त्रेता युग
जामवंत जी ने हनुमान जी को याद दिलाया कि वे उड़ सकते हैं. बड़े-बुजुर्ग हमेशा से परोपकारी रहे हैं. उन्हें तो बस परोपकार करने का मौका चाहिए. वे कभी पीछे नहीं हटेंगे. दरअसल एक उम्र पर पहुंचकर उन्हें इसके अलावा कुछ और करना न तो आता है और न ही भाता है. जामवंत जी भी इसके अपवाद नहीं थे. हनुमान जी ने जामवंत जी को थैंक्स कहा और श्रीलंका की उड़ान भर ली. बैकग्राऊंड से रवींद्र जैन अपनी सुरीली आवाज़ में गाये जा रहे हैं; "राममन्त्र के पंख लगाकर हनुमत भरे उड़ान...हनुमत भरे उड़ान."
उधर हनुमान जी अपने दोनों पाँव ठीक वैसे ही ऊपर-नीचे करते उड़े जा रहे हैं जैसे पलंग पर पेट के बल लेटा डेढ़ साल का बच्चा अपने पाँव ऊपर-नीचे करता है. देखकर कोई भी बता सकता है कि वे इस समय ज्यादा ऊपर नहीं उड़ रहे हैं क्योंकि मौसम सुहाना है. बादल ऊंचाई पर हैं. रास्ता साफ़ है. दूर-दूर तक सबकुछ दिखाई दे रहा है. लिहाज़ा सामने से आते किसी राक्षस या वायुयान से टकराने की सम्भावना नगण्य है. सूर्य भगवान का पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम स्ट्रॉंग है इसलिए वे अपनी रोशनी पूरे संसार को बांटे जा रहे हैं. हिंद महासागर नीचे अविरल बहता जा रहा है.
हनुमान जी एकाग्र-चित्त उड़े जा रहे है. ठीक वैसे ही जैसे राहुल द्रविड़ पिच पर एकाग्र-चित्त होकर ऑफ स्टंप से बाहर जानेवाली गेंदों को बिना किसी छेड़-छाड़ के छोड़ दिया करते हैं. देखकर ही लग रहा है कि उन्हें उड़ने में बहुत मज़ा आ रहा है. वे किसी बच्चे की सी मुखमुद्रा लिए आनंदित दिखाई दे रहे हैं. अचानक देखते क्या हैं कि समुद्र में से सामने एक विशालकाय महिला उभरी. उसने बड़ा वीभत्स मेक-अप किया है. बड़े-बड़े बाल, माथे पर बहुत बड़ी बिंदी, मुँह के दोनों कोनों पर बड़े-बड़े तिरछे दांत और बड़ी गाढ़ी होठ-लाली से लैस यह महिला हनुमान जी के रास्ते में मुँह बाए खड़ी हो गई. उसे देख हनुमान जी ने खुद को उसके मुँह के आगे हवा में ही पार्क कर लिया. वह महिला जोर-जोर से हा हा हा करके हँसी. उसकी हँसी उसके मेक-अप से मेल खा रही है.
हनुमान जी ने उसे प्रश्नवाचक मुद्रा में देखा. उस महिला को लगा कि अब समय आ गया है कि वह अपना परिचय दे. उसने कहा; "मैं सुरसा हूँ. हा हा हा हा हा."
उसकी हँसी सुनकर कोई भी कह सकता है कि शायद उसे सुरसा होने पर बड़ा गर्व है. वैसे यह भी कह सकता है कि जैसे हनुमान जी उड़ना एन्जॉय करते हैं वैसे ही सुरसा हँसना एन्जॉय करती है. उसकी हँसी सुनकर हनुमान जी ने कहा; "वह तो ठीक है लेकिन आप इतना हँस क्यों रही हैं?"
सुरसा बोली; "हँसी ही मेरी पहचान है. मैं जब तक नहीं हँसती लोग़ मुझे राक्षसी समझते ही नहीं. अब तुम्ही सोचो कि अगर मैं हँसना बंद कर दूँ तो कौन मुझे सीरियसली लेगा?"
उसकी बात शायद हनुमान जी की समझ में आ गई इसीलिए उन्होंने उसकी हँसी की बाबत और कोई सवाल नहीं किया. आगे बोले; "लेकिन मुझसे क्या चाहती हो?"
वो बोली; "आज देवताओं ने तुम्हें मेरा आहार बनाकर भेजा है. आशा है मेरी बात तुम्हारी समझ में आ गई होगी. नहीं आई हो तो फिर मैं काव्य में सुनाऊं कि; आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा..."
उसकी बात सुनकर हनुमान जी डर गए. उन्होंने सोचा जल्दी से हाँ कर दें नहीं तो कहीं ऐसा न हो कि यह अपनी बात काव्य में सुनाना शुरू करे तो साथ में आगे-पीछे की दस-पंद्रह चौपाई और सुना दे. आखिर उन्हें भी पता है कि कविता सुनाने वाला अगर सुनाने के मोड में आ जाए तो फिर सामनेवाले के ऊपर विपत्ति का पहाड़ टूट पड़ता है.
वे झट से बोले; "नहीं-नहीं मैं समझ गया. लेकिन हे माता अभी तो मैं भगवान श्री राम के कार्य हेतु श्रीलंका जा रहा हूँ. इसलिए आप मुझे छोड़ दें. मुझे बहुत बड़ा कार्य करना है. माता सीता की खोज करनी है. हे माता आप समझ गईं या काव्य में बताऊँ कि; "राम काजु करि फिरि मैं आवौं...."
