नेता और पत्रकार एक शाम शराब पर "देश के लोकतंत्र को और मजबूत कैसे किया जाय?" नमक गंभीर प्रश्न पर चिंतन कर रहे थे. पास ही ताल ठोककर ब्लास्ट की जिम्मेदारी लेनेवाले एक आतंकवादी संगठन ने बम फोड़ दिया. दोनों भगवान को प्यारे हो गए. इधर इन दोनों ने धरती त्यागी और उधर धर्मराज का दूत दोनों को लेने आ पहुँचा. घटनास्थल पर पहुँचकर इस दूत के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा क्योंकि नेता की आत्मा से तो उसकी भेंट हो गई लेकिन पत्रकार की आत्मा आस-पास दिखाई नहीं दी. दूत ने बड़ी खोजबीन की. पत्रकार की आत्मा को आवाज़ भी लगाईं लेकिन उसकी तरफ से जवाब नहीं मिला.
परेशान होकर धर्मराज का दूत केवल नेता की आत्मा काँधे पर लादे धर्मराज के पास पहुँचा। वहाँ पहुँच जब लाई गई आत्मा की एंट्री रजिस्टर में करवा रहा था तब धर्मराज ने पूछा; "पत्रकार की आत्मा क्यों नहीं लाये? तुम्हारा काम अब आउटसोर्स करने लगे हो क्या?"
दूत बोला; "क्षमा करें धर्मराज, पत्रकार की आत्मा की मैंने बहुत खोज की लेकिन वह मिली ही नहीं. मैंने आवाज भी लगाईं थी लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. आपको मेरी बात पर विश्वास न हो तो मैंने घटनास्थल पर जो आवाज लगाईं थी उसका खुद स्टिंग भी कर लिया है ताकि आप गुस्सा हों तो आपके सामने सबूत दे दूँ."
धर्मराज ने स्टिंग देखा. उसके बाद वे भी सोच में पड़ गए कि पत्रकार की आत्मा कहाँ गायब हो गई? वे सोच ही रहे थे कि कांख में दुनियाँ की करनी का खाता लिए चित्रगुप्त पधारे. धर्मराज को सोचते हुए देख शायद कारण भांप गए. छूटते ही बोले; "प्रभु कहीं आप उस पत्रकार की गायब आत्मा के बारे में सोचकर चिंतित तो नहीं हैं?"
धर्मराज बोले; "हाँ चित्रगुप्त, ये कैसे हुआ कि नेता की आत्मा तो दूत को मिल गई लेकिन पत्रकार की आत्मा गायब हो गई?"
चित्रगुप्त बोले; "भगवन, मेरे और मेरे खता-बही के रहते आप नाहक परेशान हो रहे हैं."
धर्मराज ने पूछा; "तो क्या तुम्हें पता है कि पत्रकार की आत्मा कहाँ है?"
चित्रगुप्त ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया; "मुझे सब पता है प्रभु. सबकी करनी का हिसाब रखता हूँ तो उनकी आत्माओं का भी हिसाब रखना ही पड़ेगा. दरअसल पत्रकार की आत्मा इस नेता की आत्मा की टेंट में है"
धर्मराज के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा. बोले; "पत्रकार की आत्मा नेता की आत्मा की टेंट में? लेकिन ऐसा हुआ कैसे चित्रगुप्त?"
चित्रगुप्त ने रहस्य खोला. बोले; "हे भगवन, वो इसलिए क्योंकि इस पत्रकार ने अपनी आत्मा इस नेता को बेंच दी थी और वर्षों से उस आत्मा का मालिक ये नेता ही था. ये देखिये इसके टेंट से मैंने पत्रकार की आत्मा निकाल ली" कहते हुए चित्रगुप्त ने नेता की आत्मा के जेब से पत्रकार की आत्मा निकालकर धर्मराज के सामने रख दिया.
उसके बाद उन्होंने नेता और पत्रकार की करनी का हिसाब करना शुरू किया।
जब हिसाब हो गया तो धर्मराज बोले; "हाँ तो क्या हिसाब निकला चित्रगुप्त?"
चित्रगुप्त बोले; "हे भगवन, जब से यह पत्रकार कार्यक्षेत्र में आया है तभी से इसने इस नेता के लिए काम किया है. इसने इस नेता और उसकी पार्टी के लिए सत्य को छिपाया है, तोड़-मरोड़ कर दिखाया है, आधा सच बोला है, पोल नहीं खोला है, इससे रुपया खाया है और झूठ फैलाया है"
धर्मराज बोले; "दोनों ने एकसाथ मिलकर पाप किया है. करोड़ों लोगों से एकसाथ सत्य छिपाने से बड़ा पाप और क्या होगा? दोनों को कम से कम अगले दस जनम तक मुक्ति नहीं मिल सकती. इन्हें मुक्ति न मिले उसके लिए जरूरी है कि ये पाप करते जाएँ. जबतक पाप करते रहेंगे, मुक्ति का इनका रास्ता कठिन होता जाएगा. इन्हें फिर से मनुष्य बनाकर पृथ्वी पर भेज दो."
चित्रगुप्त ने पूछा; "मनुष्य बनकर ये वहां तो जायेंगे ही लेकिन इनसे ऐसा कौन सा काम करवाया जाय प्रभु जिससे इनके ऊपर पाप चढ़ता रहे?"
धर्मराज बोले; "किसी बड़े मंदिर में नेता को जानवरों का व्यापारी बना दो और पत्रकार को वो पंडित बना दो जो जानवरों की बलि देता है. बाकी का काम पाप खुद कर लेगा"
चित्रगुप्त आसाम का नक्शा लिए अपने टाइपिस्ट को आर्डर.....
Sunday, March 15, 2015
पाप
Saturday, April 14, 2012
विधायक जी
वे एक बार फिर से विधायक चुन दिए गए हैं. शहर से निकलने वाले अखबार के पेज चार पर छपे हर विज्ञापन में उनकी तस्वीर है. तस्वीर के दोनों तरफ दो और तस्वीरें हैं. इन तीन तस्वीरों के नीचे कुछ और तस्वीरें. जिस तरह से उनकी तस्वीर को बाकी तस्वीरों ने घेर लिया है उसे देखकर लग रहा है कि उनकी तस्वीर कोई तस्वीर नहीं बल्कि गठबंधन वाली कोई सरकार है और बाकी की तस्वीरों ने बिना शर्त समर्थन देते हुए उसे थाम रखा है. वैसे कभी-कभी यह भी लगता है जैसे उन्हें थामने का महत्वपूर्ण काम उनकी मूंछों ने कर रखा है. बाकी की छपी तस्वीरें सारी साइड हीरो के रोल में हैं. लीड रोल में तो जी मूंछें ही हैं.
ये विज्ञापन इस बात की सूचना देते हैं कि उनकी जीत ऐतिहासिक है. शायद इसलिए कि जेल में रहते हुए विधायक जी तीसरी बार चुन दिए गए हैं. उनके समर्थकों को शायद इस बात पर विश्वास है कि हजारों वर्ष पहले मथुरा की जेल में हुई सबसे बड़ी ऐतिहासिक घटना के बाद जनता द्वारा उनका चुन दिया जाना भारतवर्ष के इतिहास में दूसरी सबसे बड़ी ऐतिहासिक घटना है.
छपी तस्वीरों में बने उनके चेहरे पर विनम्रता के सारे लक्षण हैं. जुड़े हुए हाथ. शालीन चेहरा. विनम्र कुर्ते का विनम्र कालर. विनम्र पोज और विनम्र ही चश्मा. यहाँ तक कि अँगुलियों में पड़ी अगूठियाँ भी कुछ कम विनम्र नहीं दिख रही. विनम्रता का हाल यह है कि महाराणा स्टाइल वाली उनकी मूंछें तक विनम्र लग रही हैं. मानो धमकी दे रही हों कि मैं तो ऐसे ही विनम्र दिखूंगी, जाओ जो उखाड़ना हो, उखाड़ लो. कुल मिलाकर मूंछों की विनम्रता ऐसी कि शायद ही कोई इन मूंछों से आँखें मिलाने की हिम्मत कर सके.
एक विज्ञापन में छपी तस्वीरों के ऊपर संस्कृत का श्लोक टीप दिया गया है जिसे देखकर लग रहा है कि इस श्लोक को विधायक जी को पवित्र बनाने के काम में लगा दिया गया है और वह आज काम पूरा करके ही लौटेगा.
इन तस्वीरों के अलावा इस पेज पर छोटे कालम के तीन समाचार छपे है. एक के अनुसार हनुमान मंदिर के पास शनिवार को बाइक के धक्के से एक युवती गंभीर रूप से घायल हो गई. दूसरे समाचार के अनुसार श्रम विभाग द्वारा चलाये जा रहे बाल श्रम विद्यालय अब सबेरे साढ़े सात बजे खुलेंगे और तीसरे के अनुसार थाना क्षेत्र अंतर्गत अवैध ढंग से बेंची जा रही सीमेंट पकड़ी गई.
विज्ञापनों के बीच छपे ये समाचार इस कागज़ को अखबार का पेज बना रहे हैं.
उनकी जीत की ख़ुशी में उनकी 'फैमिली' ने सहस्त्र चंडी पाठ का आयोजन किया है जिसमें उनकी पार्टी के दो नंबर वाले दो नेता आये हैं. इनमें से एक को द्वारिकाधीश का भाई शायद इसलिए करार दिया गया है ताकि विधायक जी को सुदामा बताया जा सके और उनके गाँव-घर को सुदामानगरी. मूछों वाले सुदामा विज्ञापनों में खूब फब रहे हैं. इन विज्ञापनों के प्रायोजक इलाके के साइड नेता, उप नेता, नरम नेता, गरम नेता, व्यापारी नेता, जिला परिषद् के सदस्य वगैरह हैं. देखने से ये लोग़ विधायक-प्रेमी मालूम होते हैं.
विधायक जी की फैमिली ने इलाके की जनता का आभार प्रकट किया है. उधर जनता ने विधायक जी का आभार प्रकट किया है. उधर विधायक जी ने जनता को धन्य बताया तो लगे हाथ जनता ने भी विधायक जी को धन्य करार दे दिया. दोनों एक-दूसरे को धन्य बता रहे हैं. दोनों को देख कर लग रहा है कि आसमान में खड़े देवता इस समय इनके ऊपर पक्के तौर पर पुष्पवर्षा कर रहे होंगे. इन दोनों 'पार्टियों' की धन्यता मिलकर लोकतंत्र को धन्य बना रही है. इस तरह पूरा इलाका पिछले एक महीने से धन्य हुआ जा रहा है.
कुल मिलाकर चुनाव के बाद इस धन्य मौसम में इलाके की धन्यता नदी खतरे के निशान से ऊपर बह रही है.
फैमिली का नागरिक अभिनन्दन रोज हो रहा है. सोमवार को अभिनन्दन हो लिया तो लोग़ मंगलवार का कार्यक्रम बन रहा हैं. बुधवार, वृहस्पतिवार और शुक्रवार भी पीछे नहीं हैं. आलम यह है कि विधायक जी की 'फैमिली' हफ्ते के सातों दिन बुक है. फैमिली के लोग़ वक्तव्य दे रहे हैं और अखबार उन्हें छाप दे रहे हैं. अखबार भी बेचारे क्या करें? वक्तव्य मिले या विज्ञापन, छापने के लिए ही मिले हैं.
एक रोज नागरिकों ने मिलकर विधायक जी की बेटी को ३४ किलो की माला पहना दी. चार लोग़ माला पकड़कर खड़े हुए तब जाकर फोटो खींची जा सकी. एक और अभिनन्दन में उनकी पत्नी को चाँदी की तलवार भेंट कर दी गई. हाथ में तलवार उठाये उनकी फोटो देखकर लगा मानो वहीँ से छलांग लगाकर घोड़े पर सवार होंगी और अंग्रेजों से बदला लेने लन्दन तक घोड़ा दौड़ा देंगी.
कुल मिलाकर बिकट लोकतंत्रीय महौल की सृष्टि हुई है. धन्यता के इस मौसम में हर कोई खुद को विधायक जी से जोड़ने के लिए कमर कसे दिखाई दे रहा है. उनसे जुड़ने के लिए हर कोई नए नए रास्ते तलाश रहा है. नई-नई कहानियां गढ़ी जा रही हैं.
"अरे, पप्पू के वियाह में आये थे. अरे हाँ, यही पप्पू. अपने भइया के बड़े लड़के. अरे चार-चार बाडीगार्ड. ये बड़े-बड़े. हाथ में स्टेनगन लिए हुए. बाकी खाना नहीं खाया उन्होंने. मन्त्र लिए हैं न. बाहर नहीं खाते. देवी भक्त इतने बड़े कि कोई मंगलवार नागा नहीं जाता था कि वो 'बिन्धाजल' बिन्ध्वासिनी के दरबार में दर्शन करने न जाते हों."
"बहुत कोशिश की सी आई डी ने पकड़ने की. बाकी कोई तरकीब काम नहीं आई. दिमाग ऐसा कि पुलिस को झांसा देना उनके बायें हाथ का खेल समझिये. एक बार रात को हमारी चाह दूकान पर आये. बोले बढ़िया चाह बनाओ. हाँ तो हमने भी जो चाह बनाई तो बोले कि महराज कलकत्ता घूमे, बम्बई घूमे, दिल्ली घूमे लेकिन ऐसी चाह कहीं नहीं मिलती."
"अरे, हमारे गुड्डू तो उन्ही की गाड़ी चलाते हैं. आजतक पुलिस, थाना, कोरट कहीं भी मेरा काम रुका नहीं. उन्ही की वजह से दरोगा भी सलूट मारता है गुड्डू को."
"अरे उनके कुत्ते ने मुझे काट लिया था. एक बार क्या हुआ कि हम मिलने गए उनके घर पर. देखते क्या हैं कि ओसारे में कुत्ता बैठा. कुत्ता तो क्या स्साला देखने में पूरा शेर. इधर हम ओसारे में घुसे उधर वोह भौंका. उधर हा हा करते करते यही जांघ में दांत घुसा दिया. वो तो उनका बाडीगार्ड पकड़ा नहीं होता तो किलो भर मांस निकाल लेता की. हाँ तो फिर तुरंत फोन करके डाक्टर बुलाये. चौदह इंजेक्शन लगा था."
कुल मिलाकर उन्हें जानने वालों की संख्या बढ़ती ही जा रही है. किसी न किसी चाय-पान की दूकान पर कोई न कोई दूर का रिश्तेदार मिल ही जाएगा. मौसी की जेठानी के छोटे लड़के के बड़े स्साले से लेकर साढू के साले के नाती तक हर जगह विराजमान हैं. अब उनके ऊपर चल रहे मुक़दमे हटाने की मांग भी उठने लगी है.
साथ ही उठ रहा है भारत का लोकतंत्र.
Monday, April 2, 2012
भारतीयता का रेखाशास्त्र
गरीबी की रेखा खींच दी गई. खिंचाई के बाद जो लोग़ रेखा के नीचे मिले उन्हें गरीब करार दे दिया गया. रेखा के ऊपर बरामद हुए लोगों को शायद अमीर करार देने का प्लान भी बना होगा लेकिन बाकी मुद्दों की तरह इस मुद्दे पर भी ऐन मौके पर सरकार पीछे हट गई होगी. पहले प्लान यह था ३२ रूपये वाली रेखा के नीचे जो लोग़ मिलेंगे उन्हें गरीब पुकारा जाएगा लेकिन शायद योजना आयोग को लगा कि ३२ रुपया में से तो गरीब कुछ बचा भी लेगा और उसमें से कुछ निवेश वगैरह कर देगा तो फिर इनकम टैक्स डिपार्टमेंट को उसके इनकम का भी हिसाब-किताब रखना पड़ेगा लिहाजा ३२ रूपये को घटा कर २८ रूपये कर देना ही श्रेयस्कर है.
तो २८ रूपये वाली इस रेखा की खिचाई इसलिए की गई ताकि गरीबी और गरीबों को सुरक्षा प्रदान की जा सके. इस रेखा के खिंच जाने के बाद गरीब अब सीक्योर्ड फील करेगा. एक तरह से यह रेखा गरीब के लिए कवच-कुंडल का काम करेगी. वह यह सोचकर खुश हो लेगा कि अब उसकी गरीबी उससे कोई छीन नहीं सकता. जहाँ गरीब इस बात के लिए खुश होगा वहीँ विश्व बैंक और सरकार यह सोचकर खुश होते रहेंगे कि इस रेखा ने तमाम लोगों को गरीब नहीं रहने दिया.
गरीबी की इस रेखा के खिंच जाने से एक बात और साबित हुई कि पूरी दुनियाँ जिन्हें अर्थशास्त्री समझती रही वे रेखागणित के विद्वान निकले. रेखागणित ने अर्थशास्त्र को पीछे छोड़ दिया. यह बात भी साबित हुई कि भारत अब उन दिनों ने बहुत आगे निकाल आया है जब अर्थशास्त्र को पीछे छोड़ने का काम साहित्य के जिम्मे था. तब गरीबी और गरीबों को हटाने के लिए नारे लिखने पड़ते थे. जैसे सत्तर के दशक में साहित्य ने नारे के सहारे अर्थशास्त्र को पीछे छोड़ा था. नारा लगा था; गरीबी हटाओ.
यह बात और है कि शायद गरीबी का साहित्य में विश्वास नहीं था लिहाजा वह नहीं हटी. अपनी जिद पर अड़ी रही और कालांतर में रेखागणित का सहारा लेना पड़ा.
हमारे देश में रेखाओं का महत्व पुराने समय से रहा है. जब तक हस्त रेखा और मस्तक रेखा ने रेखाशास्त्र में अपनी एंट्री नहीं करवाई थी, तबतक भारतीय संस्कृति में लक्ष्मण रेखा की मोनोपोली थी. लोग़ लक्ष्मण रेखा से काम चलाते थे. वे अपनी इच्छानुसार लक्ष्मण रेखा खींच भी लेते थे और उसे लांघ भी लेते थे. उनके इस कर्म से न सिर्फ लक्ष्मण रेखा की अपितु श्री लक्ष्मण जी की भी प्रासंगिकता बनी रहती थी. महान कवि और ऋषि बाल्मीकि जी के अनुसार इस रेखा की खिंचाई लक्ष्मण जी ने इसलिए की थी ताकि सीता जी सुरक्षित रहें. यह रेखा सीता जी के लिए सुरक्षा-घेरा का कार्य करने के लिए बनाई गई थी क्योंकि रामायण काल में जेड कैटेगरी सुरक्षा का आविष्कार नहीं हुआ था.
जहाँ बाल्मीकि जी ऐसा मानते थे वहीँ महान महिला-विमर्श एक्सपर्ट बसंती देवी का मानना है कि लक्ष्मण जी ने इस रेखा को इसलिए खींचा था ताकि भविष्य में महिलाओं पर तरह-तरह के प्रतिबन्ध लगाए जा सकें और उन्हें घर से निकलने की मनाही रहे.
लक्ष्मण रेखा को खींचते और लांघते देशवासी अपनी जीवन रेखा खींचने में लगे हुए थे तभी उनके जीवन में उस समय आमूल-चूल परिवर्तन आया जब ज्योतिषियों ने हस्त-रेखा और मस्तक रेखा का आविष्कार कर डाला. उन्होंने न सिर्फ इन रेखाओं का आविष्कार किया बल्कि उनकी पढ़ाई भी शुरू कर दी. साथ ही इन पढ़ाकू ज्योतिषियों ने जनता को बताया कि ये दोनों रेखाएं बाकी सभी रेखाओं से श्रेष्ठ हैं क्योंकि ये उनकी जीवनरेखा को प्रभावित करती हैं. उनकी इस घोषणा से जनता को लगा कि इन रेखाओं का अनुसरण करना उनका कर्त्तव्य है. धीरे-धीरे जनता इन ज्योतिषियों के साथ-साथ अपनी-अपनी हस्त और मस्तक रेखा पर अपना विश्वास कायम करती गई. ज्योतिषियों का रेखा-पठन कार्य जो तब आरम्भ हुआ, आजतक चल रहा है.
