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Wednesday, January 13, 2016

ऑड-इवेन प्लान कवियों की कलम से




दिल्ली का इवेन-ऑड प्लान पिछले कई दिनों से चर्चा का विषय बना हुआ है। टीवी पर तर्क-वितर्क चल रहा है लेकिन अगर इवेन-ऑड प्रसंग पर तमाम कवि कविता लिखते तो क्या निकल कर आता? शायद कुछ ऐसा;

कुमार विश्वास

कोई सक्सेस समझता है, कोई फेल्योर कहता है,
मगर टीवी की बहसों में हमारा शोर चलता है,
कहा भक्तों ने क्या इसबात में क्या आनी-जानी है,
इधर अरविन्द दीवाना, उधर दिल्ली दिवानी है।

रहीम

रहिमन इवेन-ऑड की महिमा करो बखान,
जबरन ओहि सक्सेस कहो, चलती रहे दुकान।

कबीर

कबिरा इवेन-ऑड की ऐसी चली बयार,
सब आपस में लडि मरें भली करें करतार।

बच्चन

कार्यालय जाने की खातिर,
घर से चलता मतवाला,
असमंजस है कौन सवारी
चढ़ जाए भोला-भाला,
कोई कहता मेट्रो धर लो,
कोई कहता बस धर लो,
मैं कहता हूँ ऑफिस त्यागो,
पहुँचो सीधे मधुशाला।

गुलज़ार

धुएं की चादर की सिलवटों में
लिपटी दिल्ली,
सुरमई धूप सेंक रही है आज,
आज दिखी नहीं,
मोटरों की परछाइयां,
जिनसे गुफ्तगू करती थी
ये सडकें,
जो देखा करती थीं
इन सड़कों की स्याह पलकों को,
किसी ने कह दिया उनको
कि इवेन-ऑड जारी है।

मैथिलीशरण गुप्त

इवेन-ऑड कहानी
विषमय वायु हुई नगरी की,
खग-मृग पर छाई मुरधानी,
इवेन-ऑड कहानी

जन हैं हठी चढ़े सब वाहन,
दिल्ली नगरी रही न पावन,
अश्रु बहाते लोचन मेरे
जन करते नादानी
इवेन-ऑड कहानी,

हुआ विवाद सदय-निर्दय का,
अधियारा छाया है भय का,
उषा-किरण से निकलें विषधर,
व्यथित हुआ यह पानी
इवेन-ऑड कहानी।

काका हाथरसी

गैरज में कारें खड़ी, जाना है अस्पताल,
धुंआ घुसता नाक में आँख हो रही लाल,
आँख हो रही लाल, पास ना इवेन गाडी,
सरकारी माया से कक्का हुए कबाड़ी,
कह काका कविराय कोई तो मुझे बचाए,
अपनी इवेन कार चला हमको पहुंचाए।

दिनकर

हो मुद्रा गर तो आधा दो,
उसमें भी हो गर बाधा तो,
फिर दे दो हमको ऑड कार,
मेरे गैरेज में इवेन चार,

था वचन कि बसें चलाओगे
अपना कर्तव्य निभाओगे,
पर भीड़ देख होता प्रतीत,
इससे अच्छा था वह अतीत,

जब मनुज पाँव पर चलता था,
आचरण उसे न खलता था,
अब भूमि नहीं जो रखे पाँव,
आहत करता शासकी दांव,

जाने कैसे दिन आयेंगे,
इस मनुज हेतु क्या लायेंगे,
यह इवेन-ऑड कब टूटेगा,
यह महावज्र कब फूटेगा,

हो सावधान रायतामैन,
कर कुछ सबको आये जो चैन,
अन्यथा नागरिक लिए रोष,
मढ़ देगा तेरे शीश दोष।


Monday, October 19, 2015

दुर्योधन की डायरी - पेज १४१




बड़ी बमचक मची है कि कवि और साहित्यकार साहित्य अकादमी टाइप संस्थाओं से मिले पुरस्कार लौटा रहे हैं. लोग अपने-अपने विचार प्रकट कर रहे हैं. दूसरों के विचार काट रहे हैं. तर्क, वितर्क और कुतर्क किये जा रहे हैं. कुछ लोग बता रहे हैं कि जिन कवियों को ये पुरस्कार मिले हैं उनकी कविताएं घटिया हैं. कुछ बता रहे हैं कि कुछ कवियों को पिछले शासकों की बड़ाई लिखने के लिए पुरस्कार मिले हैं. लेकिन मैं आपको बता दूँ कि राजाओं-महाराजाओं का यशगान कवियों का कोई नया शगल नहीं है.



