इस्लामाबाद १९ जुलाई
इस्लामाबाद से कासिफ अब्बासी
आज अंडरअचीवर वार ने एक नया मोड़ ले लिया. सूत्रों के मुताबिक़ पाकिस्तान के सदर जनाब आसिफ अली ज़रदारी इस बात से नाराज़ हो गए हैं कि दुनियाँ की किसी मैगेजीन ने उन्हें अंडरअचीवर नहीं कहा. आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि पहले अमेरिकी मैगेजीन टाइम ने इंडिया के वजीर-ए-आज़म जनाब मनमोहन सिंह को अंडरअचीवर करार दिया था जिसका जवाब एक इंडियन मैगेजीन आऊटलुक ने अमेरिकी सदर बराक ओबामा को अंडरअचीवर कहकर दिया. ऐसे में अनुमान लगाया जा रहा है कि जल्द ही दुनियाँ के तमाम मुल्क की मैगजीन एक-दूसरे के सदर और वजीर-ए-आज़म को अंडरअचीवर कहकर पूरी दुनियाँ के लीडरान को अंडरअचीवर करार दे देंगी.
दुनियाँ भर के दानिशमंद और तर्जियानिगार ऐसा मानते हैं कि एक बार ऐसा हो जाने से पूरी दुनियाँ एक नई शुरुआत कर सकेगी.
उधर कुछ पाकिस्तानी इदारों और हलकों में यह बात भी की जा रही है कि जब अमेरिका ने नाटो सप्लाई को बहाल करने के लिए पाकिस्तान से कहा तब सदर जरदारी ने अमेरिका के समाने रखी तमाम शर्तों में एक शर्त यह भी रखी थी कि नाटो सप्लाई के एवज में अमेरिका पाकिस्तान को रुपया-पैसा वगैरह देगा ही, साथ ही अमेरिकी मैगेजीन टाइम सदर जरदारी को अपने फ्रंट-कवर पर रखेगी. जब टाइम ने इस बात के लिए यह कहते हुए मना कर दिया कि सदर ज़रदारी को वह फ्रंट-पेज पर नहीं रख सकती क्योंकि वे तमाम मुद्दों पर फेल रहे हैं तब प्रेसिडेंट ओबामा ने टाइम मैगेजीन को यह कहते राजी कर लिया था कि मैगेजीन चाहे तो उन्हें फ्रंट-कवर पर रखने के लिए अंडरअचीवर करार दे सकती है.
दोनों मुल्कों के सदर और मैगेजीन के बीच यह फैसला यह हुआ था कि जुलाई महीने के एक एडिशन में सदर जरदारी को फीचर किया जाएगा लेकिन नाटो सप्लाई खुलने के बाद अमेरिकी मैगेजीन अपने वादे से मुकर गई और इंडिया के वजीर-ए-आजम जनाब मनमोहन सिंह को अंडरअचीवर बताते हुए उन्हें अपने फ्रंट-कवर पर रख दिया. टाइम मैगेजीन के एक तर्जियानिगार ने अपना नाम न लिए जाने की शर्त पर यह खुलासा किया है कि मैगेजीन को हमेशा से यह लगता था कि इंडिया के वजीर-ए-आजम जनाब मनमोहन सिंह का अंडर-अचीवमेंट पाकिस्तानी सदर ज़रदारी से बड़ा है लिहाजा मैगेजीन ने अपने फ्रंट-कवर पर उन्हें मौका दिया.
इधर इस्लामाबाद में ऐसी बातें भी की जा रही हैं कि अब अंडरअचीवर टैग पाने के लिए अब सदर जरदारी ने अफगानिस्तानी सदर जनाब हामिद करजई से अपील की है. सदर ज़रदारी चाहते हैं कि अफगानी सदर जनाब हामिद करजई काबुल से निकलेवाले न्यूजपेपर अनीस डेली से कहकर उन्हें अंडरअचीवर का टैग दिला दें. कुछ दिफाई तर्जियानिगारों का यह भी मानना है कि पाकिस्तानी सदर ने आई एस आई को हिदायत दी है कि वह तालिबानी लीडरान से डायरेक्ट बात करके यह काम करवा दे. पाकिस्तानी सदर यह भी चाहते थे कि अमेरिकी वजीर मोहतरमा हिलेरी क्लिंटन भी इस काम में अपनी टांग अड़ा दें तो काम जल्दी हो जाने की उम्मीद रहेगी. अमेरिका की तरफ से फिलहाल यह आईडिया ड्रॉप कर दिया गया है क्योंकि मोहतरमा हिलेरी क्लिंटन को यह समझ नहीं आ रहा था कि अनीस डेली पर सदर ज़रदारी को फीचर करने के लिए उन्हें गुड तालिबान से बात करने की ज़रुरत है या बैड तालिबान से.
उधर दुनियाँ भर में आइडेंटिटी क्राइसिस के मारे तमाम लीडरान चाहते हैं कि उन्हें किसी न किसी मैगेजीन के कवर-पेज पर अंडरअचीवर करार देते हुए रखा जाय ताकि उन्हें आइडेंटीटी क्राइसिस के इस रोग से निजात मिले. हाल यह है कि चीन में आई हल्की सी इकॉनोमिक क्राइसिस के चलते वहाँ के प्रेसिडेंट हू जिंताओ तक यह चाहते हैं कि मेड इन चायना वाली टाइम पत्रिका अपने एक एडिशन में उन्हें अंडरअचीवर करार दे ताकि चीन की सरकार इकॉनोमी की फील्ड में अपने अचीवमेंट के नए-नए आंकड़ों में हेर-फेर करके पूरी दुनियाँ के सामने रखें और चाइनीज गवर्नमेंट खुद को ग्रेट बता सके. सरकार का ऐसा मानना है कि ऐसा करने से चायना की जनता में एक नया जोश आएगा, वह दिन में बाईस घंटे काम करेगी और और इकॉनोमिक क्राइसिस खत्म हो जायेगी.
आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि टाइम पत्रिका की एक डुप्लीकेट मैन्युफैक्चरिंग यूनिट चीन की एक कंपनी ने शंघाई में खोल रखी है.
उधर ब्रिटेन में रह रहे साबिर पाकिस्तानी सदर और जनरल जनाब परवेज़ मुशर्रफ ने भी अंडरअचीवर बनने की कवायद शुरू कर दी है. पिछले कई सालों से पाकिस्तानी मीडिया में उनको लेकर कोई बात नहीं होती लिहाज़ा मुशर्रफ चाहते हैं कि उनका नाम भी न लेनेवाले अगर उन्हें अंडरअचीवर कह के भी याद कर लें गे तो आनेवाले इलेक्शंस में कुछ लोगों को उनके बारे में पता चल जाएगा और उनकी पार्टी को कुछ वोट मिल जायेंगे.
हमारे इंडियन व्यूरो से यह खबर भी मिली है कि इंडिया के पेज-थ्री इंडसट्रीएलिस्ट और आईपीएल टीम रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर के मालिक जनाब विजय माल्या भी चाहते हैं कि उन्हें अंडरअचीवर करार दे दिया जाय ताकि उन्हें इंडिया की गवर्नमेंट से कुछ स्पेशल पॅकेज मिल जाए. वहीँ दूसरी तरफ एक्सपर्ट्स और तर्जियानिगारों का मानना है कि इंडिया की सिविल एवियेशन मिनिस्ट्री के डायरेक्टर जनरल सिविल एवियेशन जनाब भारत भूषण को हटाने में विजय माल्या का हाथ है लिहाजा उन्हें अंडरअचीवर बताना नामुमकिन होगा.