ज्योतिषियों के इस महत्वपूर्ण सिद्धांत को तब और बल मिला जब इस सिद्धांत ने एक क्रांतिकारी शायर को न सिर्फ प्रभावित किया बल्कि उससे यह भी लिखवाया कि; "रेखाओं का खेल है मुकद्दर....". इस शायर के अनुसार रेखाएं जो खेला करती हैं उसी से मुकद्दर निकलता है और यही मुकद्दर सब को अमीर, गरीब, दुःख-सुख, धन-धान्य वगैरह से नवाजता है. ज्योतिषियों से प्रभावित जनता के ऊपर शायर का प्रभाव आया तो जनता डबल प्रभावित हुई और अपने मुकद्दर को सराह कर या फिर कराह कर अपना काम चलाती रही.
वैसे हाल ही में लोकल शायर कट्टा कानपुरी ने गरीब के हवाले से एक बड़ा ही ओरिजिनल शेर कहा. बोले;
मैं गरीबी रेखा के नीचे सही मेरा वजूद कुछ तो है,
रहा करे जो मुकद्दर मेरी तलाश में है:-)
रेखा खिंच जाने के बाद अब मुकद्दर भी चाहे तो एक गरीब से उसकी गरीबी नहीं छीन सकता. गरीब भी अपनी गरीबी छिनने के विरुद्ध है. वह आखिर ऐसा क्यों करे? उसे सब्सिडी की प्राप्ति कैसे होगी?
रेखाओं के इस खेल में एक रेखा और जुड़ी जब हमारे जीवन में सरल रेखा ने प्रवेश किया. रेखागणित पढ़ानेवाले अध्यापक ने यह राज खोला कि लक्ष्मण रेखा, हस्त रेखा, मस्तिष्क रेखा के अलावा एक और रेखा होती है जिसे सरल रेखा कहते हैं. इन्होने लगे हाथ यह भी बताया कि दो बिन्दुओं के बीच की न्यूनतम दूरी को सरल रेखा कहते हैं. सरल रेखा की इस परिभाषा ने लोगों को इतना प्रभावित किया कि हमने सरल रेखा का सहारा लेकर फिल्मस्टार रेखा और बिंदु पर तमाम चुटकुले बनाये जिससे पूरे भारत का मनोरंजन होता रहा. वैसे हमारे मोहल्ले के अनुभवी क्रांतिकारी सूमू दा का यह मानना था कि ऐसे चुटकुले जानबूझकर बनाये गए ताकि जनता रेखा और बिंदु की बात करती रहे और उसका ध्यान मूल समस्याओं से हटा रहे. पता नहीं यह कितना सच है लेकिन मुझे याद है कि इन चुटकुलों से जनता ने अपना मनोरंजन खूब किया था.
सरल रेखा की बात पर मुझे मेरे गणित के ट्यूशन टीचर की याद भी याद आई. हम जब उनके घर ट्यूशन पढ़ने जाते थे तब वे हमें बैठाकर यह कह कर निकल जाते थे कि; "एक्स और वाई के बीच एक सरल रेखा खींचो." वे इतना कहकर दूसरे रूम में चले जाते और लगभग पैंतालीस मिनट बाद बाकायदा चाय-नाश्ता करके आते. आने के बाद वे सबकी सरल रेखाएं देखते और बताते कि कैसे सरल रेखा केवल दिखने में सरल होती है लेकिन खींचने में बहुत कठिन होती है. हम उनदिनों बड़े सरल होते थे इसलिए कभी उनसे बहस नहीं किया.
अब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि अगर किसी तरह से सरल रेखा कि खिंचाई सीख जाते तो शायद गरीबी रेखा को लेकर इतना हलकान नहीं होते.
Friday, December 30, 2011
बापी दास का क्रिसमस
यह निबंध नहीं बल्कि कलकत्ते में रहने वाले एक युवा, बापी दास का पत्र है जो उसने इंग्लैंड में रहने वाली अपने एक नेट-फ्रेंड को लिखा था. इंटरनेट सिक्यूरिटी में हुई गफलत के कारण यह पत्र लीक हो गया. ठीक वैसे ही जैसे सत्ता में बैठी पार्टी किसी विरोधी नेता का पत्र लीक करवा देती है. आप पत्र पढ़ सकते हैं क्योंकि इसमें ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे 'प्राइवेट' समझा जा सके.
दिसम्बर २००७ में लिखा था. फिर से पब्लिश कर दे रहा हूँ. जिन्होंने नहीं पढ़ा होगा वे पढ़ लेंगे:-)
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प्रिय मित्र नेटाली,
पहले तो मैं बता दूँ कि तुम्हारा नाम नेटाली, हमारे कलकत्ते में पाये जाने वाले कई नामों जैसे शेफाली, मिताली और चैताली से मिलता जुलता है. मुझे पूरा विश्वास है कि अगर नाम मिल सकता है तो फिर देखने-सुनने में तुम भी हमारे शहर में पाई जाने वाली अन्य लड़कियों की तरह ही होगी.
तुमने अपने देश में मनाये जानेवाले त्यौहार क्रिसमस और उसके साथ नए साल के जश्न के बारे में लिखते हुए ये जानना चाहा था कि हम अपने शहर में क्रिसमस और नया साल कैसे मनाते हैं. सो ध्यान देकर सुनो. सॉरी, पढो.
तुमलोगों की तरह हम भी क्रिसमस बड़े उत्साह के साथ मनाते हैं. थोडा अन्तर जरूर है. जैसा कि तुमने लिखा था, क्रिसमस तुम्हारे शहर में धूम-धाम के साथ मनाया जाता है, लेकिन हम हमारे शहर में घूम-घाम के साथ मनाते हैं. मेरे जैसे नौजवान छोकरे बाईक पर घूमने निकलते हैं और सड़क पर चलने वाली लड़कियों को छेड़ कर क्रिसमस मनाते हैं. हमारा मानना है कि हमारे शहर में अगर लड़कियों से छेड़-छाड़ न की जाय, तो यीशु नाराज हो जाते हैं. हम छोकरे अपने माँ-बाप को नाराज कर सकते हैं, लेकिन यीशु को कभी नाराज नहीं करते.
क्रिसमस का महत्व केक के चलते बहुत बढ़ जाता है. हमें इस बात पर पूरा विश्वास है कि केक नहीं तो क्रिसमस नहीं. यही कारण है कि हमारे शहर में क्रिसमस के दस दिन पहले से ही केक की दुकानों की संख्या बढ़ जाती है. ठीक वैसे ही जैसे बरसात के मौसम में नदियों का पानी खतरे के निशान से ऊपर चला जाता है.
क्रिसमस के दिनों में हम केवल केक खाते हैं. बाकी कुछ खाना पाप माना जाता है. शहर की दुकानों पर केक खरीदने के लिए जो लाइन लगती है उसे देखकर हमें विश्वास हो जाता है दिसम्बर के महीने में केक के धंधे से बढ़िया धंधा और कुछ भी नहीं. मैंने ख़ुद प्लान किया है कि आगे चलकर मैं केक का धंधा करूंगा. साल के ग्यारह महीने मस्टर्ड केक का और एक महीने क्रिसमस के केक का.
केक के अलावा एक चीज और है जिसके बिना हम क्रिसमस नहीं मनाते. वो है शराब. हमारी मित्र मंडली (फ्रेंड सर्कल) में अगर कोई शराब नहीं पीता तो हम उसे क्रिसमस मनाने लायक नहीं समझते. वैसे तो मैं ख़ुद क्रिश्चियन नहीं हूँ, लेकिन मुझे इस बात की समझ है कि क्रिसमस केवल केक खाकर नहीं मनाया जा सकता. उसके लिए शराब पीना भी अति आवश्यक है.
मैंने सुना है कि कुछ लोग क्रिसमस के दिन चर्च भी जाते हैं और यीशु से प्रार्थना वगैरह भी करते हैं. तुम्हें बता दूँ कि मेरी और मेरे दोस्तों की दिलचस्पी इन फालतू बातों में कभी नहीं रही. इससे समय ख़राब होता है.
अब आ जाते हैं नए साल को मनाने की गतिविधियों पर. यहाँ एक बात बता दूँ कि जैसे तुम्हारे देश में नया साल एक जनवरी से शुरू होता है वैसे ही हमारे देश में भी नया साल एक जनवरी से ही शुरू होता है. ग्लोबलाईजेशन का यही तो फायदा है कि सब जगह सब कुछ एक जैसा रहे.
नए साल की पूर्व संध्या पर हम अपने दोस्तों के साथ शहर की सबसे बिजी सड़क पार्क स्ट्रीट चले जाते हैं. है न पूरा अंग्रेजी नाम, पार्क स्ट्रीट? मुझे विश्वास है कि ये अंग्रेजी नाम सुनकर तुम्हें बहुत खुशी होगी. हाँ, तो हम शाम से ही वहाँ चले जाते हैं और भीड़ में घुसकर लड़कियों के साथ छेड़-खानी करते हैं.
हमारा मानना है कि नए साल को मनाने का इससे अच्छा तरीका और कुछ नहीं होगा. सबसे मजे की बात ये है कि मेरे जैसे यंग लड़के तो वहां जाते ही हैं, ४५-५० साल के अंकल टाइप लोग, जो जींस की जैकेट पहनकर यंग दिखने की कोशिश करते हैं, वे भी जाते हैं. भीड़ में अगर कोई उन्हें यंग नहीं समझता तो ये लोग बच्चों के जैसी अजीब-अजीब हरकतें करते हैं जिससे लोग उन्हें यंग समझें.
तीन-चार साल पहले तक पार्क स्ट्रीट पर लड़कियों को छेड़ने का कार्यक्रम आराम से चल जाता था. लेकिन पिछले कुछ सालों से पुलिस वालों ने हमारे इस कार्यक्रम में रुकावटें डालनी शुरू कर दी हैं. पहले ऐसा ऐसा नहीं होता था. हुआ यूँ कि दो साल पहले यहाँ के चीफ मिनिस्टर की बेटी को मेरे जैसे किसी यंग लडके ने छेड़ दिया. बस, फिर क्या था. उसी साल से पुलिस वहाँ भीड़ में सादे ड्रेस में रहती है और छेड़-खानी करने वालों को अरेस्ट कर लेती है.
मुझे तो उस यंग लडके पर बड़ा गुस्सा आता है जिसने चीफ मिनिस्टर की बेटी को छेड़ा था. उस बेवकूफ को वही एक लड़की मिली छेड़ने के लिए. पिछले साल तो मैं भी छेड़-खानी के चलते पिटते-पिटते बचा था.
नए साल पर हम लोग कोई काम-धंधा नहीं करते. वैसे तो पूरे साल कोई काम नहीं करते, लेकिन नए साल में कुछ भी नहीं करते. हम अपने दोस्तों के साथ ट्रक में बैठकर पिकनिक मनाने जरूर जाते हैं. वैसे मैं तुम्हें बता दूँ कि पिकनिक मनाने में मेरी कोई बहुत दिलचस्पी नहीं रहती. लेकिन चूंकि वहाँ जाने से शराब पीने में सुभीता रहता है सो हम खुशी-खुशी चले जाते हैं. एक ही प्रॉब्लम होती है. पिकनिक मनाकर लौटते समय एक्सीडेंट बहुत होते हैं क्योंकि गाड़ी चलाने वाला ड्राईवर भी नशे में रहता है.
नेटाली, क्रिसमस और नए साल को हम ऐसे ही मनाते हैं. तुम्हें और किसी चीज के बारे में जानकारी चाहिए, तो जरूर लिखना. मैं तुम्हें पत्र लिखकर पूरी जानकारी दूँगा. अगली बार अपना एक फोटो जरूर भेजना.
तुम्हारा,
बापी
पुनश्च: अगर हो सके तो अपने पत्र में मुझे यीशु के बारे में बताना. मुझे यीशु के बारे में जानने की बड़ी इच्छा है, जैसे, ये कौन थे?, क्या करते थे? ये क्रिसमस कैसे मनाते थे?
Thursday, October 6, 2011
यहाँ का रावण इतना छोटा है कि इसे तो शत्रुघ्न ही मार लेंगे...
आज विजयदशमी है. सुनते हैं भगवान राम ने आज ही के दिन (ग़लत अर्थ न निकालें. आज ही के दिन का मतलब ९ अक्टूबर नहीं बल्कि दशमी) रावण का वध किया था. अपनी-अपनी सोच है. कुछ लोग कहते हैं आज विजयदशमी इसलिए मनाई जाती है कि भगवान राम आज विजयी हुए थे. कुछ लोग ये भी कहते हुए मिल सकते हैं कि आज रावण जी की पुण्यतिथि है. आँखों का फरक है जी.
हाँ तो बात हो रही थी कि आज विजयदशमी है और आज ही के दिन राम ने रावण का वध कर दिया था. आज ही के दिन क्यों किया? इसका जवाब कुछ भी हो सकता है. ज्योतिषी कह सकते हैं कि उसका मरना आज के दिन ही लिखा था. यह तो विधि का विधान है. लेकिन शुकुल जी की बात मानें तो ये भी कह सकते हैं कि भगवान राम और उनकी सेना लड़ते-लड़ते बोर हो गई तो रावण का वध कर दिया.
आज एक विद्वान् से बात हो रही थी. बहुत खुश थे. बोले; "भगवान राम न होते तो रावण मरता ही नहीं. वीर थे राम जो रावण का वध कर पाये. अरे भाई कहा ही गया है कि जब-जब होई धरम की हानी...."
उन्हें देखकर लगा कि सच में बहुत खुश हैं. रावण से बहुत घृणा करते हैं. राम के लिए इनके मन में सिर्फ़ और सिर्फ़ आदर है. लेकिन उन्होंने मेरी धारणा को दूसरे ही पल उठाकर पटक दिया. बोले; "लेकिन देखा जाय तो एक तरह से धोखे से रावण का वध किया गया. नहीं? मेरे कहने का मतलब विभीषण ने बताया कि रावण की नाभि में अमृत है तब जाकर राम भी मार पाये. नहीं तो मुश्किल था. और फिर राम की वीरता तो तब मानता जब वे बिना सुग्रीव और हनुमान की मदद लिए लड़ते. देखा जाय तो सवाल तो राम के चरित्र पर भी उठाये जा सकते हैं."
उनकी बात सुनकर लगा कि किसी की प्रशंसा बिना मिलावट के हो ही नहीं सकती. राम की भी नहीं. यहाँ सबकुछ 'सब्जेक्ट टू' है.
शाम को घर लौटते समय आज कुछ नया ही देखने को मिला. इतने सालों से कलकत्ते में रहता हूँ लेकिन आज ही पता चला हमारे शहर में भी रावण जलाया जाता है. आज पहली बार देखा तो टैक्सी से उतर गया. बड़ी उत्सुकता थी देखने की. हर साल न्यूज़ चैनल पर दिल्ली के रावण को जलते देखते थे तो मन में यही बात आती थी; "हमारे शहर में रावण क्यों नहीं जलाया जाता. भारत के सारे शहरों में रावण जलाया जाता है लेकिन हमारे शहर में क्यों नहीं? कब जलाया जायेगा? "
दिल्ली वालों से जलन होती थी ऊपर से. सोचता था कि एक ये हैं जो हर साल रावण को जला लेते हैं और एक हम हैं कि पाँच साल में भी नहीं जला पाते.
लेकिन आज जो कुछ देखा, मेरे लिए सुखद आश्चर्य था. खैर, टैक्सी से उतर कर मैदान की भीड़ का हिस्सा हो लिया. बड़ी उत्तम व्यवस्था थी. भीड़ थी, मंच था, राम थे, रावण था और पुलिस थी. हर उत्तम व्यवस्था में पुलिस का रहना ज़रूरी है. अपने देश में जनता को आजतक उत्तम व्यवस्था करते नहीं देखा.
जनता सामने खड़ी थी. जनता की तरफ़ राम थे और मंच, जहाँ कुछ नेता टाइप लोग बैठे थे, उस तरफ़ रावण था. मंच के चारों और पुलिस वाले तैनात थे. देखकर लग रहा था जैसे सारे के सारे रावण के बॉडी गार्ड हैं.
मैं भीड़ में खड़ा रावण के पुतले को देख रहा था. मन ही मन भगवान राम को प्रणाम भी किया. रावण को देखते-देखते मेरे मुंह से निकल आया; "रावण छोटा है."
मेरा इतना कहना था कि मेरे पास खड़े एक बुजुर्ग बोले; "ठीक कह रहे हैं आप. रावण छोटा है ही. इतना छोटा रावण भी होता है कहीं?"
मैंने कहा; "मुझे भी यही लगा. जब वध करना ही है तो बड़ा बनाते."
वे बोले; "अब आपको क्या बताऊँ? मैं तेरह साल दिल्ली में रहा हूँ. रावण तो दिल्ली के होते हैं. या बड़े-बड़े. कम से कम चालीस फीट के. हर साल देखकर लगता था कि इस साल का रावण पिछले साल के रावण से बड़ा है."
मैंने कहा; "दिल्ली की बात ही कुछ और है. वहां का रावण तो बहुत फेमस है. टीवी पर देखा है."
मेरी बात सुनकर उन्होंने अपने अनुभव बताने शुरू किए. बोले; "अब देखिये दिल्ली में बहुत पैसा है. वहां रावण के ऊपर बहुत पैसा खर्च होता है. और फिर वहां रावण का साइज़ बहुत सारा फैक्टर पर डिपेंड करता है."
उनकी बातें और अनुभव सुनकर मुझे अच्छा लगा. भाई कोई दिल्ली में रहा हुआ मिल जाए तो दिल्ली की बातें सुनने में अच्छा लगता है. मैंने उनसे कहा; "जैसे? किन-किन फैक्टर पर डिपेंड करता है रावण का साइज़?"
मेरा सवाल सुनकर वे खुश हो गए. शायद अकेले ही थे. कोई साथ नहीं आया था. लिहाजा उन्हें भी किसी आदमी की तलाश होगी जिसके साथ वे बात कर सकें.
'दो अकेले' मिल जाएँ, बस. दुनियाँ का कोई मसला नहीं बचेगा. मेरा सवाल सुनकर उनके चेहरे पर ऐसे भाव आए जिन्हें देखकर लगा कि बस कहने ही वाले हैं; "गुड क्वेश्चन."
लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा बल्कि बड़े उत्साह के साथ बोले; "बहुत सारे फैक्टर हैं. देखिये वहां तो रावण का साइज़ नेता के ऊपर भी डिपेंड करता है. समारोह में जितना बड़ा नेता, रावण का कद भी उसी हिसाब से बड़ा समझिये. अब देखिये कि जिस समारोह में प्रधानमन्त्री जाते हैं, उसके रावण के क्या कहने! या बड़ा सा रावण. चालीस-पचास फीट का रावण. उसके जलने में गजब मज़ा आता है. कुल मिलाकर मैंने बारह रावण देखे हैं जलते हुए. बाजपेई जी के राज में भी रावण बड़ा ही रहता था."
मैंने कहा; "सच कह रहे हैं. वैसे दिल्ली में पैसा भी तो खूब है. यहाँ तो सारा पैसा दुर्गापूजा में लग जाता है. ऐसे में रावण को जलाने में ज्यादा पैसा खर्च नहीं कर पाते."
मेरी बात सुनकर बोले; "देखिये, बात केवल पैसे की नहीं है. दिल्ली में बड़े-बड़े रावण केवल पैसे से नहीं बनते. रावण बनाने के लिए पैसे से ज्यादा महत्वपूर्ण है डेडिकेशन. कम पैसे खर्च करके भी बड़े रावण बनाये जा सकते हैं. सबकुछ डिपेंड करता है बनानेवालों के उत्साह पर. और इस रावण को देखिये. देखकर लगता है जैसे इसे मारने के लिए राम की भी ज़रूरत नहीं है. इसे तो शत्रुघ्न ही मार लेंगे."
मैंने कहा; "हाँ, वही तो मैं भी सोच रहा था. सचमुच काफी छोटा रावण है."
मेरी बात सुनकर बोले; "लेकिन देखा जाय तो अभी यहाँ नया-नया शुरू हुआ है. जैसे-जैसे फोकस बढ़ेगा, यहाँ का रावण भी बड़ा होगा..."
अभी वे अपनी बात पूरी करने ही वाले थे कि राम ने अग्निवाण दाग दिया. वाण सीधा रावण के दिल पर जाकर लगा. रावण जलने लगा.
चलिए हमारे शहर में भी रावण जलने लगा. अगले साल फिर जलेगा. फिर विजयदशमी आएगी....... और रावण की पुण्यतिथि भी.