हनुमान जी की बात सुनकर अब डरने की बारी सुरसा जी की थी. वे बोलीं; "समझ गई मैं. तुम्हारी बात पूरी तरह से मेरी समझ में आ गई."
अभी वे बात कर ही रहे थे कि आस-पास बकरी की सी आवाज़ सुनाई दी. हनुमान जी और सुरसा दोनों को बड़ा आश्चर्य हुआ कि समुद्र के ऊपर इस समय बकरी कहाँ से आ सकती है? वे इस आवाज़ के बारे में अभी सोच ही रहे थे कि उन्होंने देखा कि उनके सामने सूट-बूट पहने, छोटी सी चोटी बांधे एक मनुष्य खड़ा हुआ है.
उसने हनुमान जी को प्रणाम किया और बोला; "हे बजरंगबली, आप तो श्रीलंका जा रहे हैं. मैं यह बताने आया था कि मेरी फिल्म रा-वन कोलम्बो के सैवोय थियेटर में रिलीज होनेवाली है. आप से रिक्वेस्ट है कि आप वह फिल्म ज़रूर देखें."
इस मनुष्य को देखकर शायद हनुमान जी पहचान गए. बोले; "अरे तुम तो वही हो न जो परसों किष्किन्धा के आस-पास के इलाके में अपनी फिल्म का प्रचार करने वाये थे? महाराज सुग्रीव की सेना के कई बानर उसदिन अपना कर्त्तव्य भुलाकर तुम्हारा नाच-गाना देखने चले गए थे?"
उनकी बात सुनकर वह मनुष्य बोला; "हाँ, भगवन मैं वही हूँ. दरअसल मैं अपनी मूवी का प्रचार करने आपके इलाके में गया था. मेरा आपसे अनुरोध है कि आप मेरी मूवी ज़रूर देखें."
इस बार हनुमान जी बिदक गए. बोले; "तुमने पिछले वर्षा ऋतु से ही परेशान करके रख दिया है. जहाँ दृष्टि जाती है बस तुम्ही दिखाई देते हो. चित्रकूट हो या किष्किन्धा, अयोध्या हो या जनकपुर सब जगह तुम्ही दिखाई दे रहे हो. पागल कर दिया है तुमने सबको."
"लेकिन प्रभु, मेरी बात तो सुनिए. इस मूवी में रजनीकांत भी हैं. मैंने विदेशी गायक से इसमें गाना गवाया है. आप ज़रूर देखिएगा यह मूवी. आपको अच्छा लगेगा"; वह मनुष्य गिडगिडाने लगा.
उसकी बातें हनुमान जी को विरक्त कर रही थीं. बहुत नाराज़ होते हुए बोले; "हे माता, इस मनुष्य ने पूरी पृथ्वी पर हाहाकार मचा कर रखा है. मैं इसकी मूवी देखूँ उससे अच्छा तो यह होगा कि आप मुझे अपना आहार बना लें. माता सीता की खोज अंगद कर लेंगे."
कट टू द्वापर युग.
महाभारत की लड़ाई चल रही है.
महाराज धृतराष्ट्र के सारथी संजय उन्हें युद्ध के मैदान से आँखों देखा हाल बता रहे हैं. अचानक देखते क्या हैं कि उनकी स्क्रीन पर महाभारत की लड़ाई दिखनी बंद हो गई. सामने सूट-बूट में लैस एक मनुष्य नृत्य करते हुए गाने लागा; छम्मक छल्लो...चम्मक छल्लो..."
संजय की समझ में नहीं आ रहा कि यह कौन है? अभी वे कुछ सोच पाते कि आवाज़ आई; "महाराज धृतराष्ट्र की जय हो. महराज आज दिन भर युद्ध की रनिंग कमेंट्री सुनकर जब आप थक जायें तो आज रात्रिकालीन शो में मेरी मूवी रा-वन देखना न भूलें. बहुत बढ़िया मूवी है. बहुत पैसा खर्च करके मैंने यह मूवी बनाई है. आप आनंद से सरा-बोर हो जायेंगे."
उसकी आवाज़ सुनकर धृतराष्ट्र को लगा कि यह कौन है जो उनका मज़ाक उड़ा रहा है. आखिर जो व्यक्ति अँधा हो वह मूवी कैसे देखेगा? वे नाराज़ होते हुए बोले; "संजय यह कौन धृष्ट है जो मेरी हँसी उड़ा रहा है?"
संजय बोले; "महाराज यह एक चलचित्र अभिनेता है जो अपनी मूवी का विज्ञापन करते नहीं थक रहा. इसने पूरी पृथ्वी पर सबको परेशान करके रख दिया है. यह चाहता है कि आप इसकी मूवी देखें."
महाराज धृतराष्ट्र को बहुत गुस्सा आया. बोले; "क्या इसे यह नहीं मालूम कि मैं देख नहीं सकता?"
संजय अभी कुछ बोलते कि वह अभिनेता बोला; "महाराज आप केवल बैठे रहिये. संजय जी पूरी मूवी का वर्णन आपके सामने रखते जायेंगे. आप उसे फील करते रहिएगा. और हाँ, छम्मक छल्लो को अच्छी तरह से फील करियेगा. अब मैं जा रहा हूँ. मुझे पांडवों के शिविर में भी अपनी मूवी का विज्ञापन करना है."
