ना गायब है..)

(नोट: कुछ पाठकों ने श्री पाण्डेय द्वारा इस्तेमाल किए शब्द जैसे उच्च वर्ग, उच्च-मध्य वर्ग या फिर निचले तबके जैसे शब्दों पर आपत्ति जताई। इन पाठकों का मानना था कि 'भारतवर्ष में वर्गीकरण लगभग सौ साल पहले ही ख़त्म हो गया था. इसलिए श्री पाण्डेय को ऐसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए था.')

इसी साल के अगस्त महीने में प्रसिद्ध चिट्ठा-व्यंगकार और शिक्षक श्री आलोक पुराणिक ने एक ऐसा निबंध लिखा जिसने साहित्य के साथ-साथ व्यापार और सरकार को भी प्रभावित किया। श्री पुराणिक का 'पूरी छानना और लेखन एक जैसे हैं' शीर्षक से छपे निबंध ने पूरे देश के हलवाईयों को साहित्य सृजन के लिए प्रेरित किया. दिल्ली के प्रगति मैदान में देश भर के हलावाईयों की एक सभा में श्री पुराणिक का सार्वजनिक अभिनन्दन हुआ. उन्हें धन्यवाद देते हुए 'अखिल भारतीय हलवाई संघ' के अध्यक्ष ने बताया; 'हमें धन्यवाद देना चाहिए पुराणिक जी का, जिन्होंने पूरी छानने और लेखन में न केवल समानता स्थापित की, अपितु पूरे देश के हलावाईयों में ये विश्वास स्थापित किया की वे भी लेखन कर सकते हैं.'

इस सभा में २५००० हलवाईयों ने सितंबर महीने से लेखन की शुरुआत करने की शपथ ली। हलवाईयो के इस शपथ ने सरकार को सकते में डाल दिया. सरकार की 'मंहगाई रोक कमेटी' ने सरकार को रिपोर्ट सौपते हुए जानकारी दी कि; 'हलवाईयो के ऐसे कदम से देश में मिठाईयों के दाम में वृद्धि सरकार को नुकसान पहुँचा सकती है. सरकार की नीतियों से फैलती कटुता को जनता मिठाई खाकर दूर करती है. लेकिन हलवाईयो के लेखन में कदम रखने से न सिर्फ़ मिठाईयों की कीमतें बढेगी बल्कि जनता के बीच कटुता का प्रवाह बढ़ जायेगा. ऐसी स्थिति में सरकार चुनाव भी हार सकती है.'

'मंहगाई रोक कमेटी' की इस रिपोर्ट को गम्भीरता से लेते हुए सरकार ने हलावाईयों से इतने बड़े पैमाने पर लेखन के क्षेत्र में न उतरने की अपील की। बाद में 'अखिल भारतीय हलवाई संघ' और सरकार के बीच हुई बैठक में इस बात पर समझौता हो गया कि हलावाईयों की तरफ़ से कलकत्ते निवासी विश्व प्रसिद्ध हलवाई मुन्ना महाराज ही लेखन करेंगे. मुन्ना महाराज ने केवल दो महीनों में ही निम्नलिखित छह उपन्यास लिखे:
  1. तौलत मांगे ख़ून
  2. बिका हुआ इंसान
  3. आत्मा की गवाही
  4. एक कटोरा खून
  5. लूट की दौलत
  6. लंगडा कानून
इतने कम समय में इतनी बड़ी मात्रा में उपन्यास लिखकर उन्होंने एक कीर्तिमान स्थापित किया। इतने अल्प समय में छह उपन्यास लिखने का राज बताते हुए मुन्ना महाराज ने जानकारी दी थी कि; 'हमने नियम बना लिया था - एक दिन में जितनी पूरी छानेगे, उतने पन्ने रोज लिखेंगे.'

