Wednesday, November 13, 2013
चंदू इन एक्सक्लूसिव चैट विद सचिन'स बैट
सब लगे हुए हैं. कोलकाता टेस्ट के ख़त्म हो जाने के बाद चंदू ने मुझसे कहा; "सब सचिन का इंटरव्यू ले रहे हैं, आप कहें तो मैं भी ले लूँ."
मैंने कहा; "बिल्कुल ले लो. सचिन के रिटायरमेंटी यज्ञ में ब्लॉगरीय हवन हो जायेगा."
वो गया. शाम को वापस आया तो मुंह लटका हुआ था. मैंने पूछा; "क्या हुआ? मुंह लटकाये खड़े हो?"
वो बोला; "लोगों ने सचिन को पुरस्कार लेने के लिए, फ़ोटो सेशन के लिए, डिनर के लिए और न जाने क्या-क्या के लिए बिजी कर दिया. उनका इंटरव्यू मिला ही नहीं."
मैंने पूछा; "फिर?"
वो बोला;"फिर क्या? ड्रेसिंग रूम के एक कोने में उनका बैट पड़ा था. मैंने कहा इसी का इंटरव्यू ले लिया जाय. वैसे भी उनके ड्राइवर, पड़ोसी, सास, बचपन के दोस्त वगैरह टीवी वालों को इंटरव्यू देंगे कि किसी ब्लॉग पत्रकार को? अब लीजिये यही छाप दीजिये. वैसे भी आपने बहुत दिनों से ब्लॉग पर कोई इंटरव्यू नहीं छापा."
तो पेश हैं सचिन के बैट का इंटरव्यू. बांचिये.
चंदू : नमस्कार बैट जी. स्वागत है आपका इस इंटरव्यू में.
बैट : आदाब चंदू भाई. आपका शुक्रिया कि आपने मुझे इस इंटरव्यू में मधो किया. कोई मुझे मुँह नहीं लगाता लेकिन आपने मुझे जो इज्जत दी है उसके लिए मैं आपका मशकूर हूँ."
चंदू : अरे आप तो उर्दू भी जानते हैं!
बैट : कैसे नहीं जानेंगे जनाब? मेरी पैदाइश कश्मीर की है. वैसे अगर आपको उर्दू के शब्द अटपटे लग रहे हों तो मैं हिंदुस्तानी जबान में इंटरव्यू दे लूँगा.
चंदू : शुक्रिया शुक्रिया. मेरा पहला सवाल है कि आपको कैसा लग रहा है?
बैट : आप क्या पहले टीवी पत्रकारिता में थे चंदू जी?
चंदू : अरे आपको कैसे पता?
बैट : यह घटिया सवाल तो टीवी वाले पूछते थे. आप तो बोले कि आप ब्लॉग पत्रकार हैं.
चंदू : अरे ऐसा नहीं है. वैसे मेरा अगला सवाल यह है कि चौबीस साल तक सचिन के साथ रहने के बाद अब आप भी रिटायर होने वाले हैं ऐसे में कैसा महसूस कर रहे हैं?
बैट : वैसा ही जैसा सचिन महसूस कर रहे हैं. अब मैं भी घरवालों के लिए समय दे सकूँगा। बेटे की शिकायत रहती थी कि पापा पैरेंट्स डे पर भी स्कूल नहीं गए कभी. अब उसके स्कूल जा सकूँगा. उसे एक सफल बैट बनने के गुर सिखा सकूँगा। लगातार इतने सालों तक गेंदो से लड़ा. अब थोडा आराम करूँगा.
चंदू : हाँ, आपने गेंदों से बहुत लड़ाई की. वैसे ये बताइये कि आपको क्या पहले से ही पता था कि आप सचिन के बैट बनेंगे?
बैट : यह अच्छा सवाल किया आपने. देखिये मैं जिस पेड़ से निकला शायद उसको पता था. बड़ी इंटरेस्टिंग स्टोरी है. कहते हैं कि जब वह छोटा था तो एकबार जंगल का एक ठेकेदार उसको काटने आया. उसने ठेकेदार से विनती करते हुए कहा मुझे इतनी कच्ची उम्र में मत काटो. मुझे भगवान के लिए छोड़ दो. और देखिये कि ठेकेदार ने उसे सचमुच भगवान के लिए ही छोड़ दिया. मेरा जनम उसी पेड़ से हुआ.
चंदू : अच्छा ये बताइये कि किस बॉलर का बाल ठोंकने में आपको खूब आनंद आता था.
बैट : चंदू जी, ये किस तरह का अश्लील सवाल कर रहे हैं आप?
चंदू : अरे बैट जी, मेरा मतलब वो नहीं था जो आप समझ रहे हैं.
बैट : नहीं, आपको सवाल पूछने से पहले याद रखना चाहिए कि आप सचिन तेंदुलकर के बैट से सवाल पूछ रहे हैं, हरभजन सिंह के बैट से नहीं. वैसे मैं आपका आशय समझ गया मैं और आपको बताऊँ कि मुझे शेन वार्न और मैग्रा का बाल पीटने में खूब मजा आता था. यू कैन से आई हैड बाल ऑफ़ अ टाइम हिटिंग वार्न एंड मैग्रा.
चंदू : और किस बॉलर के बॉल से आपको खीज होती थी?
बैट : शोएब अख्तर के बॉल से. वो इतनी दूर से दौड़ के आता था कि बॉल फेंकने से पहले जो इंतज़ार करना पड़ता था उससे मैं बोर हो जाता था.
चंदू : अच्छा ये बताएं कि आपने तो दुनियाँ भर घूम के बॉल की पिटाई की है. कौन सा शहर आपको सबसे अच्छा लगा?
बैट : सिडनी. सिडनी मुझे सबसे अच्छा लगता था. वैसे चेन्नई भी काफी अच्छा लगा मुझे.
चंदू : अच्छा ये बताइये कि चौबीस सालों में आपकी बात ड्रेसिंग रूम में और भारतीय खिलाड़ियों के बैट से होती रही होगी. किस खिलाडी के बैट से आपकी नहीं बनती थी?
बैट : अज़हरुद्दीन के बैट से. वो हमेशा हल्का रहा और जब भी बात करता, मुझे मोटू कहकर चिढ़ाता था. कहता था वेट कम कर मोटू अपना वेट कम कर मोटू अपना. बहुत चिढ़ाया उसने मुझे. फिर एक दिन मैंने दो टूक सुना दिया तब जाकर बंद हुआ.
चंदू : क्या कहा आपने उससे?
बैट : मैंने उससे कहा कि मैं वजनदार खिलाडी का बैट हूँ बे इसलिए वजनदार हूँ तू हलके खिलाडी का बैट है इसलिए हल्का है.
चंदू : और किस खिलाडी के बैट से आपकी खूब जमती थी?
बैट : धोनी के बैट से. वो भी वजनी और मैं भी वजनी. इसलिए दोनों में खूब बनती थी.
चंदू : अच्छा ये बताएं कि आपको क्या ऐसा भी लगता था कि आप का मैदान में जाना निरर्थक रहा?
बैट : हाँ, जब भी सचिन बॉल को पैड से खेलते थे तो मेरे मन में आता था कि मेरा जीवन किस काम का जब पैड से ही खेलना है तो?
चंदू: अच्छा ये बताएं कि आपको कौन सा शॉट लगाने में सबसे ज्यादा मज़ा आता था?
बैट : स्ट्रेट ड्राइव. जब वे स्ट्रेट ड्राइव लगाते थे तो मैं बॉल के साथ खुल के मिलता था. लगता था जैसे बॉल से गले मिल रहे हैं. आप खुद ही सोचिये कि खुल के गले मिलने में जो मज़ा है वह हाथ जोड़ के मिलने में कहाँ मिलेगा? हाँ जब वे डिफेंसिव शॉट खेलते थे तो मुझे लगता था जैसे मैं बॉल से हाथ जोड़ के मिलना पड़ रहा है. और बॉल से हाथ जोड़ के मिलना मुझे बिलकुल पसंद नहीं था.
चंदू : अच्छा ऐसा भी कोई शॉट था जिसकी वजह से आपको तकलीफ होती थी?
बैट : पैडल-स्वीप, वे जब पैडल-स्वीप मारते थे तो कई बार मुझे ज़मीन से घिसटना पड़ता था. फिर भी ये सोच के घिसट लेता था कि कोई बात नहीं इसबार घिसट ले. अगली बार बॉल से खुल के मिलेंगे.
चंदू : अच्छा बैट जी, ये बताइये कि सचिन की कोई आदत जिससे आपको कोफ़्त होती थी?
बैट : हाँ जब ओवर के दौरान वे मुझी पटक पटक कर क्रीज समतल बनाते थे तब थोड़ी कोफ़्त होती थी. वैसे मुझे गुस्सा उनके ऊपर नहीं आता था, मुझे पिच क्यूरेटर के ऊपर गुस्सा आता था. मुझे लगता था कि पिच क्यूरेटर ने अपनी ड्यूटी सही तरह से क्यों नहीं की?
चंदू : और कभी किसी बात के लिए आपको बुरा लगता था?
बैट : हाँ लगता था न. जब कमेंटेटर लोग सचिन के बॉटम ग्रिप की बात करते थे. मुझे लगता था कैसी अश्लील बातें कर रहे हैं ये लोग? बॉटम ग्रिप। छि.
चंदू : हा हा हा. अच्छा और कोई मौका जब आपको कुछ अच्छा नहीं लगा हो?
बैट : हाँ ऐसे कई मौके आये. जैसे टेस्ट मैच के पहले वाली रात वे होटल रूम में बॉल लटका कर प्रैक्टिस करते थे तो मुझे अच्छा नहीं लगता था. अरे कल सुबह टेस्ट मैच है और रात भर बैट को सोने नहीं दोगे तो वह सुबह जाकर कैसे परफॉर्म करेगा?
