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Wednesday, September 22, 2010

"..अमेरिका पकिस्तान को एंटी नो-बॉल मिसाइल दे."




करीब पंद्रह दिन हो गए जब इंग्लैंड के एक बुकी मज़हर मजीद ने एक अखबार के साथ मिलकर पाकिस्तान के तीन निर्दोष खिलाड़ियों को फिक्सिंग में फँसा दिया. ये खिलाड़ी निर्दोष हैं बेचारे. साथ ही टैलेंटेड भी हैं. निर्दोष और टैलेंटता के अद्भुत संगम वाले इन तीन खिलाड़ियों में से दो ने नो-बॉल फेंकी थी और एक ने फिंकवाई.

आप पूछ सकते हैं कि पुरानी घटना पर मैं आज क्यों लिख रहा हूँ? तो मैं आपको बता दूँ कि पाकिस्तानी खिलाड़ियों ने इंग्लैंड में नो-बॉल फिक्स किया. जिस अखबार ने बेचारे निर्दोष खिलाड़ियों को फंसाया वह इंग्लैंड का था. ऐसे में यह एक ग्लोबल घटना हुई कि नहीं?

तो ग्लोबेलाइजेशन के इस युग में ग्लोबल घटना पर लोकल बात करना जायज है क्या? नहीं न? इसीलिए मैंने अपने ब्लॉग पत्रकार चंदू चौरसिया को दुनियाँ भर में भेजकर लोगों की प्रतिक्रिया लेनी चाही. आप बांचिये कि लोगों ने क्या कहा?

हिलेरी क्लिंटन, यूएस सेक्रेटरी ऑफ स्टेट्स : "वी री-टरेट आर पोजीशन दैट इंडिया इज ऐन एमर्जिंग इकॉनोमिक सुपरपॉवर इन साउथ एशिया. वी वुड आल्सो लाइक टू स्टेट दैट पाकिस्तान इज आर नेचुरल-अलाई ह्वेन इट कम्स टू एलिमिनेटिंग दिस मेनेस ऑफ नो-बॉल नॉट ओनली फ्रॉम एशिया बट शुड आई से, फ्रॉम होल वर्ल्ड ...वी विल वर्क क्लोजली विद पकिस्तान टू डिस्मैन्टेल द फोर्सेस बिहाइंड बाउलिंग नो-बॉल. दिस सॉर्ट ऑफ एक्टिविटीज...वी अवेट अ रिपोर्ट फ्रॉम आर नेटो अलाई, यूनाइटेड किंगडम टू लुक इन टू ह्वाट ट्रान्स्पायर्ड फॉर दीज यंग नो-बॉल बॉलर्स..."

आसिफ अली ज़रदारी, टेन परसेंट प्रेसिडेंट, इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ पाकिस्तान: "ओ ज़ी ये कोई बहुत बड़ी बात नहीं है. ये लड़के टैलेंटेड हैं इसलिए नो-बॉल कर दिया. और मैं आपसे पूछता हूँ कि कितनी परसेंट नो-बॉल फेंकी है बच्चे ने? अब छ बॉल का एक ओवर होता है. उसमें से एक नो-बॉल फेंक ही दे तो करीब १६ पारसेंट होती है नो-बॉल....मैं आपकी बात मानता हूँ कि बच्चों को नो-बॉल का पारसेंट कम कर के करीब दस तक लाना चाहिए. मतलब ये कि हर दास बॉल में एक नो-बॉल चलेगा. मैं खुद भी इस बात को मानता हूँ कि कोई भी काम दस पारसेंट तक ठीक है..."

एजाज बट, प्रेसिडेंट, पकिस्तान क्रिकेट बोर्ड एंड चीफ कांस्पीरेसी थेओरिस्ट, एजाज बट स्कूल ऑफ क्रिकेट मैनेजमेंट : "ये ज़ी, हमारे बच्चों को फंसाया गया है. नो-बॉल फिक्सिंग सरासर झूटी बात है. ये पाकिस्तान के खिलाफ साजिश है. कल ही एक बुकी ने मुझे बताया कि दारसल अम्पायर ने क्रीज की सामने वाली लाइन को पीछे खिसका दिया था इसलिए नो-बॉल हो गया. क्रीज की सामने वाली लाइन को पीछे खिसकाने में अम्पायर के साथ इंग्लैंड के खिलाड़ी भी इन्वोल्व हैं. इस काम के लिए अम्पायर को डेढ़ लाख पाउंड पेमेंट किया गया है. आई सी सी के पास कोई सुबूत नहीं है कि हमारे बच्चे फिक्सिंग में इन्वोल्व हैं. वहीँ मेरे बुकी के पास सुबूत है कि अम्पायर ने क्रीज -लाइन को पीछे खिसका दिया था...."

रहमान मलिक, इन्टेरियर मिनिस्टर एंड चीफ एविडेंस सीकर, इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ पकिस्तान: "हामने जांच की है और मैं आपको गारंटी से बता सकता हूँ कि न्यूज़ ऑफ ड वर्ल्ड के एविडेंस काफी नहीं हैं. हामने पता लगाया है कि ये पाकिस्तान टीम के खिलाफ साजिश है और इसमें हिन्दस्तान का रा ही सही लेकिन हाथ ज़रूर है. हिन्दस्तान जब पकिस्तान को बॉल में नहीं फँसा ससका तो फिर साजिश करके नो-बॉल में फंसाने की कोशिश कर रहा है. हामने चार और डोस्सियर मांगे हैं इंग्लैंड से....."

मुल्लाह ओमर, स्पिरिचुअल लीडर, तालिबान स्कूल ऑफ स्पिरिचुअलिटी: "आल्लाह ने हमें एक और तरीका दे दिया दिया है अमेरिकियों से लड़ने का. पहले जब हम ख़ुदा के सिपाही कहीं बॉल-बम रखने जाते थे तो 'स्क्यूरिटी' की वजह से पकड़ लिए जाते थे. अब पाकिस्तानी साइंस-दानों की मदद से हम नो-बॉल बम बनायेंगे. हमारे साइंस-दान और पाकिस्तानी साइंस-दान मिलकर काम कर रहे हैं और ख़ुदा के करम से हम जल्द ही नो-बॉल बम बना लेंगे. नो-बॉल बम का फायदा ये होगा कि वो दिक्खेगा ही नहीं. फिर हमें अमरीकी 'स्क्यूरिटी' वाले कैसे पकड़ेंगे...."

शाह महमूद कुरैशी, फ़ारेन मिनिस्टर एंड एड रिजेक्टर, इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ पकिस्तान: "हम इंडिया से कहेंगे कि हम उनके साथ मिलकर इस नो-बॉल को ख़त्म करना चाहते हैं. हम ये भी कहेंगे कि इंडिया हमारे साथ नो-बॉल पर इंटेलिजेंस शेयर करे.....हाल ही में अपने वाशिंगटन 'टूर' में मैंने प्रेसिडेंट ओबामा से डिमांड की है कि अमेरिका पकिस्तान को एंटी नो-बॉल मिसाइल दे जिससे हम नो-बॉल को कंट्रोल कर सकें...हमारी कोशिश रहेगी कि नो-बॉल को अफगानिस्तान में फैलने से रोका जाय लेकिन उसके लिए हमारी फ़ौज का नॉर्थ-वेस्टर्न बोर्डर पर रहना जुरुरी है...."