इतना कहकर संजय की स्क्रीन से वह गायब हो गया. महाराज रात्रिकालीन शो का इंतजार करने लगे.
Saturday, October 22, 2011
युग-युग में रा-वन
Wednesday, September 8, 2010
मुन्नी जी, कोई भी बदनामी आख़िरी नहीं होती.
बहुत हो चुका. मुन्नी की बदनामी अब और बर्दाश्त नहीं होती. पिछले एक महीने से मुन्नी है कि उठते-बैठते बदनाम हुई जा रही है. बार-बार लगातार. सुबह हुई नहीं कि रेडिओ पर बदनामी का नगाड़ा पीट दिया. दोपहर में टीवी पर बदनामी की ढोलक पीट दी. रात को, इंटरटेनमेंट चैनल पर, फ़िल्मी चैनल पर, म्यूजिक चैनल पर, न्यूज चैनल पर, बदनामी की शहनाई बजा दी. कल तो सड़क पर बदनाम हो गई. मैंने देखा कि एक रिक्शावाला अपने रिक्शे में रेडिओ टाँगे रिक्शा चलाते जा रहा था कि अचानक मुन्नी 'रिश्के' पर बदनाम होने लगी. आस-पास के लोग चौंक करके मुन्नी की बदनामी सुनने लगे. कुछ ने ऐसी भाव-भंगिमा बनाई जिसे देखकर लगा कि बन्दा सोच रहा है कि कहीं मुन्नी ने उसी को तो डार्लिंग नहीं कहा? कहीं उसी के लिए तो बदनाम नहीं हुई?
कोई जगह नहीं बची है जहाँ मुन्नी बदनाम नहीं हो रही. ऊपर से तुर्रा ये कि; 'मैंने बदनामी का यह कार्यक्रम तो डार्लिंग तेरे लिए किया है." जैसे कह रही हो कि; "बदनाम होने का मेरा कोई प्लान नहीं था लेकिन हे डार्लिंग तुम मुझे इतने क्यूट लगे कि कि मैंने नाम को छोड़कर बदनाम होने का फैसला कर डाला."
मुन्नी का डार्लिंग मुन्नी के साथ जहाँ-तहाँ बदनामी का कार्यक्रम आयोजित कर ले रहा है. होड़ सी लगी है लोगों में.देखकर लगता है जैसे आक्शन सिस्टम के तहत बोली लग रही है और मुन्नी और उसके डार्लिंग से भाई लोग सिफारिश कर रहे हैं कि; "डार्लिंग जी, आज अगर मुन्नी को हमारे चैनल पर बदनाम कर देते तो बहुत बढ़िया होता. हम बड़ी आशा लेकर आये हैं कि मुन्नी जी पहले हमारे ही चैनल पर बदनाम होंगी. ना मत कहियेगा."
या फिर इसका उल्टा भी हो सकता है यानि डार्लिंग जी चैनल वालों से कह रहें हों कि; "भाई साहब, आप इजाजत दें तो मैं अपनी मुन्नी को आपके चैनल पर प्राइम टाइम पर बदनाम कर लूँ."
कहीं-कहीं तो वे भाई भी मुन्नी को अपने चैनल पर बदनाम कर लेना चाहते हैं जिनके चैनल पर छोटे-छोटे बच्चे गाने में अपनी किस्मत और आवाज़ आजमा रहे हैं. उधर बच्चे स्टेज पर गाना गाने के लिए तैयार हुए और इधर डार्लिंग अपनी मुन्नी को लिए पहुँच गए उसे बदनाम करने के लिए. बच्चे भी मुन्नी की बदनामी की सरगम सुन ले रहे हैं ताकि अपने गाने में कभी फिट कर सकें.
एक चैनल पर देखा कि मुन्नी को बदनामी के गुर सिखाने वाली जज के रूप में बैठी थी. बस फिर क्या था, मुन्नी अपने डार्लिंग जी को पर्स की तरह दबाये पहुँच गई और फटाफट बदनाम हो ली. बदनामी का गुर सिखाने वाली फारहा जी ने भी साथ दिया तो बदनामी में चार चाँद लग गए. डार्लिंग जी भी खुश. मन ही मन सोच रहे होंगे कि; "आज तो बढ़िया बदनामी हुई. ऐसी बदनामी पिछले चैनल पर नहीं हो पाई थी."
हाँ, कभी-कभी यह ज़रूर लग रहा है जैसे मुन्नी इतनी भारी मात्रा में बदनाम होकर समाज में डिवाइड क्रियेट कर रही हैं. आखिर मुन्नी जी को भी सोचना चाहिए कि इतनी बड़ी मात्रा में बदनाम होकर वे न जाने कितनों को इन्फिरियारिटी कम्प्लेक्स दे रही होंगी और उनकी बदनामी देखकर न जाने कितने अपने भाग्य को कोस रहे होंगे कि; "हे भगवान, हमने क्या गुनाह किया था जो हमें बदनामी से महरूम रखा? मुन्नी जितनी न सही लेकिन उतनी बदनामी तो दे ही सकते थे कि हमें भी बदनाम होने पर गर्व होता."