दूसरी तरफ एक्सपर्ट्स का मानना है कि इंडिया और अमेरिका के बीच पोलिटिक्स में शुरू हुई यह अंडरअचीवर जंग को आनेवाले समय में एक नया मोड़ मिल सकता है. ऐसे एक्सपर्ट्स यह मानते हैं कि लन्दन ओलिम्पिक्स में अगर अमेरिका को एथेलेटिक्स इवेंट्स में पचास से कम गोल्ड मेडल्स मिले तो इंडिया की कई मैगेजिंस अमेरिकी एथलीटों को अंडरअचीवर बतायेंगी. दूसरी तरफ अमेरिकी मैगेजिंस और न्यूजपेपर्स की निगाह श्रीलंका में इंडिया की क्रिकेट टीम के ऊपर भी रहेंगी ताकि आनेवाली श्रीलंकाई सीरीज और टी-ट्वेंटी वर्ल्ड कप में अगर इंडिया की टीम अच्छा न कर पाए तो टीम और उसके तमाम खिलाड़ियों को अंडरअचीवर बताया जा सके. पकिस्तान के साबिर कप्तान जनाब आसिफ इकबाल का मानना है कि अमेरिकी मैगेजिंस की निगाहें इंडिया के आलराऊंडर रवींद्र जडेजा और उनके मेंटोर कप्तान महेंद्र सिंह धोनी पर होंगी.
आनेवाले समय में हमारी निगाह इस अंडर अचीवर जंग पर रहेगी. जल्द ही इसपर एक और कॉलम लेकर हाज़िर होऊंगा.
नोट: कल रात को उड़ती खबर सुनाई दी है कि फेमस हॉलीवुड डायरेक्टर जनाब जेम्स कैमरोन ने अपनी नई मूवी पर काम शुरू कर दिया है. मूवी का नाम है लीग ऑफ एक्स्ट्राऑर्डिनरी अंडरअचीवर्स.
Friday, July 20, 2012
अंडरअचीवर बनने की जंग
Wednesday, June 20, 2012
राष्ट्रपति चुनाव बमचक - एक ट्विटर टाइम-लाइन.
शायद कुछ ऐसी:
Thursday, October 6, 2011
यहाँ का रावण इतना छोटा है कि इसे तो शत्रुघ्न ही मार लेंगे...
आज विजयदशमी है. सुनते हैं भगवान राम ने आज ही के दिन (ग़लत अर्थ न निकालें. आज ही के दिन का मतलब ९ अक्टूबर नहीं बल्कि दशमी) रावण का वध किया था. अपनी-अपनी सोच है. कुछ लोग कहते हैं आज विजयदशमी इसलिए मनाई जाती है कि भगवान राम आज विजयी हुए थे. कुछ लोग ये भी कहते हुए मिल सकते हैं कि आज रावण जी की पुण्यतिथि है. आँखों का फरक है जी.
हाँ तो बात हो रही थी कि आज विजयदशमी है और आज ही के दिन राम ने रावण का वध कर दिया था. आज ही के दिन क्यों किया? इसका जवाब कुछ भी हो सकता है. ज्योतिषी कह सकते हैं कि उसका मरना आज के दिन ही लिखा था. यह तो विधि का विधान है. लेकिन शुकुल जी की बात मानें तो ये भी कह सकते हैं कि भगवान राम और उनकी सेना लड़ते-लड़ते बोर हो गई तो रावण का वध कर दिया.
आज एक विद्वान् से बात हो रही थी. बहुत खुश थे. बोले; "भगवान राम न होते तो रावण मरता ही नहीं. वीर थे राम जो रावण का वध कर पाये. अरे भाई कहा ही गया है कि जब-जब होई धरम की हानी...."
उन्हें देखकर लगा कि सच में बहुत खुश हैं. रावण से बहुत घृणा करते हैं. राम के लिए इनके मन में सिर्फ़ और सिर्फ़ आदर है. लेकिन उन्होंने मेरी धारणा को दूसरे ही पल उठाकर पटक दिया. बोले; "लेकिन देखा जाय तो एक तरह से धोखे से रावण का वध किया गया. नहीं? मेरे कहने का मतलब विभीषण ने बताया कि रावण की नाभि में अमृत है तब जाकर राम भी मार पाये. नहीं तो मुश्किल था. और फिर राम की वीरता तो तब मानता जब वे बिना सुग्रीव और हनुमान की मदद लिए लड़ते. देखा जाय तो सवाल तो राम के चरित्र पर भी उठाये जा सकते हैं."
उनकी बात सुनकर लगा कि किसी की प्रशंसा बिना मिलावट के हो ही नहीं सकती. राम की भी नहीं. यहाँ सबकुछ 'सब्जेक्ट टू' है.
शाम को घर लौटते समय आज कुछ नया ही देखने को मिला. इतने सालों से कलकत्ते में रहता हूँ लेकिन आज ही पता चला हमारे शहर में भी रावण जलाया जाता है. आज पहली बार देखा तो टैक्सी से उतर गया. बड़ी उत्सुकता थी देखने की. हर साल न्यूज़ चैनल पर दिल्ली के रावण को जलते देखते थे तो मन में यही बात आती थी; "हमारे शहर में रावण क्यों नहीं जलाया जाता. भारत के सारे शहरों में रावण जलाया जाता है लेकिन हमारे शहर में क्यों नहीं? कब जलाया जायेगा? "
दिल्ली वालों से जलन होती थी ऊपर से. सोचता था कि एक ये हैं जो हर साल रावण को जला लेते हैं और एक हम हैं कि पाँच साल में भी नहीं जला पाते.
लेकिन आज जो कुछ देखा, मेरे लिए सुखद आश्चर्य था. खैर, टैक्सी से उतर कर मैदान की भीड़ का हिस्सा हो लिया. बड़ी उत्तम व्यवस्था थी. भीड़ थी, मंच था, राम थे, रावण था और पुलिस थी. हर उत्तम व्यवस्था में पुलिस का रहना ज़रूरी है. अपने देश में जनता को आजतक उत्तम व्यवस्था करते नहीं देखा.
जनता सामने खड़ी थी. जनता की तरफ़ राम थे और मंच, जहाँ कुछ नेता टाइप लोग बैठे थे, उस तरफ़ रावण था. मंच के चारों और पुलिस वाले तैनात थे. देखकर लग रहा था जैसे सारे के सारे रावण के बॉडी गार्ड हैं.
मैं भीड़ में खड़ा रावण के पुतले को देख रहा था. मन ही मन भगवान राम को प्रणाम भी किया. रावण को देखते-देखते मेरे मुंह से निकल आया; "रावण छोटा है."
मेरा इतना कहना था कि मेरे पास खड़े एक बुजुर्ग बोले; "ठीक कह रहे हैं आप. रावण छोटा है ही. इतना छोटा रावण भी होता है कहीं?"
मैंने कहा; "मुझे भी यही लगा. जब वध करना ही है तो बड़ा बनाते."
वे बोले; "अब आपको क्या बताऊँ? मैं तेरह साल दिल्ली में रहा हूँ. रावण तो दिल्ली के होते हैं. या बड़े-बड़े. कम से कम चालीस फीट के. हर साल देखकर लगता था कि इस साल का रावण पिछले साल के रावण से बड़ा है."
मैंने कहा; "दिल्ली की बात ही कुछ और है. वहां का रावण तो बहुत फेमस है. टीवी पर देखा है."