(नोट: व्यापारी वर्ग द्वारा लेखन के क्षेत्र में उतरने का ये पहला मौका था। वैसे कुछ इतिहासकार मानते हैं कि ऐसा पहले भी हो चुका था. ऐसे इतिहासकारों का कहना है कि जॉर्ज बर्नाड शा के नाटक आर्म्स एंड द मैन से प्रेरित होकर सन १९०५ में अमेरिका के १६७५ हथियार व्यापारियों ने हथियारों का धंधा छोड़कर लेखन के क्षेत्र में उतरने का फैसला एक सम्मेलन में किया था. बाद में अमेरिकी सरकार के आग्रह पर ये व्यापारी अपने फैसले से पीछे हट गए. अमेरिकी सरकार का मानना था कि व्यापारियों के लेखन में कदम रखने से सरकार का वो सपना टूट जाता जिसके तहत 'अमेरिका पूरे विश्व को हथियार बेचना चाहता था!')

हिन्दी चिट्ठाकारिता की वजह से लेखन में सत्याग्रह, इतिहास में पहली बार देखने को मिला। इसी साल ६ सितंबर के दिन प्रसिद्ध चिट्ठाकार-दल महाशक्ति ने इलाहबाद में कृष्ण भक्तों पर पुलिस द्वारा लाठीचार्ज का विरोध करते हुए एक दिन 'लेखन कार्य रोको' प्रस्ताव पारित किया और पूरे दिन अपने किसी भी चिट्ठे पर लेख प्रकाशित नहीं किया. साहित्य और लेखन के इतिहास में इससे पहले ऐसा उदाहरण नहीं मिलता. उनके इस कदम ने न सिर्फ़ विरोध का नया रास्ता दिखाया बल्कि लेखकों और सरकार के बीच नए समीकरणों की उत्पत्ति की. कुछ इतिहासकार मानते हैं कि; 'इससे पहले सरकारें और राजनीतिज्ञ तब डर जाते थे, जब कोई लेखक सरकार की नीतियों का विरोध करते हुए लिखता था'. उनके इस निर्णय की वजह से उत्तर प्रदेश में सत्ता के गलियारों में हलचल मच गई. स्थिति तब और बिगड़ गई जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को महाशक्ति के चिट्ठे पर लिखी 'पंच लाईन' का पता चला. इस चिट्ठाकार दल के नारे, 'हमसे जो टकराएगा, चूर-चूर हो जायेगा' की वजह से पूरी सरकार सकते में आ गई. मुख्यमंत्री ने गृह सचिव, सूचना मंत्रालय के सचिव और सांस्कृतिक विभाग के मुख्य सचिव का एक दल बनाया और इस दल को तत्काल इलाहाबाद रवाना करके इन चिट्ठाकारों को लेखन कार्य पुनः शुरू करने का आग्रह किया. सरकारी दस्तावेजों से इस बात की पुष्टि होती है कि गृह सचिव ने महाशक्ति के लेखन-शाला जाकर उनके कंप्यूटर को चालू कर उन्हें लिखने का अनुरोध किया. इस घटना के बाद राज्य सरकार ने एक कमेटी बनाई जिसका काम केवल ये देखना था कि चिट्ठाकार बराबर लिखते रहें और॥(आगे का पन्ना गायब है..)

साल २००७ के अगस्त महीने में विख्यात हिन्दी चिट्ठाकार श्री अनूप शुक्ला के 'अपने-अपने यूरेका' शीर्षक वाले लेख ने विश्व भर में वैज्ञानिकों को न्यूटन और उनके द्वारा परिकल्पित भौतिक शास्त्र के सिद्धांतों पर नए सिरे से सोचने के लिए विवश कर दिया। प्रसिद्ध वैज्ञानिक आर्किमीडीज द्वारा उत्प्लावन बल के बारे में दी गई परिकल्पना के बारे में लिखते हुए श्री शुक्ल ने लिखा:
'सेव को गिरता देखकर न्यूटन गुरुत्व के नियम खोज लिये। आज कोई कृषि वैज्ञानिक/आर्थशास्त्री साबित कर सकता है कि यह जो लोन की प्रथा है वह पेडो़-पौधों में प्रचलित है। सेव का पेड़ धरती से तमाम पोषण तत्व उधार लेता है। फ़सल हो जाती है तब चुका देता है। पहले जब बिचौलिये न थे तब सीधे धरती को दे देता था। सेव नीचे गिर कर टूट जाता था। अब सब काम ठेके पर दे दिया। अब तो जो पेड़ उधार नहीं चुका पाते उनकी लकड़ी बेंचकर उधारी की रकम बसूल कर ली जाती है। जैसे कि बैंक वाले करते हैं।'
श्री शुक्ल के इस निबंध का अंग्रेजी रूपांतरण 'अमेरिकन जर्नल ऑफ़ साईंस' में प्रकाशित हुआ। प्रकाशन के बाद वैज्ञानिकों में इस बात को लेकर संदेह पैदा हो गया कि न्यूटन एक वैज्ञानिक थे, जैसा वे अब तक मानते आए थे, या फिर एक अर्थशास्त्री. कुछ लोगों ने न्यूटन को कृषि वैज्ञानिक मान लिया. सात देशों के वैज्ञानिकों के एक दल ने न्यूटन और उनके गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत पर पुनः खोज करना शुरू किया.