शायद इसी इन्फिरियारिटी कम्प्लेक्स का नतीजा है कि कोई मुन्नी जी से पूछ नहीं रहा है कि; "क्या ज़रुरत है इतना बदनाम होने की? वह भी इस स्टाइल से बदनाम हुई हो कि ग्रेस पूरी तरह से एब्सेंट है. बदनाम होना है तो हो लो लेकिन ग्रेसफुली बदनाम हो. क्या तुम्हें यह नहीं पता कि बदनाम होने के बाद जब तुम झंडु बाम हो रही हो तो बहुत चीप लग रही हो? उस समय बदनामी रसातल में चली गई है?"
वैसे भी एक-दो बार कहीं बदनाम हों लें वह ठीक है लेकिन रोज-रोज हर दो घंटे पर बदनाम होना कहाँ तक जायज है? बदनामी की कोई लिमिट है कि नहीं? देखकर लगता है जैसे आपकी बदनामी ही भारत की प्रगति पर चार चाँद लगाएगी? अरे चैनल वालों का क्या है? उनके चैनल तो बदनामी पर ही चल रहे हैं. आज आपकी बदनामी है कल किसी और की होगी. हर न्यूज चैनल पर कोई न कोई नीलाभ, रोहित और अमिताभ बैठे हैं जो हर घंटे आपकी बदनामी पर विशेष झाड़े जा रहे हैं. कई बार तो लगता है जैसे चलता हुआ प्रोग्राम बंदकर ब्रेकिंग न्यूज दिखाना न शुरू कर दें कि मुन्नी पाँच मिनट पहले शाबाश चैनल पर एक बार फिर से बदनाम हो गई हैं.
तो हे मुन्नी जी, माना कि आपके हिसाब से आपने बदनामी की दुनियाँ में नया रिकार्ड बना डाला है लेकिन आप बदनामी के हथौड़े से हमारे सिर पर कितनी बार चोट करेंगी? हम आपको बताना चाहते हैं कि अब सिर तो क्या आपके बदनाम हथौड़े की चोट से हमारी आँखें भी सूज गई हैं. अब आपकी बदनामी बर्दाश्त के बाहर हो गई है. इसलिए अपनी बदनामी पर लगाम लगायें. इस बात को ध्यान में रखें कि बदनामी क्या है कल कोई और आएगा और वह आपसे भी ज्यादा बदनाम होकर दिखा देगा. कोई भी बदनामी आख़िरी नहीं होती.
Friday, December 12, 2008
बल्ले-बल्ले...सावा-सावा...मखना...चखणा..
कमलेश बैरागी जी से मुलाक़ात हो गई. रतीराम जी की चाय दूकान पर. एक हाथ में चाय का कुल्हड़ और दूसरे में एक कागज़. एक बार कागज़ को देखते, कुछ बुदबुदाते और चाय की एक चुस्की और ले लेते. मुझे देखते ही उन्होंने कहा; "और बताईये, कैसे हैं?"
मैंने कहा; "मैं तो ठीक-ठाक हूँ. आप कैसे हैं? कोई नई कविता लिखी आपने?"
मेरी बात सुनकर मुस्कुरा दिए. बोले; "पिछले कुछ दिनों से कोई नई कविता नहीं लिखी. फुरसत ही नहीं मिली."
मैंने कहा; "समय अभी चिंतन करने का है, शायद?"
मेरी बात सुनकर फिर मुस्कुरा दिए. बोले; " एक कवि के लिए हर समय चिंतन का ही रहता है. लेकिन अब आप से क्या छुपाना, असल में आजकल नए फील्ड एक्सप्लोर कर रहा हूँ."
मैंने पूछा; "कवि के लिए नए फील्ड में आजकल क्या-क्या आता है?"
वे बोले; "मैंने सोचा सिनेमा के गीत लिखूं. सोचा, जावेद अख्तर साहब आजकल रियल्टी कम्पीटीशन में जजबाजी करने में बिजी हैं. गुलज़ार साहब भी आजकल सेलेक्टिव ही लिखते हैं. ऐसे में अगर थोड़ा समय दिया जाय तो सिनेमा के गीतकार के रूप में पाँव जमाया जा सकता है."
उनकी बात सुनकर बड़ा अच्छा लगा. अच्छा इसलिए कि अगर वे सिनेमा में जम गए तो हम भी बोल सकेंगे कि एक गीतकार को हम भी जानते हैं. मैंने पूछा; "तो कोई गीत लिखा है आपने?"
वे बोले; "सात दिन नैनीताल में बिता कर आया. ये सोचते हुए कि वहाँ की वादियों से लिखने की प्रेरणा मिलेगी. प्रेरणा मिली भी. गीत भी लिखे. लेकिन जैसा की हमेशा होता है, अच्छी चीजों की कीमत लोग नहीं पहचान पाते."
मैंने कहा; "अच्छी चीजों की कीमत लोग तुंरत तो सचमुच नहीं पहचानते. वैसे क्या हुआ आपके उन गीतों के साथ?"
वे बोले; "मैं एक प्रोडक्शन हाउस को अपने गीत भेजे. उनलोगों ने आउटराइट रिजेक्ट कर दिया."
मैंने पूछा; "क्यों? क्या गीत उन्हें अच्छे नहीं लगे?"