मेरी बात सुनकर उन्होंने अपने अनुभव बताने शुरू किए. बोले; "अब देखिये दिल्ली में बहुत पैसा है. वहां रावण के ऊपर बहुत पैसा खर्च होता है. और फिर वहां रावण का साइज़ बहुत सारा फैक्टर पर डिपेंड करता है."
उनकी बातें और अनुभव सुनकर मुझे अच्छा लगा. भाई कोई दिल्ली में रहा हुआ मिल जाए तो दिल्ली की बातें सुनने में अच्छा लगता है. मैंने उनसे कहा; "जैसे? किन-किन फैक्टर पर डिपेंड करता है रावण का साइज़?"
मेरा सवाल सुनकर वे खुश हो गए. शायद अकेले ही थे. कोई साथ नहीं आया था. लिहाजा उन्हें भी किसी आदमी की तलाश होगी जिसके साथ वे बात कर सकें.
'दो अकेले' मिल जाएँ, बस. दुनियाँ का कोई मसला नहीं बचेगा. मेरा सवाल सुनकर उनके चेहरे पर ऐसे भाव आए जिन्हें देखकर लगा कि बस कहने ही वाले हैं; "गुड क्वेश्चन."
लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा बल्कि बड़े उत्साह के साथ बोले; "बहुत सारे फैक्टर हैं. देखिये वहां तो रावण का साइज़ नेता के ऊपर भी डिपेंड करता है. समारोह में जितना बड़ा नेता, रावण का कद भी उसी हिसाब से बड़ा समझिये. अब देखिये कि जिस समारोह में प्रधानमन्त्री जाते हैं, उसके रावण के क्या कहने! या बड़ा सा रावण. चालीस-पचास फीट का रावण. उसके जलने में गजब मज़ा आता है. कुल मिलाकर मैंने बारह रावण देखे हैं जलते हुए. बाजपेई जी के राज में भी रावण बड़ा ही रहता था."
मैंने कहा; "सच कह रहे हैं. वैसे दिल्ली में पैसा भी तो खूब है. यहाँ तो सारा पैसा दुर्गापूजा में लग जाता है. ऐसे में रावण को जलाने में ज्यादा पैसा खर्च नहीं कर पाते."
मेरी बात सुनकर बोले; "देखिये, बात केवल पैसे की नहीं है. दिल्ली में बड़े-बड़े रावण केवल पैसे से नहीं बनते. रावण बनाने के लिए पैसे से ज्यादा महत्वपूर्ण है डेडिकेशन. कम पैसे खर्च करके भी बड़े रावण बनाये जा सकते हैं. सबकुछ डिपेंड करता है बनानेवालों के उत्साह पर. और इस रावण को देखिये. देखकर लगता है जैसे इसे मारने के लिए राम की भी ज़रूरत नहीं है. इसे तो शत्रुघ्न ही मार लेंगे."
मैंने कहा; "हाँ, वही तो मैं भी सोच रहा था. सचमुच काफी छोटा रावण है."
मेरी बात सुनकर बोले; "लेकिन देखा जाय तो अभी यहाँ नया-नया शुरू हुआ है. जैसे-जैसे फोकस बढ़ेगा, यहाँ का रावण भी बड़ा होगा..."
अभी वे अपनी बात पूरी करने ही वाले थे कि राम ने अग्निवाण दाग दिया. वाण सीधा रावण के दिल पर जाकर लगा. रावण जलने लगा.
चलिए हमारे शहर में भी रावण जलने लगा. अगले साल फिर जलेगा. फिर विजयदशमी आएगी....... और रावण की पुण्यतिथि भी.
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नोट: पुरानी पोस्ट है. साल २००८ की.
Friday, August 12, 2011
पंद्रह अगस्त की तैयारी
पंद्रह अगस्त लगभग आ गया है. लगभग इसलिए कि अभी चार दिन बाकी हैं. कई देशभक्त मोहल्लों में पंद्रह अगस्त मनाने का प्लान बन चुका है. थोड़े कम देशभक्त मोहल्लों में अभी भी बनाया जा रहा है. लाऊडस्पीकर पर कौन सा गाना पहले पायदान पर होगा और कौन सा तीसरे पर, यह फाइनल किया जाने लगा है. कितने लोग़ चिकेन बिरियानी खायेंगे और कितने मटन बिरियानी, इसकी लिस्ट बननी शुरू हो गई है. "पिछले पंद्रह अगस्त तक बीयर पीनेवाले छोटका को क्या इस बार ह्विस्की दे दी जाय?" जैसे सवालों के जवाब खोजने की कवायद शुरू हो चुकी है.
हमारे सूमू दा यह बात निश्चित कर रहे होंगे कि इस बार किससे ज्यादा चंदा लेना है? पासवाले मोहल्ले के झूनू दा, 'गरीबों' को कंबल बांटने के लिए चंदा इकठ्ठा कर रहे होंगे. इस कांफिडेंस के साथ कि; "बरसात में अगर गरीबों को कंबल न मिला तो वे बेचारे भीग जायेंगे..." उनके डिप्टी ब्लड डोनेशन कैम्प की तैयारी कर रहे होंगे. उनके दायें ब्लड डोनेशन के समय दिए जाने वाले बिस्कुट और केले के हिसाब में हेर-फेर का प्लान बना रहे होंगे.
सिनेमाई चैनल देशभक्ति से ओत-प्रोत फिल्मों का चुनाव कर रहे होंगे. पंद्रह अगस्त को सुबह नौ बजे वाले वाले स्लॉट में बोर्डर दिखाया जाय या क्रान्ति? न्यूज़ चैनल वाले नई पीढ़ी का टेस्ट लेने के लिए क्वेश्चन छांट रहे होंगे. "ये बताइए, कि गाँधी जी के चचा का क्या नाम था?" या फिर; "जवाहर लाल नेहरु की माता का क्या नाम था?" ऐसा सवाल जिसे सुनकर सामनेवाला ड्यूड ढाई मिनट तक कन्फ्यूजन की धारा मुखमंडल पर बहाने के बाद उल्टा सवाल करे; "माता मीन्स मॉम ना?" न्यूज़ चैनल के संवाददाता यह सोच रहे होंगे कि इस बार कौन से नेता को पकड़कर पूछें कि; "राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत में क्या फरक होता है?" या फिर " जन गण मन तो राष्ट्रगान है, ये बताइए राष्ट्रगीत क्या है?" या फिर; "अच्छा, पूरा राष्ट्रगान गाकर सुनाइये?"
उन्हें किसी ऐसे नेता की तलाश होगी जिससे अगर वे राष्ट्रगीत गाने को कहें तो वो फट से शुरू हो जाए; "ऐ मेरे वतन के लोगों ज़रा आँख में भर लो पानी...." या फिर; "मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे-मोती..."
ट्रैफिक सिग्नल पर जो रामनरेश कल तक भुट्टा और चेरी बेंचते थे, वही पिछले तीन-चार दिन से तिरंगा बेंच रहे हैं. स्वतंत्रता दिवस मौसमी धंधा जो ठहरा. पूरे साल भर टैक्स चोरी का प्लान बनानेवाले अचानक देशभक्ति काल में चले गए हैं और रामनरेश जी से तिरंगा खरीदकर अपनी कार में इस तरह से रख लिया है जिससे आयकर भवन के सामने से गुजरें तो लोग़ उनकी कार में रखा देशभक्ति-द्योतक तिरंगा देख पाएं. कल-परसों से ही मोहल्ले में बजने वाले गाने ....कैरेक्टर ढीला है की जगह मेरे देश की धरती सोना उगले नामक गाना ले लेगा.
