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Tuesday, May 29, 2012

एक ट्विटर टाइम-लाइन




जिस तरह से आजकल सारे संवाद ट्विटर पर हो जाते हैं उसे देखते हुए आज सुबह सोच रहा था कि अगर ममता दी ट्विटर पर होतीं तो कल शाम को उनकी ट्विटर टाइम-लाइन कैसी दीखती? शायद कुछ इस तरह की:

टाइम लाइन पढ़ें के लिए Scribd क्लिक कीजिये.



Tuesday, February 21, 2012

दिल्ली काण्ड...




यह केवल एक पैरोडियात्मक और जुगाडू पोस्ट है. इसे किसी भी तरह से गोस्वामी तुलसीदास का अपमान न समझा जाय. इसलिए लिख रहा हूँ कि प्रशंसक कई बार नाराज़ हो जाते हैं.

यह दिल्ली-कांड का प्रथम भाग है. अगर पाठकों को अच्छा लगा तो फिर आगे का वर्णन दिया जाएगा.फिलहाल इसे बांचिये...

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एक भोर सब सहित समाजा, दस जनपथ परधान बिराजा.

सकल कुटिल मंत्री, नरनाहू, राहुल जसि सुनु अतिहि उछाहू.

राहुल रहहि कृपा अभिलाषे, चमचे करहिं प्रीति रुख लाखे.

एहि जुबराज बने अब राजा, दस जनपथ पे बाजहि बाजा.

पणियप्पन के वचन सुहाए, सुनि के सिबल हृदय अति भाये.

अब अभिलाषु एक मन मोरे, राहुल पूजि अनुग्रह तोरे.

कहइ प्रधान सुनिअ जननायक, राहुल हैं सब बिधि सब लायक.

दिग्गी सह परिवार ओ माई, करहिं छोह सब रौरिहि नाई.

सुनि परधानाहि बचन सुहाए, दंगल दोदि मूल मन भाये

जौं चमचौ मत लागहि नीका, करहु हरिष हिय राहुल-टीका.

हरषि जमाइ कहेउ मृदु बानी, नापेहु कूपहि केतना पानी.

सब पूजहि स्कैमहि देवा, बिनु पूजा न करहि कलेवा.

जेह बिधि होइ कुटुंब कल्याना, तंत्र, मन्त्र सब बिधि कर नाना.

बाजा बाजेहि बिबिधि बिधाना, सुनि सब चमचे गावहि गाना.

हरषित हृदय लिए महतारी, बिटिया संग जमाइ पुकारी.

सब बिधि होइ प्रसन्न सब नेता, देखि सबइ जुबराज प्रणेता.

रहि रहि होइ प्रसन्न सब भांती, सेवक मिलिहि बनावहिं पांती.

चमचे सब पूजत जुबराजा, उनको कहाँ अउर कछु काजा.

दरस लिए बेनी सलमाना, श्रीप्रकाश दिग्गी सह नाना.

हाथ जोडि दिग्गी तब बोले, मुख पे शबद शबद सब तोले.

कोहु नृप होहि हमहि का हानी, सूखा पड़इ कि बरसइ पानी.

जानत सभै सुभाऊ हमारा, राहुल ही हैं मोर करतारा.

वे प्रसन्न जबतक हे माई, जीयत करबि ताहि सेवकाई.

आग्रह मोर बस एक बिशेषा, यूपी ठहरौ कुटुंब प्रदेशा.

बाईस बरस भये करतारा, यूपी में नहिं राज हमारा.

उधर मुलायम माया नाचे, पुनि पुनि आपन नीयम बांचे.

मातु दीन्हि जदि मोहि अधिकारा, जाऊं यूपी लइ लस्कारा.

हायर करेहु साथ 'लिंटासा', जौ से बढौ विजय को आशा.

राजपाट यूपी में लाऊँ, राहुल जस जिनगी भरि गाऊं.