चंदू : अच्छा कोई ऐसी इनिंग जब उसके दौरान आपको कष्ट हुआ हो?
बैट : कष्ट कभी नहीं हुआ मुझे. मैं सचिन का बैट था, किसी आम खिलाडी का नहीं. हाँ वैसे आपने पूछ ही लिया है तो बता दूँ कि शारजाह वाली इनिंग में जब आंधी आ गई थी तब सचिन ने मुझे पिच पर लिटा दिया था और मेरी आँख में रेत घुस गई थी. मैंने उनको बताया तो बोले कि नाराज मत हो, अभी होटल चलेंगे तो तुझे नहला देंगे और सब ठीक हो जाएगा.
चंदू : और कोई यादगार दिलचस्प बात जो आपको हमेशा याद रहेगी?
बैट : एक-दो नहीं, बहुत सी बातें हैं. वैसे एक बात बड़ी हंसने वाली बताता हूँ आपको. जब उनको टेनिस एल्बो हुआ तो मैंने उनसे कहा कि आप क्रिकेट के इतने बड़े खिलाडी हैं. मैं आपके साथ हमेशा से रहा हूँ. मैंने आजतक चलने से कभी मना नहीं किया. ऐसे में आपको टेनिस खेलने की क्या जरूरत थी जिससे आपका एल्बो हर्ट हो गया. मेरी बात सुनकर खूब हँसे. तब जब उन्होंने मुझे बताया कि टेनिस एल्बो क्या होता है तो मुझे भी अपनी बेवकूफी पर पर बड़ी हंसी आई.
चंदू : हा हा हा. अच्छा ये बताएं कि सचिन के रिटायर होने से इफेक्टिवेली आप भी रिटायर हो जायेंगे. कैसे बीतेंगे आपके दिन अब?
बैट : सच कहें तो सचिन के बिना मेरा कोई वजूद ही नहीं है चंदू जी. जैसे सचिन कई बार कह चुके हैं कि क्रिकेट के बिना वे अपना जीवन अधूरा मानते हैं वैसे ही मैं आपको बता दूँ कि मुझे सचिन के हाथों में रहने के अलावा और कुछ नहीं आता. फिर भी वे रिटायर हो जायेंगे तो मैं भी पहले कुछ दिन आराम करूँगा. अपना समय अपने परिवार को दूँगा. वैसे मैंने उनसे कहा कि मुझे अर्जुन की सेवा में लगा दें. लेकिन अगर वे नहीं लगाएंगे तो मैं अपने बेटे को एक सफल बैट बनाकर अर्जुन की सेवा में अर्पित कर दूँगा. मैंने सचिन के लिए काम किया. मेरा बेटा अर्जुन के लिए काम करेगा. हो सकता है उसका बेटा आगे चलकर अर्जुन के बेटे के लिए काम करे. तो जीवन तो देखिये किसी तरह से कट ही जायेगा. सचिन के घर में ही एक कोने में पड़ा रहूँगा. अब इस उमर में कहाँ जाऊँगा?
चंदू : चलिए मेरी भी शुभकामनाएं आपके साथ हैं. हम सभी यह चाहेंगे कि आपका आगे का जीवन अच्छे से कटे. इस इंटरव्यू के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद.
बैट : आपका भी इंटरव्यू लेने के लिए धन्यवाद चंदू जी.
Saturday, April 23, 2011
बैटिंग की बातें चलें फट कवित्त दे ठेल....

कल रात को सोचा कि इस सप्ताह को दोहा सप्ताह के रूप में मना लिया जाय. इससे पहले सीडियात्मक दोहे लिखे थे. अब प्रस्तुत है सिद्धुआत्मक दोहे.
जैसा कि आपसब जानते हैं, मैं सिद्धू ज़ी महाराज का बहुत बड़ा फैन हूँ. उन्हें सुनकर मन प्रफुल्लित हो जाता है. मेरा ऐसा विश्वास है कि वे जन्म से ही दार्शनिक थे. बचपन की कुसंगति के कारण क्रिकेटर बन गए.
एक फैन होने के नाते मेरा यह धर्म है कि मैं उनके ऊपर कुछ लिखूं. इसलिए ये अभी कुछ धोये सॉरी दोहे लिखकर टांग दे रहा हूँ. अगर सौ-दो सौ ग्राम तुकबंदी और इकठ्ठा हुई तो और टांग दूंगा. फिलहाल तो यही है. झेलिये.
एक रंग का पहनकर पगड़ी, 'टाई-नेक',
बात-बात पर मारते हमें कहावत फेंक
सुन सवाल वे क्रिकेट का दर्शन दे चिपकाय
उक्ति-सूक्ति बस ठेलकर पग-पग पर पगलाय
बैटिंग की बातें चलें फट कवित्त दे ठेल
अंट-संट बकते रहें खेलें अपना खेल
प्लेयर नेट प्रैक्टिस करें वो किताब रट लेय
जंह-जंह पर मौका मिले, सबको चौंका देय
कहत-कहत दो हाथ की अंगुली देय उठाय
बोल-बोल कर ओय गुरु निज थ्योरी समझाय
अगर रटे पुस्तक सदा जड़मति लगे सुजान
इस महान सिद्धांत का वे ही हैं पहचान
लाफ्टर शो औ खेल में नहीं करें वे भेद
जैसे समझे चुटकुले वैसे बल्ला-गेंद
जब बोलें तो सभी को चुप होना पड़ जाय
टोनी ग्रेग हों या सनी सबसे वे लड़ जाय
एमपी हैं, जज थे कभी और कभी एक्सपर्ट
जब चाहे, जिसमें जंचे, हो जायें कन्वर्ट
अफवाहें यह कह रही नासा की है मांग
करना चाहे स्टडी उनका बड़ा दिमाग
हो कवित्त या शायरी, चाहे गायें गान
हर कोई है सुन रहा उनको यही गुमान
असली गुरु-बानी कहाँ सबको यह संदेह
जो वे बोलें वही है, या जो नानकदेव
बनकर अब एक्सपर्ट वे फैलाते आतंक
प्रेमी जो हैं खेल के समझें उन्हें कलंक
न्यायालय अब कुछ करे सबकी यही गुहार
उससे ही बच सके है यह क्रिकेट-संसार
आई सी सी को चाहिए कर दे उनको बैन
यह डिमांड उससे करें दुनियाँ भर में फैन
Saturday, April 2, 2011
जिससे पूरा भारत बोरियत से बचे
डियर माही,
इससे पहले कि 'डियर माही' जैसा संबोधन तुम्हारे मन में किसी तरह की गलतफहमी को जन्म दे, मैं साफ़-साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मैं कोई 'टीनेजर गर्ल' नहीं बल्कि एक पुरुष हूँ. मेरे इस स्पष्टीकरण के पीछे कारण यह है कि तमाम टीवी चैनलों के संवाददाताओं ने मेरे सामान्य ज्ञान में बढ़ोतरी करते हुए मुझे न जाने कितनी बार बताया है कि ज्यादातर लड़कियां ही तुम्हें माही कहकर पुकारती हैं. वैसे भी अगर मैं डियर महेंद्र सिंह धोनी जैसे किसी संबोधन का इस्तेमाल करता तो उसे देखकर मुझे ही नहीं बल्कि औरों को भी लगता जैसे मैं तुम्हें कानूनी नोटिस भेज रहा हूँ. पढ़ने में भी यह संबोधन 'कूल' नहीं लगता.
नतीजा यह हुआ कि मैं तुम्हें डियर माही लिखकर संबोधित कर रहा हूँ.
तो डियर माही, मेरे इस पत्र लिखने के पीछे एक कारण है. नहीं-नहीं, जो तुम सोच रहे हो, वह कारण नहीं है. वर्ल्डकप फाइनल से पाँच घंटे पहले तुम्हारे सामने कोई डिमांड रखकर मैं तुम्हें नर्वस नहीं करना चाहता. दरअसल कारण यह है कि, मैं यह चिट्ठी लिखकर अपने ब्लॉग पर लगाना चाहता हूँ जिससे मुझे एक अदद ब्लॉग पोस्ट की प्राप्ति हो जाए. आखिर एक ब्लॉगर को और क्या चाहिए? एक पोस्ट, और क्या?
वैसे मैं चाहता तो तुम्हारी टीम और क्रिकेट वर्ल्ड कप पर सवा सौ ग्राम की अशुद्ध तुकबंदी वाली एक चवन्नी कविता लिख डालता और किसी हिंदी न्यूज़ चैनल को फोन कर देता तो वे मेरी कविता कवर करने तुरंत आ जाते और वह तुम्हारे पास पहुँच जायेगी, मैं यह सोचकर अपने मन में दर्जन भर लड्डू फोड़ लेता. शायद तुम्हें पता न हो लेकिन एक अनुमान के अनुसार इस प्रोसेस से हमारे हिंदी न्यूज चैनलों ने पिछले दस वर्षों में करीब चार हज़ार सात सौ अट्ठावन हिंदी कवि पैदा किये हैं.
लेकिन मैंने सोचा कि ऐसा कुछ किया जाय जिससे मुझे एक ब्लॉग पोस्ट भी मिल जाए और तुम्हारा मोटिवेशन भी हो जाए. माही, मुझे पता नहीं कि भारत जब पिछली बार २००३ वर्ल्डकप के फाइनल में पहुँचा था तो हमारे कोच जॉन राइट ने कप्तान सौरव गांगुली को कैसे मॉटिवेट किया था? मुझे यह भी नहीं पता कि जब इसबार हम फिर से फाइनल में पहुँच गए हैं तो गैरी कर्स्टन क्या कर रहे हैं? मैं तुम्हें बताना चाहता हूँ कि तुम्हरी टीम के लिए वर्ल्डकप जीतना क्यों ज़रूरी है? वे कौन से कारण हैं जिनके लिए १२१ करोड़ भारतीय तुम्हें आशीर्वाद और प्यार देंगे.