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नोट: पुरानी पोस्ट है. साल २००८ की.
Friday, August 12, 2011
पंद्रह अगस्त की तैयारी
पंद्रह अगस्त लगभग आ गया है. लगभग इसलिए कि अभी चार दिन बाकी हैं. कई देशभक्त मोहल्लों में पंद्रह अगस्त मनाने का प्लान बन चुका है. थोड़े कम देशभक्त मोहल्लों में अभी भी बनाया जा रहा है. लाऊडस्पीकर पर कौन सा गाना पहले पायदान पर होगा और कौन सा तीसरे पर, यह फाइनल किया जाने लगा है. कितने लोग़ चिकेन बिरियानी खायेंगे और कितने मटन बिरियानी, इसकी लिस्ट बननी शुरू हो गई है. "पिछले पंद्रह अगस्त तक बीयर पीनेवाले छोटका को क्या इस बार ह्विस्की दे दी जाय?" जैसे सवालों के जवाब खोजने की कवायद शुरू हो चुकी है.
हमारे सूमू दा यह बात निश्चित कर रहे होंगे कि इस बार किससे ज्यादा चंदा लेना है? पासवाले मोहल्ले के झूनू दा, 'गरीबों' को कंबल बांटने के लिए चंदा इकठ्ठा कर रहे होंगे. इस कांफिडेंस के साथ कि; "बरसात में अगर गरीबों को कंबल न मिला तो वे बेचारे भीग जायेंगे..." उनके डिप्टी ब्लड डोनेशन कैम्प की तैयारी कर रहे होंगे. उनके दायें ब्लड डोनेशन के समय दिए जाने वाले बिस्कुट और केले के हिसाब में हेर-फेर का प्लान बना रहे होंगे.
सिनेमाई चैनल देशभक्ति से ओत-प्रोत फिल्मों का चुनाव कर रहे होंगे. पंद्रह अगस्त को सुबह नौ बजे वाले वाले स्लॉट में बोर्डर दिखाया जाय या क्रान्ति? न्यूज़ चैनल वाले नई पीढ़ी का टेस्ट लेने के लिए क्वेश्चन छांट रहे होंगे. "ये बताइए, कि गाँधी जी के चचा का क्या नाम था?" या फिर; "जवाहर लाल नेहरु की माता का क्या नाम था?" ऐसा सवाल जिसे सुनकर सामनेवाला ड्यूड ढाई मिनट तक कन्फ्यूजन की धारा मुखमंडल पर बहाने के बाद उल्टा सवाल करे; "माता मीन्स मॉम ना?" न्यूज़ चैनल के संवाददाता यह सोच रहे होंगे कि इस बार कौन से नेता को पकड़कर पूछें कि; "राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत में क्या फरक होता है?" या फिर " जन गण मन तो राष्ट्रगान है, ये बताइए राष्ट्रगीत क्या है?" या फिर; "अच्छा, पूरा राष्ट्रगान गाकर सुनाइये?"
उन्हें किसी ऐसे नेता की तलाश होगी जिससे अगर वे राष्ट्रगीत गाने को कहें तो वो फट से शुरू हो जाए; "ऐ मेरे वतन के लोगों ज़रा आँख में भर लो पानी...." या फिर; "मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे-मोती..."
ट्रैफिक सिग्नल पर जो रामनरेश कल तक भुट्टा और चेरी बेंचते थे, वही पिछले तीन-चार दिन से तिरंगा बेंच रहे हैं. स्वतंत्रता दिवस मौसमी धंधा जो ठहरा. पूरे साल भर टैक्स चोरी का प्लान बनानेवाले अचानक देशभक्ति काल में चले गए हैं और रामनरेश जी से तिरंगा खरीदकर अपनी कार में इस तरह से रख लिया है जिससे आयकर भवन के सामने से गुजरें तो लोग़ उनकी कार में रखा देशभक्ति-द्योतक तिरंगा देख पाएं. कल-परसों से ही मोहल्ले में बजने वाले गाने ....कैरेक्टर ढीला है की जगह मेरे देश की धरती सोना उगले नामक गाना ले लेगा.
कुल मिलाकर मस्त महौल में जीने दे टाइप वातावरण बन चुका है लेकिन पता नहीं क्यों मुझे कुछ मिसिंग लग रहा है. पता नहीं क्यों लगता है जैसे पहले की ह़र बात अच्छी थी और अब चूंकि ज़माना खराब हो गया है लिहाजा वही बातें बुरी हो गई हैं. वैसे ही पहले का पंद्रह अगस्त अच्छा था और ज़माना खराब हो गया है तो अब पहले जैसा नहीं रहा.
याद कीजिये १०-१२ साल पहले का पंद्रह अगस्त. हर पंद्रह अगस्त के शुभ अवसर पर कार्यकुशल सरकारी पुलिस आतंक फैलाने का प्लान बनाते हुए आतंकवादियों को पकड़ लेती थी. दूरदर्शन हमें बताता था कि; "आज शाम पुरानी दिल्ली के फलाने इलाके से पुलिस ने तीन पाकिस्तानी आतंकवादियों को गिरफ्तार कर लिया. ये आतंकवादी स्वतंत्रता दिवस पर आतंक फैलाने का प्लान बनाकर भारत आये थे." उधर दूरदर्शन हमें यह खबर देता और इधर हम प्रसन्न हो जाते. यह सोचते हुए कि; "चलो अब देश के ऊपर कोई खतरा नहीं रहा. अब पेट भरकर पंद्रह अगस्त मनाएंगे."
अब दिल्ली में पाकिस्तानी आतंकवादी गिरफ्तार नहीं होते. इसका कारण यह भी हो सकता है कि पहले आतंक के दो मौसम होते थे, एक पंद्रह अगस्त और एक छब्बीस जनवरी और अब तो हर मौसम आतंक का है. ऐसे में आतंकवादी 'जी' लोग़ जब चाहें पंद्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी मना ले रहे हैं.
वैसे दिल्ली में तैयारियां जोरों पर होंगी. धोबी शेरवानियाँ धोने में व्यस्त होंगे. ट्रैफिक पुलिस वाले खोलने और बंद करने के लिए रास्तों का चुनाव कर रहे होंगे. प्रधानमंत्री का भाषण लिखने वाले यह सोचकर परेशान हो रहे होंगे कि भाषण में किसान, दलित, पीड़ित, ईमानदारी, चिंता, भ्रष्टाचार, अच्छे सम्बन्ध, जीडीपी, विकास दर, मज़बूत सरकार जैसे शब्द कहाँ-कहाँ फिट किये जायें जिससे भाषण को मैक्सिमम स्ट्रेंथ मिले और भाषण खूब मज़बूत बनकर उभरे. ईमानदारी के प्रदर्शन से फुरसत मिलती होगी तो प्रधानमंत्री जी सलामी लेने की भी प्रैक्टिस कर रहे होंगे. रोज रात को साढ़े आठ से नौ के बीच. उनके लिए चूंकि हिंदी एक कठिन भाषा है तो वे भाषण पढ़कर कम गलतियाँ करने की कोशिश कर रहे होंगे.
पिछले तमाम भाषणों को सुनने के बाद मेरे मन में आया कि भाषण के बारे में प्रधानमंत्री और उनके निजी सचिव के बीच शायद कुछ इस तरह की बात होती होगी;
-- सर, एक बात पूछनी थी आपसे?
-- हाँ हाँ, पूछिए न.
-- सर, वो ये पूछ रहा था कि इस बार लाल किले पर आप पहले किसानों की समस्याओं पर चिंता प्रकट करेंगे या अल्प-संख्यकों की?
-- जैसा आप कहें. वैसे मुझे लगता है कि पहले अल्पसंख्यकों की समस्याओं पर चिंता प्रकट करना ठीक रहेगा.
-- जी सर. मैं भी यही सोच रहा था. वैसे भी एक बार आपने कहा था कि देश के संसाधनों पर पहला हक अल्पसंख्यकों का है ऐसे में..
-- हाँ, अच्छा याद दिलाया आपने. पहले उनकी समस्याओं पर चिंता प्रकट करूँगा तो लोगों को लगेगा कि मैं ऐसा प्रधानमंत्री हूँ "हू वाक्स द टाक."
-- और सर, किसानों की समस्याओं पर चिंता के अलावा और क्या प्रकट करना चाहेंगे आप?
-- और क्या प्रकट किया जा सकता है वो तो आप बतायेंगे? मुझे लगता है कि चिंता करने के अलावा अगर उन्हें विश्वास दिला दें तो ठीक रहेगा. नहीं?
-- बिलकुल ठीक सोचा है सर आपने. उन्हें लोन दिला ही चुके हैं. लोन माफी दिला ही दिया. नरेगा में रोजगार दिला ही दिया. सब्सिडी देते ही हैं. सबकुछ ठीक रहा तो अब कैश भी देने लगेंगे. कहीं-कहीं उन्हें गोली भी मिल चुकी है. ज़मीन के बदले में मुवावजा दिला ही देते हैं. इनसब के अलावा और बचता ही क्या है? सबकुछ तो दिला चुके. अब तो केवल विश्वास दिलाना बाकी है.
-- बिलकुल सही कह रहे हैं. जब तक विश्वास न दिलाया जाय, इनसब चीजों को दिलाने का कोई महत्व नहीं है.
-- और सर, पड़ोसी देशों से अच्छे सम्बन्ध कायम करने की बात आप कितनी बार करना चाहेंगे? तीन बार से काम चल जाएगा?
-- मुझे लगता है उसे बढ़ाकर चार कर दीजिये. वो ठीक रहेगा. हाँ, एक बात बतानी थी आपको. अभी तक जो भाषण मैंने पढ़ा है, उसमें भ्रष्टाचार के बारे में केवल आठ बार चिंतित होने का मौका मिल रहा है. मुझे लगता है उसे बढ़ाकर ग्यारह कर दिया जाय तो ठीक रहेगा.
-- अरे सर, मैं तो बारह करने वाला था. बाद में याद आया कि पाँच कैबिनेट मिनिस्टर पिछले सात दिन में कुल मिलाकर तेईस बार चिंता व्यक्त कर चुके हैं ऐसे में आप आठ बार ही व्यक्त करें नहीं तो बड़ा बोरिंग लगेगा.
-- कोई बात नहीं. चिंता करने की बात पर मुझे अपने मंत्रियों पर बहुत गर्व है. हाँ, ये बात कम से काम चार बार लिखवाईयेगा कि सरकार भ्रष्टाचार मिटाने के लिए कटिबद्ध है.
-- वो तो मैंने चार बार लिखवा दिया है सर. साथ ही मैंने इस बात पर जोर दिलवा दिया है कि सरकार का लोकपाल बिल सब बिलों से अच्छा है और उसके माध्यम से देश को एक मज़बूत लोकपाल मिलेगा.
-- ये आपने सही किया. अच्छा पूरे भाषण में मंहगाई पर कितनी बार चिंतित होना है?
-- यही कोई सात बार सर. वैसे सर, मंहगाई पर केवल चिंतित होना है या और कुछ भी होना चाहते हैं आप?
-- अरे मंहगाई को कंट्रोल में लाना चाहते हैं हम. एक काम कीजिये. ये जो कंट्रोल में लाने वाली बात है, उसे आप पिछले तीन भाषणों से कॉपी कर सकते हैं. अगर कॉपी करेंगे तो फिर अलग से मेहनत नहीं करनी पड़ेगी.
-- हे हे हे ..सर उसके लिए तो आपको याद दिलाने की ज़रुरत बिलकुल नहीं है. वो तो मैंने साल दो हज़ार आठ के भाषण से ही कॉपी किया है. और सर, दो हज़ार नौ और दस में भी दो हज़ार आठ के भाषण से कॉपी किया था. सबसे बढ़िया बात यह है सर कि ऐसा करने से हमारी उस फिलास्फी का पालन भी हो जाता है जिसके अनुसार हम पिछले रिकॉर्ड देखकर काम करते हैं.
-- यह बहुत ज़रूरी है कि हम अपने पुराने रास्तों को न भूलें. वैसे एक बात मत भूलियेगा. हम डबल डिजिट में ग्रो कर सकते हैं, यह बात आप चार-पाँच जगह डलवा दीजियेगा.
-- हें हें हें..सर, ये भी कोई कहने की बात है? सर, एट प्वाइंट फाइव का जीडीपी और डबल डिजिट में ग्रो करने की बात आपको याद दिलानी नहीं पड़ेगी सर.
-- गुड गुड.
-- सर, साम्प्रदायिकता के बारे में आप उतना ही चिंतित होना चाहते हैं जितना पिछले तीन साल से चिंतित हैं या इसबार थोड़ा और चिंतित हों चाहेंगे?
-- गुड क्वेश्चन...देखिये मुझे लगता है कि इस बार थोड़ा और चिंतित होने की ज़रुरत है. इतने सारे स्कैम फैले हुए हैं ऐसे में सैफ्रोन टेरर की बात हो जाए तो थोड़ा बैलेंस बन जाएगा.
-- बाकी तो लगभग पूछ ही लिया सर. एक बात ये पूछनी थी कि भ्रष्टाचार पर कार्यवाई करने की बात पर भाषण में सरकार की पीठ कितनी बार ठोंकी जाए?
-- अरे, सरकार भी अपनी है और पीठ भी अपनी. जितनी बार चाहें ठोंक लीजिये. इतने सालों तक भाषण लिखवाने के बाद ये सवाल तो नहीं पूछना चाहिए आपको...
-- सॉरी सर...
-- कोई बात नहीं. आप आगे का भाषण लिखवाइए. बाकी जो पूछना होगा वह सब कल पूछ लीजियेगा. अब मेरा ईमानदारी आसन में बैठने का समय हो गया है. मैं आधा घंटा ईमानदारी आसन में बैठकर ईमानदार होने की प्रैक्टिस करूँगा. कल फिर मिलते हैं.
Friday, June 17, 2011
मीठे में क्या है?
आपने पी पी पी के बारे में सुना ही होगा. अरे, वो टीवी पर पी की आवाज़ करने वाला शंख नहीं जो टीवी चैनल वाले कई बार रियलिटी शो में दी गई गालियों को ढांपने के काम में लेते हैं. यह तीन पी का मतलब है पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप जिसको प्रमोट करने के लिए उद्योगपति श्री राहुल बजाज ने अपने पूरे दिन का कम से कम दो घंटा तो पक्का दे रक्खा है. तो जैसे पी पी पी वैसे ही बी बी पी. बी बी पी का मतलब है ब्लॉगर ब्लॉगर पार्टनरशिप. तो यह ब्लॉग पोस्ट बी बी पी से उपजी है जिसे मैंने और मेरे मित्र विकास गोयल ने लिखा है. विकास just THOUGHT no PROCESS नामक अंग्रेजी ब्लॉग लिखते हैं.
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रोज की तरह आज भी शर्मा जी ने टाइम पर डिब्बे में रखे लंच का संहार किया. अचार के मसाले को चाटते हुए उनके चेहरे पर एक मुस्कान थी. लंच के बाद जब वे हाथ धो रहे थे, उस समय भी एक बार फिर से उनके चेहरे पर उसी मुस्कान का एक्शन रिप्ले हुआ जो उनके अचार का मसाला चाटते हुए आई थी. आइये जानने की कोशिश करते हैं कि शर्मा जी के मुखड़े पर इस मुस्कान के आने का कारण क्या है? उनसे पूछें? जाने दीजिये. मूड तो उनका ठीक है लेकिन मैनेजर ही तो हैं. पता नहीं कब बिदक जायें? वैसे भी आज सुबह से अभी तक किसी बात पर वे बिदके नहीं हैं. ऐसे में क्या पता कि हमारे सवाल पर ही बिदक जायें?
आफिस में रहते हुए मैनेजर अगर फ्रीक्वेन्टली नाराज़ न हो तो उसे मैनेजर माननेवालों की संख्या दिनों- दिन कम होती जाती है.
तब कैसे पता चलेगा? चलिए शर्मा जी के मन की बात पढ़ने की कोशिश करते हैं. क्या कहा? यह संभव नहीं? लगता है आपने श्री गोविंदा की महान फिल्म दूल्हे राजा नहीं देखी है इसीलिए ऐसा कह रहे हैं. आपने देखा नहीं कि उस फिल्म में गोविंदा जी किस तरह से किसी के मन की बात सुन लेते.....क्या कहा? समझ में आ गया? ये अच्छा हुआ नहीं तो मैं उस फिल्म के डायलॉग लिखकर आपको बताने की कोशिश करता जिससे आप बोर होते. समझदार पाठक की यही निशानी है कि वह बोरे होने से बचता रहे.
तो चलिए शर्मा जी के मन की बात सुनते हैं....मैंने पता लगा लिया. अब पढ़िए कि शर्मा जी क्यों मुस्कुराए.
आज उन्होंने अपने एक क्लायंट के साथ तीन बजे मीटिंग फिक्स कर ली है. काबिल मैनेजर की यही निशानी है कि वह अपने आफिस से दूर किसी क्लायंट से तीन बजे मीटिंग फिक्स कर ले जिससे मीटिंग ख़त्म होते-होते साढ़े चार बज जाए. जिससे वह वहाँ से निकल कर अपने आफिस फ़ोन करके यह बता सके कि अब आफिस पहुँचते-पहुँचते साढ़े पाँच बज जायेंगे इसलिए वह यहीं से घर चले जा रहे हैं. वैसे भी आफिस में कोई और मीटिंग तो है नहीं. आज मंगलवार है और मिड ऑफ द वीक मीटिंग वृहस्पतिवार को होती है. उस दिन तो छ से नौ बजे तक झक मारकर आफिस में बैठना ही पड़ता है. ऐसे में क्यों न वे आज घर जल्दी पहुंचकर मिसेज शर्मा को सरप्राइज दें?
श्रीमती जी सरप्राइज देने वाली बात उनके मन में आई ज़रूर है लेकिन उसको लेकर वे बहुत कन्विंश नहीं हैं. कारण यह है कि उन्होंने जब भी अपनी श्रीमती जी को सरप्राइज देने की कोशिश की है उनका सरप्राइज औंधे मुँह गिरा है. पहली बार कोशिश उन्होंने तब की थी जब मिसेज शर्मा के जन्मदिन पर उन्होंने एक फेमस ब्रांड की ईयर-रिंग्स खरीद कर उन्हें गिफ्ट की थी. उन ईयर-रिंग्स को देखकर मिसेज शर्मा का पहला रिएक्शन था; "क्या जरूरत थी इतना पैसा खर्च करने की?" दूसरा रिएक्शन था "इसकी डिजाइन कित्ती तो ओल्ड है."
श्रीमती जी के रियेक्शंस सुनकर शर्मा जी को एक क्षण के लिए लगा कि उनके फ्लैट की फर्श फट जाए जिससे वे उसमें समा जायें. यह बात अलग थी कि ऐसा हो न सका. बिल्डर ने फ्लैट की फर्श उतनी भी कमजोर नहीं बनाई थी कि घर की मालकिन को ईयर-रिंग्स पसंद न आने पर फट जाती. अपनी शर्म को समेटे शर्मा जी को मन मार कर चुप रह जाना पड़ा था. दूसरी बार उनका सरप्राइज तब औंधे मुँह गिरा था जब काम करने वाली मेड के दो दिनों तक न आने की वजह से उन्होंने श्रीमती जी की मदद करने के लिए तब बर्तन धो देने की कोशिश की थी जब वे नीचे सब्जी वाले से सब्जी खरीदने गयीं थीं. वापस आकर जब उन्होंने देखा कि शर्मा जी ने सारे बर्तन धो डाले थे तो उन्होंने यह कहते हुए अपनी नाराजगी दिखाई कि; "जब तुम्हें मालूम नहीं है कि बर्तन धोकर रखना कैसे है तो क्या जरूरत थी उसे धोने की?"
उस दिन फर्श में समा जाने की बात उनके मन में नहीं आई क्योंकि उन्हें यह बता पता थी कि फर्श के फटने का कोई चांस नहीं था. हाँ, यह बात मन में जरूर आई कि कौन सा बहाना बनाकर वे घर से तीन-चार घंटे के लिए निकल जायें? चूंकि उन्हें तुरंत कोई बहाना नहीं सूझा था इसलिए घर में ही रहकर आधे घंटे तक वे मिसेज शर्मा की बातें सुनते रहे. कुछ देर बाद टीवी पर चल रहे एक सिंगिंग रियलिटी शो ने उन्हें उबारा. तीसरी बार उनका सरप्राइज तब...खैर जाने दीजिये. पुरानी बातों के बारे में बात करके क्या फायदा?
