कहते हैं मंत्री जी ने बेटी की शादी के लिए सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग कर लिया। अब इसमें आश्चर्य कैसा? सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग अगर न हो, तो किसे विश्वास होगा कि वह सरकारी है? बेसरकारी मशीनरी का दुरुपयोग कभी होता है क्या? वैसे भी बेटी की शादी करना आसान काम है क्या? कहते हैं गंगा में जौ बोने के सामान है बेटी की शादी करना। और यह आज से नहीं, हजारों वर्षों से गंगा में जौ बोने के ही सामान रहा है। कभी किसी को कहते हुए नहीं सुना कि बेटी की शादी करना मतलब गंगा में धान बोना। बड़ी उथल-पुथल होती है तब जाकर बेटी की शादी हो पाती है। ये मंत्री लोग तो जनता के सेवक हैं, ऐसे में इनकी बात जाने दें, राजा-महाराजा के लिए भी यह काम ईजी नहीं रहा कभी। याद करें महाराज जनक को, महाराज ध्रुपद को। इतने बड़े राजाओं को भी कितने पापड़ बेलने पड़े थे बेटियों की शादी करने के लिए, यह न तो बाल्मीकि जी से छिप सका और न ही व्यास जी से।
खैर फिर से सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग हुआ इसलिए फिर से लोग चाहते हैं कि मंत्री जी इसके लिए नैतिक जिम्मेदारी लें और इस्तीफ़ा वगैरह दें। क्या मजाक है? इस्तीफ़ा न हुआ बीड़ी हो गई कि सरजू साहु ने माँगा और मंत्री जी ने टेंट से निकलकर थमा दिया। गोस्वामी जी ने खुद लिखा है; "बड़े भाग मंत्री पद पावा।" क्या कहा? गोस्वामी तुलसीदास ने नहीं लिखा? तो फिर नीरज गोस्वामी जी ने लिखा होगा। बढ़िया लिखने के लिए केवल दो गोस्वामी जाने जाते हैं भारतवर्ष में।
लेकिन असल सवाल यह है कि एक मंत्री से नैतिक जिम्मेदारी ले लेने की मांग जायज है क्या? यह तो वही बात हो गई कि आप शेर से डिमांड करें कि वह वेजिटेरियन हो जाए। अमेरिका से डिमांड करें कि वह बाकी के देशों में अपनी नाक घुसाना बंद करे दे। पाकिस्तान से डिमांड करें कि वह आतंकवाद को बढ़ावा देना बंद करे दे। बैंको से डिमांड करें कि उसके टेलिकालर लोन की मार्केटिंग करने के लिए फोन न करें। सचिन से डिमांड करें कि वे रिटायर हो जाएँ। अब ऐसे में मंत्री जी अगर नैतिक जिम्मेदारी नहीं लेंगे तो और क्या कर सकते हैं? क्या मरदे, ये भी कोई सवाल है? ऐसे कठिन समय में रेफरेंस के लिए ही मंत्री वक्तव्य मैन्युअल है। तमाम वक्तव्यों से लदा पड़ा। साठ-पैंसठ वर्षों की केस स्टडी करके बनाया गया मैन्युअल। हर तरह के आरोपों के जवाब वाला मैन्युअल। मंत्री जी को तमाम संभावनाओं से लैस करने वाला। वे मैन्युअल बांचें और उसमें से जिस वक्तव्य को पढ़ने में मज़ा आया, उसे दे दें। जब वक्तव्य है तो इस्तीफ़ा देने जैसा तुच्छ काम मंत्री टाइप लोग करें तो लानत है उनके मन्त्रीपन पर।
मैन्युअल बांचकर वे कह सकते हैं कि "हमारे ऊपर लगाए गए आरोप झूठे हैं।" ये कह सकते हैं कि ;"आरोप लगाकर हमें बदनाम किया जा रहा है।" कह सकते हैं कि ;"विरोधियों की साजिश के तहत ऐसा किया जा रहा है।" इन सबके ऊपर यहाँ तक कह सकते हैं कि; "कोई भी इन आरोपों की जांच कर सकता है। मुझे इस देश के कानून पर पूरा भरोसा है।"
जी हाँ देश के कानूनों पर मंत्री जी टाइप लोगों का जितना भरोसा है उतना किसी का है क्या?
परन्तु सवाल यह भी है कि ऐसे तुच्छ आरोपों के लिए ये सारे ऑप्शन्स क्या बहुत मेहनत वाले नहीं हैं? इतने बिजी मंत्री जी के पास इतना कुछ कहने का समय बहुत मुश्किल से मिलता है। ऐसे में सबसे सरल काम है एक क्लीन चिट ले लेना। अब कौन इतना बोलकर मेहनत करे? वैसे भी जो मज़ा क्लीन चिट लेने में है वह जवाब देने में है कहाँ? जब से यह क्लीन चिट वाला ऑप्शन चलन में आया है, देश का फायदा ही फायदा हुआ है। इस ऑप्शन को लाकर देश के खजाने पर इतना बड़ा एहसान किया जा रहा है कि वित्तमंत्री अगला आम बजट पेश करते समय गृह मंत्रालय का खर्च पचास प्रतिशत तक कम कर सकते है। कमीशन बैठाओ, पैसे खर्च करो, कमीशन की समय सीमा बढाने के लिए बैठकें करो, उसे कम से कम दस साल का समय दो तब जाकर एक अदद रिपोर्ट की प्राप्ति होती है। और यहाँ एक क्लीन चिट की वजह से इतना सारा कुछ करने की जरूरत ही नहीं है।
मैं तो कहता हूँ कि यह क्लीन चिट सरकारी विभागों के घोटालों की जांच पर होनेवाले खर्च को रोकने के लिए संजीवनी सामान है। लोग भले ही शिकायत करें कि सरकारी लोग राज-काज चलाने के लिए नए आईडिया नहीं लाते लेकिन सच यही है कि पिछले वर्षों में सरकारी विभागों ने क्लीन चिट इश्यू करके देश का हजारों करोड़ रुपया बचाया है। ऐसे में मैं तो शिकायत करनेवालों पर लानत भेजता हूँ। मेरा तो मानना है कि जिस तरह से सी बी आई, इनकम टैक्स, कस्टम, एक्साइज, आई बी, ईडी, विदेश मंत्रालय, गृह मंत्रालय, कोयला मंत्रालय, खेल मंत्रालय, रेल मंत्रालय, मुख्यमंत्रालय, इसरो, उसरो, योजना आयोग, पुलिस आयोग, लोकायुक्त, पुलिस आयुक्त, राज्य सरकार, केंद्र सरकार, अरविन्द केजरीवाल, अन्ना हजारे वगैरह ने क्लीन चिट इश्यू कर के आरोपियों को ईमानदार साबित कर दिया है, कई बार लगता है कि हिटलर बेवकूफ था। उसने आत्महत्या क्यों की? अपने ऊपर लगने वाले आरोपों पर उसे क्लीन चिट लेकर मामला सलटा देना था।
फिर मन में आता है कि हिटलर क्लीन चिट कैसे लेता? इसका आविष्कार तो भारत में हाल में हुआ। अविष्कार समय पर न हुआ तो एक आदमी को अपनी जान गंवानी पडी।
क्लीन चिट इश्यू करने की गति से यही लगता है कि आनेवाले समय में चुनाव आयोग भी प्रत्याशी के इनकम वगैरह के रिकार्ड की डिमांड नहीं करेगा। उसका काम बस क्लीन चिट ले-देकर हो जायेगा। किसी ने किसी के ऊपर आरोप लगाया तो वह फट से किसी डिपार्टमेंट से क्लीन चिट लेकर मामला ख़त्म कर लेगा। अगर भ्रष्टाचार विरोधी लोग प्रेस कान्फरेन्स करके घोषणा करेंगे कि वे किसी के ऊपर आरोप लगाने वाले हैं लेकिन यह नहीं बताएँगे कि किसके ऊपर आरोप लगायेंगे, तो एक साथ कई लोग क्लीन चिट ले सकते हैं। उधर भ्रष्टाचार विरोधी ने आरोप लगाया और इधर आरोपी ने क्लीन चिट उसके मुंह पर मारा। तुरंत दान महा कल्यान। जिन्होंने इस डर से क्लीन चिट ले ली है कि हो सकता है आरोप उनके ऊपर लगने वाले हैं, उनका क्लीन चिट बेकार जाने का भी चांस नहीं। वे उसको अपने पास रख लेंगे और जब उन्हें आरोप-गति की प्राप्ति होगी तो उनके काम आ जाएगा।
जिसे भी इस बात की शंका होगी कि उसके ऊपर आरोप लग सकते हैं वह एंटीसिपेटरी क्लीन चिट ले सकता है। जिसे यह लगे कि जबतक वह मंत्री है तबतक उसके ऊपर आरोप नहीं लगेंगे लेकिन सरकार बदलने के बाद लगने के चांस हैं वह पहले से यह कह कर अप्लाई कर सकता है कि उसे दो साल या ढाई साल बाद क्लीन चित की ज़रुरत है। जिस तरह से सोशल मीडिया में मंत्रियों के बेटों और नेताओं के दामादों के खिलाफ आरोप लगाये जा रहे हैं और आरोप लगाने वालों को गिरफ्तार किया जा रहा है, यह क्लीन चिट वाला सिस्टम उसके भी काम आ सकता है। मंत्री जी का बेटा क्लीन चिट लेकर उसे स्कैन करके सोशल मीडिया में आरोप लगानेवाले के नाम अपनी ट्वीट के साथ सेंड कर देगा। आरोप लगनेवाले को गिरफ्तार करनेवाली पुलिस के पास और समय रहेगा और वह बलात्कारियों को धरा करेगी। हाल यह होगा कि मंत्री टाइप लोगों के घर में क्लीन-चिट शो-केस में बाकायदा इस तरह से रखी जायेंगी जैसे सचिन के घर में शो-केस में मैं ऑफ़ द मैच की ट्राफी रखी गई होगी। नेता टाइप प्राइवेट परसन जेब में नोटों की जगह क्लीन चिट रखा करेंगे। क्या पता कब ज़रुरत पड़ जाए।
आगे चलकर अगर सरकार को लगे कि वह पर्याप्त मात्रा में क्लीन चिट की डिमांड को पूरा नहीं कर पा रही है तो वह क्लीन चिट मंत्रालय भी खोल सकती है। अगर उसे लगे कि क्लीन चिट की उपलब्धता में दिक्कत आ रही है तो वह इंटर-मिनिस्टीरियल पैनल ऑन क्लीन चिट मैनेजमेंट बना सकती है। अगर यह लगे कि सरकार के पास समय पर क्लीन चिट डिलीवर करने के लिए वर्क-फ़ोर्स नहीं है तो फिर एन जी ओ को इस काम में लगाया जा सकता है। देखेंगे कि सलमान खुर्शीद के जिस एन जी ओ ने विकलांगों की बैशाखियाँ और हियरिंग एड नहीं बांटी, वही कल क्लीन चिट बांटेगा। अगर सरकार को यह लगेगा कि क्लीन चिट पर्याप्त मात्रा में समय पर इश्यू नहीं हो पा रही हैं तो गृह मंत्रालय के तहत वी आई पी डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम का नेटवर्क बना सकती है।
कहते हैं कोई उद्योग फूले-फले उसके लिए ऍफ़ डी आई का होना ज़रूरी है। ऐसे में ज़रुरत पड़ने पर सरकार क्लीन चिट सेक्टर में ऍफ़ डी आई भी ला सकती है। अगर सरकार चाहेगी तो क्लीन चिट वाले इस आईडिया का पेटेंट करवाकर रख लेगी और आनेवाले समय में यह आईडिया विदेशी सरकारों को फीस लेकर मुहैय्या कराएगी।
कुल मिलाकर बड़ी बिकट ईमानदारी लहराएगी और फिर अबतक आर टी आई एक्ट लाने के लिए क्रेडिट लेने वाले राहुल गांधी क्लीन चिट लाने के लिए भी कांग्रेस पार्टी को न सिर्फ क्रेडिट देंगे बल्कि कहकर लेंगे भी।
Tuesday, November 6, 2012
मंत्री वक्तव्य मैन्युअल और क्लीन चिट
Thursday, October 18, 2012
ईमेज को बढ़ावा देनेवाली कैबिनेट कमिटी...
टेबिल पर अखबारों की ढेर सारी कटिंग्स पड़ी हैं। प्रधानमंत्री ने उन्हें उलट-पलट कर देखा। शायद उन्हें लगा की फिर से देखना चाहिए। उन्होंने उन्हें फिर से उलटा-पलटा। कुछ सोचने का उपक्रम किया। इसके तहत उन्होंने आफिस की सीलिंग को निहारा। उसके बाद शायद उन्हें लगा कि एक बार टेबिल को देखकर भी सोचा जाय। उन्होंने वह भी किया।
सबकुछ करने के बाद संतुष्ट नहीं दिखे। सचिव से मुखातिब हुए। बोले; "ये हेल्थ मिनिस्टर जी की वही फोटो पोलिओ टीकाकरण अभियान के लिए छपी जो पिछले साल छपी थी। मिनिस्ट्री ने नई फोटो भी नहीं छपवायीं? सालभर पहले जिस बच्चे को दवा पिलाते हुए फोटो खिचाई थी, वही बच्चा इस साल वाली फोटो में भी है। ऐसा क्यों? क्या देश में बच्चों की कमी है?"
सचिव बोले; "सर, बच्चों की कमी तो नहीं है लेकिन मेरा ख़याल है कि मंत्री जी बहुत बिजी होंगे इसलिए उन्हें फोटो खिंचाने का समय नहीं मिला होगा।"
प्रधानमंत्री; "हेल्थ मिनिस्टर इतने बिजी किसलिए होंगे? क्या वे खुद ही पोलिओ टीकाकरण के लिए बच्चों को दवा पिलाते हैं?"
सचिव; "हे हे हे ..सर अगर ऐसा होता तब तो फोटो खिंच ही जाती।"
प्रधानमंत्री; "तब किसलिए समय नहीं मिला उन्हें?"
सचिव; "सर पिछले छ महीने में मंत्री जी को पांच बार अपने बयानों को लेकर बीस सपष्टीकरण देने पड़े। उसके बाद और भी काम में बिजी रहना पड़ा उन्हें।"
प्रधानमंत्री; "अपने मंत्रालय के अलावा एक मंत्री और कहाँ बिजी रहेगा? और कुछ नहीं तो किसी ब्लड-डोनेशन कैम्प का उद्घाटन करके खून देते हुए ही फोटो खीचा लेते। जिस पार्टी के पहले प्रधानमंत्री पंडित जी थे, उसी पार्टी की सरकार आज ईमेज बिल्डिंग नहीं कर पा रही है। हम पंडित जी तक को भूलते जा रहे है। हमें उनसे सीखना चाहिए कि ईमेज बिल्डिंग होती क्या है? रक्तदान करते हुए उनकी छ दर्जन तसवीरें तो खुद मैंने देखी हैं। "
सचिव; "सर, वो समय अलग था। पंडित जी इतना काम करते थे फिर भी रक्तदान करते हुए फोटो खिचाने का टाइम मिल जाता था उन्हें। सर, जो बिजी रहता है वह समय निकाल ही लेता है। वैसे सर, याद दिला दूँ कि आपने ही तो तेलंगाना मुद्दे को संभालने के लिए मंत्री जी को कहा था। पिछले आठ महीने में कुल ग्यारह बार उन्हें हैदराबाद जाना पड़ा। फिर जगनमोहन रेड्डी को मनाने का काम भी तो उन्ही के जिम्मे था। सर, मुझे लगता है कि ये जगनमोहन रेड्डी वाला मामला नहीं फंसा होता तो और कुछ नहीं तो मंत्री जी की नई फोटो तो ज़रूर खिंच जाती।"
प्रधानमंत्री; "अरे हाँ, तब तो वे सचमुच बहुत बिजी थे। आपका कहना सही है। ये फोटो नहीं खींचे जाने के पीछे जगनमोहन रेड्डी ही जिम्मेदार हैं। लेकिन वो काम भी ज़रूरी है। अगर इसी तरह से चला तो सरकार की ईमेज नष्ट हो जाएगी। वैसे ये सिविल एवियेशन की भी कोई ऐसी तस्वीर नहीं दिखाई दे रही जिसे देखकर लगे कि वे कुछ काम के आदमी हैं। एयर इंडिया के लिए नया एयर-लाइनर आया लेकिन उसके साथ भी उनकी एक फोटो नहीं है? नए एयर्लाइनर की अखबारों में जो फोटो छपी हैं उनमें मिनिस्टर कहीं दिखाई ही नहीं दिए।
सचिव; "जब एयर लाइनर की डिलीवरी हुई, उस समय मंत्री जी किंगफिशर को संभालने में लगे थे। एयर इंडिया के लिए नए फंड भी रिलीज करवाने थे। फंड नहीं रिलीज होते तो स्टाफ को सैलेरी नहीं मिलती।"
प्रधानमंत्री; "क्या फायदा हुआ? फिर भी तो किंगफिशर का कुछ नहीं हुआ। मैं कहता हूँ मंत्रालय का काम-धाम तो वैसे ही नहीं हो रहा है, ऐसे में जांच के बहाने किसी एयरक्राफ्ट की कॉकपिट में बैठकर फोटो खिचाने में क्या जाता है? और ये शिक्षा मंत्री की क्या रिपोर्ट है?"
सचिव; "सर कोई रिपोर्ट नहीं है। कई महीने हो गए उन्होंने प्राईमरी एडुकेशन तक पर चिंता व्यक्त नहीं की।"
प्रधानमंत्री; "प्राइमरी एडुकेशन पर किसी सेमिनार वगैरह का उद्घाटन तो किया होगा?"
सचिव; "नहीं सर, पिछले छ महीने में तो ऐसा भी कुछ नहीं हुआ।"
प्रधानमंत्री; "बड़े मीडिया हाउस के सेमिनार में बोलने के लिए ये लोग हमेशा तैयार रहते हैं। मैं कहता हूँ किसी स्कूल का बिना बताये दौरा ही कर लेना चाहिए था। दो-चार टीवी चैनल वालों को लेकर किसी स्कूल की वर्किंग देखने के बहाने ही फोटो खिंचा लेते। ग्रेडिंग की बात की थी तो देशवासियों को बहस करने का बहाना मिल गया था। उसके बाद उन्होंने कुछ किया ही नहीं।"
सचिव; "नहीं सर, उसके बाद ही तो आई आई टी वाला मसला खड़ा किया था उन्होंने।"
प्रधानमंत्री; "अरे एक मसला कितने दिन बहस-प्रेमी जनता को बिजी रखेगा? और नया मसला खड़ा नहीं करेंगे तो जनता को भी नहीं लगेगा कि सरकार काम कर रही है। वहीँ फिनांस मिनिस्टर को देखो, उन्होंने ऍफ़ डी आई का मसला खड़ा करके कुछ तो राहत पंहुचाई। एडुकेशन मिनिस्टर पिछली बार आकाश टैबलेट के साथ दिखे थे। कितना पुराना मामला है। टैबलेट फेल हो गया, इम्प्रूव्ड आकाश आने का समय हो गया लेकिन एक भी नई फोटो दिखाई नहीं दी उनकी।"
सचिव; "अब सर, पाँचों उंगलियाँ एक सामान तो नहीं होती। वैसे भी वित्तमंत्री जितने काबिल सारे मंत्री तो नहीं हो सकते न। वैसे भी सर यही दोनों तो स्कैम की बात होनेपर प्रेस कान्फरेन्स करते हैं। कैसे समय मिलेगा? सर, आपसे एक बात कहनी थी कि सड़क और यातायात मंत्री के बारे में आई बी की रिपोर्ट है कि सोशल मीडिया पर लोग उनके एक दिन में बीस किलोमीटर सड़क वाले प्लान की बड़ी हंसी उड़ाते है। "
प्रधानमंत्री; "हंसी नहीं उड़ायेंगे? मैं कहता हूँ न्यूजपेपर में मंत्रालय का विज्ञापन लगाने में क्या जाता है? और कुछ नहीं तो किसी दिन का सेलेक्शन करके सड़क विकास दिवस ही मना लेना चाहिए था। हाथ में कुदान और सर पर इंजिनियर की हैट पहनकर फोटो खिचाने में कितना टाइम लगता है? पंडित जी हर दो महीने में कारखाने का दौरा करके हाथ में कुदान और इंजीनियर्स कैप पहनकर फोटो खींचा लेते थे। आज भी वो तसवीरें ईमेज बिल्डिंग के लिए किसी को भी इंस्पायर कर सकती हैं। लेकिन जब हमीं उनका अनुसरण नहीं कर सकते तो औरों से कैसे आशा करें?"
