इन्द्र परेशान बैठे थे. माथे पर 'तिरशूल' के जैसे तीन-तीन बल पड़े हुए थे. बहुत कोशिश करने के बाद भी विश्वामित्र की तपस्या इस बार भंग नहीं हो रही थी. मेनका लगातार बहत्तर घंटे डांस करके अब तक गिनीज बुक में नाम भी दर्ज करवा चुकी थी लेकिन विश्वामित्र टस से मस नहीं हुए. मेनका के हार जाने के बाद उर्वशी ने भी ट्राई मारा लेकिन विश्वामित्र तपस्या में ठीक वैसे ही जमे रहे जैसे राहुल द्रविड़ बिना रन बनाए पिच पर जमे रहते हैं. उधर मेनका और उर्वशी से खार खाई रम्भा खुश थी.
इन्द्र को समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या किया जाय. दरबारियों और चापलूसों की मीटिंग बुलाई गई. मीटिंग बहुत देर तक चली. बीच में लंच ब्रेक भी हुआ. आधे से ज्यादा दरबारी केवल सोचने की एक्टिंग करते रहे जिससे लगे कि वे सचमुच इन्द्र के लिए बहुत चिंतित हैं. काफी बात-चीत के बाद एक बात पर सहमति हुई कि इन्द्र को उनके मजबूत पहलू को ध्यान में रखकर ही काम करना चाहिए. दरबारियों ने सुझाव दिया कि चूंकि इन्द्र का मजबूत पहलू डांस है सो एक बार फिर से डांस का सहारा लेना ही उचित होगा. डांस परफार्मेंस के लिए इस बार रम्भा को चुना गया. मेनका और उर्वशी इस चुनाव से जल-भुन गई. लेकिन कुछ किया नहीं जा सकता था. रम्भा ने तरह तरह के शास्त्रीय और पश्चिमी डांस किए लेकिन विश्वामित्र जमे रहे. उन्होंने रम्भा की तरफ़ देखा भी नहीं. हीन भावना में डूबी रम्भा ने एक लास्ट ट्राई मारा. मशहूर डांसर पाखी सावंत का रूप धारण किया और तीन दिनों तक फिल्मी गानों पर डांस करती रही लेकिन नतीजा वही, धाक के तीन पात. रम्भा को वापस लौटना पडा. रो-रो कर उसका बुरा हाल था. उसे अपनी असफलता का उतना दुख नहीं था जितना इस बात का था कि उर्वशी और मेनका अब उठते-बैठते उसे ताने देंगी.
प्लान फेल होने से इन्द्र दुखी रहने लग गए. सप्ताह में तीन चार दिन तो दारू चलती ही थी, अब सुबह-शाम धुत रहने लगे. लेकिन उनके प्रमुख सलाहकार को अभी तक नशे की लत नहीं लगी थी. काफी सोच-विचार के बाद वो एक दिन चंद्र देवता के पास गया. वहाँ पहुँच कर उसने पूरी कहानी सुनाई और साथ में चंद्र देवता से सहायता की मांग की. चंद्र देवता की गिनती वैसे ही इन्द्र के पुराने साथियों में होती थी. सभी जानते थे कि चन्द्र देवता इन्द्र के कहने पर एक बार मुर्गा तक बन चुके थे. वे इन्द्र के लिए एक बार फिर से पाप करने पर राजी हो गए.
चंद्र देवता रात की ड्यूटी करते-करते परेशान रहते थे, सो वे बाकी का समय सोने में बिताते थे. लेकिन इन्द्र की सहायता की जिम्मेदारी जो कन्धों पर पड़ी तो नीद और चैन जाते रहे. दिन में भी बैठ कर सोचते रहते थे कि 'इस विश्वामित्र का क्या किया जाय. इन्द्र के सलाहकार को वचन दे चुका हूँ. इन्द्र को भी दारू से छुटकारा दिलाना है नहीं तो आने वाले दिनों में पार्टियों का आयोजन ही बंद हो जायेगा.' एक दिन बेहद गंभीर मुद्रा में चिंतन करते चंद्र देवता को 'नारद' ने देख लिया. देखते ही नारद ने अपना विश्व प्रसिद्ध डायलाग दे मारा; "नारायण नारायण, किस सोच में डूबे हैं देव?"
"अरे ऋषिवर, बड़ी गंभीर समस्या है. वही इन्द्र और विश्वामित्र वाला मामला है. इसी सोच में डूबा हूँ कि इन्द्र की मदद कैसे की जाए. वैसे, ऋषिवर आप से तो देवलोक, पृथ्वीलोक, ये लोक, वो लोक सब जगह घूमते रहते हैं. आप ही कोई रास्ता सुझायें. इस विश्वामित्र की क्या कोई कमजोरी नहीं है?"; चंद्र देवता ने लगभग गिडगिडाते हुए पूछा.
"नारायण नारायण. ऐसा कौन है जिसकी कोई कमजोरी नहीं है. वैसे आप तो रात भर जागते हैं, लेकिन आप भी नहीं देख सके, जो मैंने देखा"; नारद ने चंद्र देवता से पूछा.
"हो सकता है, आपने जो देखा वो मुझे इतनी दूर से न दिखाई दिया हो. वैसे भी आजकल जागते-जागते आँख लग जाती है. लेकिन ऋषिवर आपने क्या देखा जो मुझे दिखाई नहीं दिया?"; चंद्र देवता ने पूछा.
"मैंने जो देखा वो बताकर इन्द्र की समस्या का समाधान कर मैं ख़ुद क्रेडिट ले सकता हूँ. लेकिन फिर भी आपको एक चांस देता हूँ. आज रात को ध्यान से देखियेगा, ये विश्वामित्र एक से तीन के बीच में क्या करते हैं"; नारद ने चंद्र देवता को बताया.