वहीँ दूसरी तरफ मिसेज शर्मा ने जब भी चाहा 'आर्यपुत्र' को सरप्राइज देने में हमेशा कामयाब रहीं. पहली बार उन्होंने तब सरप्राइज दी जब पड़ोस की अपनी फ्रेंड मिसेज सुरी के रस्ते पर चलते हुए एक बदनाम फिनांस कंपनी में डिपोजिट अकाउंट इसलिए खोला क्योंकि उसके एजेंट के अनुसार पाँच साल तक पैसा जमा करने से उन्हें कंपनी के हाउसिंग प्रोजेक्ट में फ्लैट मिलना था. दूसरी बार मिसेज शर्मा ने तब सरप्राइज दिया...खैर जाने दीजिये. जब शर्मा जी के सरप्राइज की बात और नहीं हुई तो बराबरी का तकाजा है कि मिसेज शर्मा के सरप्राइज की बात को भी आगे न बढ़ाया जाय.
अपनी सरप्राइज देने की कोशिशों के हर बार धरासायी होने के बावजूद आज एक बार फिर से शर्मा जी के मन में आया कि सरप्राइज पर एक बार फिर से हाथ आजमाया जाय. कोशिश करने में हर्ज़ ही क्या है? उन्होंने आठवीं कक्षा में बच्चन जी की कविता बड़े मन से पढ़ी थी जिसमें बताया गया था कि; "कोशिश करने वालों की हार नहीं होती.." बच्चन जी की फिलासफी से प्रभावित शर्मा जी ने आज मन में एक बार फिर से ठान ही लिया कि वे बहुत दिनों बाद श्रीमती जी को सरप्राइज करेंगे.
मीटिंग ख़त्म करके वे घर की तरफ रवाना हो लिए.
कार की पिछली सीट पर बैठे वे घर की तरफ चले जा रहे हैं. अगर आप वैज्ञानिक बुद्धि की अधिकता वाले पाठक हैं तो यह भी कह सकते हैं कि शर्मा जी घर की तरफ कहाँ जा रहे हैं? घर की तरफ तो उनकी कार जा रही है और यह संयोग की बात है कि चूंकि वे भी उसी कार में बैठे हैं इसलिए वे भी घर की तरफ जा पा रहे हैं. खैर जो भी हो, घर की तरफ चले जा रहे शर्मा जी ने अपनी घड़ी पर एक निगाह डाली. मन ही मन सोचा; 'वाह,! आज बहुत दिनों बाद सवा पाँच बजे तक घर पहुंचकर मिसेज को सरप्राइज दूंगा.'
आस-पास से जाने वाली कारों में बैठे लोगों को देखकर वे मन ही मन यह अनुमान भी लगाते जा रहे थे कि इनमें से कितने लोग़ इतनी जल्दी अपने घर जा रहे होंगे? दूसरे ही पल सोचते; 'इनलोगों को देखकर तो नहीं लगता कि ये लोग़ अपने घर जा रहे हैं. देखकर तो यही लगता है कि क्लायंट के साथ मीटिंग करके अपने आफिस वापस जा रहे हैं.'
उनके मन में कई बार आया कि किसी सिग्नल पर वे कार का विंडो ग्लास नीचे खिसका कर बगल वाली कार में बैठे साहब से पूछ लें कि; "आप क्लायंट के साथ मीटिंग ख़त्म करके अपने आफिस वापस क्यों जा रहे हैं? वहीँ से घर क्यों नहीं चले गए? मुझे देखिये...." उनके मन में यह भी आया कि एक बार विंडो ग्लास नीचे खिसका कर वे चिल्लाकर लोगों को बताएं कि वे आज बहुत जल्दी अपने घर जा रहे हैं. यह भी कि जल्दी घर पहुंचकर अपनी श्रीमती जी को सरप्राइज देना चाहते हैं. यह भी कि जीवन की इस आपा-धापी में बीच-बीच में ऐसा करने से एक मैनेजर की घर के प्रति जिम्मेदारियां निभ जाती हैं.
ऐसा करने के बाद कोई उसके ऊपर आरोप नहीं लगा सकता कि वो केवल आफिस में अपने काम में बिजी रहता है और घर की तरफ ध्यान नहीं देता.
न्यूटन जी का रहस्योद्घाटन कि; "कोई वस्तु गतिशील अवस्था में तबतक रहती है जबतक उसपर बाहरी बल न लगाया जाय", आज एक बार फिर से तब सच्चा साबित हुआ जब शर्मा जी के ड्राइवर ने बिल्डिंग के नीचे पहुँच चुकी उनकी कार पर ब्रेक लगा दिया. थोड़ी ही देर में शर्मा जी अपने फ्लैट के सामने थे. उन्होंने "आज मौसम है बड़ा, बेईमान है बड़ा.." गुनगुनाते हुए डोरबेल बजाई. करीब तीन मिनट तक दरवाजा नहीं खुला. उन्होंने एक बार फिर से मौसम के बेईमान होने की बात गाने में बताते हुए डोरबेल बजाई. इसबार दरवाजा खुला. सामने मिसेज शर्मा खड़ी थीं.
उन्होंने बायें हाथ से दरवाजा खोला. अपने दायें हाथ की उँगलियों को इस तरह से आड़ी-तिरछी कर रखी थीं जैसे परदे पर शैडो बनानेवाला कोई कलाकार तोता बनाने की कोशिश करता हुआ बरामद हुआ हो. उँगलियों को आड़ी-तिरछी रखकर तोता बनाने के पीछे कारण यह था कि जब अचानक डोरबेल बजी तो वे किचेन में बर्तन धो रही थी. ऐसे में पानी में भीगी उँगलियों और हथेली का तोते में कन्वर्ट हो जाना एक स्वाभाविक बात थी.
दरवाजा खोलने के बाद अपनी उँगलियों से बनाये गए तोते को बड़े प्यार से संभालते हुए वे वापस किचेन में चली गईं. शर्मा जी के चेहरे पर गर्व के वही भाव थे जो जल्दी घर आकर सरप्राइज देने वाले हसबैंड के चहरे पर होते हैं. सोफे पर बैठते हुए उन्होंने मिसेज से कहा; "डार्लिंग, एक कप चाय हो जाए."
इतना कहने के बाद वे एक बार फिर से बेईमान मौसम की बात वाले गीत के बहाने मोहम्मद रफ़ी की मिमिक्री करने की कोशिश करने लगे. पाँच मिनट बाद मिसेज ने टेबिल पर लाकर चाय से भरा कप लगभग पटकते हुए रख दिया. एक कप चाय देखकर शर्मा जी बोले; "अरे, अपने लिए नहीं बनाया? एक ही कप चाय ले आई?"
उनकी बात सुनकर मिसेज शर्मा बोलीं; "तुम्ही ने तो कहा कि एक कप चाय हो जाए. तो एक कप ले आई."
मिसेज की बात के सहारे उनका तेवर पढ़ते हुए उन्हें अपना सरप्राइज आज एकबार फिर से धरासायी होता हुआ दिखाई दिया. स्थिति को भांपकर उसे सँभालने की कोशिश करते हुए बोले; "हे हे, तुम भी न. अच्छा कोई बात नहीं. चलो आज कटिंग चाय पी लेंगे."
उनकी बात सुनकर मिसेज शर्मा ने कप उठाकर एक घूँट चाय पी और कप को प्लेट में वैसे ही पटका जैसे एल बी डब्लू के गलत डिसीजन का शिकार बैट्समैन अपना बैट पटकता है. यह करने के बाद वे फिर से रसोई घर में चली गईं.
अपनी सरप्राइज को जिन्दा रखने की कवायद करते हुए शर्मा जी ने उसे फिर से बातों की संजीवनी बूटी पिलाने की कोशिश की. बोले; "चलो, आज जल्दी आ गया हूँ तो बाहर चलकर डिनर करते हैं. आज चायनीज खाते हैं."
उनकी बात सुनकर मिसेज ने रसोई से ही आवाज़ लगाई; "कोई जरूरत नहीं है. वैसे भी खाना बन गया है."
शर्मा जी ने परिस्थिति को फिर से सँभालने की कोशिश करते हुए कहा; "कोई बात नहीं. डिनर में तो अभी देर है. चलो जुहू चौपाटी चलते हैं. वहाँ थोड़ा घूम लेंगे. पानीपूरी खाए बहुत दिन हो गया, आज पानीपूरी खाकर आते हैं. वैसे एक काम और कर सकते हैं. वो पृथ्वी थियेटर में कई महीनों से एक बड़ा हिट प्ले चल रहा है, रावणलीला. सुना है बहुत कॉमेडी प्ले है. उसको देख आते हैं."
उनकी बात सुनकर मिसेज शर्मा और भड़क गईं. बोलीं; "और ये काम कौन करेगा? किचेन में इतना बर्तन पड़ा है उसको कौन धोएगा? हुंह, और रावणलीला देखने के लिए थियेटर क्यों जाना? रावणलीला तो में घर में ही देख रही हूँ. वो कम है क्या?"
उनकी बात सुनकर शर्मा जी किचेन में गए. किचेन का स्लैब बर्तनों से भरा था. अब उन्हें अपने सरप्राइज के चित हो जाने की चिंता नहीं थी. उन्हें पता चल चुका था कि उन्होंने जितना समझा था, मामला उससे ज्यादा सीरियस है. बोले; "तुम बर्तन धो रही हो? सक्कुबाई नहीं आई क्या आज?"
उनके सवाल के जवाब में मिसेज शर्मा बोलीं; "वो क्या आएगी? मैं उसे आने दूँ तब न. उसका बस चले तो मुझे ही घर से निकाल कर इस घर पर कब्ज़ा कर ले. मैंने उसको निकाल दिया. हुंह, बड़े आये रावणलीला दिखाने वाले."
मिसेज शर्मा अब आपे से बाहर थीं. बायें हाथ से बालों को ठीक करते हुए बोलीं; "मैंने उसको ऐसे ही नहीं निकाला."
"लेकिन क्यों? वह तो अच्छा ही काम करती थी. खुद तुमने कई बार उसकी तारीफ़ की है"; शर्मा जी को अभी भी समझ में नहीं आ रहा था कि श्रीमती जी ने सक्कुबाई को निकाला क्यों?
"हाँ, तुम तो बोलोगे ही कि अच्छा काम करती थी. मैं क्या समझती नहीं हूँ? सब एक जैसे हैं. जगह कोई भी हो, सारे मर्द एक जैसे हैं. जैसा वो शाइनी आहूजा और खान, वैसे ही तुम"; मिसेज शर्मा ने अपनी बात रखकर धर दिया.
उनकी बात सुनकर शर्मा जी को हँसी आ गई. बोले; "कोई खान भी मेड के चक्कर में फंस गया क्या? कौन वाला फंसा?"
"हंसो मत. जैसे तुम्हें मालूम ही नहीं कि मैं वो अमेरिका वाले खान की बात कर रही हूँ. वो जो होटल में मेड के साथ...."
श्रीमती जी की बात सुनकर शर्मा जी की हँसी दिन दूनी रात चौगुनी स्टाइल में बढ़ गई. बोले; "अरे वो खान नहीं है. उसका नाम कान है. डोमिनिक स्ट्रॉस कान. और डार्लिंग, तुम मेरे ऊपर इतना बड़ा एलीगेशन लगा रही हो? मैंने तो आजतक सक्कुबाई से ढंग से बात भी नहीं की. मैंने ऐसा क्या कर दिया जो तुम मुझे शाइनी..... "
"अच्छा, तुम्हें क्या लगता है, मुझे कुछ मालूम नहीं है? वो सक्कुबाई ने मुझे सबकुछ बता दिया है"; मिसेज ने अब जोर-जोर से बोलना शुरू कर दिया था.
"अरे क्या बता दिया है?"; अब शर्मा जी को मामला और पेंचीदा लग रहा था.
"वही जो वो लड़का उस चॉकलेट के ऐड में अपनी वाइफ से रोज-रोज कहता है. आज मीठे में क्या है? आज मीठे में क्या है? उसने खुद बताया कि न जाने कितनी बार डिनर ख़त्म होने के बाद तुमने सक्कुबाई से पूछा कि मीठे में क्या है? अब कह दो कि तुमने ये नहीं पूछा?"; मिसेज शर्मा की आवाज़ तेज होती जा रही थी.
वे बोलती जा रही थीं और शर्मा जी को लग रहा था कि मिसेज शर्मा का हर शब्द शर्मा जी के सरप्राइज के गुब्बारे में पिन बनकर चुभता जा रहा है. गुब्बारे की हवा निकलती जा रही थी.
आप वह विज्ञापन भी देख लीजिये.
Wednesday, June 15, 2011
शर्मा जी का डिब्बा
आपने पी पी पी के बारे में सुना ही होगा. अरे, वो टीवी पर पी की आवाज़ करने वाला शंख नहीं जो टीवी चैनल वाले कई बार रियलिटी शो में दी गई गालियों को ढांपने के काम में लेते हैं. इन तीन पी का मतलब है पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप जिसको प्रमोट करने के लिए उद्योगपति श्री राहुल बजाज ने अपने पूरे दिन का कम से कम दो घंटा तो पक्का दे रक्खा है. तो जैसे पी पी पी वैसे ही बी बी पी. बी बी पी का मतलब है ब्लॉगर ब्लॉगर पार्टनरशिप. तो यह ब्लॉग पोस्ट बी बी पी से उपजी है जिसे मैंने और मेरे मित्र विकास गोयल ने लिखा है. विकास just THOUGHT no PROCESS नामक अंग्रेजी ब्लॉग लिखते हैं.
आप पोस्ट बांचिये.
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एक वीक-डेज वाली दोपहर. आफिस के दो बज रहे थे. आप कह सकते हैं; "किसी आफिस का बारह बजते सुना है लेकिन दो बजते हुए तो नहीं सुना."
तो मेरा कहना यह है कि; - अब देखिये सुना तो मैंने भी नहीं. हाँ, देखा ज़रूर है. कि दो बजे का समय बहुत महत्वपूर्ण होता है. कि दो बजते ही तमाम लोग़ कसमसाने लगते हैं. कि दो बजते ही एक-दूसरे को अपनी भूख का हिसाब देते हैं जिसका मतलब यह होता है कि बड़े जोरों की भूख लगी है. कि दो बजते ही आफिस के प्यून मन ही मन बुदबुदाने लगते हैं कि साहेब लोग़ अब बुलाएँगे. किचेन से प्लेट और चम्मच लाने को कहेंगे. कि फ्रिज से ठंडा पानी लाने के लिए कहेंगे. कि चार रोटी और सब्जी क्या खायेंगे पूरे घंटे भर सतायेंगे.
उधर प्लेट और चम्मच के जोड़े भी धुल जाने के बाद सुबह से ही सोचने लगते हैं कि पता नहीं आज किसके हत्थे चढ़ेंगे? दोनों की ज्वाइंट आकांक्षा यह रहती है कि "कितना अच्छा हो अगर आज हमदोनों मिस्टर मेहता के हाथ लगें. वे हमें कितने प्यार से पकड़ते हैं. सब्जी खाने के बाद चम्मच को ऐसे देखते हैं जैसे उससे सहानुभूति दिखाते हुए पूछ रहे हों कि दो सेकंड के लिए तुम सब्जी लादे हुए मेरे मुँह में गए थे, तुम्हें तकलीफ तो नहीं हुई? हे भगवान, आज हमें गौतम साहेब के हत्थे मत चढ़ाना. लंच के समय जब भी हमदोनों उनके हाथ में पहुँचते हैं, वे खाने से पहले कम से कम पाँच मिनट तक हमदोनों को साथ बजाते हुए "कजरारे कजरारे" गाते हैं."
कई बार तो चम्मच के मन में यह भी आया कि वह किसी बहाने गौतम जी का हाथ छुड़ाकर उछले और सीधा उनकी नाक पर एक किक जमा दे. लेकिन बेचारा उनकी मैनेजरी का लिहाज करता हुआ चुप ही रहता है.
उधर टिफिन में ठूंसकर भरी गई रोटियां पिछले चार घंटों से टिफिन से निकलने के लिए ठीक वैसे ही तड़प रही होती हैं जैसे तिहाड़ से निकलने के लिए कनिमोई. नौ बजे मिसेज शर्मा ने उन्हें सूखे आलू की सब्जी के साथ पतली वाली टिफिन में ठूंसा नहीं कि रोटियां कसमसाने हुए अपनी किस्मत को रोने लगती हैं कि अब न चाहते हुए भी चार घंटे इस आलू की सब्जी के साथ रहना पड़ेगा. दो बजे से पहले इससे डायवोर्स के चांस नहीं हैं. सूखे आलू की सब्जी उधर अपने साथ चेंप दिए गए एक फांक आम के अचार से पीड़ित है. आम का अचार आलू की सब्जी की आँख में घुसकर उसे पूरे साढ़े पाँच घंटे रुलाता है. आम के कई फांक तो अपने साथ इतना मसाला लिए हुए चलते हैं जितना उस आलू की सब्जी की आँख में घुसकर उसे तीन दिनों तक रुलाने के लिए काफी है. आलू की सब्जी की त्रासदी यह कि वह रोने के अलावा और कुछ नहीं कर सकती.
वैसे भी हमारी संस्कृति में उसको ज्यादा कुछ करने की इजाजत नहीं है.
ऐसे में सब्जी यह सोचते हुए चुप रहती है कि; 'अगर मैं सब्जी न बनी होती तो मैं आलू होती. होती तो क्या, कहना चाहिए कि आलू होता. तब देखता कि मिसेज शर्मा मुझे टिफिन में कैसे रखतीं? अगर कोशिश भी करती तो मैं टिफिन के ढक्कन को ऊपर फेंकते हुए किचेन से लुढ़कते हुए सीधा ड्राइंग रूम में जाकर सोफे से टकराकर केवल इसलिए रुकता क्योंकि सोफा मेरे सामने सीमा पर खड़े हुए फौजी जैसा अड़ा रहता. लेकिन ऐसी किस्मत कहाँ कि मैं सब्जी बनूँ ही नहीं और सिर्फ आलू बनकर इधर-उधर ढुलकता फिरूं. एक बार सब्जी बनी और मैं था से थी हुई नहीं कि फिर कोई भी मेरे साथ कुछ भी कर सकता है.'
सब्जी को पता है कि अब उसको इस कैद से छुड़ाने का काम मिस्टर शर्मा दो बजे ही करेंगे. लिहाजा वह गुलज़ार साहब की ग़ज़ल की लाइन; "दफ्न करदो मुझे कि सांस मिले, नब्ज़ कुछ देर से थमी सी है" दोहराते हुए दो बजने का इंतजार करती रहती है.
उधर जब दो बजे शर्मा जी इन रोटियों की रिहाई का महान काम अपने हाथ में लेते हैं तब इन रोटियों को उसी तरह की फीलिंग होती है जैसी कई वर्षों तक जेल में रहने के बाद छोड़ दिए जाने पर नेल्सन मंडेला को हुई होगी.
रोज लंच के समय टिफिन खोलते हुए शर्मा जी मिसेज शर्मा के स्पेस यूटीलाइजेशन स्किल्स की दाद मन ही मन बड़ी लाउडली देते हैं. मुंबई में रहते हुए मिसेज शर्मा ने दो खानों वाली पतली सी टिफिन में रोटियां, सब्जी, अचार और कभी-कभी दो फांक प्याज ठूंसने में महारत हासिल कर ली है. वह तो शर्मा जी ने सिले हुए पापड़ खाने से मना कर दिया है वरना मिसेज शर्मा तो उसी टिफिन में पापड़ भी रख सकती हैं. अपनी टिफिन खोलकर रोटियां निकालते हुए शर्मा जी के मन में यह बात ज़रूर आती है कि इस तरह की स्किल्स में एक्सेलेंस अचीव करने में श्रीमती जी को कितन समय लगा होगा? क्या इतनी बढ़िया स्टोरिंग वह पहले दिन से ही करने लगी होगी? या फिर रिफाइनमेंट में समय लगा होगा? कई बार तो शर्मा जी मन ही मन यह भी सोचते हैं कि श्रीमती जी अगर किसी लोजिस्टिक्स कंपनी में नौकरी करती तो हर साल उन्हें बेस्ट एम्प्लोयी का अवार्ड मिलता. या फिर मिसेज शर्मा अगर किसी पब्लिक सेक्टर कंपनी की फैक्ट्री में स्टोरकीपर होती तो कंपनी हर साल छब्बीस जनवरी के अवसर पर उनका नाम प्रेसिडेंट गोल्ड मेडल के लिए पक्का भिजवाती.