कल मेरी नज़र युवराज दुर्योधन की डायरी के पेज १४१ पर पडी. यहाँ टाइप कर दे रहा हूँ. आप बांचिये कि युवराज क्या लिखते हैं?

"आज हस्तिनापुर साहित्य रत्न से सम्मानित कवि रमाकांत बाजपेयी ने पांडवों को इंद्रप्रस्थ दिए जाने के विरोध में अपना सम्मान लौटा दिया। उधर जयद्रथ और दुशासन ने और कवियों को सम्मान लौटाने के लिए उकसा दिया है. ये कवि और साहित्यकार पुरस्कार लौटाकर पितामह और चाचा विदुर को कैसे परेशान करते हैं, अब हस्तिनापुर यह देखेगा। इतने महान कवि रमाकांत बाजपेयी से शुरुआत हो गई है तो मामला आगे ही बढ़ेगा, पीछे नहीं जाएगा. मुझे आज इस महान कवि की वह रचना याद आ गई जिसके लिए उन्हें पिताश्री ने अपने हाथों से साहित्य-रत्न का पुरस्कार दिया था. जो कुछ ऐसी थी;



जय हो नरेश धृतराष्ट्र सहित युवराज सुयोधन की जय हो,
हमको जिससे सम्मान मिला उस राष्ट्र और धन की जय हो,
जय हो गांधारी-पुत्री की, जय हो दामाद जयद्रथ की,
जय हो घोड़ो की, गदहों की, और उनमें जुते हुए रथ की.

भारत भर का जो है गौरव, ऐसा है कोई राज कहाँ,
जिनपर हो गर्व धर्मपथ को ऐसा है कोई आज कहाँ?
व्यवहार हो जिनका न्यायोचित, जिनसे जीवित मानवता हो,
जो धर्म-कर्म का रखे ध्यान, बस न्यायपथों पर चलता हो,

जिसने अपना सुख त्याग रखा हो प्रजाजनों का ध्यान यहाँ,
जो अहंकार तजकर देता हो बुद्धिमनों को मान यहाँ,
जो कवियों का सम्मान करे, जो बाँटे हमको पुरस्कार,
ऐसे न्यायोचित राजा प्रति हम आज प्रकट करते अभार,

जब पांडु मरे और अकस्मात हो गया हस्तिनापुर अनाथ,
सबको चिंता थी क्या होगा, कैसे जीयेंगे सभी साथ,
तब प्रजाजनों के मुखर बिंदु पर एक नाम बस आया था,
धृतराष्ट्र नाम के उस योद्धा को इसी राष्ट्र ने पाया था,

जो गुण वैभव की खान रहा जिसके जीवन का दान मिला,
जिस राजा के वैभव-प्रताप को दुनियाँ भर में मान मिला,
जिसके सौ पुत्रों ने स्थापित किया धर्म का राज यहाँ,
जिनके बल, बुद्धि और तेज़ से कांपे अधरम आज यहाँ,

जिसने आँखों का किया दान औ दिया प्रजा को बस प्रकाश,
जिसको देखे यह राष्ट्र और फट उर में उसके जगे आस,
जिसके कृपाण की ध्वनि से डरता रहा सदा अन्यायी है,
जिसके भुज के प्रताप पर चढ़कर मानवता निज आई है,

जिसने पुत्रों को दिया ज्ञान कि धर्ममार्ग पर चलना है,
स्थापना धर्म की हो उनको दीपक की भांति ही जलना है
जिसने पांडवों को किया मुक्त जिम्मेवारी की धारा से,
जिसके कारण ये राष्ट्र दूर ही रहा कलंकित कारा से,

जिसके पुत्रों से लाक्षागृह में जली न्याय की अमिट आग,
जिन पुत्रों के चलते जागा है राष्ट्रप्रेम का बड़ा भाग,
यह महाकवि उसके समक्ष अपना यह शीश नवाता है,
और उस नरपति से निजहित में थोड़ा उत्कोच कमाता है.

Monday, October 5, 2015

द्वापर-युग का एक टीवी पैनल डिस्कशन




महाभारत में युधिष्ठिर के राजसूय-यज्ञ का प्रसंग पढ़ रहा था. राजसूय-यज्ञ के समय हुए शिशुपाल वध की बात पढ़ी. श्रीकृष्ण पूजन पर शिशुपाल के असम्मति से संवैधानिक संकट जैसी किसी चीज का निर्माण हो गया. संयोग भी देखिये कि यह शिशुपाल जी द्वारा किया गया श्रीकृष्ण का सौवां अपमान निकला। खैर, सभा में धर्म वगैरह की व्याख्या पढ़ी गई. तर्कों के तीर छोड़े गए. इन तीरों को काटने के लिए नए तर्कों के तीर गढ़े गए. फिर उधर से तर्क-तीर चले. फिर इधर से उनको काटा गया.