रात को ड्यूटी देते-देते चंद्र देवता विश्वामित्र की कुटिया के पास आकर ध्यान से देखने लगे. उन्हें जो दिखाई दिया उसे देखकर दंग रह गए. उन्होंने देखा कि विश्वामित्र अपने ब्लॉग पर पोस्ट लिख रहे हैं. पोस्ट पब्लिश करके वे और ब्लॉग पर कमेंट देने में मशगूल हो गए. चंद्र देवता को समझ में आ गया कि नारद का इशारा क्या था.
दूसरे ही दिन इन्द्र के सलाहकार ने इन्द्र का एक ब्लॉग बनाया. ब्लॉग पर पहले ही दिन विश्वामित्र की निंदा करते हुए इन्द्र ने एक पोस्ट लिखी. साथ में विश्वामित्र के ब्लॉग पोस्ट पर उन्हें गाली देते हुए कमेंट भी लिखा. कमेंट और पोस्ट का ये सिलसिला शुरू हुआ तो विश्वामित्र का सारा समय अब पोस्ट लिखने, इन्द्र के गाली भरे कमेंट का जवाब देने और इन्द्र के ब्लॉग पर गाली देते हुए कमेंट लिखने में जाता रहा. उनके पास तपस्या के लिए समय ही नहीं बचा.
विश्वामित्र की तपस्या भंग हो चुकी थी. इन्द्र खुश रहने लगे.
Saturday, December 29, 2007
ब्लॉग महिमा
Friday, December 28, 2007
धमकी पुराण
एक दिन वामपंथी हिसाब लगाने बैठे. इस बात का नहीं कि नंदीग्राम में उन्होंने क्या किया बल्कि हिसाब इस बात का कि उन्होंने साल २००७ में कितनी बार कांग्रेस और केन्द्र सरकार को धमकी दी. हिसाब लगाकर इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि साल २००७ में बड़े नेता, छोटे नेता, महत्वपूर्ण नेता, बेकार नेता सभी नेताओं की धमकी को मिलाकर कुल तीन हजार सात सौ सत्ताईस धमकियाँ दी गईं. वामपंथियों ने अपने प्रदर्शन पर संतोष जाहिर किया. वे अपने प्रदर्शन पर प्रस्ताव पारित करने ही वाले थे कि एक नेता पूछ बैठा; "हमारी इन धमकियों का सरकार के ऊपर क्या असर हुआ?"
एक वरिष्ठ नेता ने बताया; "असर की देखें, तो कोई असर नहीं हुआ. और फिर हमारी धमकियों से कोई असर हो, ये जरूरी नहीं. धमकी देने से हमें जो फायदा हुआ, केवल उसके बारे में सोचना चाहिए."
"लेकिन हमने इस बात का हिसाब नहीं लगाया कि हमें इन धमकियों से क्या फायदा हुआ"; पहले नेता ने कहा.
फिर क्या था. एक कमिटी बना दी गई. उसे कहा गया कि वो इस बात का पता लगाए कि वामपंथियों को धमकियों से क्या फायदा हुआ. दो दिन बाद कमिटी ने अपनी रिपोर्ट में बताया;
हमने हमारे नेताओं द्वारा दी गई धमकियों की समग्र जांच की. अपनी जांच से हम इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि हमने जो धमकियाँ दी थी उससे हमें सबसे बड़ा फायदा ये हुआ कि धमकी देने की हमारी प्रैक्टिस होती रही. कुछ और फायदे हैं लेकिन कमिटी का मानना है कि उन फायदों को सार्वजनिक नहीं किया जाना चाहिए. कमिटी अपने सुझाव के तौर पर ये भी कहना चाहती है कि बदलाव के लिए हम कुछ दिनों के लिए सरकार को धमकी देना बंद कर दें.
कमिटी के सुझाव को मान लिया गया. दूसरे दिन ही वामपंथियों ने सार्वजनिक तौर पर घोषणा की कि वे नए प्रयोग के तहत अब से सरकार को धमकी नहीं देंगे. वामपंथियों की इस घोषणा से सरकार खुश हो गई. कांग्रेस पार्टी ने भी वामपंथियों की सराहना की. सरकार और पार्टी दोनों को विश्वास हो गया कि अब सरकार अपना काम शांति-पूर्वक करेगी.
अभी कुछ दिन ही बीते थे कि सरकार के कई मंत्रियों ने वामपंथियों की शिकायत करनी शुरू कर दी. एक मंत्री ने संवाददाता सम्मेलन में कहा; " पिछले पूरे एक साल से हमें वामपंथियों के धमकियों की आदत सी लग गई थी. उनकी धमकियों के बीच सरकार चलाने का अपना मज़ा था. जब भी वे धमकी देते थे तो हमें लगता था कि हम वाकई काबिल हैं जो उनकी धमकियों के बावजूद सरकार चला रहे हैं. लेकिन वामपंथियों ने धमकियों को बंद कर हमारे साथ अच्छा नहीं किया."
पत्रकार मंत्री जी के ऐसे बयान सुनकर दंग रह गए. उन्हें लगा कि ऐसा कैसे हो सकता है कि धमकी बंद होने की वजह से भी सरकार को परेशानी हो. एक पत्रकार ने मंत्री जी से पूछा; "लेकिन आपको तो खुश होना चाहिए कि वामपंथियों ने धमकी देना बंद कर दिया. अब तो आप चैन के साथ अपना काम कर सकते हैं."