श्री मनमोहन सिंह, ऑनेस्टी पर्सानफाइड एंड लोंगेस्ट सर्विंग ऑनेस्ट प्राइम मिनिस्टर ऑफ इंडिया : "ये नो-बॉल की प्रॉब्लम कोई प्रॉब्लम नहीं है. पकिस्तान को चाहिए कि नो-बॉल से हटकर अपनी इकोनोमी के बारे में कुछ करे. केवल चार परसेंट ग्रोथ है पकिस्तान की. उन्हें कोशिश करनी चाहिए कि वे कम से कम टू थाऊजैंड एलेवेन से नौ परसेंट ग्रोथ रेट ले आयें. और नो-बॉल की प्रॉब्लम सॉल्व करने के लिए तो ज़ी क्रिकेटिकल विल चाहिए....क्रिटिकल नहीं क्रिटिकल नहीं...मैंने कहा क्रिकेटिकल...क्रिकेटिकल...जैसे पोलिटिकल वैसे ही क्रिकेटिकल..हैं ज़ी? और फिर वे एक ज़ीओएम भी तो बना सकते हैं...ज़ीओएम से कोई भी प्रॉब्लम सॉल्व हो सकती है...."

दलेर मेहँदी, फार्मर सिंगर एंड प्रजेंट डे रिअलिटी शो जज: "मैं तो मोहम्मद आमिर से यही कहूँगा ज़ी कि पुत्तर तुझे रब्ब ने, उस मालिक ने, उस ख़ुदा ने टैलेंट दिया है नो-बॉल फेंकने का. तू तो पुत्तर ऐसे ही नो-बॉल फेंकता रह. रब राखां पुत्तर...चक दे फट्टे.."

अमिताभ बच्चन, एक्टर, मॉडल, ट्वीटर, ब्लॉगर एंड अ फादर-इन-ला : "अब देखिये मैं तो एक कलाकार हूँ. मैं इसके बारे में क्या कहूँ? वैसे अगर कुछ कहना ही है तो मैं कहूँगा कि भाई साहब, माना कि आपकी टीम प्रचंड है लेकिन नो-बॉल फेंकने की वजह से खंड-खंड है....आईं? लगी..लगी मिर्ची लगी. और फिर देखिये आप क्रिकेटर हैं. आप बालिंग कीजिये, अपना पारिश्रमिक लीजिये और घर जाइए. नो-बॉल फेंककर क्या मिलेगा आपको? कुछ एक्स्ट्रा पाऊंड? पूज्यनीय बाबूजी कहा करते थे कि जो एक बार नो-बॉल फेंककर अपनी गलती न दोहराए वही असली खिलाड़ी है.....मैंने इस नो-बॉल वाली घटना पर कल ही मधुशाला में एक रुबाई जोड़ी है...हाँ, सुनिए

बालिंग पथ पर बालिंग करने चलता है बालर आला
जोर से दौड़े या फिर धीरे दुविधा में है मतवाला
कोच बताते राहें कितनी पर मैं यह बतलाता हूँ
धीरज के संग कदम धरो तो फेंकोगे फिर नो-बॉला

बाबा रामदेव, ब्रीदिंग एक्सपर्ट, आंटरप्रेनर एंड पोलिटिसियन-इन-मेकिंग: "हे हे हे. लोग पाकिस्तान से फोन करके पूछते हैं बाबा जी, ये अपने नौजवान क्रिकेटर इतना नो-बॉल क्यों फेंक रहे हैं. मैं कहता हूँ ये नो-बॉल फेंके जाने का कारण है कि एम् एन सी का आटा. पकिस्तान लीवर जो आटा पकिस्तान में बेंच रहा है उसको खाकर ही बालर नो-बॉल फेंक रहे हैं. एम् एन सी कम्पनियाँ पाकिस्तान में करीब एक लाख करोड़ का आटा और तेल बेंचती हैं. अब कोई क्रिकेटर इन कंपनियों का आटा और तेल खायेगा तो वह जो है नो-बॉल तो फेंकेगा ही. यह बात हमारे राष्ट्र के लिए एक सन्देश है कि एम एन सी के बनाये खाद्य पदार्थों को अगर न रोका गया तो हमारा भी एक-एक क्रिकेटर नो-बॉल फेंकने लगेगा. यह जो है वह पूरे राष्ट्र के लिए बहुत ही खराब होगा. इसीलिए पतंजलि योगपीठ ने चावल, बाजरा, गेंहू और जौ को मिलाकर एक आटा बनाया है जिसकी रोटी खाने से बोलर कभी भी नो-बॉल नहीं फेंकेगा. हम तो राष्ट्र निर्माण करते हैं. उसके लिए हम कटिबद्ध हैं. आज ज़रुरत है......."

चन्दन सिंह हाठी, मैनेजर गंगोत्री यन्त्र प्रतिष्ठान: "क्या आप अपने बालिंग रन-अप से परेशान हैं? क्या आप इन-स्विंगर करते हैं और वो आउट-स्विंगर हो जाता है? क्या आप जब भी नो-बॉल फेंकना चाहते है तब नहीं फेंक पाते? क्या आपकी एल बी डब्ल्यू की अपील पर अम्पायर बैट्समैन को आउट दे देता है? क्या आप विश्व के सबसे बड़े नो-बॉलर बनना चाहते हैं? क्या नो-बॉल फिक्स करने की वजह से आप बार-बार पकड़े जाते हैं? तो पहली बार गंगोत्री यन्त्र प्रतिष्ठान लाया है नो-बॉल सुरक्षा रुद्राक्ष. यह पहनने के बाद आप जब भी चाहें नो-बॉल फेंक सकते है और पकड़े भी नहीं जायेंगे. हमारा दावा है ...."

प्रणब मुख़र्जी, फिनांस मिनिस्टर एंड पोलिटिकल मैनेजर, यूनाइटेड प्रोग्रेसिव अलायंस : "दीस ईभेंट हुविच हैपेण्ड ईन इंग्लैंड शूड नाट हैभ हैपेण्ड...उई फार्मली बिलीभ दैट पकिस्तान शूड ट्राई एंड ब्रिंग डाउन दा नो-बाल बोल्ड टू आंडर एट पारसेंट...आल्दो उई आर कोंसोटेंटोली मोनिटोरिंग दा सिचुयेशान एमार्जिंग फ्रॉम...."

यह था हमारे ब्लॉग-पत्रकार चंदू चौरसिया की विश्व के तमाम बड़े नेताओं और लोगों से नो-बॉल फिक्सिंग पर बातचीत. चंदू चौरसिया का अगला असाइंमेंट है कि वे युवा-नेता, युवराज, भावी प्रधानमंत्री श्री राहुल गाँधी का इंटरव्यू लेंगे. हम जल्द ही वह इंटरव्यू अपने ब्लॉग पर प्रकाशित करेंगे. तब तक हम आपसे विदा लेते हैं.

Wednesday, June 30, 2010

डायलाग इज द ओनली वे फॉरवर्ड - पार्ट २




अगर यह पार्ट -२ है तो जाहिर सी बात है कि पार्ट -१ भी होगा ही. तो पार्ट -१ को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक कीजिये.


अब आगे का हाल....


एक नेता जी से पत्रकार ने सवाल किया कि; "कट-मोशन में तो आप सरकार के साथ थे. आज उसके विरुद्ध क्यों हैं?"

उन्होंने जवाब दिया; "ढेर दिन हो गया था जे हम सरकार का विरोध नहीं किये थे. पब्लिक सब सोच रहा था कि कहीं हम सरकार के साथ त नहीं हो गए? दू महीना हो गया था आ हमलोग को विरोध करने का कोई मुद्दा नहीं मिल रहा था एही बास्ते हम विदेश नीति का बात पर सरकार के विरोध में चले गए."

उसके बाद पत्रकारों का सवाल और नेता जी का जवाब. पत्रकारों के हर सवाल का नेता जी ने जवाब दे डाला. विद्यार्थी जीवन में कॉपी में जवाब लिखते तो कम से कम ग्रैजुएट तो होकर निकलते लेकिन कोई बात नहीं. जब जवाब दो तभी सबेरा. पूरी प्रेस कॉन्फरेंस ख़त्म होने के बाद तीन-चार मोटी बातें निकल कर आयीं. जैसे नेताजी बहुत इम्पार्टेंट हैं. उनके पास तीन सांसद हैं तो क्या हुआ, सरकार चलाने के लिए उनका समर्थन चाहिए ही चाहिए. सरकार को आगे 'वूमेन रिजरभेशन' बिल, न्यूक्लियर लायबिलिटी बिल वगैरह-वगैरह लाना है. और लास्ट बट नॉट द लिस्ट जो बात थी वह ये थी नेता जी को सरकार हल्के में नहीं ले सकती.