श्री शुक्ल की इस परिकल्पना के उपयोग को मानते हुए भारतीय सरकार ने त्वरित कदम उठाने का फैसला किया। सेब और पृथ्वी के बीच में बिचौलिए नहीं होने के सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए सरकार ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली से बिचौलियों को पूरी तरह निकाल फेंकने का फैसला किया. इस पर काम करने के लिए और वितरण प्रणाली को मजबूत बनाने के लिए सरकार ने एक कमेटी बनाई लेकिन इस कमेटी द्वारा दी गयी रिपोर्ट किसी बिचौलिए ने .....(आगे का पन्ना गायब है)

(अब बस किया जाये?....)

Friday, September 7, 2007

हिंदी ब्लागिंग का इतिहास (साल २००७)- भाग २






(सं)वैधानिक अपील: ब्लॉगर मित्रों से अनुरोध है कि इस अगड़म-बगडम पोस्ट को केवल मनोरंजन की दृष्टि से देखें।



इसी साल (२००७ में) भारत में पहली बार किसी राजनैतिक पार्टी ने अपना हिन्दी ब्लॉग शुरू किया। नवम्बर महीने के शुरू में सत्तासीन कांग्रेस पार्टी ने अपना 'रोमन' हिन्दी ब्लॉग बनाया. ब्लॉग बनाने का काम सन २००८ में होने वाले मध्यावधि चुनावों को ध्यान में रखकर किया गया. वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं की एक कमेटी ने जनता तक पहुचने के लिए पार्टी को ब्लॉग बनाने की सलाह दी थी. चूंकि ब्लॉग 'रोमन' हिन्दी में था इसलिए उसके सम्पादन का कार्य तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गाँधी ने अपने हाथों में लिया. पार्टी के इस 'रोमन' हिन्दी ब्लॉग के लिए सलाहकार के रूप में अप्रवासी भारतीय और इटली में रहने वाले श्री राम चंद्र मिश्र को चुना गया. बाद में पार्टी के नेताओं के बीच सलाहाकार के चुनाव को लेकर मतभेद पैदा हो गया. पार्टी के एक धड़े का मानना था कि चूंकि श्री मिश्र पहले से भगवद्गीता पर लिखते रहे थे, इसलिए सलाहकार के पद पर उनकी नियुक्ति पार्टी के 'इमेज' के साथ नहीं जाती और पार्टी का वोट बैंक खिसकने का भय था. बाद में मिश्र जी को अपने पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा और 'रामानियो' नामक इटालियन को इस पद पर नियुक्त किया गया. सन २०१७ में तत्कालीन बीजेपी सरकार ने 'रामानियो' के बारे में जानकारी लेने के लिए रा की मदद ली तो पता चला कि ये रामानियो कोई और नहीं बल्कि मिश्र जी का ही छद्म नाम था. रा की रिपोर्ट को प्रकाशित करते हुए बीजेपी सरकार ने बताया कि छद्म नाम वाले सलाहकार की नियुक्ति कांग्रेस पार्टी के छद्म धर्मनिरपेक्षता के साथ………॥(आगे का पन्ना गायब है)

