शाम का समय. रतीराम जी की चाय-पान दुकान. पंद्रह मिनटी बरसात ख़त्म हुए आधा घंटा बीत चुके हैं. हवा भी मूड बनाकर बही जा रही है. मूडी हवा के साथ जैसे ही उधर से चाय की महक चली, उससे मिलने के लिए इधर से किमाम की महक लपकी. पता नहीं दोनों कौन से पॉइंट पर मिलीं? यह भी पता नहीं कि मिलने के बाद दोनों ने कौन से दुःख-सुख की बात की? चाय से भरे मिट्टी के मुँहलगे कुल्हड़ भी आस-पास के वातावरण को मिट्टी की खुशबू सप्लाई किये जा रहे हैं. कुछ बिजी और ईजी लोग़ हैं. थोड़े हलकान और ढेर परेशान लोग़ भी.
एक बेंच पर बैठे दो लोग़ पूडल नामक शब्द की व्याख्या कर रहे थे. निंदक जी किसी के साथ अंडरअचीवर नामक शब्द डिस्कश कर रहे हैं. कमलेश 'बैरागी' जी मुझे देखते ही अपना हाथ पाकिट की तरफ ले गए. शायद जेब में पड़े पन्ने पर टीपी नई कविता निकाल रहे थे लेकिन मैं रतीराम जी की तरफ बढ़ा तो उन्होंने ने भी अपना हाथ जेब से खींच लिया. मैंने नमस्ते किया तो दाहिना हाथ उठकर उन्होंने आशीर्वाद टाइप कुछ दिया.
इधर जैसे ही जगत बोस रतीराम जी की दुकान से चले रतीराम जी के होठों पर बुदबुदाहट उभर आई. मैं पास ही खड़ा था तो सुनाई भी दी. रतिराम जी की बुदबुदाहट से जो शब्द फूटा वह था; बकलोल. मुझे हँसी आ गई. मैंने पूछा; "क्या हो गया?"
वे बोले; "अरे पूछिए मत. कुछ लोग़ का पान हमको ही बड़ी मंहगा पड़ता है."
मैंने कहा; "क्या हुआ क्या? क्या दो बार सोपारी मांग लिए क्या जगत दा?"
रतीराम जी पान को कत्था समर्पित करते हुए बोले; "अब का कहें आपसे? केहू-केहू को बुझाता ही नहीं कि कहाँ चुप होना है. ई बस ओही प्रानी हैं."
मैंने कहा; "वैसे हुआ क्या?"
वे बोले; "अब आप से का कहें? जब आये तो हम इनका बेटा का तारीफ कर दिए. बस ओही भूल हो गया हमसे. हम तारीफ का किये, ई शुरू हो गए. पूरा इतिहास बांच दिए हियें. पहिला कच्छा में केतना नंबर मिला था. दूसरा में केतना मिला. कौन-कौन मास्टर कब-क़ब का बोला लड़िका के बारे में. आ शुरू हुए तो शेस होने का नाम ही नहीं. हम कहते हैं की ससुर एगो बात शुरू हुआ त कहीं ख़तम भी होना चाहिए की नहीं? बाकी इनको कहाँ खियाल है ई सब चीज का? आ पूरा आधा घंटा चाट के गए हैं."
मैंने कहा; "होता है ऐसा. लोग़ बेटे से प्यार करते हैं तो उसकी प्रशंसा सुनने पर उपलब्धि गिना ही सकते हैं."
रतीराम जी ने हमको ऐसे देखा जैसे मन ही मन कह रहे हों; आप कौन से कोई जगत बोस से कम हैं? फिर आगे बोले; "देखिये, ई खाली बेटा का उपलब्ध गिनाने का बात नहीं है. ई असल में उस बात से खुद को जोड़ने का बात है जहाँ आदमी का तारीफ़ हो. आ ई केवल जगत बाबू का समस्सा है? सबका एही प्राब्लम है. ऊ आपके हलकान भाई कम हैं का?"
मैंने कहा; "क्या बात कर रहे हैं? हलकान भाई भी आये थे क्या इधर?"
वे बोले; "आये थे? पिछला तीन दिन से सबेरे एहिये अड्डा लगा रहे हैं निंदकवा के साथ. आ काल शाम को निंदकवे बोला हमको, त पता चला. हलकान बाबू पंद्रह दिन से अउरी बात को लेकर दुखी हैं."
मैंने कहा; "उनको किस बात का दुःख है? आजकल ब्लॉग पोस्ट पर कमेन्ट कम मिल रहे हैं क्या?"