ये तो रही अशुद्ध विपक्ष के नेता की बात.

उधर विशुद्ध विपक्ष के नेता लोग भी सरकार के खिलाफ बोल रहे थे. दबाव वगैरह बनाने में जब सफल नहीं हो सके तो बोले कि; "हम इस मुद्दे को जनता के बीच ले जायेंगे."

बताइए, जनता के बीच क्या मुद्दों की कमी है? ये नेता लोग बोलते समय कुछ सोचते नहीं. यहाँ तक कह देते हैं कि; "मंहगाई के मुद्दे को हम जनता के बीच ले जायेंगे." अब इन्हें कौन समझाये कि; "हे चिरकुट, तुम मंहगाई के मुद्दे को जनता के बीच क्या ले जाओगे? वह मुद्दा वहीँ से तो निकला है."

लेकिन वही बात है न. राजू श्रीवास्तव के शब्दों में; "मुँह खोला और भक्क से बोला."

विषयांतर हो गया. ब्लॉग पर रिपोर्टिंग में यही सुविधा है कि जब चाहे रिपोर्टिंग को छोड़कर अपना ज्ञान और दर्शन ठेल दो. अब बताइए अगर मैं अखबार का संवाददाता होता तो ऐसा कर पाता? नहीं न.

खैर, आगे बढ़ते हैं. हाँ तो जब विशुद्ध विपक्ष ने भी मामले को गरमा दिया तो अपनी ईमेज बनाने के लिए सरकार इस बात पर राजी हो गई कि वह एक सर्वदलीय बैठक बुला देगी. उसमें सभी दलों को विश्वास में लेने की कोशिश के जायेगी. अगर ठीक उस दिन विश्वास की शार्ट सप्लाई नहीं हुई तो शायद इन दलों को सरकार सिश्वास में ले ले.

मीटिंग के दिन एक जगह सभी दलों के प्रतिनिधि इकठ्ठा हुए. मेज थी. मिनरल वाटर की बोतलें थीं. कुर्सी के आगे नेमप्लेट थीं. सब अपनी-अपनी नेम प्लेट के पीछे बैठ गए. कुछ लोगों ने दबे स्वर में प्रोटेस्ट भी किया कि नेमप्लेट अंग्रेजी में क्यों लिखी गईं हैं? प्रोटेस्ट वगैरह करके जब सब शांत हुए तो सरकार की तरफ से डिप्यूट किये गए मंत्री ने इन प्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए शुरू किया; "ऐज उई आल आर अभेयार, गभार्मेंट हैज रिसेंटोली डिस्कोभार्ड द फैक्ट दैट उइथ द हेल्प आफ डायोलाग..."

अभी वे इतना ही बोल पाए थे कि मीटिंग हाल में बत्ती गुल हो गई. अँधेरा हो गया. एक आवाज़ आई, " मानीय मंत्री महोय अंगेजी में मीटिंग शुरू करेंगे तो ऐसा ही होगा. अंगेजी निशानी है अँधेरे की."

उस आवाज़ को समर्थन देते हुए पास से ही एक और आवाज़ आई; "आप ठीक कहे हैं. ओही खातिर गई है बत्ती. दादा सरकार की बत्ती शुरुवे में गुल हो गया?"

ये आवाज़ सुनकर सब हँस पड़े. मंत्री महोदय को भी हँसना पड़ा.

अभी सब हँस ही रहे थे कि एक गंभीर आवाज़ आई; "पॉवर जनरेशन एंड डिस्ट्रीब्यूशन में रेफोर्म्स के लिए ग्रुप ऑफ़ मिनिस्टर बनाया होता तो कम से कम बिजली तो नहीं जाती."

"अरे त आप जब बोले थे कि कायद-ए-आजम सेकुलर हैं तब त बिजली नहीं गया था. तब त बिजली था औ तब भी त नहीं लौका आपको? दस महीना बाहर रहकर पाटी में आये हैं त बड़ा-बड़ा बात?"; फिर से आवाज़ आई.

इन आवाजों के बीच मंत्री महोदय ने सोचा कि मौज-मस्ती में विषयांतर न हो जाए. यही सोचते हुए वे बोले; "में आई हैव इयोर अटेंशोन...."

फिर से एक आवाज़ आई; "फेर ओही अंग्रेजी? पहला बार बोले तो बत्ती गुल हो गया. फेर ओही भाषा में शुरू करेंगे त अबकी बार हाल में आगे न लग जाए.."

"आच्छा ठीक है. हाम हिंदी में बोलता है. रेस्पेक्टेड डेलिगेट्स जैसा कि जानता है कि सोरकार ने पकिस्तान के साथ सोभी सोमस्सा को डायलाग..."

अभी उन्होंने अपनी हिंदी में संबोधन शुरू ही किया था कि एक तरफ से आवाज़ आई;"वाट यिज दिस सार? यानरेबल
मिनिस्टार यिज यिस्पिकिंग इन यिंदी? वी वांट टाल रेट यिट. आवर रिस्पेक्टेड डाक्टर कलैन्य्गार सार विल नाट याल्लो यिट. प्लीज यिस्पीक यिन यिन्ग्लिश."

फिर से झमेला. अंग्रेजी और हिंदी की लड़ाई में आखिर में अंग्रेजी जीत गई. मंत्री महोदय ने फिर से शुरू किया; "ऐज उई आर अभेयार, उई आर हीयार टू मेक सोम काइंड ऑफ़ कोंसेंसोस ऑन द डायोलाग डोस्सियोर हूविच उई उविल साब्मिट टू द पाकिस्तान फार देयार अप्रूभाल..."

अभी तक बिजली नहीं आई थी लेकिन देश के बड़े दिमागों का एक मिनट भी व्यर्थ न हो, इसलिए मीटिंग जारी थी.

अँधेरे में एक आवाज़ उठी; "हाँ त सरकार सही सोचा है. बढ़िया डायलाग लिखने वाला सब को बुलाया जाय और उससे डायलाग लिखवाया जाय. हम अनुमोदन करते हैं ऊ आदमी का नाम जो फिलिम मुग़ल-ए-आजम का डायलाग लिखे रहे. का नाम था उनका...एक मिनट हम लिख के लाये हैं..नेता जी तनी अपना मोबाइलवा जलाइए..हाँ..अमानुल्ला खान..उनसे लिखवायें. ऊ बढ़िया लिखेंगे और पाकिस्तान का मामला है त उर्दू में डायलाग रहने से ही ठीक रहेगा ."

"आई नोट डाउन इयोर रेकोमेंडेशोन बाट आई थिंक ही में नॉट बी अलाइभ नाऊ. बाट आई अस्योर इयु दैट उई उविल चेक ह्वेदार...."; मंत्री जी ने नेता जी को आश्वासन दिया.

मंत्री जी का आश्वासन पूरा हुआ ही था कि एक आवाज़ आई; "वी हैव आब्जेक्शान सार. वी तिंक यिट विल बे बेटर यिफ डायलाग्स यार रीटेन यिन तमिल. आवर रिस्पेक्टेड डाकटार कलैन्यगार सार येज रीसेंटली डिमांडेड दैट तमिल बी मेड या नेशनल लैंग्वेज. ही विल बी वेरी हैपी यिफ डास्सियर टू बी सबमिटेड टू पाकिस्तान विल बी रिटेन यिन क्लासिकल तमिल..आवर रिस्पेक्टेड डाकटार कलैन्यगार सार आर्गेनाइज्ड यिन्टरनेशनल क्लासिकल तमिल कांफेरेंस टू टेल टू दा वाल्ड..."