ब्लॉग समाज के बढ़ते प्रभाव ने जहाँ राजनैतिक दलों को अपने ख़ुद के चिट्ठे बनाने के लिए विवश किया वहीँ सन २००८ के संभावित मध्यावधि चुनावों को देखते हुए हिन्दी चिट्ठाकारों के लिए तरह-तरह के प्रस्ताव और प्रलोभन भी दिए गए। कांग्रेस पार्टी ने अपने चुनाव घोषणापत्र में इस बात की घोषणा की; 'अगर पार्टी सत्ता में आती है तो एनसीईआरटी की किताबों में हिन्दी चिट्ठाकारों द्वारा लिखे गए निबन्धों को प्राथमिकता दी जायेगी.’ बाद में पार्टी के मानव संसाधन विकास समिति ने हिन्दी चिट्ठाकारों द्वारा लिखे गए निबन्धों को पाठ्यपुस्तकों में शामिल करने के लिए सत्ताईस प्रतिशत आरक्षण देने का प्रस्ताव रखा. हालांकि कांग्रेस पार्टी को ये प्रस्ताव मंजूर था, वामपंथियों ने ऐसे किसी प्रस्ताव का विरोध किया. कुछ इतिहासकारों का मानना है कि 'वामपंथी पार्टियां इस बात से डरी हुई थी कि नन्दीग्राम और सिंगुर पर लिखे गए निबंध अगर पाठ्यपुस्तकों में शामिल कर लिए गए तो उन्हें समस्या हो सकती है'. कांग्रेस पार्टी ने इसका समर्थन करते हुए सन २००९ से पाठ्यपुस्तकों में चिट्ठाकारों द्वारा लिखे गए निबन्धों को शामिल करने के लिए संसद में एक प्रस्ताव रखा. बाद में इस प्रस्ताव का विरोध करते हुए कुछ नेताओं ने चिट्ठाकारों के क्रीमी लेयर को आरक्षण का लाभ न देने को लेकर विवाद शुरू कर दिया. इस विवाद के समाधान के लिए सरकार ने एक समिति बनाई जिसकी रिपोर्ट आजतक …(आगे का पन्ना गायब है)

इसी साल के मध्य में हिन्दी चिट्ठाकारिता के स्तम्भ श्री प्रमोद सिंह "अजदक" जी ने अपनी बहुचर्चित चीन यात्रा की। उन्होंने अपनी इस यात्रा पर कुल मिलकर २७५ पोस्ट लिखी और पूरी यात्रा का वर्णन विस्तारपूर्वक अपने चिट्ठे पर किया. कुछ इतिहासकारों का मानना है कि प्रमोद सिंह जी ने अपनी इस यात्रा का पूरा व्यौरा चिट्ठाकारों के साथ नहीं बाँटा. ऐसे इतिहासकारों का मानना है कि अपनी इस यात्रा के दौरान श्री सिंह ने क़रीब पचीस हज़ार चीनी नागरिकों को हिन्दी चिट्ठाकारिता के गुर सिखाये. ये बात तब सामने आई, जब इन चीनी नागरिकों ने साल २००८ के मार्च महीने में अपने हिन्दी चिट्ठों का पंजीकरण के साथ-साथ प्रकाशन भी शुरू किया. श्री सिंह के इस योगदान की सराहना करते हुए चीन की सरकार ने उन्हें 'निशान-ए-चीन' के खिताब से सम्मानित किया. सन २०२० में चीन की स्कूली पाठ्यपुस्तको में श्री सिंह के ऊपर एक पूरा अध्याय शामिल कर लिया गया. इतिहासकारों का मानना है कि ऐसा करके चीन सरकार ने भारत के उस एहसान का बदला चुका दिया जिसके तहत भारतीय स्कूली पाठ्यपुस्तकों में ह्वेनसांग और उनकी भारत यात्रा के बारे में पूरा एक अध्याय था. कुछ विद्वान् यह भी मानते हैं कि श्री सिंह ने हु जिंताओ के उस अनुरोध को ठुकरा दिया जिसमें उन्हें चीन की नागरिकता….(आगे का पन्ना गायब है)