मिसेज शर्मा ने टिफिन में खाना रखने की यह स्किल मुंबई की लोकल ट्रेन में ठुंसे हुए पैसेंजर्स को देखकर सीखी या फिर मुंबई के लोकल ट्रेन चलानेवालों ने शर्मा जी के खाने की टिफिन देखकर लोकल ट्रेन के डिब्बों में पैसेंजर ठूंसकर ट्रेन चलाने का आईडिया निकाला, यह एक शोध का विषय है. आने वाले दिनों में इस विषय पर कोई छात्र पी एचडी कर सकता है, साहित्यकार कहानी लिख सकता है, कवि कविता ठेल सकता है या फिर आई आई टी में पी एचडी की डिग्री की खोज में पहुँचा कोई इंजिनीयर अपनी अपनी थीसिस लिख सकता है. दुनियाँ भर की लोजिस्टिक्स कम्पनियाँ मिसेज शर्मा से स्पेस यूटिलाइजेशन पर कंसल्टेंसी ले सकती हैं. मिस्टर शर्मा को तो यह विश्वास भी है कि मिसेज शर्मा कंसल्टेंसी दे भी सकती हैं.
रोज दो बजे दोपहर में शर्मा जी टिफिन में कैद रोटियों को आज़ाद करवाते हैं. जब वे आलू की सूखी सब्जी को प्लेट में डालते हैं तब उसे लगता है जैसे किसी ने उसे फाँसी के तख्ते से उतार कर इसलिए नीचे रख दिया क्योंकि पिछले चार घंटे से राष्ट्रपति के दरबार में इंतजार कर रही माफी की उसकी अर्जी को राष्ट्रपति ने मंजूर कर दी. अचार के फांक को आलू की सब्जी की आँखों से निकाल कर जब शर्मा जी प्लेट में रखते हैं, तब आलू की सब्जी के मन में आता है कि वह उन्हें आशीर्वाद या वरदान टाइप कुछ दे डाले लेकिन वह ऐसा नहीं कर पाती क्योंकि उसे तुरंत याद आता है कि अगले दस मिनट में शर्मा जी उसे चट कर जायेंगे.
मिस्टर शर्मा, मिसेज शर्मा, रोटियां, सब्जी, अचार और डिब्बे की यह कहानी यूं ही चलती रहती है. सभी को एक-दूसरे से शिकायत हो सकती है लेकिन कोई किसी को छोड़कर जाना नहीं चाहता.
Wednesday, May 11, 2011
समय का अभाव है.....
इस वर्ष हम श्री रबीन्द्रनाथ टैगोर की एक सौ पचासवीं जयन्ती मना रहे हैं. इस शुभ अवसर पर तमाम कार्यक्रम आयोजित किये जा रहे हैं. प्रस्तुत है ऐसे ही एक कार्यक्रम में एक विद्वान द्वारा दिया गया लेक्चर. आप बांचिये;
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मंच पर विराजमान अध्यक्ष महोदय, अग्रज प्रोफ़ेसर धीरज लाल ज़ी और मंच के सामने बैठे सज्जनों, मैं आभारी हूँ आयोजकों का जिन्होंने गुरुदेव रबिन्द्रनाथ टैगोर की एक सौ पच्चासवीं जयन्ती पर मुझे यहाँ आमंत्रित किया. उससे भी ज्यादा मैं आयोजकों का इस बात के लिए आभारी हूँ कि मेरी बात मानकर उन्होंने मुझे यहाँ बोलने का अवसर दिया. दरअसल आयोजक चाहते थे कि मैं यहाँ आकर औरों को सुनूं परन्तु मैंने उन्हें याद दिलाया कि हमारी संस्कृति में विद्वान सुनते नहीं बल्कि बोलते हैं. ऐसे में अगर मुझे बोलने के लिए आमंत्रित न किया गया तो मैं नहीं आऊंगा. फिर जयन्ती रबीन्द्रनाथ की हो या फिर तुलसीदास की, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि मेरा ऐसा मानना है कि मैं बोलने के लिए ही विद्वान बना हूँ, अगर मुझे सुनना ही होता तो फिर विद्वान क्यों बनता?
खैर, उन्होंने मेरी बात मान ली और मुझे इस मंच से बोलने का अवसर दिया. इसके दो फायदे हुए जिन्हें हम आपस में बाँट सकते हैं. आपको इस बात का फायदा हुआ कि आप मुझे सुन सकेंगे और मुझे इसका यह फायदा हुआ कि मुझे एक बार फिर से विद्वान मान लिया गया. उस विचारधारा का विद्वान जिसके अनुसार विद्वत्ता की जो छटा बोलने में उभर कर आती है वह किसी और कर्म में नहीं उभरती. लिखने में भी नहीं.
मित्रों जैसा कि अध्यक्ष महोदय ने बताया कि समय का अभाव है और मुझे अपनी बात रखने के लिए सिर्फ पंद्रह मिनट मिले हैं, ऐसे में आपका ज्यादा समय न लेते हुए मैं अपनी बात रखना चाहूँगा. आज जब पूरी दुनियाँ संकट के दौर से गुजर रही है तब हमें रबीन्द्रनाथ याद आ रहे हैं और हम अपने आपसे सवाल कर रहे हैं कि रबीन्द्रनाथ आज के दौर में प्रासंगिक हैं या नहीं? पर मित्रों मुझे लगता है यह सवाल अपने आप में बेमानी है क्योंकि अगर रबीन्द्रनाथ की प्रासंगिकता कहीं खो जाती तो क्या आज हमलोग़ यहाँ इकत्रित होते? रबीन्द्रनाथ की प्रासंगिकता इस बात में है कि उनकी बदौलत हम साल में एक बार मिलते हैं. भाषण देते हैं. बहस करते हैं. दुनियाँ पर मंडरा रहे संकट की बात करते हैं. आप ही सोचिये, आज अगर रबीन्द्रनाथ की जयन्ती नहीं होती तो हमें क्या याद रहता कि आज पूरी दुनियाँ एक संकट के दौर से गुज़र रही है?
यह रबीन्द्रनाथ की प्रासंगिकता का ही कमाल है कि हम मिलते हैं और दुनियाँ के ऊपर छाये संकट को पहचान पाते हैं. आज हमें यह सोचने की ज़रुरत है कि अगर वे प्रासंगिक नहीं होते तो क्या दुनियाँ पर संकट मंडराता? मेरा मानना है कि ऐसा नहीं हो पाता. फिर सवाल यह उठता है कि रबीन्द्रनाथ परंपरा और आधुनिकता के बीच कहाँ है? मित्रों, रबीन्द्रनाथ परंपरा और आधुनिकता के बीच नहीं अपितु वे खुद परंपरा भी हैं और आधुनिकता भी हैं. उन्होंने परंपरा से अपने लिए पूरी तरह से एक नया दर्शन खोजा और उसी में रहकर अपने लिए आधुनिकता का रास्ता चुना और आधुनिकता में रहकर वे परंपरा को भी सुदृढ़ करते रहे.
सवाल उठता है कि आधुनिकता क्या है और परंपरा क्या है? क्या हमारी और रबीन्द्रनाथ की आधुनिकता और परम्परा की परिभाषा एक ही है? शायद ऐसा नहीं है. जो उनके लिए आधुनिकता थी वही दूसरों के लिए परंपरा हो सकती है और जो दूसरों के लिए आधुनिकता हो सकती है वही रबीन्द्रनाथ के लिए परंपरा हो सकती है. जैसा कि मुझसे पहले बोलने वाले अग्रज विद्वान प्रोफ़ेसर ने कहा, यह रबीन्द्रनाथ की विद्वत्ता ही थी जिसकी वजह से वे आधुनिकता से परम्पराएं और परम्पराओं से आधुनिकता निकाल पाए. कह सकते हैं कि रबीन्द्रनाथ आधुनिकता और परंपरा का संगम थे.
परन्तु आज यह सवाल मुँह बाए खड़ा है कि आज की तारीख में संगम कितना प्रासंगिक है? जिस संगम की कल्पना रबीन्द्रनाथ ने की थी क्या आज हमारे पास वही संगम है? क्या आज हम यह दावे के साथ कह सकते हैं कि हमारे पास एक आदर्श संगम है? क्या यह वही संगम है जिसकी बात पर उन्होंने लिखा था.....मुझे लगता है आज हम उस आदर्श संगम से दूर जा चुके हैं जिसमें गंगा, यमुना और सरस्वती का जल सामान रूप से रहता. इसका नतीजा यह हुआ है कि देश पर एक तरह का जल संकट छा गया है. जल की बात पर मुझे सन १९०५ में बंग भंग के अवसर पर लिखी गई उनकी कविता याद आती है जिसमें उन्होंने लिखा;
बांग्लार माटी बांग्लार जल
बांग्लार वायु बांग्लार फल
पूर्ण होक...
(तभी अध्यक्ष महोदय ने समय की कमी का इशारा किया...)
मित्रों जैसा कि आपने देखा, समय का अभाव है इसलिए मैं अपनी बात संक्षेप में कहते हुए यह याद दिलाना चाहूँगा कि रबीन्द्रनाथ ने स्वतंत्र विचारों को फलने-फूलने की जगह दी. उन्होंने इस बात में कभी भी कमी नहीं होने दी. वैसे कमी की बात पर यह कहना चाहूँगा कि आज कमी किस चीज की नहीं है? गरीब के लिए आज पानी की कमी है. भोजन की कमी है. समाज के लिए आज ईमानदारी की कमी है. सत्य की कमी है. इस कठिन समय में मित्रों सबसे बड़ी कमी तो मानवता की हो गई है. मानवता की कमी वाले इस निष्ठुर समय में रबीन्द्रनाथ और प्रासंगिक हो जाते हैं क्योंकि वे मानवतावादी थे. राष्ट्रवाद से आगे जाकर उन्होंने मानवतावाद को ही सर्वोपरि माना. वे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के खतरे से वाकिफ थे. खतरे की बात चली है तो हमें यह देखने की ज़रुरत है कि आज हम अपने चारों तरफ खतरा ही खतरा देखते हैं. जो खतरा हम आज देख रहे हैं, आप सोचिये कि रबीन्द्रनाथ वही खतरा कितना पहले भांप गए थे? अगर ऐसा नहीं होता तो क्या वे लिखते कि;
चित्त......
(अध्यक्ष महोदय ने फिर से समय की कमी का इशारा किया...)
मित्रों, जैसा कि आप देख रहे हैं कि माननीय अध्यक्ष महोदय ने एक बार फिर से समय का अभाव की तरफ ध्यान आकर्षित किया है इसलिए मैं अपनी बात संक्षेप में रखते हुए आपके सामने दो-तीन बातें रखूँगा. तो मैं बात कर रहा था उस भयमुक्त समाज की जिसकी कल्पना गुरुदेव ने की थी. प्रश्न उठता है कि भयमुक्त समाज क्या है? क्या वह समाज जो भय से मुक्त हो या वह समाज जिसमें भय हो ही नहीं? इस विषय पर विद्वानों का अलग-अलग मत रहा है. मित्रों कुछ लोग तो भयमुक्त समाज की बात पर भय-मुफ्त समाज की बात करते हैं और हमें गुमराह करते हैं.
फिर वही बात है कि अगर अलग-अलग मत न हो तो हमें वह समाज ही नहीं मिलेगा जिसकी कल्पना गुरुदेव ने की थी. उनकी कल्पना उनकी कविताओं में, गीतों में, निबंधों में हर जगह व्याप्त है. यह उनकी महानता ही थी कि गाँधी ज़ी ने रबीन्द्रनाथ को गुरुदेव कहना शुरू किया था. वही रबीन्द्रनाथ ने गाँधी को महात्मा कहना शुरू किया था. दोनों एक दूसरे को बहुत सम्मान देते थे. यह अलग बात है कि बहुत से मुद्दों पर दोनों के मतभेद परिलक्षित थे. छिपे हुए नहीं थे. याद की कीजिये वह समय जब गाँधी जी के आह्वान पर देश में आन्दोलन हो रहा था, जब गाँधी ज़ी सत्याग्रह आन्दोलन कर रहे थे तब रबीन्द्रनाथ ने उन्हें सहयोग नहीं दिया था. वे इस आन्दोलन के खिलाफ थे. वे सत्याग्रह से भविष्य में होने वाले खतरे को भांप गए थे.
प्रश्न यह उठता है कि जो सत्याग्रह गाँधी ज़ी ने किया और जो सत्याग्रह अभी हाल में अन्ना हजारे ने किया, उसमें मूलतः क्या समानता है? अगर हम याद करें तो पायेंगे कि गाँधी ज़ी के सत्याग्रह को रबीन्द्रनाथ का समर्थन नहीं मिला था. वहीँ अन्ना हजारे के सत्याग्रह को भी रबीन्द्रनाथ का समर्थन.....
(अध्यक्ष महोदय समय की कमी का इशारा फिर से करते हैं....)
मित्रों समय के अभाव के चलते मैं संक्षेप में दो-तीन बातें कहकर अपना वक्तव्य समाप्त करना चाहूँगा. तो प्रश्न यह है कि गाँधी ज़ी के सत्याग्रह को रबीन्द्रनाथ का समर्थन क्यों नहीं मिला? कई बातों पर मतभेद के चलते दोनों के बीच सत्याग्रह को लेकर भी मतभेद था. कहा तो यहाँ तक जाता है कि रबीन्द्रनाथ ने अपने शिक्षकों और विद्यार्थियों को गाँधी जी के सत्याग्रह आन्दोलन को समर्थन न दिए जाने पर जोर दिया था. परन्तु क्या यह मामला उतना सरल है जितना हम समझते हैं?
सरलता की बात चली है तो यह कहना चाहूँगा कि रबीन्द्रनाथ के अन्दर एक बालक की सी सरलता था. आप उनके छंद देखिये. उनकी कवितायें देखिये जिसके केंद्र में केवल और केवल मनुष्य था. केवल और केवल मनुष्य का मन था. वे इस बात के आग्रही थे कि मनुष्य को सम्पूर्ण नीला आकाश मिलना चाहिए जिससे वह जहाँ तक चाहे उड़ान भर सके. लेकिन क्या आज की दुनियाँ में मनुष्य को वह उड़ान भरने की सहूलियत है जिसकी बात रबीन्द्रनाथ अपने लेखन में करते हैं?
जब उनके लेखन की बात चलती है तो हम पाते हैं कि वे अपने लेखन से स्वच्छंद आकाश में विचरते थे. इस गीत पर ध्यान दीजिये. वे लिखते हैं;
पागला हवा बादोल दिने
पागल आमार मोन जेगे उठे
खुद सोचिये कि कवि की दृष्टि से उन्हें प्रकृति से कितना प्रेम था? उनकी कविताओं में, गीतों में उनका प्रकृति प्रेम झलकता है. बांग्ला में जिन्हें गान कहते हैं वह उन्होंने लिखा. गान की बात चली है तो आपको याद दिलाना चाहूँगा कि रबीन्द्रनाथ ने ही हमारे राष्ट्रगान को लिखा. मित्रों हमारे राष्ट्रगान की कहानी बड़ी लम्बी है.
(एक बार फिर से अध्यक्ष महोदय समय की कमी.......)
मित्रों बस मैं अपनी बात संक्षेप में कहकर ख़त्म करना चाहूँगा कि इस वर्ष हमारे राष्ट्रगान को पूरे एक सौ वर्ष हो गए. परन्तु आश्चर्य इस बात का है कि इस महान अवसर पर देश की मीडिया में इस बात पर चर्चा नहीं हुई. वैसे अगर आप राष्ट्रगान का इतिहास देखेंगे तो पायेंगे कि वह भी कभी विवादों से परे नहीं रहा. कुछ लोगों का अनुमान है कि रबीन्द्रनाथ ने यह राष्ट्रगान जार्ज पंचम की सराहना करते हुए लिखा था. परन्तु यह कहना उचित न होगा. आपको याद हो तो उस समय के कवि बुद्धदेब बसु ने रबीन्द्रनाथ की बहुत आलोचना की थी लेकिन रबीन्द्रनाथ ने अपने एक पत्र में लिखा है...एक मिनट मैं वह पत्र पढ़कर आपको सुनाता हूँ. यह पत्र रबीन्द्रनाथ ने सन १९३६ में ......
(इस बार अध्यक्ष महोदय ने समय की कमी का इशारा नहीं किया. इस बार उन्होंने विद्वान से अपना भाषण ख़त्म करने के लिए कहा. उन्होंने यह कहते हुए भाषण ख़त्म किया; )
मित्रों जैसा कि आप देख रहे हैं, समय का अभाव है इसलिए मैं अपनी बात ख़त्म करते हुए आपको बताना चाहूँगा कि
आज मेरा विषय था "रबीन्द्रनाथ और वैश्विक मानवतावाद" परन्तु समय के अभाव में आज मैं उस विषय तक पहुँच ही नहीं सका. मुझे विश्वास है कि अगले वर्ष रबीन्द्र जयंती के शुभ अवसर मैं अपने इस पसंदीदा विषय पर अवश्य बोलूंगा. मैं धन्यवाद देता हूँ आयोजकों का जिन्होंने.....
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रबीन्द्र साहित्य को लेकर मेरा विचार यह है कि अगर आलोचकों, ज्ञानियों और जानकारों की ज्यादातर बातों को दरकिनार करके रबीन्द्र साहित्य पढ़ा जाय तो समझने में मुश्किल नहीं होगी. पढ़ने का आनंद मिलेगा सो अलग.
Monday, May 9, 2011
टैटू गाथा
जब हम अपने बचपने को गाँव में रहकर गुजार रहे थे तब एक क्रिकेटर बनने के सपने देखने के अलावा लोगों के हाथ पर उनके नाम का गोदना देखते थे. क्या कहा? गोदना का मतलब नहीं मालूम? अरे भइया, मेरे कहने का मतलब है टैटू. टैटू देखते थे. हाँ, गोदना को ही हिंदी में अब टैटू कहते है. यह उन दिनों की बात है जब एक ग्रामवासी के जीवन में गोदना का बड़ा महत्वपूर्ण स्थान होता था. लोग़ अपना नाम बायें या दायें हाथ पर गोदवा लेते थे. अक्सर हाथों पर हमें झिंगुरी, मंगरू, रामलोचन, पदारथ, रामरती, दुलारी जैसे नाम पढ़ने को मिलते थे और हम फ़ौरन समझ जाते थे कि इस व्यक्ति का नाम वही है जो इसके हाथ पर गोदा हुआ है. मेरे बचपन में तो गाँव में एक लोकगीत भी सुनने को मिलता था जिसके शुरू के बोल थे;
कान्हा धइ के रूप जननवा, गोदइ चले गोदनवा ना
इसका मतलब यह कि श्रीकृष्ण औरत का वेश बनाकर गोदना गोदने के लिए निकले हैं.
पता नहीं अब यह लोकगीत गाँव में गुनगुनाया जाता है या नहीं? यह भी पता नहीं कि गीत किसी को याद भी है या नहीं? पिछले नवम्बर में जब गाँव गया था उस समय यह बात याद आई होती तो लोगों से पूछ कर पता लगा लेता लेकिन ऐसा हो न सका और मैं अपना सवाल अब यहाँ टीप रहा हूँ. वैसे गाँव वालों के बीच इस गीत के अभी तक रहने और गाये जाने की बात पर शंका इसलिए भी है क्योंकि बचपन अब बचपन नहीं रहा. बचपन अब नर्सरी हो गया है. इसी बदलाव के साथ कम्पीटीशन करते हुए गाँव भी अब गाँव नहीं रहे. गाँव अब ग्रामप्रधानी की सियासतगाह और 'नरेगा' की ज़मीन हो गए हैं जहाँ सरकार गांववालों को अधिकार देने और अपने फैसले खुद लेने की प्रयोगशाला चलाती है.
खैर, देखा जाय तो लोकगीत भी अब लोकगीत कहाँ रहे?