एक आवाज़ और आई; "बस करो. बस करो. खुदे बोलते रहोगे कि औउर भी कोई बोलेगा? अरे डायलाग लिखायेगा त हिंदी में या उर्दू में. तमिल कौन समझेगा वहाँ?"

ये बात सुनकर पहले वाली आवाज़ फिर आई; "बट यिफ यू रिमेम्बर सार, वन ऑफ़ द डास्सियर सबमिटेड टू पकिस्तान यिन दा ट्वेंटी-सिक्स एलेवेन केस येज समथिंग रिटेन यिन मराठी..."

"अरे ऊ छोड़ो..ऊ त गलती था. एक ही गलती केतना बार करेगा सरकार?"; फिर से वही विरोध जताने वाली आवाज़ आई.

"दीस इज नाट दा स्टेज टू फाईट ईच-ओदर"; मंत्री जी ने सलाह दी.

अँधेरे में एक धीर-गंभीर आवाज़ उभरी; "हमारी पार्टी का ऐसा मानना है कि हमारे पार्टी माऊथपीस के जो सम्पादक हैं उनसे लिखवाया जाय..बढ़िया लिखते हैं. वे बढ़िया डायलाग लिखेंगे."

"अरे त आप भी त किताब लिखे हैं. किसको-किसको सेकुलर बताते फिरते हैं. आप किताब लिख सकते हैं त डायलाग भी लिख दीजिये. दस महीना बाद पार्टी में लौटे हैं और पार्टी भेज भी दिया मीटिंग में"; पूरी मीटिंग में डोमिनेंट आवाज़ फिर से उभरी.

अब बारी थी एक नई आवाज़ के उभरने की. उसने कहा; "अभी प्रकाश झा की फिल्म राजनीति हिट हुई है. हमारा कहना है कि उन्हें डायलाग लेखन की समझ है. उनसे डायलाग लिखवाया जाना चाहिए. हमारे नेता और मुख्यमंत्री भी इस पक्ष में हैं."

एक बार फिर से डोमिनेंट आवाज़ उभरी; "का कहे? प्रकाश झा? अरे नाम लेना था त किसी सेकुलर डायलाग राइटर का नाम नहीं मिला? ओइसे भी मिलेगा कैसे? आपके मुख्यमंत्री का फोटो किसके साथ अखबार में प्रकाशित हुआ ऊ त सब देखा ही है."

"हमारी पार्टी बिहार के किसी राइटर को डायलाग नहीं लिखने देगी. वईसे भी पकिस्तान की बात पर किसी भी बात का विरोध पहिले महाराष्ट्र से ही होगा"; एक नई आवाज उभरी.

"नै..नै..ई नहीं चलेगा. बिहार के लोगों का बिरोध बम्बई में त करता ही था तुम लोग, अब पाकिस्तान में भी करने लगा? आ सुनिए दादा, हम एक और नाम देते हैं. जाभेद अख्तर. सबसे बड़ा बात है कि आदमी सेकुलर है. उर्दू भी जानते ही होंगे. औउर ऊ अब त पार्लियामेंट में भी है"; डोमिनेंट आवाज़ ने फैसला जैसा कुछ सुनाते हुए कहा.

"बाट सार, वी रेकमेंड नेम ऑफ़ बासंती, दा प्येमस तमिल राइटर फॉर दिस काज"; पहले वाली आवाज़ ने एक बार फिर से ट्राई मारा.

"प्रकाश झा"

"जाभेद अख्तर"

"बासंती"

"सुनील गंगोपाध्याय"

सब अपना-अपना रेकमेंडेशन अँधेरे में ही दोहराते जा रहे थे.

मंत्री महोदय को लगा कि अँधेरे में पता भी नहीं चल रहा है कि केवल गले काम कर रहे हैं या फिर और भी अंग? कहीं ऐसा तो नहीं कि हाथ-पैर भी काम करने पर उतर आयें. उन्हें लगा कि मीटिंग अगर ख़त्म न की गई तो कोई अनहोनी हो सकती है. यही सोचते हुए वे बोले; "ओके..ओके..भाट आई हैभ कोंक्लूडेड ईज, दैट उई हैभ नाट एराइव्ड ऐट एनी कोंसेंसोस.... आई उविल आस्क आनरेबल प्राइम मिनिस्टर टू फार्म आ ग्रूप आ मिनिस्टोर हुविच उविल कोऑर्डिनेट बिटभीन गभार्मेंट ऐंड दा अपोजीशोन"

मीटिंग ख़त्म हुई. अब सरकार को-ओर्डिनेशन बनाने के लिए डायलाग राइटर ढूढ़ रही है.

Monday, June 28, 2010

डायलाग इज द ओनली वे फॉरवर्ड - पार्ट 1




पूरा देश साँसे थाम कर बैठा था. भारत और पकिस्तान के विदेश सचिव वार्ता कर रहे थे. पिछला रिकॉर्ड बताता है कि जब भी पाकिस्तान के साथ अपने देश की वार्ता होती, देश के लोगों की सांसें थम जाती थीं. उसी परंपरा और संस्कृति का निर्वाह आज भी हो रहा था. लोग गुटों में बैठे थे और गुटों में ही खड़े थे. गुटों की ये सक्रियता आभास दिला रही थी कि गुटबाजी ही भारत को एक एक्टिव देश का दर्जा दिलवाती है. टीवी चैनल के संवाददाता वार्ता स्थल के बाहर अपनी हार्ट-बीट थामने की एक्टिंग करते हुए क्यूट जैसे कुछ लग रहे थे. कैमरे क्लिक होने के लिए बेताब थे. टीवी न्यूज चैनल के स्टूडियो में बैठे पैनेलिस्ट कयास लगा रहे थे.

नुक्कड़ों पर गुट चर्चारत थे. कुछ गुटों को देखकर डर लग रहा था कि कहीं ये लोग उसी जगह खड़े-खड़े अपनी पॉलिटिकल पार्टी न लॉन्च कर डालें. चाय की बिक्री बढ़ गई थी. बाज़ारों में पान की कमी हो गई थी. लोगों को खाने-पीने की सुध नहीं थी. टेंशनग्रस्त देश यही सोच रहा था कि क्या होगा आज? वार्ता ख़त्म होने के बाद सुनने को क्या मिलेगा? कुछ लोगों को वार्ता करने वालों पर पता नहीं किन कारणों से विश्वास तो नहीं लेकिन विश्वास जैसा कुछ था. ये लोग यह सोचते हुए डर रहे थे; "ऐसा तो नहीं कि पकिस्तान के साथ हमारी समस्याएं आज ही सॉल्व हो जायेंगी?" फिर उन्ही मन में सांत्वना के स्वर उभरते; "नहीं-नहीं ऐसा नहीं हो सकता."

सांत्वना के ये स्वर सही थे. जिन दिलों से ये स्वर निकल रहे थे उनके मालिकों को अपने देश के नेताओं पर पूरा भरोसा था. उन्हें पता था कि जवाहरलाल से लेकर देवीलाल तक, सभी ने जबानी जमाखर्च तो बहुत किया था लेकिन किसी ने आजतक पकिस्तान के साथ एक भी समस्या नहीं सुलझाया था. ऐसे में समस्या न सुलझा पाने की हमारी संस्कृति की रक्षा करने का काम वर्तमान पीढ़ी के जिम्मे है और हमारे नेता देशवासियों के इस विश्वास की रक्षा कर के छोड़ेंगे.

इन स्वरों को थोड़ा-बहुत बल इस सिद्धांत से भी मिल रहा था कि हर देश का अपने पड़ोसी देश के साथ कुछ न कुछ लफड़ा रहना ही चाहिए. लफड़ा नहीं रहे तो लगता ही नहीं कि देश जिन्दा है. लफड़े ही देश के जिंदा रहने का सुबूत होते हैं.