सचिव; "सर, पंडित जी की बात ही कुछ और थी। सर, याद कीजिये कि कैसे वे नॉर्थ -ईस्ट जाकर वहां की पारंपरिक पोशाक में नाचते हुए फोटो खीचा आते थे। आज भी उन तस्वीरों को देखकर लगता है जैसे अभी बोल पड़ेंगी। सर ये वाली तस्वीर ही देखिये। ये उन्होंने मणीपुरी महिलाओं के साथ नाचते हुए खिचाई थी। और ये वाली देखिये सर, कैसे बच्चे को गोद में लिए वात्सल्य रस की बृष्टि कर रहे हैं। उनके साथ खड़े बच्चे कित्ते तो हैपी हैं। मैं कहता हूँ सर, आज भी कोई चाहे तो बहुत कुछ सीख सकता है इन तस्वीरों से।"
प्रधानमंत्री; "अब क्या कहें? कहते हैं चिराग तले अँधेरा होता है। बस हमारी सरकार की हालत वैसी ही हो गई है। आज जब हमें जरूरत है कि हम पंडित जी और इंदिरा जी की ईमेज बिल्डिंग के तरीकों से कुछ सीखें, हमीं चूक जा रहे हैं। रूरल डेवेलपमेंट मिनिस्टर की एक तस्वीर ऐसी नहीं जिसमें वे किसानों की सभा को संबोधित कर रहे हों। मैं कहता हूँ रूरल एरिया में नहीं जाना हो, मत जाओ लेकिन क्या दस -पांच किसानो को दिल्ली बुलाना बहुत कठिन काम है? उनको यहाँ बुलाकर तो फोटो खिंचवा ही सकते हैं।"
सचिव; "सही कह रहे हैं सर। उनसे अच्छे तो कृषि मंत्री हैं। अभी परसों दुबई से आई सी सी की मीटिंग करके लौटे लेकिन कल ही बारामती जाकर किसानों की सभा को संबोधित कर डाला। ये देखिये सर, पगड़ी में कित्ते फब रहे हैं।"
प्रधानमंत्री; "इसीलिए तो मैं पवार साहब की बड़ी इज्जत करता हूँ। इतनी उम्र हो गई उनकी लेकिन आज भी किसान लगते हैं। अब और किसकी बात करूं? अब तो हाल ये है कि रेलमंत्री को आजकल कोई झंडा दिखाकर गाडी रवाना करते नहीं देखता। शासन करने के इतने अच्छे-अच्छे तरीके थे हमारे पास लेकिन वही आज कहीं दिखाई तक नहीं देते।"
सचिव; "सर, डोमेस्टिक मिनिस्टरी की तो जानें दें अब तो फॉरेन मिनिस्टर भी नहीं दिखाई देते कहीं। 2009 तक तो यूनाइटेड नेशंस सिक्यूरिटी काऊंसिल में परमानेंट सीट लेने की बात करते थे तो लगता था कि फॉरेन मिनिस्ट्री में कुछ हो रहा है। सर, मुझे लगता है एकबार फिर से अगर सिक्यूरिटी कॉउन्सिल में परमानेंट सीट की बात शुरू की जाती तो ..."
प्रधानमंत्री; "नहीं-नहीं, हर आईडिया का एक लाइफ होता है। दिस आईडिया हैज आउटलिव्ड इट्स लाइफ। कुछ और सोचना पड़ेगा। ईमेज बिल्डिंग नहीं करेंगे तो सरकार चलेगी कैसे? आप एक काम कीजिये। ईमेज को बढ़ावा देनेवाली कैबिनेट कमिटी की मीटिंग की व्यवस्था कीजिये, हमें सरकार की ईमेज बिल्डिंग एक्सरसाइज का क्रिटिकल एक्जामिनेशन करना है।"
सचिव नोटिस भेजने का इंतज़ाम करने निकल जाते हैं।
Friday, May 25, 2012
चंदू इन एक्सक्लूसिव चैट विथ डॉक्टर सिंह
चंदू ने उत्तरप्रदेश चुनावों के समय राहुल गांधी जी का एक इंटरव्यू किया था. चूंकि राहुल जी हमेशा सच बोलने और लिखने वालों के साथ रहते हैं, लिहाजा उन्होंने चंदू की बड़ी प्रशंसा की. चंदू की प्रशंसा के चर्चे इतने फैले कि प्रधानमंत्री ने फैसला किया कि वे पाँच संपादकों से मिलें उससे अच्छा केवल चंदू को इंटरव्यू दे दें. जो काम पाँच सम्पादक मिलकर नहीं कर सकेंगे वह काम चंदू अकेले ही कर देगा. परसों यूपीए-टू की तीसरी सालगिरह मनाई गई. मीटिंग हुई. खाना-पीना हुआ. मुस्कुराहटें बिखेरी गईं. विचार-विमर्श करने की ऐक्टिंग की गई. कुछ ने खुश दिखने की ऐक्टिंग की. कुछ ने दुखी दिखने की. कुछ पुराने मित्र नहीं आये. सरकार को नए मित्र मिले. फोटो वगैरह की खिचाई हुई. इन्ही सब के बीच चंदू को मौका मिला कि वह प्रधानमंत्री का इंटरव्यू ले सके.
कल ही दिल्ली से लौटा और इंटरव्यू की ट्रांसक्रिप्ट मुझे थमा दी. बोला; "एक्सक्लूसिव इंटरव्यू है. तमाम पत्र-पत्रिकाएँ चाहती थीं कि मैं उन्हें बेंच दूँ लेकिन चूंकि मैं ब्लाग-पत्रकारिता धर्म का पालन करना चाहता था इसलिए ये मैं आपको दे रहा हूँ. आप ही छापिये."
तो पेश है प्रधानमंत्री का एक्सक्लूसिव इंटरव्यू. आप बांचिये.
चंदू: सर, नमस्कार.
प्रधानमंत्री:
चंदू: सर नमस्कार.
प्रधानमंत्री:
चंदू: सर, मैंने कहा नमस्कार. आप कुछ बोलिए.
प्रधानमंत्री: बोलूँ? मतलब आप मुझे बोलने की इजाजत देते हैं?
चंदू: सर, आप देश के प्रधानमंत्री हैं. मैं एक अदना सा पत्रकार. मेरी क्या हैसियत कि मैं आपको इजाजत दूँ.
प्रधानमंत्री: देखिये यह इजाजत नहीं चंदू जी, दरसल यह आदत की बात है.
चंदू: समझ गया सर, समझ गया.
प्रधानमंत्री: आप तो बहुत समझदार हैं. काश इतनी समझदारी अरनब गोस्वामी के पास होती. वैसे मुझे आने में थोड़ी देर हो गई. दरअसल हमलोग खा रहे थे.
चंदू: कोई बात नहीं सर. पार्टी है तो खाना-पीना तो होगा ही.
प्रधानमंत्री: हे हे..क्या बात कही आपने. पार्टी है तो खाना-पीना तो होगा ही. वैसे भी सबके साथ खाने में समय ज्यादा लगता है. और लोग़ रहते हैं तो बातचीत करते हुए खाते हैं. हँसते हुए खाते हैं. विचार-विमर्च करके खाते हैं. ऐसे में समय ज्यादा लग ही जाता है.
चंदू: बिलकुल सही बात कह रहे हैं सर. इंसान को अकेले खाना हो तो उसे कितना टाइम लगेगा खाने में? साथ की बात कुछ और है.
प्रधानमंत्री: हे हे हे..बिलकुल सही कहा आपने. वैसे आपने खाया या नहीं?
चंदू: नहीं सर, मैंने नहीं खाया. वो पार्टी में दाल-रोटी नहीं थी न. यहाँ तो सारे परदेशी-विदेशी व्यंजन हैं.
प्रधानमंत्री: क्या बात कर रहे हैं? आप पत्रकार होकर दाल-रोटी खाते हैं?
चंदू: सर, अब आप तो जानते ही हैं कि मैं एक ब्लाग-पत्रकार हूँ इसलिए मेरे पास कोई च्वायस नहीं है.
प्रधानमंत्री: चंदू जी पत्रकार को बहुत चूजी होना चाहिए. च्वायस तो पत्रकार खुद बनाता है.
चंदू: क्या फरक पड़ता है सर. बात तो पेट भरने से है. मेरा पेट दाल-रोटी से ही भर जाता है. कह सकते हैं यह बुरी आदत हो गई पेट भरने की. वैसे भी सर, दाल-रोटी खाने का फायदा यह रहता है कि खानेवाले को आटा-दाल का भाव पता लगता रहता है.
प्रधानमंत्री: हे हे हे..ये खूब कही आपने. इसी बात पर आपको एक शेर सुनाता हूँ.
चंदू: अरे सर, अभी तो इंटरव्यू की शुरुआत है. शेर कहने के लिए तो और भी मौके आगे आयेंगे.
प्रधानमंत्री: चलिए आपने कहा तो मैं रुक जात हूँ नहीं तो मैं सुनाता कि; माना कि तेरी दीद के काबिल..
चंदू: हाँ सर, मुझे पता है कि आप यही सुनाते.
प्रधानमंत्री: हे हे हे..
चंदू: सर, आपसे मेरा पहला सवाल है कि आप इन आठ सालों को कैसे देखते हैं? कैसे गुज़रे ये साल?
प्रधानमंत्री: कैसे देखते हैं की बात पर तो यही कहूँगा कि पीछे मुड कर देखते हैं. रही बात कि ये आठ कैसे गुजरे तो उसपर यह कहूँगा कि गुजरे तो क्या हमने गुज़ार दिए.
चंदू: वैसे सर, आप अपनी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या मानते हैं?
प्रधानमंत्री : सबसे बड़ी उपलब्धि की बात पूछेंगे तो मैं यही कहूँगा कि हमारी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही है कि वह खड़ी रह गई.
चंदू: और आपकी सबसे बड़ी उपलब्धि?
प्रधानमंत्री: मेरी सबसे बड़ी व्यक्तिगत उपलब्धि की बात करेंगे तो मैं कहूँगा कि मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि मैंने अपनी सरकार को खड़ी रखा.
चंदू: इसी के साथ यह भी पूछता चलूं कि इन आठ सालों में देश की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या रही?
प्रधानमंत्री: देश की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि देश ने मेरी सरकार को झेला.
चंदू: लेकिन वहीँ यह आरोप भी लगते रहे हैं कि बहुत सारी पार्टियों और नेताओं को मैनिपुलेट करके सरकार को खड़ी रखा गया.
प्रधानमंत्री: अब राजनीति की बातों में मुझे मत घसीटिए. मैं एक इकॉनोमिस्ट हूँ. मुझे राजनीति नहीं आती.
चंदू : परन्तु सर, तमाम लोग़ यह मानते हैं कि आप राजनीतिज्ञ हैं. अगर ऐसा नहीं होता तो माइनॉरिटी की सरकार आठ सालों तक नहीं चलती.
प्रधानमंत्री : आप मेजर प्वाइंट मिस कर रहे हैं. यह राजनीति की बात नहीं बल्कि इकॉनोमिक्स की बात है. देश की इकॉनोमी को आगे बढ़ाने के लिए हमें समर्थन मिलता रहता है. हम लेते रहते हैं और सरकार चलती रही है.
चंदू : लेकिन सर, कुछ लोग़ कहते हैं यह इकॉनोमिक्स की नहीं बल्कि फिनांस की बात है.
प्रधानमंत्री: देखिये मैं इकॉनोमिस्ट हूँ और मेरा मानना है कि इकॉनोमिक्स और फिनांस एक ही सिक्के के दो पहलू हैं.
चंदू: कौन से सिक्के के, सर?
प्रधानमंत्री: उस सिक्के के जो हमें आगे ले जाता है.
चंदू: लेकिन सर, सिक्का खरा है या खोटा, यह भी तो देखना पड़ेगा.
प्रधानमंत्री: नहीं-नहीं, असली प्वाइंट यह है कि सिक्का पहलू में है या नहीं. यह अर्थशास्त्र के सिद्धांत के अनुसार बात कर रहा हूँ मैं. आपतो जानते ही हैं कि मैं बेसिकेली एक इकॉनोमिस्ट हूँ.
चंदू; ओके सर. आपकी सरकार पर यह आरोप लगता रहा है कि विकास की बात बहुत हद तक बेमानी है. आप इसे कैसे देखते हैं?
प्रधानमंत्री: विकास की बात में कैसी बेईमानी चंदू जी? विकास में बेईमानी की बात करने वाले सही नहीं कह रहे.
चंदू: आपने शायद सुना नहीं. मैंने बेमानी की बात की. बेमानी की सर. बेईमानी की नहीं.
प्रधानमंत्री : ओह, आपका मतलब बेमानी से था? अब समझा, अब समझा. देखिये, यह तो देखने वाले की नज़र पर निर्भर करता है. हम प्रधानमंत्री की हैसियत से देखते हैं तो हमें तो यह लगता है कि विकास की बात बेईमानी ..सॉरी बेमानी नहीं है. मेरे हिसाब से तो भरपूर विकास हुआ है.
चंदू: लेकिन सर..
प्रधानमंत्री: मुझे पता है कि आपको और आपकी तरह ही तमाम लोगों को यही लगता है कि विकास नहीं हुआ. लेकिन आंकड़े यह बताते हैं कि विकास हुआ है. गरीबी कम हुई है. अमीरी बढ़ी है. लोगों के हाथ में पैसा आया है. खर्च बढ़ा है. लोगों का फेसबुक स्टेटस...सॉरी स्टेटस बढ़ा है. एक्सपोर्ट बढ़ा है. इम्पोर्ट बढ़ा है. डॉलर तक बढवा दिया हमने. और सब तो जाने दीजिये मंहगाई बढ़ गई. अब आपको इससे बड़ा और क्या सबूत चाहिए?
चंदू: आप खुद कह रहे हैं कि मंहगाई बढ़ी है.
प्रधानमंत्री: देखिये, मंहगाई बढ़ने का मतलब है विकास हो रहा है. यह अर्थशास्त्र का सिद्धांत है. हम अर्थ-सिद्धांतवादी हैं इसलिए अगर विकास की बात करेंगे तो वह भी अर्थशास्त्र के सिद्धांत के अनुसार ही करेंगे.
चंदू : परन्तु सर, क्या आंकड़े सबकुछ दर्शाते हैं? आचार्य नवजोत सिंह सिद्धू ने खुद कहा है कि आंकड़े बिकिनी की तरह होते है.....
प्रधानमंत्री: मैं समझ गया, मैं समझ गया. आचार्य सिद्धू का प्रसिद्द सदुपदेश जो वे किसी और से चुरा कर एक्स्ट्रा इनिंग्स में बोलते रहते हैं, उसके बारे में मुझे पता है. लेकिन लोकतंत्र में आंकड़ों का बहुत महत्व है.
चंदू: सर, मेरा अगला सवाल यह है कि अब आठ परसेंट वाली ग्रोथ रुक गई है. ग्रोथ कम होने लगी है. इसका क्या कारण है?
प्रधानमंत्री: इसका सबसे बड़ा कारण ग्रीस है. ग्रीस ने भारत की ग्रोथ रोक दी है. क्या आपने अखबारों में नहीं पढ़ा?
चंदू: लेकिन कुछ लोग़ मानते हैं कि सरकार ग्रीस को एस्केप-गोट बना रही है.
प्रधानमंत्री: देखिये अगर ऐसा है भी तो लोगों को इस बात पर खुश होना चाहिए कि सरकार कुछ बना ही तो रही है, बिगाड़ तो नहीं रही न.
चंदू: लेकिन सर, ये एस्केप-गोट बनाने की जगह कुछ सड़क वगैरह बनाने से अच्छा रहता न.
प्रधानमंत्री: देखिये, एक देश की सरकार के लिए एस्केप-गोट बनाना शासन के तमाम सिद्धांतों में सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत है.
चंदू: मतलब क्या ग्रीस सचमुच इतना इम्पार्टेंट है?
प्रधानमंत्री: बहुत इम्पार्टेंट है. और मैंने तो अपने हर मंत्री से कह दिया कि उन्हें अपना-अपना ग्रीस खोज लेना चाहिए.
चंदू: मसलन?
प्रधानमंत्री: मसलन इंडियन इकॉनोमी का सबसे बड़ा ग्रीस खुद ग्रीस है. इसके अलावा भी सरकार का अपना ग्रीस है. ममता जी सरकार की सबसे बड़ी ग्रीस हैं. उनकी वजह से ही तमाम रिफार्म्स रुक गए. चिदंबरम जी के ग्रीस रहमान मलिक हैं जो उनकी बात नहीं मानते. प्रनब बाबू का ग्रीस गिरता हुआ रुपया और यूरोपियन इकॉनोमी है....आप देखिये कि हमसे प्रेरित होकर ही बीजेपी वालों ने भी अपने-अपने ग्रीस खोज लिए हैं. जैसे गडकरी के ग्रीस नरेन्द्र मोदी हैं. वैसे ही सुषमा जी के ग्रीस अरुण जेटली हैं. अब तो ममता जी ने भी इस ग्रीस खोजो अभियान के तहत कार्टूनिस्ट और सवाल करने वाली छात्राओं में अपना ग्रीस ढूढ़ लिया है. मैं आपको बताता हूँ कि यह ग्रीस सच में बहुत इम्पार्टेंट है. हमारी बड़ी उपलब्धियों में यह भी है कि हमने लोगों को अपने-अपने ग्रीस खोजना सिखा दिया है.
चंदू : सर, मेरा एक सवाल करप्शन को लेकर है. लोगों में यह धारणा बनी है कि आपकी सरकार में भ्रष्टाचार बढ़ा है.
प्रधानमंत्री : हे हे..ऐसी बात नहीं है. लोगों को आधा-सच देखने की आदत है. अगर आप देखें तो यह भी जानेंगे कि हमारी सरकार ने ही सबसे ज्यादा नेताओं को जेल भेजा है.हमने तो यह सिद्धांत ही बना दिया है हम भ्रष्टाचार बिलकुल बर्दाश्त नहीं करेंगे.
चंदू: लेकिन सर, भ्रष्टाचार हुए है तभी तो लोग़ जेल जा रहे हैं. भ्रष्टाचार होते ही नहीं तो लोग़ जेल क्यों जाते?