तर्क वगैरह कटने के बाद काटने के लिए एक ही चीज बची थी, शिशुपाल की गर्दन. श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र को भेज शिशुपाल जी की गर्दन काट उन्हें यमपुरी भेज दिया. देवताओं ने ऊपर से पुष्पवर्षा की.

धर्मराज युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ की समाप्ति हुई.

मन में आया कि वहाँ जो कुछ भी हुआ उसको बड़ी सहजता से क्यों स्वीकार किया गया? फिर मन में आया कि; वैसे और कर भी क्या सकते थे लोग़? उन दिनों टीवी चैनल तो थे नहीं कि पैनल डिस्कशन होते, रपट निकलती, विशेषज्ञ बैठते और बाल की खाल निकालते. ऐसा करने से शिशुपाल जी का मामला आराम से दस-बारह वर्षों तक चलता. इन्वेस्टिगेशन होता. एस आई टी जांच करती. रपट लीक होती. मानवाधिकार कार्यकर्ता नारे लगाते. मानवाधिकार नेता टीवी पर दलीलें देता. दूसरों की बात न सुनता और समय निकालकर कैंडिल मार्च कर डालता। शिशुपाल जी के लिए न्याय की मांग उठाई जाती।

कुल मिलाकर बड़ी बमचक मचती.

शायद कुछ ऐसे:-

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न्यूज-आवर पर अरनब गोस्वामी.

अरनब - "When so-called religion pushes humanity to the backseat, ladies and gentlemen, when some human beings start believing, they are more equal than others.. when rulers with help of the powerful seek to finish other rulers, then we are bound to be pushed many generation back, then we as human beings are doomed...then humanity is threatened to be finished..

..and amidst this threat to humanity ladies and gentlemen, I am here tonight on Newshour, yet again to save the humanity from ruthless and powerful

"Good evening. In a bizarre turn of events, परसों करीब 10 बजे सुबह इंद्रप्रस्थ में युधिष्ठिर की भरी सभा में दिन-दहाड़े श्रीकृष्ण ने चेदिप्रदेश के महाराज शिशुपाल का मर्डर कर दिया. उस महाराज शिशुपाल का जो राजा तो थे ही, श्रीकृष्ण के फूफा भी थे. हमारे सोर्सेज बताते हैं कि सभा में प्रजेंट शिशुपाल के दोस्तों ने विरोध किया लेकिन उनकी आवाज़ को दबा दिया गया. सवाल यह है कि इस देश में अब Rule of Dharma है या नहीं? सवाल यह भी उठता है कि क्या अधर्मियों की आवाज़ को ऐसे ही दबा दिया जाएगा?

तरह-तरह के दावे किये जा रहे हैं. चेदिप्रदेश के मानवाधिकार कार्यकर्ता और महाराज शिशुपाल के दोस्त चाहते हैं कि इस मामले की पूरी छानबीन SIT से कराई जाय लेकिन इंद्रप्रस्थ में उनकी बात नहीं सुनी जा रही है. आज इंद्रप्रस्थ में युधिष्ठिर के महल के सामने इन मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन किया तो पुलिस ने उनके ऊपर लाठीवर्षा की. ऐसे में The nation wants to know the truth.

सच क्या है यह देश जानना चाहता है. हमारे साथ हैं हस्तिनापुर से कृपाचार्य to interpret Dharma. हस्तिनापुर से ही हमारे साथ हैं महामंत्री विदुर. We also wanted Shree Krishna to come and defend himself but he refused. वे नहीं आये. उनको represent करने के लिए हमारे साथ इंद्रप्रस्थ से हैं बलराम. इन्द्रप्रस्थ से ही हमारे साथ है सहदेव.

और स्टूडियो में मेरे साथ है चेदिप्रदेश से आये नरोत्तम कलसखा जो ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट हैं और Save the Demon नाम का NGO चलाते हैं और जो चाहते हैं कि शिशुपाल मर्डर केस की जांच SIT करे. साथ ही मेरे दायीं ओर हैं वरिष्ठ पत्रकार मिस्टर आशुतोष.

विदुर जी, मैं आपसे शुरू करना चाहता हूँ. क्या हुआ यह? भरी सभा में किसी को क़त्ल कर देना कहाँ तक जायज़ है?"