इन्ही सोच-विचार की लहरों में दिन डूबा जा रहा था. अचानक शाम को कॉन्फरेंस रूम का दरवाजा खुला. दरवाज़ा खुलने के बाद जो हरकतें हुई उन्हें देखकर लगा कि कुछ दरवाजे कितने महत्वपूर्ण होते हैं. खैर, दरवाजा खुला और अन्दर से दोनों देशों के विदेश सचिव निकले. भारतीय विदेश सचिव मुस्कुराते हुए आगे बढीं. संवाददाताओं ने उन्हें घेर लिया. इन संवाददाताओं को देख कर लगा जैसे उन्हें पूरा विश्वास था कि आज विदेश सचिव कुछ ऐसा कहने वाली थीं जो भारत और पकिस्तान के पंगात्मक इतिहास में किसी प्रधानमंत्री, विदेश मंत्री या विदेश सचिव ने नहीं कहा था.

विदेश सचिव ने संवाददाताओं के इस विश्वास को थाम लिया और कहा; "विद टूडेज मीटिंग, वी हैव अराइव्ड ऐट द कान्क्लूजन दैट डायलाग इज द ओनली वे फॉरवर्ड."

उनकी बात सुनकर वहाँ उपस्थिति लोगों की बांछें खिल गईं. सब हतप्रभ होकर एक-दूसरे को देखने लगे. लोगों को देखकर लग रहा था जैसे उन्हें विश्वास हो चला था कि विदेश सचिव द्वारा कही गई डायलाग वाली बात बहुत गहरी थी और अब भारत और पकिस्तान के बीच समस्याओं का सुलझना निश्चित है. कुछ लोगों ने इस विदेश सचिव की सराहना करते हुए पुराने विदेश सचिवों की आलोचना कर डाली. यह कहते हुए कि; "इतनी-इतनी सैलेरी लेते थे वे लोग, कहने को बढ़िया दिमाग रखते थे लेकिन उनके दिमाग में कभी यह बात नहीं आई कि; "डायलाग इज द ओनली वे फॉरवर्ड."

लानत है.

विदेश सचिव द्वारा बोले गए 'बयानीय सेंटेंस'को सुनकर मन में भाव आ रहे थे जैसे देश के एक सौ बीस करोड़ लोग डायलाग बोलते हुए पाकिस्तान की तरफ बढ़ते जा रहे थे और उनके रास्ते की तमाम मुश्किलें अपने आप हटती जा रही थीं.

बधाइयाँ दी जा रही थीं. बधाइयाँ ली जा रही थीं. विदेशी टीवी चैनलों के रिपोर्टर्स भी खुश थे, खासकर अमेरिकी रिपोर्टर्स, जिन्हें यह लगता है कि भारत और पकिस्तान के बीच अगर मारपीट न हो सके तो कम से कम बातचीत या वैसा ही कुछ होते रहना चाहिए. वे अपने-अपने चैनलों के लिए अपनी रिपोर्ट रिकॉर्ड करवा रहे थे. चारों दिशायें मुस्कुराहटों से भरी हुई थीं. भारतीय दल खुश था तो पाकिस्तानी दल महाखुश.

शाम को सरकार ने इस डायलाग वाली बात के बारे में बताया कि यह इक्कीसवीं सदी का सबसे बड़ा रहस्योद्घाटन है और इस रहस्य के साथ ही पाकिस्तानी पंगों का अंत तय है. प्रधानमन्त्री खुश थे. विदेश मंत्री तो बहुत खुश थे. कूटनीति की सफलता ने सबके चेहरे चमका दिए थे. रूलिंग पार्टी के प्रवक्ता से लेकर उठभैये और छुटभैये नेता तक माइक्रोफोन के सामने बाईट देने में बिजी थे. प्रस्ताव पारित करके लड्डू वितरण समारोह का आयोजन किया गया. तमाम पत्रकार इस बात से चकित थे कि एक रहस्योद्घाटन कितना महत्वपूर्ण हो सकता है.

विदेश सचिव की डायलाग वाली बात पर पूरा देश ही कयास लगा रहा था. सब अपने-अपने अंदाज़ में बातें कर रहे थे. सरकार किसे चुनेगी डायलाग लिखने के लिए? क्या किसी पुरानी फिल्म के डायलाग राइटर को लाया जाएगा? कहीं ऐसा तो नहीं कि पकिस्तान के साथ समस्याएं सुलझाने के लिए सलीम-जावेद एक बार फिर से जोड़ी बना लेंगे? कोई कह रहा था कि कादर खान जी से लिखवाना चाहिए. कोई बोला कि अब के ज़माने में कादर खान जी के डायलाग नहीं चलेंगे. अब जमाना बदल गया है. अब किसी नए राइटर को ट्राई किया जाएगा. किसी ने सुझाव दिया कि पाकिस्तान की बात है लिहाज़ा डायलाग उस राइटर से लिखवाना चाहिए जिसने सनी देओल की फिल्म में एक डायलाग लिखा था कि "दूध मांगोगे तो खीर देंगे, कश्मीर मांगोगे तो चीर देंगे." किसी ने कहा धत्त, उससे लिखवाओ जिसने ग़दर एक प्रेम कथा का डायलाग लिखा था. कोई बोला हो सकता है सरकार किसी पत्रकार को हायर कर ले.

टीवी चैनलों ने सात-आठ नामों को दिखाकर एस एम एस वोटिंग करवाना शुरू कर दिया था.

उधर लड्डू बँटे. मीटिंग्स हुईं. लोग जमा हुए. कहीं-कहीं लोग जमे भी. देश-विदेश के टीवी चैनलों ने भारतीय सरकार की सराहना की. अमेरिकी राष्ट्रपति ने राहत की सांस लेने की एक्टिंग की. उन्होंने हमारे प्रधानमंत्री को बधाई दी. हमारे प्रधानमन्त्री ने फट से बधाई लेकर उसे अपनी उस एक्सक्लूसिव आलमारी के हवाले किया जिसमें वे अमेरिकी राष्ट्रपति की बधाइयाँ और सन्देश बड़े करीने से सजाते थे.

जब अमेरिकी राष्ट्रपति के सन्देश आलमारी के हवाले हो गए और इनिशियल सेलिब्रेशन की धूल-धक्कड़ सेटल हुई तो विदेश सचिव ने एक राज खोला. डिप्लोमेसी की यही विशेषता है कि सबकुछ एक बार में सामने नहीं आता. वैसे भी बातें रह-रह कर सामने आयें तो डिप्लोमेसी में दिलचस्पी बनी रहती है. इसी दिलचस्पी को बरकरार रखते हुए विदेश सचिव ने बताया कि यह डायलाग वाली बात पर पाकिस्तान की तरफ से एक रायडर लगा दिया गया है.

जब विदेश सचिव से इस रायडर के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा; "पाकिस्तान चाहता है कि भारत पहले डायलाग के कम से कम दस डोस्सियर बनाकर पकिस्तान को दे जिससे उसके डोस्सियर एक्सपर्ट उसे जांच सकें. वे जब डायलाग को जांचकर उसे अप्रूव कर देंगे तब अगला स्टेप लिया जाएगा."

विदेश सचिव की बात सुनकर प्रधानमन्त्री मुस्कुरा दिए. पीए ने धीरे से पूछा; "सर आपकी मुस्कराहट देखकर लगता है जैसे आपको कुछ याद आ गया."

अपने पीए की बात सुनकर प्रधानमंत्री बोले; "हाँ. दरअसल मुझे अचानक एक लाइन याद आ गई कि; म्यूचुअल-फंड इन्वेस्टमेंट्स आर सब्जेक्ट टू मार्केट रिस्क. प्लीज रीड द ऑफर डाक्यूमेंट केयरफुली बिफोर इन्वेस्टिंग."