मेरे इस सवाल पर कमलेश जी के चेहरे पर दर्द उभर आया. इतना दर्द कि उससे वे मुकेश साहब के लिए कम से कम दो दर्द भरे नगमें लिख लेते. खैर, दर्द को सँभालते हुए बोले; "फ़िल्म प्रोड्यूसर को गीत में इस्तेमाल किए गए शब्द बकवास लगे. उन्होंने ये कहकर गीतों को रिजेक्ट कर दिया कि आजकल ऐसे गीत फैशन में नहीं हैं."
मैंने सोचा ऐसे कौन से शब्द थे जिन्हें पसंद नहीं किया गया. मैंने उनसे पूछा; "क्या शब्द उन्हें अश्लील लगे?"
कमलेश जी बोले; "आपतो मुझे जानते हैं. मैं कभी अश्लील शब्द इस्तेमाल कर सकता हूँ. ठीक है, व्यावसायिक होना चाहता हूँ लेकिन अश्लीलता तो मेरे लिए एकदम ही ना ना है. बात दरअसल ये हुई कि गीत में सजन, बलम, जान-ए-जनाना जैसे शब्द थे. मैंने ये सोचकर लिखे थे कि पुराने गानों का दौर लौटा लाऊंगा. लेकिन अब क्या कहें?"
मैंने कहा; "ये शब्द तो पहले भी फिल्मी गानों में इस्तेमाल हुए हैं. प्रोड्यूसर को इन शब्दों से गुरेज क्यों हुई?"
वे बोले; "आपको असल बात तो अभी बताया ही नहीं. प्रोड्यूसर साहब ने अपने कमेन्ट में लिखा है कि मेरे गीतों में पंजाबी शब्द एक भी नहीं हैं. और आजकल बिना पंजाबी शब्दों के गाना दो कौड़ी का. कह रहे थे वो ज़माना गया जब हिन्दी फिल्मों में हीरो सजन, बलम, सैयां वगैरह और हिरोइन जान-ए-जनाना और जोहरा-जबीं होती थी. आजकल हीरो मखना होता है और हिरोइन सोणिया."
मैंने कहा; "ठीक ही कह रहे हैं. बदलते समय की निशानियाँ हैं सब. वैसे क्या करेंगे अब? प्रोड्यूसर के हिसाब से गीत लिखेंगे?"
वे बोले; "और कर ही क्या सकते हैं? अगर गीतकार कहलाना है तो यह करना ही पड़ेगा. इसीलिए तैयारी में जुटे हैं."
इतना कहकर उन्होंने हाथ का कागज़ मेरी तरफ़ बढ़ा दिया. कागज़ देखने पर मुझे पंजाबी के करीब बीस-पचीस शब्द लिखे हुए मिले. मखना, सोणिया, चखणा, बल्ले-बल्ले, सावा-सावा, कुड़ी, मुंडा.....और न जाने क्या-क्या.
मैंने पूछा; "ओह, तो कागज़ शब्दों वाला है?"
वे बोले; " हाँ, ये कागज़ शब्दों वाला ही है. ये बीस-पचीस शब्द घोटने की कोशिश कर रहा हूँ. याद हो जाएँ तो इन्हें गानों में फिट करने की कोशिश करूंगा."
कागज़ देखते हुए मैं अनुमान लगाने की कोशिश कर रहा था कि हिन्दी सिनेमा कितना आगे निकल गया है? एक ज़माना था जब किसी फ़िल्म में पंजाबी किरदार भी हिन्दी और लखनवी उर्दू के शब्द यूज करते हुए गाना गाता था और आज यूपी का किरदार भी पंजाबी शब्दों वाले गाने गा रहा है.
ऐसे गानों से प्रोड्यूसर की बल्ले-बल्ले और सावा-सावा हो रही है.
मुझे अचानक साहब बीबी और गुलाम फ़िल्म की याद आ गई. मीना कुमारी जी ने इस फ़िल्म में शराब के नशे में गाना भी गाया है. अरे वही; "न जाओ सैयां, छुडा के बईयां..."
Friday, October 3, 2008
पोस्टर पर हीरोगीरी
हिन्दी सिनेमा के पोस्टर भी अपने साथ मनोरंजन का ढेर सारा सामान लेकर चिपकते थे. हीरोगीरी करता हुआ हीरो, और हिरोइनगीरी पर उतारू हिरोइन तो रहती ही थी, परम चिरकुटई करता हीरो का कामेडियन दोस्त भी पोस्टर से चिपकना नहीं भूलता था. इनलोगों से थोड़ी जगह सेव करके विलेन को एक बन्दूक के साथ छाप दिया जाता था. वो भी विलेन अगर रिसोर्सफुल रहा तो बन्दूक की जगह रॉकेट लांचर लेकर चिपकता था. इनलोगों से जितनी जगह बचती थी, उसमें प्रोड्यूसर और डायरेक्टर का नाम समा जाता था.
कुल मिलाकर बड़ा बम्फाट पोस्टर बनाया जाता था, पब्लिक को सिनेमा घर तक लाने के लिए. कई बार तो पोस्टर देखकर मन में सवाल आता है कि जितनी मेहनत पोस्टर पर की गई है, उतनी अगर फ़िल्म पर की गई होगी तो फ़िल्म हिट हो जायेगी.