कुल मिलाकर मस्त महौल में जीने दे टाइप वातावरण बन चुका है लेकिन पता नहीं क्यों मुझे कुछ मिसिंग लग रहा है. पता नहीं क्यों लगता है जैसे पहले की ह़र बात अच्छी थी और अब चूंकि ज़माना खराब हो गया है लिहाजा वही बातें बुरी हो गई हैं. वैसे ही पहले का पंद्रह अगस्त अच्छा था और ज़माना खराब हो गया है तो अब पहले जैसा नहीं रहा.
याद कीजिये १०-१२ साल पहले का पंद्रह अगस्त. हर पंद्रह अगस्त के शुभ अवसर पर कार्यकुशल सरकारी पुलिस आतंक फैलाने का प्लान बनाते हुए आतंकवादियों को पकड़ लेती थी. दूरदर्शन हमें बताता था कि; "आज शाम पुरानी दिल्ली के फलाने इलाके से पुलिस ने तीन पाकिस्तानी आतंकवादियों को गिरफ्तार कर लिया. ये आतंकवादी स्वतंत्रता दिवस पर आतंक फैलाने का प्लान बनाकर भारत आये थे." उधर दूरदर्शन हमें यह खबर देता और इधर हम प्रसन्न हो जाते. यह सोचते हुए कि; "चलो अब देश के ऊपर कोई खतरा नहीं रहा. अब पेट भरकर पंद्रह अगस्त मनाएंगे."
अब दिल्ली में पाकिस्तानी आतंकवादी गिरफ्तार नहीं होते. इसका कारण यह भी हो सकता है कि पहले आतंक के दो मौसम होते थे, एक पंद्रह अगस्त और एक छब्बीस जनवरी और अब तो हर मौसम आतंक का है. ऐसे में आतंकवादी 'जी' लोग़ जब चाहें पंद्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी मना ले रहे हैं.
वैसे दिल्ली में तैयारियां जोरों पर होंगी. धोबी शेरवानियाँ धोने में व्यस्त होंगे. ट्रैफिक पुलिस वाले खोलने और बंद करने के लिए रास्तों का चुनाव कर रहे होंगे. प्रधानमंत्री का भाषण लिखने वाले यह सोचकर परेशान हो रहे होंगे कि भाषण में किसान, दलित, पीड़ित, ईमानदारी, चिंता, भ्रष्टाचार, अच्छे सम्बन्ध, जीडीपी, विकास दर, मज़बूत सरकार जैसे शब्द कहाँ-कहाँ फिट किये जायें जिससे भाषण को मैक्सिमम स्ट्रेंथ मिले और भाषण खूब मज़बूत बनकर उभरे. ईमानदारी के प्रदर्शन से फुरसत मिलती होगी तो प्रधानमंत्री जी सलामी लेने की भी प्रैक्टिस कर रहे होंगे. रोज रात को साढ़े आठ से नौ के बीच. उनके लिए चूंकि हिंदी एक कठिन भाषा है तो वे भाषण पढ़कर कम गलतियाँ करने की कोशिश कर रहे होंगे.
पिछले तमाम भाषणों को सुनने के बाद मेरे मन में आया कि भाषण के बारे में प्रधानमंत्री और उनके निजी सचिव के बीच शायद कुछ इस तरह की बात होती होगी;
-- सर, एक बात पूछनी थी आपसे?
-- हाँ हाँ, पूछिए न.
-- सर, वो ये पूछ रहा था कि इस बार लाल किले पर आप पहले किसानों की समस्याओं पर चिंता प्रकट करेंगे या अल्प-संख्यकों की?
-- जैसा आप कहें. वैसे मुझे लगता है कि पहले अल्पसंख्यकों की समस्याओं पर चिंता प्रकट करना ठीक रहेगा.
-- जी सर. मैं भी यही सोच रहा था. वैसे भी एक बार आपने कहा था कि देश के संसाधनों पर पहला हक अल्पसंख्यकों का है ऐसे में..
-- हाँ, अच्छा याद दिलाया आपने. पहले उनकी समस्याओं पर चिंता प्रकट करूँगा तो लोगों को लगेगा कि मैं ऐसा प्रधानमंत्री हूँ "हू वाक्स द टाक."
-- और सर, किसानों की समस्याओं पर चिंता के अलावा और क्या प्रकट करना चाहेंगे आप?
-- और क्या प्रकट किया जा सकता है वो तो आप बतायेंगे? मुझे लगता है कि चिंता करने के अलावा अगर उन्हें विश्वास दिला दें तो ठीक रहेगा. नहीं?
-- बिलकुल ठीक सोचा है सर आपने. उन्हें लोन दिला ही चुके हैं. लोन माफी दिला ही दिया. नरेगा में रोजगार दिला ही दिया. सब्सिडी देते ही हैं. सबकुछ ठीक रहा तो अब कैश भी देने लगेंगे. कहीं-कहीं उन्हें गोली भी मिल चुकी है. ज़मीन के बदले में मुवावजा दिला ही देते हैं. इनसब के अलावा और बचता ही क्या है? सबकुछ तो दिला चुके. अब तो केवल विश्वास दिलाना बाकी है.
-- बिलकुल सही कह रहे हैं. जब तक विश्वास न दिलाया जाय, इनसब चीजों को दिलाने का कोई महत्व नहीं है.
-- और सर, पड़ोसी देशों से अच्छे सम्बन्ध कायम करने की बात आप कितनी बार करना चाहेंगे? तीन बार से काम चल जाएगा?
-- मुझे लगता है उसे बढ़ाकर चार कर दीजिये. वो ठीक रहेगा. हाँ, एक बात बतानी थी आपको. अभी तक जो भाषण मैंने पढ़ा है, उसमें भ्रष्टाचार के बारे में केवल आठ बार चिंतित होने का मौका मिल रहा है. मुझे लगता है उसे बढ़ाकर ग्यारह कर दिया जाय तो ठीक रहेगा.
-- अरे सर, मैं तो बारह करने वाला था. बाद में याद आया कि पाँच कैबिनेट मिनिस्टर पिछले सात दिन में कुल मिलाकर तेईस बार चिंता व्यक्त कर चुके हैं ऐसे में आप आठ बार ही व्यक्त करें नहीं तो बड़ा बोरिंग लगेगा.
-- कोई बात नहीं. चिंता करने की बात पर मुझे अपने मंत्रियों पर बहुत गर्व है. हाँ, ये बात कम से काम चार बार लिखवाईयेगा कि सरकार भ्रष्टाचार मिटाने के लिए कटिबद्ध है.
-- वो तो मैंने चार बार लिखवा दिया है सर. साथ ही मैंने इस बात पर जोर दिलवा दिया है कि सरकार का लोकपाल बिल सब बिलों से अच्छा है और उसके माध्यम से देश को एक मज़बूत लोकपाल मिलेगा.
-- ये आपने सही किया. अच्छा पूरे भाषण में मंहगाई पर कितनी बार चिंतित होना है?
-- यही कोई सात बार सर. वैसे सर, मंहगाई पर केवल चिंतित होना है या और कुछ भी होना चाहते हैं आप?
-- अरे मंहगाई को कंट्रोल में लाना चाहते हैं हम. एक काम कीजिये. ये जो कंट्रोल में लाने वाली बात है, उसे आप पिछले तीन भाषणों से कॉपी कर सकते हैं. अगर कॉपी करेंगे तो फिर अलग से मेहनत नहीं करनी पड़ेगी.