उसके बाद दोनों ने एक दूसरे को देखा और दोनों मुस्कुरा दिए.

खैर, उसके बाद प्रधानमंत्री विदेश सचिव से मुखातिब होते हुए बोले; "तो इसमें कौन सी बड़ी बात है? डायलाग का डोस्सियर ही तो बनवाना है. पहले की बात होती तो कोई चिंता भी थी लेकिन अब बिलकुल चिंता नहीं है. अब तो हमारे पास ग्रुप ऑफ़ मिनिस्टर्स का फंडा भी है. एक काम करता हूँ. मैं एक ग्रुप ऑफ़ मिनिस्टर्स बना देता हूँ जो मीटिंग्स करके बताएगा कि किस राइटर से डायलाग लिखवाना है? अपने यहाँ डायलाग लिखने वालों की कमी थोड़ी है. देश के ट्वेंटी परसेंट लोग कई सालों से डायलाग बोल रहे हैं और बाकी सुन रहे हैं. कहिये तो पूरा देश ही डायलाग से ही चल रहा है. आप बिलकुल निश्चिन्त रहें. हम डायलाग के ऐसे-ऐसे डोस्सियर देंगे कि वहाँ के डोस्सियर एक्सपर्ट उसे रिजेक्ट नहीं कर पायेंगे. मुझे अपने ग्रुप ऑफ़ मिनिस्टर्स पर पूरा भरोसा है."

दूसरे दिन लोकसभा में प्रधानमंत्री ने सदन को जानकारी देते हुए कहा; "हमें यह बताते हुए ख़ुशी हो रही है कि पाकिस्तान के साथ हमारी समस्याएं अब ख़त्म हो जायेंगी. हमें पता चल गया है कि डायलाग का सहारा लेकर सबकुछ ठीक किया जा सकता है. मैंने आज आफिस पहुँचते ही एक ग्रुप ऑफ़ मिनिस्टर्स बना दिया है जो उन राइटर्स का सेलेक्शन करेगा जो डायलाग लिखेंगे और साथ ही उन एक्टरों का भी सेलेक्शन करेगा जो लिखे गए डायलाग की डेलिवरी करेंगे."

प्रधानमंत्री की बात सुनकर विपक्ष और साथी दल वाले भड़क गए. शोर जब थमा तो पता चला कि बाकी के दल चाहते हैं कि चूंकि यह विदेश नीति का मामला है इसलिए बाकी दलों को विश्वास में लेना ज़रूरी है. वैसे भी कई महीने हो गए थे सरकार ने सभी दलों को विश्वास में नहीं लिया था. पिछली बार सरकार ने सांसदों की सैलेरी बढ़ाने के मामले में सभी दलों को विश्वास में लिया था. लेकिन उस बात को करीब सात महीने बीत गए थे. ऐसे में बाकी दलों की यह बात जायज भी लगी.

कभी विपक्ष में और कभी पक्ष में रहने वाले एक नेता जी बोले; "भाट इज दिस? ऐसा नै चलेगा. हम नाराज हूँ. सरकार का ड्यूटी है कि ऊ जेतना सेकुलर दल है ऊ सबको विशबास में ले.... आल दी सेकुलर पार्टी...का समझा? आ हम क्लीयर कर दें कि ई मुद्दा पर पर हम आ नेताजी साथ-साथ हैं. टूगेदर...कह सकता है सब कि ई मुद्दा पर हम विपक्ष में हैं...एतना इम्पार्टेंट फैसला बिना सब सेकुलर पार्टी से बात किये लिया कैसे सरकार ने? हमर डिमांड है कि इसके लिए 'सर्भदलीय' बैठक बुलाई जाय...आल पार्टी मीटिंग..तब जाके फैसला फाइनल होगा."

शोर मच गया. हंगामा हो गया. वाक आउट हो गया. अध्यक्ष ने लोकसभा की कार्यवाई स्थगित कर दी. विपक्ष ने जहाँ इसे लोकतंत्र की हत्या बताया वहीँ सरकार ने इसे लोकतंत्र को मजबूती प्रदान करने वाला कदम बताया. एक ही मुद्दे पर लोकतंत्र के ट्रीटमेंट को लेकर सरकार और विपक्ष एक्सट्रीम पर थे. यह देखकर एक बार फिर से लगा कि देश में केवल और केवल लोकतंत्र है, लोकतंत्र के अलावा कुछ नहीं है.

मीडिया में भी लोकतंत्र छाया रहा. जहाँ इस मुद्दे पर मीडिया का एक ग्रुप सरकार के पक्ष में था वहीँ दूसरा ग्रुप विपक्ष के पक्ष में था. दूसरा ग्रुप चाहता तो सरकार के विपक्ष में भी हो सकता था लेकिन पता नहीं क्यों उसे इस मुद्दे पर विपक्ष के पक्ष में होना ज्यादा उचित लगा. खैर, दोनों तरफ के लोग अपने-अपने स्टैंड पर डटे रहे.

नेता जी से पत्रकार ने सवाल किया कि; "कट-मोशन में तो आप सरकार के साथ थे. आज उसके विरुद्ध क्यों हैं?"

उन्होंने जवाब दिया; "ढेर दिन हो गया था जे हम सरकार का विरोध नहीं किये थे. पब्लिक सब सोच रहा था कि कहीं हम सरकार के साथ त नहीं हो गए? दू महीना हो गया था आ हमलोग को विरोध करने का कोई मुद्दा नहीं मिल रहा था एही बास्ते हम विदेश नीति का बात पर सरकार के विरोध में चले गए."

...जारी...

Friday, May 7, 2010

फिर से अधूरा इंटरव्यू




कल दोपहर करीब एक बजे नरोत्तम जी का फ़ोन मिला. क्या कहा? कौन नारोत्तम जी? अरे अपने नारोत्तन कालसखा जी, अरे वही मानवाधिकार वाले. हमेशा की तरह हलकाए से लग रहे थे. आवाज़ सुनकर लगा जैसे कोई आदमी मैराथन दौड़ते हुए हांफ रहा हो और बात भी करना चाहता हो.

मैंने पूछा; "क्या बात है? बड़े परेशान लग रहे हैं?"

वे बोले; "तुम पहले फटाफट मेरा एक इंटरव्यू ले लो."

उनकी बात सुनकर मुझे बड़ा अजीब लगा. मुझे पता है कि नरोत्तम जी ने इंटरव्यू देने में वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया है लेकिन इंटरव्यू लेने के लिए मुझसे कह रहे हैं?

मैंने पूछा; "क्या बात है? सब ठीक-ठाक है तो?"

वे बोले; "पहले मैं तुरंत एक इंटरव्यू देना चाहता हूँ."

मैंने पूछा; "अचानक इंटरव्यू का ख़याल क्यों आ गया? वो भी आप चाहते हैं कि मैं आपका इंटरव्यू लूँ?"

मेरी बात सुनकर भड़क गए. बोले; " आफिस में बैठकर करते क्या हो? इन्टरनेट कनेक्शन भी नहीं है क्या आफिस में?"

मैंने कहा; "ऐसी बात नहीं, कनेक्शन तो है. वैसे आप इंटरव्यू क्यों देना चाहते हैं?"

मेरी बात सुनकर और झल्ला गए. बोले; "कुछ भी पता नहीं है. अरे अजमल को फांसी की सजा हो गई."

मैंने कहा; "अजमल को फांसी की सजा हो गई! कौन अजमल?"

मेरी बात सुनकर बोले; "ओह जीजज..इस आदमी को यह भी नहीं पता कि मैं कौन से अजमल की बात कर रहा हूँ. अरे मैं अजमल कसाब की बात कर रहा हूँ."

उनकी बात सुनकर मुझे याद आया कि कसाब का पूरा नाम अजमल कसाब है. उनकी बात सुनकर एक बार के लिए लगा जैसे उन्हें कसाब कहने में शायद बुरा लगता हो क्योंकि सुना है कसाब का मतलब कसाई होता है. शायद इसीलिए वे उसे उसके फर्स्ट नेम से पुकारते हैं.

