
इंडिया टुडे ने जुलाई महीने के अंतिम सप्ताह में देश भर में हिंदी ब्लागिंग पर एक सर्वेक्षण किया. पत्रिका के अनुसार यह सर्वेक्षण अपनी तरह का पहला सर्वेक्षण है जो हिंदी ब्लागिंग के लिए न सिर्फ महत्वपूर्ण है अपितु उसकी दिशा तय करने में निर्णायक साबित होगा.
इस मामले में पत्रिका के प्रधान सम्पादक का कहना है; "हिंदी ब्लागिंग स्वतंत्र अभिव्यक्ति का ऐसा माध्यम बन चुकी है जिसका भविष्य तो उज्जवल है ही, वर्तमान भी कम महत्वपूर्ण नहीं है. लेखन के मीडियम के तौर पर हिंदी ब्लागिंग अब पर्याप्त रूप से पुरानी हो चुकी है. इतनी पुरानी हो चुकी है कि अब तो इस मीडियम का विस्तार दलों, गुटों और एशोसियेशन के तौर पर भी हो रहा है. आज पूरे भारतवर्ष में बीस हज़ार से ज्यादा हिंदी ब्लॉगर हैं. यही कारण था कि हमने पहली बार इतने विशाल स्तर पर एक सर्वे किया. हमने पूरे देश के अट्ठारह बड़े और तैंतीस छोटे शहरों में अपने संवाददाताओं को भेजकर करीब आठ हज़ार हिंदी ब्लागरों से कुल तेरह प्रश्न किये और उनपर उनका मत लेते हुए यह सर्वे करवाया जिसमें कई चौकानेवाले तथ्य सामने आये हैं. आशा है कि हमारी पत्रिका हिंदी ब्लागिंग पर आगे भी सर्वेक्षण करती रहेगी. हम अपना यह सर्वेक्षण राष्ट्र को समर्पित करते हैं."
प्रस्तुत है सर्वेक्षण का परिणाम जो इंडिया टुडे के १६-२३ सितम्बर अंक में प्रकाशित होगा. वैसे आपको इंतज़ार करने की ज़रुरत नहीं है, सर्वेक्षण के परिणाम आप यहीं बांचिये.
०१. ब्लागरों से जब यह पूछा गया कि "उनकी ब्लागिंग का उद्देश्य क्या है?" तो कुल ५७.३७ प्रतिशत ब्लॉगर का यह मानना था कि ब्लागिंग का कोई उद्देश्य हो, यह ज़रूरी नहीं है. जहाँ बड़े शहरों में इस तरह का विचार रखने वाले कुल ४०.२६ प्रतिशत लोग थे वहीँ छोटे शहरों में यह आंकड़ा ५२.१८ प्रतिशत रहा. बड़े शहरों में करीब १९.२७ प्रतिशत ब्लॉगर का मानना था कि वे इन्टरनेट पर अमर होने के लिए ब्लागिंग कर रहे हैं वहीँ ९.८३ प्रतिशत ब्लॉगर यह मानते हैं कि वे अपनी ब्लागिंग से समाज को बदल डालेंगे. छोटे शहरों में समाज बदलने को ब्लागिंग का उद्देश्य बनाने वाले ब्लागरों का आंकड़ा करीब १७.३१ प्रतिशत रहा.
०२. जब ब्लागरों से यह सवाल पूछा गया कि; "ब्लागिंग की वजह से सम्बन्ध बनाने में सहायता मिलती है?" तो ७०.१९ प्रतिशत ब्लॉगर यह मानते हैं कि ब्लागिंग की वजह से सम्बन्ध बनते है. वहीँ १९.८३ प्रतिशत ब्लॉगर यह स्वीकार करते हैं कि ब्लागिंग की वजह से सम्बन्ध बिगड़ते है. ७.१२ प्रतिशत ब्लॉगर का यह मानना है कि ब्लागिंग की वजह से सम्बन्ध बनते-बिगड़ते रहते हैं. बाकी ब्लॉगर यह मानते हैं कि समबन्ध बने या बिगडें, उन्हें इसकी परवाह नहीं है.
०३. एक और महत्वपूर्ण प्रश्न था; "ब्लागिंग करने की वजह से क्या ब्लॉगर को एक पारिवारिक माहौल मिलता है?" इस प्रश्न पर ८९.१६ प्रतिशत ब्लॉगर का मानना था कि उन्हें ब्लागिंग में आने के बाद एक ही चीज मिली है और वह है पारिवारिक माहौल. ६.८७ प्रतिशत ब्लॉगर का ऐसा मानना है कि वे स्योर नहीं है कि उन्हें पारिवारिक माहौल मिला है या नहीं? ऐसे ब्लॉगर का मानना है कि अगर झगड़ा वगैरह होता रहे तो पारिवारिक माहौल का एहसास बना रहता है परन्तु चूंकि झगड़ा परमानेंट फीचर नहीं है इसलिए वे अपने विचार पर पूरी तरह जम नहीं सकते.
०४. एक प्रश्न कि; "ब्लागिंग की वजह से ब्लॉगर को कौन-कौन से रिश्तेदार मिलने की उम्मीद रहती है?" इस प्रश्न के जवाब में ८.९३ प्रतिशत ब्लॉगर का कहना था कि वे एक 'फादर फिगर' मिलने की उम्मीद से रहते हैं वहीँ ४५.६६ प्रतिशत लोग भाई-बहन मिलने की उम्मीद करते हैं. करीब १४.५७ प्रतिशत ब्लॉगर को एक अदद चाचा मिलने की उम्मीद रहती है तो १९.३१ प्रतिशत ब्लॉगर एक दोस्त मिलने की उम्मीद में ब्लागगिंग करते हैं. केवल ७.५६ प्रतिशत ब्लॉगर यह उम्मीद करते हैं कि उन्हें पूरा परिवार ही मिल जाए जिससे उन्हें किसी रिश्ते की कमी नहीं खले. करीब ३.१६ प्रतिशत लोग यह मानते हैं कि पारिवारिक रिश्तों से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि उन्हें टिप्पणियां मिले.
०५. हमारे संवाददाताओं ने ब्लागरों से एक सवाल किया कि; "क्या केवल अपना ब्लॉग लिखकर ब्लॉगर बना जा सकता है?" इस सवाल के जवाब में ह्वोपिंग ९७.६८ प्रतिशत ब्लॉगर का यह मानना था कि केवल ब्लॉग लिखकर ब्लागिंग नहीं की जा सकती. जहाँ २२.४४ प्रतिशत ब्लॉगर का यह मानना था कि वे अपना ब्लॉग लिखने के अलावा चर्चा करना पसंद करते हैं वहीँ ५३.७१ प्रतिशत ब्लॉगर का यह मानना है कि वे ब्लॉग लिखने के अलावा ब्लॉगर सम्मलेन को महत्वपूर्ण मानते हैं. १८.८८ प्रतिशत ब्लॉगर यह मानते हैं कि लिखने के अलावा वे एशोसियेशन बनाने को ब्लागिंग का अभिन्न अंग मानते हैं. ४१.५१ प्रतिशत ब्लॉगर यह मानते हैं कि लिखने के अलावा ब्लॉगर सम्मलेन, एशोसियेशन और गुटबाजी करके ही एक सम्पूर्ण ब्लॉगर बना जा सकता है. वहीँ ७.३९ प्रतिशत ब्लॉगर यह मानते हैं कि लेखन, एशोसियेशन और सम्मलेन के अलावा पुरस्कार वितरण करके ही पूर्ण ब्लॉगर बना जा सकता है.
०६. सर्वे में एक प्रश्न था; "आप लेखन की किस विधा का समर्थन करते हैं?" इस प्रश्न के जवाब में जहाँ ८३.१५ प्रतिशत लोगों ने कविता लेखन का समर्थन किया वहीँ १४.१३ प्रतिशत लोगों ने गद्य लेखन का समर्थन किया. केवल १.१८ प्रतिशत लोगों ने दोनों का समर्थन किया. करीब १.५ प्रतिशत लोगों ने यह कहकर किसी का समर्थन नहीं किया कि वे गुट निरपेक्ष संस्कृति को जिन्दा रखना चाहते हैं.
०७. एक प्रश्न कि; "टिप्पणियां कितनी महत्वपूर्ण हैं?" के जवाब में ९१.८९ प्रतिशत ब्लॉगर ने बताया कि टिप्पणियां सबसे महत्वपूर्ण हैं. इसमें से जहाँ ८४.५६ प्रतिशत ब्लॉगर यह मानते हैं कि टिप्पणियां पोस्ट से भी ज्यादा महत्वपूर्ण हैं वहीँ ७.१६ प्रतिशत ब्लॉगर मानते हैं कि टिप्पणियां और पोस्ट दोनों महत्वपूर्ण हैं. करीब ८.७८ प्रतिशत ब्लॉगर मानते हैं कि पोस्ट और टिप्पणियों से ज्यादा महत्वपूर्ण वे खुद हैं.
०८. एक प्रश्न कि; "फीड अग्रीगेटर का रहना कितना ज़रूरी है?" के जवाब में करीब ९२.३९ प्रतिशत ब्लॉगर का यह मानना है कि हिंदी ब्लागिंग के लिए फीड अग्रीगेटर का होना बहुत ज़रूरी है. जहाँ ६७.७२ प्रतिशत ब्लॉगर यह मानते हैं कि फीड अग्रीगेटर के रहने से लोगों को उठाने-गिराने में सुभीता रहता है वहीँ २८.७५ प्रतिशत ब्लॉगर का मानना था कि फीड अग्रीगेटर को पंचिंग बैग की तरह इस्तेमाल करने में मज़ा आता है इसलिए उसका रहना बहुत ज़रूरी है. करीब ३.१८ प्रतिशत ब्लॉगर यह मानते हैं कि फीड अग्रीगेटर रहे या न रहे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि वे लोगों को मॉस-मेल के जरिये सूचित करते हैं कि उनकी नई पोस्ट आ गई है.
०९. जब ब्लागरों से यह प्रश्न किया गया कि "ब्लागिंग करने की वजह से उनका कितने लोगों से झगड़ा हुआ है?" तो जो परिणाम सामने आये वे चौकाने वाले थे. करीब ८.१२ प्रतिशत लोग ही यह जवाब दे सके कि ब्लागिंग करने के बावजूद उनका किसी ब्लॉगर के साथ झगड़ा नहीं हुआ. ९०.१७ प्रतिशत का मानना था कि ब्लागिंग करते हुए उनका किसी न किसी ब्लॉगर से झगड़ा अवश्य हुआ है. वहीँ १.७१ प्रतिशत ब्लॉगर का मानना था कि वे स्योर नहीं है कि उनका किसी अन्य ब्लॉगर के साथ झगड़ा हुआ या नहीं? ऐसे लोगों का मानना था कि अन्य ब्लॉगर से उनकी तू-तू-मैं-मैं हुई भी तो उसे झगड़ा कह जा सकता है या नहीं इस बात पर संदेह है. केवल २४.८९ प्रतिशत ब्लॉगर ही ऐसे थे जिनका दो या दो से कम लोगों से झगड़ा हुआ है. करीब ४०.३७ प्रतिशत ब्लॉगर ऐसे हैं जिनका पाँच से ज्यादा लेकिन नौ से कम लोगों के साथ झगड़ा हुआ. जहाँ १३.७८ प्रतिशत ब्लॉगर का दस से ज्यादा और पंद्रह से कम ब्लॉगर के साथ झगड़ा हुआ वहीँ ११.१० प्रतिशत ब्लॉगर का पंद्रह से ज्यादा और तीस से कम ब्लॉगर के साथ झगड़ा हुआ. कुल ०.३ प्रतिशत ब्लॉगर थे जिन्होंने मॉस लेवल पर यानि पचास से ज्यादा लोगों के साथ झगड़ा किया है.
१०. जब ब्लागरों से यह प्रश्न किया गया कि "हिंदी ब्लागिंग में ज्यादातर झगड़े की वजह क्या है?" तो करीब केवल ७.८९ प्रतिशत लोगों ने व्यक्तिगत मतभेद को झगड़े की वजह बताया. दूसरी तरफ जहाँ ६७.१८ प्रतिशत लोगों ने धार्मिक वैमनष्य को झगड़े की जड़ बताया वहीँ १९.०९ प्रतिशत ब्लागरों ने राजनैतिक विचारधारा को झगड़े की वजह बताया. वैसे एक बात पर सारे ब्लॉगर एकमत थे कि कहीं पर झगड़ा होने से उस संस्था के डेमोक्रेटिक होने का गौरव प्राप्त होता है इसलिए हिंदी ब्लागिंग में झगड़े का मतलब है कि डेमोक्रेटिक सेटअप सुदृढ़ हो रहा है.
११. एक सवाल कि; "संबंध बनाने के लिए कौन से साधन महत्वपूर्ण हैं?" के जवाब में जो परिणाम आये वे चौकाने वाले थे. जैसे करीब ६३.३९ प्रतिशत लोगों का मानना था कि संबंध बनाने के लिए फ़ोन सबसे महत्वपूर्ण साधन है. वहीँ करीब ८.९७% प्रतिशत ब्लॉगर यह मानते हैं कि संबंध बनाने के लिए वे ई-मेल का सहारा लेते हैं. ६.९८ प्रतिशत ब्लॉगर मेल और फ़ोन दोनों का इस्तेमाल करते हैं और बाकी के ब्लॉगर मेल, फ़ोन के अलावा सम्मलेन और व्यक्तिगत मुलाकातों को सम्बन्ध बनाने के लिए महत्वपूर्ण मानते हैं.
१२. जब ब्लागरों से यह पूछा गया कि; "सिनेमा, राजनीति, क्रिकेट और सामजिक मुद्दों के अलावा ब्लॉग पोस्ट के लिए सबसे महत्वपूर्ण विषय क्या है?" तो उसपर करीब ७५.४३ प्रतिशत ब्लागरों का मानना था कि इन सब विषयों के अलावा सबसे महत्वपूर्ण विषय है "चिट्ठाकारों" के बारे में लिखना. करीब ६.७३ प्रतिशत लोगों के लिए यात्रावर्णन एक महत्वपूर्ण विषय है वहीँ ९.११ प्रतिशत लोगों के लिए ब्लागिंग कार्यशाला महत्वपूर्ण विषय है. दूसरी तरफ ८.२७ प्रतिशत लोगों के लिए सम्मान लेन-देन कार्यक्रम महत्वपूर्ण है तो करीब ०.५% प्रतिशत लोगों ने स्वीकार किया कि वे खुद सबसे महत्वपूर्ण विषय हैं.