प्रधानमंत्री: यही तो आप नहीं समझ पाए. दरअसल यह लोकतंत्र को मज़बूत करने वाला प्रोसेस है. भ्रष्टाचारी को छूट है कि वह भ्रष्टाचार करे और सरकार को छूट है कि वह उन्हें पकड़े.
चंदू: सर, लोग़ ऐसा मानते हैं कि देश की अर्थव्यवस्था ठीक नहीं है. उसके लिए सरकार का क्या प्लान है?
प्रधानमंत्री: सब ठीक हो जाएगा. हम पेट्रोल और डीजल वगैरह का दाम बढ़ाके सब ठीक कर देंगे.
चंदू : लेकिन सर, क्या यह करना सही रहेगा? मंहगाई के मारे लोग़ परेशान हैं. क्या वे और परेशान नहीं हो जायेंगे?
प्रधानमंत्री: देखिये, देश को इस बोहरान से निकालने का सबसे बढ़िया तरीका यही है. आप लार्जर पिक्चर देखिये. मंहगाई जैसी छोटी बात से निकलिये.
चंदू: अच्छा सर, आप कहते हैं तो निकल जाता हूँ. मेरा अगला सवाल यह है कि यूपी इलेक्शन में आपकी पार्टी ह़र गई. उसे लेकर विचार-विमर्श चल रहा है?
प्रधानमंत्री: मुझे पोलिटिक्स में मत घसीटिए. मैं तो इकॉनोमिस्ट हूँ.
चंदू : लेकिन सर...
प्रधानमंत्री: देखिये इलेक्शन तो एन डी ए भी हारा था. इलेक्शन की बात पर भी हम एन डी ए को ही फालो करते हैं. टूजी पर भी हमने एन डी ए को ही फालो किया था. हम सारी नीति उन्ही की फालो करते हैं. इसलिए अगर आपको हमारी फैल्योर की बात याद आये तो यह समझ कर संतोष करें कि यह दरअसल एन डी ए का फैल्योर है.
चंदू : अब कुछ व्यक्तिगत सवालों पर आ जाते हैं.
प्रधानमंत्री: नहीं-नहीं. चंदू जी देखिये, एक देश के प्रधानमंत्री के लिए व्यक्तिगत कुछ नहीं होता. जो कुछ भी होता है सब पब्लिक होता है. इसलिए व्यक्तिगत सवालों का जवाब देना मैं ठीक नहीं समझता. अब इस इंटरव्यू को मैं इस शेर के साथ ख़त्म करना चाहूँगा कि; माना कि तेरी दीद के काबिल नहीं हूँ मैं, तू मेरा शौक तो देख, मेरा इंतजार तो देख.
चंदू: एक छोटा सा सवाल यह है सर कि आपने यह शेर क्यों कहा?
प्रधानमंत्री: बस ऐसे ही कह दिया. हमें यह शेर पसंद है इसलिए मैं कह देता हूँ. आप इसको ऐसे देखिये कि जो मुझे पसंद है उसको मैं कह देता हूँ.
चंदू: बहुत-बहुत धन्यवाद सर. इस इंटरव्यू और इस शेर के लिए.
Tuesday, November 22, 2011
@#!%&८? राष्ट्रीय गोबर मिशन
मंत्री जी सोच में डूबे थे. आप पूछ सकते हैं सोच में क्यों डूबे थे? खासकर तब, जब डूबने के लिए और बहुत कुछ है? तो मेरा कहना यह है कि आप सवाल बहुत करते हैं. पढ़ तो लीजिये कि उन्होंने सोच में डूबना क्यों पसंद किया? तो मैं बता रहा था कि मंत्री जी सोच में डूबे थे. मंत्री भी कौन विभाग के? मिनिस्ट्री ऑफ न्यू एंड री-न्यूएबिल एनर्जी यानि नवीन और नवीनीकरणीय उर्जा मंत्रालय. क्या कहा? नाम नहीं सुना कभी? अरे भइया वही मंत्रालय जो किसी भी चीज से उर्जा बना लेता है. सूरज की रौशनी को पेट्रोमैक्स और बल्ब की रौशनी में परिवर्तित कर डालता है. गोबर से गैस बना देता है. पोलीथीन से तेल बना देता है. यहाँ तक कि कूड़ा से सरकार भी बना सकता है.
तो मैं बता रहा था कि इसी मंत्रालय के मंत्री सोच में डूबे थे. सामने सचिव महोदय बैठे. ऑब्जेक्शन मत कीजिए सचिव के आगे महोदय लगाना ज़रूरी होता है. यही सरकारी नियम है. तो सामने सचिव महोदय बैठे थे. सोच में डूबकर जब मंत्री जी बोर हो गए तो सिर उठाकर बोले; "लगातार आठवां महीना है जब हम लोग़ टारगेट अचीव नहीं कर पाए. क्या हो रहा है? जब मैं मंत्री बना था तो मैंने मीडिया को बताया था कि मैं इस देश में ऊर्जा के नए-नए स्रोत स्थापित करूँगा लेकिन यहाँ हाल यह है कि गोबर गैस के टारगेट को भी हम अचीव नहीं कर पा रहे?"
सचिव जी के बोलने की बारी थी. वे बोले भी. उन्होंने कहा; "लेकिन सर, क्या किया जाय जब हमारे पास गोबर ही उपलब्ध नहीं है. एक जमाना था जब देश में गोबर पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध था. लेकिन आज गोबर की कमी पड़ गई है. गोबर मिलेगा तब तो गोबर-गैस बनेगी."
मंत्री जी बोले; "लेकिन गोबर न मिलने का कारण क्या है? अचानक देश में गोबर की कमी हो जाना तो ठीक नहीं है न. गेंहू, चावल, दाल, सब्जी वगैरह की कमी समझ में आती है लेकिन गोबर की कमी? अरे भाई, भारत तो गोबर के लिए ही जाता है."
सचिव जी बोले; "लेकिन सर, यह कहना कि भारत को गोबर के लिए जाना जाता है ठीक नहीं होगा. भारत तो और बातों के लिए भी जाना जाता है. हमें नहीं भूलना चाहिए कि भारत करप्शन के लिए जाना जाता है. भारत महात्मा के लिए जाना जाता है. भारत ...."
मंत्री जी बोले; "ठीक है-ठीक है. मैं समझ गया. लेकिन सवाल यह है कि गोबर की कमी कैसे हो गई?"
सचिव जी ने अपनी फ़ाइल से एक कागज़ निकालते हुए कहा; "सर, यह रिपोर्ट है. हमने एक्सपर्ट्स लगाकर स्टडी करवाया तो पता चला कि पिछले वर्षों में देश में गायें ज्यादा कटने लगी हैं. वे अब कटकर एक्सपोर्ट्स होने के काम आती हैं. शायद गोबर की कमी इसीलिए हो रही है."
मंत्री जी बोले; "लेकिन हमारे यहाँ भैंस भी तो पायी जाती हैं. वे भी तो गोबर करती होंगी."
सचिव जी को पता था कि मंत्री जी ऐसा सवाल कर सकते हैं. वे इस सवाल के लिए तैयार थे. उन्होंने बताया; "सर, भैंस गोबर तो करती हैं लेकिन देश के लोग़ उस गोबर से उपले बनना ज्यादा ज़रूरी समझते हैं. और फिर सर, परिवार बड़े-बड़े होते हैं. एक परिवार में एक ही भैंस है. कई बार तो ऐसा देखा गया है कि एक ही भैंस का गोबर परिवार में चार भागों में बट जाता है. चारों लोग़ उस गोबर से उपले बनाते हैं जो जलाने के काम आता है."
मंत्री जी बोले; "और बैल? बैल भी तो गोबर करते होंगे? क्या बैलों ने गोबर करना छोड़ दिया है?"
सचिव जी इस अप्रत्याशित सवाल के लिए तैयार नहीं थे. कुछ क्षणों के लिए खुद को संभाला और बोले; "सर, देखा जाय तो बैल और करते ही क्या हैं? बैल गोबर ही तो करते हैं. लेकिन सर बैलों की संख्या भी तो घट गई है. वैसे सर, यहाँ एक समस्या और भी है कि भैंस तो एक जगह बंधी रहती है लेकिन बैल इधर-उधर आता-जाता रहता है. वह घूम-घूम कर गोबर करता है. ऐसे में लोग उसका पूरा गोबर इकठ्ठा नहीं कर पाते."
मंत्री जी भी शायद सोच में और डूब जाने के लिए तैयार नहीं थे. लिहाजा उन्होंने अपनी म्यान से एक और सवाल निकाला. बोले; "लेकिन बैल क्यों कम हो गए? क्या उन्हें अब भारतवर्ष पसंद नहीं आता?"
सचिव जी ने भी अपनी म्यान से जवाब निकाला. बोले; "सर, देखा जाय तो बैलों को हमेशा से ही भारतवर्ष पसंद रहा है. यहाँ समस्या यह है कि अब भारतवर्ष को बैल रास नहीं आते."
मंत्री जी ने पूछा; "क्यों? ऐसा क्यों? अगर भारतवर्ष को बैल रास नहीं आते तो फिर बैलों की जगह किसने ली?"
सचिव जी को पता था कि मंत्री जी यह ज़रूर पूछेंगे. वे बोले; "सर, अब बैलों की जगह ट्रैक्टर ने ले ली है."
मंत्री जी के लिए यह सूचना नई टाइप लगी. बोले; "क्या बात करते हैं आप? जो काम बैल कर सकता है क्या वे सारे काम ट्रैक्टर करने लगे हैं?"
सचिव जी बोले; "ट्रैक्टर लगभग सारे काम कर सकता है, बस गोबर नहीं कर सकता. वैसे सर, क्या ऐसा नहीं हो सकता कि अपने मंत्रालय के टारगेट अचीव करने के लिए हम वाणिज्य मंत्रालय से कहें कि गायें कम काटी जायें. गायों को काटकर उन्हें एक्सपोर्ट्स करने का नया लाइसेंस न दिया जाय?"
मंत्री जी बोले; "लेकिन ऐसा करने से तो लफड़ा हो जाएगा. क्लैश ऑफ इंटरेस्ट की बात उभर कर सामने आ जायेगी. अभी तक हमारी मिनिस्ट्री इस झमेले से दूर थी लेकिन वह भी इसमें पड़ जायेगी तो मीडिया वालों को एक और बहाना मिल जाएगा हमारी सरकार के खिलाफ लिखने का. वैसे क्या ऐसी कोई तकनीक नहीं है जिससे गोबर मैन्यूफैक्चर किया जा सके?"
सचिव जी इस सवाल के लिए तैयार नहीं थे. उनके मन में एक बार तो आया कि कह दें कि; "सर देखा जाय तो हम और कर ही क्या रहे हैं? सब मिलकर गोबर मैन्यूफैक्चरिंग ही तो कर रहे हैं." फिर उन्हें लगा कि यह कहना ठीक नहीं होगा. लिहाजा उन्होंने मंत्री जी से कहा; "सर, अगर केवल इसलिए गोबर मैन्यूफैक्चर करना है कि उसकी गैस बनाई जाय तो फिर हम किसी समुद्र में सीधा-सीधा गैस ही खोज लें."
उनकी बात से मंत्री जी प्रभावित नहीं हुए. बोले; "लेट अस स्टिक टू आर प्रॉब्लम. समुद्र में गैस खोजना तो पेट्रोलियम मिनिस्ट्री का काम है. हमें गोबर गैस के बारे में सोचना है. आप केवल यह बताएं कि गोबर मैन्यूफैक्चर करने की कोई तकनीक है या नहीं?"
सचिव जी बोले; "सर, किस चीज को मैन्यूफैक्चर नहीं किया जा सकता? और खासकर सरकार तो कुछ भी मैन्यूफैक्चर कर सकती है."
सचिव जी की बात सुनकर मंत्री जी ने सरकार के टैलेंट की मन ही मन सराहना की. फिर सोचनीय मुद्रा बनाते हुए बोले; "वैसे सुना है कि गुड़ से भी गोबर बनाया जाता है. तो क्यों न हम उस तकनीक का इस्तेमाल करें?"
सचिव जी को लगा कि दो मिनट के लिए मंत्री जी की इजाजत लेकर बाहर जायें और हँस लें. फिर उन्हें लगा कि यह संभव नहीं है. वे बोले; "सर, अभी तक तो हम ज्यादातर गुड़ गोबर कर चुके हैं. अब तो गुड़ भी ज्यादा नहीं बचा."
मंत्री जी बोले; "वैसे गोबर मैन्यूफैक्चरिंग की कोई तकनीक है तो उसके बारे में बाद में सोचते हैं. पहले एक बार ट्राई किया जाय और जानवरों की संख्या बढ़ाकर पर्याप्त मात्रा में गोबर उपलब्ध करवाया जाय."
सचिव जी बोले; "लेकिन सर, यह कैसे होगा?"
मंत्री जी के पास शायद पहले से ही कोई प्लान था. बोले; "हम एक योजना की घोषणा करते हैं. योजना का नाम होगा "@#!%&८? राष्ट्रीय गोबर मिशन". एक बार योजना का उद्घाटन हो गया तो फिर अगले बजट में वित्तमंत्री को कहकर इस योजना के लिए करीब पाँच हज़ार करोड़ रुपया निकलवा लूंगा. आप बस योजना के लॉन्च करने के प्लान की घोषणा कीजिये."
सचिव जी ने सोचा कि मंत्री के पास कोई योजना है इसलिए ठीक यही होगा कि उन्ही से पूरी जानकारी ले ली जाय. वे बोले; "सर, आपने जिस तरह से योजना की बात की, उससे लगा कि आपके पास पूरा प्लान है. जब पूरा प्लान है ही तो वो मुझे बता ही दीजिये."
मंत्री जी को सचिव जी की बिना लाग-लपेट वाली बात खूब पसंद आयी. बोले; "तो फिर सुनो. योजना के पहले चरण में हम अपने मंत्रालय से एक सौ साठ करोड़ रुपया देंगे. उसके बाद चार महीने बाद बजट आने वाला है. उस बजट में पाँच
हज़ार करोड़ रुपया निकलवा लेंगे. काम आगे बढ़ेगा. अगले साल के अंत तक मीडिया में रिपोर्ट प्लांट करवाना है कि देश में अचानक गोबर की कमी हो गई है और यह योजना आगे नहीं बढ़ पाएगी. एक बार मीडिया में बात उठ गई और टीवी पर दस-पाँच पैनल डिस्कशन हो गए तो फिर इस गोबर योजना में एफ डी आई की इजाजत ले लेंगे. तुम तो जानते ही हो कि किसी भी उद्योग में एक बार एफ डी आई की ज़रुरत की बात हो जाती है तो उस उद्योग को लोग़ गंभीरता से लेने लगते हैं. ऐसे में आज यह देश के हित में है कि @#!%&८? राष्ट्रीय गोबर मिशन जल्द से जल्द शुरू किया जाय. बस अब काम शुरू करो और इस मिशन के पूरा होने के लिए अपनी जान लड़ा दो. तीन-चार दिन में एक सेमिनार में मुझे इस मिशन की घोषणा.....................
सचिव जी बड़ी तन्मयता से मंत्री जी को सुने जा रहे थे...
Friday, August 19, 2011
गवरनेंस बाइ मैजिक वैंड - ए बुक बाइ मैजिकानो वैंडलोई
नई दिल्ली से चंदू चौरसिया, मुंबई से निर्भय सावंत और बैंगलुरू से रजत चिनप्पा
आज एक ऐतिहासिक निर्णय देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने फेडरेशन ऑफ इंडियन चेम्बर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (फिक्की) को आदेश दिया कि वह एक जांच करके बताये कि केंद्र सरकार, उसके मंत्रियों और प्रधानमंत्री के लिए मैजिक वैंड देश में ही कैसे उपलब्ध कराया जा सकता है. ज्ञात हो कि प्रधानमंत्री और उनके कई मत्रियों ने मैजिक वैंड उपलब्ध न होने के कारण पिछले ढाई वर्षों में कई बार समस्याओं को सुलझाने में असमर्थता जताई थी. अभी तीन दिन पहले ही स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले से बोलते हुए प्रधानमंत्री ने असमर्थता जताते हुए अपने भाषण में कहा था; "भ्रष्टाचार मिटाने के लिए हमारे हाथ में कोई मैजिक वैंड नहीं है."
करीब दो महीने पहले सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर करते हुए अखिल भारतीय सरकार सताओ आन्दोलन के प्रमुख श्री अशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया था कि न्यायालय सी बी आई को आदेश दे कर सरकार और उसके मंत्रियों के खोये हुए मैजिक बैंड को बरामद करवाए. कालांतर में सी बी आई ने एक जांच कर के सुप्रीम कोर्ट को दिए गए अपने हलफनामे में यह खुलासा किया सरकार या उसके किसी भी मंत्री के पास कभी कोई मैजिक वैंड था ही नहीं. दरअसल सरकार और उसके मंत्री चाहते हैं कि या तो देश में ही मैजिक वैंड का उत्पादन शुरू हो या फिर उसे विकसित देशों से आयात करके उन्हें मंत्रियों को उपलब्ध करवाया जाय. सी बी आई के इस हलफनामे के बाद मैजिक वैंड को लेकर देशवासियों में व्याप्त कई तरह के भ्रम ख़त्म हो गए.
यहाँ पर यह बता देना उचित है कि देशवासियों में यह भ्रम था कि सरकार और उसके मंत्रियों के मैजिक वैंड चोरों ने चुरा लिए हैं जिसके कारण मंत्रीगण समस्याएं नहीं सुलझा पा रहे हैं.
ज्ञात हो कि पिछले ढाई वर्षों में वित्तमंत्री, कृषिमंत्री, गृहमंत्री, रक्षामंत्री वगैरह ने कई बार कहा कि उनके पास कोई मैजिक वैंड नहीं है जिससे देश की समस्याओं को सुलझाया जा सके. जहाँ वित्तमंत्री ने मंहगाई को रोक पाने में असमर्थता जताते हुए मैजिक वैंड की अनुपलब्धता की बात बताई वहीँ गृहमंत्री ने आतंकवाद की रोकथाम न कर पाने का श्रेय मैजिक वैंड की अनुपलब्धता को दिया. उधर हाथ में मैजिक वैंड न होने के कारण कृषिमंत्री हर बार चीनी, प्याज, सब्जी, तेल वगैरह के दाम को कंट्रोल नहीं कर पाए.
मैजिक वैंड के बल पर शासन करने की बात नई नहीं है लेकिन इस तरह के सभी शासक हमेशा केवल किस्से-कहानियों में पाए जाते रहे हैं. पुराने किस्से-कहानियों के जादूगर वगैरह मैजिक वैंड के बल पर लोगों के ऊपर शासन करते हुए बरामद होते रहे हैं. लेकिन पाँच साल पहले इटली के समाजशास्त्री, लेखक और विचारक श्री मैजिकानो वैडलोई ने गवरनेंस बाइ मैजिक वैंड नामक किताब लिखकर शासन के इस तरीके को एक बार फिर से विश्व के राजनीतिक पटल पर ला खड़ा किया. वर्तमान भारतीय सरकार श्री वैंडलोई के इस सिद्धांत से इतना प्रभावित हुई कि उसे हर समस्या का समाधान मैजिक वैंड में ही नज़र आने लगा. यह बात अलग है कि देश में अभी तक मैजिक वैंड का न तो उत्पादन शुरू हुआ और न ही इसके आयात के लिए रास्ता खोला गया.