रतीराम जी मुस्कुराए. फिर बोले; "हा हा..ऊनको आ कमेन्ट का कमी? उसका कमी त उनको कभियो नहीं होगा. देखे नहीं अभी पिछला कहानी जंगल का रात पर पैसठ कमेन्ट मिला? बाकी उनका प्राब्लम दूसरा है."
इतना कहकर वे निंदक जी को आवाज़ लगाते हुए चिल्लाए; "ऐ निंदक..निंदक."
उनकी आवाज़ शायद निंदक जी को सुनाई नहीं दी या उन्होंने जानबूझकर रिसपोंड नहीं किया. उन्होंने एक बार फिर से आवाज़ लगाई; "ऐ निंदक जी..अरे तनी हेइजे सुनिए भाई."
उधर निंदक जी अपने डिस्कशन में मशगूल. रतीराम जी बोले; "आ ई निंदकवा को देखिये. ई हफ्ता भर से किसी न किसी के साथ में अंडरअचीभर वाला बात का चर्चा किये जा रहा है. मनमोहन सिंह के ओतना धक्का नहीं लगा होगा जेतना इसको लगा है. उप्पर से कहता है कि कौनो इश्पंसर मिल जाता त टाइम पत्रिका के खिलाफ प्रदर्शन कर देता."
इतना कहकर उन्होंने फिर आवाज़ लगाई; " हे निंदक...अरे सुनो भाई. कभी हमरो सुनो तनी.
अब की बार निंदक जी ने उनकी सुन ली. उठकर आये. रतीराम जी से बोले; "काहे ला एतना परशान कर रहे हैं? चेन से बतियाने भी नहीं देते हैं."
रतीराम जी बोले; "का उखाड़ ले रहे हो बतिया के? हफ्ता भर से ओही एगो मुद्दा लेकर सबसे बतियाये जा रहे हो. आ बतियाने का एतना ही है त काहे नहीं धर लेते कौनौ न्यूज चैनल. हम तो कहेंगे कि ऊ अरनब्वा का चैनल पर चल जाओ.बाकी उहाँ, अंग्रेजी में बौकना पड़ेगा सब." इतना कहकर रतीराम ने मुस्कुराते हुए आँख दबा दी.
रतीराम जी की बात को समझते हुए निंदक जी बोले; "माटी से जुड़े मनई हैं महराज. आ ई जनम में तो अंग्रेजी भाषा नहिये बोलेंगे. बाकी अगला जनम का बाद में देखा जाएगा. आ बकैती छोड़िये औ ई बताइए कि बोलाए काहे हमको?"
रतीराम जी ने मेरी तरफ इशारा करते हुए कहा; "हम कहाँ बोलाए? बोलाए हैं आपके बड़के फैन मिसिर बाबा. इनको जरा बताइए कि हलकान भई को कौन बात का दुःख है? ऊ जो कल आप बताये रहे न हमके."
निंदक जी मेरी तरफ देखते हुए रतीराम जी से बोले; "आप भी कौनो बात पचा भी नहीं सकते हैं. मिश्रा जी के भी बता दिए?"
उनकी बात सुनकर रतीराम जी बोले; "अरे त मिसिर बाबा के त ही बताये हैं. कौन सा आपका बताया रहस्स बराक ओबामा के बता आये?"
निंदक जी को लगा कि अब वे बात को टाल नहीं सकते. लिहाजा बोले; "अरे अब क्या कहें मिश्रा जी आपसे? आपके हलकान भाई को इस बात का दुःख है कि पंद्रह दिन से कोई उनका तारीफ़ नहीं किया है."
मैंने कहा; "हलकान भाई को तो तारीफ मिलती ही रहती है. फेसबुक से लेकर ब्लॉग तक हर पोस्ट में इतना कमेन्ट मिलता है."
निंदक जी बोले; "अरे ऊ त भर्चुअल वल्ड का तारीफ है महराज. हम रीयल वल्ड वाला तारीफ़ का बात कर रहे हैं."
मैंने कहा; "रीयल वर्ल्ड में भी तारीफ मिलती ही रहती है उनको."
वे बोले; "एही त प्रॉब्लम है...चलिए अब आपके सामने भेद खोल ही देते हैं. त सुनिए. हलकान भई का माडस अप्रेंडी और तरह का है. ऊ किसी न किसी ब्लॉगर से हर दो तीन दिन पर कहते रहते हैं कि ऊ ब्लॉगर बहुत अच्छा लिखता है. आ ऐसा इस लिए कहते हैं ताकि ऊ पलट कर कह दे कि आप भी बहुत अच्छा लिखते हैं. बाकी हुआ क्या कि जब से सावन शुरू हुआ है तब से कोई ब्लॉगर इनको मिला ही नहीं जिससे यह कह सके. कारण ये है कि कोई न कोई ब्लॉगर हमेशा भोलेबाबा को जल चढाने जा रहा है. ऊपर से दू दिन पहले झा जी फ़ोन पर मिले तो ई कह दिए कि आप बहुत अच्छा लिखते हैं मगर झमेला ये हुआ कि झा जी उधर से नहीं कहे कि आप भी बहुत अच्छा लिखते हैं. बस तभी से हलकान भाई दुखी हैं."