हाँ तो मैं टैटू की बात कर रहा था. कई बार ऐसा भी देखने में आता था कि कोई-कोई कलाप्रेमी ग्रामवासी केवल अपना नाम लिखवा कर ही संतुष्ट नहीं होता था. वह अपने नाम के आस-पास फूल-पत्ती वगैरह भी गोदवा लेता था. कई बार तो फूल या पत्ती वाला टैटू उसके नाम के ऊपर बनाया हुआ बरामद होता जिसे देखकर लगता कि इस फूल का नाम ही झिंगुरी या मंगरू है. कुछ-कुछ वैसा जैसे गाँव के स्कूल में पढ़ने वाले सातवीं कक्षा के विद्यार्थी ने कला कुसुम की ड्राइंग बुक में गुलाब बनाकर नीचे मंगरू लिख दिया हो.
गुलाबों के शहरी विशेषज्ञ अगर वैसे टैटू देख लेते तो मार-पीट पर उतारू हो जाते.
यह उनदिनों की बात है जब टैटू पर गांववालों का एकाधिकार टाइप था. मुझे इस बात का विश्वास है कि तब शहरों में रहने वाले अपने हाथ पर टैटू बनवाने से इसलिए कतराते होंगे क्योंकि वे टैटू को पिछड़ेपन की निशानी मानते होंगे. बाद में जब गाँवों में प्रगति हुई और गाँव मॉडर्नगति को प्राप्त हुए तब गाँव वालों ने अपने हाथों पर टैटू बनवाना बंद कर दिया. इस स्थिति से निपटने और समाज को एक बैलेंस देने के लिए टैटू के मामले में शहरवासियों ने 'पिछड़ेपन' को अपना लिया. अब वे टैटू बनवाने लगे थे.
'पिछड़ापन' एक जगह से चलकर दूसरी जगह पहुँच गया.
यह बात अलग है कि टैटू की बात पर गाँव और शहर वालों के बीच मतभेद दिखाई देने लगा. जहाँ गाँव वाले अपने हाथ पर अपना नाम गोदावाते थे वहीँ शहर वाले अपने हाथ या बांह पर अपना नाम न गोदवा कर किसी और का नाम गोदवाते हैं. यह बात भारतीय टैटू की मूल भावना के खिलाफ है. कल्पना कीजिये कि तब क्या हो सकता है जब कोई पुरायट ग्रामवासी सैफ अली खान की बांह पर करीना लिखा हुआ देखेगा? उसके गश खाकर गिरने का चांस रहेगा. वह यह सोचकर दिन भर परेशान रहेगा कि; "अरे यही करीना है? हम तो सुने थे कि करीना किसी हीरोइन का नाम है लेकिन करीना तो हीरो निकला. बाकी बातों में तो धांधली होती ही थी अब शहर में नाम के मामले में भी धांधली होने लगी है?"
उन्हें क्या पता कि सैफ अली ज़ी ने अपने प्यार को सच्चा बताने के लिए अपनी बांह पर करीना लिखवाया है.
उधर विदेशी सेलेब्रिटी अपनी बांह, पीठ और पापी पेट पर संस्कृत और हिंदी में कुछ लिखवाते हैं. डेविड बेकहम ने लिखवाया था. उसके बाद तमाम सेलेब्रिटी ने लिखवाया. किसी ने गायत्री मन्त्र की प्रिंटिंग करवा ली. कल्पना कीजिए कि अगर गाँव गडौरा के माताचरण को कभी डेविड बेकहम के दर्शन हो जायें और उन्हें डेविड बाबू की बांह पर उनकी पत्नी का लिखा हुआ नाम दिखाई दे जाय तो क्या होगा? माताचरण बाबू सोचने में फुलटाइम लीन हो जायेंगे. यह सोचते हुए उनका दिन गुजर जाएगा कि; "बिक्टोरिया तो सुने थे किसी रानी का नाम है. तो क्या यह आदमी ही रानी विक्टोरिया है?"
कालांतर में जैसा होता है वैसा ही हुआ. टैटू के साथ प्रयोग होने लगे. कुछ टैटू देखकर तो लगता है जैसे टैटू के साथ प्रयोग नहीं बल्कि प्रयोग के साथ टैटू हो रहे हैं. एक से बढ़कर एक टैटू. पीठ पर, पेट पर, हाथ पर, बांह पर. टैटू ही टैटू. तरह-तरह के टैटू. धार्मिक टैटू का अलग ही महत्त्व. एक बांह देखी. उसपर युद्ध की बात पर आना-कानी कर रहे अर्जुन को श्रीकृष्ण पाठ पढ़ा रहे थे. देखकर एक बार के लिए लगा कि महाभारत का युद्ध इसी बांह पर लड़ा गया था. आते-जाते चट्टान से दीखने वाले एक एक्टर की होर्डिंग देखता हूँ. होर्डिंग पर वह एक स्टील कंपनी की सरिया का विज्ञापन कर रहा है. उसने स्टील की सरिया इस तरह से पकड़ रखी है जिससे 'डोल्ले-सोल्ले' वाली उसकी बांह के दर्शन होते हैं जहाँ बाबा भोलेनाथ मय त्रिशूल आसन जमाये ध्यानमग्न बैठे हैं. कुछ कुछ ऐसा लगता है जैसे भोलेनाथ को कैलाश पर्वत से तड़ीपार कर दिया गया है और वे अपनी जमा-पूंजी यानि मृगछाला, पालतू सांप, त्रिशूल और चन्द्रमा लिए इस एक्टर की बांह पर आ बिराजे हैं और अब वहीँ रहेंगे.
प्रयोग में टैटू का यह हाल है कि हाथ, बांह, कलाई, हथेली, पीठ, पेट वगैरह पर टैटू बनवाकर बोर हो चुके लोग़ अब दांत पर टैटू बनवा रहे हैं. गुलाब देखने में सुन्दर लगे तो दांत पर गुलाब बनवा लिया. कोई विशेष जायके का है और उसे अगर कैक्टस अच्छा लगे तो दांत पर कैक्टस उगा लिया. जो चाहे मर्जी बनवा लिया. जो चाहे मर्जी उगा लिया. दांत अपना काम तो कर ही रहा है साथ ही साथ कैनवास का रोल भी अदा कर दे रहा है. मल्टी टास्किंग की अद्भुत मिसाल.
वैसे देखा जाय तो एक तरह से अच्छा भी है. फ़र्ज़ कीजिये किसी ने अपनी पूरी बतीसी टैटू के हवाले कर दी. मतलब हर दांत पर एक टैटू. एक पर गुलाब, एक पर कमल, एक पर सूरजमुखी एक पर गेंदा फूल. सामने वाले दांत पर कैक्टस. अब अगर कभी भी उसके दांत में दर्द हो और उसे डॉक्टर के पास जाना पड़े तब क्या होगा? जाने पर डॉक्टर पूछेगा - किस दांत में दर्द है तो इधर से जवाब जाएगा - सर ये सूरजमुखी वाला दांत कल शाम से ही बहुत दर्द कर रहा है. उसके बगल में जो गुलाब वाला है उसमें समस्या नहीं है. उसमें दर्द भी नहीं है. जवाब में डॉक्टर साहब कहेंगे - भाई समस्या है कि नहीं ये आप कैसे डिसाइड करेंगे? यह तो हम डिसाइड करेंगे. और आपको यह बताते हुए हमें अफसोस हो रहा है कि आपका गुलाब सड़ गया है. अगर इसे अभी ठीक नहीं किया गया तो ये आपके कैक्टस को भी सड़ा देगा.
पहले जो गोदना गांववालों के लिए केवल महत्वपूर्ण हुआ करता था वही अब टैटू बनकर शहर वालों के लिए अति महत्वपूर्ण हो गया है. कई केस तो ऐसे सुनने में आये कि बेटी ने राजा भरथरी स्टाइल में अपने घर का त्याग केवल इसलिए कर दिया क्योंकि उसकी माँ नहीं चाहती थी कि वह अपनी पीठ पर टैटू बनवाये. एक जगह पढ़ा कि एक सुपुत्र ने अपने माँ-बाप को खुद से इसलिए बेदखल कर दिया क्योंकि वो टैटू मेकर बनना चाहता था और उसके माँ-बाप उसे इंजिनियर बनाने पर तुले हुए थे. घरेलू महाभारत के मामले में टैटू इतना महत्वपूर्ण पहले कभी नहीं रहा. अब टैटू बनवाने और उसे बनवाने से रोकने वालों की लड़ाईयां रोज हो रही हैं. माँ-बेटी ने और बाप-बेटे ने घरों को पानीपत और प्लासी के मैदान में कन्वर्ट कर दिया है.
मुझे तो पूरा विश्वास है कि आज से दो-ढाई सौ साल बाद जब भारतीय टैटू का इतिहास लिखा जाएगा तब इतिहासकार वर्तमान समय को ही भारतीय टैटू का स्वर्णकाल बताएगा.
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आज के टाइम्स ऑफ इंडिया में यह आर्टिकिल था. टैटू आख्यान लिखने की प्रेरणा यहीं से मिली.
Thursday, May 5, 2011
एक डॉक्टर का प्रेमपत्र
हमारे शहर के डॉक्टर विद्यासागर बटबयाल महान समाजसेवी हैं. करीब अस्सी वर्ष की आयु तक उन्होंने अपनी डाक्टरी से समाज की बहुत सेवा की. बीस वर्ष पहले जब वे रिटायर हुए तो उन्हें लगा - अब समय आ गया है कि जिस प्रोफेशन ने मुझे समाजसेवा के लायक बनाया उस प्रोफेशन को वापस कुछ दिया जाय.
डॉक्टर साहब तभी से अपने डॉक्टर भाइयों और उनके परिवार की सेवा में लग गए. पिछले बीस वर्षों से वे डाक्टरों के माँ-बाप, पत्नियों और प्रेमिकाओं के लिए डाक्टरों के पत्रों/प्रेमपत्रों की लिपियों को पहचानने का काम निशुल्क कर रहे हैं. हाल ही में उनके यहाँ से रद्दी खरीदने वाले के हाथों से एक पत्र लीक हो गया. यह पत्र विदेश में पढ़ाई के लिए जाने वाले किसी डॉक्टर ने अपनी प्रेमिका को लिखा था. वैसे तो किसी का प्रेमपत्र पढ़ना अनैतिक कर्म है लेकिन कभी-कभी हमें कुछ अनैतिक भी कर लेना चाहिए नहीं तो समाज हमें नैतिकता की मूर्ति बताकर बदनाम कर सकता है.
इसलिए आप पढ़िए कि पत्र में क्या लिखा था;
प्रियतमे रजनी,
पत्र लिखने कुर्सी पर बैठा ही था कि पीठ में दर्द शुरू हो गया. चौंको मत, अब मैंने वह स्टेज हासिल कर ली है जब एक डॉक्टर को सिर की बजाय पीठ में दर्द शुरू हो जाए. दर्द की वजह से तकलीफ इतनी बढ़ गई कि सहन नहीं हो रहा था. तभी मुझे याद आया कि आज जब मैं चेंबर में था तब एक मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव आयोडेक्स की दस शीशी उपहार में थमा गया था. उठकर आलमारी से आयोडेक्स निकाला और हाथ को तोड़ते-मरोड़ते हुए जैसे-तैसे पीठ पर आयोडेक्स की मालिश की. एक बार के लिए मन में आया कि आज अगर तुम होतीं तो न सिर्फ आयोडेक्स की मालिश कर देती बल्कि साथ में लोरी भी सुनाती कि; "पीठ अगर चकराए या हाथ में दर्द सताए, आज प्यारे पास हमारे ...."
खैर, ऐसा हो न सका और मुझे खुद ही मालिश करनी पड़ी. मालिश करने से पहले मुझे लगा था कि पीठ दर्द तुरंत छू मंतर हो जाएगा लेकिन ऐसा हुआ नहीं. बहुत देर इंतज़ार किया फिर भी बैठा नहीं जा रहा है. इसलिए यह पत्र लेटे-लेटे ही लिख रहा हूँ.
प्रिये, लेटे हुए पत्र लिखने का परिणाम यह है कि पेन उस दिशा में आसानी से नहीं जा रही है जिस दिशा में मैं उसे ले जाना चाहता हूँ. कभी-कभी यह वैसे ही बिहैव कर रही है जैसे किसी राजनीतिक पार्टी से नाराज नेता अपने आलाकमान के साथ करता है. ऐसे में यह हो सकता है कि तुम्हें मेरी लिखाई पूरी तरह से समझ में न आए. अगर ऐसा हुआ (वैसे मुझे मालूम है कि ऐसा ही होगा. आख़िर तुमने मेरे साथ बगीचे में घूमने और आईसक्रीम खाने के सिवा किया ही क्या है? अपनी पढाई-लिखाई की वाट पहले ही लगा चुकी हो) तो फिर पहले ख़ुद से तीन-चार बार पढ़ने की कोशिश करना. उसके बाद भी समझ में न आए तो तुम्हारे मुहल्ले में जो दवा की दूकान दर्शन मेडिकल है वहाँ चली जाना. वहां पर जो पप्पू सेल्समैन है उसे मेरी हैण्ड राइटिंग समझ में आती है. वह पत्र पढ़कर समझा देगा. लेकिन हाँ, उसके पास ज्यादा देर तक मत रुकना. पत्र सुनकर तुंरत घर वापस चली जाना.
आगे समाचार यह है कि पिताजी के दबाव में आकर मुझे एमआरसीपी करने लन्दन जाना पड़ रहा है. तुम तो मेरे बारे में जानती ही हो. मुझे पिताजी के दबाव से जरा भी आश्चर्य नहीं है. दुनियाँ भर के पिताओं को दबाव बनाने के लिए अपने बेटे से ज्यादा अच्छा और कौन मिलेगा? वैसे भी मेरे पिता ज़ी तो मेरे ऊपर मेरे बचपन से ही दबाव देते रहे हैं. कभी साइंस पढ़ने का तो कभी डॉक्टर बनने का. आज अगर मैं डॉक्टर बना हूँ तो यह उनके दबाव का ही प्रताप है. मैं तो पत्रकार बनना चाहता था.
वैसे जो बात मैं तुम्हें बताना चाहता था वह यह है कि मुझे एमआरसीपी पास न कर पाने की चिंता नहीं है, वह तो मैं पास ही कर लूंगा. तुम्हें तो मालूम ही है कि पिताजी के दबाव की वजह से मैं पढ़ाई-लिखाई में हमेशा अब्बल रहा हूँ. दरअसल मुझे जिस बात की चिंता सता रही है वह कुछ और ही है. तुम्हें कैसे बताऊँ कि जब भी मैं लन्दन जाने की बात सोचता हूँ, मुझे राजेन्द्र कुमार की फिल्में याद आ जाती हैं. वो फिल्में जिनमें राजेंद्र कुमार डाक्टरी की पढ़ाई करने अमेरिका चले जाते थे और उनके जाने के बाद हिरोइन की शादी किसी और से हो जाती थी. उन फिल्मों की याद करके मेरे रोंगटे खड़े हो जा रहे हैं. अभी थोडी देर पहले ही हुए थे, दो टैबलेट खाकर मैं नार्मल हुआ हूँ.
एक बार तो मन में बात आई कि पिताजी के आदेश का पालन न करूं. फिर सोचा वे ख़ुद भी डॉक्टर हैं और उन्होंने जब इतना बड़ा नर्सिंग होम बना ही लिया है तो हमारी संस्कृति के अनुसार उस नर्सिंग होम को एक लायक वारिस भी तो चाहिए. ऐसा वारिस जो उसे चलाकर और बड़ा कर सके. तुम्हें तो मालूम है कि मैं उनका इकलौता पुत्र हूँ. ऐसे में उनके धंधे को आगे बढ़ाने का काम मुझे ही करना पड़ेगा. माँ भी कह रही थी कि मैं लन्दन जाकर एम आर सी पी की पढाई पूरी करूं. कह रही थी कि वैसे तो मैं बड़ा डॉक्टर हूँ लेकिन कल अगर और बड़ा डॉक्टर बन जाऊँगा तो कुछ अपना पैसा लगाकर और कुछ बैंक से फाइनेंस लेकर एक और नर्सिंगहोम खोल लेंगे. दो नर्सिंगहोम देखकर पिताजी कितने खुश होंगे.
उनका नर्सिंग होम उन्हें चलाएगा और मेरा मुझे.
वैसे तुम्हें निराश होने की ज़रूरत नहीं है. तुम हमेशा मेरी यादों में रहोगी. परीक्षा के पेपर और अस्पतालों को अर्जी लिखने से फुरसत मिली तो मैं तुम्हें ई-मेल भी लिखूंगा. लन्दन में अगर पढ़ाई में मेहनत से समय मिला, हालाँकि इसका चांस बहुत कम है, तो हमदोनों नेट पर चैट भी कर सकते हैं. रजनी तुम्हें याद है? मेरे पिछले जन्मदिन पर तुमने गिफ्ट स्वरुप मुझे एक आला और थर्मामीटर दिया था? मैं उन दोनों को अपने साथ लिए जा रहा हूँ. जब भी हॉस्पिटल में कोई लड़की मरीज बनकर आएगी और मैं उसका इलाज करूंगा तो मुझे लगेगा कि मैं तुम्हारा ही टेम्परेचर माप रहा हूँ और तुम्हारे ह्रदय की धड़कने ही सुन रहा हूँ. प्लीज इस बात पर ज्यादा अनुमान मत लगना. मैं तुम्हें सचमुच प्यार करता हूँ. यह बात मैं डरते-डरते लिख रहा हूँ क्योंकि मुझे पता है कि तुम मेरे ऊपर कितना शक करती हो.
मुझे पता है कि मेरे जाने के बाद तुम उदास रहने लगोगी. मैं वहां परदेश में और तुम यहाँ. तुम्हें तो बिरहिणी नायिका की भूमिका अदा करनी ही पड़ेगी. तुम्हें मेरी कसम, न मत कहना. हमारे प्यार के लिए तुम्हें ऐसा करना ही पड़ेगा. तुम्हें तो पता ही है कि जबतक प्रेम में बिरह की स्थिति न आये, वह प्रेम पकता नहीं है. वैसे जब तुम दुखी रहने लगोगी तब तुम्हारे घरवाले समझ जायेंगे कि तुम किसी के प्यार में पड़ गई हो. सब जानते हैं कि 'इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपते.' ऐसे में तुम्हारे पिताजी तुम्हारी शादी करवाने की कोशिश करेंगे लेकिन तुम शादी मत करना. मैं तुम्हें सजेस्ट करता हूँ कि तुम अभी से तरह-तरह के बहाने बनाने की प्रैक्टिस शुरू कर दो. जब पिताजी शादी के लिए कहेंगे तब ये बहाने काम में लाना.
मेरे जाने के बाद जब भी मूवी देखने का मन करे तो अपनी सहेली पारो को साथ लेकर मूवी देख आना. एक बात का ध्यान रखना पारो के बॉयफ्रेंड रामदास को साथ लेकर मत जाना. वो बहुत काइयां किस्म का इंसान है. वो तुम्हें इम्प्रेश करने की कोशिश करेगा. थियेटर में ज्यादा आईसक्रीम मत खाना. तुम्हें तो मालूम ही है, तुम्हें हर तीसरे दिन जुकाम हो जाता है. हाँ, अगर जुकाम हो जायेगा तो फिक्स एक्शन सिक्स हंड्रेड लेना मत भूलना. वैसे बुखार हो जाए तो मेरे फ्रेंड डॉक्टर चिराग के पास जाना. ज्यादा बटर पॉपकॉर्न भी मत खाना. तुम्हारा वजन पहले से ही काफी बढ़ा हुआ है.
बाकी क्या लिखूं? कुछ समझ में नहीं आ रहा है. वैसे लग रहा है कि कुछ और लिखना चाहिए लेकिन तय नहीं कर पा रहा हूँ कि क्या लिखूं. तुम तो जानती ही हो कि एक्जाम्स की आन्स्वर स्क्रिप्ट के अलावा मैं कहीं भी कुछ ज्यादा नहीं लिख पाता हूँ. तुम्हें याद होगा, एक बार तुम्हें इम्प्रेस करने के लिए कविता लिखी थी जो तुम्हारे पिताजी के हाथ पड़ गई थी और उन्होंने कविता में मात्रा की गलतियाँ निकलते हुए उसे बहुत घटिया कविता बता डाला था. उसके बाद मैंने कसम खाई कि अब परीक्षा में प्रश्नों का उत्तर देने के अलावा और कुछ नहीं लिखूँगा.