मोर मने उपजहु एहि चित्रा, मैं कलियुग को विश्वामित्रा.

दिग्गी बचन हृदय अति तारी, मगन हुई सुनि के महतारी.

हामी भरेहु साथ परधाना, ताहि संग चमचे सब नाना.

आज्ञा आज तोहि मैं दीन्हा, सकल उपाय विजय को कीन्हा.


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Monday, January 2, 2012

बीती विभावरी जाग री .... (री-मिक्स्ड)




आदरणीय श्री जयशंकर प्रसाद के प्रसंशकों से क्षमा याचना सहित.


बीती विभावरी जाग री
सास जी घर में झाड़ू देती
पेड़ पे बोले काग री
बीती विभावरी जाग री

बजता जाता टीवी, ऍफ़ एम्
सुन जिन्हें साधु भी जाते रम
स्मृति में ला कर्त्तव्य सभी
औ वह विराट बैक-लॉग री
बीती विभावरी जाग री

बिस्तर पर तू, अधखुले नेत्र
अब निकल छोड़कर कर शयन क्षेत्र
माना अबतक रवि नहीं दिखें
पर रीजन है यह फ़ॉग री
बीती विभावरी जाग री

आ पहुँचा है अब नया साल
दिक्खेंगे सारे नव-बवाल
क्या हमें मिलेगा लोकपाल
यह पूछ रही सब नागरी
बीती विभावरी जाग री

जो बीता गया अब उसे भूल
बातों का 'उनके' यही मूल
हर भारतवासी को देंगे
ऑनेस्टी भरके गागरी
बीती विभावरी जाग री

उठकर कर ले मॉर्निंग वॉक
कर लिया हेल्थ पर बहुत टॉक
कंट्रोल रहेगा रक्त-चाप
दे दुनियाँ को नव-राग री
बीती विभावरी जाग री

Friday, January 28, 2011

हाय मंहगाई - मंहगाई के मारे पुरुरवा




डेढ़ वर्ष हो गए उर्वशी को गए हुए. आजतक वापस नहीं आई. अर्थव्यवस्था की मंदी तो चली गई लेकिन फिर उसे मंहगाई ने धर दबोचा. आज उर्वशी ने सोचा कि पुरुरवा से चैट पर ही पूछा जाय कि क्या हुआ? अब अर्थव्यवस्था की हालत क्या है? उसके महीलोक पर आने के चांसेज कैसे हैं?

उनके चैट बॉक्स की एक फोटो लगा रहा हूँ. आप भी पढ़िए कि क्या बातें हो रही हैं?

पुरुरवा

डेढ़ वर्ष हो गए छोड़ कर तुम जब चली गईं थी
तुम्हें देखने की अभिलाषा कुछ दिन नई-नई थी
किन्तु समय ज्यों बीता वह भी होती गई पुरानी
आज सोचकर लगता जैसे यह प्राचीन कहानी

समझ नहीं आता कि स्थित अब कैसे सुधरेगी

उर्वशी

सारी बातें कब बोलोगे जब उर्वशी कहेगी?

क्या-क्या बीता साथ तुम्हारे मुझको जरा सुनाओ
इतना भी क्या कठिन समय था आज मुझे बतलाओ
क्या कारण हो सकता है कि डेढ़ बरस के भीतर
एक बार भी मेल लिखा, ना भेजा कोई कबूतर

पुरुरवा

सच कहता हूँ एक नहीं है कारण कई हज़ार
तुमने छोड़ा महीलोक तो मन पर हुआ प्रहार
अर्थव्यवस्था की मंदी से जीवन था हलकान
जैसे बिन बरसात के तड़पे कोई दीन किसान
पहले मुद्रा की तंगी थी फिर क्रेडिट का लोचा
इक नरेश की यह हालत होगी ये कभी न सोचा
उधर गई तुम इधर मुझे फिर राज-काज ने घेरा
साथ तुम्हारे मौज में था फिर दुःख ने डाला डेरा
जीवन अब कैसे बीतेगा यह चिंता थी मन में
कई बार मैंने यह सोचा जा भटकूँ अब वन में

ऐसा उलझा राज-काज में कहाँ मिले आराम

उर्वशी

और तुम्हारे आमात्यों ने किया नहीं कुछ काम?