१३. जब ब्लागरों से यह प्रश्न किया गया कि; "बीच-बीच में ब्लागिंग छोड़ देने की घोषणा एक ब्लॉगर के भविष्य के लिए कितनी महत्वपूर्ण है?" तो उसके जवाब में करीब ९२.१३ प्रतिशत ब्लॉगर मानते हैं कि ब्लागिंग छोड़ देने की घोषणा किसी भी ब्लॉगर के ब्लॉग-जीवन के लिए अति महत्वपूर्ण है. इसमें से करीब ६६.८९ प्रतिशत ब्लॉगर का मानना है कि ऐसी घोषणा से किसी भी ब्लॉगर का ब्लॉग-जीवन न सिर्फ बढ़ जाता है अपितु उसे टिप्पणियां भी ज्यादा मिलने लगती हैं. करीब ७.१६ प्रतिशत ब्लॉगर ही मानते हैं कि ब्लागिंग छोड़ देने की घोषणा से एक ब्लॉगर के ब्लॉग-जीवन पर ख़ास असर नहीं पड़ता. वहीँ जिन लोगों का मानना है कि ऐसी घोषणा से एक ब्लॉगर का ब्लॉग जीवन बढ़ जाता है उनमें से करीब २४.३१ प्रतिशत लोग यह मानते हैं कि दो से ज्यादा बार ब्लागिंग छोड़ देने की घोषणा करने से एक ब्लॉगर का ब्लॉग जीवन औसतन तीन वर्ष बढ़ जाता है. वहीँ चार से ज्यादा घोषनाएं करने वाले ब्लॉगर का ब्लॉग जीवन औसतन पाँच वर्ष बढ़ जाता है.
तो ये थे हमारे प्रथम राष्ट्रीय ब्लॉग सर्वेक्षण के परिणाम. हमारे संवाददाताओं ने न सिर्फ पूरे देश का दौरा किया अपितु सही परिणामों के लिए सैम्पल साइज़ से कोई समझौता नहीं किया. उद्देश्य केवल एक ही था कि पूरे देश के सामने एक सच्ची तस्वीर उभर कर आये. हम उन हिंदी ब्लागरों के भी आभारी हैं जिन्होंने इस सर्वे के लिए अपना समय निकाला. आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि यह सर्वे हिंदी ब्लागिंग में एक मील का पत्थर साबित होगा.
---सम्पादक
Tuesday, August 31, 2010
इंडिया टुडे - राष्ट्रीय ब्लॉग सर्वे - २०१०
Friday, July 10, 2009
वही बात...ब्लॉग को साहित्य कहा जा सकता है या नहीं?
ब्लॉग को साहित्य कहा जाय या नहीं, इस बात पर बहस अब पुरानी हो चुकी है. आज बालसुब्रमण्यम जी ने भी एक लेख पब्लिश किया है. उनके लेख में तमाम बातों का जिक्र किया है जिसकी वजह से साहित्य को साहित्य की मान्यता दी जाती है. उन बातों में से एक बात है;
"यदि आज ब्लोगों में जो लिखा जा रहा है, वह बीस-पच्चीस साल बाद भी पढ़ा जाता रहे, तब इस पर विचार किया जा सकता है कि वह साहित्य कहलाने लायक है या नहीं।"
इसपर दो मत नहीं हो सकता कि ऊपर लिखी गई बात भी साहित्य को नापने का एक पैमाना है. लेकिन यह मान्यता कब की है? पुरानी है. जब साहित्य के बारे में यह मान्यता उभरी, उनदिनों में और आज के दिनों में बहुत अंतर है. पहले शिक्षा और ज्ञान की उम्र बहुत लम्बी होती थी. लेकिन आज ऐसा नहीं है. तकनीक के विकास की वजह से ज्ञान या शिक्षा की उम्र धीरे-धीरे घटती जा रही है.
एक शिक्षा या ज्ञान लेकर शिक्षण संस्थाओं से निकलने वाला छात्र देखता है कि कुछ ही वर्षों में उसके ज्ञान को तकनीकी विकास के दौर में किसी और ज्ञान ने रिप्लेस कर दिया.इसके अलावा ज्ञान और शिक्षा के माध्यम भी बदल गए हैं.
आप कंप्यूटर को ही ले लीजिये. कंप्यूटर के क्षेत्र में हर एक-दो वर्ष में कोई नई भाषा आकर पुरानी भाषा को रिप्लेस कर रही है. कंप्यूटर के अलावा आप शिक्षा के किसी भी और डिसिप्लिन को ले लीजिये, वह चाहे इंजीनियरिंग हो, मेडिकल हो,अकाऊंटिंग हो, आर्ट हो, सिनेमा हो, या फिर कुछ और, हर क्षेत्र में बदलाव बड़ी तेजी से हो रहे हैं.
ऐसे में बदलाव से साहित्य अछूता कैसे रह सकता है?
बालसुब्रमण्यम जी ने खुद लिखा है कि कैसे पहले राहुल साकृत्यायन और किपलिंग के साहित्य की गिनती अच्छे साहित्य के तौर पर होती थी लेकिन बाद में पुनर्विचार के बाद इन लोगों की कृतियों को खारिज कर दिया गया. मेरा प्रश्न यह है कि अगर इन साहित्यकारों की कृतियों पर पुनर्विचार के बाद इन्हें खारिज किया जा सकता है तो फिर साहित्य की मान्यताओं पर क्या पुनर्विचार भी नहीं किया जा सकता?
पहले साहित्य को सहेजने के साधन क्या थे? किताब की शक्ल में साहित्य लिखा जाता था. शोध-कार्यों को भी सहेज कर रखने का जरिया भी किताबें ही थीं. वहीँ दूसरी तरफ ब्लॉग जहाँ पर लिखा जाता है वह माध्यम ही रोज बदलता रहता है. हो सकता है कि हमें कल कोई और माध्यम मिले जिसपर लोग ब्लॉग लिखें. हम विचार करें तो शायद इस निष्कर्ष पर पहुंचें कि असल में ब्लॉग का आईडिया ही व्यावसायिक है. और चूंकि व्यवसाय के काम में लाया जानेवाला आईडिया समय-समय पर बदलता रहता है इसलिए हो सकता है कि कल ब्लॉग का आईडिया ही पूरी तरह से डिस्कार्ड कर दिया जाय. ब्लॉग को कोई और माध्यम रिप्लेस कर दे.
पुराने साहित्य-लेखन पर व्यावसायिक होने का तमगा कभी नहीं लगा सिवाय इसके कुछ प्रकाशक और लेखक साहित्य को कोर्स की किताबों के तौर पर चलवाने के लिए कुछ करते रहते थे. वहीँ आज के साहित्यकारों को देखिये, कितना पैसा मिलता है इन्हें. तो क्या व्यावसायिक होने का बहाना बनाकर इनके साहित्य को खारिज कर दिया जाय?
कोई भी कह सकता है कि जो कुछ पहले लिखा गया और अभी तक पढ़ा जा रहा है, वही असली साहित्य है और आज के साहित्यकार जो लिख रहे हैं, चूंकि उसके आज से पचास साल बाद भी पढ़े जाने की गारंटी नहीं है, लिहाजा उनके द्बारा लिखे जाने वाले साहित्य को साहित्य ही न माना जाय. कालजयी लेखन के चक्कर में आज का साहित्यकार अपने समय के समाज और अपने समय की राजनीति के बारे में बात ही न करे तो फिर उसके साहित्य का समाज के लिए क्या फायदा?
हिंदी ब्लागिंग में ही न जाने कितने लोग हैं जिन्होंने लिखना शुरू किया तो देखकर लगा कि बहुत अच्छा लिखते हैं. लेकिन वही लोग अब लिखते ही नहीं. ऐसे में उनका लिखा हुआ लोग आज से बीस साल बाद भी याद रखेंगे, इस बात की कोई गारंटी नहीं है. लेकिन ब्लागिंग छोड़ने से पहले उन्होंने जो कुछ भी लिखा, उसे न सिर्फ किताब की शक्ल दी जा सकती है बल्कि यह भी कहा जा सकता है कि वह सारा कुछ लोक हितकारी है और शायद आज से बीस साल बाद भी लोग उसे पढ़ना चाहें. ऐसे में ब्लागिंग छोड़ने से पहले उनलोगों ने जितना लिखा, उसे क्या साहित्य नहीं कहा जा सकता?
इसके अलावा शिक्षा के माध्यमों में जिस तरह का बदलाव आ रहा है, हो सकता है कल को शिक्षण संस्थायें कुछ ब्लॉग लेखकों के ब्लॉग को अपने पाठ्यक्रम में ले आयें. आखिर जब फिल्मों को साहित्य के पाठ्यक्रम में रखा जा सकता है तो उसी तरह ब्लॉग को भी तो रखा जा सकता है.
ब्लॉग को साहित्य कहा जाय या नहीं, इस बात पर बहस करना शायद अभी ठीक नहीं होगा. हाँ, जैसा कि हाल ही में सुना गया है, कुछ संस्थायें इन्टरनेट पर हिंदी साहित्य को उपलब्ध कराने के लिए प्रयासरत हैं. जब हिंदी साहित्य का एक बड़ा भाग नेट पर उपलब्ध होगा और जब ब्लॉग और साहित्य के पाठक एक ही होंगें, तब शायद यह बहस ही बेमानी हो जाय. तब पाठक खुद ही पता लगा लेगा और एक निर्णय पर पहुंचेगा कि ब्लॉग पर जो कुछ भी लिखा जा रहा है वह सब साहित्य है या नहीं? या फिर उसका एक हिस्सा ऐसा है जिसे साहित्य की श्रेणी में रखा जा सकता है.
आखिर सच तो यही है न कि आज साहित्य और ब्लॉग के पाठक बहुत हद तक अलग-अलग हैं.
Tuesday, June 30, 2009
भेज रहा हूँ नेह-निमंत्रण प्रियवर तुम्हें पढ़ाने को
ब्लागिंग करते हैं. एक जगह बैठे-बैठे लिख लेते हैं. वहीँ बैठे-बैठे छाप देते हैं. न तो प्रकाशक के आफिस के चक्कर लगाने की ज़रुरत है और न ही लेख के वापस लौट आने की आशंका. झमेला केवल पाठक ढूढ़ने का है. वो भी करने के लिए कहीं जाने की ज़रुरत नहीं है. मेल में ढेर सारा नाम भरा और सेंड नामक बटन क्लिकिया दिया. कुछ-कुछ वैसा कि;
भेज रहा हूँ नेह-निमंत्रण प्रियवर तुम्हें पढ़ाने को
हे मानस के राजहंस तुम आ जाना टिपियाने को
लेकिन कई महीने से चल रहा मेरा यह प्लान आज सुबह-सुबह मुझे भारी पड़ गया. आज बड़े दिनों बाद लालमुकुंद पधारे. आफिस में आये तो मैं धन्य हो लिया. पाठक अगर ब्लॉगर से मिलने खुद आये तो ब्लॉगर धन्य-गति को प्राप्त होगा ही. मैं भी प्राप्त हुआ. उनके बैठते ही पानी मंगवाया. साथ ही कोल्डड्रिंक्स लाने की व्यवस्था में जुट गया. लेकिन एक बात का आभास हो रहा था. लालमुकुंद मेरी इस व्यवस्था से खीझे जा रहे थे.
कुछ समय के लिए तो उन्होंने खुद को संभाला लेकिन अचानक ज्वालामुखी की तरह फट पड़े. बोले; "तुम कैसे आदमी हो? ठीक है, ब्लागिंग करते हो लेकिन जितनी बार पोस्ट लिखते हो, पढने के लिए मेल क्यों ठेल देते हो?"
उनकी बात सुनकर मुझे कुछ अजीब सा लगा. पता नहीं क्यों लग रहा था कि वे कुछ नाराज हैं. सामने वाला अगर नाराज हो जाए तो तुंरत गंभीर हो जाना श्रेयस्कर रहता रहता है. लिहाजा मैंने भी गंभीरता की मोटी चादर से मुख को ढांपते हुए कहा; " वो तो देखो, एक एक्सरसाइज टाइप है. मुझे लगता है कि तुम मेरे लेखों को बड़ी गंभीरता से पढ़ते हो. टिप्पणी नहीं देते वो एक अलग बात है लेकिन मुझे भरोसा है कि तुम मुझे सुझाव दोगे कि लेख में क्या कमी है. इसी बात के चलते मैं तुम्हें मेल भेज देता हूँ."
यह कहते हुए मेरे मुख पर हल्की सी मुस्कान आ गई. बस, वे तो और बिफर पड़े. बोले; "मैं मजाक के मूड में नहीं हूँ. आज इस तरफ आया था तो सोचा कि तुमसे मिलूँ और इस मुद्दे पर बात करूं. तुम्हें मालूम है, अपनी पोस्ट पढ़वाने के लिए जो मेल भेजते हो, उसका क्या करता हूँ मैं?"
मैंने कहा; "जाहिर है, उस लिंक को क्लिक करके मेरे लेख पढ़ते होगे. आखिर मैं मेल इसीलिए भेजता हूँ कि तुम मेरे लेख पढ़ सको."
मेरी बात सुनकर और बिफर पड़े. बोले; "सीधा डिलीट करता हूँ मैं. तुंरत. पिछले न जाने कितने महीनों से तुमने परेशान करके रखा है मुझे. और केवल तुम्ही नहीं हो. न जाने और कितने भाई-बन्धु हैं तुम्हारे जो ऐसा करते हैं . तुमलोगों को क्या लगता है, तुम्हारे लेख इस तरह से लोग पढेंगे? अगर ऐसा ही है तो क्या ज़रुरत है ब्लॉगवाणी और चिट्ठाजगत की?"
मैंने कहा; "ब्लॉगवाणी और चिट्ठाजगत की अपनी भूमिका है. लेकिन मेल की भी अपनी भूमिका है. आज ज़रुरत है नेट पर हिंदी को आगे बढाने की. हम हिंदी की सेवा कर रहे हैं. सेवा बिना कष्ट के तो असंभव है."
मेरी बात सुनकर मन ही मन कुछ बुदबुदाए. लगा जैसे कह रहे हों; "हिंदी की सेवा! माय फुट."
मैंने कहा; "लेकिन मेरे लेख तो और लोग पढ़ते हैं. कुछ तो टिप्पणी भी देते हैं. बहुत लोग पसंद करते हैं. ब्लॉगवाणी पर मेरे लेख को ऊपर पहुंचा देते हैं."
मेरी बात सुनकर उन्होंने माथे पर हाथ रख लिया. बोले; "तुमको क्या लगता है? लोग तुम्हारे लेख पर टिप्पणियां देते हैं इसका मतलब क्या निकालते हो तुम?"