मंत्री जी ने अपनी बात का खुलासा करते हुए कहा; "असल में वामपंथी जब धमकी देते थे तो हमें जनता से बहुत सहानुभूति मिलती थी. लोग ये सोचकर संतोष कर लेते थे कि वामपंथियों के दबाव के चलते सरकार अपना काम नहीं कर पा रही है. लेकिन जब से वामपंथियों ने धमकी देना बंद कर दिया है, जनता आए दिन सवाल करती है कि अब आप अपना काम क्यों नहीं करते? अब वामपंथियों ने धमकी बंद कर दी है. अब जनता को पता चल गया है कि हम अपना काम नहीं करते, वामपंथी धमकी दें या न दें."
पत्रकारों को अबतक मंत्री जी की बात समझ में आ गई थी.
सुनने में आया है कि सरकार ने वामपंथियों को धमकी देना शुरू कर दिया है. कुछ लोगों का मानना है कि सरकार ने वामपंथियों को धमकी दी है कि; 'आपलोग सरकार को धमकी देना फिर से शुरू कर दें नहीं तो हम आपका समर्थन आपको वापस दे देंगे.'
Wednesday, December 26, 2007
आयोजक? मैं तो चीफ गेस्ट हूं!
इलाहाबाद से आई-नेक्स्ट (i-next) अपना प्रकाशन शुरू करने जा रहा है। कल यह मार्केट में आयेगा। एक रुपये का नयी पीढ़ी का अखबार जिसमें २४ में से ९ पन्ने इलाहाबाद से सम्पादित होंगे।
इसके तैयारी के लिये मेरे बहनोई श्री राजीव ओझा कई दिनों से लखनऊ से यहां डेरा डाले हैं। पिछले एक सप्ताह से भी अधिक हो गया उनकी टीम को इलाहाबाद में अपनी तैयारी करते। कल वे हमारे घर में दोपहर में आये थे। उन्होंने एक रोचक वाकया बताया।
उनके रिपोर्टर अल्लापुर में हुये एक फ्लावर शो को कवर करने गये थे। पर वापस आ कर उन्होने कोई रिपोर्ट नहीं की। जब उन नये और उत्साही रिपोर्टर से जवाब-तलब किया गया तो उसने कहा कि बड़ा ’खतम’ कार्यक्रम था। वह समय से पंहुच गये थे कैमरे के साथ। पर वहां कोई नहीं था। तम्बू में एक मेज पर एक सज्जन सो रहे थे। उन्हे उठा कर रिपोर्टर ने पूंछा कि क्या वे फ्लवर शो के आयोजक हैं? शो पोस्टपोन तो नहीं हो गया है? सज्जन ऊंघते हुये बोले - "आयोजक? मैं तो चीफ गेस्ट हूं। शो के बाद यहां कवि सम्मेलन भी होने जा रहा है। उसमें मुझे कविता पाठ भी करना है।"
शो बहुत देर बाद शुरू हुआ।
हमने इस फ्लावर शो की खबर अखबार में पढ़ी। पांचवे पन्ने पर फूलों और देखने वालों के कलर फोटो और शो में आने वाले दर्जनों नामों के साथ। उस खबर से कहीं नहीं लगता था कि इतना ’खतम’ शो होगा!
पिछली पोस्ट: बापी दास का क्रिसमस विवरण
Tuesday, December 25, 2007
बापी दास का क्रिसमस विवरण
यह निबंध नहीं बल्कि कलकत्ते में रहने वाले एक युवा, बापी दास का पत्र है जो उसने इंग्लैंड में रहने वाले अपने एक नेट फ्रेंड को लिखा था. इंटरनेट सिक्यूरिटी में हुई गफलत के कारण यह पत्र लीक हो गया. ठीक वैसे ही जैसे सत्ता में बैठी पार्टी किसी विरोधी नेता का पत्र लीक करवा देती है. आप पत्र पढ़ सकते हैं क्योंकि इसमें ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे 'प्राइवेट' समझा जा सके.
प्रिय मित्र नेटाली,पहले तो मैं बता दूँ कि तुम्हारा नाम नेटाली, हमारे कलकत्ते में पाये जाने वाले कई नामों जैसे शेफाली, मिताली और चैताली से मिलता जुलता है. मुझे पूरा विश्वास है कि अगर नाम मिल सकता है तो फिर देखने-सुनने में तुम भी हमारे शहर में पाई जाने वाली अन्य लड़कियों की तरह ही होगी. तुमने अपने देश में मनाये जानेवाले त्यौहार क्रिसमस और उसके साथ नए साल के जश्न के बारे में लिखते हुए ये जानना चाहा था कि हम अपने शहर में क्रिसमस और नया साल कैसे मनाते हैं. सो ध्यान देकर सुनो. सॉरी, पढो.
हम क्रिसमस बड़े उत्साह के साथ मनाते हैं. थोडा अन्तर जरूर है. जैसा कि तुमने लिखा था, क्रिसमस तुम्हारे शहर में धूम-धाम के साथ मनाया जाता है, लेकिन हम हमारे शहर में घूम-घाम के साथ मनाते हैं. हमारे जैसे छोकरे बाईक पर घूमने निकलते हैं और सडकों पर चलने वाली लड़कियों को छेड़ कर क्रिसमस मनाते हैं. हमारा मानना है कि हमारे शहर में अगर लड़कियों से छेड़-छाड़ न की जाय, तो यीशु नाराज हो जाते हैं. और हम छोकरे अपने माँ-बाप को नाराज कर सकते हैं, लेकिन यीशु को कभी नाराज नहीं करते.