उधर आज दिल्ली में अखिल भारतीय निज-भाषा उन्नति समिति के अध्यक्ष श्री रामप्रवेश शुक्ला ने सरकार और उसके मंत्रियों की यह कहते हुए आलोचना की है कि मंत्रीगण अपनी भाषा पूरी तरह से भूल गए हैं जिसके चलते वे देश के विशाल जनमानस से कट चुके हैं. श्री शुक्ला ने अपने आरोप को सही ठहराते हुए बताया कि सरकार और उसके मंत्रियों को मैजिक वैंड न कहकर जादुई छड़ी कहना चाहिए. मंत्रियों के ऐसा न करने की वजह से हिंदी रसातल में चली जा रही है. श्री शुक्ला ने राष्ट्रपति को एक ज्ञापन देते हुए आग्रह किया कि सरकार के मंत्री अब से केवल और केवल जादुई छड़ी की बात करें.
उधर आज बैंगलुरू में डिफेन्स रिसर्च ऐंड डेवलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन (डीआरडीओ) की तरफ से दायर हलफनामे में संस्थान ने मैजिक वैंड का उत्पादन करने में असमर्थता जताई है. ज्ञात हो कि सुप्रीम कोर्ट ने अखिल भारतीय सरकार सताओ आन्दोलन द्वारा दायर जनहित याचिका के बाद डी आर डी ओ से हलफनामा माँगा था कि संसथान मैजिक वैंड के उत्पादन के तरीके पर विचार करके एक रिपोर्ट फाइल करे. संस्थान ने सुप्रीम कोर्ट में दायर हलफनामे में कहा है कि; "यह संस्थान ऐसी कोई चीज के उत्पादन के बारे में विचार नहीं करेगा जिसके साथ मैजिक जुडा हो. संस्थान और उसमें काम करने वाले वैज्ञानिकों को मैजिक में कोई विश्वास नहीं है. संस्थान ने कसम खाई है कि वह केवल और केवल वैज्ञानिक दृष्टि से प्रमाणिक चीजों का ही उत्पादन करेगा."
डी आर डी ओ के इस हलफनामे के बाद सुप्रीम कोर्ट के पास और कोई रास्ता नहीं बचा था. यही कारण है कि मैजिक वैंड के उत्पादन या आयात के बारे में अध्ययन और रिपोर्ट का काम उसने फिक्की को सौंप दिया है.
मैजिक वैंड के बारे में प्रधानमंत्री और उनेक मंत्रियों द्वारा पिछले ढाई वर्षों से लगातार बात करने की वजह से पूरे देश के सरकारी विभाग और उनके कर्मचारी जाग गए हैं और उन्होंने मांग रखी है कि उन्हें भी मैजिक वैंड उपलब्ध करवाया जाय जिससे वे अपने-अपने विभागों की समस्याओं का समाधान कर सके. यही कारण है कि पिछले पंद्रह दिनों से, शिक्षा, रक्षा, रेल, खेल, ट्रांसपोर्ट, एयरपोर्ट, डी डी ए, पी डब्ल्यू डी, सेल्स टैक्स, इनकम टैक्स, नगर पालिका, और ऐसे ही तमाम विभागों के कर्मचारियों ने सरकार के सामने मांग रखी है कि सरकार जल्द से जल्द उन्हें मैजिक वैंड उपलब्ध करवाए जिससे पूरे भारत को एक बार फिर से सोने की चिड़िया बनाकर उसे लूट लिया जाय.
सरकारी कर्मचारियों द्वारा इतनी बड़ी संख्या में मांग रखने के कारण देश के प्रमुख औद्योगिक घराने हरकत में आ गए हैं. कई औद्योगिक घराने मैजिक वैंड के उत्पादन पर विचार करने लगे हैं. अलायंस उद्योग समूह के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की एक मीटिंग में कल फैसला लिया गया कि भारी मात्रा में मैजिक वैंड की डिमांड को देखते हुए कंपनी जल्द ही उसके उत्पादन के क्षेत्र में उतारेगी. सूत्रों के अनुसार कुछ भारतीय उद्योग समूहों ने मैजिक वैंड के क्षेत्र में निवेश करने के लिए मॉरिसश के रास्ते देश में पैसे लाने का इंतज़ाम शुरू कर दिया है. बाहर के कुछ निवेशक समूह इस बात पर कयास लगा रहे हैं कि इस क्षेत्र में सरकार कितने प्रतिशत एफ डी आई पर राजी होगी. भारतीय उद्योग समूहों के अलावा कुछ विदेशी निवेशकों ने भी मैजिक वैंड के उत्पादन में निवेश की घोषणा की है. प्रसिद्द निवेशन श्री वारेन बफेट ने कल बताया कि उनका समूह भारतीय मैजिक वैंड क्षेत्र में पहले चारण में करीब सात करोड़ डॉलर इन्वेस्ट करेगा.
सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक निर्णय के बाद देश के लोगों में ख़ुशी की लहर दौड़ गई है. आल इंडिया कॉमन-मेन एशोसियेशन के अध्यक्ष श्री प्रशांत अभ्यंकर ने कल मुंबई में एक संवाददाता सम्मलेन को संबोधित करते हुए कहा; "इस देश के नागरिकों का अब केवल सुप्रीम कोर्ट पर ही विश्वास रह गया है. हमें विश्वास है कि सुप्रीम कोर्ट के इस कदम की वजह से देश में जल्द ही मैजिक वैंड का उत्पादन शुरू हो जाएगा. देश की सारी समस्याएं छू-मंतर हो जायेंगी और भारत पूरे विश्व में एक इकॉनोमिक सुपर पॉवर बनकर उभरेगा."
Tuesday, June 7, 2011
'प्रजा' सो रही नींद में, बरसत लाठी-बेंत....
आधे घंटे पहले कोई सवा सौ ग्राम तुकबंदी इकट्ठी हो गई. इकट्ठी हुई तो कुछ 'धोये' निकाल आये. अगर झेल सकते हैं तो झेलिये.
करता है आदर कभी, कभी बताये चोर
कभी कहे कौवा उन्हें, यूं सरकारी जोर
सब जिसको बाबा कहें, उनको कहता गून
सब समझें चीनी जिसे, वो बतलाये नून
इक बाबा तो मौन है, और एक चिल्लात
इक सोये जब रात में, दूजा मारे लात
'प्रजा'सो रही नींद में, बरसत लाठी-बेंत
लोकतंत्र मुर्दा यहाँ, उसका यह संकेत
दिल्ली लंका सदृश अब, रावण करे निवास
सब पे कब्ज़ा कर लिया, धरती और अकाश
जिनको समझे थे सभी, जनता की आवाज़
चारण बन सरकार के, लुटा रहे हैं लाज
सच्चरित्र कहते उसे, जो है राष्ट्र प्रधान
चूहा बन बिल में घुसा, प्रजा रहे हलकान
कठपुतली सारे यहाँ, रानी करती राज
दरबारी बनकर वही, रोज गिराते गाज
कहते सब राजा जिसे, दिखे वही शैतान
जिह्वा पर कंट्रोल नहि, भूंके कुकुर समान
गृहमंत्री शकुनी सदृश, चलता रहता चाल
मोड़े मुख कर्त्तव्य से, दोपहर,सांझ,सकाळ
चरण कमल धोकर सदा चरणामृत पी लेव
रानी के चारण सभी, होठों को सी लेव
धूर्त, क्रूर मंत्री सभी, लागें कंश समान
जनता का करते वही, रोज-रोज अपमान
दुर्योधन चुप ही रहे, यह कलिकाली चाल
कलियुग का जयद्रथ यहाँ, खूब बनाये माल
मन का मोहन मौन है, जलता जाए राष्ट्र
करे आचरण ज्यों किये, द्वापर में धृतराष्ट्र
जिनको समझें द्रोण हम, वह भी करें प्रपंच
गलत-सलत बोलें सदा, जब मिल जाए मंच
उधर दुशाला रच रही, एक बड़ा षड्यंत्र
समय देखि के वार हो,उसका है यह मन्त्र
प्रथम यज्ञ में डारि जल, दुर्योधन मदहोश
चारण भी हैं कर रहे, उसका ही जयघोष
किन्तु समय कब पलट ले,यह जाने ना कोय
कभी-कभी सम्राट भी जनता सम्मुख रोय
Thursday, March 10, 2011
स्कैम, एरर ऑफ जजमेंट, फुल रेस्पोंसिबिलिटी और मनी-ट्रेल - भाग २
तो मैं कह रहा था कि मुंबई में बैठा उद्योगपति अगर यूपी स्थित अपनी कंपनी में पैसा लगाना चाहता है तो उसका पैसा मॉरिशस के रास्ते चलकर ही यूपी पहुँचता है. उद्योगपति यह नहीं चाहता कि मुंबई मेल वाया इलाहबाद पकड़े और पैसा दूसरे ही दिन यूपी में. ना, वह यह अफोर्ड नहीं कर सकता क्योंकि उसके सलाहकार ने उसे बता रखा है कि अपना ही रुपया अपनी कंपनी में लगाना भी चाहो तो सीधे-सीधे न लगाओ. पहले उसे मॉरिशस भेजो और वहाँ से उसकी एंट्री भारत में करवाओ. यह वैसी ही बात है जैसे कहीं-कहीं गावों में विवाह के बाद नई-नवेली दुल्हन को ससुराल वाले घर में कदम रखने से पहले किसी देवी के मंदिर या किसी पीपल के पेड़ की पूजा करवाने ले जाते हैं.
शायद भारत का ही पैसा भारत में ही प्रवेश करने से पहले मॉरिशस की तीर्थयात्रा कर आता है तो तन और मन से पवित्र हो जाता है.
गज़ब देश है यह मॉरिशस भी. मॉरिशस से मेरी और तमाम भारतीयों की पहली जान-पहचान वहाँ के भूतपूर्व प्रधानमंत्री शिवसागर रामगुलाम ने करवाई. मुझे याद है सत्तर के दशक के अंत में रेडियो पर अशोक बाजपेयी समाचार पढ़ते हुए हमें बताते थे कि; "आज दिल्ली में मॉरिशस के प्रधानमंत्री शिवसागर रामगुलाम से प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी से मुलाकात की और दोनों देशों के बीच समबन्धों को प्रगाढ़ किये जाने पर बल दिया."
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| पैसा यहां से घूम कर आता है! |
सम्बन्ध आगे बढ़े तो १९८९ में मेरे और मॉरिशस के बीच दूरी तब और कम हो गई जब मैंने श्री अमिताभ बच्चन की 'फिलिम' अग्निपथ देखी. बड़ी धाँसू एंट्री मारी थी बच्चन ज़ी ने डैनी बाबू के अड्डे पर. जिसने भी अग्निपथ देखी होगी उन्हें याद होगा कि बच्चन ज़ी कैसे समुन्दर के अन्दर से बच्चन इस्टाइल में अपना सिर हिलाते हुए निकले थे और उन्हें देखकर डैनी ज़ी ने अपनी ओवरएक्टिंग का एक और नमूना फट से पेश कर दिया था. अपने छिछले समुन्दर और नारियल के पेड़ों के कारण मॉरिशस बड़ा सुन्दर और सुशील दिखाई दिया था. बच्चन ज़ी की फिल्म 'अग्निपथ' मॉरिशस के साथ हमारे फ़िल्मी सम्बन्ध की शुरुआत भर थी. आगे चलकर उन्ही की एक और फिल्म 'हम' ने इन संबंधों को और प्रगाढ़ कर डाला. क्या कहा? याद नहीं है? अरे जरा सा दिमाग पर जोर डालेंगे तो याद आ जाएगा कि कैसे गोविंदा और शिल्पा शिरोडकर अपने घर से बाइक पर निकलते हैं और सीधा मॉरिशस पहुंचकर वहाँ एयरपोर्ट पर खड़े एयर मॉरिशस के एक जहाज के पंखें पर नाचते हुए एक दूसरे को बताते हैं कि; "सनम मेरे सनम, कसम तेरी कसम, मुझे आजकल नींद आती है कम...."
पूरे ढाई किलो शुद्ध तुकबंदी वाला गाना.
अभी दो-ढाई साल पहले मैं एक भोजपुरी फिल्म देख रहा था....
क्षमा कीजिये मैं विषय से भटक गया. एक ब्लॉगर की यही समस्या है. उसे टोकने वाला कोई नहीं रहता है लिहाजा वह भटक कर किसी भी राह पर चला जाता है. और जब उसे होश आता है तो पता चलता है कि आधी पोस्ट में वह निरर्थक बातें लीप चुका है. ऊपर से इतनी निरर्थक बातें लिखने बाद उसके मन में लालच भी आ जाता है कि अब इसे मिटायेंगे तो पोस्ट को हरी-भरी करने के लिए फिर से कुछ और निरर्थक लिखना पड़ेगा. ऐसे में जाने दो जो लिखा गया वो लिखा गया. इसे मिटाने की ज़रुरत नहीं. जो कुछ भी है पड़ा रहेगा एक कोने में. क्या लेगा हमारा?
तो मैं भारत में लाये जाने वाले कैपिटल की बात कर रहा है. बड़ी विकट अफरा-तफरी है इन पैसों की वजह से. ऐसी लोक-कथा है कि किसी पूर्व वित्तमंत्री ने अपनी बहू के सुझाव पर (भारतीय राजनीति और उसकी नीति निर्धारण में बहुओं का बोलबाला पहले से रहा है) भारत और मॉरिशस के बीच कुछ ऐसे कागजी सम्बन्ध स्थापित किये कि पूछिए ही मत. उस कागजी समबन्ध के बाद भारत में मॉरिशस के रास्ते पैसा ही पैसा. हर क्षेत्र में पैसा. हर जगह पैसा. हर उद्योग में पैसा. हर राज्य में पैसा. और हर पैसे के केंद्र में मॉरिशस. एफ डी आई का पैसा मॉरिशस के रास्ते आ रहा है तो एफ आई आई का पैसा भी उसी रास्ते से आ रहा है. हाल यह है कि पिछले कई वर्षों में मॉरिशस से चले पैसे की लहरें भारतीय शेयर बाज़ारों के तटों से आकर ऐसे टकरा रही हैं कि कभी-कभी सुनामी आने का खतरा हो जाता है.
जिस तरह के खुलासे हो रहे हैं और जिस तरह से कुछ बातें सामने आ रही है उन्हें देखकर कभी-कभी लगता है कि हमारे उद्योगपतियों के फैसले न केवल उनके अर्थ सलाहकारों के सुझावों पर निर्भर करते हैं बल्कि उनके पंडितों और गुरुओं पर भी निर्भर करते हैं. पता नहीं मुझे क्यों लगता है कि हर उद्योगपति का पंडित या गुरु उसे उपदेश देते हुए कहता होगा कि; "हे जजमान, भगवदगीता में श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि हे पार्थ कलियुग में भारतवर्ष में पैसा अगर मॉरिशस के रास्ते आएगा तो वह पवित्र पैसा होगा. जिस तरह से तीर्थराज प्रयाग में स्थित संगम में स्नान करने के बाद मनुष्य पवित्र हो जाता है वैसे ही मॉरिशस में स्थित गंगा तलाव की महिमा यह होगी कि वह मॉरिशस में आये हर पैसे को शुद्ध और पवित्र कर देगा....."
अब मॉरिशस की गिनती विश्व के अन्यतम टैक्स-हेवेन में होने लगी है और उसे यह दर्जा दिलवाने का काम इतना महत्वपूर्ण है कि आनेवाले समय में भारत को अपनी इस उपलब्धि को आगे रखकर सयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद् में परमानेंट सीट की दावेदारी प्रस्तुत करनी चाहिए. मामूली उपलब्धि नहीं है यह. मैं तो कहता हूँ कि इसके बल पर तो भारत खुद को पूरे विश्व के मुखिया के तौर पर प्रोजेक्ट कर सकता है. नौ प्रतिशत विकास दर (दर लिखने गए तो जो शब्द पहले आया वह 'डर' था) एक एडिशनल क्वालिफिकेशन के तौर पर अपने साथ तो है ही.
इस उपलब्धि की वजह से परिवर्तन दिखाई भी दे रहा है. मैं तो स्कूलों के मास्टर ज़ी लोगों से अनुरोध करूँगा कि अब छात्रों को निबंध के लिए जो नए विषय दिए जायें उनमे भारतीय अर्थव्यवस्था में मॉरिशस का महत्व नामक विषय अवश्य दिया जाय. ऐसा करने से छात्र आधे तैयार होकर निकल सकेंगे. मॉरिशस सरकार को यह प्रयास करने चाहिए कि जिस तरह भारतवर्ष में मॉरिशस से आनेवाले पैसों के बारे में कोई पूछताछ नहीं होती उसी तरह से मॉरिशस से आनेवाले नागरिकों के बारे में कोई पूछताछ न की जाय. इससे दोनों देशों के बीच समबन्ध प्रगाढ़ तो होंगे ही, एक नई वैश्विक व्यवस्था पनप सकेगी. कितने दिनों तक शोध करने वाले हमारे छात्र अर्थशास्त्र के पुराने सिद्धांतों पर पी एचडी लेते रहेंगे? नए विषय के तौर पर इन छात्रों को "इमपौर्टेंस ऑफ मॉरिशस इन इंडियन इकॉनोमी" नामक विषय पर शोधपत्र लिखकर पी एचडी की डिग्री लेनी चाहिए. देसी विश्वविद्यालयों को चाहिए कि अर्थशास्त्र के विद्यार्थियों के लिए इस विषय को आवश्यक कर दें. इससे देश की विकास दर के करीब दो प्रतिशत और बढ़ जाने की सम्भावना प्रबल हो जायेगी. हमारे जो नेता इस विषय पर पहले ही शोध ग्रंथ लिख चुके हैं उन्हें चाहिए कि वे नए आनेवाले नेताओं को अपने शोध ग्रंथ की न सिर्फ प्रतियाँ बातें बल्कि उन्हें अपनी तरफ से भी कुछ जोड़ देने के लिए प्रेरित करें. हमारी जांच एजेंसियों को चाहिए कि वे अपने अफसरों को मॉरिशस के बारे में अलग से ट्रेनिंग दें ताकि आनेवाले समय में उन्हें आर्थिक घपलों की जांच में कोई दिक्कत नहीं हो. हमारे प्रधानमंत्री को चाहिए कि वे................
Tuesday, March 8, 2011
स्कैम, एरर ऑफ जजमेंट, फुल रेस्पोंसिबिलिटी और मनी-ट्रेल - भाग १
किसी भी काल में देशवासियों के शब्दकोष में जुड़ने वाले शब्द कुछ हद तक उस रास्ते का सूचक होते हैं जिसपर देश चल रहा है. पिछले आठ-दस महीने को ही ले लीजिये, टू-ज़ी, स्कैम, सी बी आई, जे पी सी, टैपिंग, रिस्पोंसिबिलिटी, सुप्रीमकोर्ट, एरर ऑफ जजमेंट, सी वी सी, सी डब्ल्यू ज़ी, बेल अप्लिकेशन, फिक्शर्स, मॉरिशस, मनी-ट्रेल और ऐसे ही न जाने कितने शब्द हैं जो देशवासियों के न सिर्फ शब्दकोष में जगह पाकर इतरा रहे हैं बल्कि उनके जेहन में रच-बस गए हैं. जो अभी तक रचे-बसे नहीं हैं वे अपना नंबर आने का इंतजार करते हुए हमारे कर्णधारों से पूछ रहे हैं; "मेरा नंबर कब आएगा?"