मैंने कहा; "अरे तो हमको फ़ोन कर लेते. हम तो उनको वैसे ही बताते रहते हैं कि वे बहुत अच्छा लिखते हैं."
निंदक जी बोले; "अब ई तो नहीं पता कि आपको काहे नहीं फ़ोन किये. बाकी इसीलिए दुखी हैं ऊ."
तबतक रतीराम जी बोले; "देखिये तारीफ सुनना सभी चाहता है लोग़, बाकी ज़बरजस्ती नहीं न कर सकता है. ऊ दत्तो दा भी ओइसे ही हैं. एक दिन मार्निंग वाक में अपना कुत्ता लेकर आये. कुत्ता त का पूरा शेर टाइप लगता है ऊ. आ उसी समय एगो औरी हैं मुखर्जी बाबू, ऊ भी अपना कुत्ता लेकर आ गए. दत्तो बाबू ने मुख़र्जी बाबू का कुत्ता का खूब सराहना किया बाकी मुख़र्जी बाबू ने उनका कुत्ता का तारीफ नहीं किया तो दत्तो बाबू भी नाराज़ हो गए. त कहने का मतलब ई कि पब्लिक सब नाराज़ होकर आजकाल तारीफ लेना चाहता है."
रतीराम जी की बात ख़तम होती उससे पहले ही निंदक जी बोल उठे; "आ खाली दत्तो बाबू ही काहे? भूल गए कविराज का काण्ड?"
रतीराम जी बोले; "भूलेंगे कईसे? उनका त हमेशा से एही हाल है. ऊ आपके फ़ुरसतिया जी की सूक्ति है न कि "कबी का तारीफ कर दो त ऊ फट से दीन हीन हो जाता है", ऊ सूक्ति पूरा फिट बैठता है उनपर. पहिले तो हर नया कविता सुनायेंगे औउर कोई तारीफ नहीं किया त उसका साथ दू दिन बात नहीं करेंगे. बाकी जो तारीफ कर दिया त फट से उसका सामने हाथ जोड़ कर खड़े हो जायेंगे, ई कहते हुए कि बास आपका कृपा है. देख के लगता है कि जईसे सामने वाला ही इनको कागज़-कालम खरीद के दिया है आ नहीं तो ई कविता नहीं लिख पाते."
निंदक जी बोले; "हा हा हा..सही कह रहे हैं. ऊनका हाल देखकर उस समय एही लगता है."
रतीराम जी ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा; "अब ऊ जमाना नहीं रहा कि शम्मी कपूर जैसा हीरो भी शरमीला जी को सुन्दर बताने का बास्ते तारीफ ख़ुदा का करें जो उनको बनाया था.हम कहते हैं तारीफ त अईसे भी होता है बाकी सामने वाला माने तब."
तब तक मेरा पान बन गया था. रतीराम जी हमको देते हुए बोले; "आ लीजिये खाइए. ई तो हरि अनंत हरि कथा अनंता टाइप बात है. पूरा शास्त्र ही लिखा जा सकता है. बस वेद व्यास जईसा कोई चाहिए."
Monday, July 23, 2012
तारीफ़ करूं क्या उसकी....
Wednesday, December 24, 2008
'हमरे बिरोध का वजह से ही भारत में लोकतंत्र जिन्दा है...
वही रतीराम जी की चाय-पान की दूकान. निंदक जी मिल गए. कड़क चाय बनाने की फरमाईश कर ही रहे थे कि मैं पहुँच गया. मुझे देखते ही चाय बनाने वाले 'कारीगर' को हिदायत देते हुए बोले; " दू ठो बनाओ. मिश्रा जी भी आ गए हैं."
सर्दी बढ़ जाने की वजह से सर्दी की काट के लिए जैकेट से सजे थे. एक दिन पुराना अखबार हाथ में. गले में मफलर लपेटे हुए. चेहरे से लग रहा था जैसे चाय दूकान पर काफी देर से खड़े हैं और थोडी देर पहले ही किसी के साथ किसी मुद्दे पर बहस कर चुके हैं.
मेरी तरफ़ मुखातिब हुए. बोले; "जब से रतीरमवा चाह का दुकान खोला है, इसका त चांदी हो गया है. आ समय भी खुबे चुन के निकाला."