मैंने कहा; "इसका मतलब और क्या हो सकता है? लोग मेरे लेख, मेरी कवितायें बहुत पसंद करते हैं. और क्या मतलब हो सकता है इसका?"
वे बोले; "अरे मूढ़मति. दुनियाँ का कुछ पता भी तुम्हें? कौन क्या सोचता है तुम्हारे लेखों के बारे में? जो भी चैट पर मिलता है वो तुम्हारा नाम लेकर यही कहता है कि तुमने उन सब को कितना परेशान कर रखा है. अनूप जी परसों चैट पर मिल गए. बोले शिव कुमार मिश्र ने मेल भेज-भेज कर हालत खराब कर दी है. पोस्ट पब्लिश किये नहीं कि तुंरत मेल भेज दिया. पागल कर दिया है इन्होने."
मैंने कहा; "लेकिन उनकी टिप्पणियों से तो ऐसा नहीं लगता. मेरी एक पोस्ट पर तो उन्होंने "जय हो" भी लिखा था."
वे बोले; "हे भगवान. कुछ नहीं समझाया जा सकता इस आदमी को. तुम्हें मालूम है उन्होंने "जय हो" क्यों लिखा था? इसका कुछ आईडिया है तुम्हें?"
मैंने कहा; "इसका मतलब तो यही होता है कि उन्हें वो लेख बम्फाट लगा होगा."
बोले; "ऐसा कुछ नहीं है. वे तो चाहते थे कि वे "क्षय हो" लिख दें लेकिन "क्षय हो" लिखने लिए टाइम लगता इसलिए उन्होंने "जय हो" लिख डाला. "जय" टाइप करने के लिए केवल तीन 'की' यूज करने की ज़रुरत होती है. वहीँ "क्षय" टाइप करने के लिए पूरे पांच 'की' यूज करना पड़ता है. अब कौन झमेला करे. ऐसे में उन्होंने सोचा होगा कि "जय हो" लिख दो. इसका भी मन रह जाएगा. नहीं तो ऐसा न हो कि ये टंकी पर चढ़ जाए."
मैंने कहा; "लेकिन मुझे तुम्हारी बात पर विश्वास नहीं हो रहा. मैं इसे सही नहीं मानता."
मेरी बात सुनकर बोले; "तुमको जो मानना है वो मानो. लेकिन सच तो यही है कि लोग तुमसे परेशान है. समीर जी से चैट पर बात हो रही थी. वे भी तुमसे परेशान हैं. कह रहे थे कि पता नहीं मुझे भी क्यों मेल भेज देते हैं. मैं तो बिना मेल मिले ही टिप्पणियां करता हूँ. फिर ऐसे में मेल भेजकर परेशान क्यों करते हैं?"
मैंने कहा; "लेकिन समीर भाई से तो मैं कलकत्ते में जब मिला तो उन्होंने तो मुझे इस बात की शिकायत नहीं की."
वे बोले; "ये उनका बड़प्पन है, जिसे तुम अपने लिए शाबासी मान रहे हो. कोई भला आदमी सबकुछ सामने कहकर तुम्हें लताड़े तब तुम्हें समझ में आएगा क्या?"
मैंने कहा; "तो क्या किया जाय? अब से मेल भेजना बंद कर दूँ क्या?"
मेरी बात सुनकर मुझे ऐसी नज़रों से देखा जैसे मेरे अन्दर की बेवकूफी को मीटर टेप लेकर नाप रहे हों. बोले; "तो क्या तब बंद करोगे जब लोग पुलिस स्टेशन में रिपोर्ट लिखाना शुरू करेंगे? नहीं, बोलो तुम कब बंद करना चाहते हो? तुम्हें पता है, आजकल चिट्ठाकार कौन सा गाना गाते रहते हैं?"
मैंने कहा; "नहीं मालूम. कौन सा गाना गा रहे हैं आजकल चिट्ठाकारगण"
वे बोले; "सब तुम्हारे और तुम्हारे साथियों के मेल से इतना डरने लगे हैं कि सारे एक ही गाना गा रहे हैं; 'ज़रा सी आहट सी होती है तो दिल पूछता है, कहीं ये वो तो नहीं.' सब इतना डरे हुए हैं तुम्हारे मेल देखकर."
समझ में नहीं आया कि क्या कहूँ? मैं सोच ही रहा था कि कुछ कहूँ तब तक वे बोले पड़े; "और बाकी को तो जाने दो. ज्ञान जी ने एक दिन मुझसे कहा कि तुम उन्हें भी मेल भेज देते हो. जब उनका कमेन्ट ब्लाग पर नहीं मिलता तो एस एम एस देकर फिर से बताते हो ताकि वे तुंरत कमेन्ट करें. मुझसे कोई कह रहा था कि तुम ताऊ जी को भी फोन कर देते हो कि एक पोस्ट डाली है, देखिएगा. तुम्हें क्या लगता है? ताऊ जी भी स्टॉक मार्केट वाले हैं तो तुंरत आकर तुम्हें कमेन्ट देंगे? तंग रहते हैं वे भी तुमसे."
लालमुकुंद जी ने इतनी खरी-खोटी सुनाई कि क्या कहूँ? सबकुछ लिखने जाऊँगा तो पोस्ट पंद्रह पेज की हो जायेगी.
इसलिए, मेरी तरह मेल भेजकर पढ़वाने और टिपियाने की एक्सरसाइज करने वाले मित्रों, चलो आज से ही वचन लें कि हम किसी को अब से मेल लिखकर अपनी कविताओं और अपने लेख का लिंक नहीं देंगे. अगर हमारे भाग्य में लिखा ही होगा कि हम परसाई, अज्ञेय, गालिब और दिनकर बनें तो हमें ये सब बनने से कोई नहीं रोक पायेगा. हम बनकर रहेंगे. मेल भेजें या न भेजें.
Tuesday, June 16, 2009
शत-प्रतिशत निरापद-लेखन
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Monday, June 15, 2009
अम्मा जरा देख तो ऊपर
कक्षा एक में ये कविता पढ़ी थी. कोर्स की किताब में थी. बहुत प्यारी कविता है. मुझे तो तब से याद है. आपको भी याद होगी. अगर याद नहीं हो, तो याद ताजा कर लें.
अम्मा जरा देख तो ऊपर
चले आ रहे हैं बादल
गरज रहे हैं, बरस रहे हैं
दीख रहा है जल ही जल
हवा चल रही क्या पुरवाई
भीग रही है डाली-डाली
ऊपर काली घटा घिरी है
नीचे फैली हरियाली
भीग रहे हैं खेत, बाग़, वन
भीग रहे हैं घर, आँगन
बाहर निकलूँ मैं भी भीगूँ
चाह रहा है मेरा मन
बचपन में किसी पत्रिका में पढ़ी एक और कविता याद आ गई. आप भी पढें.
छुक-छुक करती, छुक-छुक करती
रेल चली जब दिल्ली से
टीटी चूहा झट आ पहुंचा
टिकट मांगने बिल्ली से
लेकिन बिल्ली बिना टिकट की
चूहे ने तब ली खिल्ली
झट जुर्माना करके बोला
गंदी होती है बिल्ली
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फिल्म कलाकार जोगिन्दर नहीं रहे. उन्हें मेरी श्रद्धांजलि.
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औत अंत में:
कल हुए ट्वेंटी-ट्वेंटी वर्ल्ड कप के मुकाबले में इंग्लैंड ने भारत को हरा दिया. इस हार की वजह से भारतीय टीम अब वर्ल्ड कप प्रतियोगिता से बाहर हो गई है. भारतीय टीम के प्रशंसक दुखी हैं. वैसे मेरा मानना है कि टीम ने खेल भावना के साथ अपना काम किया. जीत-हार तो खेल का हिस्सा है.
Thursday, June 11, 2009
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की कीमत
हम ब्लॉगर लोग आम आदमी हैं. इसलिए ब्लॉग लिखते हैं. आते-जाते जो कुछ भी देखते हैं, टांक देते हैं ब्लॉग पर. ई ससुर गूगल ने सर्वर क्या दिया हमारी तो खिल गईं. अरे मैं बाँछों की बात कर रहा हूँ. खिल गईं. एक आईडी क्रीयेट किये और शुरू हो गए. क्या-क्या नहीं लिख डाला.
आज हमको रास्ते में यह दिखा. कल शाम को वह दिखा था. ई राजनीति बहुत गंदी हो गई है. आतंकवाद बहुत बढ़ गया है. मंहगाई बढ़ गई है. अंग्रेजी बढ़ गई है. हिंदी कम गई है. अंग्रेजी को बढावा देना गुलामी की निशानी है. आतंकवादी से सख्ती से निबटना होगा. कसाब को डायरेक्ट फांसी काहे नहीं दे देती सरकार? अफ़ज़ल गुरु की फांसी में इतना दिन काहे लग रहा है? वर्ण व्यवस्था कब ख़तम होगी? किसान काहे आत्महत्या कर रहा है? महिला आरक्षण को लेकर इतना हंगामा क्यों है? कसाब अपना बयान काहे बदल दिया? हम सेकुलर हैं, तो तुम कम्यूनल काहे हो? साध्वी प्रज्ञा के साथ इतनी बदसलूकी काहे हो रही है? हिन्दू आतंकवाद शब्द काहे इस्तेमाल किया जा रहा है? कम्यूनिष्ट इतनी बुरी तरह से काहे हारे? क्या दुनियाँ से कम्यूनिज्म के ख़तम होने की शुरुआत हो गई है? उड़ीसा में चर्च पर काहे हमला हो रहा है? मुतालिक जैसों की धुलाई काहें नहीं होनी चाहिए?
भारतीय भुजंग काट लेगा तो क्या होगा? वेद में व्यवस्था को लेकर ई कहा गया है. जंगल की आग से छुटकारा कैसे पाया जा सकता है? पर्यावरण खराब क्यों हो रहा है? हबीब तनवीर को श्रद्धांजलि. आदित्य जी को श्रद्धांजलि. गत्यात्मक ज्योतिष खराब है. फलित ज्योतिष अच्छा है. जलित ज्योतिष उससे भी अच्छा है. हम ऐसा मानते हैं तुम क्या कर लोगे? हिन्दू कौन थे? हिंदी भाषा किधर जा रही है? किस रफ़्तार से जा रही है? परसों तक कहाँ पहुँच जायेगी? कविता क्या है? कविता इंसान को जगाती है या फिर गौरैया के लिए लिखी जाती है?
काहे? काहे? काहे?
मतलब यह है कि आम आदमी हैं तो यही सब लिखेंगे न. ख़ास होते तो किसी मैगजीन में लिख रहे होते. केंचुकी फ्रायड चिकेन और मैकडोनाल्ड की वजह से एक ख़ास समाज किस दिशा में जा रहा है उसका विश्लेषण कर रहे होते. तब अगर कसाब के मुक़दमे की बात करते तो इस बात को ध्यान में रखकर करते कि अंतर्राष्ट्रीय कूटिनीति का इस मुक़दमे पर क्या असर पड़ता है. अमेरिका का मीडिया क्या चाहता है? एमनेस्टी इंटरनेशल के लोग इस मुद्दे पर क्या विचार रखते हैं? अफ़ज़ल गुरु को फांसी देने की बात करते तो यह ध्यान में रखते कि यूरोपियन यूनियन भारत से क्या चाहता है? मैकडोनाल्ड की किसी खास वर्ग के लोगों पर पड़े प्रभाव को देखते तो उससे उपजने वाली आर्थिक नीतियों का अध्ययन करते हुए लिखते.
लेकिन भैया, हम तो आम आदमी हैं. ऐसे में जो कुछ लिखेंगे वह सब आम आदमी की भाषा में ही होगा. हम तो यह सुनकर लिखना शुरू किये थे कि; "ब्लॉग अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम है."
किसी ब्लॉग विशेषज्ञ ने यह लाइन गढी होगी. लेकिन हमें तो मरवाने पर उतारू दीखता है यह ब्लॉग विशेषज्ञ.
यह वाक्य सुनकर हम तो उड़ने लगे. जो मन में आया, लिख डाला. ऊपर से संविधान ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी वाला सर्टिफिकेट दिया है. अब इस सर्टिफिकेट और कुछ टूटे-फूटे विचारों से लैस हम निकल लिए ब्लॉग लिखने. आम आदमी छोटे-छोटे काम कर के महान होने के सपने देखता रहता है. वही बात हम ब्लॉगर लोगों के साथ है. सोचते हैं;"चलो ब्लॉग लिखकर महान हो लेते हैं."
अब ऐसे में अगर कोई आकर यह कहे कि ऐसा करने से फंस जाओगे तो? हमें तो लगेगा न कि यहाँ हम ब्लॉग लिखकर महान हुए जा रहे थे और आप आ गए बीच में. हमारी महानता पर ताला लगाने. महान होने का हमारा प्लान चौपट करने. आम आदमी को महान होने का हक़ नहीं है क्या?
हम ब्लॉग लिखेंगे तो आम आदमी की तरह. इसलिए जब अफ़ज़ल गुरु की बात करते हैं तब केवल यह याद रहता है कि उसे फांसी की सज़ा हो गई है. यह भी याद रहता है कि कुछ नेताओं ने और कुछ मानवाधिकार वालों उसे बचाने की मुहिम छेड़ रखी है. हमें इस बात से क्या लेना-देना कि यूरोपियन यूनियन अफ़ज़ल गुरु के मामले में भारत पर क्या दबाव डाल रहा है?
ऐसे में हम क्या लिखें?
हम जब किसानों की आत्महत्या की बात करेंगे तो यही न लिखेंगे कि सरकार की नीतियों की वजह से किसान मारा जा रहा है? हमें नहीं मालूम कि विदर्भ और बुंदेलखंड की आर्थिक दशा क्या है? किसान किस फसल की खेती करता है? वहां उपलब्ध साधन क्या हैं? हम तो जी आम आदमी की तरह यही सोचते मरे जा रहे हैं कि न जाने कितने लोग अपना जीवन ख़त्म कर ले रहे हैं.
हम जब न्याय-व्यवस्था पर लिखेंगे तो एक आम आदमी की धारणा लिए लिखेंगे. हमें तो केवल इतना पता है कि अदालतें न जाने कितने वर्षों से चल रहे न जाने कितने मुकदमें निबटा नहीं पा रही. क्यों नहीं निबटा पा रही, उसपर दिया जलाकर रौशनी दिखाना ख़ास लोगों का काम है. हमें केवल इतना जानते हैं कि वकील अपने दांव-पेंच कैसे चलाते हैं. हमें केवल इतना पता है कि इसकी वजह से मुकदमें कैसे खिंचते हैं.