-- हे हे हे ..सर उसके लिए तो आपको याद दिलाने की ज़रुरत बिलकुल नहीं है. वो तो मैंने साल दो हज़ार आठ के भाषण से ही कॉपी किया है. और सर, दो हज़ार नौ और दस में भी दो हज़ार आठ के भाषण से कॉपी किया था. सबसे बढ़िया बात यह है सर कि ऐसा करने से हमारी उस फिलास्फी का पालन भी हो जाता है जिसके अनुसार हम पिछले रिकॉर्ड देखकर काम करते हैं.
-- यह बहुत ज़रूरी है कि हम अपने पुराने रास्तों को न भूलें. वैसे एक बात मत भूलियेगा. हम डबल डिजिट में ग्रो कर सकते हैं, यह बात आप चार-पाँच जगह डलवा दीजियेगा.
-- हें हें हें..सर, ये भी कोई कहने की बात है? सर, एट प्वाइंट फाइव का जीडीपी और डबल डिजिट में ग्रो करने की बात आपको याद दिलानी नहीं पड़ेगी सर.
-- गुड गुड.
-- सर, साम्प्रदायिकता के बारे में आप उतना ही चिंतित होना चाहते हैं जितना पिछले तीन साल से चिंतित हैं या इसबार थोड़ा और चिंतित हों चाहेंगे?
-- गुड क्वेश्चन...देखिये मुझे लगता है कि इस बार थोड़ा और चिंतित होने की ज़रुरत है. इतने सारे स्कैम फैले हुए हैं ऐसे में सैफ्रोन टेरर की बात हो जाए तो थोड़ा बैलेंस बन जाएगा.
-- बाकी तो लगभग पूछ ही लिया सर. एक बात ये पूछनी थी कि भ्रष्टाचार पर कार्यवाई करने की बात पर भाषण में सरकार की पीठ कितनी बार ठोंकी जाए?
-- अरे, सरकार भी अपनी है और पीठ भी अपनी. जितनी बार चाहें ठोंक लीजिये. इतने सालों तक भाषण लिखवाने के बाद ये सवाल तो नहीं पूछना चाहिए आपको...
-- सॉरी सर...
-- कोई बात नहीं. आप आगे का भाषण लिखवाइए. बाकी जो पूछना होगा वह सब कल पूछ लीजियेगा. अब मेरा ईमानदारी आसन में बैठने का समय हो गया है. मैं आधा घंटा ईमानदारी आसन में बैठकर ईमानदार होने की प्रैक्टिस करूँगा. कल फिर मिलते हैं.
Wednesday, May 11, 2011
समय का अभाव है.....
इस वर्ष हम श्री रबीन्द्रनाथ टैगोर की एक सौ पचासवीं जयन्ती मना रहे हैं. इस शुभ अवसर पर तमाम कार्यक्रम आयोजित किये जा रहे हैं. प्रस्तुत है ऐसे ही एक कार्यक्रम में एक विद्वान द्वारा दिया गया लेक्चर. आप बांचिये;
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मंच पर विराजमान अध्यक्ष महोदय, अग्रज प्रोफ़ेसर धीरज लाल ज़ी और मंच के सामने बैठे सज्जनों, मैं आभारी हूँ आयोजकों का जिन्होंने गुरुदेव रबिन्द्रनाथ टैगोर की एक सौ पच्चासवीं जयन्ती पर मुझे यहाँ आमंत्रित किया. उससे भी ज्यादा मैं आयोजकों का इस बात के लिए आभारी हूँ कि मेरी बात मानकर उन्होंने मुझे यहाँ बोलने का अवसर दिया. दरअसल आयोजक चाहते थे कि मैं यहाँ आकर औरों को सुनूं परन्तु मैंने उन्हें याद दिलाया कि हमारी संस्कृति में विद्वान सुनते नहीं बल्कि बोलते हैं. ऐसे में अगर मुझे बोलने के लिए आमंत्रित न किया गया तो मैं नहीं आऊंगा. फिर जयन्ती रबीन्द्रनाथ की हो या फिर तुलसीदास की, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि मेरा ऐसा मानना है कि मैं बोलने के लिए ही विद्वान बना हूँ, अगर मुझे सुनना ही होता तो फिर विद्वान क्यों बनता?
खैर, उन्होंने मेरी बात मान ली और मुझे इस मंच से बोलने का अवसर दिया. इसके दो फायदे हुए जिन्हें हम आपस में बाँट सकते हैं. आपको इस बात का फायदा हुआ कि आप मुझे सुन सकेंगे और मुझे इसका यह फायदा हुआ कि मुझे एक बार फिर से विद्वान मान लिया गया. उस विचारधारा का विद्वान जिसके अनुसार विद्वत्ता की जो छटा बोलने में उभर कर आती है वह किसी और कर्म में नहीं उभरती. लिखने में भी नहीं.
मित्रों जैसा कि अध्यक्ष महोदय ने बताया कि समय का अभाव है और मुझे अपनी बात रखने के लिए सिर्फ पंद्रह मिनट मिले हैं, ऐसे में आपका ज्यादा समय न लेते हुए मैं अपनी बात रखना चाहूँगा. आज जब पूरी दुनियाँ संकट के दौर से गुजर रही है तब हमें रबीन्द्रनाथ याद आ रहे हैं और हम अपने आपसे सवाल कर रहे हैं कि रबीन्द्रनाथ आज के दौर में प्रासंगिक हैं या नहीं? पर मित्रों मुझे लगता है यह सवाल अपने आप में बेमानी है क्योंकि अगर रबीन्द्रनाथ की प्रासंगिकता कहीं खो जाती तो क्या आज हमलोग़ यहाँ इकत्रित होते? रबीन्द्रनाथ की प्रासंगिकता इस बात में है कि उनकी बदौलत हम साल में एक बार मिलते हैं. भाषण देते हैं. बहस करते हैं. दुनियाँ पर मंडरा रहे संकट की बात करते हैं. आप ही सोचिये, आज अगर रबीन्द्रनाथ की जयन्ती नहीं होती तो हमें क्या याद रहता कि आज पूरी दुनियाँ एक संकट के दौर से गुज़र रही है?
यह रबीन्द्रनाथ की प्रासंगिकता का ही कमाल है कि हम मिलते हैं और दुनियाँ के ऊपर छाये संकट को पहचान पाते हैं. आज हमें यह सोचने की ज़रुरत है कि अगर वे प्रासंगिक नहीं होते तो क्या दुनियाँ पर संकट मंडराता? मेरा मानना है कि ऐसा नहीं हो पाता. फिर सवाल यह उठता है कि रबीन्द्रनाथ परंपरा और आधुनिकता के बीच कहाँ है? मित्रों, रबीन्द्रनाथ परंपरा और आधुनिकता के बीच नहीं अपितु वे खुद परंपरा भी हैं और आधुनिकता भी हैं. उन्होंने परंपरा से अपने लिए पूरी तरह से एक नया दर्शन खोजा और उसी में रहकर अपने लिए आधुनिकता का रास्ता चुना और आधुनिकता में रहकर वे परंपरा को भी सुदृढ़ करते रहे.
सवाल उठता है कि आधुनिकता क्या है और परंपरा क्या है? क्या हमारी और रबीन्द्रनाथ की आधुनिकता और परम्परा की परिभाषा एक ही है? शायद ऐसा नहीं है. जो उनके लिए आधुनिकता थी वही दूसरों के लिए परंपरा हो सकती है और जो दूसरों के लिए आधुनिकता हो सकती है वही रबीन्द्रनाथ के लिए परंपरा हो सकती है. जैसा कि मुझसे पहले बोलने वाले अग्रज विद्वान प्रोफ़ेसर ने कहा, यह रबीन्द्रनाथ की विद्वत्ता ही थी जिसकी वजह से वे आधुनिकता से परम्पराएं और परम्पराओं से आधुनिकता निकाल पाए. कह सकते हैं कि रबीन्द्रनाथ आधुनिकता और परंपरा का संगम थे.