लेकिन अब हिसाब थोड़ा अलग हो गया है. थोड़ा क्या, पूरा ही अलग हो गया है. अब बेचारे कामेडियन और विलेन के लिए जगह ही नहीं बची है. पूरे पोस्टर पर हीरो-हिरोइन का कब्जा हो चुका है. विलेन लोग भी अब बन्दूक वगैरह नहीं रखते. सिक्स पैक एब्स वाला हीरो रहता है. देखकर दर्शकगण समझ नहीं पाते कि ये हीरो हीरोगीरी पर उतारू है कि विलेनगीरी पर. कुल मिलाकर विकट कन्फ्यूजियाहट से जूझते दर्शक फिलिम के बारे में आईडिया नहीं लगा पाते.
ये तो हुई हिन्दी फिलिम के पोस्टरों की बात.
लेकिन फिलिम अगर भोजपुरी भाषा की रही तो? तो फिर भइया पोस्टरवा में और बहुत कुछ इनकार्पोरेट करना पड़ता है. तीन-चार पोज में हीरो-हिरोइन, दो पोज में विलेन, तीन पोज में हीरो का माई-बाबू और दो पोज में आइटम गाना पर डांस करने वाली लड़की. लेकिन एक बात और है. ई फोटो-सोटो से भोजपुरी सिनेमा का पोस्टर पूरा नहीं होता. नीचे में कम से पाँच गाना का पहिला दू लाइन. मतलब कुल मिलाकर दस लाइन का जगह खाली गाना खातिर. अब ई पाँच गाना में से कम से कम दू गाना तो डबल मीनिंग वाला रहता है. साथ में म्यूजिक डायरेक्टर का नाम और गाना लिखने वाले का नाम.
देखकर लगता है जैसे डायरेक्टर पोस्टर पर ही पूरा फिलिम देखाने का कोशिश किया रहा लेकिन थोड़ा सा जगह कम पड़ गया. इसलिए पूरा फिलिम देखने के लिए सिनेमा हाल में पधार ल्यो.
हाल ही में एक बांगला फ़िल्म का पोस्टर देखा. फ़िल्म का नाम था 'लव'. अंग्रेज़ी नाम पर मत जाइये, फ़िल्म पूरी तरह से बांग्ला में है. और आजकल बांग्ला में भी लव ही होता है, प्रेम नहीं होता. टीवी पर इस फ़िल्म के बारे में चर्चा सुनी थी. डायरेक्टर बता रहे थे कि टीन-एज लव स्टोरी है. मतलब ये कि हीरो-हिरोइन स्कूल या फिर कालेज में पढ़ते होंगे.
अब ये टीन-एज लव स्टोरी बनाने का मामला बड़ा उलझा हुआ रहता है. कारण है लगभग सारे हीरो तीस साल से ऊपर के हैं. अब उन्हें कैसे टीन-एज कैसे बनाएं? इसी फ़िल्म के हीरो को देखकर लगता है कि कम से कम पैंतीस साल का है. आंखों के नीचे या बड़े-बड़े आई बैग. हिरोइन भी देखने से तीस साल से कम की नहीं लग रही. मेकअप करने की बावजूद. कैसे बनाएं इनदोनों को टीन-एज?
शायद इन्ही सवालों के जवाब के लिए क्रिएटिव डायरेक्टर रहता होगा. ऐसे ही कठिन समय में उसकी ज़रूरत पड़ती होगी. पहले प्रयास के तहत हीरो को टीन-एज बनाने के लिए उसे लाल रंग का जैकेट पहना दिया जाता है. साथ में जींस. लेकिन ये क्या? अब भी हीरो टीन-एज नहीं लग रहा. अब क्या करें? अच्छा ठीक है, एक काम करो, इसके हाथ में एक गिटार थमा दो. अब देखो, कैसा लग रहा है? थोड़ा-थोड़ा टीन-एज लगने लगा है.
यही हाल हिरोइन के साथ भी है. हिरोइन को देखकर लग रहा है कि ये तो तीस साल की है. मेकअप के बावजूद आंखों के नीचे झुर्री दिखाई दे रही है. अब क्या करें? एक काम करो, इसके हाथ में एक टेडी बीयर थमा दो. अब देखो, कुछ टीन-एज लग रही है? नहीं लग रही है! एक काम करो, इसे छोटी सी साईकिल पर बैठकर इसका एक फोटो ले लो. हाँ, अब ठीक है. अब ये टीन-एज लग रही है.
पहले प्रदीप कुमार जी को भी देख चुके हैं. वो भी कालेज से टॉप करके निकलते हुए. अब सोचिये कि प्रदीप कुमार जी कालेज से टॉप करके निकल रहे हैं. मुझे भीगी रात फ़िल्म याद है. उसमें कालेज से ताजा-ताजा निकले प्रदीप कुमार जी, मीना कुमारी जी से इश्क फरमाते हैं. एक सीन में अशोक कुमार जी को बताते हैं; "मैं कालेज में निशानेबाजी में चैम्पियन था."
बात आगे बढ़ती है. एक जगह तैरने की बात होती है. वहां भी वही बखान; "आपको शायद मालूम नहीं कि मैं कालेज में तैराकी का चैम्पियन था." मतलब ये कि खेल का नाम ले लो. जितने खेल का नाम लोगे, मैं सब में चैम्पियन. चैम्पियन होने का ये हाल कि; " आपको शायद मालूम नहीं कि मैं पढाई में भी चैम्पियन था."
समझने की बात ये कि चैम्पियन होने का कॉपी राईट्स थोक में इनके ही पास था.