हमें क्या पता कि आम आदमी की सोच लिए हम अगर कुछ लिख देंगे तो उससे अदालत की अवमानना होगी? हमें तो बस इतना मालूम है कि नेता टाइप लोग न जाने कितनी बार उच्चतम न्यायालय तक की अवमानना करते नहीं अघाते. लेकिन उनके खिलाफ कुछ नहीं होता. हमें तो बस इतना पता है कि आये दिन न्याय पालिका में भ्रष्टाचार की बातें होती रहती हैं.
इन मुद्दों के फ़ाइनर पॉइंट्स पर प्रकाश डालने का काम किसी प्रशांत भूषण, किसी फली नारीमन या किसी सोली सोराबजी के जिम्मे है.
ऐसे में हम और क्या लिखेंगे? ब्लॉग लिखने से बदलाव होता है, ऐसा कोई गुमान नहीं पाल रक्खा है हमने. हमें तो यही समझ में आता है कि टीवी के पैनल डिस्कशन या फिर सेमिनार आयोजित करने से अगर बदलाव नहीं आ पाया तो फिर शायद ब्लॉग का नंबर आये..:-)
लेकिन अब क्या अनिवार्य हो जाएगा कि ब्लॉग लिखने से पहले भारतीय अचार संहिता की धाराएं रट लो? साइबर कानूनों को घोंट डालो. हमारे लेख से किस-किस को नाराजगी होगी उसकी एक लिस्ट बना लो. इतना सबकुछ कर लो उसके बाद लिखना. चार साल लग जायेंगे सारी तैयारी करने में. हो सकता है उसके बाद जब लिखने की बारी आये तो पता चले कि गूगल जी ने फ्री की सुविधा हटा ली. ऐसे में हमारा ब्लॉग कैरियर तो शुरू होने से पहले ही ख़त्म हो जाएगा.
अभिव्यक्ति का माध्यम क्या केवल ब्लॉग ही है?
यह तो अभी आया है. हाल ही में. इससे पहले जो लोग व्यंग वगैरह लिख डालते थे उन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं थी? क्या होता अगर कोई अधिकारी, कोई मास्टर, कोई नेता, कोई राजनीतिक पार्टी, कोई डॉक्टर, कोई वकील, कोई थानेदार, कोई गवर्नर, कोई मुख्यमंत्री किसी परसाई जी, किसी शरद जोशी जी या किसी श्रीलाल शुक्ल जी से नाराज़ हो जाता तो?
समाज में न जाने किन-किन विसंगतियों पर इन लोगों ने लिखा. किसी को छोड़ा नहीं. लेकिन मैंने तो नहीं सुना कि किसी ने इन्हें अदालत में घसीट लिया हो. ऐसा होता तो क्या-क्या हो सकता था?
देखते कि सन पचहत्तर से ही परसाई जी केवल अदालतों के चक्कर काट रहे हैं. किसी दिन जबलपुर में मुक़दमे की सुनवाई रहती तो यह कहते सुने जाते कि;"क्या कहें, वकालत में व्याप्त विसंगतियों के बारे में लिख दिया था. गवाह कैसे तोडे जाते हैं. तारीख कैसी ली जाती है. जबलपुर बार असोसिएशन ने मुकदमा ठोक दिया. अब तो झेलना पड़ेगा ही. मेरी भी मति मारी गई थी. काहे व्यंग लिखने गए?"
कोई कहता कि; " कोई बात नहीं. ऐसा होता रहता है. सब ठीक हो जाएगा."
इस बात पर शायद बोलते; "अरे क्या ख़ाक ठीक हो जाएगा? अभी कल ग्वालियर में मुक़दमे की सुनवाई है. रानी नागफनी की कहानी में डॉक्टर भाई लोगों के बारे में लिख दिया था कि कैसे जब मार्केट में कोई दवाई भारी मात्रा में आ जाती है डॉक्टर लोग हर रोग में मरीज को वही दवाई प्रिस्क्राईब कर देते हैं. कल की तारीख निबट जाए तो अगले मंगलवार को हैदराबाद जाना है. राजनीति पर लिखे गए एक लेख में चेन्ना रेड्डी को खींच लिए थे. भाई ने आंध्रप्रदेश हाई कोर्ट में मुकदमा दायर कर दिया है."
देखते कि सन पचहत्तर के बाद उन्होंने कुछ लिखा ही नहीं. तब से सन पंचानवे तक बेचारे मुकदमों में उलझे-उलझे इस असार संसार से कूच कर जाते.
कैसा लगता अगर ऐसा कुछ हो जाता तो?
संजय गांधी की खिंचाई न जाने कितनी बार की होगी उन्होंने. अशोक मेहता से लेकर राम मनोहर लोहिया, और जय प्रकाश नारायण से लेकर राज नारायण तक किसी को नहीं छोड़ा. लेकिन क्या इन लोगों ने उनको मुकदमों में फंसाकर जोत डालने की कसम खाई?
या फिर उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के कुछ और मायने थे? या कहीं ऐसा तो नहीं कि परसाई जी अपने समय के बाहुबली थे जिनसे सब डरते थे इसलिए किसी ने डर के मारे मुकदमा नहीं दायर किया?
आखिर एक आम आदमी की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की कीमत क्या है? जेलयात्रा?
Monday, June 8, 2009
बाँट रहे सर्टिफिकेट गाकर सेकुलर राग
कभी नहीं सोचा था कि इस तरह का कुछ लिखना पड़ेगा. क्योंकि सेकुलर और कम्यूनल जैसे मुद्दों पर बहस का काम बड़े-बड़े ज्ञानी, विद्वान् करते हैं. लेकिन इनमें से ही एक विद्वान जी ने कुछ ब्लॉग पोस्ट पर टिप्पणी करने की वजह से मुझे कम्यूनल घोषित कर दिया है.
अब घोषित कर दिया है तो कर दिया है. विद्वान् हैं. विद्वान टाइप लोग कुछ भी करते रहते हैं. लेकिन भैया, मेरा कहना है कि मैंने क्या टिप्पणी की, वह तो देख लेते. केवल टिप्पणी करने की वजह से ही कम्यूनल घोषित कर दिया आपने?
इन विद्वान जी के विद्वत्ता देखकर सेकुलर और सेकुलरिज्म के जो मायने मुझे समझ में आये, वह इन 'धोयों' में हैं. देखिये जरा, आप सेकुलरिज्म की जो परिभाषा जानते हैं, वो ऐसी ही है क्या?
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हम सेकुलर हैं जनम से और कम्यूनल हैं आप
संग हमरे जो न चले लेंगे गर्दन नाप
खुद को सेकुलर कह दिए ठप्पा लिया लगाय
वे टस से मस न करें चाहे सब मरि जाय
साठ साल से गा रहे अपना सेकुलर गान
बाकी चाहे जो कहें सुनें न उनका तान
बाँट रहे सर्टिफिकेट गाकर सेकुलर राग
सेकुलर साबुन यूज कर छुपा लिए सब दाग
वे जिसको सेकुलर कहें वह सेकुलर हो जाय
जिसको वे कम्यूनल कहें मिट्टी में मिल जाय
बैठे हैं जो उस तरफ देते अपनी राय
उन्हें समर्थन दे अगर फट सेकुलर हो जाय
किया बहाना बहस का पोस्ट दिया है चढाय
चार नाम ले लिख दिया सब कम्यूनल है भाय
'बहसी पोस्ट' चढाय जो चहु दिक् फैले नाम
बड़े-बड़े सेकुलर यहाँ करते उन्हें सलाम
हम समझायें धर्म क्या तुम बस सुनते जाव
जो कह दें वह फाइनल हमरा ऊंचा भाव
सेकुलर ही जाने यहाँ क्या है हिन्दुस्तान
बाकी सब चिरकुट यहाँ उनको नहि कछु ज्ञान
जिसकी चाहें फिक्स कर 'हाफ-पैन्टिया' जात
ले लाठी दौडाय दें, उसकी क्या औकात
Tuesday, April 14, 2009
नवपदार्पण करने वाली कलियाँ और टिप्पणी रुपी भ्रमर
रोज चिट्ठाजगत से मेल मिलता है. किसी दिन २५ तो किसी दिन १९ नए चिट्ठे रजिस्टर होते हैं. लिखा रहता है;
"इन्द्रजाल में नवपदार्पण करने वाली इन कलियों का टिप्पणी रूपी भ्रमरों द्वारा स्वागत करें!"
पूरी लाइन पढ़कर लगता है जैसे अति कोमल ह्रदय के ओनर किसी कवि ने रात में खूब तेल खर्च करके इस लाइन को गढा है. कुल मिलाकर घणी गाढ़ी लाइन है.
नवपदार्पण करने वाली कलियाँ! टिप्पणी रुपी भ्रमर. आहा!
लेकिन एक बात है. कवि ने किसी अलग तरह के अलंकार का सदुपयोग कर डाला है. अब देखिये न. टिप्पणी हुई स्त्रीलिंग. भ्रमर जी हुए पुल्लिंग. ऐसे में टिप्पणी रुपी भ्रमर!
ठीक वैसे ही, चिट्ठा हुआ पुल्लिंग. कलियाँ हुई स्त्रीलिंग.
शायद ये ब्लॉग अलंकार है.
काव्य प्रेमी लोगों से भरा है अपना ब्लॉग-जगत. मामला काव्यात्मक न रहता तो थोडा अटपटा लगता.
काव्य रचने को प्रोत्साहित करने वाले नॉर्मल बगीचे में नवपदार्पण करने वाली कलियाँ भ्रमरों को देखकर ज्यादातर विदक जाती हैं. ये कहते हुए तन जाती हैं कि; "मुवों, तुम्हें और कोई काम नहीं है? हम कलियों ने पदार्पण किया नहीं कि चले आये मंडराने? तुम्हारे मन में हमेशा खोट रहता है."
लेकिन चिट्ठा-बाग़ में ऐसा नहीं हो सकता. इस केस में ऐसा होने का चांस नहीं हैं. यहाँ तो नवपदार्पण करने वाली कलियाँ भ्रमरों का इंतज़ार करती रहती हैं. जैसे कह रही हों;
आजा रे..मैं तो कब से खड़ी...ये अँखियाँ थक गई पंथ निहार...आजा रे.
भ्रमर आ जायें तो ठीक. न आयें तो बड़ी मुश्किल. काहे नहीं आये आज? शायद भटक गए होंगे.
नवपदार्पण करने वाली जिस कली का टिप्पणी रुपी भ्रमरों ने स्वागत नहीं किया वे अपने पास वाली कली से पूछती होगी; " सखी, आज तुम्हारा स्वागत किसी भ्रमर ने किया कि नहीं?... क्या कहा?... तीन भ्रमरों ने तुम्हारा स्वागत किया! हमारा तो स्वागत किसी ने किया ही नहीं."
टिप्पणी रुपी भ्रमरों के स्वागत करने से खुश हुई कली बोलेगी; " सखी, हम ठहरे काव्य-कली. इन भ्रमरों को हमें स्वागत करने में आराम रहता है न. स्वागत गान बनता है काव्य से कॉपी की हुई चार लाइन और बधाई नामक शब्द को जोड़कर. इसीलिए तीन भ्रमर हमारे सामने स्वागत गान गाकर गए हैं."
भ्रमर भी कैसे-कैसे. आड़े-तिरछे मंडराते हुए. भिनभिनाते हुए. तीस्ता नदी से चंचल.
इनके ये गुण भ्रमरों से जाने क्या-क्या करवाते हैं. देखेंगे भ्रमर चले नवपदार्पण करने वाली कलियों की बाग़ की तरफ. पहुँच गए कहीं और. पुराने बगीचे में. वहां पहले से ही डेरा जमाये धूल समेटे फूलों को निहार हर्ष की गंगा में गोते लगा रहे हैं.
ऐसा भी हो सकता है कि तीन-चार भ्रमरों का एक झुंड नवपदार्पण कलियों के चिट्ठा-बाग़ की तरफ उड़ा. देखा सामने से एक भ्रमर वापसी का टिकट टेंट में दबाये चला आ रहा है. इस झुंड को देखकर पूछेगा; " कहाँ जा रहे हो?"
ये बोलेंगे; "नवपदार्पण करने वाली कलियों का स्वागत करने."
वापसी करने वाला भ्रमर बोलेगा; " उस तरफ मत जाओ. आज इन नवपदार्पण कलियों में काव्य-कली है ही नहीं."
बस. इतना काफी है भ्रमरों के इस झुंड के लिए. झुंड में से एक भ्रमर बोलेगे;" जब नवपदार्पण कलियों में काव्य-कली है ही नहीं तो कौन वहां जाकर इधर-उधर उड़े? खाली-पीली दो-चार मिनट मंडराएंगे और फिर वहां से बिना स्वागत किये ही एक-दो-तीन."
पुरायट टाइप भ्रमरों को ट्राइड एंड टेस्टेड टाइप फूल ज्यादा भाते होंगे. ऐसे फूलों को देखकर भ्रमर बोर भी होंगे लेकिन आदत पुरानी हो गई है. कुछ नया देखना ही नहीं चाहते. कहते हैं; "हमें तो पता है. जिस फूल पर बैठेंगे उसका रंग क्या है? उसका गंध कैसा है? हम तो उसी पर बैठेंगे."
काहे उन्ही पर बैठोगे? नया देखने की इच्छा नहीं होती? गेंदा के फूल का कितना दिन स्वागत करते रहोगे? इतनी सारी कलियाँ चिट्ठा-बाग़ में अवतरित हो रही हैं. उनपर मंडराओ. उन्हें फूल बनाओ. तरह-तरह के रंग लिए, तरह-तरह का गंध लिए इन नवपदार्पण करने वाली कलियों का स्वागत करो.
Wednesday, April 1, 2009
Saturday, March 21, 2009
चुरातत्व हीन पोस्टें
शिवकुमार मिश्र हलकायमान और हड़कायमान रहते हैं कि उनकी पोस्टें फलाने तिवारी छाप देते हैं अखबार में। छाप देना तो ठीक, उसमें कटपेस्ट का कमाल भी दिखाते हैं। और फिर लीपापोती में बुलशिट टिप्पणी करने की सीनाजोरी भी करते हैं।
हम ने तो कालजयी न लिखने का सवा आने का संकल्प कर रखा है – कुछ ऐसा लिखो ही मत जिसमें चुरातत्व हो। टीएसाआई (थेफ्टोलॉजिकल सर्वे ऑफ इण्डिया) उसपर अपना अधिपत्य ही न जमा सके। जब वह तत्व ही न हो तो कौन छापेगा?!