तो हे अधिनायक, ध्यान लगाकर सुनो;
जैसा कि तुम्हें मालूम है हम २५ जून, १९८३ में क्रिकेट वर्ल्डकप जीते थे. वैसे कुछ चिरकुटों ने पिछले २-३ दिनों से यह भ्रम फैला रखा है कि हमें उस वर्ल्डकप में विजयश्री की प्राप्ति २ अप्रैल १९८३ के दिन हुई थी लेकिन यह सही नहीं है. खुद गूगलदेव ने यह बात कन्फर्म की है. और हे अधिनायक, आज की तारीख में गूगल से बढ़कर कौन है?
तो मैं कह रहा था कि २५ जून, १९८३ के दिन हम वर्ल्डकप जीते थे और उसके बाद केवल स्पोर्ट्स चैनलों पर लगातार जीतते जा रहे हैं. हाल यह है कि एक अनुमान के अनुसार हम स्पोर्ट्स चैनलों पर १९८३ का वर्ल्डकप १९८३ बार जीत चुके हैं. वैसे कुछ सूत्रों का मानना है कि यह आंकड़ा करीब आठ हज़ार दो सौ तक पहुँच सकता है. हम अगर इन दो सख्याओं का औसत भी निकालें तो हे अधिनायक, हम स्पोर्ट्स चैनलों पर करीब पाँच हज़ार बार वर्ल्डकप जीत चुके हैं. और तो और स्पोर्ट्स चैनलों के फुटेज के सहारे हमारे हिंदी न्यूज चैनल भी करीब ढाई हज़ार बार टीवी पर हमें वर्ल्डकप दिलवा चुके हैं.
हे अधिनायक, मुझे तो लगता है कि पिछले कई वर्षों में इन स्पोर्ट्स चैनलों के ट्रांसमिशन सेंटर में कुछ इस तरह का वार्तालाप होता होगा;
क्लर्क अपनी कुर्सी छोड़कर नीचे रतिराम चौरसिया की पान दूकान पर पान खाने जा रहा है. बीच में प्रोग्राम डायरेक्टर मिल जाता है. डायरेक्टर पूछता हा; "कहाँ जा रहे हो?"
क्लर्क'; "पान खाने नीचे जा रहा हूँ. आधे घंटे में वापस आता हूँ."
डायरेक्टर; "तो एक काम करो न. जाने से पहले वो १९८३ वर्ल्डकप फाइनल की सीडी लगाते जाओ. तुम जबतक पान खाकर वापस आओगे इंडिया फाइनल जीत जाएगा."
हे अधिनायक, हाल यह है कि बाथरूम में जाने से पहले एक भारतीय देख रहा है कि स्पोर्ट्स चैनल इंग्लिश प्रीमियर लीग का हाइलाइट्स दिखा रहा है और जब वह बाथरूम से बाहर आता है तो देखता क्या है कि मोहिंदर अमरनाथ माइकल होल्डिंग्स को एल बी डब्लू करके स्टंप लिए भागे जा रहे हैं. देख कर लगता है जैसे अगर वे आज इतनी जोर से न भागेंगे तो उन्हें स्टंप चोरी के इल्जाम में अरेस्ट कर लिया जाएगा. हे अधिनायक, तुम्हें यह जानकार आश्चर्य होगा कि १९८३ वर्ल्डकप फाइनल टीवी पर देखने की वजह से बेटा माँ के बार-बार कहने के बावजूद सब्जी लेने बाज़ार नहीं जाता और घर वालों को उस दिन केवल दाल-रोटी से गुज़ारा करना पड़ता है. वैसे सत्य यह है कि बेटा सोचता है कि क्या पता स्पोर्ट्स चैनल कल से भारत को जितवाना ही बंद कर दे. ऐसे में जब तक जितवा रहा है तब तक तो जीतते रहो.
हे अधिनायक माही, १२१ करोड़ लोग़ अट्ठाइस वर्षों से कपिल देव को दौड़ कर रिचर्ड्स का कैच लेते हुए देख रहे हैं. मानता हूँ कि गावस्कर के अनुसार; "कपिल वाज अ ग्रेट एथिलीट" लेकिन अब उनकी उमर भी तो देखो. पचास के पार पहुँच गए हैं. ऐसे में जब वे आजकल हाइलाइट्स में दौड़ते हैं तो धड़का लगा रहता है कि इस बार वे कैच नहीं पकड़ सके तो? अगर इस बार कैच छूट गया तो फिर रिचर्ड्स बड़ी दुर्गति करेगा हमारी. अभी तक तो कपिल कैच पकड़ते आये हैं लेकिन हे अधिनायक, यह क्रिकेट ही तो है. क्या पता अगली हाइलाइट्स में उनसे कैच छूट जाए और उसके बाद रिचर्ड्स ऐसा मारे कि आउट ही न हो? बीस ओवर भे नहीं लगेंगे वेस्ट- ईंडीज को मैच जीतने में.
और फिर हे अधिनायक, तुम्हें तो पता ही है कि हमारी संस्कृति और दर्शन में ऐसा बताया गया है कि हर चीज में जान होती है. अगर हम इस लिहाज से देखें तो क्या तुम्हें नहीं लगता कि हमें गोर्डन ग्रीनिज के उस स्टंप की रक्षा करनी चाहिए जिसे पिछले अट्ठाइस वर्षों से बलविंदर सिंह संधू अपने इन-स्विंगर से उखाड़ते आ रहे हैं. एक बार ठहरो और सोचो कि हर बार बॉल से धक्का खाने के बाद उस स्टंप की क्या दशा होती होगी? और फिर यह भी तो सोचो कि क्या होगा अगर अगली हाइलाइट्स में संधू का बॉल स्विंग ही न किया? क्या होगा तब? ग्रीनिज हमारी बड़ी दुर्गति करेगा. १९८३ में ही उसके पास बड़ा अनुभव था अब तो पूरे अट्ठाइस वर्षों का अनुभव उसमें जुड़ गया है. ऐसे में अगर वह अगले हाइलाइट्स में स्क्वायर ड्राइव लगाकर चौका मार दे तो? पता नहीं तुम्हें मालूम है कि नहीं लेकिन मुझे मालूम है कि उसने एक इंटरव्यू में कहा था कि; "अगर बॉल मेरे बैट पर ठीक से नहीं आती तो चौका हो जाता है. अगर आ जाती है तो फिर छक्का तो है ही."
हे अधिनायक, कभी तुमने माइकल होल्डिंग्स के पैड की दुर्गति के बारे में सोचा है? मोहिंदर अमरनाथ की बॉल पिछले अट्ठाइस वर्षों से उसके पैड पर एक ही जगह लग रही है. उसके पैड की दुर्दशा के बारे में सोचते हुए लगता है जैसे बेचारा पैड न जाने कितनी बार मरा होगा. उसके बाद मोहिंदर जिस तरह से भागते हैं और भीड़ उनका पीछा करती है वह देखकर लगता है जैसे अगर भीड़ इनके ऊपर टूट पड़ी और ये घायल हो गए तो फिर अगले हाइलाइट्स में कौन जेफरी डुजों को बोल्ड करेगा और कौन मार्शल को आउट करेगा? जिस तरह से डुजों टिक गया था, वह तो अगली हाइलाइट्स में मैच जीत ले जाएगा और हमारा जीता हुआ एक मात्र वर्ल्डकप हमसे छिन जाएगा.
और फिर अब समय आ गया है कि हम भारतीय मोहिंदर की उमर का लिहाज करे और उन्हें बार-बार लगातार दौड़ने की जिम्मेदारी न दें. अब तो उनके लिए यही सही रहेगा कि वे किसी टीवी स्टूडियो में बैठकर अपनी बेसुरी आवाज़ में मैच के दिन "मेरा रंग दे बसंती चोला" की गुहार लगायें और पूरे भारत का मनोरंजन करें.
हे अधिनायक, अगर ध्यान से देखो तो लॉर्ड्स की बालकोनी पर वर्ल्डकप उठाये हुए कपिल देव फबते तो बहुत हैं लेकिन हर बार मुझे ये खटका लगा रहता है कि इतनी भीड़ में कहीं कोई वेस्टइंडियन धक्का-मुक्की करके उनके हाथ से कप लेकर भाग न ले. आजकल चूंकि राजा लोग़ किसी एक्सक्लूसिव जगह पर कप उठाकर जीतने वाले कैप्टन के हाथ में नहीं रखते इसलिए ये डर नहीं रहता कि कोई धक्का-मुक्की में कप लेकर निकल लेगा. आजकल तो बाकायदा मैदान के बीच में कप दिया जाता है जहाँ भीड़-भाड़ कम रहती है.
इसलिए हे अधिनायक, और किसी बात के लिए नहीं तो कम से १२१ करोड़ भारतीयों को पिछले इतने वर्षों की बोरियत से तो बचाओ. किसी को केवल ख़ुशी देना ही महान काम नहीं होता. मैं तो समझता हूँ कि उसे बोरियत से बचाना महानतम काम होता है और आज पूरा भारत तुमसे यह चाहता है कि तुम और तुम्हारी टीम उसे ख़ुशी तो दे ही साथ ही आनेवाले वर्षों में उसे बोरियत से भी बचाए. मेरा तो ऐसा मानना है कि हमारे पूर्व राष्ट्रपति ए पी ज़ी अब्दुल कलाम के ट्वेंटी-ट्वेंटी मिशन (क्रिकेट से मत जोड़ लेना इसे) को अचीव करने के लिए यह भी महत्वपूर्ण है कि पूरा भारत बोरियत से बचा रहे.