परन्तु आज यह सवाल मुँह बाए खड़ा है कि आज की तारीख में संगम कितना प्रासंगिक है? जिस संगम की कल्पना रबीन्द्रनाथ ने की थी क्या आज हमारे पास वही संगम है? क्या आज हम यह दावे के साथ कह सकते हैं कि हमारे पास एक आदर्श संगम है? क्या यह वही संगम है जिसकी बात पर उन्होंने लिखा था.....मुझे लगता है आज हम उस आदर्श संगम से दूर जा चुके हैं जिसमें गंगा, यमुना और सरस्वती का जल सामान रूप से रहता. इसका नतीजा यह हुआ है कि देश पर एक तरह का जल संकट छा गया है. जल की बात पर मुझे सन १९०५ में बंग भंग के अवसर पर लिखी गई उनकी कविता याद आती है जिसमें उन्होंने लिखा;
बांग्लार माटी बांग्लार जल
बांग्लार वायु बांग्लार फल
पूर्ण होक...
(तभी अध्यक्ष महोदय ने समय की कमी का इशारा किया...)
मित्रों जैसा कि आपने देखा, समय का अभाव है इसलिए मैं अपनी बात संक्षेप में कहते हुए यह याद दिलाना चाहूँगा कि रबीन्द्रनाथ ने स्वतंत्र विचारों को फलने-फूलने की जगह दी. उन्होंने इस बात में कभी भी कमी नहीं होने दी. वैसे कमी की बात पर यह कहना चाहूँगा कि आज कमी किस चीज की नहीं है? गरीब के लिए आज पानी की कमी है. भोजन की कमी है. समाज के लिए आज ईमानदारी की कमी है. सत्य की कमी है. इस कठिन समय में मित्रों सबसे बड़ी कमी तो मानवता की हो गई है. मानवता की कमी वाले इस निष्ठुर समय में रबीन्द्रनाथ और प्रासंगिक हो जाते हैं क्योंकि वे मानवतावादी थे. राष्ट्रवाद से आगे जाकर उन्होंने मानवतावाद को ही सर्वोपरि माना. वे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के खतरे से वाकिफ थे. खतरे की बात चली है तो हमें यह देखने की ज़रुरत है कि आज हम अपने चारों तरफ खतरा ही खतरा देखते हैं. जो खतरा हम आज देख रहे हैं, आप सोचिये कि रबीन्द्रनाथ वही खतरा कितना पहले भांप गए थे? अगर ऐसा नहीं होता तो क्या वे लिखते कि;
चित्त......
(अध्यक्ष महोदय ने फिर से समय की कमी का इशारा किया...)
मित्रों, जैसा कि आप देख रहे हैं कि माननीय अध्यक्ष महोदय ने एक बार फिर से समय का अभाव की तरफ ध्यान आकर्षित किया है इसलिए मैं अपनी बात संक्षेप में रखते हुए आपके सामने दो-तीन बातें रखूँगा. तो मैं बात कर रहा था उस भयमुक्त समाज की जिसकी कल्पना गुरुदेव ने की थी. प्रश्न उठता है कि भयमुक्त समाज क्या है? क्या वह समाज जो भय से मुक्त हो या वह समाज जिसमें भय हो ही नहीं? इस विषय पर विद्वानों का अलग-अलग मत रहा है. मित्रों कुछ लोग तो भयमुक्त समाज की बात पर भय-मुफ्त समाज की बात करते हैं और हमें गुमराह करते हैं.
फिर वही बात है कि अगर अलग-अलग मत न हो तो हमें वह समाज ही नहीं मिलेगा जिसकी कल्पना गुरुदेव ने की थी. उनकी कल्पना उनकी कविताओं में, गीतों में, निबंधों में हर जगह व्याप्त है. यह उनकी महानता ही थी कि गाँधी ज़ी ने रबीन्द्रनाथ को गुरुदेव कहना शुरू किया था. वही रबीन्द्रनाथ ने गाँधी को महात्मा कहना शुरू किया था. दोनों एक दूसरे को बहुत सम्मान देते थे. यह अलग बात है कि बहुत से मुद्दों पर दोनों के मतभेद परिलक्षित थे. छिपे हुए नहीं थे. याद की कीजिये वह समय जब गाँधी जी के आह्वान पर देश में आन्दोलन हो रहा था, जब गाँधी ज़ी सत्याग्रह आन्दोलन कर रहे थे तब रबीन्द्रनाथ ने उन्हें सहयोग नहीं दिया था. वे इस आन्दोलन के खिलाफ थे. वे सत्याग्रह से भविष्य में होने वाले खतरे को भांप गए थे.
प्रश्न यह उठता है कि जो सत्याग्रह गाँधी ज़ी ने किया और जो सत्याग्रह अभी हाल में अन्ना हजारे ने किया, उसमें मूलतः क्या समानता है? अगर हम याद करें तो पायेंगे कि गाँधी ज़ी के सत्याग्रह को रबीन्द्रनाथ का समर्थन नहीं मिला था. वहीँ अन्ना हजारे के सत्याग्रह को भी रबीन्द्रनाथ का समर्थन.....
(अध्यक्ष महोदय समय की कमी का इशारा फिर से करते हैं....)
मित्रों समय के अभाव के चलते मैं संक्षेप में दो-तीन बातें कहकर अपना वक्तव्य समाप्त करना चाहूँगा. तो प्रश्न यह है कि गाँधी ज़ी के सत्याग्रह को रबीन्द्रनाथ का समर्थन क्यों नहीं मिला? कई बातों पर मतभेद के चलते दोनों के बीच सत्याग्रह को लेकर भी मतभेद था. कहा तो यहाँ तक जाता है कि रबीन्द्रनाथ ने अपने शिक्षकों और विद्यार्थियों को गाँधी जी के सत्याग्रह आन्दोलन को समर्थन न दिए जाने पर जोर दिया था. परन्तु क्या यह मामला उतना सरल है जितना हम समझते हैं?
सरलता की बात चली है तो यह कहना चाहूँगा कि रबीन्द्रनाथ के अन्दर एक बालक की सी सरलता था. आप उनके छंद देखिये. उनकी कवितायें देखिये जिसके केंद्र में केवल और केवल मनुष्य था. केवल और केवल मनुष्य का मन था. वे इस बात के आग्रही थे कि मनुष्य को सम्पूर्ण नीला आकाश मिलना चाहिए जिससे वह जहाँ तक चाहे उड़ान भर सके. लेकिन क्या आज की दुनियाँ में मनुष्य को वह उड़ान भरने की सहूलियत है जिसकी बात रबीन्द्रनाथ अपने लेखन में करते हैं?
जब उनके लेखन की बात चलती है तो हम पाते हैं कि वे अपने लेखन से स्वच्छंद आकाश में विचरते थे. इस गीत पर ध्यान दीजिये. वे लिखते हैं;
पागला हवा बादोल दिने
पागल आमार मोन जेगे उठे
खुद सोचिये कि कवि की दृष्टि से उन्हें प्रकृति से कितना प्रेम था? उनकी कविताओं में, गीतों में उनका प्रकृति प्रेम झलकता है. बांग्ला में जिन्हें गान कहते हैं वह उन्होंने लिखा. गान की बात चली है तो आपको याद दिलाना चाहूँगा कि रबीन्द्रनाथ ने ही हमारे राष्ट्रगान को लिखा. मित्रों हमारे राष्ट्रगान की कहानी बड़ी लम्बी है.