साल के मध्य में एक ऐसी घटना घटी, जिसने हजारों साल की हिंदू संस्कृति की मान्यताओं पर एक प्रश्नचिन्ह लगा दिया. मई महीने में प्रसिद्ध 'चिप्पीकार' और विचारक श्री अभय तिवारी के 'हम सब गंगू हैं' शीर्षक से प्रकाशित निबंध ने सालों से प्रतिष्ठित सांस्कृतिक मान्यताओं पर नए सिरे से बहस का दरवाजा खोल दिया. इस निबंध ने न केवल सांस्कृतिक बल्कि संवैधानिक संकट भी पैदा कर दिया. उनके निबंध को साल २००८ से एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकों में शामिल करने को लेकर बवाल खडा हो गया. तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री श्री अर्जुन सिंह जहाँ इस निबंध को पाठ्यपुस्तकों में शामिल करने के पक्ष में थे, वहीँ हिंदू वादी संगठनों ने इसका जमकर विरोध किया. इन संगठनों का मानना था कि इस निबंध के निष्कर्ष को मान्यता देने से पूरे हिंदू समाज पर घोर संकट आ जायेगा. इन संगठनों ने एक श्वेतपत्र जारी करते हुए बताया; 'कल्पना कीजिये कि ऐसे निबंध को मान्यता देने का नतीजा क्या होगा. हमारे द्वारा दिया गया नारा; 'गर्व से कहो हम हिंदू हैं' का मतलब पूरी तरह से बदल जायेगा. कुछ संस्थान, जैसे 'विश्व हिंदू परिषद्' और उनके द्वारा किए गए सम्मेलनों को लोग मजाक की दृष्टि से देखेंगे. अगर ऐसा होता है तो बनारस हिंदू युनिवर्सिटी का नाम बदलकर क्या रखा जायेगा'. इस निबंध को लेकर विवाद इतना बढ़ गया कि श्री अभय तिवारी के निवास स्थान पर कई दिनों तक इन संगठनों ने प्रदर्शन किया. इन हिंदू धार्मिक संगठनों के साथ साथ अखिल भारतीय मुहावरा बचाओ समिति ने भी इस निबंध से निकलने वाले आशय का विरोध किया. समिति का कहना था कि अगर ऐसा हुआ तो 'कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली' नामक मुहावरे पर संकट आ जायेगा और मुहावरा इतिहास से मिट जायेगा. जहाँ सरकार को बाहर से समर्थन वाले वामपंथी इस निबंध को पाठ्यपुस्तकों में रखने के पक्ष में थे, वहीँ धार्मिक संगठनो…..(आगे का पन्ना गायब है)

आगे भी जारी है....

Thursday, September 6, 2007

हिंदी ब्लागिंग का इतिहास (साल २००७)- भाग १





(सं)वैधानिक अपील: ब्लॉगर मित्रों से अनुरोध है कि इस अगड़म-बगडम पोस्ट को केवल मनोरंजन की दृष्टि से देखें।
स्कूल में मास्टर जी ने बताया था; 'जब कोई बात पुरानी हो जाती है तो इतिहास का हिस्सा बन जाती है।' कुछ महीने पहले तक जब भी उनकी बात याद आती थी, तब ये सोचकर मन मार लेते थे कि; 'अपन नेता नहीं बन सके. घर से भागकर बंबई भी नहीं जा सके, सो अभिनेता बनने का चांस भी पहले ही गँवा बैठे हैं. इसलिए इतिहास का हिस्सा तो बनने से रहे.' मास्टर जी की इस 'सूचना' का मेरे लिए कोई ख़ास महत्व नहीं था.