इसलिए हे अधिनायक, पूरे भारत की शुभकामनाएं तुम्हारे और तुम्हारी टीम के साथ हैं. कप जीतो हमें बोरियत से उबारो.
May God of cricket save us from this boriyat!!
Saturday, January 8, 2011
प्लेयर + वैट + सेल्स टैक्स + टर्नओवर टैक्स + एडुकेशन सेस = ?
यह पोस्ट आई पी एल फर्स्ट के ऑक्शन पर लिखी थी. आज फिर से ऑक्शन हो रहा है तो सोचा कि फिर से छाप दूँ. पहले नहीं बांचा हो तो बांचिये:-)
.............................................................
कल रतीराम की पान दुकान पर गया था. जाते ही मैंने कहा; "एक पान दीजिये."
मैंने उनसे पान लगाने को कहा लेकिन देख रहा हूँ कि वे अखबार पढने में व्यस्त हैं. पूरी तन्मयता के साथ लीन. मैंने फिर से कहा; "रतीराम भइया, एक ठो पान दीजिये."
मेरी तरफ़ देखे बिना ही बोले; "तनी रुकिए, लगा रहे हैं." ये कहकर अखबार पढ़ने में फिर से लग गए.
मैंने कहा; "अरे ऐसा क्या छप गया है जो पढ़ने में इतना व्यस्त हैं."
बोले; "अरे ओही, खिलाड़ी सब केतने-केतने में बिका, वोही देख रहे हैं." तब मेरी समझ में आया कि क्या पढ़ रहे हैं.
मैंने कहा; "अब पढ़ने से क्या मिलेगा. टीम तो आप खरीद नहीं सके."
बोले; "हाँ लेकिन हम देखना चाहता हूँ कि ई लोग का केतना दाम लगा."
मैंने कहा; "बहुत पैसा मिला है सबको. देखिये न धोनी ही छ करोड़ में बिके. तेंदुलकर चार करोड़ में. ऐसा पहली बार हुआ कि खिलाड़ी भी बिक गए."
मेरी बात सुनकर मुस्कुरा दिए. बोले; "अरे आप भी बड़े भोले हैं. ई लोग का पहला बार बिक रहा है. का पहले नहीं बिका है. काहे, भूल गए अजहरुद्दीन को, जडेजा को."
उनकी बात सुनकर मैं चुप हो गया. क्या करता, कोई जवाब भी तो नहीं था. फिर सोचते हुए मैंने कहा; "बहुत ख़बर रखते हैं क्रिकेट की."
अब तक वे अखबार छोड़ चुके थे. उन्होंने मेरी तरफ़ देखते हुए कहा; "अरे ई जो लोग टीम खरीदा है न, उनसे तो ज्यादा ही जानकारी रखते हैं. आपको का लगता है, मुकेश अम्बानी अपना काम करते-करते क्रिकेट देखते होंगे का? ऊ दारू वाले, का नाम है उनका, हाँ माल्या जी, ऊ देखते होंगे का. हम तो काम करते-करते कमेंट्री सुनते हैं. पूरा-पूरा जानकारी रखते हैं क्रिकेट का."
मैंने कहा; "ये बात तो है. ऐसे में एक टीम आपको जरूर मिलनी चाहिए थी."
बोले; "जाने दीजिये, अब का मिलेगा उसपर बात कर के. ओईसे एक बात बताईये, छ करोड़ में तो धोनी बिक गए लेकिन सेल टैक्स, भैट-वैट मिलकर केतना दाम पडा होगा, इनका?"
उनकी बात सुनकर मुझे हंसी आ गई. मैंने कहा; "अरे महाराज आप भी गजबे बात करते हैं. ये लोग आदमी हैं, कोई सामान नहीं कि इनके ऊपर भी सेल्स टैक्स लगे."
मेरी बात से कन्विंस नहीं हुए. बोले; "आदमी हैं तो फिर आलू-गोभी का माफिक काहे बिक रहा है ई सब?"
मैंने कहा; "आलू-गोभी की माफिक नहीं बोलिए हीरा-जवाहरात की तरह. बोली लगाकर खरीदे गए हैं."
मेरी बात सुनकर मुस्कुरा दिए. बोले; "बोली लगाकर बिके हैं, इतना त हमहू जानते हैं. सुनने से कैसा लगता है न. ऊ जो फिलिम में देखाता है कि कौनो सेठ का सबकुछ बरबाद हो गया और ऊ कर्जा में डूब जाता है तब उसका घर-दुआर जैसे हथौड़ा मार के बिकता है. ओईसे ही तो?"
मैंने कहा; "एक दम ठीक पहचाने. वैसे ही बिके हैं सब."
बोले; "एक बात बाकी गजबे होई गवा."
मैंने पूछा; "क्या?"
बोले; "विदेशी तेल, साबुन, शेम्पू वगैरह तो ठीक लगता है. ऊ का वास्ते हमरे देश का लोग सब बहुत पैसा पेमेंट कर देता है लेकिन विदेशी खेलाड़ी सब तो बहुत सस्ता में खरीद लिया सब. खिलाडी लोगों का वास्ते ज्यादा पईसा नहीं दिया कोई भी. सुने कि पार्थिव पटेल भी पोंटिंग से जादा दाम में बिक गए."
मैंने कहा; "ऐसा होता है. किस खिलाड़ी का कितना महत्व है, वो तो टीम वाले ही बता सकते हैं. वो लोग जिन्होंने टीम खरीदे है."
मेरी बात सुनकर उन्होंने मेरी तरफ़ कुछ ऐसे देखा जैसे मुझे बेवकूफ साबित करने पर तुले हैं. फिर बोले; "हम पाहिले ही बोले रहे न, आप बहुते भोले हैं. अरे ई सब चाल है टीम का मालिक लोगों का. नहीं तो आप ही कहिये, पार्थिव पटेल का इतना दाम. लगा जईसे बँगला पान खरीद रहा है लोग ऊ भी बनारसी पान का दाम देकर."
उनकी बात सुनकर मुझे लगा एक पान खाने आए थे और इतनी देर लग गई. बात खिलाड़ियों की बिक्री से होते हुए कहाँ-कहाँ से आखिर पान तक आ रुकी. मुझे लगा रतीराम जी से बात करते रहेंगे तो पता नहीं और कहाँ-कहाँ से होकर गुजरना पड़े. उनकी पार्थिव पटेल और बँगला पान वाली बात पर मैंने झट से कहाँ; "एक दम ठीक बोले हैं. इसी बात पर एक ठो बनारसी पान लगा दीजिये."
सुनकर हंस दिए. बोले; "ये लीजिये, अभिये लगा देते हैं."
चलते-चलते
सुनने में आया है कि अर्थशास्त्रियों के एक दल ने भारत सरकार के वित्त मंत्रालय और भारतीय रिज़र्व बैंक को एक ज्ञापन दिया है. इस ज्ञापन में इन्फ्लेशन के लिए बनाए गए होलसेल प्राईस इंडेक्स में बाकी चीजों के साथ-साथ क्रिकेट खिलाड़ियों को भी शामिल करने का आग्रह किया गया है. जब कुछ जानकारों ने क्रिकेट खिलाड़ियों के शामिल करने का विरोध यह कहकर किया कि; आख़िर आम जनता तो क्रिकेट खिलाड़ी खरीदती नहीं. ऐसे में उन्हें होलसेल प्राईस इंडेक्स में शामिल करने का औचित्य क्या है तो अर्थशास्त्रियों का जवाब था; "जिन लोगों ने टीम और खिलाडी खरीदे हैं, उन्हें इन्कम तो आम जनता की जेब से ही आनी है. ऐसे में पूरा भार जनता के ऊपर ही तो पड़ेगा."
आप का इस ज्ञापन के बारे में क्या विचार है?
Wednesday, September 22, 2010
"..अमेरिका पकिस्तान को एंटी नो-बॉल मिसाइल दे."
करीब पंद्रह दिन हो गए जब इंग्लैंड के एक बुकी मज़हर मजीद ने एक अखबार के साथ मिलकर पाकिस्तान के तीन निर्दोष खिलाड़ियों को फिक्सिंग में फँसा दिया. ये खिलाड़ी निर्दोष हैं बेचारे. साथ ही टैलेंटेड भी हैं. निर्दोष और टैलेंटता के अद्भुत संगम वाले इन तीन खिलाड़ियों में से दो ने नो-बॉल फेंकी थी और एक ने फिंकवाई.
आप पूछ सकते हैं कि पुरानी घटना पर मैं आज क्यों लिख रहा हूँ? तो मैं आपको बता दूँ कि पाकिस्तानी खिलाड़ियों ने इंग्लैंड में नो-बॉल फिक्स किया. जिस अखबार ने बेचारे निर्दोष खिलाड़ियों को फंसाया वह इंग्लैंड का था. ऐसे में यह एक ग्लोबल घटना हुई कि नहीं?
तो ग्लोबेलाइजेशन के इस युग में ग्लोबल घटना पर लोकल बात करना जायज है क्या? नहीं न? इसीलिए मैंने अपने ब्लॉग पत्रकार चंदू चौरसिया को दुनियाँ भर में भेजकर लोगों की प्रतिक्रिया लेनी चाही. आप बांचिये कि लोगों ने क्या कहा?