क्रिसमस का महत्व केक के चलते बहुत बढ़ जाता है. हमें इस बात पर पूरा विश्वास है कि केक नहीं तो क्रिसमस नहीं. यही कारण है कि हमारे शहर में क्रिसमस के दस दिन पहले से ही केक की दुकानों की संख्या अचानक बढ़ जाती है. ठीक वैसे ही जैसे बरसात के मौसम में नदियों का पानी खतरे के निशान से ऊपर चला जाता है. क्रिसमस के दिनों में हम केवल केक खाते हैं. बाकी कुछ खाना पाप माना जाता है. शहर की दुकानों पर केक खरीदने के लिए जो लाइन लगती है उसे देखकर हमें विश्वास हो जाता है दिसम्बर के महीने में केक के धंधे से बढ़िया धंधा और कुछ भी नहीं. मैंने ख़ुद प्लान किया है कि आगे चलकर मैं केक का धंधा करूंगा. साल के ग्यारह महीने मस्टर्ड केक का और एक महीने क्रिसमस के केक का.
केक के अलावा एक चीज और है जिसके बिना हम क्रिसमस नहीं मनाते. वो है शराब. हमारी मित्र मंडली (फ्रेंड सर्कल) में अगर कोई शराब नहीं पीता तो हम उसे क्रिसमस मनाने लायक नहीं समझते. वैसे तो मैं ख़ुद क्रिश्चियन नहीं हूँ, लेकिन मुझे इस बात की समझ है कि क्रिसमस केवल केक खाकर नहीं मनाया जा सकता. उसके लिए शराब पीना भी अति आवश्यक है. मैंने सुना है कि कुछ लोग क्रिसमस के दिन चर्च भी जाते हैं और यीशु से प्रार्थना वगैरह भी करते हैं. तुम्हें बता दूँ कि हमारी दिलचस्पी इन फालतू बातों में कभी नहीं रही. इससे समय ख़राब होता है.
अब आ जाते हैं नए साल को मनाने की गतिविधियों पर. यहाँ एक बात बता दूँ कि जैसे तुम्हारे देश में एक जनवरी से नया साल शुरू होता है वैसे ही हमारे देश में भी नया साल एक जनवरी से ही शुरू होता है. ग्लोबलाईजेशन का यही तो फायदा है कि सब जगह सब कुछ एक जैसा रहे. नए साल की पूर्व संध्या पर हम अपने दोस्तों के साथ शहर की सबसे बिजी सड़क पार्क स्ट्रीट चले जाते हैं. है न पूरा अंग्रेजी नाम, पार्क स्ट्रीट? मुझे विश्वास है कि ये अंग्रेजी नाम सुनकर तुम्हें बहुत खुशी होगी. हाँ, तो हम शाम से ही वहाँ चले जाते हैं और भीड़ में घुसकर लड़कियों के साथ छेड़-खानी करते हैं. हमारा मानना है कि नए साल को मनाने का इससे अच्छा तरीका और कुछ नहीं होगा. सबसे मजे की बात ये है कि हम जैसे यंग लडके तो यहाँ जाते ही हैं, ४५-५० साल के लोग जो जींस की जैकेट पहनकर यंग दिखने की कोशिश करते हैं, वे भी आते हैं. भीड़ में अगर कोई उन्हें यंग नहीं समझता तो ये लोग बच्चों के जैसी अजीब-अजीब हरकते करते हैं जिससे लोग उन्हें यंग समझें.
तीन-चार साल पहले तक पार्क स्ट्रीट पर लड़कियों को छेड़ने का कार्यक्रम आराम से चल जाता था. लेकिन पिछले कुछ सालों से पुलिस वालों ने हमारे इस कार्यक्रम में रुकावटें डालनी शुरू कर दी हैं. पहले ऐसा ऐसा नहीं होता था. हुआ यूँ कि दो साल पहले यहाँ के चीफ मिनिस्टर की बेटी को मेरे जैसे किसी यंग लडके ने छेड़ दिया. बस, फिर क्या था. उसी साल से पुलिस वहाँ भीड़ में सादे ड्रेस में रहती है और छेड़-खानी करने वालों को अरेस्ट कर लेती है. मुझे तो उस यंग लडके पर बड़ा गुस्सा आता है जिसने चीफ मिनिस्टर की बेटी को छेड़ा था. उस बेवकूफ को वही एक लड़की मिली छेड़ने के लिए. पिछले साल तो मैं भी छेड़-खानी के चलते पिटते-पिटते बचा था.
नए साल पर हम लोग कोई काम-धंधा नहीं करते. वैसे तो पूरे साल कोई काम नहीं करते, लेकिन नए साल में कुछ भी नहीं करते. हम अपने दोस्तों के साथ ट्रक में बैठकर पिकनिक मनाने जरूर जाते हैं. पिकनिक मनाने में कोई बहुत दिलचस्पी नहीं रहती मेरी लेकिन चूंकि वहाँ जाने से शराब पीने में सुभीता रहता है सो हम खुशी-खुशी चले जाते हैं. एक ही प्रॉब्लम होती है. पिकनिक मनाकर लौटते समय एक्सीडेंट बहुत होते हैं क्योंकि गाड़ी चलाने वाला ड्राईवर भी नशे में रहता है.
नेटाली, क्रिसमस और नए साल को हम ऐसे ही मनाते हैं. तुम्हें और किसी चीज के बारे में जानकारी चाहिए, तो जरूर लिखना. मैं तुम्हें पत्र लिखकर पूरी जानकारी दूँगा. अगली बार अपना एक फोटो जरूर भेजना.
तुम्हारा,
बापी
पुनश्च: अगर हो सके तो अपने पत्र में यीशु के बारे में बताना. मुझे यीशु के बारे में जानने की बड़ी इच्छा है, जैसे, ये कौन थे?, क्या करते थे? ये क्रिसमस कैसे मनाते थे?
राखी सावंत और कांग्रेस - हार में समानता है क्या?