मैं उनकी तरफ़ देखकर मुस्कुराया. मैंने कहा; "क्या मतलब?"
बोले; "वोही, देश में आतंकवादी घटना बढ़ा त चाह का दुकान खोल लिया. शुरू-शुरू में लोग आतंकवादी घटना सब पर बहस करते हुए चाह पीता था. अब इस बात पर बहस करता है सब कि पकिस्तान के साथ युद्ध होना चाहिए या नहीं. एही वास्ते कह रहे हैं कि समय का चुनाव खूब किया है ई."
मैंने कहा; "दिमाग वाले हैं रतीराम जी. वैसे आप क्या सोचते हैं? पकिस्तान के साथ युद्ध होना चाहिए या नहीं?"
मेरी बात सुनकर मुस्कुरा दिए. बोले; "पाहिले त हम सोचते थे कि युद्ध होना ही चाहिए. ई पकिस्तान को उसका औकात बताना बहुत ज़रूरी है. हम तो चार दिन पाहिले रैली निकालने का सोच रहे थे. देश का इज्जत का सवाल है. लोग बाहर के देश से आकर ताल ठोंककर हमला कर जाता है लेकिन ई दिल्ली में त निकम्मा बैठा हुआ है सब. ई लोग को देश का इज्जत से का लेना-देना? हम त सोच रहे थे कि रैली निकालकर नेतवा सबका बिरोध करना बहुत ज़रूरी है."
मैंने कहा; "लेकिन रैली निकली नहीं आपने."
मेरी बात सुनकर बोले; " अरे का कहें आपसे. सारा तैयारी हो गया था. भाषण तक याद कर लिए थे. बैनर बन गया था. हरिओम पवार का तीन-चार ठो कविता भी कंठस्थ कर लिए थे. अरे वोही, युद्ध वाली सब बीररस की कविता. बाकी मामला गड़बड़ा गया."
मैंने पूछा; "क्यों? क्या अड़चन आ गई?"
वे बोले; "अरे तब तक त सरकारे का मंत्री सब बोलने लगा कि भारत अपना सब आप्शन खोल के रक्खा है. ई लोग खुदे कहना शुरू कर दिया कि भारत युद्ध भी कर सकता है. फिर सुने कि सीमा पर सेना तैनाती चल रहा है. अब अईसे में रैली निकालें भी त बिरोध किसका होगा?"
मैंने कहा; "हाँ, वो तो है. अब तो लग रहा है कि मुम्बई में जब हमला हुआ, उसके दूसरे दिन ही आपको रैली निकालनी चाहिए थी. उस समय रैली को अच्छा कवरेज़ भी मिलता."
मेरी बात सुनकर उनके चेहरे पर पछतावा-भाव उभर आया. बोले; "आप ठीक कह रहे हैं. मौका त ओही समय बढ़िया था."
मैंने कहा; "तो अब आप सरकार के समर्थन में एक रैली निकाल दीजिये."
मेरी बात सुनकर मुस्कुरा दिए. बोले; "समर्थन में रैली निकालने से का मिलेगा? हमें त एस्टेब्लिश्मेंट का विरोध करना है."
मैंने पूछा; "तो अब क्या करेंगे?"
वे बोले; "अब सोच रहे थे कि एक रैली निकालें जिसमें सरकार का युद्ध-नीति का विरोध कर दें. आज देश का अर्थ-व्यवस्था जईसा है, उसमें युद्ध का बात करना कहाँ तक जायज है? सरकार का त कुछ जायेगा नहीं न. पैसा त हमारा और आपका खर्च होगा. एतना पैसा खर्च होगा सब. एतना-एतना लोग मर सकता है. आ फ़िर पकिस्तान भी चूड़ी पहन के थोड़े न बैठा है. आज का डेट में ऊ भी त न्यूक्लीयर पॉवर वाला देश है. परमाणु बमे छोड़ दिया तब? कौन जिम्मेदार होगा इसका?"
मैंने कहा; "ठीक ही कह रहे हैं. वैसे भी मेरा मानना है कि युद्ध करने से नुकशान ही होगा. इससे अच्छा तो ये रहेगा कि आतंरिक सुरक्षा को सुधारने पर ज्यादा ध्यान दिया जाय."
मेरी बात सुनकर मुस्कुराने लगे. उन्हें देखकर लगा जैसे मन में सोच रहे हैं कि; 'एक बार सरकार को युद्ध की बात बंद करने दो. फिर हम इस बात पर रैली निकालेंगे कि जो सरकार पकिस्तान से युद्ध न कर सके, उसे भारतवर्ष पर शासन करने का अधिकार नहीं है.....आतंरिक सुरक्षा को मजबूत करने से कुछ नहीं होगा......'