हिलेरी क्लिंटन, यूएस सेक्रेटरी ऑफ स्टेट्स : "वी री-टरेट आर पोजीशन दैट इंडिया इज ऐन एमर्जिंग इकॉनोमिक सुपरपॉवर इन साउथ एशिया. वी वुड आल्सो लाइक टू स्टेट दैट पाकिस्तान इज आर नेचुरल-अलाई ह्वेन इट कम्स टू एलिमिनेटिंग दिस मेनेस ऑफ नो-बॉल नॉट ओनली फ्रॉम एशिया बट शुड आई से, फ्रॉम होल वर्ल्ड ...वी विल वर्क क्लोजली विद पकिस्तान टू डिस्मैन्टेल द फोर्सेस बिहाइंड बाउलिंग नो-बॉल. दिस सॉर्ट ऑफ एक्टिविटीज...वी अवेट अ रिपोर्ट फ्रॉम आर नेटो अलाई, यूनाइटेड किंगडम टू लुक इन टू ह्वाट ट्रान्स्पायर्ड फॉर दीज यंग नो-बॉल बॉलर्स..."
आसिफ अली ज़रदारी, टेन परसेंट प्रेसिडेंट, इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ पाकिस्तान: "ओ ज़ी ये कोई बहुत बड़ी बात नहीं है. ये लड़के टैलेंटेड हैं इसलिए नो-बॉल कर दिया. और मैं आपसे पूछता हूँ कि कितनी परसेंट नो-बॉल फेंकी है बच्चे ने? अब छ बॉल का एक ओवर होता है. उसमें से एक नो-बॉल फेंक ही दे तो करीब १६ पारसेंट होती है नो-बॉल....मैं आपकी बात मानता हूँ कि बच्चों को नो-बॉल का पारसेंट कम कर के करीब दस तक लाना चाहिए. मतलब ये कि हर दास बॉल में एक नो-बॉल चलेगा. मैं खुद भी इस बात को मानता हूँ कि कोई भी काम दस पारसेंट तक ठीक है..."
एजाज बट, प्रेसिडेंट, पकिस्तान क्रिकेट बोर्ड एंड चीफ कांस्पीरेसी थेओरिस्ट, एजाज बट स्कूल ऑफ क्रिकेट मैनेजमेंट : "ये ज़ी, हमारे बच्चों को फंसाया गया है. नो-बॉल फिक्सिंग सरासर झूटी बात है. ये पाकिस्तान के खिलाफ साजिश है. कल ही एक बुकी ने मुझे बताया कि दारसल अम्पायर ने क्रीज की सामने वाली लाइन को पीछे खिसका दिया था इसलिए नो-बॉल हो गया. क्रीज की सामने वाली लाइन को पीछे खिसकाने में अम्पायर के साथ इंग्लैंड के खिलाड़ी भी इन्वोल्व हैं. इस काम के लिए अम्पायर को डेढ़ लाख पाउंड पेमेंट किया गया है. आई सी सी के पास कोई सुबूत नहीं है कि हमारे बच्चे फिक्सिंग में इन्वोल्व हैं. वहीँ मेरे बुकी के पास सुबूत है कि अम्पायर ने क्रीज -लाइन को पीछे खिसका दिया था...."
रहमान मलिक, इन्टेरियर मिनिस्टर एंड चीफ एविडेंस सीकर, इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ पकिस्तान: "हामने जांच की है और मैं आपको गारंटी से बता सकता हूँ कि न्यूज़ ऑफ ड वर्ल्ड के एविडेंस काफी नहीं हैं. हामने पता लगाया है कि ये पाकिस्तान टीम के खिलाफ साजिश है और इसमें हिन्दस्तान का रा ही सही लेकिन हाथ ज़रूर है. हिन्दस्तान जब पकिस्तान को बॉल में नहीं फँसा ससका तो फिर साजिश करके नो-बॉल में फंसाने की कोशिश कर रहा है. हामने चार और डोस्सियर मांगे हैं इंग्लैंड से....."
मुल्लाह ओमर, स्पिरिचुअल लीडर, तालिबान स्कूल ऑफ स्पिरिचुअलिटी: "आल्लाह ने हमें एक और तरीका दे दिया दिया है अमेरिकियों से लड़ने का. पहले जब हम ख़ुदा के सिपाही कहीं बॉल-बम रखने जाते थे तो 'स्क्यूरिटी' की वजह से पकड़ लिए जाते थे. अब पाकिस्तानी साइंस-दानों की मदद से हम नो-बॉल बम बनायेंगे. हमारे साइंस-दान और पाकिस्तानी साइंस-दान मिलकर काम कर रहे हैं और ख़ुदा के करम से हम जल्द ही नो-बॉल बम बना लेंगे. नो-बॉल बम का फायदा ये होगा कि वो दिक्खेगा ही नहीं. फिर हमें अमरीकी 'स्क्यूरिटी' वाले कैसे पकड़ेंगे...."
शाह महमूद कुरैशी, फ़ारेन मिनिस्टर एंड एड रिजेक्टर, इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ पकिस्तान: "हम इंडिया से कहेंगे कि हम उनके साथ मिलकर इस नो-बॉल को ख़त्म करना चाहते हैं. हम ये भी कहेंगे कि इंडिया हमारे साथ नो-बॉल पर इंटेलिजेंस शेयर करे.....हाल ही में अपने वाशिंगटन 'टूर' में मैंने प्रेसिडेंट ओबामा से डिमांड की है कि अमेरिका पकिस्तान को एंटी नो-बॉल मिसाइल दे जिससे हम नो-बॉल को कंट्रोल कर सकें...हमारी कोशिश रहेगी कि नो-बॉल को अफगानिस्तान में फैलने से रोका जाय लेकिन उसके लिए हमारी फ़ौज का नॉर्थ-वेस्टर्न बोर्डर पर रहना जुरुरी है...."
श्री मनमोहन सिंह, ऑनेस्टी पर्सानफाइड एंड लोंगेस्ट सर्विंग ऑनेस्ट प्राइम मिनिस्टर ऑफ इंडिया : "ये नो-बॉल की प्रॉब्लम कोई प्रॉब्लम नहीं है. पकिस्तान को चाहिए कि नो-बॉल से हटकर अपनी इकोनोमी के बारे में कुछ करे. केवल चार परसेंट ग्रोथ है पकिस्तान की. उन्हें कोशिश करनी चाहिए कि वे कम से कम टू थाऊजैंड एलेवेन से नौ परसेंट ग्रोथ रेट ले आयें. और नो-बॉल की प्रॉब्लम सॉल्व करने के लिए तो ज़ी क्रिकेटिकल विल चाहिए....क्रिटिकल नहीं क्रिटिकल नहीं...मैंने कहा क्रिकेटिकल...क्रिकेटिकल...जैसे पोलिटिकल वैसे ही क्रिकेटिकल..हैं ज़ी? और फिर वे एक ज़ीओएम भी तो बना सकते हैं...ज़ीओएम से कोई भी प्रॉब्लम सॉल्व हो सकती है...."
दलेर मेहँदी, फार्मर सिंगर एंड प्रजेंट डे रिअलिटी शो जज: "मैं तो मोहम्मद आमिर से यही कहूँगा ज़ी कि पुत्तर तुझे रब्ब ने, उस मालिक ने, उस ख़ुदा ने टैलेंट दिया है नो-बॉल फेंकने का. तू तो पुत्तर ऐसे ही नो-बॉल फेंकता रह. रब राखां पुत्तर...चक दे फट्टे.."
अमिताभ बच्चन, एक्टर, मॉडल, ट्वीटर, ब्लॉगर एंड अ फादर-इन-ला : "अब देखिये मैं तो एक कलाकार हूँ. मैं इसके बारे में क्या कहूँ? वैसे अगर कुछ कहना ही है तो मैं कहूँगा कि भाई साहब, माना कि आपकी टीम प्रचंड है लेकिन नो-बॉल फेंकने की वजह से खंड-खंड है....आईं? लगी..लगी मिर्ची लगी. और फिर देखिये आप क्रिकेटर हैं. आप बालिंग कीजिये, अपना पारिश्रमिक लीजिये और घर जाइए. नो-बॉल फेंककर क्या मिलेगा आपको? कुछ एक्स्ट्रा पाऊंड? पूज्यनीय बाबूजी कहा करते थे कि जो एक बार नो-बॉल फेंककर अपनी गलती न दोहराए वही असली खिलाड़ी है.....मैंने इस नो-बॉल वाली घटना पर कल ही मधुशाला में एक रुबाई जोड़ी है...हाँ, सुनिए
बालिंग पथ पर बालिंग करने चलता है बालर आला
जोर से दौड़े या फिर धीरे दुविधा में है मतवाला
कोच बताते राहें कितनी पर मैं यह बतलाता हूँ
धीरज के संग कदम धरो तो फेंकोगे फिर नो-बॉला
बाबा रामदेव, ब्रीदिंग एक्सपर्ट, आंटरप्रेनर एंड पोलिटिसियन-इन-मेकिंग: "हे हे हे. लोग पाकिस्तान से फोन करके पूछते हैं बाबा जी, ये अपने नौजवान क्रिकेटर इतना नो-बॉल क्यों फेंक रहे हैं. मैं कहता हूँ ये नो-बॉल फेंके जाने का कारण है कि एम् एन सी का आटा. पकिस्तान लीवर जो आटा पकिस्तान में बेंच रहा है उसको खाकर ही बालर नो-बॉल फेंक रहे हैं. एम् एन सी कम्पनियाँ पाकिस्तान में करीब एक लाख करोड़ का आटा और तेल बेंचती हैं. अब कोई क्रिकेटर इन कंपनियों का आटा और तेल खायेगा तो वह जो है नो-बॉल तो फेंकेगा ही. यह बात हमारे राष्ट्र के लिए एक सन्देश है कि एम एन सी के बनाये खाद्य पदार्थों को अगर न रोका गया तो हमारा भी एक-एक क्रिकेटर नो-बॉल फेंकने लगेगा. यह जो है वह पूरे राष्ट्र के लिए बहुत ही खराब होगा. इसीलिए पतंजलि योगपीठ ने चावल, बाजरा, गेंहू और जौ को मिलाकर एक आटा बनाया है जिसकी रोटी खाने से बोलर कभी भी नो-बॉल नहीं फेंकेगा. हम तो राष्ट्र निर्माण करते हैं. उसके लिए हम कटिबद्ध हैं. आज ज़रुरत है......."