उनदिनों हीरो के इतने बड़े चैम्पियन होने के बावजूद पोस्टरों पर उन्हें हाथ में किताब लेकर कालेज जाते नहीं दिखाया जाता था. शायद प्रोड्यूसर को मालूम था कि ऐसा करने से फ़िल्म का फ्लॉप होना तय था. लेकिन अब समय बदल गया है. अब तो हीरो जो कुछ भी कर सकता है (या नहीं भी कर सकता है), उसे पोस्टर पर दिखाया जाना ज्यादा ज़रूरी है.
Thursday, November 8, 2007
एक फिल्मी पोस्टर का पोस्टमार्टम
युधिष्ठिर के मन वाले प्रसंग की बात आज भी याद आ गई. उनकी एक लाख स्वर्ण-मुद्राओं वाली बात कि; 'मन सबसे तेज होता है.' कल की बात बताता हूँ. मैं और मेरा मित्र सुदर्शन साथ में घर लौट रहे थे.
रास्ते में शाहरुख़ खान से मुलाक़ात हो गई. पोस्टर पर चिपके खड़े थे. बड़े-बड़े बाल.शरीर पर कोई वस्त्र नहीं. एक कंधे पर रस्सी टाँगे हुए. सिर पर कोयला खदानों के मजदूर वाला हेलमेट. पोस्टर पर लिखा हुआ था ॐ शान्ति ॐ.अब देखिये, मन कैसे भागता है. पोस्टर देखकर मैंने कहा; "शायद कोयला खदानों के मजदूरों के जीवन पर आधारित फ़िल्म है."
सुदर्शन ने कहा; "मुझे नहीं लगता. आपको मालूम है कि नहीं, इस फ़िल्म में डिस्को पर आधारित गाना है. फिर फ़िल्म कोयला खदानों के मजदूरों पर कैसे आधारित हो सकती है?"
मैंने कहा; "क्यों नहीं हो सकती. इसके पहले भी कोयला खदान के मजदूरों को हमने गाना गाते देखा है. हमने काला पत्थर में देखा है." मुझे लगा सुदर्शन मेरी बात मान गया.
फिर सुदर्शन ने कुछ सोचते हुए पूछा; "अच्छा, यही फ़िल्म है जिसमें शाहरुख़ खान ने सिक्स पैक ऐब्स दिखाए हैं?"
"हाँ यही फ़िल्म है. देखने से लगता है, फ़िल्म में ऐब ही ऐब है"; मैंने उसे बताया.
सुदर्शन ने कहा; "जो भी बोलिए, शाहरुख़ खान का ये अंदाज़ मुझे अच्छा नहीं लगा. बड़े-बड़े बाल और नंगे बदन वाले शाहरुख़ को देखकर मुझे लगा जैसे जंगल बुक वाले मोगली को देख रहा हूँ."
मुझे बड़ी हँसी आई. लेकिन मुझे मेरे मित्र की बातों में दम लगा. बड़े-बड़े बालों और बिना कपडे के शाहरुख मोगली की तरह ही दिखते हैं. फिर मैंने सोचा, 'कितने पुराने हो गए हैं हम लोग. एक फिल्मी हीरो की जिस बाडी को देखकर पूरा भारत खुश हो रहा है हमें उसमें मोगली नज़र आ रहा है. हम क्या ज़माने के साथ नहीं चल सकते?

बात आगे चली और सुदर्शन ने कहा;"इसका एक गाना, 'दिल में मेरे है दर्द-ए-डिस्को', बहुत हिट हो गया है।"
फिर क्या था. मन इस बात की तहकीकात में चला गया कि दर्द-ए-डिस्को क्या होता है. मैंने सोचा; 'डिस्को का दर्द तो पाँव में होना चाहिए. ये तो नई बात हो गई कि डिस्को का दर्द दिल में हो रहा है. अरे, आदमी डांस करेगा तो पाँव थकेंगे. दर्द पाँव में होगा. लेकिन अजीब बात है कि इस हीरो के दिल में दर्द हो रहा है.'
फिर भी मैंने कहा; "शायद हीरो ठीक से डिस्को न कर पाता होगा, इसलिए उसका दिल दुखता होगा." फ़िल्म के बाकी पहलुओं पर बात हुई. अंत में बात फ़िल्म की टाईटल पर आ गई. सुदर्शन ने कहा; "अजीब टाईटल है.ॐ शान्ति ॐ. कहीं ये कोई धार्मिक फ़िल्म तो नहीं?"
मैंने मन ही मन सोचा कि फ़िल्म धार्मिक नहीं हो सकती. अभी तक तो किसी संगठन ने कोई बवाल खडा नहीं किया. फ़िल्म अगर धार्मिक होती तो कुछ न कुछ बवाल जरूर खडा हो जाता अब तक. धार्मिक या धर्मनिरपेक्ष 'ताकतों' की तरफ़ से कुछ न कुछ बात जरूर सामने आती. सोचते-सोचते मैंने सुदर्शन को अपने मन में आई बात बताई; "हो सकता है फ़िल्म के अन्तिम दृश्यों में कोयले की खदान में आग लग गई होगी. उसे बुझाने के लिए किसी तांत्रिक का सहारा लिया गया होगा जिसने ॐ शान्ति ॐ नामक मन्त्र का जाप करके आग बुझाई होगी."
ये तो हुई हमारे मन की बातें जो एक फिल्मी पोस्टर देखकर उपजीं. आपने भी पोस्टर देखा ही होगा. आपके मन में भी कुछ बातें अवश्य आईं होगी. वो बातें क्या थीं, ज़रा बताईयेगा तो!