उनकी मुस्कराहट से लग रहा था जैसे कह रहे हों; 'हमरे बिरोध का वजह से से भारत में लोकतंत्र जिन्दा है...'
Friday, December 7, 2007
'फिलिम वालों' के ख़िलाफ़ निंदक जी का अभियान
'निंदक' जी मिल गए. अरे, वही अखिल भारतीय निंदक महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष. रतीराम चौरसिया की पान-दुकान पर खड़े थे. रतीराम के साथ बहस में उलझे थे. उसे समझाते हुए कह रहे थे; "गजब मनई है यार तुम भी. अरे कह तो रहे हैं कि कर देंगे हिसाब, और तुम है कि एक ही जगह अटका है. हिसाब कीजिये, हिसाब कीजिये. आज तक ऐसा हुआ है का, कि तुम्हारा हिसाब नहीं दिए?"
रतीराम बोला; "ऊ सब तो ठीक है, लेकिन भजाते नहीं हैं कभी. खाली कहते है कि काल दे देंगे, काल दे देंगे. एही करते-करते चार महीना निकल गया."
"अरे ज़रा ई भी तो सोचो कि रोज आते तो हैं. आज हमरे आने से दस लोग अऊर आते हैं तुम्हारे दुकान पर." फिर मेरी तरफ़ मुड़ते हुए बोले; "का, ठीक कह रहा हूँ कि नहीं?"
मैंने कहा; "बिल्कुल ठीक कह रहे हैं. और बताईये, क्या हाल है?" मुझसे बात शुरू हुई तो रतीराम को चुप हो जाना पडा.
बोले; "वोइसे त सब ठीक है. बाकी, ई मीडिया वालों से दुखी हो गए हैं."
मैंने पूछा; "क्यों, ऐसा क्या हो गया. कोई झगड़ा हो गया क्या?"
बोले; "नहीं ऊ बात तो नहीं है. लेकिन बदमाश हो गया है सब. कल का ही बात लीजिये, ई फिलिम आई है न. अरे ओही, माधुरी वाली, आजा नच ले. उसका विरोध में सभा किए रहे. अखबार वाला आया सब. बक्तव्य भी ले गया, लेकिन बदमाशी देखिये कि छापा नहीं."
मैंने कहा; "फ़िल्म के विरोध में सभा किए. किस बात को लेकर विरोध दर्ज कराया आपने?"
बोले; "अरे आपको पता नहीं? ई फिलिम का एक गाना में जाति-सूचक शब्दों का प्रयोग कर दिया है, गीतकार ने. हमको तो बहुते बुरा लगा. हम बोले विरोध दर्ज कराना ही पड़ेगा."
"अच्छा, उस गाने को लेकर विरोध था. लेकिन अखबार वालों ने आपका वक्तव्य छापा क्यों नहीं? क्या बोले?"; मैंने उनसे पूछा.

<< एस्ट्रोपण्डित। राजस्थान पत्रिका की वेब साइट से साभार।
निंदक जी ने इधर-उधर देखते हुए मुझसे चुपके से कहा; "अरे का बतायें. ई लोग बोला, कि जब सरकारे फिलिम पर रोक लगा दिया, तो आपका बक्तव्य का महत्व नहीं रहा. इसीलिए नहीं छापे."
मैंने कहा; "अच्छा, ये बात है. क्या करियेगा, उनकी भी मजबूरी होगी कुछ."
बोले; "लेकिन फिलिम वालों के ख़िलाफ़ हमरे संगठन का विरोध जारी रहेगा. हम तो संगठन का लड़का लोगों को लगा दिए, ई खोजने के लिए कि और कौन मुद्दों पर फिलिम वालों का विरोध किया जा सकता है."
मैंने पूछा; "तो कुछ खोज पाये. मेरा मतलब कोई मुद्दा मिला, जिसपर फ़िल्म वालों का विरोध किया जा सके?"
निंदक जी ने मेरी तरफ़ देखा. मुंह पास लाते हुए धीरे से बोले; "आप अपने है, सो बता रहे हैं. बहुत सॉलिड मुद्दा खोजा है लड़कवा सब. बोल रहा था कि फिलिम में जिस तरह से पंडित और ब्राह्मण लोग को देखाता है, उससे ब्राह्मण जाति का बहुत अपमान होता है."
मैंने कहा; "अच्छा, इस मुद्दे पर फ़िल्म वालों का विरोध किया जा सकता है?"