लेकिन जब से ब्लॉग समाज की सदस्यता ली है, ऐसे विचार मन में नहीं आते. अब तो हाल ये है कि सड़क पर चलते-चलते अगर कोई पीछे से आवाज दे देता है तो पहली बात जो दिमाग में आती है वो है; 'शायद आटोग्राफ लेने के लिए बुलाया है इसने'. अब तो दिन में कई बार बैठे-बैठे गुनगुना लेता हूँ; 'साला मैं तो ब्लागर बन गया…!' हाल ये है कि अब ये सोचकर निश्चिंत हो जाता हूँ कि जब भी हिन्दी ब्लागिंग का इतिहास लिखा जायेगा, अपने ऊपर भी चार लाईन का ही सही, एक पैराग्राफ जरूर लिखा जायेगा. और क्या पता, आगे चलकर अगर सरकार का दिमाग फिर जाए, तो एक ताम्रपत्र के साथ-साथ कुछ ब्लॉगर पेंशन का इंतजाम भी हो सकता है.

मेरी सोच का आधार ये है कि हिन्दी ब्लागिंग का भी अपना इतिहास होगा। कहते हैं पूत के पाँव पालने में दिखाई देते हैं. ब्लॉग समाज के सदस्य कितनी सारी बातों पर बहस करते हैं. कभी-कभी झगडा भी कर लेते हैं. ब्लॉग पोस्ट हो या फिर उसपर टिप्पणी, हिन्दी साहित्य का इतिहास हो या फिर हिन्दी भाषा, अमेरिका की खिलाफत हो या साम्प्रदायिकता और नरेन्द्र मोदी पर बहस, लगभग सारे मुद्दों पर बहस और झगडा करते हुए हम हिन्दी ब्लागिंग का समाजशास्त्र लिख रहे हैं. जिसे हम आज समाजशास्त्र मानकर चल रहे हैं, आगे चलकर इतिहास में परिवर्तित हो जायेगा. हम सभी भावी इतिहास का हिस्सा बन रहे हैं. मैं कभी-कभी सोचता हूँ कि अगर सन २०७० में हिन्दी ब्लागिंग का इतिहास नामक पुस्तक किसी को मिले तो उसमें क्या लिखा होगा? मेरा मानना है कि किताब में साल के आधार पर इतिहास लिखा होगा. अब तकनीकी दृष्टि से अति विकसित समय में किताब की हालत का अंदाजा लगाया जा सकता है. ऐसी किताब के पन्ने बीच-बीच से गायब मिलेंगे. उसमें सन २००७ का वर्णन शायद कुछ ऐसा हो:

'साल २००७ हिन्दी चिट्ठाकारिता का स्वर्णसाल था। इस साल हिन्दी चिट्ठों और चिट्ठाकारों की बाढ़ सी आ गई. तरह तरह के विचारों और मुद्दों पर चिट्ठे लिखे गए. साम्यवाद से लेकर शेयर बजार, वेदों पर चर्चा से लेकर गजलों पर चर्चा, कुछ भी बचा नहीं रहा. चिट्ठों की इस बाढ़ ने फीड एग्रीगेटर को पूरे साल परेशान रखा. जहाँ पर चिट्ठे नहीं परेशान कर सके, वहाँ परेशान करने का काम चिट्ठाकारों ने किया. चिट्ठों में आई बाढ़ ने विचारों का बाँध खोल दिया. …॥(आगे का पन्ना गायब है)

साल २००७ के अगस्त महीने तक चिट्ठों की संख्या में बढोतरी सामान्य रही। सितंबर महीने के मध्य से चिट्ठों की संख्या में अभूतपूर्व बढोतरी देखी गई. इस तरह की असामान्य बढोतरी को लेकर इतिहासकारों में अलग-अलग मत हैं. कुछ का मानना है कि ऐसी बढोतरी उन लोगों की वजह से हुई जो अगस्त महीने तक केवल इसलिए चिटठा नहीं लिख पाते थे क्योंकि वे अपना पूरा समय भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति ए पी जे अब्दुल कलाम को मेल लिखने और सवाल पूछने में बिताते थे. ए पी जे अब्दुल कलाम के राष्ट्रपति पद छोडने के बाद ऐसे लोगों के सामने समस्या उत्पन्न हुई कि अब ये क्या करें. काफ़ी सोच विचार के बाद और 'समय बिताने के लिए करना है कुछ काम' पर अमल करते हुए इन लोगों ने अपना हिन्दी चिट्ठा लिखना शुरू किया.