पोस्ट की प्री-पब्लिश टिप्पणी - मुझे तो मालूम भी न था कि यह ॐ शान्ति ॐ क्या बला है। पर शिव की पोस्ट का ड्रॉफ्ट देख कर इण्टरनेट छाना तो पता चला कि यह फिल्म अभी प्रदर्शित भी नहीं हुई। नौ नवम्बर को होगी। मूवी के लिये बदन की मछलियाँ बनाने को एसआरके ने बहुत मेहनत की है और प्रकाश पदुकोण की पुत्री पहले ही प्रसिद्धि पा चुकी है। यह फिल्म प्री-पब्लिकेशन कमाई भी कस के कर चुकी है। जब इतना ज्ञानार्जन कर ही चुका हूं, तो अपने फिल्म ज्ञान को पोस्ट की प्री-पब्लिश टिप्पणी में ठेल ही सकता हूं! वैसे इससे कहीं ज्यादा और कहीं रोचक पाठक जानते होंगे, जो पोस्ट-पब्लिश टिप्पणियों में उद्घाटित होगा! - ज्ञानदत्त पाण्डेय
चित्र फिल्म की वेब साइट और बॉलीवुड.कॉम से।
Friday, October 19, 2007
एक फिल्मी पोस्ट: प्यार में बड़ी ताक़त होती है
वे देवनागरी लिपि के पत्रकार हैं। टीवी चैनल पर 'लीपते' रहते हैं। कल मिल गए। चेहरे पर खुशी की कई सारी सामानांतर रेखाओं के साथ। दुआ-सलाम के बाद मैंने पूछा; "क्या बात है, आज बड़े खुश नजर आ रहे हैं|"
बोले; "हाँ भाई, खुशी की बात तो है ही।"
मैंने पूछा; "क्या हुआ, राशन कार्ड बन गया क्या?"
बोले; "छोटा आदमी मुँह खोलेगा तो छोटी बात ही करेगा।"
उनकी बात सुनकर में स्पॉट पर ही दुखी हो लिया। लेकिन मेरी भी गलती नहीं थी। मुझे राशन कार्ड का बन जाना सबसे कठिन और खुशी देने वाला काम लगता है। फिर भी मैंने अनुमान लगाते हुए कहा; "शायद प्रधानमंत्री की इफ्तार पार्टी कवर कर आए हैं|"
बोले; "इफ्तार-उफ्तार तो कोई भी कवर कर लेता है। मैं तो कुछ और ही कवर कर आया आज|"
मेरी उत्सुकता बढ़ गई। मैंने कहा; "ठीक है। चलिए आप ही बता दीजिये।" मुझे डर था, कहीं एक और अनुमान लगाकर अपने छोटेपन का कोई और सबूत न दे डालूँ।
बोले; "तुमको नहीं मालूम? करीना कपूर और सैफ अली खान में प्रेम हो गया।"मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। मैंने उनसे कहा; "लेकिन करीना कपूर तो रणधीर कपूर की बेटी हैं."
बोले; "तो क्या हुआ। रणधीर कपूर की बेटियों को प्यार करने की मनाही है क्या?"
मैंने कहा; "नहीं मनाही क्यों होगी. लेकिन ये करीना कपूर तो शाहिद कपूर के साथ प्यार करती थीं।"
मुझे बड़ा अजीब लगा । कोई किसी से प्यार करे या किसी से प्यार तोड़े। इसमें टीवी वालों को खुशी क्यों होने लगी। मैंने उनसे पूछा; "तो इसमें आपलोगों को खुशी हुई, ये बात समझ में नहीं आई।"
मैंने वजह पूछी तो बोले; "ये करीना कपूर जब देखो टीवी चैनल पर शाहिद कपूर के साथ ही दिखाई देती थी। दोनों एक दूसरे की बड़ाई कर के जनता के साथ-साथ हमें भी बोर करते थे। पिछले तीन महीनों से फिल्मी दुनिया में कोई ख़बर ऐसी नहीं थी, जिसे बढ़िया कहा जा सके। ये तीन महीने की बोरियत आज जाकर ख़त्म हुई।"
मैंने कहा; "लेकिन फिल्मी दुनिया में और भी तो बढ़िया खबरें हैं। आजकल तो फिल्में भी हिट हो रही हैं। उसके बारे चर्चा कीजिये। भारतीय सिनेमा अब विदेशों में धूम मचा रहा है, उसके बारे में चर्चा कीजिये।"
बोले; "फिल्मों के बारे में चर्चा उतनी हिट नहीं होती जितनी फ़िल्म वालों के बारे में। जब से अमित जी ने अपनी किसानी वाली जमीन उस ग्राम सभा को वापस की है, उनके बारे में भी कुछ कहने का मौका नहीं मिल रहा था। शाहरुख खान की 'सिक्स पैक' वाली बाडी भी अब पुरानी हो चली थी। करन जौहर के बारे में सुन-सुन कर लोग बोर हो रहे थे। लेकिन सैफ अली खान और करीना ने प्यार करके हमें बचा लिया।"
बोले; "जरूर जरूर। मैं तुमको बताऊँगा। अभी तो मैं जाता हूँ। आज पार्टी में जाने की तैयारी करनी है।" इतना कहकर वे चले गए।