बोले; "विरोध माने, सॉलिड विरोध. देखते नहीं कैसे देखाता है फिलिमकार लोग पंडित को. देखने से लगता है जैसे पंडित ही सबसे बड़ा घूसखोर होता है. देखाता है कि पंडित लोग घूस लेकर कुंडली मिला देता है. आ चाहे कुंडली मिलती हो, चाहे नहीं. आप ही बताईये, ई ग़लत बात है कि नहीं?"
मैंने कहा; "आप ठीक ही कहते हैं. मुद्दा तो ठीक उठाया आपने."
मेरी तरफ़ देखते हुए बोले; "और तो और, फिलिम में दिखाता है कि शादी हो या पूजा, मरण हो या कीर्तन, सब जगह पंडित एक ही 'इशलोक' बोल रहा है. अरे वही, 'मंगलम भगवान् विष्णु...'. हम पूछते हैं, का हमरे समाज का पंडित केवल यही एक ही 'इशलोक' जानता है? आप ख़ुद ही बताईये, पंडितों और ब्राह्मणों का बेइज्जती है कि नहीं ये?"
मैं सोच ही रहा था कि उन्होंने खुलासा करते हुए बताया; "और इस बार तो सोच रहे हैं कि टीवी चैनल वालों को बुला लेंगे विरोध प्रदर्शन के समय. राम बरन उकील का रिश्तेदार हैं. टीवी में काम करता है. भरोसा दिलाया है कि भइया आप प्रदर्शन कीजिये, हमारा चैनल कभरेज देगा आपका संगठन को."
उनसे बात करके मैं चला आया. 'निंदक' जी ने मुझे बताया; "आ टीवी पर कौन सा दिन देखायेगा, हम बता देंगे आपको. देखकर बतईयेगा, हमारा बक्तव्य टीवी पर कैसा लगा."
हर फिल्मकार के लिए चेतावनी टाइप दे गए हैं 'निंदक' जी.
Friday, August 3, 2007
अखिल भारतीय निंदक महासभा
लोगों ने उन्हें उपनाम दे दिया था; 'निंदक'। कारण था उनका 'गुण' जिसकी वजह से वे सभी की निंदा करते हुए सुने जा सकते थे। चौरसिया की पान-दुकान पर मिल गए। हाथ में १२० जर्दा वाला मघई पत्ता पान। मुँह में रखते ही रती राम की निंदा शुरू कर दी, "आजकल पान ठीक नहीं लगाता। मेटिया देता है। किमाम पत्ता पर घिसने में का जाता है? खाली पत्ता पर गोबर जईसन रख देता है। जब एतना मेहनत करके सोपारी काटता है तो फिर किमाम घिसने में का जाता है"? रती राम के होंठों पर कुछ सुगबुगाहट सुनाई दी। शायद कह रहा था कि; "तीन महीना हो गया, पुराना हिसाब खतम करते नहीं; किमाम घिसवाने आये हैं"।मुझे देखते ही दुआ-सलाम का बाजा बजाया। इधर-उधर की बातें हुईं। बात-बात में पता चला कि सचिन तेंदुलकर से बहुत नाराज हैं। मैंने कारण पूछा तो बोले; "पहिले मैच में देखा नहीं आपने; केतना खराब खेले ई। हम सोचे थे कि एनके टीम से हटाने का माँग कर डालेंगे। लेकिन दुसरा मैच में रन बना दिए ई। विरोध करने का मौका भी नहीं दिए"।
मैंने कहा; "लेकिन शतक तो बनाया नहीं, सचिन ने। शतक नहीं बनाने को लेकर माँग कर देते। कितने दिन हो गए, एक भी शतक नहीं लगाया"।
बोले; "विचार आया था हमरे मन में भी। लेकिन टीवी वाला बोला सब कि इनके खेलने से ही टीम का कन्डीशन मजबूत हुआ था। हम सोचे; जब एही लोग साथ नहीं देगा तो हम अकेलही का करेंगे"।
बात आगे चली तो पता चला कि प्रतिभा पाटिल से भी नाराजगी चल रही है। और कुरेदने पर बोले; "हम तो सोच लिए रहे कि इनका उम्मीदवारी को लेकर शहर में रैली निकालेंगे। एक दिन का चक्का जाम कर देंगे। बताईये अइसन लोग अगर राष्ट्रपति बन जाएगा तो देश का हाल का होगा"।
मैंने कहा; "लेकिन रैली निकाली नहीं आपने। विरोध अगर था ही तो दर्ज कराना चाहिए था"।
बोले; "विरोध दर्ज कराने का बात कर रहे हैं आप। हम तो राम बरन उकील से बात भी कर लिए रहे। पूरा प्रोग्राम बन गया था कि प्रतिभा पाटील के खिलाफ एक ठो जनहित याचिका दायर करेंगे। राम बरन भी तैयार हो गए थे। ऊ तो बाद में खर्चा को लेकर थोडा प्राब्लम खड़ा हो गया। आ नहीं तो हम छोड़ने वाले नहीं थे प्रतिभा पाटिल को"।