राखी सावंत हार गईं. उनकी देखा-देखी कांग्रेस भी हार गई. दोनों वोटिंग की शिकार हुईं. अब दोनों का कहना है कि वे नहीं हारीं बल्कि लोकतंत्र हार गया. राखी सावंत ने हारने के बाद बताया कि आयोजकों ने उनसे वादा किया था कि वे ही जीतेंगी लेकिन इन आयोजकों ने अपना वादा नहीं निभाया. कांग्रेस ने अभी तक ऐसा कुछ नहीं कहा है. कांग्रेस को शायद किसी ने वादा नहीं किया था. या किसी ने किया भी था तो ये बेहद जी निजी तौर पर किया था, जो सार्वजनिक करने लायक बात नहीं है.
हारने के बाद राखी सावंत ने बताया कि उनके साथ नाइंसाफी शुरू से हुई. उन्हें मिलने वाले वोट रजिस्टर नहीं किए गए. उन्होंने अब कभी भी रियलिटी शो में हिस्सा न लेने की कसम खा ली है. उन्होंने ये भी बताया कि अगर ऐसी ही बेईमानी होती रही तो आने वाले दिनों में भारत में रियलिटी शो का भविष्य खतरे में है. हारने के बाद कांग्रेस पार्टी ने भी बताया कि 'पार्टी के हारने से भारत में लोकतंत्र पर ख़तरा मंडराने लगा है.' जी हाँ, वीरप्पा मोइली ने यही कहा. कांग्रेस का जीतना जरूरी था क्योंकि भारत में लोकतंत्र का जिंदा रहना ज्यादा जरूरी है. कांग्रेस ने हारने के कारणों में सबसे प्रमुख कारण गुजरात में ध्रुवीकरण को बताया. लेकिन एक बात मेरी समझ में नहीं आई. ध्रुवीकरण होने के बाद दो ध्रुव बनते हैं. अब ऐसे में एक ध्रुव तो कांग्रेस के पास था ही. मोदी दोनों ध्रुवों पर तो कब्जा नहीं कर सके थे. फिर मैंने सोचा कि दक्षिणी ध्रुव पर बरफ की मात्रा शायद ज्यादा थी. साथ ही साथ वहाँ के शिलाखंडों पर अभी तक ग्लोबल वार्मिंग का असर उतना बड़ा नहीं था जितना कांग्रेस के कब्जे वाले उत्तरी ध्रुव पर था. शायद इसलिए मोदी जीत गए.
राखी सावंत को लोग घमंडी मानते हैं. उन्हें शायद इस बात का घमंड है कि उनसे बढिया ड्रामा करने वाला भारत में और कोई नहीं. उन्हें अपने ड्रामे पर बड़ा विश्वास था. उनकी नज़र में संजीदगी का कोई महत्व नहीं है. उन्हें अपने नाचने की कला पर भी कम घमंड नहीं है. इसलिए उनका मानना था कि वे ही जीतेंगी. जहाँ तक कांग्रेस के घमंड की बात है तो मुझे कांग्रेस भी एक दो बातों में घमंडी कम नहीं लगती. जैसे कांग्रेस को सेकुलर होने का घमंड है. अब इसे घमंड नहीं तो और क्या कहेंगे कि चार महीने पहले तक जो लोग मोदी के साथ रहते हुए साम्प्रदायिक थे, वही कांग्रेस के साथ होने पर सेकुलर मान लिए जाते हैं. कांग्रेस पार्टी ख़ुद को गंगा की भांति पवित्र मानती है. शायद इस सोच के साथ जीती है कि कोई कितना बड़ा साम्प्रदायिक हो, अगर कांग्रेस में चला अता है तो सेकुलर हो जाता है. ये घमंड नहीं तो और क्या है? घमंड इस बात का भी लगता है कि अगर कोई पार्टी इस देश में राज करने लायक है तो वो कांग्रेस पार्टी है. अन्य पार्टियां केवल खाना-पूर्ति के लिए बनाई गई हैं जिससे ये कहा जा सके कि भारत में लोकतंत्र है. इसके अलावा इन पार्टियों का कोई ख़ास महत्व नहीं है. अगर ऐसी सोच नहीं होती तो ये बात होती ही नहीं कि कांग्रेस के हारने से देश में लोकतंत्र ख़त्म हो जायेगा.
वैसे गुजरात चुनावों और नाच बलिये के नतीजे की वजह से केवल रखी सावंत और कांग्रेस ही दुखी नहीं है. कल मैं बाल किशन जी के ब्लॉग पर उनकी पोस्ट पढ़ रहा था. उनके मुताबिक कुछ टीवी वाले भी दुखी हैं. कुछ न्यूज़ चैनल और पत्रकार इस बात से दुखी हैं कि उनकी मेहनत के बावजूद गुजरात चुनावों में कांग्रेस की हार हुई. वहीं दूसरी तरफ़ राखी सावंत के हारने से कुछ टीवी चैनल भी दुखी हैं. ये सोचकर कि नच बलिये चलता था तो राखी के बहाने सप्ताह में २-३ घंटे का प्रोग्राम बन जाता था, लेकिन अब क्या करेंगे?
वैसे मुझे पूरी आशा है कि राखी सावंत भविष्य में भी रियलिटी शो में भाग लेंगी. टीवी चैनल वालों को राखी के ऊपर प्रोग्राम बनाने का मौका मिलेगा. साथ में देश में लोकतंत्र भी जिंदा रहेगा. चुनाव भी होंगे और कांग्रेस पार्टी एक बार फिर से चुनाव लड़ेगी. भले ही ध्रुवीकरण के बीच में लड़ना पड़े.