ये शब्द कुछ हद तक उस रास्ते के बारे में बता भी रहे हैं जिसपर देश चल रहा है.
वैसे ये शब्द लोगों के जेहन में केवल धंसे नहीं हैं, अब तो धीरे-धीरे इन्हें बोल-चाल में इस्तेमाल भी किया जाने लगा है. हाल यह है कि अगर घर का खाना बनाने वाला महराज सब्जी के पैसों में से अपने लिए बीड़ी का बण्डल खरीद लेता है तो घर का राजा बेटा चिंटू अपने पापा से कहता है; "पापा, मुझे तो लगता है कि रामू महराज ने सब्जी के पैसे में कोई स्कैम ज़रूर किया है. आप सुप्रीमकोर्ट (यानि चिंटू ज़ी की मम्मी) से कहिये न कि वे इस मामले में इंटरफीयर करें नहीं तो रामू महराज कल को और बड़ा स्कैम करेगा."
चुन्नू गली में क्रिकेट खेलते-खेलते अगर फ्रोन्ट-फुट की बजाय बैकफुट पर शॉट खेलकर एल बी डब्ल्यू आउट हो रहा है तो पैवेलियन में वापस आकर कह रहा है; "एरर ऑफ जजमेंट हो गया. मुझे बैकफुट पर नहीं खेलना चाहिए था."
उसी मैच में अगर टीम हार जा रही है तो टीम का कैप्टेन पूरी गली के सामने इस हार की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेते हुए तपाक से यह कहकर अपना पल्ला झाड़ ले रहा है कि; "आई टेक फुल रिस्पोंसिबिलिटी फॉर दिस लॉस."
इतना कह देने भर से लोग़ उसकी वाह-वाही कर डाल रहे हैं और उसे कैपटेंसी से रिजाइन करने की जरूरत ही नहीं पड़ रही है. उसका वाइस कैप्टेन जिसने अभी तक कैप्टेन बनने के सपने संजो रखे थे, उसे समझ में नहीं आ रहा कि अब वह क्या करे? वाइस कैप्टेन यह सोचते हुए मुँह लटका ले रहा है कि; "इसने तो जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली, अब तो इसके रेजिग्नेशन की डिमांड टीम करेगी ही नहीं. अब तो इस हार की जांच के लिए जे पी सी की डिमांड भी नहीं की जा सकती."
अचानक घपलों में इस्तेमाल होनेवाले शब्द इतने महत्वपूर्ण हो गए हैं कि समझ नहीं आता कि यही शब्द इतने दिन तक कहाँ थे? अभी कल की बात है. मैं अपनी पार्ट टाइम ड्यूटी पर था यानि अपने एक मित्र के कोलैबोरेशन में देश के हालात पर चिंता व्यक्त कर रहा था. चिंता व्यक्त करते हुए मैंने उनसे कहा; "एक बात समझ में नहीं आती कि इन शब्दों ने इतने दिन तक हमारे जीवन में प्रवेश क्यों नहीं किया? क्या हम इतने गए गुजरे थे कि ये शब्द हमें इस लायक नहीं समझते थे? क्या दोष था हमारा? मैं पूछता हूँ क्या स्कैम पहले नहीं हुए थे? हमारे पास बोफोर्स था. हमारे पास सुखराम थे. हमारे पास हर्षद मेहता, केतन पारेख और ओत्तोवियो क्वात्रोकी थे. हमारे पास यू टी आई था. हमारे पास यूरिया, नरसिम्हा राव, सिबू सोरेन, साइमन मरांडी और लखूभाई पाठक थे. और तो और हमारे पास जैन ज़ी की डायरी थी. ऐसे में इस सुप्रीम कोर्ट ने पहले क्यों नहीं किया कुछ? इन शब्दों ने देशवासियों को पहले परेशान क्यों नहीं किया? क्यों नहीं ये शब्द तभी जेहन में घर बना सके?"
मित्र शायद एक साथ इतने सवालों के लिए तैयार नहीं थे. अचानक सवालों की झड़ी लगी तो सकपका गए. स्थिर हुए तो चेहरे पर दार्शनिक भाव लाते हुए बोले; "हर चीज का अपना समय होता है. जो-जो जब-जब होना है सो-सो तब-तब होता है."
उनकी बात सुनकर मुझे यह मानने में जरा भी संकोच नहीं हुआ कि विदुर या चाणक्य की नीति में यह लिखा हो या नहीं लेकिन यह हमारी संस्कृति और इतिहास में पक्के तौर पर दिखाई देता है कि जब कोई जवाब न सूझे तो आदमी को फट से दार्शनिकता नामक तिनके को थाम लेना चाहिए. तिनका डूबा देगा इस बात की चिंता बिलकुल नहीं करनी चाहिए.
इन शब्दों पर आगे बात चली तो मनी-ट्रेल नामक शब्द पर आकर रुकी. इन घपलों में जांच के दौरान मनी-ट्रेल के बारे में खूब चर्चा हो रही है. मनी-ट्रेल से मतलब रुपया जिस रास्ते गया या जिस रास्ते से आया. वैसे मैं आपको यह बताता चलूं कि मनी-ट्रेल सुनने से पता नहीं क्यों मुझे वे हवाई जहाज याद आ जाते हैं जो अपने पीछे धुआं छोड़ते जाते हैं. जब मैं छोटा था और गाँव में रहता था तो गाँव के आसमान में गुजरते हुए ऐसे हवाई जहाज को देखकर हम दोस्त कहते; "अरे देखो रॉकेट छूटा है."
आज जब भी मनी-ट्रेल नामक शब्द सुनता हूँ तो गाँव, बचपन और अपनी बेवकूफियां तो याद आती ही हैं वे हवाई जहाज भी खूब याद आ रहे हैं.
मनी-ट्रेल की कहानी भी बड़ी धाँसू निकलती है. एक दिन अखबारों से पता चला (यह उनलोगों को इम्प्रेश करने के लिए लिखा गया है जिन्हें यह शक है कि मैं अखबार नहीं पढ़ता) कि जिन कंपनियों को टू ज़ी स्पेक्ट्रम अलॉट हुआ उनमें से कुछ कंपनियों में मॉरिशस के रास्ते पैसा आया था. दूसरे दिन पता चला कि राजा बाबू को जो घूस मिला वह घूस उन्होंने मॉरिशस के रास्ते बाहर के देशों जैसे मलेशिया और मैडगासकर में इन्वेस्ट किया. पढ़कर लगा कि ऐसा भी क्या है कि देश में पैसा आये तो मॉरिशस के रास्ते और देश से पैसा जाए वो भी मॉरिशस के रास्ते?
मुझे तो यह लगता है कि जिन्हें अपने भूगोल के ज्ञान पर नाज़ है वे अगर यह पढ़ लें तो अपने ज्ञान पर शंकित होते हुए सिर खुजलाने लगेंगे. यह सोचते हुए कि अब भारतवर्ष तक आने-जाने वाला हर रास्ता क्या केवल और केवल मॉरिशस से होकर गुजरता है? और कोई रूट नहीं जिसे फॉलो करके भारत पहुँचा जा सके?
अचानक भारत की अर्थव्यवस्था में मॉरिशस का महत्व इस तरह से बढ़ गया है जितना अमेरिका और चीन का भी नहीं है. हालात यहाँ तक पहुँच गए हैं कि मुंबई में बैठे उद्योगपति को अगर उत्तर प्रदेश में अपनी कंपनी में पैसा डालना है तो वह बन्दा भी मॉरिशस के रास्ते ही पैसे को यूपी तक पहुंचाता है. वह यह करने के लिए राजी नहीं है कि मुंबई से मुंबई मेल वाया इलाहाबाद पकड़ी और दूसरे ही दिन पैसा यूपी में. ना? वह ऐसा नहीं कर सकता क्योंकि........
(जारी रहेगा)
Saturday, February 26, 2011
बजटोत्सव
जैसा कि हम जानते हैं, ये बजट का मौसम है. टीवी न्यूज चैनलों ने अपनी-अपनी औकात के हिसाब से बजट पर आम आदमी, दाम आदमी, माल आदमी, हाल आदमी, बेहाल आदमी वगैरह की डिमांड और सुझाव वगैरह वित्तमंत्री तक पहुंचाने शुरू कर दिए हैं. कोई 'डीयर मिस्टर फाइनेंस मिनिस्टर' के नाम से प्रोग्राम चला रहा है, कोई 'डीयर प्रणब बाबू' तो कोई 'वित्तमंत्री हमारी भी सुनिए' नाम से.
मुझे याद आया, एक आर्थिक संस्था द्बारा साल २००८ में आयोजित किया गया एक कार्यक्रम. 'सिट एंड राइट' नामक इस कार्यक्रम में प्रतियोगियों को बजट के ऊपर निबंध लिखने के लिए उकसाया गया था. पेश है उसी प्रतियोगिता में भाग लेने वाले एक प्रतियोगी का निबंध. सूत्रों के अनुसार चूंकि इस आर्थिक संस्था को सरकारी ग्रांट वगैरह मिलती थी, लिहाजा इस प्रतियोगी के निबंध को रिजेक्ट कर दिया गया था. आप निबंध पढिये.
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बजट एक ऐसे दस्तावेज को कहते हैं, जो सरकार के न होनेवाले इनकम और ज़रुरत से ज्यादा होनेवाले खर्चे का लेखा-जोखा पेश करता है. इसके साथ-साथ बजट को सरकार के वादों की किताब भी माना जा सकता है. एक ऐसी किताब जिसमें लिखे गए वादे कभी पूरे नहीं होते. सरकार बजट इसलिए बनाती है जिससे उसे पता चल सके कि वह कौन-कौन से काम नहीं कर सकती. जब बजट पूरी तरह से तैयार हो जाता है तो सरकार अपनी उपलब्धि पर खुश होती है. इस उपलब्धि पर कि आनेवाले साल में बजट में लिखे गए काम छोड़कर बाकी सब कुछ किया जा सकता हैं.
सरकार का चलना और न चलना उसकी इसी उपलब्धि पर निर्भर करता है. कह सकते हैं कि सरकार है तो बजट है और बजट है तो सरकार है.
सरकार के तमाम कार्यक्रमों में बजट का सबसे ऊंचा स्थान है. बजट बनाना और बजटीय भाषण लिखना भारत सरकार का एक ऐसा कार्यक्रम है जो साल में सिर्फ़ एकबार होता है. सरकार के साथ-साथ जनता भी पूरे साल भर इंतजार करती है तब जाकर एक अदद बजट की प्राप्ति होती है. वित्तमंत्री फरवरी महीने के अन्तिम दिन बजट पेश करते हैं. वैसे जिस वर्ष संसदीय लोकतंत्र की मजबूती जांचने के लिए चुनाव होते हैं, उस वर्ष 'सम्पूर्ण बजट' का मौसम देर से आता है.
भारतीय बजट का इतिहास पढ़ने से हम इस नतीजे पर पहुँचते हैं कि पहले बजट की पेशी शाम को पाँच बजे होती थी. बाद में बजट की पेशी का समय बदलकर सुबह के ११ बजे कर दिया गया. ऐसा करने के पीछे मूल कारण ये बताया गया कि अँग्रेजी सरकार पाँच बजे शाम को बजट पेश करती है लिहाजा भारतीय सरकार भी अगर शाम को पाँच बजे बजट पेश करे तो उसके इस कार्यक्रम से अँग्रेजी साम्राज्यवाद की बू आएगी.
कुछ लोगों का मानना है कि बजट सरकार का होता है. वैसे जानकार लोग यह बताते हैं कि बजट पूरी तरह से उसे पढ़ने वाले वित्तमंत्री का होता है. बजट लिखने से ज्यादा महत्वपूर्ण काम बजट में 'कोट' की जाने वाली कविता के सेलेक्शन का होता है. ऐसा इसलिए माना जाता है कि बजट पढ़ने पर तालियों के साथ-साथ कभी-कभी गालियों का महत्वपूर्ण राजनैतिक कार्यक्रम भी चलता है लेकिन बजटीय भाषण के दौरान जब मेहनत करके छांटी गई कविता पढ़ी जाती है तो केवल तालियाँ बजती हैं.
बजट में कोट की जाने वाली कविता किसकी होगी, ये वित्त मंत्री के ऊपर डिपेण्ड करता है. जैसे अगर वित्तमंत्री तमिलनाडु राज्य से होता है तो अक्सर कविता महान कवि थिरु वेल्लूर की होती है. अगर वित्तमंत्री पश्चिम बंगाल का हो तो फिर कविता कविगुरु रबिन्द्रनाथ टैगोर की होती है. लेकिन वित्तमंत्री अगर उत्तर भारत के किसी राज्य या तथाकथित 'काऊ बेल्ट' का होता है तो कविता या शेर किसी भी कवि या शायर से उधार लिया जा सकता है, जैसे दिनकर, गालिब वगैरह वगैरह.
नब्बे के दशक तक बजटीय भाषणों में सिगरेट, साबुन, चाय, माचिस, मिट्टी के तेल, पेट्रोल, डीजल, एक्साईज, सेल्स टैक्स, इन्कम टैक्स, सस्ता, मंहगा जैसे सामाजिक शब्द भारी मात्रा में पाये जाते थे. लेकिन नब्बे के दशक के बाद में पढ़े गए बजटीय भाषणों में आर्थिक सुधार, डॉलर, विदेशी पूँजी, एक्सपोर्ट्स, इम्पोर्ट्स, ऍफ़डीआई, ऍफ़आईआई, फिस्कल डिफीसिट, मुद्रास्फीति, आरबीआई, ऑटो सेक्टर, आईटी सेक्टर, इन्फ्लेशन, बेल-आउट, स्कैम जैसे आर्थिक शब्दों की भरमार रही. ऐसे नए शब्दों के इस्तेमाल करके विदेशियों और देश की जनता को विश्वास दिलाया जाता है कि भारत में बजट अब एक आर्थिक कार्यक्रम के रूप में स्थापित हो रहा है.
वैसे तो लोगों का मानना है कि बजट बनाने में पूरी की पूरी भूमिका वित्तमंत्री और उनके सलाहकारों की होती है लेकिन जानकारों का मानना है कि ये बात सच नहीं है. जानकार बताते हैं कि बजट के तीन-चार महीने पहले से ही औद्योगिक घराने और अलग-अलग उद्योगों के प्रतिनिधि 'गिरोह' बनाकर वित्तमंत्री से मिलते हैं जिससे उनपर दबाव बनाकर अपने हिसाब से बजट बनवाया जा सके.
जानकारों की इस बात में सच्चाई है, ऐसा कई बार बजटीय भाषण सुनने से और तमाम क्षेत्रों में भारी मात्रा में दी जाने वाली छूट और लूट वगैरह को देखकर पता चलता है. कुछ जानकारों का यह मानना भी है कि सरकार ने कई बार बजट निर्माण के कार्य का निजीकरण करने के बारे में भी विचार किया था लेकिन सरकार को समर्थन देनेवाली पार्टियों के विरोध पर सरकार ने ये विचार त्याग दिए.
बजट का भाषण कैसे लिखा जाए, यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि कौन से पंथ पर चलने वाले सरकार को समर्थन दे रहे हैं. जैसे अगर सरकार को वामपंथियों से समर्थन मिलता है तो निजीकरण, सुधार जैसे शब्द भारी मात्रा में नहीं पाए जाते. उस स्थिति में सुधार की जगह उधार जैसे शब्द ले लेते हैं. वहीँ, अगर सरकार को समर्थन की ज़रुरत न पड़े तो फिर वो जो चाहे, जहाँ चाहे वैसे शब्द सुविधानुसार लिख लेती है.
बजट के मौसम में सामाजिक और राजनैतिक बदलाव भारी मात्रा में परिलक्षित होते हैं. 'बजटोत्सव' के कुछ दिन पहले से ही वित्तमंत्री के पुतले की बिक्री बढ़ जाती है. ऐसे पुतले बजट प्रस्तुति के बाद जलाने के काम आते हैं. कुछ राज्यों में 'सरकार' के पुतले जलाने का कार्यक्रम भी होता है. पिछले सालों में सरकार के वित्त सलाहकारों ने इन पुतलों की मैन्यूफैक्चरिंग पर इक्साईज ड्यूटी बढ़ाने पर विचार भी किया था लेकिन मामले को यह कहकर टाल दिया गया कि इस सेक्टर में चूंकि छोटे उद्योग हैं तो उन्हें सरकारी छूट का लाभ मिलना अति आवश्यक है.
पुतले जलाने के अलावा कई राज्यों में बंद और रास्ता रोको का राजनैतिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होता है. बजट का उपयोग सरकार को समर्थन देने वाली राजनैतिक पार्टियों द्वारा समर्थन वापस लेने की धमकी देने में भी किया जाता है.
बजट प्रस्तुति के बाद पुतले जलाने, रास्ता रोकने और बंद करने के कार्यक्रमों के अलावा एक और कार्यक्रम होता है जिसे बजट के 'टीवीय विमर्श' के नाम से जाना जाता है. ऐसे विमर्श में टीवी पर बैठे पत्रकार और उद्योगपति बजट देखकर वित्तमंत्री को नम्बर देने का सांस्कृतिक कार्यक्रम चलाते हैं. देश में लोकतंत्र है, इस बात का सबसे अच्छा उदाहरण बजट के दिन देखने को मिलता है. एक ही बजट पर तमाम उद्योगपति और जानकार वित्तमंत्री को दो से लेकर दस नम्बर तक देते हैं. लोकतंत्र पूरी तरह से मजबूत है, इस बात को दर्शाने के लिए ऐसे कार्यक्रमों में बीच-बीच में 'आम आदमी' का वक्तव्य भी दिखाया जाता है.
भारतीय सरकार के बजटोत्सव कार्यक्रम पर रिसर्च करने के बाद हाल ही में कुछ विदेशी विश्वविद्यालयों ने अर्थशास्त्र के विद्यार्थियों के पाठ्यक्रम में भारतीय बजट के नाम से एक नया अध्याय जोड़ने पर विमर्श शुरू कर दिया है. कुछ विश्वविद्यालयों का मानना है; 'अगर भारत सरकार के बजट को पाठ्यक्रम में रखा जाय तो न सिर्फ अर्थशास्त्र के विद्यार्थियों को लाभ मिलेगा अपितु राजनीतिशास्त्र के विद्यार्थी भी लाभान्वित होंगे.'
आशा है भारतीय सरकार के बजट की पढ़ाई एकदिन पूरी दुनियाँ में कम्पलसरी हो जायेगी. भारतीय बजट दिन दूनी और रात चौगुनी तरक्की करेगा.
जय हिंद का बजट
Thursday, February 17, 2011
काहे नहीं एक शायर रिक्रूट कर लेते?
अगले सप्ताह रेलमंत्री ममता बनर्जी रेल बजट पेश कर देंगी. जब वे पेश करेंगी तब एकाध शेर भी कहेंगी. जब कहेंगी तब मैं उसके भावार्थ निकालने का वादा करता हूँ. लेकिन अभी तो आप पिछले रेल बजट उनके द्वारा कहे गए शेर का भावार्थ बढिए. पुरानी पोस्ट है:-)
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ममता बनर्जी जी ने रेल बजट पेश कर दिया. करना ही था. बजट होता ही है पेश करने के लिए सो उन्होंने कर दिया. बजटीय परंपरा निभाते हुए उन्होंने बजट के साथ-साथ शेर भी पेश किया. शेर था;
रोशनी चाँद से होती है सितारों से 'नेहीं'
मोहब्बत कामयाबी से होती है जुनून से 'नेहीं'
ममता जी शेर से बिलकुल 'नेहीं' डरीं. सीधा उसे पेश कर दिया. वैसे भी अब शेरों से कम ही लोग डरते हैं. ऐसे में ममता जी क्यों डरें?