मैंने कहा; "चक्का जाम कर देते। एक रैली निकाल देते तो देश वालों की नज़र में एक बार आपत्ति तो दर्ज हो जाती। और भी फायदा हो सकता था। मेरा मतलब भविष्य में इलेक्सन वगैरह लड़ते तो एक तरह से पहचान से मदद ही मिलती"।
बोले; "सोचे तो हम भी थे। लेकिन राज का बात कहें तो बाद में हम इरादा बदल दिए। सोचे कि ई राष्ट्रपति बनेंगी जरूर ही। कोई रोक तो सकेगा नहीं"। आगे बोले; "अब तो सोच रहे हैं कि अब्दुल कलाम का विरोध करते तो अच्छा होता। उनका विरोध करने से एक ठो अलग ही पहचान बनता"।
मैं सोच ही रहा था कि ये ऐसा क्यों बोल रहे हैं। तभी उन्होने अपनी सोच का खुलासा किया। बोले; "अब देखिए। प्रतिभा पाटिल का विरोध तो सभी कर रहे थे। त अईसे में सभी का आवाज सुनाई नहीं देता। लेकिन अब्दुल कलाम का विरोध एक दो लोग करते हैं। आ अईसे में सभी का आवाज सुनाई देता है। अईसा लोग एक दो दिन में ही फेमस हो जाता है। आप देखे नहीं। ऊ पत्रकार। का नाम है उनका। अरे वही स्मिता गुप्ता। कैसे दो दिन में ही फेमस हो गई"।
मैंने कहा "आप जैसे लोग ही समाज में जागरूकता ला सकते हैं। नेताओं की करतूत जनता के सामने ला सकते हैं"।
बोले; "ज़रूरी है। जागरूकता पैदा करना ही है। आ नहीं तो ई नेता सब देश बेंच कर खा जाएगा। जागरूकता नहीं आने से कोई बदलाव का आशा नहीं कर सकते। आपको मालूम है कि नहीं? हमरे दादाजी भी ऐसे ही थे। पूरा शहर में नेहरू का विरोध ओही किये थे। एक बार नेहरू का विरोध में शहर में रैली निकाले थे। बाबूजी बताते हैं ऊ जमाने में दादाजी का वक्तव्य पेपर में छपता था, 'नगर की हलचल' कालम में"।
"अच्छा, मुझे मालूम नहीं था। आपके दादाजी भी समाजसेवा में थे"? मैंने उनसे पूछा।
बोले; "दादाजी ही क्यों। हमरे बाबूजी भी कभी नेता लोगन का बात बर्दास्त नहीं किये। सन् सतहत्तर में खुद वो इन्द्रा गांधी का विरोध किये थे। ईमर्जेंसी में धारा १४४ तोड़े थे। गिरफ्तार हो गए थे। दैनिक 'तूफान' में फोटो छपा था उनका। तीन महीना जेल में थे। त ई मत सोचिये कि आज का बात है। घर में देश के लिए कुछ करने का बात पहिले से ही है"। आगे बोले; "लेकिन हम सोच रहे हैं कि अकेले का आवाज़ सुनाई कम देता है अब। एही वास्ते हम सोच रहे हैं कि अब संस्था बना कर विरोध का स्वर ऊंचा करना पड़ेगा"।
मैं उनसे बात करके घर आ गया। दो दिन बाद बाजार से गुजरते हुये देखा कि बहुत सारे लोग रामलीला मैदान की तरफ जा रहे थे। मैंने पूछ-ताछ किया। पता चला 'निंदक' जी कोई सभा करने वाले हैं। और जानकारी लेने पर लोगों ने बताया कि आज रामलीला मैदान में 'अखिल भारतीय निंदक महासभा' के स्थापना का एलान होने वाला है।
Monday, July 30, 2007
लेम्पूनिंग@ करनी हो तो "ग्रेत लीदर" की करें
महामहिम राष्ट्रपति जी को लैम्पून करने का प्रयास किया जा रहा है हिन्दी ब्लॉगरी में. कहा जा रहा है कि उनके प्रति श्रद्धा नहीं है. श्रद्धा तो गली के दादा और माफिया डॉन के प्रति भी नहीं होती. उन्हे लैम्पून करने का प्रयास करें - वह भी ब्लॉगरी में नहीं, उपयुक्त फॉरम में - गली के नुक्कड़ पर या टाउन हॉल के सामने सभा कर. वहां श्रद्धा का भाव पता चलते देर नहीं लगेगी. ब्लॉगिंग के रूप में तो पिपिहरी मिल गयी है - लोग, जैसे मन आये बजा रहे है!