लिहाजा हमें चिरकुट टाइम्स में अपने ब्लॉग के जिक्र का डंका पीटती पोस्ट भी न बनानी पड़ेंगी और उस अखबार के आठवें कॉलम के कोने का फोटो स्कैन कर ब्लॉग पर ठेलने से भी बच सकेंगे। पर क्या बतायें, शिव ने अपने लेखन का कमाल ऐसा जमा लिया है कि उन्हें पोस्ट की सज्जा या फोटो चेंपने की जरूरत ही नहीं महसूस होती। उनकी पोस्टें कालजयी छाप होती हैं। सुयोधन की डायरी कालान्तर में एमए/एमबीए में पढ़ाई न जाने लगे – बड़ी आशंका है मुझे!
खैर हास्य-व्यंग अपार्ट, मैने पाया है कि अखबार अपना स्पेस भरने को चुरातत्व पर या सरकारी प्रेस विज्ञप्तियों पर निर्भर रहते हैं। जितना प्रेम से मेहनत हम अपनी छोटी सी पोस्ट पर करते हैं, उसका एक आना भी इन अखबारों के अधिकांश स्क्राइब्स अपनी रिपोर्टिंग/स्टिंग/फीचर में नहीं करते।
मैं फिर चाहूंगा कि शिव कुछ बेकार छाप लेखन करने लगें, जिससे तुलनात्मक रूप से मैचिंग पोस्ट इस ब्लॉग पर ठेलने में मुझे झेंप न महसूस हो।
सुन रहे हो प्यारे भाई!
Tuesday, December 9, 2008
टिंकू भविष्य की आशा है
शिव कुमार मिश्र की पोस्ट पर तीन चरित्र उभरे हैं – मनोहर और उनके भतीजे रिंकू और टिंकू। मनोहर और रिंकू चिरकुट समाज की उपज और अंग हैं। ये भारत के सेल्फ-अप्वॉइण्टेड नेतृत्व हैं। टिंकू आज की तारीख में अभिजात्य है – एलीट। फ्लैटियाती (समतल होती) दुनिया का पूरा लाभ लेने वाला और तकनीकी जगत को दोहन के लिये सन्नध।
आप माने न माने, टिंकुओं की संख्या भविष्य के भारत में बढ़ने वाली है। अर्थव्यवस्था को भले ही अस्थाई सेट-बैक का सामना है, पर अंततोगत्वा भारत का उच्च मध्यवर्ग बढ़ने वाला है।
टिंकू चाहे मनोहर चाचा का सम्बन्धी हो या रहमान या रुस्तम अंकल का। पर बम्बई की घटनाओं ने यह अहसास उसको करा दिया है कि वह सेफ नहीं है। आतंक की नजर में अब चिराग दिल्ली, डोम्बीवली, महरौली या दन्तेवाड़ा ही नहीं, ओबेराय और ताज भी हैं। एलीट का सेफ्टी-आइसोलेशन भरभरा कर ढ़ह गया है।
एक तरीके से यह अच्छा ही हुआ है। टिंकू के अगले चुनाव में वोट डालने की सम्भावनायें बढ़ गयी हैं। टिंकू बेहतर मीडिया मैनेजमेण्ट से आतंक के खिलाफ राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय जनमत मोबिलाइज करने में सन्नध हो गया है। टिंकू अब तक मोमबत्ती जला कर अपने दायित्व से मुक्त हो जाता था, अब वह बत्ती के वैकल्पिक उपयोग करने के मोड में आ रहा है।
मनोहर और रिंकुओं से मुझे ज्यादा आशा नहीं है। ये दोनो बड़ा बड़ा बोलते पर प्राइवेटली करते अपोजिट हैं। रिंकू के मां-बाप और रिंकू तो दहेज की आशा में गदगद हुये जा रहे हैं, भले ही कहते हैं कि उनकी कोई डिमाण्ड नहीं है। उसी दहेज से उनका तरण होना है। ये फटीचर आदर्शवाद बूंकते हैं, पर अपनी कुण्ठा और अपनी लार से लाचार हैं।
अब मुझे आशा टिंकू और उसके (उत्तरोत्तर) बाकी समाज से घटते आइसोलेशन से है।
पोस्ट पर रीविजिट: कौन मनोहर है, कौन रिंकू और कौन टिंकू; इस पर मारपीट हो सकती है। बहुत से हैं जो मनोहर/रिंकू/टिंकू नहीं हैं। मेरे बचपन से अब तक भारत ने वास्तविक अर्थों में प्रगति की है। यह सब मनोहरों के बावजूद हुई है। अनेक टिंकूगण अपनी अभिजात्य स्नॉबरी में इतराते रहे हैं, पर बहुतों ने मौलिक योगदान भी किये हैं।
आगे की पीढ़ी के बारे में सार्थक बात पाठक लोग करेंगे।
Monday, October 20, 2008
विश्वामित्र की तपस्या फिर से भंग हो गई.....
रात (या सुबह?) के तीन बजे थे. इन्द्र अपने कमरे में कंप्यूटर टेबल के सामने लगी कुर्सी पर बैठे कुछ सोच रहे थे. सोचते-सोचते कुर्सी पर पालथी मार कर बैठ गए. कुछ देर कमरे की सीलिंग को निहारा. सीलिंग निहार कर बोर हो लिए तो टेबल पर रखी थैली उठा ली. थैली में से पान मसाला निकाल हथेली पर रखा. कुछ क्षण बाद हथेली को नाक के पास ले गए. कुछ सोचते हुए बोले; "लगता है नकली है."
तीन बजे कमरे में उनकी बात सुनने वाला कौन होगा? कोई नहीं. इसलिए तुंरत ही मन मारते हुए चेहरे पर कोम्प्रोमाईज मुद्रा लाते हुए सोचा कि हाय-तौबा मचाकर भी कुछ नहीं मिलने वाला.
संकठा प्रसाद के ऊपर बहुत गुस्सा आया. मन में सोचने लगे; "सबेरा होने दो, संकठा प्रसाद की ठुकाई कर दूँगा. कितनी बार इसे मना किया है कि सेठ ब्रदर्स की दूकान से मसाला न लाया करे लेकिन ये जगरचोर वहीँ से ले आता है. सौ मीटर और आगे जाने में पता नहीं इसका क्या बिगड़ता है?"
मन मारकर ज़र्दे का पाउच खोला. पता नहीं क्यों आज ज़र्दा का डबल डोज़ हथेली पर उलट लिया. पान मसाला के साथ ज़र्दा रगड़ते हुए मिश्रण तैयार करने में जुट गए.
मिश्रण तैयार करते हुए बार-बार टेबल पर रखे लैपटॉप को निहारते जा रहे थे. लैपटॉप पर उनका ब्लॉग खुला था. अपनी पिछली पोस्ट पर आए कमेन्ट को अब तक सात बार देख चुके थे. भगवान विष्णु के साथ-साथ वृहस्पति और शुक्राचार्य के कमेन्ट भी थे. साथ में कुछ और बड़े, मझोले और टुटपुजिया देवताओं के अथाह बड़ाई वाले कमेन्ट भी थे.
जहाँ भगवान विष्णु ने अपने कमेन्ट में लिखा था; "बेहतरीन" वहीँ शुक्राचार्य ने देवराज का मजाक उड़ाते हुए लिख दिया था; "सही जा रहे हो. आजकल उर्वशी से पोस्ट लिखवाने लगे हो या फिर कथक देखते-देखते सोमरस के प्रभाव में ये पोस्ट लिखी है? यही हाल रहा तो मुझे अपने चेलों को युद्धविद्या सिखाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी."
शुक्राचार्य का कमेन्ट पढ़ते हुए सोच रहे थे; "पता नहीं ख़ुद को क्या समझता है? हर पोस्ट पर कुछ न कुछ तीखी टिप्पणी कर के ही जाता है. एक तरफ़ वृहस्पति जैसे विद्वान हैं जो मेरी हर पोस्ट की बड़ाई करते हैं और दूसरी तरफ़ ये कानिया है जो हर पोस्ट पर गाली देता है. इसका कुछ न कुछ इलाज करना पड़ेगा."
ये बातें सोचते हुए वे पान मसाला और ज़र्दे का मिश्रण तैयार कर ही रहे थे कि नारद प्रकट हुए. असल में अपनी वीणा से लैश नारद एक गीत गुनगुनाते चले जा रहे थे. सुबह-सुबह पृथ्वीलोक जा रहे थे लेकिन तीन बजे देवराज के कमरे में लाईट जलती देख इधर मुड लिए. इन्द्र को मिश्रण तैयार करता देख बोले; "नारायण नारायण. ये क्या देख रहा हूँ प्रभो? आप खैनी का सेवन कब से करने लगे?"
उनका सवाल देवराज को पसंद नहीं आया. बोले; "देखिये देवर्षि, इस समय मेरा मूड बहुत ख़राब है. अगर आप मज़ाक करने का प्लान बनाकर आए हैं तो चले जाइये. आपको मालूम है, मैं खैनी नहीं बल्कि पान मसाला और ज़र्दे का मिश्रण खाता हूँ."
इन्द्र का जवाब सुनकर नारद को पता चल गया कि मामला कुछ गड़बड़ है. यही सोचते हुए बोले; " लेकिन प्रभो, आप पान मसाला और ज़र्दा भी क्यों खाते हैं? ये अच्छी चीजें नहीं हैं."
इतना कहकर वे रुक गए. फिर उन्हें अचानक याद आया कि उन्होंने नारायण नारायण तो कहा ही नहीं. यही सोचते हुए उन्होंने ख़ुद को करेक्ट करते हुए "नारायण नारायण" कह डाला.
नारद के मुंह से नारायण नारायण सुनकर इन्द्र को बड़ा अजीब लगा. वे सोचने लगे कि इन्होने अलग से नारायण नारायण क्यों कहा?
एक बार तो सोचा कि नारद से पूछ लें लेकिन दूसरे ही क्षण उन्होंने अपना ये विचार त्याग दिया और बोले; "मुझे भी मालूम है ये अच्छी चीजें नहीं हैं. लेकिन मैं क्या करूं? पिछले पन्द्रह दिन से टेंशन डिजाल्व करने वाली गोली काम ही नहीं कर रही है. इसलिए डॉक्टर ने कहा कि पान मसाला और ज़र्दे का मिश्रण ट्राई करूं. कह रहे थे, अब यही दो चीजें खालिश हैं. दवाई तो नकली बिक रही हैं";
इन्द्र ने अपनी समस्या के बारे में बताते हुए कहा.
उनकी बात सुनकर नारद भी सोच में पड़ गए. उन्हें एकदम से समझ में नहीं आया कि इन्द्र के टेंशन का कारण क्या है. उन्हें लगा कि अनुमान लगाकर कौन दिमाग खर्च करे? इन्ही से पूछ लो. यही सोचते हुए उन्होंने पूछ लिया; " लेकिन आप टेंशनग्रस्त क्यों हैं प्रभो? क्या मेनका आजकल डांस स्टेप भूल जाती है?"
"नहीं देवर्षि, ऐसी बात नहीं है. वैसे भी मेनका अगर डांस स्टेप भूल भी जायेगी तो क्या हो जायेगा? आडिशन करके नई डांसर्स भर्ती कर लेंगे"; इन्द्र ने सफाई देते हुए कहा.
"तो फिर आप क्या ब्लॉग पर शुक्राचार्य के कमेन्ट से दुखी हैं?"; नारद ने अनुमान लगाते हुए पूछा.
अब तक इन्द्र का मुंह पान मसाला और ज़र्दे के मिश्रण से पूरी तरह से भर गया था. वे और बात करने में असमर्थ थे. इसलिए टेबल के नीचे से डस्टबिन उठाकर उसमें थूकते हुए बोले; "नहीं देवर्षि, शुक्राचार्य से तो कभी भी निबट लूँगा. असल में मेरी टेंशन की वजह एक बार फिर से विश्वामित्र हैं. आपके कहने से मैंने ब्लॉग बनाकर पिछली बार उनकी तपस्या भंग की थी. लेकिन पता नहीं क्यों वे पिछले बीस दिन से ब्लॉग पर पोस्ट ही नहीं डाल रहा है. न ही मेरी पोस्ट पर कमेन्ट कर रहा है."
नारद उनकी बात सुनकर मंद-मंद मुस्कुराने लगे. बड़े सरकास्टिक लहजे में बोले; "नारायण नारायण. ये आप क्या कह रहे हैं प्रभो? आप ही तो कहते थे कि अब विश्वामित्र के ब्लॉग पर जाने का मन नहीं करता. और आज आपको ये चिंता सता रही है कि वे पोस्ट नहीं लिख रहे हैं? ये क्या बात हुई, देवाधिदेव?"
"वो तो मैं ऐसे ही कहता था, देवर्षि. असल में मैं रोज ही उसके ब्लॉग पर जाकर देखता था कि उसने क्या लिखा. अगर नहीं देखता तो फिर से गाली देते हुए पोस्ट कैसे लिखता? और फिर, जब वो मेरी पोस्ट पर गाली देते हुए कमेन्ट लिखता था तो मैं आश्वस्त रहता था कि ये तपस्या नहीं कर रहा है"; इन्द्र ने पूरी बात का खुलासा करते हुए कहा.
इतना कहते हुए वे फिर से पान मसाला हाथ पर रखने लगे. हथेली पर ज़र्दा रखते हुए बोले; "मुझे तो लग रहा है कि विश्वामित्र एक बार फिर से तपस्या करने में जुट गया है. मैं हर घंटे अपना ब्लॉग खोलकर देख लेता हूँ कि उसका कोई कमेन्ट आया कि नहीं? लेकिन पिछले बीस दिन से वो कहीं दिखाई ही नहीं दे रहा है. अब तो आप ही कोई रास्ता दिखायें देवर्षि. अगर ये विश्वामित्र फिर से तपस्या करने बैठ गया तो बड़ी मुश्किल हो जायेगी."
इन्द्र की व्यथा-कथा सुनकर नारद को दया आ गयी. सोचने लगे कि इनकी मदद कैसे करें? ये इस तरह से टेंशनग्रस्त हो गए तो सोमरस कौन पीयेगा? स्वर्गलोक में डांस का प्रोग्राम ही बंद हो जायेगा. देवता तो त्राहि-त्राहि करने लगेंगे. देवता अगर देवताई न कर सके तो और ही कर्म पर उतर आयेंगे.
यही सब सोचते हुए नारद ने ब्रेन-स्टार्मिंग सेशन शुरू कर दिया.