विदुर:- "देखें ऐंकरश्री, पहले तो मैं आपको बता दूँ कि शिशुपाल श्रीकृष्ण के फूफा नहीं बल्कि उनके फूफेरे भाई थे. अब आप के सवाल पर आता हूँ. देखें, जिसे आप क़त्ल कह रहे हैं दरअसल वह क़त्ल नहीं है. उसे वध कहते हैं. धर्मशास्त्रों के अनुसार क़त्ल और वध में अंतर होता है."

अरनब:-"लेकिन विदुर जी, end result तो दोनों का एक ही है न. आप उसको कोई भी word दे दें लेकिन दोनों का result यह है कि एक आदमी मारा जाता है."

विदुर:-"ऐंकरश्री, आप पहले मेरी बात पूरी तो होने दें. देखें, किसी अपराध के दंडस्वरुप अगर किसी को मारा जाता है तो उसे वध...."

(स्टूडियो में बैठे नरोत्तम कालसखा उत्तेजित होकर)

नरोत्तम कालसखा:-"आप ये बताएं..आप ये बताएं.."

(स्टूडियो में बैठे आशुतोष के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है. वे मुस्कुराते हुए ना ना के इशारे में सिर हिलाते है जिससे लगता है कि वे न केवल विदुर से असहमत है बल्कि यह भी लगता है कि पूरे राष्ट्र में उनकी सी समझ रखनेवाला कोई नहीं)

अरनब:-"okay okay. Narottam ji wants to rebut you विदुर जी. मैं नरोत्तम जी के पास जाता हूँ. नरोत्तम जी, यह बताएं कि विदुर जो कह रहे हैं आप उससे सहमत हैं?"

नरोत्तम कालसखा:-"बिलकुल नहीं अरनब। ये तथाकथित धर्म के जानकर केवल शब्दों से खेलना जानते हैं. ये विदुर जी आज हस्तिनापुर में बैठकर धर्म सिखा रहे हैं लेकिन मैं बता दूँ कि उनकी यह दलील शब्दों की जादूगरी के सिवा और कुछ नहीं है. मैं पूछता हूँ कि केवल अपमान करने से किसी कि हत्या कर देना कैसा धर्म है?"

आशुतोष:-"मैं तो और आगे जाकर कहूँगा कि ……

अरनब:- "one second one second आशुतोष। मैं आपके पास आऊंगा, मैं आऊंगा। विदुर जी, जवाब दें. नरोत्तम जी पूछ रहे है कि केवल अपमान के लिए किसी का murder कर देना कैसा धर्म है?"

विदुर:-"देखें, आप मुझे अपनी बात पूरी करने देंगे तब तो मैं कुछ कहूँगा. मुझे लगता है कि आपको मुझे बोलने का मौका देना चाहिए।"

अरनब:-"वैसे तो मैं किसी को मौका नहीं देता विदुर जी लेकिन आप कह रहे हैं तो आपको दे देता हूँ"

विदुर:-"धन्यवाद। और अब मेरी बात ख़त्म होने तक मुझे टोकें नहीं। देखें, यह अपमान के एवज में की गई हत्या का मामला नहीं है. यह उससे आगे का मामला है. दरअसल मामला अधर्मी को दण्डित करने का है. बात केवल यह नहीं है कि शिशुपाल ने श्रीकृष्ण का अपमान किया, बात यह भी है कि शिशुपाल अपने क्षेत्र के राजाओं से बिना किसी वजह युद्ध करता रहा है. प्रजा को और ऋषि-मुनियों को वर्षों से सताता रहा है. यह केवल श्रीकृष्ण के अपमान का मामला नहीं है. यह धर्म और अधर्म का युद्ध...

नरोत्तम कालसखा:-"विदुर जी, आज आपको धर्म याद आ रहा है.…"

(कृपाचार्य हाथ उठाकर बोलने की अनुमति लेना चाहते है. अनुमति न मिलने पर शुरू हो जाते है)

कृपाचार्य:-"शास्त्रों के अनुसार …"

अरनब:-"कृपाचार्य जी, मैं आऊंगा आपके पास. मैं आऊंगा। wait for your turn. अभी आप नरोत्तम जी को बोलने दें. go ahead नरोत्तम जी"

नरोत्तम कालसखा:-"अरनब मैं विदुर जी से वही कह रहा था कि धर्म तो यह भी कहता है कि स्त्री की हत्या नहीं करनी चाहिए. यदि श्रीकृष्ण धर्म के अनुसार ही आचरण करते हैं तो पूतना की हत्या क्यों की? उस समय धर्म का विचार उनके मन में क्यों नहीं आया? क्यों नहीं सोचा कि स्त्री की हत्या धर्म के विरुद्ध है?"