अगर नहीं कुछ किया अभी तक फिर क्यों टिके हुए हैं?
लगता है कि औरों के हाथों वे बिके हुए हैं.
उसका तो बस धर्म यही अपना कर्त्तव्य निभाये
प्रजा रहे खुश उनसे और बस भूपति के गुण गाये
किन्तु मुझे यह लगता है वे काम नहीं करते हैं
और मुझे होता प्रतीत वे तुमसे ना डरते हैं.

पुरुरवा

कौन डरेगा मुझसे जब अधिकार दे दिया उनको
दही सरीखे जमे रहें आधार दे दिया उनको
जिनका था कर्त्तव्य प्रजा को वे अनाज दिलवाएं
वही घूमते इधर-उधर और बस क्रिकेट खेलवायें
समय मिले जब खेल-कूद से रखें दृष्टि बस एक
ऐसा कुछ रच डालें कि बस हो मुद्रा अभिषेक
क्या-क्या बतलायें तुमको क्या उसने है कर डाला
हाल है यह सुनने को मिलता रोज एक घोटाला

प्याज बिकेगी सत्तर रूपये नहीं कभी सोचा था

उर्वशी

इससे अच्छा तो जीवन में मंदी का लोचा था

माना मैंने सब चीजों का बढ़ा हुआ है दाम
क्या प्रधान आमात्य ने किया नहीं कुछ काम?

सुना रखा था अर्थशास्त्र के विज्ञाता हैं आप
ऐसा तो है नहीं कि निकले वे भी झोलाछाप?

पुरुरवा

शायद तुमने सही कहा कि अर्थशास्त्र के ज्ञाता
भूल चुके हैं अर्थशास्त्र अब उन्हें नहीं कुछ आता
करने की तो बात दूर है वे चुप ही रहते हैं
उनको जो भी कहना वे मैडम से ही कहते हैं
लगती ठोकर उन्हें हो जैसे वे कोई फ़ुटबाल
मंत्री, संत्री, चेले, चमचे करते रोज बवाल
न्यायालय भी देती उनको रोज एक फटकार
घोटालों का रोज मनाते एक नया त्यौहार
जिन्हें भार सौंपा था मैंने देकर जिम्मेदारी
वही बनाकर खच्चर मुझको करते रोज सवारी
खाने-पीने पर ही इतना रोज खर्च हो जाता
अब तो बनिए ने भी मेरा बंद कर दिया खाता
मास चार हो गए मुझे मदिरा को हाथ लगाए
मदिरा सेवन के खातिर अब मुद्रा कहाँ से आये
सादा जीवन भी मुश्किल अब ऐसी है मंहगाई
कौन जनम का पाप ढो रहे जाने कहाँ से आई

मन में आती बात हमारे जा भटकूँ अब वन में

उर्वशी

तुमसे अच्छी मैं ही हूँ, विचरण कर रही गगन में

देवराज दरबार सजाते करते मदिरा पान
देवलोक में बन रहे रोज सभी पकवान

मर्त्यलोक की हालत पर मुझको होता है कष्ट
चंद निकम्मे आमात्यों ने कर डाला सब नष्ट
जो हालत है आज तुम्हारी वह कब अच्छी होगी
तुम्ही बताओ मिलेंगे कैसे अब विरहणी-वियोगी?

पुरुरवा

अब तो यह लगता है.....

पुरुरवा जवाब दे ही रहे थे कि कक्ष में उनकी पत्नी औशीनरी ने प्रवेश किया. उसे देखते ही पुरुरवा ने डर के मारे टू-ज़ी नेट कनेक्शन वाला अपना लैपटॉप बंद कर दिया.