चलते-चलते:
गुजरात चुनावों के ऊपर टीवी पर दिखाए गए लगभग सभी एग्जिट पोल में बताया गया कि बीजेपी ही जीतेगी. पता नहीं ऐसा क्यों हुआ कि रिजल्ट आने से ठीक दो दिन पहले अचानक ये बात फैला दी गई कि कांग्रेस के जीतने के चांस बहुत बढ़ गए हैं. ऐसी बात फैलाने के लिए सट्टेबाजों का सहारा लिया गया. मुझे नहीं पता कि ऐसा किसने और क्यों किया, लेकिन एक बात जो मेरे मन में आई वो मैं कहता चलूँ.
कहीं ऐसा तो नहीं कि सट्टेबाजों ने जान-बूझ कर इस तरह की अफवाह उड़ाकर लोगों को कांग्रेस की जीत पर पैसा लगाने का लालच दिया और लोगों को नुकसान हुआ.
Saturday, December 22, 2007
मूढ़मति उपाधि - और भी लोग हैं लाइन में
किसी उपाधि से नवाजा जाना बहुत बड़ी बात है. पद्मश्री, पद्मविभूषण वगैरह तो बहुत सारे लोगों को मिलते रहते हैं. और तो और मैग्सेसे जैसे 'इम्पोर्टेड' पुरस्कार से भी पिछले सालों में कई देसी लोग नवाजे जा चुके हैं. लेकिन कुछ उपाधियाँ ऐसी होती हैं, जो सब के भाग्य में नहीं होतीं. मिसाल के तौर पर मूढ़मति उपाधि. लेकिन यहाँ एक अन्तर है. मैग्सेसे और पद्मश्री टाइप के पुरस्कार और सम्मान से नवाजे गए लोगों से हम नहीं मिलते, सो पता नहीं चलता कि ये लोग अपना मेडल चमकाते/दिखाते हैं या नहीं. लेकिन मूढ़मति सम्मान के बारे में कहा जा सकता है कि ये जिसे मिलता है, वह इसकी चर्चा करना नहीं भूलता. कारण शायद ये है कि मूढ़मति फाऊंडेशन मैग्सेसे और वगैरह से बड़ी संस्था है.जब से शुकुल जी को 'मूढ़मति' की उपाधि से नवाजा गया है, हम जैसे ब्लागरों की वाट लग गई है. शुकुल जी अपने मूढ़मति वाले ताम्रपत्र को हर दो-तीन बाद अपनी किसी पोस्ट पर चमका ही देते हैं. अगर अपने ब्लॉग पर चमकाने का मौका नहीं मिलता तो दूसरों के पोस्ट पर कमेंट में ही चमका देते हैं. जैसे कह रहे हों; 'भूलो मत, तुम जितना चाहे लिख लो, लेकिन मूढ़मति का सम्मान मिलना बहुत मुश्किल है.' ठीक वैसे ही जैसे कमल हासन को पद्मश्री मिलने के बाद उनकी हर फ़िल्म की पोस्टर पर उनका नाम पद्मश्री कमल हासन लिखा होता था और साउथ के तमाम नॉन-पद्मश्री स्टार उनकी फिल्मों के पोस्टर देखकर मरे जाते होंगे.
सच में, शुकुल जी का ये ताम्रपत्र देखकर हम तो हीन भावना से मरे जाते हैं. मन में बात आती है कि; 'हाय, एक वे हैं, जो मूढ़मति सम्मान पर कब्जा जमाये बैठे हैं और एक हम हैं, जिन्हें कोई मूढ़मति नहीं कहता.' उपाधि देनेवालों ने भी अभी तक इस बात को क्लीयर नहीं किया कि; 'ये उपाधि अब केवल शुकुल जी के पास ही रहेगी, या साल दो साल बाद किसी और का चांस है इस उपाधि से नवाजे जाने का.' कहीं ऐसा न हो कि किसी और का चांस ही न आए और शुकुल जी अगले कई सालों तक अपनी उपाधि का ताम्रपत्र जगह-जगह चमकाते रहें.
उनकी कल वाली पोस्ट पढ़ रहा था. पता चला कि उनके अच्छे मित्र भी उन्हें इस बात की याद दिलाते रहते हैं कि वे मूढ़मति उपाधि पर कब्ज़ा जमाये बैठे हैं. मुझे तो पूरा विश्वास है कि कल वाली पोस्ट पर जिन मित्र का जिक्र शुकुल जी ने किया था, वे भी उनके इस उपाधि से जलते होंगे. शुकुल जी की कल वाली पोस्ट पढ़कर आज बाल किशन ने मुझसे पूछा; "भइया, हम तो ठहरे नए ब्लॉगर, लेकिन तुम तो थोड़े पुराने टाइप हो चुके हो, सो ये बताओ कि मूढ़मति की उपाधि कैसे ली जा सकती है." मुझे लगा ये बाल किशन भी अपने नए ब्लॉगर का स्टेटस जब-तब चमकाते रहता है. नीरज भैया और संजीत पहले ही बाल किशन के नए ब्लॉगर वाले स्टेटस को लेकर बोल चुके हैं, लेकिन बाल किशन मानता ही नहीं कि वो अब नया नहीं रहा. वैसे बाल किशन का सवाल सुनकर मेरे मन में ये भी आया कि; 'मुझे मालूम होता तो मैं ख़ुद ही नहीं ले लेता ये मूढ़मति की उपाधि.'