यही सोचते हुए मैंने उनसे कहा; "लेकिन कालसखा साहब आप मुझे इंटरव्यू क्यों देना चाहते हैं? आपकी तो वैसे ही आज टीवी न्यूज़ चैनलों पर बड़ी डिमांड रहेगी."

मेरी बात सुनकर बोले; "अरे टीवी पर तो इंटरव्यू रात को लिए जायेंगे. पैनल डिस्कशन भी सारे रात को होंगे. ऐसे तुम क्या चाहते हो कि मैं शाम तक इंतज़ार करूं? मेरा मन कर रहा है कि अभी तुरंत इंटरव्यू दे डालूँ. मैं अपनी अभिव्यक्ति की कुलबुलाहट को संभाल नहीं पा रहा हूँ. अभी फिलहाल टीवी पर आम लोगों के इंटरव्यू आ रहे हैं इसलिए मैंने सोचा कि तुम्हारे ब्लॉग पर ही इंटरव्यू दे डालूँ."

मैंने कहा; "ना बाबा न. बुरा मत मानियेगा लेकिन मैं आपका इंटरव्यू नहीं ले सकता."

वे बोले; "क्यों नहीं ले सकते? क्या प्रॉब्लम क्या है तुम्हें?"

मैंने कहा; "पिछली बार मेरा 'ब्लॉग-पत्रकार' आपका इंटरव्यू लेते हुए बेहोश हो गया था. इस बार तो वो भी नहीं है."

वे बोले; "क्यों नहीं है? कहाँ गया वो? उसने क्या कोई और ब्लॉग ज्वाइन कर लिया?"

मैंने कहा; "नहीं-नहीं ऐसी बात नहीं है. असल में उसने राजनीति ज्वाइन कर ली."

वे बोले; "मुझे उसके अन्दर छिपा हुआ राजनीतिज्ञ उसी दिन दिख गया था जिस दिन वो मेरा इंटरव्यू लेते हुए बेहोश हुआ था. वैसे कौन सी पार्टी ज्वाइन की उसने?"

मैंने उन्हें बताया कि कैसे मेरा ब्लॉग-पत्रकार देवगौड़ा जी का इंटरव्यू लेने बंगलुरू गया था और वहीँ उसने उनकी पार्टी ज्वाइन कर ली. मेरी बात सुनकर बोले; "वो सब छोड़ो ब्लॉग-पत्रकार और मिल जायेंगे लेकिन पहले मेरा इंटरव्यू लो. तुम खुद ले लो."

क्या करता? आपलोग तो जानते ही हैं कि मेरा ब्लॉग कभी किसी की डायरी के पेज से तो कभी किसी के इंटरव्यू से चलता है. भविष्य में अगर नई पोस्ट के लिए विषय न मिला तो कलसखा जी के इंटरव्यू से एक पोस्ट बन जायेगी, यही सोचते हुए मैंने उनका इंटरव्यू लिया. पेश है इंटरव्यू. आप बांचिये.
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शिव: नमस्कार कालसखा जी.

नरोत्तम जी : नमस्कार वगैरह ठीक है जल्दी से मुद्दे पर आइये और सवाल पूछिए.

शिव: जी जरूर. आप ये बताइए कि आज स्पेशल कोर्ट ने कसाब को फांसी की सजा सुना दी. ऐसे में आपको कैसा लग रहा है?

नरोत्तम जी: आपका सवाल सुनकर मुझे ख़ुशी हुई. मुझे लगा जैसे कोई टीवी चैनल का पत्रकार मुझसे सवाल कर रहा है. वैसे जहाँ तक अजमल को फाँसी की सज़ा सुनाये जाने की बात है, तो मेरा कहना यही है कि मैं पर्सनली कैपिटल पनिसमेंट के खिलाफ हूँ. किसी को फाँसी की सजा बेसिक ह्यूमन राइट्स वायलेशन है.

शिव: मतलब यह कि फाँसी की सजा के मुद्दे पर आप आधुनिक फैशन के हिसाब से चलते हैं?

नरोत्तम जी: देखिये यह फैशन की बात नहीं है. मैं आपसे एक सवाल करता हूँ. जो जज किसी को जीवन दे नहीं सकता उसे जीवन लेने का अधिकार है क्या?

शिव: यह बात तो उस अपराधी पर भी लागू होती है जिसने किसी का जीवन ले लिया हो.

नरोत्तम जी: नहीं. यही तो बुनियादी फर्क है. वह तो अपराधी है. उसका काम अपराध करना है लेकिन दूसरी तरफ तो जज है. उसका काम अपराध करना तो नहीं है न.

शिव: आपके कहने का मतलब जज अगर किसी को फाँसी की सज़ा सुनाता है तो वह भी अपराध करना हो गया?

नरोत्तम जी: नहीं आप मेरी बात समझ नहीं रहे. मेरे कहने का मतलब है जज का काम है कानून का फैसला सुनाना. किसी को सज़ा देकर उसका जीवन लेना नहीं है.

शिव: लेकिन भारतीय कानून तो कहता है कि रेयरेस्ट ऑफ़ रेयर केसेज में फाँसी की सजा होनी चाहिए.

नरोत्तम जी: नहीं इसे केवल भारतीय कानून के हिसाब से देखा जाना ठीक नहीं होगा. आज लगभग पूरे यूरोप में कैपिटल पनिसमेंट अबोलिस हो रहा है. ऐसे में हमें चाहिए कि हम अपने कानून पर फिर से विचार करें. आज देश में एक बदलाव लाने की ज़रुरत है. जीवन अपने आप में बहुमूल्य होता है.

शिव: लेकिन एक आतंकवादी का जीवन ही बहुमूल्य है? जिन लोगों को उसने मारा उनका जीवन क्या...

नरोत्तम जी: देखिये कोई भी इंसान पैदा होते ही आतंकवादी नहीं बन जाता. आतंकवाद क्या है पहले इसे डिफाइन करना पड़ेगा. उसकी तह में जाना पड़ेगा. युवक आतंकवादी क्यों बनते हैं? आज पूरे विश्व में इस तरह का माहौल तैयार हो गया है कि शोषित युवा को आतंकवादी करार दिया जा रहा है. वह युवा जिसका शोषण सरकारें कर रही हैं. सरकार का आतंकवाद सबसे पहले है और सबसे बड़ा भी. इन युवकों का आतंकवाद तो सरकार के आतंकवाद का जवाब है. क्या है आतंकवाद? ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के अनुसार टेरोरिज्म इज अ काम्प्लेक्स टर्म व्हिच सिग्निफाई....

शिव: क्या सर? आप एक अपराधी को मिली सजा को गलत साबित करने के लिए आप टेरोरिज्म की परिभाषा डिक्शनरी से दे रहे हैं. अगर आतंकवादियों को उचित सजा नहीं मिले तो..

नरोत्तम जी (बीच में काटते हुए): आप एक बात बताइए. किसी को फाँसी की सजा देने से आतंकवाद रुक जाएगा क्या?

शिव: माना कि नहीं रुकेगा लेकिन क्या ऐसे में अपराध की सजा देना बंद कर दिया जाए?

नरोत्तम जी: नहीं, मैं वो नहीं कह रहा हूँ. फाँसी की जगह और कोई सजा दीजिये. उस तथाकथित आतंकवादी को सुधारने की कोशिश कीजिये.

शिव: आपको लगता है कि कसाब को सुधारा जा सकता है?