सोचते-सोचते सुबह हो गयी. मुर्गा भी बोल उठा. मुर्गा बोला ही था कि मुर्गे की बांग सुनकर कौआ भी बोल उठा. साथ में कुत्तों ने भी भौकना शुरू कर दिया. इतनी सारी आवाजें सुनकर नारद को ब्रेनवेव आ गयी. अचानक बोल उठे; "नारायण नारायण."
उनके मुंह से नारायण नारायण सुनकर इन्द्र की आँखें चमक उठी. उन्हें आभास हो गया कि देवर्षि के दिमाग में कोई समाधान आया ज़रूर है. वे नारद की तरफ़ याचक भाव से देख रहे थे. जैसे कह रहे हों; " जल्दी अपने आईडिये के बारे में बताएं देवर्षि.ट्राई मेक इट फास्ट, प्लीज."
नारद मुस्कुराते हुए बोले; " नारायण नारायण. समाधान मिल गया प्रभो. अब आपको चिंतित होने की ज़रूरत नहीं है."
उनकी बात सुनकर इन्द्र पान मसाला से अपना मुंह खाली करते हुए इन्द्र ने कहा; "जल्दी बताईये देवर्षि. आपके हिसाब से क्या किया जा सकता है?"
नारद बोले; "हे देवराज, आज ही आप एक कम्यूनिटी ब्लॉग बनाईये. इस कम्यूनिटी ब्लॉग के मेम्बेर्स के नाम पर आप विश्वामित्र, शुक्राचार्य और तमाम राक्षसों का नाम दे दीजिये. इस ब्लॉग पर ख़ुद ही देवताओं को गाली देते हुए तीन-चार पोस्ट लिखिए. और कल ही अपने असली ब्लॉग पर इस ब्लॉग के ख़िलाफ़ पोस्ट लिखते हुए हल्ला मचा दीजिये कि विश्वामित्र तो राक्षसों के साथ मिल गए हैं. आप देखियेगा, दूसरे ही दिन विश्वामित्र सफाई देने के लिए अपने ब्लॉग पर न केवल पोस्ट लिखेंगे बल्कि आपके पोस्ट पर कमेन्ट भी लिखेंगे."
ऐसा ही हुआ. इन्द्र ने एक कम्यूनिटी ब्लॉग बनाया. ब्लॉग के मेंबर के रूप में विश्वामित्र के साथ-साथ शुक्राचार्य और राहु-केतु के नाम से पोस्ट भी लिख डाली जिनमें देवताओं को गाली दी गई थी.
इस कम्यूनिटी ब्लॉग को देखकर विश्वामित्र को अपनी सफाई देने के लिए अपने ब्लॉग पर पोस्ट लिखनी पडी. अब वे सफाई देने में जुट गए थे. उनकी तपस्या एक बार फिर से भंग हो चुकी थी.
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२०० वीं पोस्ट
वो क्या है जी, कि ये मेरे ब्लॉग पर पब्लिश होने वाली २०० वीं पोस्ट है. मुझे किसी भी हाल में ऐसी-वैसी, जैसी-तैसी एक पोस्ट लिखकर ये २०० वीं पोस्ट की ख़बर देकर बधाई लेनी थी. इसीलिए इस तरह की अगड़म-बगड़म पोस्ट लिख डाली.
मुझे पता है कि आपलोग ऐसी पोस्ट पढ़कर हलकान च परेशान होंगे. और सुबह-सुबह मन में गाली देंगे. लेकिन मैं क्या कर सकता हूँ? मुझपर जल्दी से जल्दी २०० वीं पोस्ट लिखने की धुन सवार थी.
इसलिए मन में गाली भले ही दें, टिपण्णी में बधाई देते जाईयेगा.
Monday, September 22, 2008
कृपया परमीशन धर्म का पालन करें......
अनुमति, जिसे बोल-चाल की भाषा में परमीशन कहते हैं, बड़ी जरूरी चीज होती है. जरूरी इसलिए कि लेनेवाले और देनेवाले दोनों को औकातोचित ऊंचाई प्रदान करती है. जिसे मिलती है, उसे कुछ करने की औकात का एहसास होता है और जो देता है वो यह सोचकर संतुष्ट होता है कि उसके पास भी औकात है कुछ देने की. लेकिन अगर परमीशन के लेन-देन का कार्यक्रम पूरी तरह से न संपन्न किया जाय तो बड़ी झंझट होती है.
होली के मौके पर दैनिक जागरण वालों ने मुझे मेल लिखकर मेरे कुछ लेख छापने की परमीशन लेनी चाही. परमीशन लेने की उनकी ये कवायद मुझे खुश कर गई. लगा जैसे मैं भी किसी को परमीशन देने की हैसियत रखता हूँ. मेरे पास परमीशन थी, सो मैंने उन्हें दे दिया. उनलोगों ने थोक में चार लेख छापने की परमीशन माँगी थी. सो मैंने उन्हें थोक में परमीशन दे दी. ये सोचते हुए कि क्या पता, भविष्य में कोई मांगे ही नहीं, इसलिए परमीशन लुटा दो. वैसे भी और कुछ नहीं है लुटाने के लिए.
उन्होंने लेख छापा. चार में से दो लेखों में अपने हिसाब से परिवर्तन कर दिया. बोले; "कार्टून लगाने के लिए लेख की काट-छाँट आवश्यक थी." उस समय पता चला कि बिना कार्टून के मेरे लेखों की कोई औकात नहीं है. चाहकर भी कुछ नहीं कह सका इन्हें. वैसे भी, छप गया तो कुछ कर भी नहीं सकते थे. लेकिन उनकी इस काट-छाँट और लेख के साथ छपे उनके कार्टूनों ने मेरी हैसियत की क्वालिटी मुझे अच्छी तरह से समझा दी. बाद में उनलोगों ने मुझे कुछ पैसे भी दिए. पैसे मिलने से लगा जैसे ये लोग मुझे काट-छाँट करने की कीमत अदा कर रहे हैं.
आप पूछ सकते हैं कि होली पर घटित इस घटना का जिक्र अब किस काम का? आपका प्रश्न उचित भी है. आख़िर होली पर लेख छपा था उसी समय एक पोस्ट लिखनी चाहिए थी. अखबार को स्कैन करते, एक पोस्ट लिखते. बधाई स्वीकार करते. बधाई मिलने से लेखों के कमपेंशेशन पैकेज की कीमत बढ़ जाने की संभावना रहती. लेकिन हाय री किस्मत. उस समय ये बात मन में आई ही नहीं. मौका हाथ से निकल गया.
लेकिन परमीशन वाली बात का जिक्र एक बार फिर से. शनिवार को अपने ताऊ जी ने मेरी पोस्ट पर टिपण्णी के रूप में मुझे बधाई दे डाली.
बोले; " आदरणीय मिश्राजी ! बहुत बधाई हो ! मैं आपकी इस पोस्ट पर टिप्पणी नही कर रहा हूँ !आपकी दुर्योधन की डायरी आज हमारे शहर से शाम को प्रकाशित होने वाले अखबार प्रभात किरण में प्रकाशित हुई है ! आपके नाम के साथ ! बधाई हो ! शायद आपकी जानकारी में होगा ! अगर नही हो तो आपको भिजवाता हूँ ! शुभकामनाएं !"
उनकी टिप्पणी पढ़कर मुझे अपनी हैसियत का पता चला. मतलब ये कि परमीशन दे देने से हैसियत का तो पता चलता है लेकिन अगर कोई परमीशन न मांगे तो? तो क्या? हैसियत का पता और अच्छे ढंग से चलता है.
मन में बात आई कि इसमें बेचारे ताऊ जी का क्या दोष? उन्हें तो लगा ही होगा कि उनके शहर के इस सांध्य दैनिक ने परमीशन धर्म का पालन किया ही होगा. हर जिम्मेदार करता है. लेकिन उनकी बधाई लेने के साथ-साथ मैं ज़मीन पर. कितना बेचारा लग रहा था मैं कि क्या कहूं?
मुझे लगा कैसे ढीठ लोग हैं? बिना मुझसे पूछे ही छाप लिया. परमीशन मांगकर एक बार थोडी खुशी ही दे देते. उनकी इस ढिठाई का कारण समझने की कोशिश की. मन में बात आई कि इनलोगों ने अनुमति लेना शायद इसलिए ज़रूरी नहीं समझा कि उन्हें मेरे ब्लॉग पर कहीं लिखा हुआ नज़र नहीं आया; 'इस ब्लॉग की सारी सामग्री शिव कुमार मिश्रा और ज्ञानदत्त पाण्डेय की संपत्ति है.'
कहने का मतलब ये कि केवल घर बनाने से काम नहीं चलने वाला. घर के सामने नाम की एक पट्टी लगानी ज़रूरी है. ये बताते हुए कि ये कुटिया जिसे आप देख रहे हैं, ये मेरी ही है. सामने वाले के लिए आपका घर में रहना आपको घर का मालिक तबतक नहीं बनाता, जबतक आप अपने नाम का शिलालेख घर पर नहीं चिपकाते.
अब ऐसे लोगों को कहूं भी तो क्या जिन्होंने सांध्य दैनिक का नाम 'प्रभात किरण' रखा है. "ऐसे लोगों की बुद्धि और व्यवहार कुशलता पर बलिहारी जाऊं" कहने के अलावा और कोई चारा नहीं.
ताऊ जी का बधाई संदेश सुनकर मैं ज़मीन पर गिरा ही था. अभी उठने की कोशिश कर ही रहा था कि ज्ञान भैया ने मुझे बताया कि अमर उजाला ने भी एक-दो बार मेरे लेख छाप लिए हैं. उन्होंने बताया; "मैंने सोचा कि तुमसे परमीशन लेने के बाद ही छापा होगा."
ज्ञान भैया की बात सुनकर मेरी हैसियत नई नीचाइयां नाप रही थी. हे भगवान, कैसे-कैसे दैनिक! कैसे-कैसे सांध्य दैनिक! अब छाप ही लिए थे तो एक बार मुझे ख़बर तो कर देते. कितने दिनों से इच्छा थी कि कहीं अखबार में मेरे बारे में कुछ छपे तो उसे स्कैन करके एक-दो पोस्ट लिखकर बधाई पात्र भरवा लूँ. लेकिन मेरी छोटी सी इच्छा की कीमत इन समाचार पत्रों के लिए कुछ भी नहीं.
अब क्या करता. ज्ञान भैया के ब्लॉग से वो सूचना कॉपी की जिसमें बताया जाता है कि इस ब्लॉग पर जो कुछ भी छपा है वो हमारा है. इसलिए आप अपनी इच्छा से यहाँ-वहां, जहाँ-तहां छापने की कोशिश न करें.अब मालिकाना हक़ की सूचना अपने ब्लॉग पर लगा दिया है.
ये सोचकर कि हो सकता है सूचना पढ़ने के बाद कोई बिना परमीशन लिए कुछ नहीं छपेगा.
Sunday, September 7, 2008
शिवकुमार मिश्र के प्रयत्न से फीड-यातायात में जबरदस्त उछाल!
मैं शिव की पिछले कुछ महीनों में ब्लॉग सक्रियता और लोकप्रियता में बढ़त से बहुत प्रभावित हूं। आज जब फीडबर्नर का आंकड़ा-ग्राफ देखा तो वास्तव में बहुत प्रसन्नता हुई। आप जरा यह ग्राफ देखें:
इसमें लाल लकीरें मैने इण्टरपोलेट की हैं। इसमें मुझे पहले कई प्लॉटॉओ (plateau -उच्च तल पर समतल) दीखते हैं:
सितम्बर’०७ से नवम्बर’०७ये प्लॉटॉओ बताते हैं कि विभिन्न दौरों में शिव ने काफी ब्लॉग-नींद निकाली!
जनवरी’०८ से मार्च’०८
मार्च’०८ से मई’०८
मई’०८ से जुलाई’०८ से कुछ पहले तक
पर उसके बाद तो पाठक/सबस्क्राइबर गतिविधि में तेज बढ़त नजर आती है। और उसके लिये मैं शिवकुमार मिश्र को बधाई देता हूं।
आप जरा इस ब्लॉग की सबसे अधिक पढ़ी गयी पोस्टों पर नजर डालें, जो फीडबर्नर ने बताई हैं:
यह मैं फीडबर्नर की साइट के चित्र से प्रस्तुत कर रहा हूं।
पोस्टों के लिंक निम्न हैं:
http://shiv-gyan.blogspot.com/2008/04/blog-post_25.html
http://shiv-gyan.blogspot.com/2008/05/blog-post_22.html
http://shiv-gyan.blogspot.com/2008/02/blog-post.html
http://shiv-gyan.blogspot.com/2008/04/blog-post_24.html
http://shiv-gyan.blogspot.com/2008/05/blog-post_17.html
http://shiv-gyan.blogspot.com/2008/05/blog-post_15.html
http://shiv-gyan.blogspot.com/2007/09/blog-post_24.html
http://shiv-gyan.blogspot.com/2007/10/blog-post_12.html
http://shiv-gyan.blogspot.com/2008/08/blog-post_28.html
http://shiv-gyan.blogspot.com/2008/05/blog-post_29.html
यह पोस्ट ज्ञानदत्त पाण्डेय ने प्रस्तुत की है। शिवकुमार मिश्र से बिना सलाह के। और इसे मेरी शिवकुमार की ब्लॉग-प्रगति पर मुग्धता का प्रतीक माना जाये!
Thursday, September 4, 2008
बहस
- क्या कर रहे हो?
- सोच रहा हूँ.
- तुम सोचते भी हो!
- हाँ.
- वैसे, क्या सोच रहे थे?
- सोच रहा हूँ एक बहस चला दूँ.
- क्यों?
- बहुत दिन हुए कोई बहस नहीं चली.
- बहस को बैठे रहने दो न.
- कितने दिन बैठेगी? बैठे-बैठे थक जायेगी.
- वैसे क्यों चलाते हो बहस?
- दूसरों की ज्ञान-वृद्धि के लिए.
- और तुम्हारी ज्ञान-वृद्धि?
- अब चरम सीमा पर है.
- तो क्या इम्प्रूवमेंट का कोई चांस नहीं?
- और कैसा चांस? लबालब है.
- वैसे कौन सा मुद्दा खोजा?
- अभी तय नहीं किया.
- तय कैसे करोगे?
- सोलह मुद्दों को पेपर पर लिखकर आँख बंद करके पेंसिल रखता हूँ. जिसपे पेंसिल वही मुद्दा.
- तो क्या-क्या मुद्दे लिखे इसबार पेपर पर?
- वो नहीं बताऊँगा.
- अरे पूरे सोलह नहीं तो आठ ही बता दो.
- क्यों? तुम जानकर क्या करोगे?
- मैं टिप्पणियां तैयार कर लूँगा.