विदुर :-"देखें ऐक्टिविस्टश्री, पूतना एक राक्षसी थी और वासुदेव कृष्ण ने उसकी हत्या नहीं अपितु उसका भी वध ही किया था. वह श्रीकृष्ण को मारने के लिए गई थी. धर्म कहता है कि कोई भी व्यक्ति अपने जीवन को बचाने के लिए किसी का भी वध कर.…"

नरोत्तम कालसखा:-"सुनिए सुनिए विदुर जी पहले मेरी बात सुनिए"

विदुर:-"आपको याद हो तो त्रेता युग में भी.…"

नरोत्तम कालसखा:-"अरे सुनिए सुनिए विदुर जी, मेरी बात भी तो सुनिए। देखिये ऐसा है कि मैं कोई पूतना का पक्ष नहीं ले रहा लेकिन आपसे जरूर पूछना चाहूँगा कि; हो सकता है पूतना हत्या करने के इरादे से गई होगी पर उसने श्रीकृष्ण की हत्या तो नहीं की न. केवल शक के बिला पर उसकी हत्या कर देना तो अपराध हुआ."

आशुतोष:-"बिलकुल"

विदुर:-"तो कालसखा जी, आप क्या चाहते हैं कि पूतना श्रीकृष्ण को मार देती तभी उसका वध किया जा सकता था?"

सहदेव:-"मैं कहना चाहूँगा…"

अरनब:-"सहदेव जी, सहदेव जी, हम आपको बोलने का मौका देंगे, हम देंगे मौका। फिलहाल नरोत्तम जी को उनकी बात पूरी करने दें. हाँ, go ahead नरोत्तम जी"

नरोत्तम कालसखा:-"मैं वही कह रहा था. मैं पूछता हूँ कि क्या सबूत है कि पूतना श्रीकृष्ण की हत्या के इरादे से ही गई थी? श्रीकृष्ण ने कह दिया और आप मान गए? और फिर एक बात बताएं विदुर जी; क्या आप नहीं मानते कि हत्याऑं के मामले में श्रीकृष्ण का रिकार्ड ही खराब है? पूतना को तो जाने दें, श्रीकृष्ण ने उसे भी मार डाला जो उनका खुद का मामा था, महाराज कंस. आज यह बात तो जग के सामने है कि उन्होंने महाराज कंश को मार डाला था. अब महाराज शिशुपाल की हत्या कर दी जो खुद उनके फूफेरे भाई थे. एक बहुत ही वीर राजा। और फिर आपको याद हो तो इन्ही कृष्ण ने बचपन में ही बकासुर की हत्या कर दी थी. वृषभासुर को मार डाला. मैं पूछता हूँ बचपन से ही केवल हत्याएं करना कौन सा धर्म है?"

विदुर:-"नरोत्तम जी, पहले आप की जानकारी के लिए बता दूँ कि राक्षसों और अपराधियों को मारना...."

अरनब:-"okay okay ओके..मैं आशुतोष की तरफ आता हूँ. tell me Ashutosh, ये जो भरी सभा में दिन-दहाड़े हत्या हुई है, इसके बाद आप इस मामले को कहाँ जाता हुआ देखते हैं?"

आशुतोष-"अर्नब, यह मामला उतना सीधा नहीं है जितना दिखाई देता है. जहाँ तक मेरी जानकारी है, श्रीकृष्ण का इस तरह से रिएक्ट करना ठीक नहीं था. मैं एक बात और बता दूँ अर्नब. देखें पहले यह बात सुनी गई कि इन्द्रप्रस्थ की सभा में ही शिशुपाल ने श्रीकृष्ण का सौवीं बार अपमान किया लेकिन सूत्रों की मानें तो यह शिशुपाल द्वारा श्रीकृष्ण का सौवां अपमान नहीं था. खुद मेरे अपने सोर्स ने बताया है कि यह सौवां अपमान नहीं था. मैंने इस केस को बहुत नजदीक से फालो किया है और मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि जल्द ही इस केस में ऐसे-ऐसे तथ्य सामने आ सकते हैं जो न केवल उन सभी तथ्यों से भिन्न होंगे जो अभी पब्लिक डोमेन में हैं बल्कि पूरे देश को आश्चर्यचकित कर देंगे."

अरनब:-"जैसे? क्या खुलासा हो सकता है इस केस में?"