चन्दन सिंह हाठी, मैनेजर गंगोत्री यन्त्र प्रतिष्ठान: "क्या आप अपने बालिंग रन-अप से परेशान हैं? क्या आप इन-स्विंगर करते हैं और वो आउट-स्विंगर हो जाता है? क्या आप जब भी नो-बॉल फेंकना चाहते है तब नहीं फेंक पाते? क्या आपकी एल बी डब्ल्यू की अपील पर अम्पायर बैट्समैन को आउट दे देता है? क्या आप विश्व के सबसे बड़े नो-बॉलर बनना चाहते हैं? क्या नो-बॉल फिक्स करने की वजह से आप बार-बार पकड़े जाते हैं? तो पहली बार गंगोत्री यन्त्र प्रतिष्ठान लाया है नो-बॉल सुरक्षा रुद्राक्ष. यह पहनने के बाद आप जब भी चाहें नो-बॉल फेंक सकते है और पकड़े भी नहीं जायेंगे. हमारा दावा है ...."
प्रणब मुख़र्जी, फिनांस मिनिस्टर एंड पोलिटिकल मैनेजर, यूनाइटेड प्रोग्रेसिव अलायंस : "दीस ईभेंट हुविच हैपेण्ड ईन इंग्लैंड शूड नाट हैभ हैपेण्ड...उई फार्मली बिलीभ दैट पकिस्तान शूड ट्राई एंड ब्रिंग डाउन दा नो-बाल बोल्ड टू आंडर एट पारसेंट...आल्दो उई आर कोंसोटेंटोली मोनिटोरिंग दा सिचुयेशान एमार्जिंग फ्रॉम...."
यह था हमारे ब्लॉग-पत्रकार चंदू चौरसिया की विश्व के तमाम बड़े नेताओं और लोगों से नो-बॉल फिक्सिंग पर बातचीत. चंदू चौरसिया का अगला असाइंमेंट है कि वे युवा-नेता, युवराज, भावी प्रधानमंत्री श्री राहुल गाँधी का इंटरव्यू लेंगे. हम जल्द ही वह इंटरव्यू अपने ब्लॉग पर प्रकाशित करेंगे. तब तक हम आपसे विदा लेते हैं.
Thursday, July 22, 2010
एक मुलाकात कृषि मंत्री के साथ
परसों मेरा ब्लॉग पत्रकार शरद पवार जी का इंटरव्यू लेने पहुंचा तो उन्होंने मना कर दिया. बोले कि नहीं देंगे. मैंने सोचा था कि प्रधानमंत्री जी उनका भार कम करते उससे पहली ही उनका एक ताज़ा इंटरव्यू छाप देता लेकिन अब उन्होंने नहीं दिया तो क्या कर सकते हैं? उनकी इस बात के विरोध में उनका पुराना इंटरव्यू छाप रहा हूँ. आप बांचिये.
वैसे उन्होंने वचन दिया है कि वे अगले हफ्ते इंटरव्यू देंगे.
...............................................................
इस वर्ष मानसून की कमी हो गई है. अपना देश ही ऐसा है. यहाँ भ्रष्टाचार को छोड़कर आये दिन किसी न किसी चीज की कमी होती रहती है. इस कमी वाली वर्तमान संस्कृति में शायद कमी के लिए और कुछ नहीं बचा था इसीलिए इस बार मानसून की कमी हो गई. दाल की कमी, चीनी की कमी, प्याज-आलू की कमी को देश कितने दिन झेलेगा? कुछ नया भी तो कम होना चाहिए.
विद्वान बता रहे हैं कि बादलों की कमी नहीं है लेकिन बादलों में पानी की कमी ज़रूर है. आश्चर्य इस बात का है कि अभी तक सरकार ने यह नहीं कहा कि मानसून की कमी के पीछे विदेशी ताकतों का हाथ है. शायद सरकार अभी तक इतनी काबिल नहीं हुई कि मानसून की कमी के लिए विदेशी ताकतों को जिम्मेदार बता दे.
लेकिन यह सब मैं क्यों लिख रहा हूँ? इसी को कहते हैं घटिया ब्लॉग-लेखन.
अब देखिये न, मुझे प्रस्तुत करना है हमारे कृषि मंत्री का साक्षात्कार और मैं प्रस्तावना में न जाने क्या-क्या ठेले जा रहा हूँ. इसलिए प्रस्तावना को यहीं खत्म करता हूँ और हमारे कृषि मंत्री का साक्षात्कार प्रस्तुत करता हूँ.
आप यह मत पूछियेगा कि इस साक्षात्कार के ट्रांसक्रिप्ट मुझे कहाँ मिले? मैं नहीं बताऊँगा. मैंने (ब्लॉगर) पद और गोपनीयता की कसम खाई है.आप साक्षात्कार पढिये.
.......................................................
पत्रकार: नमस्कार मंत्री जी.
मंत्री जी: नमस्कार. बाहर आसमान साफ़ है. मौसम अच्छा है....अब यहाँ कोई अंपायर तो है नहीं कि वो हाथ नीचे करके इंटरव्यू शुरू करने का इशारा करेगा. जब मैं खुद ही जसवंत सिंह बन गया हूँ तो अंपायर का रोल भी खुद ही निभा देता हूँ.....वैसे भी क्रिकेट चलाने के लिए मैं ही अध्यक्ष बना रहता हूँ. मैं ही सेलेक्टर भी बन जाता हूँ. मैं ही...इसलिए यहाँ भी मैं ही अंपायर भी बन जाता हूँ... ये लीजिये. मैंने हाथ नीचे किये. अब आप पहला सवाल फेंक सकते हैं.
पत्रकार: जसवंत सिंह? ये वही जिन्हें पार्टी से...
मंत्री जी: सॉरी सॉरी. जसदेव सिंह की जगह मेरे मुंह से जसवंत सिंह निकल गया. कोई बात नहीं. आप सवाल फेंकिये.
पत्रकार: सबसे पहले मेरा सवाल यह है कि आप कृषि मंत्री भी हैं और इस देश की क्रिकेट भी चलाते हैं. क्या आप दोनों काम एक साथ कर पाते हैं?
मंत्री जी: जी हाँ. बिलकुल कर पाता हूँ.... वैसे भी क्रिकेट में पॉलिटिक्स है और पॉलिटिक्स में क्रिकेट..कृषि मंत्रालय में भी पॉलिटिक्स है...जब सब जगह पॉलिटिक्स ही है तो फिर और क्या चाहिए? डबल रोल करने से समय का बेहतर तरीके से मैनेजमेंट होता है...
पत्रकार: वह कैसे? अपनी बात पर प्रकाश डालेंगे?
मंत्री जी: अब देखिये. अगर मैं क्रिकेट देखने दक्षिण अफ्रीका जाऊंगा तो साथ-साथ वहां की कृषि के बारे में भी जानकारी हो जायेगी...... मान लीजिये मैं श्रीलंका में कोई टूर्नामेंट देखने गया. अब हो सकता है वहां यह देखने को मिले कि श्रीलंका वालों ने समुद्र के पानी से खेती करने के लिए कोई नया कैनाल प्रोजेक्ट कर लिया हो. ऐसे में श्रीलंका जाना तो हमारे मंत्रालय के लिए लाभकारी तो साबित होगा ही न?
पत्रकार: जी हाँ. आपकी बात से सहमत हुआ जा सकता है.
मंत्री जी: सहमत हुआ जा सकता है से क्या मतलब है आपका? आपको कहना चाहिए कि आप मेरी बात से सहमत हैं.
पत्रकार: ठीक है. वही समझ लीजिये.
मंत्री जी: हाँ, ये ठीक है. अब आगे का सवाल पूछिए.
पत्रकार: मेरा सवाल यह है कि आप कृषि और क्रिकेट, दोनों को चला सकते हैं इसके बारे में आपने प्रधानमंत्री को कैसे कन्विंस किया?
मंत्री जी: फोटो खिंचवा कर.... आप मेरा यह वाला फोटो देखिये. देख लिया? अब आप बताइए, पगड़ी पहनकर मैं मिट्टी से जुडा हुआ किसान लग रहा हूँ कि नहीं? ये वाला फोटो देख लिया?... अब आप मेरा ये वाला फोटो देखिये. इस फोटो को देखने से क्या आपको नहीं लगता कि मैं आई सी सी का भावी अध्यक्ष लग रहा हूँ?
पत्रकार: जी हाँ. मैं आप की बात से सहमत हूँ. बल्कि इस फोटो में आप आईसीसी के भावी नहीं बल्कि प्रभावी अध्यक्ष लग रहे हैं.
मंत्री जी: है न. कन्विंस करना कितना इजी है, आपको समझ में आ ही गया होगा.
पत्रकार: जी हाँ, समझ में आ गया.... अब मेरा सवाल यह है कि इस वर्ष पहले चरण में मानसून पूरे बासठ प्रतिशत कम रहा. मानसून की इस कमी से उत्पन्न होने वाली परिस्थितियों से निबटने के लिए आपके मंत्रालय ने क्या किया है?