मैं जरा बाबा तुलसीदास को उद्धृत कर दूं, लैम्पूनिंग (निन्दा) के विषय में:
सब कै निन्दा जे जड़ करहीं l ते चमगादुर होई अवतरहीं ll 1
जरूरी है कि लैम्पूनिग न टांगी जाये अश्रद्धा पर. अगर श्रद्धा नहीं है तो उससे उस व्यक्ति का कुछ बनता बिगड़ता नहीं जिसके प्रति श्रद्धा नहीं है. वरन वह उस व्यक्ति के स्तर को दर्शाती है जिसे श्रद्धा नहीं है. "यो यत श्रद्ध: स एव स:"2 - जिसकी जैसी श्रद्धा (फेथ) होती है, वह वैसा ही होता है.
प्रश्न श्रद्धा का है भी नहीं. प्रश्न राष्ट्रपति पद की गरिमा और सम्मान का है. मात्र आलोचना और स्वस्थ आलोचना को असम्मान नहीं माना जाता. आलोचना तो कलाम जी की भी हुई थी, जब उन्होने बिहार में राष्ट्रपति शासन को आधी रात को मंजूरी दे दी थी. पर उससे कलाम जी का बतौर राष्ट्रपति सम्मान लैम्पूनिंग का पात्र नहीं बना था.
और भविष्य या भूत काल को क्या रेघना? शेषन महोदय काबीना सचिव बने - पूरे दन्द-फन्द के साथ. पर जब मुख्य चुनाव आयुक्त बन गये तो उस पद को जो गरिमा प्रदान की वह बेमिसाल है. उन्होने चुनाव आयोग को एक नया दैदीप्यमान आयाम प्रदान किया. उसी प्रकार महामहिम प्रतिभा ताई पाटीळ भविष्य में क्या करेंगी - कौन जाने?और अगर लैम्पूनिग का शौक है भी तो "ग्रेत लीदर" की करें. ग्रेत लीदर की रोमनागरी हिन्दी की अच्छी लैम्पूनिग हो सकती है. यह तो आप पर निर्भर करता है कि आप अपनी अभिजात्य संस्कृतनिष्ठ देवनागरी हिन्दी को लैम्पूनिंग के लिये उपयुक्त मानते हैं या स्तरीय ब्लॉग/साहित्य निर्माण योग्य.
ग्रेत लीदर की लैम्पूनिग इस बात के लिये भी हो सकती है कि उन्हे पूरी योग्यता होने के बावजूद कलाम जी पोलिटिकली करेक़्ट च्वाइस नहीं लगे. अन्यथा लैम्पूनिंग साम्यवादियों की हो सकती है कि उन्हे प्रथम - द्वितीय - तृतीय - चतुर्थ (?) विकल्प पसन्द नहीं आये. या फिर लैम्पूनिंग भाजपा और मीडिया की हो सकती है कि उन्होने राष्ट्रपति के चुनाव को मुंसीपाल्टी के इलेक्शन के स्तर पर उतार दिया. लैम्पूनिग तथाकथित तीसरे मोर्चे की भी हो सकती है जो एक कदम आगे दो कदम पीछे चलता रहा. लैम्पूनिग समग्र राजनीति की हो सकती है जिसमें 2009 को ध्यान में रख कर खेल खेला जा रहा है. जब लैम्पूनिंग के लिये इतने लोग या मुद्दे हैं तो राष्ट्रपति पद को छोड़ा नहीं जा सकता?
बन्धुओं, गलती लैम्पूनर्स की नहीं है. ब्लॉगरी में ताजा ताजा मिली अभिव्यक्ति की स्वच्छन्दता ने वातावरण लैम्पूनात्मक कर दिया है. अभी सिर स्वच्छन्द हो बैलून की तरह फूल रहा है - हवा से हल्की और विरल सोच के कारण. जब यह गैस लीक हो कर समाप्त हो जायेगी तभी हम सामान्य हो पायेंगे.
(मैं आपसे अनुरोध करूंगा कि महामहिम राष्ट्रपति के पद की गरिमा और सम्मान बनाये रखें. टिप्पणियों मे असम्मान न झलके और रबड़ का प्रयोग न करना पड़े.)
@ lampoon n आक्षेप, निन्दा; vt : आक्षेप करना, निन्दा करना. Source : shabdkosh.com
1. रामचरितमानस, उत्तरकाण्ड, 120-121
2. भग्वद्गीता, श्लोक 3, अध्याय 17.