Friday, January 21, 2011

मंदी के मारे उर्वशी और पुरुरवा




कुछ तुकबंदी फिर से इकठ्ठा हो सकती है. फिर ट्राई किया तो तुकबंदी इकठ्ठा हो गई. आप झेलिये.

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रात का समय. आकाश मार्ग से जाती हुई मेनका, रम्भा, सहजन्या और चित्रलेखा पृथ्वी को देखकर आश्चर्यचकित हैं. उन्हें आश्चर्य इस बात का है कि मुंबई के साथ-साथ और भी शहरों के शापिंग माल सूने पड़े हैं. मल्टीप्लेक्स में कोई रौनक नहीं है. दिल्ली में कई निवास पर कोई हो-हल्ला नहीं सुनाई दे रहा. लेट-नाईट पार्टियों का नाम-ओ-निशान नहीं है.

पिछले कई सालों से शापिंग माल और मल्टीप्लेक्स की रौनक देखने की आदी ये अप्सराएं हलकान च परेशान हो रही हैं.

सहजन्या

लोप हुआ है जाल रश्मि का, है अँधेरा छाया
रौनक सारी कहाँ खो गई, नहीं समझ में आया
शापिंग माल में लाईट-वाईट नहीं दीखती न्यारी
कार पार्किंग दिक्खे सूनी, सोती दुनिया सारी

तुझे पता है रम्भे, क्या इसका हो सकता कारण?

रम्भा

कैसा प्रश्न किया सहजन्ये, कैसे करूं निवारण?

हो सकता है इसका उत्तर दे उर्वशी बेचारी
पर अब महाराज पुरु की भी दिक्खे नहीं सवारी

सहजन्या

अरे सवारी कैसे दिक्खे, महाराज सोते हैं
मैंने सुना है, वे भी अब तो दिवस-रात्रि रोते हैं
पृथ्वी पर मंदी छाई है, ठप है अर्थ-व्यवस्था
नहीं पता था, हो जायेगी ऐसी विकट अवस्था

मेनका

अर्थ-व्यवस्था की मंदी तो, दुनियाँ ले डूबेगी

सहजन्या

अगर हुआ ऐसा तो फिर उर्वशी बहुत ऊबेगी

महाराज पुरु की चिंताएं उसे ज्ञात हो शायद
दिन उसके दूभर हो जाएँ स्याह रात हो शायद
मर्त्यलोक की सुन्दरता पर मिटी उर्वशी प्यारी
किसे पता था होगी दुनियाँ इस मंदी की मारी?

पता नहीं किस हालत में उर्वशी वहां पर होगी

मेनका

सच कहती है सहजन्ये वो जाने कहाँ पर होगी

सहजन्या

वह तो होगी वहीँ, जहाँ पर महाराज होते हैं
दिन में विचरण करते हैं, और रात्रि पहर सोते हैं
पिछली बार गए थे दोनों, गिरि गंधमादन पर
हो सकता है अब जाएँ वे, किसी धर्म-साधन पर
लेकिन उनका आना-जाना, अब दुर्लभ हो शायद
मंदी के कारण न उनको, अर्थ सुलभ हो शायद

चित्रलेखा

अरी कहाँ तू भी सहजन्ये मंदी-मंदी गाती
महाराज को कैसी मंदी, दुनियाँ उनसे पाती

मेनका

पाने की बातें करके, ये अच्छी याद दिलाई
सखी उर्वशी को क्या मिलता, उत्सुकता जग आई
तुझे याद हो शायद, उसका कल ही जन्मदिवस है

सहजन्या

महाराज क्या देंगे उसको, मंदी भरी उमस है.

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महाराज पुरुरवा के साथ उर्वशी उद्यान में विचरण कर रही है. कल उसका जन्मदिवस है. महाराज चिंतित हैं. उसे इस बार क्या उपहार दें? पिछले बार इक्यावन तोले का नौलखा हार दिया था. पाश्चात्य देशों से मंगाया गया बढ़िया परफ्यूम और चेन्नई से मंगाई गई नेल्ली चेट्टी की साडियां दी थी.