लेकिन एक बात समझ में नहीं आई. वे तो पश्चिम बंगाल से चुनकर गई हैं. ऐसे में उन्हें गुरुदेव की कोई कविता सुनानी चाहिए थी. गुरुदेव की कविता क्यों नहीं सुनाई उन्होंने? शायद उन्हें गुरुदेव की कविता याद न हो. चलिए माना कि उन्हें गुरुदेव की कविता याद नहीं थी तो उन्होंने नहीं सुनाई लेकिन कवि सुकान्त की ही कविता सुना देतीं.
मैंने अपने एक मित्र से कहा; "और कुछ नहीं तो कवि सुकांत की ही कविता सुना देनी चाहिए थी उन्हें."
मित्र बोले; "अरे तुम्हें मालूम नहीं क्या? कवि सुकांत बुद्धदेव बाबू के चाचा जी थे. ऐसे में ममता जी उनकी कविता क्यों सुनाएं? वैसे भी ममता जी बंगाल के किसी कवि की कविता सुनाती तो लालू जी उनके ऊपर आरोप लगा देते कि वे भारत की रेलमंत्री होकर ऐसे काम कर रही हैं जिसे देखकर लग रहा है कि वे भारत की नहीं बल्कि पश्चिम बंगाल की रेलमंत्री हैं."
मुझे समझ मे आ गया कि उन्होंने शेर क्यों पेश किया.
लेकिन ऐसा शेर?
इससे बढ़िया शेर तो हमारे मोहल्ले के पप्पू जी सुनाते हैं. ममता जी पप्पू जी से ही शेर लिखवा लेतीं. वैसे भी बजट चाहे वित्तमंत्री पढ़ते हों या रेलमंत्री, वे कविता या शेर जरूर पढ़ते हैं. अपने इस कर्म से बाज तो आयेंगे नहीं. ऐसे में तो उन्हें मंत्रालय के लिए शायर और कवि रिक्रूट कर लेने चाहिए. भाई, अगर आप पुराने कवियों या शायरों की रचनाएँ बजट के साथ नहीं पेश करना चाहते तो कम से कम इतना तो करें कि अपने मंत्रालय में कुछ कवि और शायर रिक्रूट कर लें. संसद और देश इस तरह के शेर सुनने से तो बच जाएगा.
लेकिन जो शेर ममता जी ने पढ़ा उसका मतलब क्या हो सकता है?
अब शेर और कविता का मतलब सबके लिए समान हो तो फिर साहित्यिक झमेले ही न हों. आलोचकों की ज़रुरत ही न पड़े. कविताओं और शेरों के भावार्थ-उद्योग पर ताला लग जाए.
तो पेश है ममता जी के पढ़े गए शेर का मतलब जो अलग-अलग लोगों के लिए बिलकुल अलग-अलग है.
प्रधानमंत्री जी के विचार:
देखो जी, ममता जी ने जो शेर पढ़ा, वो हमारी पिछली सरकार के रवैये को बिलकुल साफ़ करते हुए उसे आगे बढ़ाता है. आपको याद हो तो मैंने अपने एक भाषण में कहा था कि देश के संसाधनों पर माइनोरिटी कम्यूनिटी का हक़ सबसे पहले है. अब आप अगर ममता जी के शेर की पहली लाइन पढेंगे तो आपको पता चल जाएगा कि चाँद माइनोरिटी में है और तारे मेजोरिटी में. लेकिन रोशनी की बात होती है तो चाँद का ही बोलबाला रहता है. तारे कितने भी हों, वे रोशनी नहीं फैला सकते. जहाँ तक दूसरी लाइन की बात है तो मैं इतना ही कहना चाहूँगा मोहब्बत होनी ही चाहिए. मोहब्बत रहने से कामयाबी मिलती रहेगी. क्योंकि कामयाबी के रास्ते में अगर जुनून आ गया तो हम देखेंगे कि कोई जुनूनी नेता ने सरकार की कामयाबी से जलते हुए सपोर्ट वापस ले लिया. सरकार गिर जायेगी..... चंगा शेर पढ़ा है जी ममता जी ने.
भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता
यात्री किराए और माल भाड़े में कोई वृद्धि ही नहीं हुई. हम बहुत निराश हो गए थे. हमें चिंता सताने लगी थी कि हम किस मुद्दे पर विरोध करेंगे? वो तो भला हो ममता जी का जिन्होंने यह शेर पढ़कर हमें उबार लिया. शेर की दोनों लाइन पर हमें आपत्ति है. पहली लाइन पढ़कर हमें गुस्सा आया कि चाँद माइनोरिटी में है लेकिन पूरी रोशनी पर कब्ज़ा किये बैठा है. वहीँ तारे मेजोरिटी में हैं लेकिन उनकी कोई सुनवाई नहीं है. उन्हें रोशनी के लिए जिम्मेदार माना ही नहीं जा रहा है. यह किस तरह की सोच है? और दूसरी लाइन पढिये. मोहब्बत कामयाबी से होती है....यह कहकर हमारे ऊपर फब्ती कसी जा रही है कि हम २००४ के चुनावों में कामयाब नहीं हुए इसलिए हमारे सहयोगी दलों ने हमसे मोहब्बत तोड़ ली थी...इस शेर की वजह से हम इस रेल बजट का विरोध करते हैं.
कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता
ममता जी ने जो शेर पढ़ा है उसका भावार्थ यह है कि हमारी पार्टी और उनकी पार्टी मिलकर काम कर रहे हैं. मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि उनके शेर की पहली लाइन में लिखा है कि रोशनी चाँद से होती है सितारों से नहीं.......कहने का मतलब यह कि इस गठबंधन में कांग्रेस ही चाँद है. तृणमूल कांग्रेस, पवार जी की कांग्रेस, डी एम के वगैरह सब तारे हैं. मतलब यह कि सरकार जितनी रोशनी बिखेरेगी, वो सारी रोशनी कांग्रेस पार्टी की है. तारे तो ऐं वें ही हैं जी...उनका कोई खास रोल नहीं है. वैसे भी इस शेर को पढ़कर ममता जी ने बता दिया है कि उन्हें समझ में आने लगा है कि चाँद कौन है और सितारे कौन...जहाँ तक दूसरी लाइन की बात है तो उसका अर्थ यह है कि कांग्रेस पार्टी कामयाब है इसलिए समर्थन देने वाली पार्टियों को उससे मोहब्बत है. बी जे पी वाले जुनूनी लोग हैं इसलिए ममता जी को उनसे मोहब्बत नहीं हुई
लालू प्रसाद जी
ममता बनर्जी को रेल के बारे में का मालूम है? उनको का मालूम कि शेर का होता है. ई भी कोई शेर है? पिछला साल जब हम रेल बजट पढ़े थे तो बोले थे कि होल इंडिया कह रहा है चक दे रेलवे....आज कोई नहीं कह रहा है कि चक दे रेलवे...ई शेर पढने से मंत्रालय चलता है?...पढ़ने से नहीं चलता बल्कि पढ़ाने से चलता है...देखा नहीं था का हमको, आई आई एम में पढ़ाने गए थे हम...तब जाकर पांच साल रेल मंत्रालय चला था...का कहा? ई शेर पर हमारा का विचार है...धुत्त...इससे बढ़िया शेर तो हमारा ऊ कवि लिखता है...अरे उहे जो हमारे ऊपर चालीसा लिखा था...का नाम था उसका...हाँ, रतिराम...का बताएँगे इहाँ...बाईटे में शेर का मतलब बता दें?...शेर का मतलब जानना है त स्टूडियो में बुलाओ..ओइसे भी आजकल तुमलोग बोलाता नहीं है...
एक रेलयात्री के विचार
ममता जी ने बढ़िया शेर पढ़ा है. इस शेर को पढ़कर उन्होंने अपनी और अपने सरकार की स्थिति स्पष्ट कर दी है. उनके कहने का मतलब है कि रोशनी चाँद से होती है, इसका मतलब यह है कि रेलवे चाँद की तरह चमके, ऐसा होने का कोई चांस नहीं है. उनके कहने का तात्पर्य है कि रोशनी चाँद से होती है लेकिन चाँद बहुत दूर है. कोई-कोई प्रेमी जैसे प्रेमिका से वादा करता है कि तुम्हारे लिए सितारे तोड़ लाऊँगा वैसे ही ममता जी स्पष्ट कर रही हैं कि सितारे तो ला दूं लेकिन उससे कोई रोशनी नहीं होगी. कोई फायदा नहीं होगा तारे लाने से और चाँद हम ला नहीं सकते. बहुत वजन होता है चाँद का. ऐसे में आपलोग रेलवे के साथ मोहब्बत से रहे. मोहब्बत है तो हमें भी कामयाब समझा जाएगा. गाड़ी-वाड़ी लेट चलने से आपलोग जुनूनी मत हो जाइयेगा......
Wednesday, February 9, 2011
धमकी पुराण
एक दिन वामपंथी हिसाब लगाने बैठे. इस बात का नहीं कि नंदीग्राम में उन्होंने क्या किया बल्कि हिसाब इस बात का कि उन्होंने साल २००७ में कितनी बार कांग्रेस और केन्द्र सरकार को धमकी दी. हिसाब लगाकर इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि साल २००७ में बड़े नेता, छोटे नेता, महत्वपूर्ण नेता, बेकार नेता सभी नेताओं की धमकी को मिलाकर कुल तीन हजार सात सौ सत्ताईस धमकियाँ दी गईं. वामपंथियों ने अपने प्रदर्शन पर संतोष जाहिर किया. वे अपने प्रदर्शन पर प्रस्ताव पारित करने ही वाले थे कि एक नेता पूछ बैठा; "हमारी इन धमकियों का सरकार के ऊपर क्या असर हुआ?"
एक वरिष्ठ नेता ने बताया; "असर की देखें, तो कोई असर नहीं हुआ. और फिर हमारी धमकियों से कोई असर हो, ये जरूरी नहीं. धमकी देने से हमें जो फायदा हुआ, केवल उसके बारे में सोचना चाहिए."
"लेकिन हमने इस बात का हिसाब नहीं लगाया कि हमें इन धमकियों से क्या फायदा हुआ"; पहले नेता ने कहा.
फिर क्या था. एक कमिटी बना दी गई. उसे कहा गया कि वो इस बात का पता लगाए कि वामपंथियों को धमकियों से क्या फायदा हुआ. दो दिन बाद कमिटी ने अपनी रिपोर्ट में बताया;
हमने हमारे नेताओं द्वारा दी गई धमकियों की समग्र जांच की. अपनी जांच से हम इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि हमने जो धमकियाँ दी थी उससे हमें सबसे बड़ा फायदा ये हुआ कि धमकी देने की हमारी प्रैक्टिस होती रही. कुछ और फायदे हैं लेकिन कमिटी का मानना है कि उन फायदों को सार्वजनिक नहीं किया जाना चाहिए. कमिटी अपने सुझाव के तौर पर ये भी कहना चाहती है कि बदलाव के लिए हम कुछ दिनों के लिए सरकार को धमकी देना बंद कर दें.
कमिटी के सुझाव को मान लिया गया. दूसरे दिन ही वामपंथियों ने सार्वजनिक तौर पर घोषणा की कि वे नए प्रयोग के तहत अब से सरकार को धमकी नहीं देंगे. वामपंथियों की इस घोषणा से सरकार खुश हो गई. कांग्रेस पार्टी ने भी वामपंथियों की सराहना की. सरकार और पार्टी दोनों को विश्वास हो गया कि अब सरकार अपना काम शांति-पूर्वक करेगी.
अभी कुछ दिन ही बीते थे कि सरकार के कई मंत्रियों ने वामपंथियों की शिकायत करनी शुरू कर दी. एक मंत्री ने संवाददाता सम्मेलन में कहा; " पिछले पूरे एक साल से हमें वामपंथियों के धमकियों की आदत सी लग गई थी. उनकी धमकियों के बीच सरकार चलाने का अपना मज़ा था. जब भी वे धमकी देते थे तो हमें लगता था कि हम वाकई काबिल हैं जो उनकी धमकियों के बावजूद सरकार चला रहे हैं. लेकिन वामपंथियों ने धमकियों को बंद कर हमारे साथ अच्छा नहीं किया."
पत्रकार मंत्री जी के ऐसे बयान सुनकर दंग रह गए. उन्हें लगा कि ऐसा कैसे हो सकता है कि धमकी बंद होने की वजह से भी सरकार को परेशानी हो. एक पत्रकार ने मंत्री जी से पूछा; "लेकिन आपको तो खुश होना चाहिए कि वामपंथियों ने धमकी देना बंद कर दिया. अब तो आप चैन के साथ अपना काम कर सकते हैं."
मंत्री जी ने अपनी बात का खुलासा करते हुए कहा; "असल में वामपंथी जब धमकी देते थे तो हमें जनता से बहुत सहानुभूति मिलती थी. लोग ये सोचकर संतोष कर लेते थे कि दबाव के चलते सरकार अपना काम नहीं कर पा रही है. लेकिन जब से इनलोगों ने धमकी देना बंद कर दिया है, जनता आए दिन सवाल करती है कि अब आप अपना काम क्यों नहीं करते? अब तो वामपंथियों ने धमकी बंद कर दी है. अब जनता को पता चल गया है कि हम अपना काम नहीं नहीं कर सकते, वामपंथी धमकी दें या न दें."
पत्रकारों को अबतक मंत्री जी की बात समझ में आ गई थी.
सुनने में आया है कि सरकार ने वामपंथियों को धमकी देना शुरू कर दिया है. कुछ लोगों का मानना है कि सरकार ने वामपंथियों को धमकी दी है कि; 'आपलोग सरकार को धमकी देना फिर से शुरू कर दें नहीं तो हम आपका समर्थन आपको वापस दे देंगे.'
नोट: यह पोस्ट मैंने २८ दिसंबर २००७ को लिखी थी. आज जब आफिस में यह बात हो रही थी कि पहले तो हमारी सरकार के मंत्री यह बहाना बनाते थे कि हर मामले में लेफ्ट वालों की धमकियों की वजह से वे काम नहीं कर पा रहे. लेकिन जब लेफ्ट समर्थन नहीं दे रहा और धमकियों का कहीं सवाल ही नहीं उठता तब भी हमारे मंत्री काम नहीं कर पा रहे. मुझे यह पोस्ट याद आ गई और मैंने एक बार फिर से पब्लिश कर दिया है. जिन्होंने नहीं बांचा होगा वे बांच लेंगे. नहीं बांचेंगे तो भी कोई बात नहीं.
Friday, February 4, 2011
बीरबल का ईनाम
बीरबल आज फिर से बहुत प्रसन्न थे. वैसे प्रसन्न रहना उनके लिए कोई नई बात नहीं थी. उन्हें जो भी देखता, यही सोचता कि ये इंसान प्रसन्न रहने के लिए ही इस धरा पर आया है. एक बार फिर से उन्होंने अपनी बुद्धि का लोहा मनवा लिया था. बादशाह के साथ सारे दरबारी खुश नज़र आ रहे थे.
बीरबल बाबू से जलने वाले दरबारी खुश दीखने की एक्टिंग कर रहे थे. उनसे जलने वाले दरबारियों के पास और कोई चारा नहीं था. इनलोगों ने मन ही मन सोच लिया था कि जलने-भुनने का काम 'ऐज यूजुवल' दरबार से बाहर निकलने के बाद कर लेंगे. बीरबल बाबू जितनी बार अपनी तीक्ष्ण बुद्धि का प्रदर्शन करते, उनसे जलने वाले दरबारियों का खून कम हो जाता.
वैसे आज इन दरबारियों का खून कुछ ज्यादा ही जलने वाला था.उसका कारण यह था कि बादशाह जी ने बीरबल को ईनाम में दो सौ किलो चावल और पचास किलो मसूर की दाल और एक क्विंटल प्याज दिया था. इतना कीमती ईनाम पाकर बीरबल की प्रसन्नता दूनी हो गई थी.
उनसे जलने वाले दरबारी ये सोचते हुए दुखी थे कि 'एक बीरबल है जिसे आज ईनाम में चावल, दाल और प्याज मिली और एक हम हैं, जिन्हें मुद्राओं से संतोष करना पड़ता है. पता नहीं हमारे दिन ऐसे कब आयेंगे जब हमें भी ईनाम में यह सबकुछ मिलेगा.
ऐसा पहली बार हुआ था कि बीरबल को ईनाम में चावल, दाल और प्याज की प्राप्ति हुई थी. कारण ये था कि बादशाह अकबर आज कुछ ज्यादा ही खुश हो लिए थे. बादशाहों को खुश होने के अलवा और काम ही क्या था? उनके पास दो ही तो काम थे. या तो बैठे-बैठे बोर हो लें या फिर खुश हो लें. कई बार बोरियत से बचने की कोशिश करते तो खुशी अपने आप डेरा दाल देती.
कई लोगों का तो ये भी मानना था कि 'बादशाह दरबार में हंसने का उपक्रम ख़ुद ही करते हैं.'
आज बीरबल बाबू की बुद्धि का लोहा मानते हुए उन्होंने बीरबल से कहा;"बीरबल, आज हम तुम्हारी बुद्धि पर ज़रूरत से ज्यादा खुश हैं. यही कारण है कि आज हम तुम्हें कोई कीमती चीज देना चाहता हैं. वैसे भी तुम्हें ईनाम में मुद्राएं देते-देते हम बोर हो चुके हैं."
बादशाह जी की बात सुनकर बीरबल धन्य हो गए. बोले; "ये तो आलमपनाह की नाचीज पर दया है, वरना कीमती चीज पाने की हमारी क्या औकात?"
बादशाह को जोश दिलाने और अपने लिए ईनाम की राशि दूनी करवाने का इससे अच्छा साधन और क्या हो सकता है कि दरबारी अपनी औकात को पाताल तक पहुँचा दे? वैसे भी, कितना भी बुद्धिमान दरबारी हो, अगर बादशाह के सामने अपनी औकात को जीरो न बताये तो उसको दरबारत्व का ज्ञान लेने वापस पाठशाला चले जाना चाहिए.
बीरबल का तीर सही निशाने पर लगा. उनकी औकात वाली बात पर बादशाह अकबर का जोश कुलांचे मारने लगा. वे बोले; "नहीं-नहीं, ऐसा मत कहो बीरबल. तुम सचमुच कीमती चीज डिजर्व करते हो. बस, ये बताओ कि तुम्हें क्या चाहिए?"
बादशाह की बात सुनकर बीरबल बोले; "जहाँपनाह, जैसे आप मुद्राएं देकर बोर हो लिए हैं, उसी तरह मैं लेकर बोर हो गया हूँ. आप जो मुद्राएं ईनाम में देते हैं, उसे लेकर जब घर पहुँचता हूँ तो और पत्नी को बताता हूँ कि आज ईनाम में मुद्राएं मिलीं, तो पत्नी ताने मारती है. कहती है मुझ जैसे निकम्मे को इनाम में और क्या मिलेगा?"
"तो क्या तुम्हारी पत्नी खुश नहीं होती?"; बादशाह ने बीरबल से पूछा.
बादशाह की बात सुनकर बीरबल ने कहा; "कैसे खुश होगी, आलमपनाह? मुद्रा पाकर आज के ज़माने में कौन गृहणी खुश रहेगी?"