हाँ, अभी एक बात याद अई है तो वह लिख देता हूँ. अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना. हो सके तो एमए करने के बाद पी एचडी करने की कोशिश करना. पी एचडी में एडमिशन लेने से शादी टालने का एक और बहाना मिल जायेगा. जब तक मैं नहीं आता, तबतक किसी और से शादी करने की सोचना भी मत. मैं नहीं चाहता कि तुम किसी और शादी कर लो और फिर अपने परिवार का इलाज करवाने मेरे ही नर्सिंग होम में आओ. ऐसा हुआ तो मेरी हालत राजेंद्र कुमार जैसी हो जायेगी और फिर मुझे गाने का सहारा लेना पड़ेगा.
वैसे जब सारे बहाने फ़ेल हो जाएँ तो फिर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करना. अपने पिताजी को ये बताना कि तुम जिससे प्यार करती हो, वो अपने माँ-बाप का इकलौता पुत्र है और उसके बाप के पास बहुत पैसा है. मुझे विश्वास है कि वे यह सुनने के बाद फिर कभी तुम्हारी शादी की जिद नहीं करेंगे. अभी तो मैं इतना ही लिख रहा हूँ. बाकी की बातें लन्दन पहुँचकर मेल में लिखूंगा.
तुम्हारा
डॉक्टर सोमेश
पुनश्च:
अगर ये चिट्ठी समझ में न आए और पप्पू सेल्समैन के पास जाना ही पड़े तो चिट्ठी समझकर तुंरत घर वापस जाना.
Thursday, April 28, 2011
दुखीराम ज़ी का इंटरव्यू
कई महीनों से उनसे आग्रह कर रहा था कि वे मेरे ब्लॉग के लिए एक इंटरव्यू दें. वे राजी तो हो जाते लेकिन फिर दुखी होकर ना कह देते. आप कह सकते हैं कि इंटरव्यू के लिए दुखी होकर ना कहने वाली बात समझ में नहीं आई. तो मेरा जवाब यह है कि सारी समस्या दुःख की ही है. आपको बता दूँ कि आज उनकी गिनती टॉप के दुखियारों में होती है. वे जब-तब दुखी हो लेते हैं. दुखी होने के लिए उन्हें किसी कारण की ज़रुरत नहीं पड़ती. हालाँकि उनके ऊपर आरोप भी लगते रहते हैं. कि उनका दुःख प्रायोजित होता है. कि वे बिना मतलब के दुखी रहते हैं. कि उनका दुःख दिखावा है. कि वे इसलिए दुखी रहते हैं क्योंकि दुःख को आसानी से भजाया जा सकता है. कि....
खैर, आज पता नहीं क्या हुआ कि जब मैंने उन्हें इंटरव्यू के उनके वादे की याद दिलाई तो दुखी होते हुए तैयार हो गए. बोले; "देखो जो भी कहूँ या करूँगा वह बिना दुःख के तो हो नहीं सकता. पहले दुखी होकर इंटरव्यू के लिए मना कर देता था लेकिन आज दुखी होकर इंटरव्यू के लिए तैयार हो गया हूँ. तो इससे पहले कि मुझपर दुःख का एक नया दौरा पड़े, आज ले ही लो मेरा इंटरव्यू."
तो पेश है उनका इंटरव्यू. आप बांचिये.
शिव: नमस्कार दुखीराम जी. इंटरव्यू के लिए धन्यवाद. ये बताइए कि कैसा लग रहा है?
दुखीराम जी: दुखी हूँ. इस बात पर दुखी हूँ कि लोग़ एक इंटरव्यू के लिए इतना हलकान किये रहते हैं. ज़रूरी है कि किसी को इंटरव्यू के लिए इतना परेशान किया जाय कि वह दुखी होकर इंटरव्यू देने के लिए हाँ कर दे?
शिव: नहीं ज़रूरी तो नहीं है लेकिन चूंकि आपने वादा किया था इसलिए....वैसे मेरा सवाल यह है कि कितने साल हो गए आपको दुखी रहते? मेरा मतलब आप पहली बार दुखी कब हुए?
दुखीराम जी: ये मैं कैसे बताऊँ? अब देखिये कोई हिसाब रखकर तो दुखी होता नहीं है? दुःख का कोई लॉगबुक होता है क्या? नहीं न? ऐसा तो है नहीं कि आदमी किसी सरकारी कोटे के तहत दुखी होगा. कि भइया सरकार ने मुझे दिन में केवल ढाई घंटे का दुःख-कोटा अलॉट किया है इसलिए मुझे केवल ढाई घंटे दुखी रहना है. उससे ज्यादा दुखी हुए तो सरकार दुःख का कोटा जब्त कर लेगी..... देखा जाय तो दुःख अपने आप में इतना बड़ा होता है कि मनुष्य को यह सुध-बुध नहीं रहती कि वह दुखी है. ऐसे में इस तरह का सवाल बेमानी है. वैसे अगर मुझे इसका उत्तर देना ही पड़े तो मैं कहूँगा कि करीब छियालीस वर्षों से मैं दुखी रहता आया हूँ. दो-चार महीने इधर-उधर हो सकते हैं लेकिन....
शिव: अच्छा ये बताइए कि पहली बार कब दुखी हुए?
दुखीराम ज़ी: वैसे कुछ ठीक से याद नहीं लेकिन मुझे लगता है कि पहली बार मैं नौ साल की उमर में दुखी हुआ था जब दादाजी ने मुझे गधा कहा था. उसके बाद मुझे याद है कि मेरे भाई साहब ने जब सबके सामने मुझे अच्छा बच्चा बताया था तब मैं दुखी हुआ था. लेकिन हाँ, पहली बार दुखी होने का सारा श्रेय मैं दादाजी को ही दूंगा.
शिव: भाई साहब ने आपको अच्छा बच्चा बताया उसके लिए आप दुखी हो गए?
दुखीराम जी: यह दुखी होने की बात ही है. अगर किसी बच्चे को अच्छा बता दिया जाय तो उसके साथ उससे बुरा और क्या हो सकता है? इतने लोगों के सामने अच्छा बता देने से उसके ऊपर परफ़ॉर्म करने का प्रेशर बन जाता है. मेरे ऊपर अच्छा दिखने, अच्छा करने, अच्छा कहने का प्रेशर आया तो मैं दुखी रहने लगा.
शिव: फिर?
दुखीराम ज़ी: फिर क्या? धीरे-धीरे दुखी रहने की आदत पड़ गई.
शिव: वैसे यह बताइए कि दुखी रहने के लिए प्रैक्टिस करना कितना ज़रूरी है?
दुखीराम जी: देखिये वह तो आपके ऊपर डिपेंड करता है कि आप कितने जल्दी दुःख को अपने अन्दर समो लेते हैं. जैसे पहले-पहल मुझे सुबह-शाम कम से कम दो घंटे दुःख दुखी होने की प्रैक्टिस करनी पड़ती थी लेकिन अब ऐसा नहीं है. अब मैं कहीं भी कभी भी दुखी हो सकता हूँ.
शिव: अच्छा यह बताइए कि आप दुखी रहने की प्रैक्टिस कैसे करते थे?
दुखीराम ज़ी: दुखी होने की प्रैक्टिस के लिए तमाम इक्विपमेंट्स टाइप मुद्दे हैं जिनका इस्तेमाल करके आदमी एक दुखियारे का अपना जीवन शुरू कर सकता है. जैसे मैं शुरू-शुरू में यह कहकर दुखी होता था कि ज़माना बड़ा खराब है. फिर यह कहकर दुखी रहने लगा कि हमारा ज़माना बड़ा अच्छा था. बाद में यह कहकर रहने लगा कि जो ज़माना चला गया वह दोबारा लौट कर नहीं आएगा. फिर बेटों की दशा और दिशा को लेकर दुखी रहने लगा. जीवन आगे बढ़ा तो पोतों के चाल-चलन पर दुखी रहने लगा. कुल मिलाकर भगवान के आशीर्वाद से दुखी होने के लिए कम से कम मुझे तो मुद्दों की कमी कभी नहीं रही. आज जब मैं उम्र के इस पड़ाव पर खड़ा हूँ तो गर्व से कह सकता हूँ कि दुखी होने के लिए अब मुझे किसी बहाने की ज़रुरत नहीं रहती. दुःख के मामले में मैं अब आत्मनिर्भर हो गया हूँ.
शिव: आपसे मेरा एक सवाल यह है कि जो दुखियारा बनना चाहते हैं उनके लिए आप और क्या-क्या मुद्दे सजेस्ट कर सकते हैं जिसका इस्तेमाल करके दुखी होने की प्रैक्टिस की जा सकती है? मेरे कहने का मतलब यह है कि सभी आप जैसे भाग्यशाली तो नहीं हैं. सभी के बड़े भाई साहब नहीं होंगे जो उन्हें अच्छा बच्चा बता दें. या कह सकते हैं कि सभी के बेटे-बेटियां नहीं हो सकती या फिर सभी के पोते नहीं हो सकते जिनके सहारे वह दुःख की प्रैक्टिस करते रहें. आज जैसे...
दुखीराम ज़ी: समझ गया. समझ गया. मैं आपकी बात पूरी तरह से समझ गया हूँ. आप को सच बताऊँ तो दुखी होने के लिए मुद्दों की कमी कभी नहीं रही. आज भी नहीं है. आप छोटे से छोटे और बड़े से बड़े मुद्दे के सहारे दुखी हो सकते हैं. जैसे एक तरफ दुखी होने के लिए आप भ्रष्टाचार का सहारा ले सकते हैं तो दूसरी तरफ आप इस बात से दुखी हो सकते हैं कि आप इस देश के प्रधानमंत्री नहीं बन सके. आप इस बात से दुखी हो सकते हैं कि मसालों में मिलावट बढ़ गई. मिलावट का बहाना बड़ा व्यापक है. जैसे आप मिलावटी दूध, मिठाई, दाल, सब्जी, मसाला, हल्दी, धनियाँ वगैरह की बात करके दुखी हो सकते हैं. आपकी इच्छा हो तो आप इन्ही चीजों के मंहगे होने की बात करके दुखी हो सकते हैं. आप चाहें तो यह कहकर दुखी हो लें कि एक तरफ तो चीजें मिलावटी हैं और दूसरी तरफ इतनी दामी भी हैं....... जो बड़े दुखियारे होते हैं उनके लिए विषय और बड़े हो सकते हैं. जैसे आप इजराइल और फिलिस्तीन या चीन और तिब्बत के झगड़े को लेकर दुखी हो सकते हैं. जापान के ऊपर चीन की दादागीरी को लेकर दुखी हो सकते हैं. ईराक और अफगानिस्तान पर अमेरिकी दादागीरी एक बहुत बड़ा मुद्दा हो सकता है. साहित्य वाले भाषा की गिरावट को लेकर दुखी हो सकते हैं. आज से सत्तर साल बाद भाषा का स्वरुप अच्छा नहीं रहेगा, यह बात अपार दुःख का विस्तार कर सकती है. चूंकि दुःख जो है वह एक साधन है...
शिव: मैं समझ गया. आपकी बात मैं समझ गया. लेकिन ये बताइए कि सामाजिक बदलाव दुखी होने में कितना मदद करता है?
दुखीराम ज़ी: गुड क्वेश्चन. देखिये सामाजिक बदलाव के सहारे भारी मात्रा में दुःख पैदा किया जा सकता है. सामाजिक बदलाव का सहारा लेकर युवाओं की बात करके दुखी हो सकते हैं. भरी जवानी में अपने बुढापे के खराब होने की बात पर दुखी होने की प्रैक्टिस की जा सकती है. आपको मैं यह बताना ज़रूरी समझता हूँ कि जब जवानी में बुढापे के खराब होने की बात की जाती है तब सैकड़ों लोग़ धीरज बंधाते हैं. यह प्रोसेस अपार दुःख का संचार करता है. धार्मिक अनेकता की बात करके दुखी हुआ जा सकता है. अब तो ब्लॉग वगैरह लिखकर भी लोग़ दुखी हो लेते हैं. कवितायें लिख कर भी दुखी हुआ जा सकता है. कविता का तो यह समझिये कि आचार्यों के अनुसार पुराने जमाने से ही कविता दुःख से उपजती आयी है. लेकिन असली दुखियारा वह है जो अपनी काबिलियत दिखाते हुए कविता से दुःख निकाल लें. जैसे आप यह कहकर दुखी हो सकते हैं कि हाय मैं कविता लिखना बंद कर दूंगा तो अच्छी कवितायें कहाँ मिलेंगी?....... कुल मिलाकर यह समझिये कि दुखी होने के लिए मुद्दे तैयार करने पड़ते हैं. आपको अपने कान, आँख, नाक वगैरह का सहारा लेते रहना पड़ेगा. हमेशा तैनात रहना पड़ेगा. दुखी होने का मुद्दा आपको कहीं से भी मिल सकता है. इसके लिए बस आपको...
शिव: समझ गया. जैसा कि आपने बताया अब आपको दुखी होने के लिए प्रैक्टिस करने की ज़रुरत नहीं पड़ती. इसके क्या कारण हैं?
दुखीराम जी: देखिये यह तो परिपक्वता से हुआ है. अब दुखी होने के लिए मुझे किसी आउट-साइड सपोर्ट की ज़रुरत नहीं पड़ती. अब मैं बिना प्रैक्टिस के दुखी हो लेता हूँ. दुखी होने के मामले में अब मैं आत्मनिर्भर हो गया हूँ. और आपको सच बताऊँ तो अब मैं पाँच मिनट तक की शॉर्ट नोटिस पर दुखी हो सकता हूँ. एक दुखी आदमी के जीवन में यह स्टेज बड़ी मुश्किल से आता है. आपको यह बताते हुए मुझे अपार दुःख हो रहा है कि आज इस स्टेज पर पहुँचने वाले देश में कुछ गिने-चुने लोग़ ही हैं. पिछले वर्ष की रैंकिंग के हिसाब से मेरा नाम देश के टॉप टेन दुखी लोगों में शुमार है.
शिव: सर, आपने कविता की बात करके मुझे एक बात याद दिलाई. अच्छा ये बताइए कि आप अपनी कविताओं के सहारे भी काफी दुखी होते रहे हैं. कुछ लोगों का आरोप है कि आप ताज़ा लिखी दुःख वाली कविताओं को वर्षों पुरानी बताते हैं. क्या यह सही है? और अगर सही है तो इन कविताओं को पुरानी बताने से क्या दुःख की मात्रा में बढ़ोतरी होती है?
दुखीराम जी: यह सवाल पूछकर आपने अच्छा किया. देखिये इस सवाल के जवाब में भावी दुखियारों के के लिए एक गाइड-लाइन छिपी हुई है. होता क्या है? समझिये आपने कोई दुखी कर देने वाली कविता कल ही लिखी है. अगर आप यह बताते हैं कि आपने वह कविता कल ही लिखी है तो जो लोग़ उसे पढेंगे वे उसपर थोड़ा दुखी होंगे. यह सोचकर थोड़ा दुखी होंगे कि मैं कल से याने कविता की उम्र से दुखी हूँ. लेकिन उसी जगह अगर आप यह बता देते हैं कि मैंने यह कविता आज से बाईस साल पहले लिखी थी तो उससे उपजने वाला दुःख कई गुना बढ़ जाती है. कारण क्या है? कारण यह है कि पाठक समझता है कि अगर मैंने यह कविता बाईस साल पहले लिखी थी तो इसका मतलब यह है कि मैं पूरे बाईस साल से दुखी हूँ. दरअसल इसे ही दुःख की दुनिया में डोमिनो पिज्जा... सॉरी सॉरी डोमिनो इफेक्ट कहते हैं. तो इससे आप समझ ही....
शिव: यह आपने बहुत अच्छी बात बताई. वैसे दुखी होने का ऐसा और कोई साधन जिसकी चर्चा अभी तक इस इंटरव्यू में नहीं हो सकी?
दुखीराम ज़ी: हाँ, हैं न. बिलकुल है. आप सोच रहे होंगे कि वह क्या है? तो मेरा जवाब है कि जहाँ भी दो-चार ही-ही, ठी-ठी करने वाले इकट्ठे होते हों वहाँ एक दुखियारे को ज़रूर जाना चाहिए. वहाँ जाने का असर यह होता है कि दुखी आदमी और दुखी हो सकता है. ऊपर से अगर वहाँ जाकर उसने अपने दुःख की अभिव्यक्ति कर दी तो समझिये कि उसके दुःख का ईमेज बड़ा धाँसू होकर उभरता है. इसलिए दुखी होने के इच्छुक लोगों को ही-ही, ठी-ठी करने वालों 'उजड्डों' के बीच अवश्य जाना चाहिए. यह एक ऐसी सीख है जो मैंने दुखी होने एक हज़ार तरीके नामक किताब में पढ़ी थी इसलिए सोचा कि.....
शिव: कुछ लोगों का कहना है कि आपके ऊपर दुखी होने के दौरे पड़ते हैं. क्या यह सच है?
दुखीराम जी: अब नहीं पड़ते. अब आपसे क्या छिपाना. करीब बारह साल पहले तक पड़ते थे लेकिन अब मैं दुःख के ऐसे शिखर पर जा पहुँचा हूँ कि मुझे दुखी होने के लिए दौरों की ज़रुरत नहीं पड़ती.
शिव: कुछ लोगों का मानना है कि आपका दुःख प्रायोजित दुःख है. आप इससे कितना सहमत हैं?
दुखीराम ज़ी: देखिये इसका जवाब मैं क्या दूँ? अब देखा जाय तो आज के ज़माने में कौन सी बात प्रायोजित नहीं है? वैसे दुःख प्रायोजित हो ही सकता है. इसका बाज़ार बहुत बड़ा है. वैसे सच कहूँ तो अब ज्यादातर मेरे दुःख आयोजित ही होते हैं. अब दुःख और दुःख मिलाकर ऐसा वातारवरण बना है कि प्रायोजित होने का कोई केस ही नहीं बनता.
शिव: कोई संदेश जो आप भावी दुखियारों को देना चाहते हों?
दुखीराम जी: यही कि दुखी होने की प्रैक्टिस करते रहें. दुःख के बाज़ार को कभी छोटा न समझें. दुखी होने में बड़ी बरक्कत है. एक और बात यह कि आप हमेशा अपना दुःख बाँटते रहिये. मतलब सार्वजनिक तौर पर दुःख की नुमाइश का असर यह होता है कि दुःख बढ़ता जाता है. एक दुखियारे के लिए यह ज़रूरी है कि वह अपनी जमात में में नए-नए लोगों को शामिल करता जाए. देखिये सुख आता है तो फट से चला जाता है. क्यों? क्योंकि वह एक और बड़े सुख की तमन्ना लिए रहता है. लेकिन दुःख के साथ ऐसा नहीं है. छोटा दुःख कभी भी बड़े दुख की तमन्ना नहीं रखा. दर्शनशास्त्र के अनुसार.....
शिव: समझ गया. समझ गया. सर, आज आपने मेरी वर्षों की तमन्ना पूरी कर दी. आपने अपने बहुमूल्य समय से कुछ क्षण निकाले और यह इंटरव्यू दिया. इसके लिए मैं आपका आभारी हूँ.
दुखीराम ज़ी: वह सब तो ठीक है. आप तो आभारी हो गए लेकिन जितनी देर इंटरव्यू लेते रहे उतनी देर के लिए तो दुखी होने का मौका मेरे हाथ से जाता रहा. आज शाम को कुल बावन मिनट एक्स्ट्रा दुखी होना पड़ेगा.
तो यह था दुखीराम ज़ी का इंटरव्यू. आज चंदू चौरसिया के छुट्टी पर जाने की वजह से मुझे ही दुखीराम ज़ी का इंटरव्यू लेना पड़ा. लेकिन मैं दुखी नहीं हूँ.
Thursday, April 7, 2011
रेडियो गाता रहा...