आशुतोष :-"अर्नब, मुझे मेरे सोर्सेज से जानकारी मिली है कि यह केस बहुत पेंचीदा है. जितनी खोजबीन मैंने की है उससे हैरत में डाल देने वाली बातें आई हैं सामने. अपमानों का रजिस्टर मेंटेन करने वाले श्रीकृष्ण के कर्मचारी से भी मेरी बात हुई है और उसने भी इसबात से इंकार नहीं किया कि अपमानों की एंट्री करने में उससे भी गलती हो सकती है."

बलराम:-"अब यह तो...."

अरनब:-"one sec, one sec, one sec. बलराम जी मैं आता हूँ आपके पास. आपके पास आता हूँ. आशुतोष को उनकी बात … okay okay go ahead आशुतोष"

आशुतोष:-"मैं वही कह रहा था कि अपमानों के रजिस्टर में एंट्री करने में गलती भी हो सकती है अर्नब"

अरनब:-"जैसे? किस तरह की गलती की बात कर रहे हैं आप?"

आशुतोष:-"जैसे ऐसा भी हो सकता है कि महाराज शिशुपाल द्वारा किया गया श्रीकृष्ण का कोई अपमान दो बार रिकार्ड हो गया हो. या ये भी हो सकता है कि कोई 2-3 अपमान दो बार रिकार्ड हो गए हों. और अर्नब अगर ऐसा कुछ हुआ है तो फिर यह महाराज शिशुपाल द्वारा किया गया सौवां अपमान नहीं था. या तो सौ से कम होगा या फिर ज्यादा लेकिन सौवां नहीं हो सकता।

कृपाचार्य:-"धर्म में गणित …"

सहदेव:-"यह किस तरह की बात...."

आशुतोष:-"वैसे अर्नब, मैंने उडती खबर यह भी सुनी है कि अपमानो के रजिस्टर में कुछ उलट-फेर भी हुआ है. मेरे सोर्सेज बताते हैं कि रजिस्टर से बीच के दो पन्ने फाड़े गए है. अब पता नहीं यह बात कितनी सच है लेकिन सवाल तो अपनी जगह है. और अर्नब, मैंने इस केस को जिस तरह से फालो किया है.."

विदुर:-(व्यंग करते हुए) "यह तो अभी परसों की घटना है पत्रकार श्री. दो दिन में कितना फालो कर लिया आपने?

अरनब:-"okay okay..let me go to Balram..बलराम जी, यह बताइए कि क्या यह सच है कि अपमानों की entry वाले register में हेर-फेर हुई है. ऐसी बात सुनाई दे रही है कि ऐसा हुआ है. आप क्या कहना चाहते हैं?"

सहदेव:-"what rubbish?"

अरनब:-"सहदेव जी, आप अरनब के show में हैं. रबिस कुमार दूसरे चैनल के anchor हैं. हाँ, go ahead बलराम जी"

बलराम:-(शांति के साथ) "देखिये, ऐसी बात बिलकुल नहीं है. अब आशुतोष जी को पता नहीं कौन से सोर्स से जानकारी मिली है लेकिन मैं स्पष्ट शब्दों में कहना चाहूँगा कि अपमानों के रजिस्टर में कोई हेर-फेर नहीं हुई है. रजिस्टर कभी भी कोई भी आकर देख सकता है. हम कुछ छिपा नहीं रहे. रही बात..."

नरोत्तम कालसखा:-(कंधे उचकाते हुए) "लेकिन...लेकिन..."

अरनब:-"okay Narottam ji wants to rebut you. Go ahead Narottam ji."

नरोत्तम कालसखा:-"बलराम जी, आपसे मेरा एक अलग ही प्रश्न है. ये बताइए कि क्या सबूत है कि श्रीकृष्ण ने अपनी बुआ को शिशुपाल जी महराज के केवल सौ अपमानों को क्षमा करने का वचन दिया था? हो सकता है उन्होंने सवा सौ अपमानों को क्षमा करने का वचन दिया हो. या हो सकता है कि एक सौ चालीस अपमानों को क्षमा करने का वचन दिया हो. कोई सबूत है किसी के पास कि उन्होंने सौ अपमानों की ही बात की थी?"

बलराम:-"फिर तो आप यह भी कह सकते हैं कि …"

आशुतोष:- (जल्दी जल्दी) मैं इसपर कुछ कहना चाहूँगा। अर्नब मैं इसपर ये ...."

अरनब:- (हाथ उठाकर)"I will come back to you Ashutosh. Let Balram ji speak. मैं वापस आऊंगा आपके पास. Yes go ahead Balram ji"

बलराम:-"नरोत्तम जी, जब श्रीकृष्ण ने बुआ को वचन दिया था उस समय मैं वहीँ पर था. और मैं आपको सच बताता हूँ कि उसने सौवें अपमान के बाद ही मारने का वचन दिया था. अगर आपको मेरी बात का विश्वास न हो तो बुआ से पूछ सकते हैं."