Friday, December 21, 2007
रहिमन धंधा धर्म का कभी न मंदा होय
आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ बताते हैं कि अमेरिका में आए आर्थिक संकट का बुरा असर हमारे देश के उद्योग और धंधों पर पड़ेगा. जिन-जिन उद्योगों पर असर दिखने वाला है, उनकी लिस्ट तैयार की जा रही है. साथ ही ऐसे उद्योगों और धंधों की लिस्ट भी तैयार हो रही है, जिनपर कोई असर नहीं पड़ेगा. इन लिस्टों के सहारे आनेवाले समय में सेमिनारों और टीवी के पैनल डिस्कशन में ज्ञान की नदी बहाई जायेगी. सैकड़ों घंटे के टीवी प्रोग्राम बनेंगे. लेकिन यहाँ विशेषज्ञों से एक चूक हो गई. जिस धंधे पर अमेरिका में आए आर्थिक संकट का असर बिल्कुल नहीं पड़ेगा, उसका जिक्र इस लिस्ट में कहीं नहीं है. मैं धर्म के धंधे की बात कर रहा हूँ.
मेरे मन यह ख़याल कल शाम को मजुमदार साहब से मिलने के बाद आया. मजुमदार साहब के बारे में बता दूँ. ये साहब मेरे मुहल्ले में ही रहते हैं. धर्म के धंधे में पिछले बीस सालों से हैं. साथ में कुछ 'साइड बिजनेस' भी करते हैं. किराना की दो दुकाने हैं इनकी, लेकिन ज्यादा समय अपने 'मेन धंधे' में ही लगाते हैं. हर साल दिसम्बर महीने में धर्म का शोरूम मुहल्ले के पास वाले मैदान में स्थापित कर लेते हैं. ये शोरूम पूरे महीने भर खुला रहता है. कई सारे डिपार्टमेन्ट रहते हैं. भजन-कीर्तन का डिपार्टमेन्ट सबसे बड़ा होता है. अगले जनम को ठीक करने वाला डिपार्टमेन्ट अलग रहता है. करीब दस 'विजिटिंग साधु' हर साल आते हैं. साथ में करीब सात-आठ दुकानों से सज्जित एक मेला लगता है. पूरे दिन लाऊडस्पीकर पर भजन करके अगला जनम ठीक कराने और मोक्ष प्राप्त करने का इंतजाम पूरी तन्मयता के साथ चलता है. लाऊडस्पीकर रात के तीन बजे तक बजता है. शायद मोक्ष प्राप्त करने की साधना रात में ज्यादा फल देती है.
मजुमदार साहब ने अपने इस बिजनेस को चलाने के लिए इंतजाम पक्के कर रखे हैं. मुहल्ले के तथाकथिक जिम्मेदार लड़कों की बड़ी फौज है उनके पास. ये लड़के धंधे के लिए अर्थ की व्यवस्था में नवम्बर महीने से ही लग जाते हैं. मुहल्ले के हर घर से 'अनुचित मात्रा' में चन्दा उगाहने की जिम्मेदारी इनके पास है. कुछ लोगों का अनुमान है कि इकठ्ठा किए गए चंदे में से इन लड़कों को तीस प्रतिशत मिलता है. पता नहीं बात सच है या नहीं, लेकिन ये लड़के हर साल चंदे की रकम बढाते जाते हैं.
एक शामियाना सड़क के ठीक बीचों-बीच लगता है. इस शामियाने की वजह से रास्ता पूरे महीने भर बंद रहता है. शामियाने में सामने की तरफ़ रखे तख्त पर एक दान-पेटी रहती है. करीब पाँच साल पहले तक ये दान-पेटी काठ की बनी होती थी, लेकिन बाद में इस दान-पेटी में सामने की तरफ़ शीशा लगा दिया गया. शायद इसलिए कि बक्शे में रखा दान भक्तों को दिखाई दे. वैसे कुछ लोग ये भी कहते सुने जाते हैं कि सुबह-सुबह ख़ुद आयोजक इस दान-पेटी में पैसा रखते हैं जिससे बाद में आनेवाले भक्तों को दान देने के लिए उकसाया जा सके.
लगभग हर साल मेले में लगने वाली आठ-दस दुकानों से मजुमदार साहब के लोग 'लाईसेन्स फीस' की वसूली करते हैं. मुझे याद है, पिछले साल इनके लड़कों ने एक फुचका वाले का खोमचा पलट दिया था. कारण केवल इतना था कि इस फुचका वाले ने आयोजकों को 'लाईसेन्स फीस' के रूप में पचास रुपये कम दिए थे. दुकानदारों के साथ आयोजकों का लगभग हर साल झगड़ा होता है. वैसे मैंने सुना है कि आयोजक ऐसे किसी झगड़े को कार्यक्रम के लिए शुभ मानते हैं. ऐसे झगड़े से कार्यक्रम की सफलता को लेकर रही-सही शंका मिट जाती है.
मजुमदार साहब से कल मिलते ही मैंने हाल-चाल पूछा. काफ़ी खुश थे. बोले; "नेक्स्ट ईयर और बड़ा आयोजन करेंगे. हरिद्वार से साधु और ज्ञानी मंगवायेंगे. जो खर्च होगा, उसकी फ़िक्र नहीं है. लेकिन मुहल्ले के लोगों को सत्संग का लाभ मिलना चाहिए."
मैंने पूछा; "और घर में सब कैसे हैं?"
बोले; "बाकी तो सब ठीक है, पिताजी का पाँव टूट गया."
मैंने कहा; "अरे, ये तो बहुत बुरा हुआ. वैसे ये हुआ कैसे?"
मजुमदार साहब ने बताया; "अब आपको क्या बतायें. अस्सी साल उम्र हो गई. दिखाई तो देता नहीं. बाज़ार से सब्जी लाने गए थे. सड़क पर रिक्शे से टकरा गए. पाँव टूट गया. अब कम से कम तीन महीने तक घरवालों को परेशान रखेंगे."