(एक बार फिर से अध्यक्ष महोदय समय की कमी.......)
मित्रों बस मैं अपनी बात संक्षेप में कहकर ख़त्म करना चाहूँगा कि इस वर्ष हमारे राष्ट्रगान को पूरे एक सौ वर्ष हो गए. परन्तु आश्चर्य इस बात का है कि इस महान अवसर पर देश की मीडिया में इस बात पर चर्चा नहीं हुई. वैसे अगर आप राष्ट्रगान का इतिहास देखेंगे तो पायेंगे कि वह भी कभी विवादों से परे नहीं रहा. कुछ लोगों का अनुमान है कि रबीन्द्रनाथ ने यह राष्ट्रगान जार्ज पंचम की सराहना करते हुए लिखा था. परन्तु यह कहना उचित न होगा. आपको याद हो तो उस समय के कवि बुद्धदेब बसु ने रबीन्द्रनाथ की बहुत आलोचना की थी लेकिन रबीन्द्रनाथ ने अपने एक पत्र में लिखा है...एक मिनट मैं वह पत्र पढ़कर आपको सुनाता हूँ. यह पत्र रबीन्द्रनाथ ने सन १९३६ में ......
(इस बार अध्यक्ष महोदय ने समय की कमी का इशारा नहीं किया. इस बार उन्होंने विद्वान से अपना भाषण ख़त्म करने के लिए कहा. उन्होंने यह कहते हुए भाषण ख़त्म किया; )
मित्रों जैसा कि आप देख रहे हैं, समय का अभाव है इसलिए मैं अपनी बात ख़त्म करते हुए आपको बताना चाहूँगा कि
आज मेरा विषय था "रबीन्द्रनाथ और वैश्विक मानवतावाद" परन्तु समय के अभाव में आज मैं उस विषय तक पहुँच ही नहीं सका. मुझे विश्वास है कि अगले वर्ष रबीन्द्र जयंती के शुभ अवसर मैं अपने इस पसंदीदा विषय पर अवश्य बोलूंगा. मैं धन्यवाद देता हूँ आयोजकों का जिन्होंने.....
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रबीन्द्र साहित्य को लेकर मेरा विचार यह है कि अगर आलोचकों, ज्ञानियों और जानकारों की ज्यादातर बातों को दरकिनार करके रबीन्द्र साहित्य पढ़ा जाय तो समझने में मुश्किल नहीं होगी. पढ़ने का आनंद मिलेगा सो अलग.
Wednesday, April 13, 2011
विक्रम की चेन्नई विजिट
कल से बप्पी दा का 'गान' याद आ रहा है; "आना-जाना लगा रहेगा, 'दूख' जाएगा, 'सूख' आएगा...."
दुःख को 'दूख' लिखकर मैं बताना चाहता था कि बाप्पी दा का गाया 'गान' पढ़ने के लिए नहीं बल्कि सुनने के लिए है. आज तक उन्होंने दुःख का उच्चारण दुःख कहकर नहीं किया, हमेशा दूख कहकर ही किया है. इसके पीछे शायद यह कारण भी हो सकता है कि वे दुःख से कभी दुखी न हुए हों. देखा जाय तो उनके दुखी होने का कारण भी नहीं है. बल्कि खुश होने का सबसे बड़ा कारण है सोने के भाव में विकट उछाल. दुनियाँ भर के कमोडिटी एक्सपर्ट्स का मानना है कि पिछले डेढ़-दो साल में सोने के भाव में जो उछाल आया है उसका सबसे बड़ा फायदा उन्हें ही पहुँचा है.
बात चली है तो लगे हाथ बता दूँ कि मैं उनका बहुत बड़ा फैन हूँ. बाथरूम में नहा रहा होता हूँ तो मुँह से अनायास ही फूट पड़ता है; "कहाँ हाम कहाँ तूम हुए तूम कहाँ गूम, आ भी जा आ भी जा एक्के बार..." जब दोस्तों की मीटिंग होती है तो कई मित्र मुझसे बप्पी दा का 'गान' गाने के लिए कहते हैं. मैं गा देता हूँ. वे हँस लेते हैं. बात यह कहते हुए ख़त्म कर दी जाती है कि - तुम ब्लॉगर नहीं होते तो बप्पी दा के सबसे बड़े डुप्लीकेट होते. चेहरे-मोहरे की बात नहीं हो रही. बाप्पी दा के शब्दों में कहें तो "यहा 'सूर' का बात हो रहा है."
मैं क्या करूं? वे यहाँ को 'यहा' और सुर को 'सूर' कहते नहीं थकते.
लीजिये, कहाँ से कहाँ पहुँच गए? बात गाने से शुरू हुई थी और दो-चार गलियों से होते हुए देखिये कैसे शेम-लेस सेल्फ प्रमोशन तक पहुँच गई. केवल ब्लॉगर कहला कर संतोष नहीं है इसलिए समय-समय पर और कुछ बन जाने की इच्छा उछल कर बाहर आ ही जाती है. आदमी कहाँ-कहाँ कंट्रोल करेगा?
हाँ, तो आना-जाना लगा रहेगा नामक गाने की बात हो रही है. दरअसल विक्रम अपने तीन दिन के चेन्नई विजिट के बाद सोमवार को कोलकाता पहुँचा. उसकी चेन्नई और गाँव विजिट पर काफी देर तक बातें हुईं. तमाम जानकारियाँ मिलीं जो इलाके को नज़दीक से देखने वाला ही दे सकता है. इन तमाम बातों की एक पोस्ट लिख दे रहा हूँ. आप भी पढ़िए. चेन्नई विजिट की कहानी विक्रम की जुबानी....
...अरे सर, स्टालिन है लेकिन कमाल का बन्दा. फ्लाईओवर ही फ्लाईओवर बना डाले हैं भाई ने. अगर कहीं एक बस के आने-जाने की भी जगह है तो उसने यह गारंटी दे दी है कि वह बस फ्लाईओवर के ऊपर से ही जायेगी. वैसे भी फ्लाईओवर पर आने-जाने वाली गाड़ियाँ बड़ी क्यूट लगती है. नीचे से देखने पर कई तो एरोप्लेन की फीलिंग देती हैं. कई इस रफ़्तार से भागती हैं जिसे देखकर लगता है जैसे अभी टेक-ऑफ कर जायेंगी. ऊपर से फ्लाईओवर विकास का द्योतक भी होता है........... अगर आप चेन्नई से बाहर भी जा रहे हैं और बीच में कोई टाऊन पड़ गया तो आपको ट्रैफिक जाम से घबराने की ज़रुरत नहीं है. वहाँ आपके लिए फ्लाईओवर रेडी है. अगर आप उस टाऊन में कोई सौदा नहीं करना चाहते तो आप वाया फ्लाईओवर निकल लीजिये. उस टाऊन के लोगों से आपका न उधो का लेना और न माधो का देना...
आप देखिएगा एक दिन ऐसा आएगा जब भारतवर्ष की तमाम राज्य सरकारें स्टालिन को अपने शहरों के लिए बनने वाले फ्लाईओवर की कंसल्टेंसी के लिए बुलाएंगी. वे दिन भी दूर नहीं जब इंजीनियरिंग कालेजों में सिविल इंजीनियरिंग के कोर्स में स्टालिन के ऊपर एक चैप्टर होगा जिसमें फ्लाईओवर क्षेत्र में दिए गए उनके योगदान के ऊपर सबकुछ लिखा हुआ मिलेगा......एक दिन ऐसा भी आएगा जब...