नरोत्तम कालसखा:-"देखिये बलराम जी मुझे आपकी बात का विश्वास क्यों हो? आप तो श्रीकृष्ण के भाई हैं. और रही बात बुआ से पूछने की तो क्या गारंटी है कि आप, श्रीकृष्ण और युधिष्ठिर बुआ जी पर दबाव डाल के उनसे नहीं कहलवा देंगे कि श्रीकृष्ण ने केवल सौ अपमानों को क्षमा करने की बात कही थी?"

बलराम:-"अब देखिये वैसे तो आपको हमारी किसी बात का विश्वास नहीं होगा लेकिन मेरा कहना यही है कि तथ्यों को जाने बिना...."

कृपाचार्य:-"धर्मानुसार तो यह …"

सहदेव:-"राजनीतिक विमर्श में ऐसे आरोप …"

आशुतोष:-"धर्म की आड़ में अपराध ...."

विदुर:-"ये कालसखा जी विचित्र बात कर …"

(सारे एक साथ बोले जा रहे हैं. किसी की बात सुनाई नहीं दे रही है)

अरनब:- (परेशान होकर झल्लाते हुए,ऊंची आवाज़ में) "Gentlemen, please! one at a time.. please. Ek minute ek minute …ek minute सहदेव जी, मैं आपके पास आता हूँ. आऊंगा मैं आपके पास. एक मिनट कृपाचार्य जी please … (शांति छा जाती है)
thank you. okay let me go back to Ashutosh . आशुतोष ये बताइए कि अब क्या देखते हैं इस केस में? अब जबकि media ने इस case को अपने हाथ में ले लिया है?"

आशुतोष:-"अर्नब, ये नरोत्तम जी का प्वाइंट महत्वपूर्ण है. मेरी बात एक सैनिक से हुई जिसने ये बताया कि जब श्रीकृष्ण ने अपनी बुआ को महाराज शिशुपाल के अपमानों को क्षमा कर देने की बात कही थी तो वह वहीँ पर था. और आपको हैरत होगी कि उसने बताया कि श्रीकृष्ण ने एक सौ पचहत्तर अपमानों को क्षमा करने का वचन दिया था....."

बलराम:-"यह तो बिल्कुल ही झूठ बात ...."

अरनब:-"बलराम जी बलराम जी, आप आशुतोष को उनकी बात तो पूरी करने दीजिये। एक वरिष्ठ पत्रकार हैं. इनके बाल कितने सफ़ेद हैं यह तो देखिये। उनको नहीं तो कम से कम उनके बालों को तो इज़्ज़त दीजिये। हाँ, go ahead Ashutosh"

आशुतोष:-"वही मैं कह रहा था अर्नब। देखें अब इसमें कितना सच है और कितना झूठ यह कह पाना मेरे लिए मुश्किल है लेकिन उस सैनिक ने मुझे यही बताया. और एक बात अर्नब, अब जिस तरह से सबूत एक-एक करके सामने आने लगे हैं उससे तो यही लगता है कि यह मामला बड़ा पेंचीदा होता जा रहा है. कुछ अपमान विशेषज्ञों ने तो यहाँ तक कहा है अर्नब कि यह क्लीयर नहीं है कि श्रीकृष्ण ने एक सौ अपमान होते ही महाराज शिशुपाल को मारने की बात कही थी या फिर एक सौ अपमान होने तक क्षमा कर देते और एक सौ एकवाँ अपमान होने के बाद मारते. मेरे विचार से यह बात कम महत्वपूर्ण नहीं है. और मेरा ऐसा मानना है..."

(बलराम हैरत भरी निगाह से आशुतोष को देखते हैं)

अरनब:-"okay, joining me now...अब हमें join कर रहे हैं हस्तिनापुर से आचार्य शकुनी. शकुनी जी, हमें ये बताएं...."

(Program coordinator गलती से अरनब को शकुनि से connect न करके किसी और से connect कर देता है) (एक कान में ऊँगली दबाये,जैसे कि earpiece पकड़े हुए हों,एक आदमी कुर्सी पर दीखता है)

अरनब:-"शकुनि जी, आपको हमारी आवाज़ आ रही है?"

उधर बैठा व्यक्ति:-"अरे कौन शकुनि? मैं भ्रष्टाचार विशेषज्ञ अशांत कुलभूषण हूँ और मैं यहाँ पर घोड़ों की खरीद में जो scam हुआ है उसपर बोलने आया था. ये कहाँ आप मुझे शकुनि बना रहे है?"