जानकार लोग बताते हैं कि साहित्य समाज का दर्पण होता है. साहित्य रुपी इस दर्पण में समाज अपनी तस्वीर देख सकता था लेकिन सच्चाई यह है कि कभी देखा नहीं. तस्वीर में ख़ुद को देखकर तकलीफ होती होगी इसीलिए साहित्य को समाज ने देखना ही बंद कर दिया. साहित्यकार कहते रह गए कि; "हम दर्पण लाये हैं, देख लो" लेकिन समाज कहाँ सुनने वाला? उसे मालूम था कि दिनों-दिन उसका चेहरा ख़तम होता जा रहा है. ऐसे में देखना उचित नहीं रहेगा. डर जाने का चांस रहता था.
उन दिनों के दर्पण भी ऐसे थे कि झूठ बोलना नहीं जानते थे. समाज को भी मालूम था कि ये विकट ईमानदार दर्पण हैं, झूठ नहीं बोलते. असली कांच के बने थे. पीछे में सॉलिड सिल्वर कोटिंग. ऐसे में इसे देखेंगे तो तकलीफ नामक बुखार के शिकार हो जायेंगे. साहित्यकार भी ढिंढोरा पीटते रह गए. वे ख़ुद ईमानदार भी थे. समाज को लगा कि ईमानदार साहित्यकार का दर्पण मिलावटी नहीं होगा. ऐसे में इस दर्पण को घूस देकर हम इससे झूठ नहीं बुलवा सकते. ऐसे में ये दर्पण तो हमें सुंदर दिखाने से रहा. हटाओ, क्या मिलेगा देखने से? कौन अपना ख़तम होता चेहरा देखना चाहेगा? दर्पण की बिक्री बंद. साहित्य का साढ़े बारह बज गया.
वैसे साहित्य समाज का दर्पण है, यह बात पहले के जानकार बताते थे. बाद के जानकारों ने बताया कि अब भारत आगे निकल चुका है. अब सिनेमा समाज का दर्पण है. इतिहास गवाह है कि हर थ्योरी की काट भी पेश की जाती है. काट पेश न की जाए तो इतिहास का निर्माण नहीं हो सकेगा. इसी बात को ध्यान में रखकर बड़े ज्ञानियों और जानकारों ने बताया कि सिनेमा समाज का नहीं बल्कि समाज सिनेमा का दर्पण होता है. विकट कन्फ्यूजन.
जानकारों का काम ही है कन्फ्यूजन बनाए रखना.
बाद में सिनेमा के गानों को समाज का दर्पण बनाने की कवायद शुरू हुई. मनोरंजन का साधन? आकाशवाणी. बिनाका गीतमाला. रात को खाना मिले या न मिले, रेडियो लेकर तकिया के पास ज़रूर रख सकते हो. इसलिए रख लो, मनोरंजन होता रहेगा.
रेडियो चालू हुआ और इधर खटिया पर आकर जानकार जी बैठ गए. देश में भ्रष्टाचार की बात शुरू ही होती कि तीन हफ्ते से तीसरे पायदान पर बैठा गाना बज उठता; "मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे-मोती. मेरे देश की धरती."
सुनने वाला भौचक्का! सोचता; "देश की धरती इतना सोना और हीरा-मोती उगल रही है तो वो जा कहाँ रहा है?"
लेकिन किससे करे ये सवाल? अब ऐसे में कोई बुद्धिजीवी और जानकार टाइप आदमी आ जावे तो उससे पूछ लेता; " अच्छा ई बताओ, ये देश की धरती इतना सोना, हीरा वगैरह उगल रही है तो ये कहाँ जा रहा है?"
जानकार के पास कोई जवाब नहीं. कुछ देर सोचने की एक्टिंग करता होगा और बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचे कह देता होगा; "अरे सोना, हीरा वगैरह उगल रही है, यही क्या कम है? तुमको इस बात से क्या लेना-देना कि किसके पास जा रहा है. तुम तो यही सोचकर खुश रहो कि उगल रही है. आज जाने दो जिसके पास जा रहा है. कल तुम्हारा नंबर भी आएगा. रहीम ने ख़ुद कहा है कि; रहिमन चुप हो बैठिये देख दिनन के फेर...."
सवाल को दफना दिया? नहीं. डाऊट करने वाले इतनी जल्दी हार नहीं मानते. अगला सवाल दाग देता होगा; "अच्छा, ये गेंहूं की बड़ी किल्लत है. अमेरिका से जो गेहूं आया है, वो खाने लायक नहीं है. क्या होगा देश का?"
जानकार कुछ कहने की स्थिति में आने की कोशिश शुरू ही करता होगा कि रेडियो में दूसरे पायदान का गाना बज उठता होगा; 'मेरे देश में पवन चले पुरवाई...हो मेरे देश में.'
जानकार को सहारा मिल जाता होगा; "ले भैये गेहूं की चिंता छोड़ और इस बात से खुश हो जा कि तेरे देश में पुरवाई पवन चलती है. बाकी के देशों में पछुआ हवा धूम मचाती है. वे साले निकम्मे हैं. भ्रष्टाचारी हैं. पश्चिमी सभ्यता वाले. देख कि हम कितने भाग्यवान हैं जो हमारे देश में पुरवाई पवन चलती है. ये गेंहूं की चिंता छोड़ और इस पुरवाई पवन से काम चला. इसी को खा जा."
डाऊट करने वाले के पास एक और सवाल है. पूछना चाहता होगा कि लोगों के रहने के लिए मकान नहीं है. सरकार कुछ कर दे तो मकान मिल जाए. सोच रहा है कि बुद्धिजीवी ज़ी से ये बात पूछे कि नहीं? अभी सोच ही रहा है कि रेडियो का रंगारंग कार्यक्रम चालू हो गया. गाना सुनाई दिया; 'जहाँ डाल-डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा, वो भारत देश है मेरा...' वगैरह-वगैरह.
डाऊट करने वाला हतप्रभ. मन में सवाल पूछ रहा है कि गुरु भारत देश में चिड़िया डाल-डाल पर बसेरा करती है. और बाकी के देशों में? वहां क्या चिड़िया के रहने के लिए दस मंजिला इमारत होती है?
ये वे दिन थे जब भ्रष्टाचार अपनी जड़ें जमा रहा था. लेकिन देशवासी गाने सुनकर खुश थे. देश में पवन पुरवाई चलती थी और देश की धरती सोना वगैरह उगल रही थी. किसी को नहीं मालूम कि उगला हुआ इतना सोना वगैरह कौन दिशा में गमनरत है?
कोई अगर किसी दिशा की तरफ़ तर्जनी दिखा देता तो चार बोल उठते; "छि छि. ऐसा सोचा भी कैसे तुमने? जिस दिशा को तुमने इंगित किया है, उस दिशा में सारे ईमानदार लोगों के घर हैं. उनकी गिनती तो बड़े त्यागियों में होती है. तुम्हें शर्म नहीं आती ऐसे त्यागियों को इस तरह से बदनाम करते? देशद्रोही कहीं के."
यह नहीं देखा कि त्यागियों ने भवन देकर देश ही हथिया लिया.
उसी समय रेडियो पर बज उठता होगा; 'है प्रीत जहाँ की रीत सदा, मैं गीत वहां के गाता हूँ.........'
ऐसे ही रेडियो गाता रहा और हम ..........आज भी गा रहा है. फर्क सिर्फ इतना कि आज आई पी एल के स्कोर बताता है.
Saturday, April 2, 2011
जिससे पूरा भारत बोरियत से बचे
डियर माही,
इससे पहले कि 'डियर माही' जैसा संबोधन तुम्हारे मन में किसी तरह की गलतफहमी को जन्म दे, मैं साफ़-साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मैं कोई 'टीनेजर गर्ल' नहीं बल्कि एक पुरुष हूँ. मेरे इस स्पष्टीकरण के पीछे कारण यह है कि तमाम टीवी चैनलों के संवाददाताओं ने मेरे सामान्य ज्ञान में बढ़ोतरी करते हुए मुझे न जाने कितनी बार बताया है कि ज्यादातर लड़कियां ही तुम्हें माही कहकर पुकारती हैं. वैसे भी अगर मैं डियर महेंद्र सिंह धोनी जैसे किसी संबोधन का इस्तेमाल करता तो उसे देखकर मुझे ही नहीं बल्कि औरों को भी लगता जैसे मैं तुम्हें कानूनी नोटिस भेज रहा हूँ. पढ़ने में भी यह संबोधन 'कूल' नहीं लगता.
नतीजा यह हुआ कि मैं तुम्हें डियर माही लिखकर संबोधित कर रहा हूँ.
तो डियर माही, मेरे इस पत्र लिखने के पीछे एक कारण है. नहीं-नहीं, जो तुम सोच रहे हो, वह कारण नहीं है. वर्ल्डकप फाइनल से पाँच घंटे पहले तुम्हारे सामने कोई डिमांड रखकर मैं तुम्हें नर्वस नहीं करना चाहता. दरअसल कारण यह है कि, मैं यह चिट्ठी लिखकर अपने ब्लॉग पर लगाना चाहता हूँ जिससे मुझे एक अदद ब्लॉग पोस्ट की प्राप्ति हो जाए. आखिर एक ब्लॉगर को और क्या चाहिए? एक पोस्ट, और क्या?
वैसे मैं चाहता तो तुम्हारी टीम और क्रिकेट वर्ल्ड कप पर सवा सौ ग्राम की अशुद्ध तुकबंदी वाली एक चवन्नी कविता लिख डालता और किसी हिंदी न्यूज़ चैनल को फोन कर देता तो वे मेरी कविता कवर करने तुरंत आ जाते और वह तुम्हारे पास पहुँच जायेगी, मैं यह सोचकर अपने मन में दर्जन भर लड्डू फोड़ लेता. शायद तुम्हें पता न हो लेकिन एक अनुमान के अनुसार इस प्रोसेस से हमारे हिंदी न्यूज चैनलों ने पिछले दस वर्षों में करीब चार हज़ार सात सौ अट्ठावन हिंदी कवि पैदा किये हैं.
लेकिन मैंने सोचा कि ऐसा कुछ किया जाय जिससे मुझे एक ब्लॉग पोस्ट भी मिल जाए और तुम्हारा मोटिवेशन भी हो जाए. माही, मुझे पता नहीं कि भारत जब पिछली बार २००३ वर्ल्डकप के फाइनल में पहुँचा था तो हमारे कोच जॉन राइट ने कप्तान सौरव गांगुली को कैसे मॉटिवेट किया था? मुझे यह भी नहीं पता कि जब इसबार हम फिर से फाइनल में पहुँच गए हैं तो गैरी कर्स्टन क्या कर रहे हैं? मैं तुम्हें बताना चाहता हूँ कि तुम्हरी टीम के लिए वर्ल्डकप जीतना क्यों ज़रूरी है? वे कौन से कारण हैं जिनके लिए १२१ करोड़ भारतीय तुम्हें आशीर्वाद और प्यार देंगे.
तो हे अधिनायक, ध्यान लगाकर सुनो;
जैसा कि तुम्हें मालूम है हम २५ जून, १९८३ में क्रिकेट वर्ल्डकप जीते थे. वैसे कुछ चिरकुटों ने पिछले २-३ दिनों से यह भ्रम फैला रखा है कि हमें उस वर्ल्डकप में विजयश्री की प्राप्ति २ अप्रैल १९८३ के दिन हुई थी लेकिन यह सही नहीं है. खुद गूगलदेव ने यह बात कन्फर्म की है. और हे अधिनायक, आज की तारीख में गूगल से बढ़कर कौन है?
तो मैं कह रहा था कि २५ जून, १९८३ के दिन हम वर्ल्डकप जीते थे और उसके बाद केवल स्पोर्ट्स चैनलों पर लगातार जीतते जा रहे हैं. हाल यह है कि एक अनुमान के अनुसार हम स्पोर्ट्स चैनलों पर १९८३ का वर्ल्डकप १९८३ बार जीत चुके हैं. वैसे कुछ सूत्रों का मानना है कि यह आंकड़ा करीब आठ हज़ार दो सौ तक पहुँच सकता है. हम अगर इन दो सख्याओं का औसत भी निकालें तो हे अधिनायक, हम स्पोर्ट्स चैनलों पर करीब पाँच हज़ार बार वर्ल्डकप जीत चुके हैं. और तो और स्पोर्ट्स चैनलों के फुटेज के सहारे हमारे हिंदी न्यूज चैनल भी करीब ढाई हज़ार बार टीवी पर हमें वर्ल्डकप दिलवा चुके हैं.
हे अधिनायक, मुझे तो लगता है कि पिछले कई वर्षों में इन स्पोर्ट्स चैनलों के ट्रांसमिशन सेंटर में कुछ इस तरह का वार्तालाप होता होगा;
क्लर्क अपनी कुर्सी छोड़कर नीचे रतिराम चौरसिया की पान दूकान पर पान खाने जा रहा है. बीच में प्रोग्राम डायरेक्टर मिल जाता है. डायरेक्टर पूछता हा; "कहाँ जा रहे हो?"
क्लर्क'; "पान खाने नीचे जा रहा हूँ. आधे घंटे में वापस आता हूँ."
डायरेक्टर; "तो एक काम करो न. जाने से पहले वो १९८३ वर्ल्डकप फाइनल की सीडी लगाते जाओ. तुम जबतक पान खाकर वापस आओगे इंडिया फाइनल जीत जाएगा."
हे अधिनायक, हाल यह है कि बाथरूम में जाने से पहले एक भारतीय देख रहा है कि स्पोर्ट्स चैनल इंग्लिश प्रीमियर लीग का हाइलाइट्स दिखा रहा है और जब वह बाथरूम से बाहर आता है तो देखता क्या है कि मोहिंदर अमरनाथ माइकल होल्डिंग्स को एल बी डब्लू करके स्टंप लिए भागे जा रहे हैं. देख कर लगता है जैसे अगर वे आज इतनी जोर से न भागेंगे तो उन्हें स्टंप चोरी के इल्जाम में अरेस्ट कर लिया जाएगा. हे अधिनायक, तुम्हें यह जानकार आश्चर्य होगा कि १९८३ वर्ल्डकप फाइनल टीवी पर देखने की वजह से बेटा माँ के बार-बार कहने के बावजूद सब्जी लेने बाज़ार नहीं जाता और घर वालों को उस दिन केवल दाल-रोटी से गुज़ारा करना पड़ता है. वैसे सत्य यह है कि बेटा सोचता है कि क्या पता स्पोर्ट्स चैनल कल से भारत को जितवाना ही बंद कर दे. ऐसे में जब तक जितवा रहा है तब तक तो जीतते रहो.
हे अधिनायक माही, १२१ करोड़ लोग़ अट्ठाइस वर्षों से कपिल देव को दौड़ कर रिचर्ड्स का कैच लेते हुए देख रहे हैं. मानता हूँ कि गावस्कर के अनुसार; "कपिल वाज अ ग्रेट एथिलीट" लेकिन अब उनकी उमर भी तो देखो. पचास के पार पहुँच गए हैं. ऐसे में जब वे आजकल हाइलाइट्स में दौड़ते हैं तो धड़का लगा रहता है कि इस बार वे कैच नहीं पकड़ सके तो? अगर इस बार कैच छूट गया तो फिर रिचर्ड्स बड़ी दुर्गति करेगा हमारी. अभी तक तो कपिल कैच पकड़ते आये हैं लेकिन हे अधिनायक, यह क्रिकेट ही तो है. क्या पता अगली हाइलाइट्स में उनसे कैच छूट जाए और उसके बाद रिचर्ड्स ऐसा मारे कि आउट ही न हो? बीस ओवर भे नहीं लगेंगे वेस्ट- ईंडीज को मैच जीतने में.
और फिर हे अधिनायक, तुम्हें तो पता ही है कि हमारी संस्कृति और दर्शन में ऐसा बताया गया है कि हर चीज में जान होती है. अगर हम इस लिहाज से देखें तो क्या तुम्हें नहीं लगता कि हमें गोर्डन ग्रीनिज के उस स्टंप की रक्षा करनी चाहिए जिसे पिछले अट्ठाइस वर्षों से बलविंदर सिंह संधू अपने इन-स्विंगर से उखाड़ते आ रहे हैं. एक बार ठहरो और सोचो कि हर बार बॉल से धक्का खाने के बाद उस स्टंप की क्या दशा होती होगी? और फिर यह भी तो सोचो कि क्या होगा अगर अगली हाइलाइट्स में संधू का बॉल स्विंग ही न किया? क्या होगा तब? ग्रीनिज हमारी बड़ी दुर्गति करेगा. १९८३ में ही उसके पास बड़ा अनुभव था अब तो पूरे अट्ठाइस वर्षों का अनुभव उसमें जुड़ गया है. ऐसे में अगर वह अगले हाइलाइट्स में स्क्वायर ड्राइव लगाकर चौका मार दे तो? पता नहीं तुम्हें मालूम है कि नहीं लेकिन मुझे मालूम है कि उसने एक इंटरव्यू में कहा था कि; "अगर बॉल मेरे बैट पर ठीक से नहीं आती तो चौका हो जाता है. अगर आ जाती है तो फिर छक्का तो है ही."
हे अधिनायक, कभी तुमने माइकल होल्डिंग्स के पैड की दुर्गति के बारे में सोचा है? मोहिंदर अमरनाथ की बॉल पिछले अट्ठाइस वर्षों से उसके पैड पर एक ही जगह लग रही है. उसके पैड की दुर्दशा के बारे में सोचते हुए लगता है जैसे बेचारा पैड न जाने कितनी बार मरा होगा. उसके बाद मोहिंदर जिस तरह से भागते हैं और भीड़ उनका पीछा करती है वह देखकर लगता है जैसे अगर भीड़ इनके ऊपर टूट पड़ी और ये घायल हो गए तो फिर अगले हाइलाइट्स में कौन जेफरी डुजों को बोल्ड करेगा और कौन मार्शल को आउट करेगा? जिस तरह से डुजों टिक गया था, वह तो अगली हाइलाइट्स में मैच जीत ले जाएगा और हमारा जीता हुआ एक मात्र वर्ल्डकप हमसे छिन जाएगा.
और फिर अब समय आ गया है कि हम भारतीय मोहिंदर की उमर का लिहाज करे और उन्हें बार-बार लगातार दौड़ने की जिम्मेदारी न दें. अब तो उनके लिए यही सही रहेगा कि वे किसी टीवी स्टूडियो में बैठकर अपनी बेसुरी आवाज़ में मैच के दिन "मेरा रंग दे बसंती चोला" की गुहार लगायें और पूरे भारत का मनोरंजन करें.
हे अधिनायक, अगर ध्यान से देखो तो लॉर्ड्स की बालकोनी पर वर्ल्डकप उठाये हुए कपिल देव फबते तो बहुत हैं लेकिन हर बार मुझे ये खटका लगा रहता है कि इतनी भीड़ में कहीं कोई वेस्टइंडियन धक्का-मुक्की करके उनके हाथ से कप लेकर भाग न ले. आजकल चूंकि राजा लोग़ किसी एक्सक्लूसिव जगह पर कप उठाकर जीतने वाले कैप्टन के हाथ में नहीं रखते इसलिए ये डर नहीं रहता कि कोई धक्का-मुक्की में कप लेकर निकल लेगा. आजकल तो बाकायदा मैदान के बीच में कप दिया जाता है जहाँ भीड़-भाड़ कम रहती है.
इसलिए हे अधिनायक, और किसी बात के लिए नहीं तो कम से १२१ करोड़ भारतीयों को पिछले इतने वर्षों की बोरियत से तो बचाओ. किसी को केवल ख़ुशी देना ही महान काम नहीं होता. मैं तो समझता हूँ कि उसे बोरियत से बचाना महानतम काम होता है और आज पूरा भारत तुमसे यह चाहता है कि तुम और तुम्हारी टीम उसे ख़ुशी तो दे ही साथ ही आनेवाले वर्षों में उसे बोरियत से भी बचाए. मेरा तो ऐसा मानना है कि हमारे पूर्व राष्ट्रपति ए पी ज़ी अब्दुल कलाम के ट्वेंटी-ट्वेंटी मिशन (क्रिकेट से मत जोड़ लेना इसे) को अचीव करने के लिए यह भी महत्वपूर्ण है कि पूरा भारत बोरियत से बचा रहे.
इसलिए हे अधिनायक, पूरे भारत की शुभकामनाएं तुम्हारे और तुम्हारी टीम के साथ हैं. कप जीतो हमें बोरियत से उबारो.
May God of cricket save us from this boriyat!!