- बिना जाने कि क्या लिखा रहेगा बहस में?
- तुम केवल मुद्दा बता दो. क्या लिखा रहेगा, मैं तय कर लूँगा.
- मैं मुद्दों को गोपनीय रखना चाहता हूँ.
- ओह, सरप्राईज. है न?
- वही समझ लो.
- वैसे बहस का मकसद क्या है?
- आनेवाली पीढ़ी को सुधारना है.
- और अपनी पीढ़ी का सुधार?
- अपनी पीढ़ी ख़ुद सुधर जायेगी.
- कैसे?
- बहस में हिस्सा लेकर.
- लेकिन आजतक तो हमेशा अंतर्राष्ट्रीय मुद्दे ही उठाते आए हो. फिर अपने देश के लोगों का भला?
- अपना देश, पराया देश की बात मत करो. अब हम ग्लोबल सिटिज़न हैं.
- ओह, तो इसीलिए पिछली बार चिली की हरी मिर्च पर बहस चलाई थी?
- हाँ. आख़िर सबकुछ ग्लोबल है. ऐसे में कौन कहाँ की मिर्च खा ले, किसे पता.
- फिर भी, इस बार के मुद्दे बता देते तो सुविधा रहती न. टिप्पणी बैंक तैयार करने में सुभीता रहता.
- तो सुनो.
- हाँ-हाँ. बताओ बताओ.
- तेल का खेल, अफ्रीका की भूख, क्यूबा की बाक्सिंग, राजनीति में धर्म की मिक्सिंग, आशाराम बापू, अफगानिस्तान में साम्राज्यवाद, आज का इलाहबाद, बम वाला सूरत, गणेश की मूरत, कबीर और तुलसी, फिलिस्तीन में मातमपुर्सी..
- बस-बस. मैं समझ गया. ठीक है चलता हूँ मैं.
- अरे क्या हुआ? कहाँ चल दिए?
- घर जाकर ढेर सारी टिप्पणियां लिखकर अभी से रखनी हैं. ओके बाय..
Monday, August 11, 2008
ब्लॉगर प्रोफाइल - लालमुकुंद जी के विचार
ब्लॉगर की प्रोफाइल बड़ी मारक चीज होती है. उसके ऊपर ब्लॉगर अगर अपनी हिन्दी का हो तो प्रोफाइल के मार करने की क्षमता कई गुना बढ़ जाने का चांस रहता है. ब्लॉगर ने बीए, एमए में भले ही इतिहास, भूगोल, अंग्रेज़ी, हिन्दी जैसे विषयों की पढाई की पढाई की हो लेकिन जब प्रोफाइल लिखने की बात आती है तो जिस विषय पर सबसे पहले हाथ फेरता हैं वह है दर्शनशास्त्र. कोशिश रहती है कि अपने बारे में कुछ ऐसा लिख दिया जाय कि पढने वाले को लगे कि उसकी आँखें अचानक जेठ की दुपहरिया के सूरज से टकरा गई हैं. ऐसा कुछ लिख देने की ललक रहती है जिससे पढ़नेवाले को पता चल जाए कि आदमी ऊंची सोच वाला है. ऊंची सोच मतलब माडर्न आर्ट समझता है, सत्यजीत रे की फिल्में न केवल देखता है बल्कि समझता भी है और बचपन से ही ऋत्विक घटक जैसे लोगों के संपर्क में था.
हुआ ऐसा कि कल लालमुकुंद जी मिल गए. बता रहे थे कि हाल ही में उनकी मुलाक़ात ऐसे ही एक ब्लॉगर प्रोफाइल से हो गई. लालमुकुंद थोड़े तैश में थे. मुझसे कहने लगे; " अब क्या बताऊँ तुम्हें, कि क्या लिखा था. लिखा था 'मैं ख़ुद को खोजने निकल पड़ा हूँ. कितना खोज पाया हूँ, यह तो नहीं पता लेकिन कोशिश जारी है. यह खोजने की, कि ख़ुद को किस हद तक खोज पाया." आगे बोले; " आँख रगड़-रगड़ कर पढा मैंने. लगा कि बीच-बीच में पानी भी मार लूँ तो शायद समझ में आ जाए. लेकिन इस खोज नामक शब्द की भूल-भुलैया में ऐसा फंसा है कि निकलने की कोई तरकीब समझ नहीं आ रही थी."
इतना उखड़े हुए थे कि पूछिए मत. आगे मुझसे बोले; " इच्छा तो हुई कि ब्लॉगर जी सामने मिलते तो पूछ लेता कि प्रभु, ख़ुद को क्यों खोज रहे हैं? कितने दिनों से खोये हैं? और अगर आपको पूरा यकीन हो ही गया है कि आप खो गए हैं तो चिंता न करें. अभी तक तो आपके घर वालों ने आपके गायब होने की रपट किसी थाने में लिखा ही दी होगी. अब आप ख़ुद न खोजें, पुलिस आपको खोजकर आपके घरवालों के हवाले कर देगी......हम तो आए थे आपके बारे में जानने के लिए. यह जानने के लिए कि आप कहाँ रहते हैं? आप क्या करते हैं? आपकी पसंद क्या है? लेकिन अब तो हमें लग रहा है कि हमारा आना ही व्यर्थ हुआ. आप जब ख़ुद ही ख़ुद को खोज रहे हैं तो अपने बारे में बताएँगे भी क्या?"
हम लालमुकुंद जी की शिकायत वैसे ही सुन रहे थे जैसे गृहस्थगति को प्राप्त कोई व्यक्ति शाम को घर पहुंचकर टीवी देखते-देखते पत्नी से घर की समस्याओं के बारे में सुनता है. लालमुकुंद थे कि रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे. एक और ब्लॉगर प्रोफाइल के बारे में शुरू हो गए. बोले; "तुम्हें क्या बताऊं? एक और ब्लॉगर प्रोफाइल देखी मैंने. देखकर लगा जैसे गुलज़ार साहब और जद्दू कृष्णमूर्ति ने मिलकर लिखा है."
मैंने कहा; "क्यों, ऐसा क्या लिखा था उसमें?"
मेरी बात सुनकर और उत्तेजित हो गए. अचानक शर्ट की जेब में हाथ डालते हुए बोले; "सुनोगे? रुको मैं लिखकर ले आया हूँ. हाँ, तो सुनो. इसमें लिखा है; 'बचपन से ही बिखरे शब्दों को बटोरने का प्रयास कर रहा हूँ. शब्द हैं कि पकड़ में ही नहीं आते. कभी हवा के झोंके के साथ उड़ चलते हैं तो कभी कागज़ की नाव में बैठे बरसात में जमें पानी पर तैरते निकल जाते हैं. कई बार तो शब्दों को आसमान से गिरते देखा. जब भी बाँधने का प्रयत्न किया, हाथ से फिसल गए. दूर पहुँच मुझे चिढ़ाते हैं. फिर एक दिन दादी ने बताया कि आसान नहीं है शब्दों को बाँधना. कठिन ही सही लेकिन शब्दों को पकड़ने की कवायद अभी तक जारी है. दो-चार एक साथ पकड़ पाता हूँ तो उन्हें मिलकर वाक्य बनाने की कोशिश करता हूँ."
इस ब्लॉगर की प्रोफाइल पढ़कर मुझे हंसी आ गयी. मुझे हँसता देख लालमुकुंद बिदक गए. बोले; "तुम्हें हंसी आ रही है! तुम बताओ, ये प्रोफाइल है? न तो ब्लॉगर के शहर का पता चलता है. न ही ये पता चलता है कि करते क्या हैं?"
मैंने कहा; "ऐसा हो ही सकता है. ये ब्लॉगर शायद कवि हैं. शब्दों के बारे में इस तरह से कोई कवि ही लिख सकता है."
बोले; " हाँ, ठीक पहचाना तुमने ये कवि ही हैं."
मैंने कहा; "देखो कवि का ब्लॉग है. इस ब्लॉगर के पास कवि का ह्रदय है. तो ऐसा होगा ही कि ये प्रोफाइल में भी कविता ही लिखेगा."
मेरी बात सुनकर बोले; "अरे भाई कविता करने के लिए तो पूरा ब्लॉग पड़ा है. दिन में कम से कम तीन-चार कवितायें लिखते है ब्लॉगर कवि. इतनी कविता तो मैथिलीशरण और दिनकर जी भी एक दिन में लिखते होंगे, इस बात पर डाऊट है. और फिर कविता तो रोज ही लिखते हैं. प्रोफाइल तो एक बार लिखा जाता है. तो भइया प्रोफाइल में तो अपने बारे में लिखे."
मैंने कहा; "ऐसा एक-दो केस में दिखा होगा आपको. हर केस में थोड़े न मिलेगा."
मेरी बात सुनकर भड़क गए. बोले; "एक-दो केस? मुझे तो सब जगह ऐसा ही लिखा मिला. एक और ब्लॉगर- कवि का प्रोफाइल देखा. लिखा था; शब्द मेरे लिए आसमान हैं. शब्द मेरे लिए तारे हैं. शब्द मेरे लिए बादल हैं. मुझे इस बात का यकीन है कि दुनियाँ शब्दों से बनी है. शब्द न रहें तो कुछ भी न रहेगा. न तो ये आसमान, न बादल, न तारे और न ही सूरज. नहीं रहेंगे ये पेड़, ये पत्ते और ये झंझावात. कहाँ मिलेगी ज़मीन और कहाँ मिलेगी मिटटी? समुंदर नहीं मिलेगा और न ही मिलेगा अमृत. गरल को गले से नीचे उतरते देखेंगे और खोजेंगे जीवन के उस रास्ते को जो सीधा चाँद तक जाता है.क्योंकि शब्दों से बनी इस दुनियाँ में अगर कुछ जिन्दा रहेगा तो वह है एहसास. एक ऐसा एहसास जिसे शब्दों की तलाश रहती है. और अगर शब्द मर गए तो एहसास मर जायेगा."
इस ब्लॉगर-कवि की प्रोफाइल पढ़ते-पढ़ते बोले; "तुम्ही बताओ. ऐसे ब्लॉगर-कवि के बारे में जानना हो तो मुझ जैसा पाठक कहाँ जाए? अरे दिनकर, बच्चन और गुप्त जी की किताबों पर भी उनकी जीवनयात्रा के बारे में लिखा रहता है. यहाँ तक लिखा रहता है कि इनलोगों ने कहाँ-कहाँ की विदेश यात्राएं की. लेकिन ब्लॉगर-कवि के बारे में उन्ही की प्रोफाइल पर किसी दर्शनशास्त्र की किताब का आठवां अध्याय लिखा हुआ मिलता है. ये ठीक है क्या?"
मैंने कहा; "बात तो आपकी ठीक है. हमलोगों को प्रोफाइल के मामले में कुछ करना चाहिए."
मुझे लगा मेरी इस बात पर कुछ ठंडा होंगे लेकिन वे तो और तैश में आ गए. मुझसे बोले; " तुम क्या करोगे? तुम करोगे भला. दूसरों की क्यों, ख़ुद अपनी प्रोफाइल के बारे में सोचो. क्या लिखा है ये; कविता - हिन्दी और उर्दू में रूचि. परसाई और दिनकर के भीषण प्रशंसक....तुम्हें क्या लगता है? दिनकर और परसाई का नाम लेकर दूसरों को इम्प्रेस कर लोगे क्या? पढ़कर लगता है जैसे किसी कस्बे के छुटभैया नेता ने किसी राष्ट्रीय पार्टी के अध्यक्ष के साथ खिचाई अपनी तस्वीर को ड्राईंग रूम में लगा रखा है जिससे सबको इम्प्रेस कर सके."
उन्होंने अपने कमेन्ट से मुझे भी ढेर कर दिया. लालमुकुंद जी के साथ ब्लॉगर प्रोफाइल के और हिस्से पर चर्चा शुरू हुई. मुझसे बोले; "जिसे देखो उसी ने प्रोफाइल में लिख दिया है पसंदीदा फ़िल्म दो आँखें बारह हाथ, दो बीघा ज़मीन और नवरंग. इन लोगों में से किसी से भी पूछ लो कि आपने पिछले तीन सालों में इन फिल्मों के दर्शन कितनी बार किए? कोई अगर ये कह दे कि उसने दो बार भी देखा तो मैं मान जाऊंगा.........
खैर, लालमुकुंद जी के साथ ब्लॉगर प्रोफाइल ही नहीं, ब्लॉगर की ब्लागिंग के किस्से हम फिर सुनायेंगे.....
Monday, May 26, 2008
सेण्टिया गये हैं शिवकुमार
मेरे लिये जूझने को उद्धत। पर औरों की जूतमपैजार देख कर सेण्टिया गये हैं शिव कुमार। और मैं साफ कहूंगा कि यह जमा नहीं।
हिन्दी ब्लॉग जगत में लतखोरई नई बात नहीं है। लोग साथ चलते हैं, बात करते हैं, फिर लात चलाते हैं। ये कोशिश करते हैं कि लात उनकी तो चल जाये पर दूसरा जब चलाये तो बैलेंस बिगड़ जाये उसका, और वह गिरे धड़ाम। यह तो कॉमन डिनॉमिनेटर है हिन्दी (चिर्कुट) ब्लॉग धर्म का।
मैं तो केवल सलाह ही दे सकता हूं, कई क्षेत्र अपने लिये निषिद्ध कर लेने चाहियें ब्लॉगजगत में। अव्वल तो वह न पढ़ें। पढ़ने के लिये वैसे ही बहुत बैकलॉग है। दूसरे अगर पढ़ें भी तो निस्पृहभाव से - नलिनीदलगतजलमतितरलम! कमल से बून्द ढ़रक जाये - ऐसे।
और बाकी भी कित्ता काम बाकी है - लक्ष्य की साइट बनी नहीं। वो प्रॉजेक्ट का क्या हुआ? मेरा पोर्टफोलियो देखे कितने दिन हो गये। शूगर स्टॉक का क्या सीन है। दुर्योधन की डायरी के जो पन्ने मैने दिये थे, उनका अनुवाद कितना धीरे चल रहा है?! बाकी पन्ने किसके पास भेज दूं??!
खैर, मैं यह इस लिये लिख रहा हूं कि इस ब्लॉग पर मेरी भी पांच परसेण्ट की शेयरहोल्डिंग है। और मेरे पार्टनरशिप में यूंही नैराश्य नहीं उंडेल सकते बिना जॉइण्ट पॉलिसी डिसीशन लिये!