लेकिन इस बार छाई मंदी की वजह से प्रजा से भी धन वगैरह की प्राप्ति नहीं हुई है. खजाने में केवल एक सप्ताह के आयात के लिए ही फॉरेन एक्सचेंज बचा है. ऐसे में इम्पोर्टेड चीजें मंगाकर उपहार स्वरुप उर्वशी को देना संभव नहीं है. महाराज सोच रहे हैं कि उर्वशी कुछ मांग न बैठे. इसलिए वे आज के लिए उर्वशी से विदा होना चाहते हैं.....

पुरुरवा

चिर-कृतज्ञ हूँ, साथ तुम्हारा मन को करता विह्वल
जब से हम-तुम मिले, लगे ये धरा हो गई उज्जवल
मन के हर कोने में, बस तुम ही तुम हो हे नारी
लेकिन हमको करनी है, अब चलने की तैयारी

उर्वशी

चलने की तैयारी! लेकिन क्योंकर कर ऐसी बातें?
चाहें क्या अब महाराज, हो छोटी ही मुलाकातें?
शायद हो स्मरण कि मेरा जन्मदिवस है आया
एक वर्ष के बाद हमारे लिए, ख़ुशी है लाया
पिछले बरस मिला था मुझको हार नौलखा,साड़ी
मैं तो चाहूँ मिले इस बरस, बी एम डब्ल्यू गाड़ी


पुरुरवा

गाड़ी दूं उपहार में कैसे, मंदी बड़ी है छाई
ज्ञात तुम्हें हो अर्थ-व्यवस्था, है सकते में आई
खाली हुआ खजाना मेरा, समय कठिन है भारी
अब तो हमको करनी है, बस चलने की तैयारी

उर्वशी

फिर-फिर से क्यों बातें करते हमें छोड़ जाने की?
जाना ही था कहाँ ज़रुरत थी वापस आने की?
या फिर देख डिमांड गिफ्ट का छूटे तुम्हें पसीना
समझो नहीं मामूली नारी, मैं हूँ एक नगीना

समझो भाग्यवान तुम खुद को, मिली उर्वशी तुमको

पुरुरवा

नाहक ही तुम रूठ रही हो, थोड़ा समझो मुझको

पैसे की है कमी और अब लिमिट कार्ड का कम है
धैर्यवती हो सुनो अगर, तो बात में मेरी दम है
मुद्रा की कीमत भी कम है, ऊपर से यह मंदी
क्रेडिट क्रंच साथ ले आई, पैसे की यह तंगी

उर्वशी

ओके, समझी बात तुम्हारी, मैं भी अब चलती हूँ
वापस जाकर देवलोक में, सखियों से मिलती हूँ
जब तक मर्त्यलोक में मंदी, यहाँ नहीं आऊँगी
देवलोक में रहकर, सारी सुविधा मैं पाऊँगी
थोड़ा धीरज रखो, शायद अर्थ-व्यवस्था सुधरे
हो सुधार गर मर्त्यलोक में, और अवस्था सुधरे
अगर तुम्हें ये लगे, कि सारी सुविधा मैं पाऊँगी
एक मेल कर देना मुझको, वापस आ जाऊंगी


इतना कहकर उर्वशी आकाश में उड़ गई. पुरुरवा केवल उसे देखते रहे.

अब पृथ्वी पर अर्थ-व्यवस्था में सुधार की राह देख रहे हैं. कोई कह रहा था कि अर्थ-व्यवस्था जल्द ही सुधरने वाली है


यह पोस्ट साल २००९ के मई महीने में पब्लिश की थी. आज फिर से इसलिए पब्लिश कर रहा हूँ ताकि यह मेरी अगली पोस्ट का कर्टेन-रेजर साबित हो:-)