इस वर्ष में हिन्दी ब्लॉगर असुरक्षा की भावना से भी ग्रस्त रहे। अकेले पड़ जाने के अहसास को मिटाने के लिये जबरदस्त नेटवर्किंग की गयी. पत्रकार लोगों ने पत्रकारों को, शिक्षकों ने शिक्षकों को, अपने पड़ोसियों, बच्चों को .... जो जिसके करीब का मिला, उसे हिन्दी बॉगरी में लुभा कर उनसे ब्लॉग बनवाया. एक ने पांच, पांच ने पच्चीस का आंकड़ा बनवाया ब्लॉगरी में जोड़ने का. यह प्रक्रिया वर्ष के प्रारम्भ में शुरू हुयी थी पर अपने पूरे यौवन पर सितम्बर मास में आ पायी.

चिट्ठों में आई असामान्य बढोतरी का सबसे बड़ा असर चिट्ठों की पोस्ट पर टिपण्णी की कमी के रूप में सामने आया। चिट्ठाकार इस बात से दुखी रहने लगे कि उनकी प्रति पोस्ट पर टिप्पणियों की संख्या घटकर औसतन क़रीब 1.०८ रह गई. चिट्ठाकारों का दुःख तब और बढ़ गया जब एक ब्लॉग समाजशास्त्री ने अपने अध्ययन के आधार पर ये रिपोर्ट निकाली कि; 'आनेवाले साल में टिप्पणियो की संख्या घटकर औसतन 0.७६ रह जायेगी'. चिट्ठाकारों की इस चिन्ता का समाधान खोजा उस समय के मूर्धन्य चिट्ठाकार और अपनी टिप्पणियों के लिए लोकप्रिय, कनाडा में रहने वाले अप्रवासी भारतीय श्री समीर लाल ने. समीर लाल जी ने गूगल के साथ मिलकर जबलपुर में टिप्पणीकार बनाने के लिए एक संस्थान कि स्थापना की. इस संस्थान से पहले ही वर्ष क़रीब तीन हजार फुल-टाइम टिप्पणीकारों को स्नातक का प्रमाणपत्र मिला. कालांतर में इस संस्थान की नौ साखायें भारत और विदेशों में स्थापित हुईं. साल २०११ में संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस संस्थान को साहित्य और वैश्वीकरण में योगदान के लिए पुरस्कृत किया.

साल २००७ को इतिहास में चिट्ठाकारों के सम्मेलन के लिए याद रखा जायेगा. इस साल देश के कई शहरों में ब्लॉगर मीट का आयोजन किया गया. दिल्ली, कानपुर, इलाहाबाद और आगरा जैसे शहरों में आयोजित चिट्ठाकार सम्मेलन काफ़ी चर्चा में रहे. इस तरह के सम्मेलनो में चिट्ठाकारों की संख्या को लेकर भी काफ़ी चर्चा हुई. सबसे ज्यादा पब्लिसिटी उन सम्मेलनों को मिली जिनमें केवल दो चिट्ठाकार रहते थे. कुछ सम्मेलनों में 'डिजिटल कैमरे' की अनुपलब्धता ने मज़ा किरकिरा किया. कालांतर में गूगल ने चिट्ठाकारों के ऐसे सम्मेलनों को अपने फोटोग्राफ़र भेजकर कवर कराया. उस समय सभी चिट्ठाकारों ने गूगल की इस पहल की सराहना की. लेकिन गूगल की ये पहल पूरे तौर पर 'मुनाफिक' (मुनाफा कमाने के लिए) थी, इस बात का खुलासा तब हुआ जब सन २०३३ में गूगल ने ऐसे सम्मेलनों में ली गई तस्वीरों को क्रिस्टीज की एक नीलामी के दौरान ६० लाख डालर में बेंच दिया. भारत के लिए गर्व की बात ये थी कि इन तस्वीरों को विजय माल्या के पुत्र ने खरीद लिया...(आगे का पन्ना गायब है)
(....... भाग २ में जारी रहेगा.)