Sunday, May 25, 2008
नक्शा उठाकर कोई नया शहर ढूढिये
साहित्यकार ब्लॉगर से नाराज हैं. ब्लॉगर साहित्यकार से नाराज हैं. ब्लॉगर दूसरे ब्लॉगर से नाराज हैं. ब्लॉगर कमेंट करने वाले से नाराज हैं. हालत बड़ी ख़राब है. एक दूसरे के ऊपर व्यक्तिगत आक्षेप लगाने की होड़ लगी हुई है. दोस्त दुश्मन बन गए हैं. दुश्मन दोस्त बन रहे हैं. दो कौड़ी का ईगो लिए लोग एक दूसरे के ख़िलाफ़ पोस्ट और टिपण्णी लिख रहे हैं. जिसके पास सोलह आने का ईगो है उसके तो क्या कहने.
(यहाँ मैं ईगो की बात इसलिए कर रहा हूँ, क्योंकि मैं ख़ुद इस ईगो की वजह से पहले इस तरह की स्तिथि से गुजर चुका हूँ.)
कुछ टिप्पणियां तो इतनी ख़राब हैं कि सोचने पर विवश कर दिया है कि टिकें या नहीं? स्तिथि बिल्कुल नियंत्रण में नहीं है. इसलिए ख़तरा टलने की बात करें भी तो कैसे.
हमें एक बार सोचना चाहिए. लिखने वाले ने ये दो शेर आज शाम को तो नहीं लिखे?
नक्शा उठाकर कोई नया शहर ढूढिये
इस शहर में तो सबसे मुलाकात हो गई
या फिर;
जिसको भी देखना हो कई बार देखना
हर आदमी में बंद हैं दस-बीस आदमी
बड़ी अजीब बात लग रही है मुझे. आजतक कभी रात के इस समय पोस्ट नहीं लिखी. वैसे ये पोस्ट है भी नहीं. लेकिन पिछले दो दिनों से कुछ मुसीबत की वजह से आज करीब आधा घंटा पहले ही ब्लाग्स देखने का समय मिला. नतीजा? ये 'पोस्ट' है.
Friday, February 1, 2008
और जूनियर प्रगतिशील ने विरोध कर डाला
सीनियर प्रगतिशील कम्यूनिस्ट भिन्नाये हुए थे. जूनियर ने उनकी बात नहीं मानी. सीनियर ने विरोध करने के लिए कहा लेकिन जूनियर ने अनसुना कर दिया. इस बात का सीनियर के ऊपर ये असर हुआ कि उनका सिगरेट का सेवन बढ़ गया. सोते तो वैसे भी कम ही थे, लेकिन अब एक दम बंद कर दिया था. कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि इस जूनियर को कैसे समझाये. जब कम्यूनिस्ट को कुछ समझ में नहीं आता तो वह चीन का रुख कर लेता है. लिहाजा इस सीनियर ने भी वहीं का रुख किया. अपने दोस्त हू लाऊ लाऊ को चीन में फ़ोन किया. उसे मामले की जानकारी दी. उससे राय भी मांगी कि जूनियर के इस व्यवहार पर क्या किया जा सकता है. हू लाऊ लाऊ ने उसे बाबा मार्क्स की शरण में जाने को कहा.
सीनियर प्रगतिशील कम्युनिस्ट ने जाकर बाबा मार्क्स से शिकायत कर दी. बोले; "बाबा, इस जूनियर प्रगतिशील को समझाओ. भटक गया है ये. इतनी किताबें पढ़ी इसने लेकिन रह गया नादान का नादान. आप ही बताईये, जहाँ मैंने इसे विरोध करने के लिए कहा, वहाँ इसने विरोध नहीं किया. और तो और, लोगों को यहाँ तक बता डाला कि इसकी पत्नी अच्छा खिचड़ी पकाती है. आप मेरी शिकायत सुनिए और ख़ुद ही फैसला कीजिये, पत्नी खिचड़ी पकाती है, इस बात को मानकर इसने क्या बुर्जुआ संस्कृति को बढावा नहीं दिया?"
बाबा मार्क्स अपनी दाढ़ी खुजलाते हुए कुछ सोचने लगे. बोले; "क्या जूनियर, ये सीनियर जो कह रहा है, क्या सही कह रहा है?"
जूनियर की घिघ्घी बंध गई. बाबा के सवाल से सकपका गया. अपनी सफाई देते हुए बोला; "अच्छा बाबा, आप ही सोचिये, थोड़ा बहुत तो लोगों से व्यवहार भी ठीक रखना चाहिए. और फिर हमारे बाकी के कामरेड तो विरोध कर ही रहे थे. और तो और मानस ने भी एक बार फिर से कामरेडी का चोला पहन लिया. अब इसमें मैंने विरोध नहीं किया तो कोई ख़ास बात नहीं है."
जूनियर की बात सुनकर सीनियर प्रगतिशील को और गुस्सा आ गया. बोला; "मुझे देखो, मैंने विरोध में कितने लेख लिखे. कवितायें तक लिख डाली. वो भी इसके बावजूद कि मैंने सार्वजनिक तौर पर घोषणा कर डाली थी कि गजल और कविता में मेरी ज्यादा दिलचस्पी नहीं है."
सीनियर की बात सुनकर बाबा मार्क्स प्रसन्न हो गए. बोले; "तुम एक दम सही जा रहे हो सीनियर. असली साम्यवादी वही होता है जो अपनी बात को ही झुठला दे."
बाबा की बात पर सीनियर का सीना चौडा हो गया. बोला; " इस जूनियर ने अपने ब्लॉग पर से अपनी दाढ़ी वाली तस्वीर तक हटा डाली. आप ख़ुद ही सोचिये, एक कामरेड ऐसा करेगा तो शक नहीं होगा? अरे जूनियर, मुझे देख, मैंने हाल ही में अपने ब्लॉग पर तस्वीरों की संख्या भी बढ़ा दी है. दाढी वाली, बिना दाढी वाली, सिगरेट पीते हुए, सोचते हुए, सब तरह की तस्वीरें हैं. और मैंने लिखते हुए, क्या-क्या लेबल दे डाले हैं. पतनशील साहित्य. आहा. बाबा आप इस जूनियर को समझाईये, ये अगर विरोध नहीं करेगा तो भारत से तो कम्यूनिज्म और प्रगतिशीलता जाती रहेगी."
बाबा ने कुछ देर सोचा. दाढी खुजलाई और सिगरेट का कश लेते हुए प्रवचन शुरू कर दिया; "देखो जूनियर, तुम्हारे कामरेड साथी सही कह रहे हैं. विरोध नहीं करोगे तो तुम्हारी सोच को जंग लग जायेगा. तुमने ब्लॉग पर से अपनी दाढ़ी वाली तस्वीर हटा कर भी अच्छा नहीं किया. और ये क्या, तुमने सबको ये भी बता दिया कि तुम्हारी पत्नी खिचड़ी अच्छा बनाती है. ये सारी बातें तो प्रगतिशीलता की राह में रुकावट लग रही हैं."
जूनियर ने फट से बालों में पूरी की पूरी दसों उंगलियाँ घुसेड दी. सिर नीचे करते हुए कुछ सोचता रहा. कुछ समय बाद सिर उठाकर बोला; "बाबा, पत्नी खिचड़ी बनाती है, वह तो केवल कहने के लिए कह दिया. लेकिन मैं हूँ तो असली प्रगतिशील कामरेड. पत्नी खिचड़ी बनाए तो बनाए, मैं तो चौपाटी पर जाकर भेलपूरी ही खाता हूँ. भेलपूरी खाने से प्रगतिशीलता और कम्यूनिज्म, दोनों पर आंच नहीं आती. आप ये भी तो देखिये कि मैंने सार्वजनिक तौर पर एलान कर दिया है कि मैंने पढाई के नाम पर टाइम पास किया है. आप ही बताईये, और क्या कहे एक प्रगतिशील कम्यूनिस्ट?"
उसकी बात सुनकर बाबा सोच में पड़ गए. कुछ देर सोचने के बाद बोले; "देखो जूनियर, ये सब तो ठीक है. लेकिन कोई न कोई बात तो इस सीनियर को खटक रही है. मेरा सुझाव है कि इसकी बात मानो और विरोध कर डालो."
जूनियर ने बाबा की बात मान ली. और लिख डाला. प्रगतिशीलता और कम्यूनिज्म को जिंदा जो रखना था. लेकिन एक बात है, जूनियर ने अपने लेख में प्रेज करते हुए विरोध किया. देखना है सीनियर खुश होता है या और कुछ करता है.
Saturday, January 26, 2008
ज्ञान भैया, आपके लिए मेरे पास कुछ सुझाव हैं
हमारे ज्ञान भैया भी गजब हैं. पिछले तीस सालों से हमारी भाभी से चाय बनवा कर पीते हैं और उन्हें ये पता नहीं कि उनकी इस हरकत की वजह से दुनियाँ भर की औरतों के साथ अत्याचार हो रहा है. मजे की बात ये कि अपना अपराध कुबूल भी कर रहे हैं. वो भी ऐसी पोस्ट में जो सबकी समझ में आए. अब भैया जब पोस्ट सबकी समझ में आएगी तो उसपर टिप्पणियां भी आएँगी ही. और जब आएँगी तो बचना मुश्किल होगा ही. वैसे भी इस केस में केवल टिपण्णी से काम चलना मुश्किल था लिहाजा लोगों को पोस्ट तक लिखनी पडी.
मैंने कई बार भैया से कहा है कि ऐसी पोस्ट लिखते ही क्यों हैं, जो सबकी समझ में आ जाए. ऊपर से ऐसे मुद्दों पर लिखते हैं जिनके बारे में सब जानते हैं. अरे भैया, मैं कहता हूँ कि आपको कलकत्ते में होने वाली मीटिंग की फोटो लगाकर पोस्ट लिखनी ही क्यों? और फिर आप किसी समस्या पर डिस्कशन करना ही चाहते हैं तो आठ-दस साल और इंतजार कीजिये. रिटायर होने के बाद ये सारी समस्याओं की लिस्ट लेकर कहीं कोलोम्बिया, ब्राजील, चीन, उज़बेकिस्तान जैसी जगह चले जाईयेगा और वहाँ के लोगों के साथ भारत की आजकी समस्याओं को डिस्कस कर लीजियेगा. कौन रोकता है आपको. डिस्कशन करने से जो निष्कर्ष निकलेगा, उसे पोस्ट दर पोस्ट ठेलते रहियेगा. चाहे वहीं से या फिर भारत आने के बाद. भारत आ गए तो मेरी कोलोम्बिया यात्रा-भाग ५२७ तक ठेलते रहें. अज़दक जी से कुछ सीखिए. देखा नहीं आपने, चीन के एक नदी के किनारे बसे होनसीसी गांव में बैठकर वहाँ की एक बुढ़िया हूँचीची के साथ बिहार के चम्पारण जिले की समस्याएं डिस्कस कर आए. हाल ही में मुम्बई में बैठे-बैठे रूस से आए ब्रजनेव के पोते कसेल्निकोव के साथ भारत की पानी की समस्या डिस्कस किया है उन्होंने. ऐसा कुछ कीजिये.
नेरुदा आपकी समझ में नहीं आते फिर भी उनके बारे में लिखिए, बोलिए. उनकी कवितायें ठेलिए पोस्ट दर पोस्ट. आप रहते थे इलाहबाद के शुकुलपुर गाँव में लेकिन सबको ये बताईये कि आपने बचपन में ही इटली के महान फिल्मकार की १९५० में बनाईं गई फ़िल्म देख ली थी और इस फ़िल्म पर आप पीएचडी कर चुके हैं. आप लोगों को ये बताईये कि जॉर्ज बर्नाड शा के नाटक मैन एंड द सुपरमैन और आर्म्स एंड द मैन की सबसे बढ़िया व्याख्या आपने की है. किसी माडर्न आर्ट के 'पेंटर' की बनाईं गई 'जलेबी' को अपनी पोस्ट पर छापिये और लोगों को ये बताईये कि ये पेंटिंग आपको इस आर्टिस्ट ने भेंट में दी थी. पूरे साल भर पोस्ट में ऐसी भाषा लिखिए जो पाठक तो क्या पाठक की माँ (बाप इसलिए नहीं लिख रहा कि इसको लेकर भी बवाल न खडा हो जाए) की समझ में भी न आए. लेकिन जब किसी को गाली देना हो तो ऐसी भाषा लिखिए तो सबकी समझ में आए.
और आप हैं कि अपने घर और अपनी सच्ची सोच के बारे में पोस्ट ठेल रहे हैं. वो भी ऐसी जो सबकी समझ में आए. थोड़ा मेहनत करके एक 'डुयल पर्सनालिटी' तैयार नहीं कर सकते? माफ़ कीजियेगा, अगर ऐसा नहीं कर सकते तो फिर आप असली ब्लागिंग के लायक कतई नहीं हैं. और छोड़ दीजिये ये ब्लागिंग वागिंग. और हाँ, जो भी लिखिए बहुत सोच-समझ के लिखिए. हो सके तो लिखिए ही मत. क्योंकि आपकी लिखी हुई पोस्ट की एक भी लाइन लोगों को नागवार गुज़री तो भारत का सत्यानाश हो जायेगा. आपको सोचना चाहिए कि आपका लिखा हुआ शाश्वत है. आनेवाले समय में ये कोर्स की किताबों में पढाया जायेगा और इसे छात्रों ने पढ़ा तो भारत का भविष्य चौपट हो जायेगा.
और फिर केवल अज़दक जी से ही क्यों, प्रत्यक्षा जी से भी कुछ सीखिए. अभय भाई ने अपने ब्लॉग पर इन दोनों को शब्द धनी बताया है. देखा नहीं कि प्रत्यक्षा जी मिसेज मजुमदार के बारे में पूरी की पोस्ट लिख डालती हैं. लेकिन क्या लिखती हैं वह मिसेज मजुमदार की माँ की भी समझ में नहीं आएगा. लेकिन अगर आपकी पोस्ट पर आपको धिक्कारने की बात आती है तो ऐसी भाषा लिखती हैं जो गली का कुत्ता भी पढे तो समझ जाए. प्रमोद जी ने अपनी ही पोस्ट में उन्हें हरियाणा में औरतों के साथ होनेवाले जुल्म को लेकर कुछ कहा है. मुझे भी समझ में नहीं आया कि वे कभी वहाँ की औरतों के साथ हो रहे अत्याचार के बारे में क्यों नहीं लिखती? खैर, ये उनका अपना मामला है.
इसलिए भैया, मेरा तो यही कहना है कि आप ख़ुद को बदलिए. ट्राई कीजिये कि ऐसा कुछ लिखिए जो लोगों की समझ में न आए. कम से कम गालियाँ खाने की नौबत तो नहीं आएगी.