ये कहते हुए बीरबल मन ही मन मुस्कुरा रहे थे. सोच रहे थे 'मुद्रा की जगह स्वर्ण आभूषण रहता तो ये ताने मारने का कार्यक्रम होता ही नहीं.'
बीरबल की बात सुनकर बादशाह जी को बड़ा आश्चर्य हुआ. कोई मुद्राएं पाकर खुश न हो, ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था. वे बोले; "तो क्या तुम्हारी पत्नी की निगाह में मुद्राओं की कोई कीमत नहीं है?"
बादशाह की बात सुनकर बीरबल बाबू को समझ नहीं आया कि वे क्या कहें? लेकिन बहुत साहस बटोर कर बोले; "आपके राज की मुद्रा की घटती कीमत का अंदाजा आपको नहीं है आलमपनाह. वैसे आपके के राज में चलने वाली मुद्रा की कीमत कितनी गिरी है, इसका अंदाजा आपको कैसे लगेगा?"
"क्या मतलब है तुम्हारा?"; बादशाह ने अचम्भे से पूछा.
"आपको शायद मालूम नहीं जहाँपनाह कि आपके राज में चलने वाली मुद्रा से खरीदारी करने पर आजकल झोले में कुछ नहीं आता. वैसे भी आपको इस बात की जानकारी कौन देगा? आपके पास जितना समय है, वो तो हँसने या फिर हँसने की कोशिश करने में चला जाता है. ऊपर से या तो आप महल से निकलते ही नहीं, या फिर निकलते हैं तो कूटनीति की प्रैक्टिस करने परदेस चले जाते हैं"; बीरबल बाबू ने बादशाह के करीबी होने का फायदा उठाते हुए सच कह डाला.
बीरबल बाबू की बात सुनकर बादशाह जी कुछ सोचने लगे. सोचते हुए बोले; "तो कोई बात नहीं. मैं तुम्हें ईनाम में एक कार दे देता हूँ."
बादशाह की बात सुनकर बीरबल ने मन ही मन अपना माथा ठोक लिया. बोले; "कार तो दे देंगे जहाँपनाह, लेकिन पेट्रोल की कीमत का जो हाल है, मैं कार लेकर करूंगा क्या? देना ही है तो कोई सच में कीमती चीज दीजिये."
"तो तुम्ही बताओ, तुम्हें क्या चाहिए?"; बादशाह ने बीरबल से पूछा.
"आप देना ही चाहते हैं तो मुझे चावल और दाल दे दें. और अगर उसके साथ में प्याज मिल जाती तो मेरा यह जनम सफल हो जाता. आजकल यही सबसे कीमती चीज है"; बीरबल ने कीमती सामान का नाम बता दिया.
बादशाह ने मंत्री को आदेश दिया कि बीरबल को ईनाम में चावल, दाल और प्याज दे दिया जाय. बीरबल बाबू को जब यह सबकुछ मिल गया तो बादशाह ने पूछा; "बीरबल तुमने चावल, और प्याज क्यों माँगा?"
बीरबल बोले; "आलमपनाह, जिस तरह से आपके राज्य में कृषि की जमीन लगातार कम होती जा रही है, मेरी बुद्धि कहती है कि आनेवाले दिनों में चावल, दाल और गेंहूं ही सबसे कीमती रहेंगे. वैसे भी किसान आत्महत्या करते जा रहे हैं. जमीन की कमी के साथ-साथ किसानों की कमी हो जायेगी तो खेती-बाड़ी का काम क्या आपके नौ रत्न करेंगे? इसीलिए मैं अभी से खाने-पीने की चीजें इकठ्ठा करने में लगा हूँ."
बादशाह जी बीरबल की बुद्धि पर एक बार फ़िर से फ़िदा हो गए. खुश होते हुए बोले; "मैं एक बार फिर तुम्हारी बुद्धि पर फ़िदा हो गया हूँ. बोलो, तुम्हें और क्या चाहिए?"
बादशाह को अधिकार है कि वह जब चाहे, जिस चीज पर चाहे फ़िदा हो सकता है.
उनकी बात सुनकर बीरबल बोले; " आपसे एक वचन चाहिए. जो दरबारी मुझसे जलते हैं, आज से आप उन्हें ईनाम में मिड-कैप कंपनियों के शेयर दिया करेंगे."
बादशाह जी ने बीरबल को वचन दे दिया. ईनाम लिए बीरबल घर की तरफ़ रवाना हो गए.
Monday, January 17, 2011
अब महंगाई रुकेगी
कभी-कभी यह तय करने में मुश्किल होती है कि अपने देश में समस्याएं हैं या समस्याओं में अपना देश है. वैसे विद्वानों की मानें तो देश है तो समस्या है. समस्या है तो बहस है. बहस है तो ऑप्शंस हैं. ऑप्शंस हैं तो फैसला है. फैसला है तो गलती है...अरे मैं यह क्या लेकर बैठ गया. नए-नवेले ब्लॉगर की यही समस्या है. चांस मिला नहीं कि निकल पड़ा किसी शायर की नक़ल करने.
हाँ, तो मैं कह रहा था कि देश में समस्याएं हैं. आज सबसे बड़ी समस्या है महंगाई की. इतनी बड़ी कि सब्जियों तक को समझ नहीं आता कि कहाँ तक बढें क्योंकि ऊपर जाने के लिए जगह ही जगह है. लोग सुझाव दे रहे हैं. लोग सुझाव ले रहे हैं. कभी लगता है कारण खोज लिए गए हैं तो दूसरे ही दिन लगता है कि कारणों का पता ही नहीं है. किताबी अर्थशास्त्री हैं तो दूसरी तरफ व्यावहारिक व्यवसायी है. ऐसे में जितने मुँह उतनी बातें. हमारे संवाददाता ने देश में घूमकर तमाम लोगों से मंहगाई के कारणों और उसे रोकने के उपायों पर बात की. पढ़िए कि लोगों ने क्या कहा:
कौशिक बसु, चीफ इकॉनोमिक एडवाइजर टू इकॉनोमिस्ट प्राइम मिनिस्टर: "वी हैव टू लुक इन टू द प्रॉब्लम टू फाइंड द रीजन ऑफ दिस प्राइस राइज. महंगाई के कई कारण होते हैं. महंगाई बढ़ने का सबसे बड़ा कारण होता है डिमांड और सप्लाई. जब चीजों की डिमांड उसकी सप्लाई से बढ़ जाती है तो महंगाई आ जाती है. सी, अकार्डिंग टू द ला ऑफ सप्लाई, सप्लाई एंड प्राइस आर प्रपोर्स्नल...द हायर ऐन आइटम्स प्राइस, द मोर विल बी द सप्लाई....डिमांड इज इन्वार्सली प्रोपर्स्नल टू......"
प्रणब मुखर्जी, फिनांस मिनिस्टर, ट्रबल शूटर एंड परसेंटेज रीडर: "देयार आर सोम कोंसोर्न ओभार द प्राइस राइज. उइ आर लूकिंग इनटू द प्रोब्लोम एंड उइ थींक दैट रोबी क्रोप उविल ब्रिंग द प्राइसेज डाउन इन द मांथ ऑफ मार्च....उइ थींक दैट पीपूल शूड बे हैपी वीथ द एट प्वाइंट फाइव पारसेंट जी डी पी ग्रोथ..."
राम निवाश मिश्रा, 'फार्मर', सकरपुरा, सहरसा, बिहार: "बस अब बहुत हो गया. ई लोग अगर महंगाई नहीं रोक पा रहा है त मिलिट्री को काहे नहीं बुलाता? हमारे देश में बाढ़ आता है त मिलिट्री को बुलाया जाता है. प्रिंस कुआं में फंस जाता है त मिलिट्री ही निकलता है. ऐसे में ई मंहगाई एतना बढ़ रहा है त सरकार उसको रोकने के लिए भी मिलिट्री को काहे नहीं बुलाता? हमसे पूछते हैं त हम तो एही कहेंगे कि एक ही सलूशन है ई समस्या का. मिलिट्री."
सनल एडमरुकू, प्रेसिडेंट, इन्डियन रेशनेलिस्ट एशोसियेशन एंड ग्रेट बिलीवर इन पॉवर ऑफ साइंस: "अमारा कहना ये कि गवर्नमेंट महंगाई की प्रॉब्लम को सॉल्व करने के लिए यिनडियन यिस्पेस रिसर्च यार्गेनाइजेशन से कहे. देको इस कंट्री की हर प्रॉब्लम का सलूशन साइंस के पास है. अबी मंहगाई ईतनी ऊपर चला गया है कि यिसरो ही बता सकता है कि केतना ऊपर है और उसको उतना ऊपर से लाने के लिए क्या करना है...."
तुषार जी महाराज, जैन धर्म के ज्ञानी: "प्याज का दाम बढ़ना एक तरह से स्वामी महावीर जी का पूरी दुनिया को यह बताने का तरीका है कि प्याज एक तामसिक आहार है और उसे खाने से मानव सभ्याता का विनाश निश्चित है. यह इशारा है कि ...."
अरनब गोस्वामी, मॉडर्न डे रिवोलुश्यनरी एंड ओनली प्रोटेक्टर ऑफ इंडियन नेशन: "सिक्स मंथ बैक, व्हेन योर चैनल केम अप विद द प्रूफ दैट दिस स्काई राकेटिंग इन्फ्लेशन वाज रिजल्ट ऑफ मिस-डीड्स ऑफ मिस्टर सुरेश कलमाडी, मिस्टर कलमाडी हैड थ्रीटंड टू स्यु योर चैनल...नाऊ, योर चैनल हैज कम अक्रॉस न्यू एविडेंस ह्विच क्लीयरली शोज दैट मिस्टर कलमाडी.....टू नाईट आई वुड लाइक टू अस्योर आर व्यूअर्स वंस अगेन दैट योर चैनल विल सी टू इट दैट दोज हू आर रिस्पोंसिबिल फोर कॉजिंग एन्ग्जाइटी टू अ नेशन ऑफ अ वन बिलियन आर ब्राट तो जस्टिस...."
इंडिया टीवी, कस्टोडियन ऑफ थ्रिल, हॉरर, माइथोलॉजी, कल्चर.....एंड इन्वेन्टर ऑफ द टर्म, ब्रेकिंग न्यूज: "जी हाँ, आज हम आपको बतायेंगे कि कैसे सरसों, दूध और काली गाय की सहायता से महंगाई को कम किया जा सकता है. यह उपाय ऋगवेद से लिया गया है. जी हाँ, आज हमारे स्टूडियो में हैं स्वामी मुद्रानन्द जी महाराज जो आपको उस मंत्र के बारे में बतायेंगे जिसके जाप से मंहगाई कम होगी...जी हाँ, पहली बार महंगाई को काबू में करने वाला मन्त्र...."
बेजान दारूवाला, मेसेंजर ऑफ गणेशा: "मेरी जान, ये साल में क्या होगा? महंगाई बढ़ेगी अभी और बढ़ेगी. ये साल में कौन भारी है? ये साल में चन्द्रमा सबसे भारी है. जुपिटर से भी भारी अभी चन्द्रमा हो गया है. औउर उसका क्या असर होता है? उसका असर होता है कि आर्टिकल का दाम बढ़ता है...लेकिन जुलाई से, हाँ जुलाई से मेरी जान, चीजों का दाम कम होगा. वईसे अगर तुम लेफ्ट हैण्ड का मिडिल फिंगर में नीलम पहनेगा तो महंगाई कम हो सकता है....."
शरद पवार, एग्रीकल्चर मिनिस्टर एंड विनर ऑफ क्रिकेट ऐडमिनिस्ट्रेटिव बॉडी: "मैं कोई ज्योतिषी नहीं हूँ लेकिन महंगाई तीन महीने में कम हो जायेगी..."
बाबा रामदेव, ब्रीदिंग एक्सपर्ट एंड ऑनटरप्रेन्योर: "हे हे हे हे..लोग मुझसे पूछते हैं, बाबाजी महंगाई क्यों बढ़ रही है? मैं कहता हूँ क्यों नहीं बढ़ेगी महंगाई? आज हम अपनी संस्कृति भूल गए हैं. कलियुग में महंगाई रोकने का एक ही उपाय है, योग. अगर हम योग का सहारा लें तो महंगाई को रोका जा सकता है. द्वापर में महंगाई क्यों नहीं रहती थी? .....हे हे हे..हाँ, करो बेटा करो. हमारे बीच हैं सोनीपत से आये हैं भाई राजेश. अनुलोम विलोम और कपालभाति से इन्हें बहुत लाभ हुआ है. हाँ, क्या समस्या थी बेटा तुम्हारी? क्या? गर्लफ्रेंड नहीं मिल रही थी? अच्छा, कितने दिन किया कपालभाति? चार महीने?.... और अब गर्लफ्रेंड मिल गई? हे हे हे...कोई भी समस्या का समाधान हो सकता है योग से..."
हमारे संवाददाता ने ए राजा, कपिल सिबल और राहुल गाँधी से भी सुझाव मांगे थे लेकिन उनलोगों ने कहा कि उन्हें करीब पंद्रह दिन का समय चाहिए . वहीँ राम जेठमलानी ने कहा कि वे महंगाई के बारे में तब तक कुछ नहीं कहेंगे जब तक वे महंगाई के ऊपर हाईकोर्ट का फैसला नहीं पढ़ लेते.
Wednesday, September 29, 2010
नारा ही देश को महान बनाता है..
सत्तर और अस्सी के दशक के सरकारी नारों को पढ़कर बड़े हुए। उस समय समझ कम थी। अब याद आता है तो बातें थोड़ी-थोड़ी समझ में आती हैं। ट्रक, बस, रेलवे स्टेशन और स्कूल की दीवारों पर लिखा गया नारा, 'अनुशासन ही देश को महान बनाता है' सबसे ज्यादा दिखाई देता था।
भविष्य में इतिहासकार जब इस नारे के बारे में खोज करेंगे तो इस निष्कर्ष पर पहुंचेंगे कि 'एक समय ऐसा भी आया था जब अचानक पूरे देश में अनुशासन की कमी पड़ गई थी। अब गेंहूँ की कमी होती तो अमेरिका से गेहूं का आयात कर लेते (सोवियत रूस के मना करने के बावजूद), जैसा कि पहले से होता आया था। लेकिन अनुशासन कोई गेहूं तो है नहीं।' इतिहासकार जब इस बात की खोज करेंगे कि अनुशासन की पुनर्स्थापना कैसे की गई तो शायद कुछ ऐसी रिपोर्ट आये:-
'सरकार' के माथे पर पसीने की बूँदें थीं। अब क्या किया जाय? इस तरह की समस्या पहले हुई होती तो पुराना रेकॉर्ड देखकर समाधान कर दिया जाता। चिंताग्रस्त प्रधानमंत्री ने नैतिकता और अनुशासन को बढावा देने वाली कैबिनेट कमिटी की मीटिंग बुलाई। चिंतित मंत्रियों के बीच एक 'इन्टेलीजेन्ट' अफसर भी था। सारी समस्या सुनने के बाद उसके मुँह से निकला "धत तेरी। बस, इतनी सी बात? ये लीजिये नारा"। उसके बाद उसने 'अनुशासन ही देश को महान बनाता है' नामक नारा दिया। साथ में उसने बताया; "इस नारे को जगह-जगह लिखवा दीजिए और फिर देखिए किस तरह से अनुशासन देश के लोगों में कूट-कूट कर भर जाएगा"।
मंत्रियों के चेहरे खिल गए। सभी ने एक दूसरे को बधाई दी। प्रधानमंत्री ने उस अफसर की भूरि-भूरि प्रशंसा की।एक मंत्री ने नारे के सफलता को लेकर कुछ शंका जाहिर की। उस मंत्री की शंका का समाधान अफसर ने तुरंत कुछ इस तरह किया। "आप चिन्ता ना करें, नारा पूरा काम करेगा। काबिल नारों को लिखने का अपना पारिवारिक रेकॉर्ड अच्छा है। मेरे पिताजी ने ही साम्प्रदायिकता की समस्या का समाधान 'हिंदु-मुस्लिम भाई-भाई' नामक नारा लिखकर किया था"।
इस अनुशासन वाले नारे ने अपना काम किया। लोगों में अनुशासन की पुनर्स्थापना हो गई। हम ऐसे निष्कर्ष पर इस लिए पहुंच सके क्योंकि नब्बे के दशक के बाद ये नारा लगभग लुप्त हो गया। ट्रकों पर नब्बे के दशक में इस नारे की जगह 'नाथ सकल सम्पदा तुम्हारी, मैं सेवक समेत सुत नारी' जैसे नारों ने ले ली। जहाँ तक रेलवे स्टेशन की बात है तो वहाँ इस नारे की जगह 'जहर खुरानों से सावधान' और 'संदिग्ध वस्तुओं को देखकर कृपया पुलिस को सूचित करें' जैसे नारों ने ले ली। ये अनुशासन वाला नारा कहीँ पर लिखा हुआ नहीं दिखा। दिखने का कोई प्रयोजन भी नहीं था। जब अनुशासन की पुनर्स्थापना हो गई तो नारे का कोई मतलब नहीं रहा।'
ये तो थी इतिहासकारों की वो रिपोर्ट जो आज से पच्चास साल बाद प्रकाशित होगी और इस रिपोर्ट पर शोध करके छात्र 'इतिहास के डाक्टर' बनेंगे। लेकिन नब्बे के दशक से इस नारे का सही उपयोग हमने शुरू किया।
अनुशासन शब्द का व्यावहारिक अर्थ हो सकता है 'खुद के ऊपर शासन करना' या एक तरह 'लगाम लगाना'। (व्यावहारिकता की बात केवल इस लिए कर रहा हूँ क्योंकि ये नारा केवल हिंदी के डाक्टरों' के लिए नहीं लिखा गया था)। लेकिन शार्टकट खोजने की हमारी सामाजिक परम्परा के तहत हमने इस शब्द का 'शार्ट अर्थ' भी निकाल लिया। हमने इस अर्थ, यानी 'खुद के ऊपर शासन करना' में से 'के ऊपर' निकाल दिया। 'शार्ट अर्थ' का सवाल जो था। उसके बाद जो अर्थ बचा, वो था 'खुद शासन करना'। और ऐसे अर्थ का प्रभाव हमारे सामने है।
हम सभी ने खुद शासन करना शुरू कर दिया। होना भी यही चाहिए। जब अपने अन्दर 'शासक' होने की क्षमता है, तो हम सरकार या फिर किसी और को अपने ऊपर शासन क्यों करने दें? अब हम रोज पूरी लगन से अपनी शासकीय कार्यवाई करते हैं। आलम ये है कि हम सड़क पर बीचों-बीच बसें खडी करवा लेते हैं। इशारा करने पर अगर बस नहीं रुके तो गालियों की बौछार से ड्राइवर को धो देते हैं। आख़िर शासक जो ठहरे। हमारे शासन का सबसे उच्चस्तरीय नज़ारा तब देखने को मिलता है जब कोई मोटरसाईकिल सवार सिग्नल लाल होने के बावजूद सांप की तरह चलकर फुटपाथ का सही उपयोग करते हुए आगे निकल जाता है।
कभी-कभी सामूहिक शासन का नज़ारा देखने को मिलता है। हम बरात लेकर निकलते हैं। पूरी की पूरी सड़क पर कब्जा कर लेते हैं और आधा घंटे में तय कर सकने वाली दूरी को तीन घंटे में तय करते हैं। ट्रैफिक जाम करने का मौका बसों और कारों को नहीं देते। वैसे भी क्यों दें, जब हमारे अन्दर इतनी क्षमता है कि हम खुद ही जाम कर सकते हैं।
सामूहिक शासन के तहत रही सही कसर हमारे धार्मिक शासक पूरी कर देते हैं। बीच सड़क पर दुर्गा पूजा से लेकर शनि पूजा तक का प्रायोजित कार्यक्रम पूरी लगन के साथ करते हैं। पूजा ख़त्म होने के बाद मूर्तियों का भसान और उसके बाद नाच-गाने का 'कल्चरल प्रोग्राम', सब कुछ सड़क पर ही होता है। हर महीने ऐसे लोगों को देखकर हम आश्वस्त हो जाते हैं कि देश में डेमोक्रेसी है।
हमारे इस कार्यवाई में पुलिस भी कुछ नहीं बोलती। बोलेगी भी क्यों? ट्रैफिक मैनेजमेंट का तरीका भी नारों के ऊपर टिका है। रोज आफिस जाते हुए पुलिस द्वारा बिछाए गए कम से कम बीस नारे देखता हूँ। ट्रैफिक के सिपाही को उसके बडे अफसर ने हिदायत दे रखी है कि कुछ करने की ज़रूरत नहीं है। हाँ, जनता को नारे दिखने चाहिए। बाक़ी तो जनता अनुशासित है ही।
मैं इस बात से पूरी तरह आश्वस्त हूँ कि 'पुलिस आफिसर आन् स्पेशल ड्यूटी' होते हैं जिनका काम केवल नारे लिखना है। नारे पढ़कर मैं कह सकता हूँ कि ये आफिसर अपना काम बडे मनोयोग के साथ करते हैं। रोज आफिस जाते हुए मेरी मुलाक़ात कोलकता पुलिस के एक साइनबोर्ड से होती है जिसपर लिखा हुआ है; 'लाइफ हैज नो स्पेयर, सो टेक वेरी गुड केयर'।
इस बोर्ड को सड़क के एक कोने में रखकर ट्रैफिक का सिपाही गप्पे हांक रहा होता है। उसे इस बात से शिक़ायत है कि पिछले मैच में मोहन बागान के स्ट्राईकर ने पास मिस कर दिया नहीं तो ईस्ट बंगाल मैच नहीं जीत पाता।
आशा है कि नारे लिखकर समस्याओं का समाधान खोजने की हमारी क्षमता भविष्य में और भी निखरेगी। नारे पुलिस के लिए भी काम करते रहेंगे। जरूरत भी है, क्योंकि आने वाले दिनों में भी ईस्ट बंगाल मोहन बगान को हराता रहेगा। हम अपने अनुशासन (या फिर शासन) में नए-नए प्रयोग करते रहेंगे।
Friday, August 27, 2010
एक और अपील का जादू
बात उनदिनों की है जब गणतांत्रिक देश की जनता को समझ में नहीं आ रहा था कि वह किस बात पर परेशान हो? मंहगाई की बात पर परेशान होना शुरू करती तो भ्रष्टाचार से न परेशान होने की बात पर हीन भावना से ग्रस्त हो जाती. सड़क के गड्ढों की बात पर परेशान होना शुरू करती कि कामनवेल्थ गेम्स में पैसों की हेरा-फेरी पर परेशान न हो पाने की बात खलने लगती. कामनवेल्थ गेम्स में हुई पैसों की हेरा-फेरी से परेशान होने के लिए कमर कस रही होती कि कोई पूछ बैठता; "नक्सली समस्या पर परेशान नहीं हुए? उसका नंबर कब आएगा?"