नरोत्तम जी: क्यों नहीं? अगर गौतम बुद्ध की वजह से अंगुलिमाल जैसा अपराधी सुधर सकता है तो अजमल तो उससे बहुत छोटा अपराधी है. हमें ज़रुरत है उसे सपोर्ट करने की. उसे ऐसा वातावरण देने की जिसमें उसका जीवन अच्छा हो. अपराध को अपने बीच से हटाइए, अपराधी को नहीं. पिछले तीस सालों में यूरोप और अमेरिका में कैपिटल पनिसमेंट के खिलाफ अभियान चलाये जा रहे हैं. क्यों चलाये जा रहे हैं? क्योंकि किसी को फाँसी की सजा देना बदले की भावना से दिया गया फैसला होता है. ऐसे में मानव जाति की भलाई इसी में है कि लोग समझें.....

अभी वे बोल ही रहे थे कि उनके फोन की घंटी बजी. हेलो कहते ही बोले; "ओह अरनब...आई वाज वेटिंग फॉर योर कॉल...आई एम कमिंग...बी देयर विदिन टेन मिनट्स...हू आर द आदर पैनेलिस्ट? हू? मनीष तिवारी? ग्रेट!.... हू...तरुण बिजय?..जस्ट द राइट पीपुल...कोलिन फ्रॉम आर साइड?..बस आ रहा हूँ."


इतना कह कर मुझे छोड़ कर चले गए. इतना गुस्सा आया कि क्या कहूँ? अभी भी लोग ब्लॉग वालों को न जाने क्या समझते हैं? टीवी वालों के सामने कुछ समझते ही नहीं. मन तो हुआ कि इसी बात के प्रोटेस्ट में एक महीना कोई पोस्ट ही न लिखूं. फिर सोचा कि नरोत्तम जी का इंटरव्यू अपने ब्लॉग पर छापूँ ही नहीं. फिर सोचा कि चलो छाप देता हूँ नहीं तो भविष्य में इंटरव्यू न दे तो....

Tuesday, February 2, 2010

इन्ही के लिए सब इतना हलकान है???




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शाहिद आफरीदी हैं न. अरे वो पाकिस्तान वाले. अरे वही जो यंग हैं. अरे यार, वही विश्व के नंबर एक खिलाड़ी.... अरे गजब हो.... नंबर एक क्या केवल तेंदुलकर ही हो सकते हैं? अरे वही यार, जिनको आई पी एल में नहीं लेने पर झमेला हो गया.

हाँ वही-वही. दो दिन पहले आस्ट्रेलिया की आस्ट्रेलियाई पिच पर क्रिकेट की बाल चबाते हुए देखे गए. आफरीदी को बाल चबाते देख, पाकिस्तानी टीम मैनेजमेंट को बहुत गुस्सा आया. उन्होंने प्लान बनाया कि वे इस बात की शिकायत आई सी सी से करेंगे. वे उन्हें बताएँगे कि आस्ट्रेलिया में पाकिस्तानी खिलाड़ियों को ढंग से खाना नहीं खिलाया जाता. खाना नहीं मिलने की वजह से खिलाड़ी भूखे रहते हैं और बाल चबाने लगते हैं. यही कारण है कि पाकिस्तानी टीम आस्ट्रेलिया में एक भी मैच नहीं जीत पाई.

अभी मैनेजर साहब शिकायत ड्राफ्ट कर ही रहे थे कि किसी ने उन्हें बताया कि जिसे वे भूख बताने पर आमादा हैं, असल में उसे बाल टेम्पेरिंग कहते हैं. मतलब बाल के साथ छेड़-छाड़. उन्हें इस बात पर विश्वास ही नहीं हुआ. पिछले कई वर्षों से पाकिस्तानी टीम के साथ रहकर उन्होंने यही जाना था कि छेड़-छाड़ केवल महिलाओं के साथ हो सकती है. खुद आफरीदी भी एक बार हवाई जहाज में लड़की से छेड़-छाड़ करते धर लिए गए थे.

जितना ड्राफ्ट किया गया था, उसे सेव कर के छोड़ दिया गया. बाद में अम्पायर लोगों ने बताया कि आफरीदी तो बाल के साथ सचमुच छेड़-छाड़ कर रहे थे. अब तो छेड़-छाड़ का ये मामला मैच रेफरी तक जाएगा.

यह सब सुनकर मैनेजर बोले; "मैं मान ही नहीं सकता जी. अल्ला-ताला के फज़ल से बाल टेम्पेरिंग वो होती है जो कोक की बोटल कैप से की जाय. इमरान भाई ने इसी को बाल टेम्पेरिंग बताया था. वे खुद भी ऐसे ही बाल टेम्पेरिंग करते थे."

किसी ने कहा; "उसी अल्ला-ताला के फज़ल से अब जमाना बदल गया है. अब बाल टेम्पेरिंग ऐसे भी होती है जैसे आफरीदी ने किया है. बाल को ही चबा जाओ. काहे कोक की बोटल का एहसान लो?"

मैनेजर साहब इस बात पर आश्वस्त हुए कि पाकिस्तानी क्रिकेट सही तरक्की कर रहा है.

बाद में शाहिद आफरीदी ने माना कि जो उन्होंने किया उसे बाल टेम्पेरिंग ही कहते हैं. टीम मैनेजमेंट के ह्रदय में क्रैक हो गया. टीम मैनेजमेंट ने सोचा था कि मीडिया-वीडिया में हल्ला मचा देंगे और इस बात को नहीं मानेंगे कि शहिद आफरीदी ने टेम्पेरिंग जैसी कोई हरकत की है.

लेकिन आफरीदी जी ने क़ुबूल करके सब गड़बड़ कर दिया.

आफरीदी जी ने क़ुबूल भी बड़े मस्त अंदाज़ में कहा. बोले; "इल्लीगल तो है जी. लेकिन वो क्या है न कि फ्रस्ट्रेशन थी जी. पाकिस्तान टीम एक भी मैच जीत नहीं पा रही थी." इतना कहने के बाद शायद उन्हें लगा होगा कि ये क़ुबूल करना तो एक तरफ़ा हो रहा है इसलिए फट से बोले; "और वैसे भी जी, दुनियाँ की हर टीम करती है जी, बाल टेम्पेरिंग."

कहने का मतलब यह कि मुल्क के लिए जो करें कम है जी.

बाल टेम्पेरिंग करके उन्होंने बता दिया कि टीम के न जीतने की दशा में कुछ न कुछ किया जा सकता है. पिच को स्पाइक से खोदने का काम वे पहले ही कर चुके थे. गाली-वाली देकर भी टीम को जिताने का प्रयास कर ही लिया था. अब बाल टेम्पेरिंग भी आजमा लिया.

आगे अगर इसे बढ़ाएंगे तो क्या-क्या आजमा सकते हैं?

अब पाकिस्तान में तो वैसे भी कोई खेलने नहीं जाता. इन्हें खेलना होगा तो किसी और देश में जाना ही पड़ेगा. देखेंगे कि किसी दौरे पर पकिस्तान टीम मैच नहीं जीत पा रही है. कप्तान की समझ में नहीं आ रहा है कि क्या किया जाय? कौन सा दांव खेला जाय? डेढ़ सौ रन बनाकर खेल रहे बैट्समैन को आफरीदी अचानक बाल मारकर घायल कर देंगे.

अम्पायर पूछेगा कि यह क्या कर रहे हो तो आराम से बोल देंगे; "फ्रस्ट्रेशन है जी. मुल्क जीत नहीं पा रहा है जी. क्या करें जी? मानता हूँ इल्लीगल है लेकिन जीतने के लिए... मुल्क के लिए कुछ करना तो पड़ेगा जी...."

इन्ही वर्ल्ड नंबर वन के न खरीदे जाने पर अपने देश में इतना बड़ा बवाल हो गया. मीडिया ने आई पी एल को गाली दी. शाहरुख़ खान को शिवसेना वालों ने गाली दी. बुद्धिजीवियों ने टीम के मालिकों को गाली दी.मीडिया, सरकार, शाहरुख़, पत्रकार, बुद्धिजीवी और न जाने कौन-कौन हलकान हुए जा रहे थे.