मंत्री जी: देखिये, अभी तक तो कुछ नहीं किया. और कुछ नहीं करने के पीछे एक कारण है. हम कोई भी काम जल्दबाजी में नहीं करते. आपको ज्ञात हो कि जब से मैंने देश की क्रिकेट को चलाना शुरू किया है तब से अगर कोई बैट्समैन अपने पहले टेस्ट में असफल रहे तो हम उसे और मौका देते हैं. हम उसे तुंरत टीम से नहीं निकालते. इसी तरह से हम मानसून को और मौका दे रहे हैं.... अब हम दूसरे चरण के मानसून का परफॉर्मेंस देखेंगे. अगर वह दूसरे चरण में भी कम रहा फिर हम स्थिति से निबटने पर सोचेंगे. क्रिकेट चलाने की वजह से हमने बहुत कुछ नया सीखा है जिसे हम मंत्रालय में भी लागू कर रहे हैं.
पत्रकार: हाँ, वह तो दिखाई दे रहा है. अच्छा यह बताइए कि इतने वर्षों से आपकी पार्टी देश पर शासन कर रही है लेकिन किसानों के लिए आधारभूत योजनायें क्यों नहीं लागू की जा सकी?
मंत्री जी: देखिये, जहाँ तक मेरी पार्टी द्बारा देश पर शासन करने की बात है तो आपको मालूम होना चाहिए कि मेरी पार्टी तो एक रीजनल पार्टी है. मेरी पार्टी ने देश पर शासन नहीं किया है. आपको इतनी छोटी सी बात का पता नहीं है? किसने आपको पत्रकार बना दिया?
पत्रकार: नहीं...., वो तो मैं डिग्री लेकर पत्रकार बना हूँ. लेकिन एक बात तो सच है न कि आप पहले कांग्रेस पार्टी में थे तो यह कहा ही जा सकता है कि आपकी पार्टी ने वर्षों से देश पर शासन किया है.
मंत्री जी: अच्छा अच्छा. आप उस रस्ते से आ रहे हैं. तब ठीक है. आगे का सवाल पूछिए.
पत्रकार: सवाल तो मैंने पूछ ही लिया है. आधारभूत योजनायें...
मंत्री जी: यह कहना गलत है. वैसे भी जब लोन-माफी से काम चल जाए तो फिर आधारभूत योजनाओं की क्या ज़रुरत है? ....अभी हाल में ही हमारी सरकार ने किसानों द्बारा लिया गया सत्तर हज़ार करोड़ रूपये का क़र्ज़ माफ़ किया है....आपको पता है कि कर्ज माफी का यह आईडिया भी मुझे एक क्रिकेट मैच के दौरान मिला?
पत्रकार: कैसा आईडिया? आप प्रकाश डालेंगे?
मंत्री जी: वो हुआ ऐसा कि मैं नागपुर में एक क्रिकेट मैच देख रहा था. क्रिकेट मैच देखने के लिए स्टेडियम में पहुँचने से पहले मैंने विदर्भ के किसानों के एक प्रतिनिधिमंडल से मुलाक़ात की थी. मैच देखते हुए मैंने देखा कि बैट्समैन ने शाट मारा और उसे कवर का फील्डर नहीं रोक सका. संयोग देखिये कि सजी हुई फील्ड में एक्स्ट्रा-कवर था ही नहीं. नतीजा यह हुआ कि बाल बाउंड्री लाइन से बाहर चली गई. चौका हो गया....यह देखते हुए मुझे लगा कि अगर किसानों को एक एक्स्ट्रा-कवर दिया जाय...मेरा मतलब अगर लोन-माफी का एक्स्ट्रा-कवर उन्हें मिल जाए तो फिर...
पत्रकार: समझ गया-समझ गया. सचमुच आप क्रिकेट की वजह से बहुत कुछ सीख गए हैं...लेकिन कुछ आधारभूत योजनायें नहीं बनीं. डॉक्टर एम एस स्वामीनाथन का कहना है कि...
मंत्री जी: मैं भी समझ गया कि आप क्या कहना चाहते हैं. आप डॉक्टर स्वामीनाथन के हवाले से यही कहना चाहते हैं न कि उनके सुझाव पर सरकार ने ध्यान नहीं दिया?
पत्रकार: हाँ. मेरा मतलब यही है.
मंत्री जी: देखिये डॉक्टर स्वामीनाथन हरित क्रान्ति ले आये वह एक अलग बात है. लेकिन उनके सुझाव बहुत लॉन्ग टर्म प्लानिंग की बात लिए हुए हैं और यहाँ हमें चाहिए तुंरत समाधान वाले सुझाव. ऐसे में कर्ज-माफी से बेहतर और क्या हो सकता है? डॉक्टर स्वामीनाथन को यह समझने की ज़रुरत है कि अब ज़माना ट्वेंटी-ट्वेंटी क्रिकेट का है. टेस्ट मैच देखकर पब्लिक बोर हो जाती है. हमें तुंरत रिजल्ट चाहिए.
पत्रकार: लेकिन डॉक्टर स्वामीनाथन की बात में प्वाइंट तो है ही.
मंत्री जी: कोई प्वाइंट नहीं है. आप जिसे प्वाइंट कह रहे हैं, वे सारे सिली प्वाइंट हैं.
पत्रकार: आपके कहने का मतलब लॉन्ग टर्म योजनायें नहीं लागू की जा सकती? यहाँ भी वही क्रिकेट?
मंत्री जी: जी बिल्कुल. अब बिना क्रिकेट के इस देश में कुछ चलता है क्या? वैसे भी डॉक्टर स्वामीनाथन की उम्र हो गई है अब....आप खुद ही सोचिये न. सचिन तेंदुलकर इतने बड़े खिलाड़ी हैं लेकिन क्या वे पचपन साल की उम्र में भी क्रिकेट खेल सकते हैं?...मानते हैं न कि नहीं खेल सकते...बस वैसा ही कुछ डॉक्टर स्वामीनाथन के साथ भी है...अब कृषि-विज्ञान के क्षेत्र में हम यंग टैलेंट लाना चाहते हैं...आप जानते हैं कि यंग टैलेंट लाने का आईडिया मुझे ट्वेंटी-ट्वेंटी क्रिकेट की वजह से मिला?...मैं आपको बताता हूँ कि क्रिकेट की वजह से हमारे मंत्रालय में बहुत कुछ बदल दिया है मैंने.
वैसे, ये आप बार-बार लॉन्ग टर्म, लॉन्ग टर्म की रट क्यों लगा रहे हैं? लॉन्ग टर्म सुनने से मुझे लॉन्ग लेग, लॉन्ग ऑन, लॉन्ग ऑफ वगैरह की याद आती है.
पत्रकार: हाँ, वह तो है. वैसे एक सवाल का जवाब दीजिये. अगर मानसून दूसरे चरण में भी ढीला रहा तो आपका प्लान क्या रहेगा?
मंत्री जी: उसके लिए मैंने सेलेक्टर नियुक्त कर दिए हैं.
पत्रकार: सेलेक्टर नियुक्त कर दिया है आपने? क्या मतलब?
मंत्री जी: माफ़ कीजिये, आप पत्रकार तो हैं लेकिन आपका दिमाग नहीं चलता. केवल कलम चलाने से कोई पत्रकार नहीं हो जाता....सेलेक्टर नियुक्त करने से मेरा मतलब यह है कि मैंने अपने मंत्रालय के अफसरों को सेलेक्टर बना दिया है. वे देश के जिलों का सेलेक्शन करके एक लिस्ट देंगे. फिर मैं एक प्रेस कांफ्रेंस में उन जिलों को सूखा-ग्रस्त घोषित कर दूंगा...आपने बीसीसीआई के सचिव द्बारा टीम सेलेक्शन की सूचना वाला प्रेस कांफ्रेंस अटेंड किया है कभी?
पत्रकार: नहीं. मैं तो कृषि मामलों का पत्रकार हूँ. मैं केवल कृषि मामलों पर रिपोर्टिंग करता हूँ.
मंत्री जी: इसीलिए तो आपके अखबार का सर्कुलेशन ख़तम है...अपने एडिटर से कहें कि वे आपको क्रिकेट मामलों को कवर करने का भी मौका दें....आप देखेंगे कि आपकी एफिसिएंसी बढ़ जायेगी...जैसे मेरी बढ़ गई है...अखबार का सर्कुलेशन भी बढ़ जाएगा. क्रिकेट की वजह से एफिसिएंसी बढ़ जाती है.
पत्रकार: जी. मैं सम्पादक महोदय से आपके सुझाव के बारे में बात करूंगा. वैसे एक प्रश्न मेरा यह है कि अगर कम मानसून की वजह से देश में अनाज की कमी हुई तो क्या आप इसबार भी आस्ट्रेलिया से गेंहू का आयात करेंगे?
मंत्री जी: गेंहूँ का आयात करने के लिए देश में अनाज की कमी का होना ज़रूरी नहीं है.गेंहूँ का आयात तो हमने तब भी किया था जब अनाज की कमी नहीं थी...हाँ इस बात की गारंटी नहीं दे सकता कि इस बार भी आस्ट्रेलिया से ही गेंहूँ का आयात करूंगा.
पत्रकार: ऐसा क्यों? मेरा मतलब क्या ऐसा आप इसलिए करेंगे क्योंकि पिछली बार आस्ट्रलिया वालों ने सडा गेंहूँ भेज दिया था?
मंत्री जी: नहीं वो बात नहीं है....मैं ऐसा इसलिए करूंगा कि एक बार फोटो खिचाने के चक्कर में आस्ट्रलियाई खिलाड़ियों ने मुझे मंच पर धक्का दे दिया था...इसी बात को ध्यान में रखते हुए हमारे बीसीसीआई के पदाधिकारियों ने मुझे सजेस्ट किया कि आस्ट्रलिया से बदला लेने का यही तरीका है कि आप कृषि मंत्री के रोल में उनसे गेंहूँ मत मंगवाईये.