जनता की इस परेशानी को ध्यान में रखते हुए किसी तत्कालीन न्यूज चैनल के नारा सर्जक ने नारा भी लिख दिया था; "किस पर हो परेशान किसको दे फेंक, जनता एक और समस्याएं अनेक".
हाँ, उनदिनों टीवी न्यूज चैनल्स की चांदी थी. न्यूज चैनल वाले एक समस्या पर पैनल डिस्कशन करते और दूसरी पर चले जाते. फ़ॉलो-अप के लिए समय देने की ज़रुरत नहीं पड़ती.
एक दिन जनता के रूप में जन्मे किसी गुनी ने बताया कि सारी समस्याओं का जन्म एक ही समस्या से हुआ है और वह है भ्रष्टाचार. मतलब यह कि अगर भ्रष्टाचार को रोक लिया जाय तो बाकी समस्याएं अपने आप ख़त्म हो जायेंगी.
बस फिर क्या था. जनता का एक प्रतिनिधिमंडल प्रधानमंत्री के पास पहुँचा. वहाँ लोगों ने देखा कि प्रधानमंत्री एक एक्सेल शीट और पेंसिल लिए बैठे थे. वे बार-बार अपनी आँख बंद कर कुछ बुदबुदाते हुए पेंसिल को घुमाते और एक खाने पर रख देते. पेंसिल कभी ८.९ प्रतिशत पर बैठती तो कभी ८.७५ पर. कभी ९ प्रतिशत पर बैठती तो ८.६५ प्रतिशत पर.
प्रतिनिधमंडल के लोग प्रधानमंत्री का यह कार्यक्रम बड़े ध्यान से देख रहे थे. उनमें से एक ने अपने पास खड़े आदमी से धीरे से कहा; "शायद कोई टोटका कर रहे हैं."
उसकी बात सुनकर प्रतिनिधिमंडल में से ही एक विद्वान् बोला; "टोटका नहीं है यह. यह अर्थशास्त्र है. प्रधानमंत्री जी अगले क्वार्टर के लिए जीडीपी का फिगर फाइनल कर रहे हैं."
अभी वे बात कर ही रहे थे कि प्रधानमंत्री ने कहा; "हैं जी? आपलोग किसी काम से आये हैं? बताइए मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ?"
जनता में से ही एक नेता टाइप दिखने वाला व्यक्ति भाषण देने वाले अंदाज़ में बोला; "प्रधानमंत्री महोदय हम आज देश के हालात अच्छे नहीं हैं. समस्याओं की भरमार हो गई है. एक तरफ मंहगाई की समस्या है तो दूसरी तरफ आतंकवाद की. एक तरफ बाढ़ की समस्या है तो दूसरी तरफ नक्सलवाद की. एक तरफ....."
अभी वह बोल ही रहा था कि प्रधानमंत्री उसे टोंकते हुए बोले; "आप प्वाइंट की बात करें. समस्याएं हैं यह मुझसे बेहतर कौन जान सकता है? आपको मुझसे क्या काम है वह बताइए."
प्रधानमंत्री की बात सुनकर उस नेता टाइप आदमी ने हडबडाते हुए कहा; "महोदय हमने अपने अध्ययन से यह पता लगाया है कि देश की सारी समस्याओं की जड़ भ्रष्टाचार है. आप भ्रष्टाचार को रोक दें तो देश सुधर जाएगा."
उसकी बात सुनाकर प्रधानमंत्री बोले; "मैं क्या-क्या करूं? देश को ९ प्रतिशत की ग्रोथ दूँ या भ्रष्टाचार रोकूँ? मैं अपना समय ऐसी फालतू बातों में खर्च करूँगा तो ग्रोथ का क्या होगा? वैसे भी आप ९ प्रतिशत की ग्रोथ रेट पर खुश होइए. भ्रष्टाचार की बात क्यों करते हैं?"
उनकी बात सुनकर जनता में से एक और विद्वान बोला; "महोदय, आज देश की हर समस्या की जड़ है भ्रष्टाचार. यह बात मैंने कल ही टीवी पर होनेवाले पैनल डिस्कशन में एक विद्वान् के मुँह से सुनी. अगर आप भ्रष्टाचार को रोक दें तो भारत एक बार फिर से सोने की चिड़िया हो जाएगा. आपके ही सरकार के मंत्रीगण भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे हैं. टेलिकॉम मिनिस्ट्री को ही ले लें...."
प्रधानमंत्री ने उसे बीच में टोकते हुए कहा; "देखिये, मंत्रियों के खिलाफ भ्रष्टाचार का कोई सबूत नहीं है. मैंने अपने मंत्रियों से खुद पूछा था कि क्या वे भ्रष्टाचार में लिप्त हैं? उन्होंने बताया कि वे भ्रष्टाचार में लिप्त नहीं हैं. वैसे अगर आपको लगता है कि भ्रष्टाचार के बार में मुझे कुछ करना चाहिए तो ठीक है. मैं आज शाम को ही राष्ट्र को संबोधित करूँगा और अपील कर दूंगा कि जो लोग भी भ्रष्टाचार में लिप्त हैं तो तुरंत उसका त्याग कर दें."
उनकी बात सुनकर एक व्यक्ति बोला; "लेकिन सर, सरकार को कुछ कार्यवाई भी करनी चाहिए. छापे वगैरह मारने चाहिए. केवल अपील से क्या होनेवाला है?"
उसकी बात सुनकर प्रधानमंत्री बोले; " आपलोगों को अपील की ताकत का अंदाजा नहीं है. यह महात्मा गाँधी का देश है. जयप्रकाश नारायण का देश है. विनोबा भावे का देश है. यहाँ अपील से सबकुछ हो जाता है. अपील पर मुझे पूरा विश्वास है. मैंने कल ही कश्मीर में पत्थर फेंकने वालों से अपील की कि वे पत्थर फेंकना बंद कर दें. अभी हाल ही में मैंने नक्सली 'भाइयों' से अपील की कि वे हिंसा छोड़कर राष्ट्र की मुख्यधारा में लौट आयें."
"लेकिन सर...?" एक व्यक्ति फिर बोला.
"देखिये, मैं और कुछ नहीं कहूँगा. आप जाइए. मैं आज शाम को ही देश के तथाकथित भ्रष्टाचारियों से अपील कर दूंगा"; प्रधानमंत्री ने यह कहकर उन्हें विदा कर दिया.
शाम को राष्ट्र को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने भ्रष्टाचारियों से अपील कर दी. बोले; "लोग चाहे जो भी कहें परन्तु मुझे विश्वास नहीं होता कि हमारे देश में भ्रष्टाचार फैला है. विश्वास इसलिए नहीं होता क्योंकि देश में फैले भ्रष्टाचार का सबूत नहीं है. लेकिन फिर भी अगर कोई मंत्री, अफसर, दरोगा, क्लर्क वगैरह-वगैरह भ्रष्टाचार में लिप्त हो तो मैं उससे अपील करूँगा कि वह तुरंत उसे त्याग दे और सामान्य व्यवहार करें. ऐसा करने से देश की तरक्की होगी और हमारा देश फिर से महान हो जाएगा. यहाँ तक कि हम डबल डिजिट ग्रोथ भी अचीव कर सकते हैं."
दूसरे दिन पूरे देश में क्रान्ति हो गई. देश के हर शहर, हर जिले, हर ताल्लुके में लोगों ने भ्रष्टाचार त्याग दिया. मंत्री, अफसर, पुलिस, दरोगा, क्लर्क, चपरासी वगैरह वगैरह ने भ्रष्टाचार का त्याग कर दिया. हर महकमे में काम करने वालों ने घूस लेना बंद कर दिया. महानगर पालिका के सफाई इंस्पेक्टर से लेकर क्लर्क तक, सभी ने फैसला किया कि अब से वे घूस नहीं लेंगे. अब पी डब्ल्यू डी डिपार्टमेंट में भी घूस को घुसने की अनुमति नहीं थी. पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम के इंस्पेक्टर ने घूस लेने से मना करना शुरू कर दिया और राशन दूकान वालों को फाइन करना शुरू कर दिया. मिलावट की जांच करने वाले इंस्पेक्टर ने मिठाई की दूकानों से गिफ्ट में मिठाई लेना बंद कर दिया. ट्रैफिक कांस्टेबल ने अब पचास की पत्ती न लेकर रसीद काटना शुरू कर दिया. म्यूनिसिपल कारपोरेशन के क्लर्क ने जन्म प्रमाणपत्र अब बिना सौ रूपये लिए देना शुरू कर दिया.
देश में हाहाकार मच गया. एक तरफ जहाँ कुछ लोग खुश थे वहीँ दूसरी तरफ कुछ लोगों को यह शिकायत थी कि जब प्रधानमंत्री को यह मालूम था कि उनकी एक अपील से ऐसा जादू हो सकता था तो उन्होंने यही अपील पहले क्यों नहीं की? ऐसे लोगों को देखकर यही लगा कि कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनके सामने अगर सरकार अपना कलेजा निकालकर भी रख देगी तो भी उन्हें संतुष्टि नहीं होगी.
सरकारी महकमों में जगह-जगह नारों की तख्तियां लटक रही थीं जिनपर सरकारी कर्मचारियों ने लिखकर बता दिया था कि वे अब घूस नहीं लेंगे. म्यूनिसिपल कारपोरेशन के हर डिपार्टमेंट में कोई न कोई नारा लटक रहा था. जैसे जन्म-मृत्यु पंजीकरण विभाग की दीवार पर नारा लटक रहा था जिसमें लिखा था; "दिन भर में घूस के लिए अब नहीं कोई सत्र, बिना घूस के ही लीजिये जन्म-मृत्यु प्रमाणपत्र".
पी डब्लू डी में सड़कों के टेंडर जिस विभाग में खुलते थे वहाँ दीवार पर नारा लटक रहा था; "पूरे देश में होगी अब सड़क ही सड़क, अब हम नहीं सहेंगे घूस की तड़क-भड़क."
कुल मिलाकर कहा जा सकता था कि सरकार के सभी विभागों के कर्मचारियों ने अपनी भावनाओं को नारों में कैद करके लटका दिया था.
टीवी वाले हर शहर के सरकारी विभागों में होनेवाली चहल-पहल का लाइव कवरेज दिखा रहे थे. दिखाना बनता भी था. जब घूस का लेन-देन कार्यक्रम बंद हो ही चुका था तो छुपाने के लिए कुछ नहीं था. विदेशों के पत्रकार देश में होनेवाली इस क्रान्ति के बारे रपट ठेले जा रहे थे. ट्रांसपरेंसी इंटर्नेशनल के पदाधिकारी दंग थे. उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि एक अपील से ऐसा कुछ हो सकता है. कई विदेशी विश्वविद्यालयों ने अपने छात्रों को "गणतंत्र में भ्रष्टाचार की रोक-थाम" पर शोध और केस स्टडी के लिए यहाँ भेजना शुरू कर दिया.
सरकार के हर महकमे के कर्मचारी सड़कों पर नारे लगा रहे थे. जगह-जगह सम्मलेन हो रहे थे. वे नारे लगा रहे थे कि देश में होगा शिष्टाचार, नहीं बचेगा भ्रष्टाचार....वगैरह-वगैरह. वे चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे थे कि हम अब घूस नहीं लेंगे...नहीं लेंगे-नहीं लेंगे.
बिना घूस के चलते हुए गणतंत्र को अभी बीस-पच्चीस दिन हुए थे कि अचानक पता चला कि सभी महकमों में जनता और सरकारी कर्मचारियों के बीच तू-तू मैं-मैं होना शुरू हो गया. एक-दो दिन तो मामला केवल कह-सुनी तक अटका रहा लेकिन तीसरे दिन जब सरकारी कर्मचारी घूस और भ्रष्टाचार विरोधी नारे लगाते हुए सड़कों पर जा रहे थे तो जनता और उनके बीच मार-पीट हो गई.
जनता इस बात पर अड़ी थी कि सरकारी कर्मचारियों को घूस लेना ही पड़ेगा वहीँ महकमों के कर्मचारी इस बात अड़े थे कि चाहे जो हो जाए वे घूस नहीं लेंगे. वे जनता से कह रहे थे; "तुम्ही लोगों ने तो कहा कि हम घूस न लें और अब जब हम नहीं ले रहे हैं तो क्यों परेशान हो रहे हो?"
जनता में से भी कुछ लोगों ने सड़क पर नारे लगाने शुरू कर दिया. वे चिल्ला रहे थे; "घूस न लेने का यह निर्णय नहीं सहेंगे-नहीं सहेंगे..."
नारेबाजी हो ही रही थी कि दोनों तरफ के अति उत्साही तत्वों ने एक-दूसरे के ऊपर हमला कर दिया. टीवी वाले, रेडिओ वाले, देसी पत्रकार, विदेशी पत्रकार सब दंग थे कि यह क्या हो रहा है? किसी को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था कि एक गणतंत्र की जनता इस बात पर अड़ी है कि भ्रष्टाचार करने वालों को सुधरने नहीं देंगे. मार-पीट इतनी बढ़ गई कि शहरों में कर्फ्यू लग गया.
दूसरे दिन जनता का एक प्रतिनिधिमंडल प्रधानमंत्री से मिला. जनता ने प्रधानमंत्री से रिक्वेस्ट किया कि वे अपनी अपील वापस ले लें. जब प्रधानमंत्री ने कारण जानना चाहा तो प्रतिनिधिमंडल के नेता ने कहा; "सर, आपने अपील क्या की हमारी जान की तो आफत आ गई. घूस न लेने के कारण सभी महकमों में इतना नियमपूर्वक काम हो रहा है कि हम नियम के सामने टिक नहीं पा रहे. सड़कें नहीं बन रही हैं क्योंकि सड़कों के लिए निकलनेवाले टेंडर की शर्तें कोई भी ठेकेदार पूरी नहीं कर पा रहा. फ़ूड इंस्पेक्टर ने घूस लेना बंद कर दिया है इसलिए मिठाई दूकानदारों की शामत आ गई है. अब वे न तो बासी मिठाइयाँ बेंच पा रहे हैं और न ही नकली मावा यूज कर पा रहे हैं. इनकम टैक्स अफसर नियम के हिसाब से चल रहा है तो जनता के लोग टैक्स की चोरी नहीं कर पा रहे हैं. सेल्स टैक्स वाले नियम पालन के लिए जगह-जगह छापे मार रहे हैं. ऐसे में तो जनता का जीना ही मुश्किल हो जाएगा. और तो और न जाने कितनी गाड़ियाँ मोटर वेहिकिल वालों ने जब्त कर ली हैं. ट्रैफिक पुलिस वाला......"
"बस-बस. मैं समझ गया. मुझे नहीं पता था कि मेरी एक अपील की वजह से इतना बड़ा बवाल हो जाएगा"; प्रधानमंत्री ने उनसे कहा.
नेता बोला; "सर, हमने भ्रष्टाचार को रोकने के लिए आपसे जो रिक्वेस्ट किया उसके लिए हम आपसे क्षमा मांगते हैं. आप कुछ कीजिये जिससे स्थिति पहले जैसे हो जाए और देश एक बार फिर से प्रगति की राह पर चल निकले."
प्रधानमंत्री ने उन्हें आश्वासन दिया कि वे जल्द ही स्थिति पहले जैसी कर देंगे.
दूसरे दिन उन्होंने देशवासियों से अपील करते हुए कहा; "मैंने आप सब से सामान्य व्यवहार करने की अपील की थी. घूस न लेना कोई सामान्य व्यवहार थोड़ी न है. मैं आपसब से अपील करता हूँ कि आप सब पहले जैसे हो जाएँ और देश को प्रगति की राह पर आगे ले जाएँ."
दूसरे दिन फिर सब पहले जैसा हो गया और देश प्रगति की राह पर दौड़ने लगा...
नोट: यह लेख परसाई जी के लेख एक अपील का जादू का नया संस्करण हैं. लेख के 'आइडिये'की मौलिकता पर मेरा कोई दावा नहीं है. परसाई जी का लेख पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक कर सकते हैं.