मैं उनसे मिलकर चला आया. ये सोचते हुए कि रहीम होते तो शायद कुछ ऐसा लिखते;
रहिमन धंधा धर्म का कभी न मंदा होय
ये धंधा फूले-फले जब बाकी धंधे रोय
Thursday, December 20, 2007
देख नहीं रहे, मंत्री जी चिंतित हैं
सरकार काम कर रही है, जब इस बात को साबित करना रहता है तो प्रधानमंत्री किसी समस्या का जिक्र करते हुए उसपर चिंतित हो लेते हैं. बताते हैं कि वे बहुत चिंतित हैं. कल बारी थी अमेरिका में आए आर्थिक संकट पर चिंतित होने की. प्रधानमंत्री बता रहे थे कि वे बहुत चिंतित हैं. सारी चिंता इस बात की है कि अमेरिका में आए आर्थिक संकट का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा. वाकई, चिंतित होने की बात ही है. वैसे तो प्रधानमंत्री लगभग सभी समस्याओं को लेकर चिंतित रहते हैं, लेकिन आर्थिक समस्याओं के लिए उन्होंने अपनी पूरी चिंता का सत्ताईस प्रतिशत आरक्षित रख छोड़ा है.
वे जहाँ भी जाते हैं, उस जगह के मुताबिक चिंतित हो लेते हैं. महाराष्ट्र गए तो विदर्भ के किसानों की समस्या पर चिंतित हो लेते हैं. आसाम जाते हैं तो वहाँ हो रही हिंसा पर चिंतित हो लेते हैं. विदेश जाते हैं तो पाकिस्तान की समस्याओं को लेकर चिंतित रहते हैं. जिस जगह पर चिंतित होते हैं, वहाँ के लोगों को विश्वास हो जाता है कि 'प्रधानमंत्री जब ख़ुद ही चिंतित हैं, तो इसका मतलब सरकार काम कर रही है.' लोग आपस में बातें करते हुए सुने जा सकते हैं कि; 'मान गए भाई. यह सरकार वाकई काम कर रही है. देखा नहीं किस तरह से प्रधानमंत्री चिंतित दिख रहे थे.'
प्रधानमंत्री के चिंता के बारे में सोचते हुए मुझे लगा कि उनके और उनके निजी सचिव के बारे में वार्तालाप कैसी होती होगी. शायद कुछ इस तरह;
प्रधानमंत्री: "भई, कल तो २० तारीख है, कल किस बात पर चिंतित होना है?"
सचिव:" सर, कल आपको किसानों के प्रतिनिधियों से मिलना है. तो मेरा सुझाव है कि कल आप किसानों की हालत पर चिंतित हो लें."
प्रधानमंत्री: "हाँ, बात तो आपकी ठीक ही है. बहुत दिन हुए, किसानों की समस्याओं पर चिंतित हुए."
सचिव: "हाँ सर, किसानों की समस्याओं पर पिछली बार आप १५ अगस्त को लाल किले पर चिंतित हुए थे."
प्रधानमंत्री: " और, उसके बाद वाले दिन का क्या प्रोग्राम है?"
सचिव: "सर, २१ तारीख को आपको न्यूक्लीयर डील के मामले पर एक अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल से मिलना है. सो, मेरा सुझाव है कि उनसे मिलने के पहले आप अगर मीडिया को संबोधित कर लेते तो सरकार को मिले 'फ्रैकचर्ड मैनडेट' पर चिंता जाहिर किया जा सकता है."
प्रधानमंत्री: " हाँ, सुझाव तो अच्छा है. ठीक है, मीडिया से मिल लेंगे. लेकिन उसके बाद वाले दिनों में क्या प्रोग्राम है."
सचिव: "सर, २३ तारीख को गुजरात चुनावों का रिजल्ट आएगा. उस दिन रिजल्ट के हिसाब से चिंतित होना पड़ेगा. बीजेपी जीत जाती है तो साम्प्रदायिकता पर चिंतित हो लेंगे. लेकिन अगर हार जाती है तो फिर चिंता जताने की जरूरत नहीं है. हाँ, असली चिंता की जरूरत पड़ सकती है. चिंता इस बात की होगी कि मुख्यमंत्री किसे बनाना है."
प्रधानमंत्री: "ठीक है. वैसा कर लेंगे."
सचिव: "सर, एक बात और बतानी थी आपको. उड़ती ख़बर सुनी है कि गृहमंत्री शिकायत कर रहे थे कि उन्हें चिंतित होने का मौका नहीं दिया जा रहा है. कह रहे थे कि देश में कानून-व्यवस्था की स्थिति ख़राब है, बम विस्फोट हो रहे हैं लेकिन उन्हें चिंतित नहीं होने दिया जाता. और तो और, सर, वित्तमंत्री भी शायद ऐसा ही कुछ कह रहे थे. ख़बर है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर वे ख़ुद चिंतित होना चाहते थे, लेकिन आप के चिंतित होने से उनके हाथ से मौका जाता रहा."
प्रधानमंत्री: "एक तरह से इन लोगों का कहना ठीक ही है. मैं ख़ुद भी सोच रहा था कि चिंतित होने का काम मिल-बाँट कर कर लें तो अच्छा रहेगा. वैसे आपका क्या ख़याल है?"
सचिव: "सर, आपकी सोच बिल्कुल ठीक है. आर्थिक मामलों वित्तमंत्री को एक-दो बार चिंतित हो लेने दें. बहुत दिन हुए गृहमंत्री को कश्मीर की समस्या पर चिंतित हुए. उन्हें भी चिंतित होने का मौका मिलना चाहिए. लेकिन सर यहाँ एक समस्या है. शिक्षा की समस्या पर मानव संसाधन विकास मंत्री ख़ुद चिंतित नहीं होना चाहते. उनका मानना है कि उन्हें केवल आरक्षण के मुद्दे पर चिंतित होने का हक़ है."
प्रधानमंत्री: "देखिये, यही बात मुझे अच्छी नहीं लगती. मैं उनको आरक्षण