.... जैसे अपने यहाँ क्या है? एयरकंडीशनर चलाने के लिए आपने स्विच और एम सी बी लगा रखा है. आपने इधर स्विच दबाया और उधर एसी ने अपना काम करना शुरू किया. थोड़ी देर में रूम ठंडा हो जाता है. लेकिन चेन्नई में ऐसा नहीं है. वहाँ मैं जितने घर में भी गया वहाँ यह देखा कि हर एसी का कनेक्शन स्टेबिलाइजर से ज़रूर है. एसी चलाने के लिए पहले स्टेबिलाइजर चलाना पड़ता है. स्टेबिलाइजर का स्विच दबाते ही उसमें करीब दस मिनट तक तरह-तरह की आवाजें आती हैं. कई आवाजें सुनकर लगता है जैसे यह स्टेबिलाइजर किसी मिमिक्री आर्टिस्ट की नक़ल कर रहा है. कई बार कुछ देर तक आने वाली आवाज़ अचानक किसी और आवाज़ में कन्वर्ट हो जाती है जिसे सुनकर लगता है जैसे यह स्टेबिलाइजर अपनी जगह बैठे-बैठे ही टेक-ऑफ कर जाएगा...... चार-चार घंटे चलने के बाद भी कमरा ठंडा नहीं होता है. देखकर लगता है जैसे एसी अपने रोल को लेकर कन्फ्यूज्ड है. जैसे कई बैट्समैन कई-कई बार यह सोचते हुए कन्फ्यूज्ड हो जाते हैं कि उन्हें स्ट्रोक खेलना चाहिए या डिफेंड करना चाहिए.....चेन्नई के एसी को वहाँ की बिजली की ऐसी आदत पड़ चुकी है जिसे देखकर लगता है कि आप वहाँ के एसी को अगर कुछ रिश्वत वगैरह भी दे देंगे तो भी वह चेन्नई की बिजली को छोड़कर कहीं नहीं जाएगा.....
बाद में सड़क पर लगे ट्रांसफॉर्मर देखा तो बात समझ में आई. आप देख लेंगे तो अपना माथा पीट लेंगे. देखकर लगता है जैसे एक्सपेरिमेंट के बाद दुनियाँ में ट्रांसफॉर्मर के कॉमर्शियल प्रोडक्शन की जो पहली खेप थी वह चेन्नई शहर में ही लगी थी और अभी तक चल रही है. कई ट्रांसफॉर्मर के ऊपर कुछ ऐसे आड़े-तिरछे लोहे-लक्कड़ और इक्विपमेंट्स नज़र आये जिन्हें देखकर लगा कि ये माल-असबाब इसलिए लगाये गए ताकि अंतरिक्ष में सैर कर रहे तमाम भारतीय सैटलाइट्स को कंट्रोल किया जा सके...
......लोग़ अस्पताल में खूब भर्ती होते हैं. एक पार्टी में रिश्तेदारों से मिला. उनकी बातें सुनकर इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि यहाँ उपस्थित लोगों में से फिफ्टी परसेंट तो पिछले एक-दो महीने में किसी न किसी बीमारी के बहाने अस्पताल में रह आये हैं. मेरे एक रिश्तेदार वृहस्पतिवार तक अस्पताल में भर्ती थे और शनिवार को पार्टी अटेंड कर रहे थे. देखकर लगा कि ये टीवी और पत्र-पत्रिकाओं में भारत को जो मेडिकल टूरिज्म का महान डेस्टिनेशन बताया जा रहा है उसका पहला प्रयोग लोकल लोगों पर किया जाता है. कई तो बुखार से पीड़ित होकर अस्पताल में भर्ती हो लेते हैं.....
हाल यह है कि तमाम डाक्टर्स अपने रोगियों को अपने दोस्त, भाई, चचा, ताऊ जैसे ट्रीट करते हैं. मतलब यह कि उन्हें लूटने का कोई मौका हाथ से जाने नहीं देते.
...... बात इलेक्शन की शुरू हुई तो तमाम बातें सुनने को मिलीं. जीजाजी ने बताया कि वोट का रेट इस बार पाँच हज़ार रुपया पर फॅमिली का चल रहा है. पार्टी वाले एडवांस देने पर राजी हैं. नोट लो और वोट दो. वोट का रेट इस बार पर फॅमिली शायद इसलिए बांधा गया क्योंकि करूणानिधि इज अ फॅमिलीमैन...मिक्सर, टीवी, लैपटॉप की बातें पुरानी हो गईं हैं. चावल तो और पुराना हो गया है.... इस बार ३५ किलो पर फॅमिली पर मंथ पर सौदा पक्का हुआ है....चावल की बात पर मुझे ए राजा की याद आ गई. एक इंटरव्यू में टू-ज़ी और थ्री-ज़ी के अंतर को समझाते हुए उन्होंने बताया था कि "त्री ज़ी यिज्ज लइक बासमती रईस येंड टू ज़ी यिज लइक यार्डिनरी रईस." .......
.......जब सभा में पीकर भाषण देने की बात उठी तो विजयकान्त ने सीधा कह दिया कि इस गर्मी में पीयेंगे नहीं तो चुनाव प्रचार कैसे करेंगे?..एक सभा में भाषण दे रहे थे. किसी विरोधी के बारे में मुँह से कुछ उल्टा-सीधा निकल आया. पास खड़े चमचे ने कान में कुछ कहकर उनका ध्यान खीचने की कोशिश की. उन्होंने अपने चमचे को वहीँ धुनक कर धर दिया. जब विरोधी दल वालों ने अपने टीवी चैनलों पर इस मामले को उछाला तो सीधा कह दिया; "मैंने आजतक जिसे भी पीटा वह एम एल ए बन गया. मैंने जिसे पीटा जब उसे कोई प्रॉब्लम नहीं है तो तुम्हारे बाप का क्या जाता है? वह इसलिए पिटना चाहता था ताकि उसका एम एल ए बनना पक्का हो जाए."
......पार्टी में कुछ नेताओं की वल्दियत को लेकर भी बातचीत हुई. एक नेता के बारे में यह कहा गया कि वे उनके (मतलब एक बड़े नेता जिन्हें उनका बाप माना जाता है) पुत्र नहीं हैं. दरअसल ये उनके (मतलब एक नेता जो पहले थे लेकिन अब नहीं हैं) के पुत्र हैं. ध्यान से चेहरा देखो तो पता चलेगा...बाद में यह कहकर बात ख़त्म की गई कि चेहरा कम्पेयर करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी है क्योंकि उनका (मतलब एक नेता जो पहले थे लेकिन अब नहीं हैं) आधा चेहरा काले चश्में में छिपा रहता था...
.....हमारे गाँव में सभी ने अपनी खेती-बाड़ी वाली करीब सौ एकड़ ज़मीन बड़े आराम से ज़मीन के किसी व्यापारी को बेंच दी. उस व्यापारी ने उनके इन जमीनों के कई प्लाट बनवा कर "एक बंगला बने न्यारा" गाने वाले कई खरीददारों को चेंप दिया. बाद में जब ज़मीन के कन्वर्जन के लिए अप्लिकेशन दिया गया तो स्टेट गवर्नमेंट ने यह कहकर सब गुड गोबर कर दिया कि एग्रीकल्चरल लैंड को किसी भी हालत में ......