अरनब:-"sorry sorry, अशांत जी, गलती से studio ने आपको connect कर दिया। वैसे आप आये हैं तो शिशुपाल जी की हत्या पर भी अपने विचार दे दें"

अशांत कुलभूषण:-"देखिये मैं भ्रष्टाचार विशेषज्ञ हूँ और उसी पर बोलूँगा। और आपने कहा था कि साढ़े नौ बजे से वो debate शुरू करेंगे और यहाँ already दस बजने वाले है"

अरनब:-"बस, ये debate ख़त्म करके मैं वापस आता हूँ."

(उस कुर्सी पर कुछ क्षणों के लिए अँधेरा छा जाता है और जब फिर फोकस किया जाता है तो कुर्सी पर शकुनि दीखते हैं)
पीछे से आवाज़ आती है-प्रोग्राम को-ऑर्डिनेटर की- "अरनब,, now Mr Shakuni is connected..go ahead)

अरनब:-"हाँ तो अब हमारे साथ हैं हस्तिनापुर से आचार्य शकुनि। शकुनि जी, हमें ये बतायें ...."

विदुर :-(मुख पर तंग होने का भाव लिए हुए) "ऐंकरश्री, महाराज शकुनी आचार्य नहीं हैं. आपको कम से कम इतनी जानकारी तो रहनी ही चाहिए. शकुनी गांधार नरेश हैं और पिछले कई वर्षों से अपनी बहन के घर बैठकर मुफ्त की रोटियां तोड़ रहे हैं."

अरनब:-"sorry sorry..विदुर जी. चलिए गंधार नरेश शकुनी ही सही. शकुनी जी, हमें ये बताएं कि ये इन्द्रप्रस्थ में जो महाराज शिशुपाल की हत्या का मामला हुआ है, इसके बारे में आप क्या सोचते हैं?"

शकुनी:-"यह तो बहुत ही क्रूर हत्या का मामला है भांजे अरनब...क्षमा करो भाई,, मैंने तुम्हें भी भांजा कह डाला. एक सौ भांजो से दिन-रात मामा-मामा सुनते-सुनते आदत ख़राब हो गई है. हाल यह है कि एक दिन मेरे मुँह से जीजाश्री के लिए भी भांजे धृतराष्ट्र निकल आया था...

(2 second का पॉज जैसे साँस ले रहे हों)

हाँ तो मैं यह कह रहा था कि यह तो वासुदेव कृष्ण द्वारा क्रूर हत्या का मामला है. ऐसे में मैंने और भांजे दुर्योधन ने यह निर्णय लिया है कि कुछ ही दिनों में काशीनरेश के दरबार में होने वाले राजाओं के सम्मलेन में हमलोग इस मामले को उठाएंगे और चाहेंगे कि श्रीकृष्ण को उनके इस अपराध के लिए घोर दंड मिले. मैंने तय किया है कि हम इस मामले को मीडिया में उछालते रहेंगे जिससे शिशुपाल की आत्मा को न्याय मिले."

अरनब:-"okay, last एक minute रह गया है मेरा पास. नरोत्तम जी, यह बताएं कि अब आपका क्या प्लान होगा? आप और आपके जैसे हजारों "मानव धिकार" activists क्या चाहते हैं?"

नरोत्तम कालसखा:-"अरनब, हमारा stand बिलकुल क्लीयर है. हम यह चाहते हैं कि एक independent SIT से इस मामले की जांच कराई जाय और श्रीकृष्ण को तुरंत सज़ा दी जाय. जबतक यह नहीं होता, हम आन्दोलन करते रहेंगे। परसों हमने इंद्रप्रस्थ Gate पर एक candle march का आयोजन किया है. (मुस्कुराते हुए)
आशा है कि आप अपने channel पर coverage जरूर देंगे। और...(गंभीर होते हुए कठोर आवाज़ में) हम आपके साथ मिलकर यह सुनिश्चित करेंगे कि महाराज शिशुपाल की आत्मा को न्याय मिले."

अरनब:-"Gentlemen, अब हमारे पास वक़्त नहीं है.So let's conclude...(पॉज)
लेकिन We promise you that we will make it sure that justice is done in this case.Your channel has always stood for justice. हस्तिनापुर में कृपाचार्य और इन्द्रप्रस्थ में सहदेव जी, आपको भी thanks. समय की कमी के कारण हम आपको समय न दे सके but I promise you ,,कि अगली बार हम आप दोनों को भी समय देंगे. Goodbye and Goodnight."