पत्रकार: वैसे आपको नहीं लगता कि गेंहू का आयात करके तबतक कोई फायदा नहीं होगा जब तक आप सार्वजनिक वितरण प्रणाली, मेरा मतलब पब्लिक डिस्ट्रीव्यूशन सिस्टम को ठीक नहीं करेंगे. वैसे क्या कारण है कि पब्लिक डिस्ट्रीव्यूशन सिस्टम ठीक से काम नहीं कर रहा?
मंत्री जी: असल में पब्लिक डिस्ट्रीव्यूशन सिस्टम थर्ड मैन के होने की वजह से काम नहीं कर रहा.
पत्रकार: लेकिन अगर सिस्टम में थर्ड मैन हैं तो उन्हें हटाने की जिम्मेदारी भी तो आपकी ही है.
मंत्री जी: अब देखा जाय तो थर्ड मैन भी तो ज़रूरी होते हैं. पब्लिक डिस्ट्रीव्यूशन से थर्ड मैन हटाने के बारे में मैंने बैठक की थी लेकिन सलाहकारों का विचार था कि थर्ड मैन का रहना दोनों के लिए ज़रूरी है. क्रिकेट में भी और पब्लिक डिस्ट्रीव्यूशन सिस्टम में भी. हमने सुझाव मानते हुए थर्ड मैन नहीं हटाये...देखा आपने? डबल रोल कितने काम की चीज है?
पत्रकार: जी हाँ. वो तो मैं देख रहा हूँ. अच्छा मेरा एक और सवाल यह है कि इस बार सरकार ने किसानों के लिए मिनिमम सपोर्ट प्राइस की घोषणा फसल होने से पहले ही कर दी. ऐसा पहले तो नहीं हुआ था. तो इसबार ऐसा करने का कारण क्या इलेक्शन था?
मंत्री जी: जी नहीं. मिनिमम सपोर्ट प्राइस पहले ही घोषणा करने का आईडिया मुझे क्रिकेट चलाने की वजह से ही मिला......आपके मन में सवाल ज़रूर उभर रहा होगा...उसका जवाब यह है कि क्रिकेट खिलाड़ियों को जब से कान्ट्रेक्ट सिस्टम के तहत पेमेंट होना शुरू हुआ है तब से फीस की घोषणा कान्ट्रेक्ट साइन करने से पहले ही हो जाती है...मिनिमम सपोर्ट प्राइस का आईडिया मुझे वहीँ से मिला...देखा आपने कि क्रिकेट...
पत्रकार: हाँ देखा मैंने कि क्रिकेट चलाने की वजह से आप एक अच्छे कृषि मंत्री बन पाए. वैसे मेरा एक आखिरी सवाल है. आये दिन क्रिकेट खिलाड़ी आपके कहने पर तमाम लोगों के सहायतार्थ मैच खेलते रहते हैं. ऐसे में आपने कभी किसानों की सहायता के लिए क्यों नहीं मैच आयोजित किये?
मंत्री जी: अरे वाह. आप एक कृषि पत्रकार होते हुए भी इतना दिमाग रखते हैं. हमने तो सोचा था कि....चलिए आपके सुझाव को मैं याद रखूँगा और आज ही अपने मंत्रालय के अफसरों की एक मीटिंग बुलाकर इस मसले पर विचार करूंगा.
पत्रकार: लेकिन इस बात पर विचार करने के लिए तो आपको बीसीसीआई की मीटिंग बुलानी चाहिए.
मंत्री जी: वही तो बात है न. मेरे लिए दोनों एक सामान हैं. मैं मंत्रालय वालों से क्रिकेट डिस्कस कर सकता हूँ और क्रिकेट वालों से कृषि...आप नहीं समझेंगे...आप समझते तो क्रिकेट के पत्रकार नहीं बन जाते...खैर, अब मेरे पास और सवाल के लिए वक्त नहीं है...मुझे क्रिकेट असोसिएशन की मीटिंग में जाना है...
Friday, April 23, 2010
मोक्ष वाया क्रिकेट
शायद किन्ही गहन आध्यात्मिक क्षणों में उन्होंने अपने गुरु से पूछा होगा; "गुरुदेव, पेट्रोकेमिकल और कपड़ा बेंचकर बहुत पैसा कमाया परन्तु चित्त को शांति नहीं मिलती. कोई उपाय सुझाएँ कि चित्त को शांति मिले. अगर ऐसा नहीं हुआ तो मोक्ष प्राप्ति के मार्ग में बाधा उत्पन्न होगी. हिन्दू धर्म में कहा गया है कि..."
गुरुदेव ने उनकी बात काटते हुए तुरंत बताया होगा; "यजमान, चित्त को शांति मिले, इसके लिए आप क्रिकेट टीम क्यों नहीं खरीद लेते?"
अपनी बात को सही साबित करने के लिए गुरुदेव ने यहाँ तक कह दिया होगा कि; " हे यजमान, स्वयं वासुदेव श्रीकृष्ण ने क्रिकेट की महिमा का बखान करते हुए गीता में कहा है कि 'हे पार्थ, कलियुग में मोक्षप्राप्ति का एक ही मार्ग होगा और वह होगा किसी न किसी रूप में क्रिकेट नामक खेल से जुड़ना. कलियुग में जो भी इस खेल से जुड़ जाएगा उसे मोक्ष की प्राप्ति होगी. जो भी नहीं जुड़ सकेगा उसे मोक्ष की प्राप्ति तो दूर मोक्ष मार्ग पर जाकर मिलने वाली कच्ची पगडंडी के दर्शन भी नहीं होंगे."
उन्होंने क्रिकेट टीम खरीद ली. अब मैच के दौरान सूट-बूट से निकलकर टी-शर्ट और जींस में समाये हुए अपनी टीम की सफलता पर ताली बजाते हैं. हवा में पंच मारते हैं. अपने खरीदे गए गए खिलाड़ी द्वारा छक्का जड़ देने पर नाच-नाच कर तालियाँ बजाते हैं. शायद इन्ही क्षणों में मोक्ष के कीटाणु उनके शरीर से टकराते होंगे और उन्हें असीम आनंद देते होंगे. वे स्टेडियम में हजारों लोगों के सामने हेहर बने कूद रहे हैं. ऐसे लोगों के सामने जिन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि हमेशा सूट-बूट में घुसा यह आदमी इस तरह से नाचेगा और करोड़ों लोग देख रहे होंगे.
लेकिन कहते हैं न कि मोक्ष की लालसा जो न कराये.
ये हाल केवल उनका नहीं है. ये तो ठहरे पेट्रोकेमिकल और कपड़ा बेचने वाले. सीमेंट और लोहा बेचने वाले और हवाई-जहाज उड़ाने वाले और शराब बेचने वाले का गुरु भी मोक्ष प्राप्ति का साधन क्रिकेट को ही बताता होगा. इस मामले में सारे गुरु एक जैसे होते होंगे वो चाहे अध्यात्मिक गुरु हों या मैनेजमेंट गुरु. कुछ बेंचकर, चाहे पैसा कमाया हो या पैसा गंवाया हो, मोक्ष प्राप्ति का साधन एक ही है, क्रिकेट.
जो पहले नहीं जुड़ सके और मोक्ष के मार्ग पर दो साल से पिछड़ गए वे अब जुड़ रहे हैं. पहुँच गए किसी गुरु के पास. बोले; "गुरुदेव, जिस जनता से हमारी कंपनी ने पैसा डिपोजिट लिया था वो बहुत तंग कर रही है. कहती है पैसा वापस दो. अब कहाँ से दें पैसा? वो तो खा चुके हैं. तिकड़म कर सरकार से किसी तरह तीन साल का समय लिया है लेकिन उसमें से दो साल ख़तम. मालूम है जनता का पैसा वापस नहीं कर पायेंगे. अगले साल फिर झमेला शुरू होगा. क्या करें गुरुदेव? चित्त शांत नहीं रहता. आप कोई मार्ग सुझाएँ. अब आपका ही 'सहारा' है."
गुरुदेव ने कहा होगा; "मात्र एक ही मार्ग है वत्स. क्रिकेट. चित्त शांत करने के लिए क्रिकेट टीम खरीद लो. मोक्ष प्राप्ति का यही साधन है."
वे पहुँच गए और सत्रह सौ करोड़ रुपया देकर क्रिकेट टीम खरीद ली. गरीब जनता का डिपोजिट वापस करने के लिए पैसे नहीं हैं लेकिन क्रिकेट टीम खरीद ली और मोक्ष का रास्ता साफ़ कर लिया.
हर मर्ज की दवा क्रिकेट है. न जाने किसको-किसको बचाता रहता है. जैसे सत्तर के दशक में डॉक्टर साहब लोग हर मर्ज़ का इलाज पेनिसिलिन से करते थे वैसे ही आज के जमाने में हर चीज का इलाज क्रिकेट से किया जा रहा है.
मंत्री जी के भी गुरु होंगे. उन्होंने भी बताया होगा कि; "वत्स मंत्री हो, टीम तो खरीद नहीं सकते. क्यों न किसी टीम के मेंटर बन जाओ. मंत्री और मेंटर में बड़ा जबरदस्त ताल-मेल है. मुझे तो लगता है कि मेंटर शब्द मंत्री शब्द से ही निकला होगा."
मंत्री जी बन गए मेंटर. बनने से पहले तमाम अध्ययन किया. एक्सल शीट्स को रातभर जागकर वैसे ही रट्टा मारा जैसे आठवीं का विद्यार्थी ज्यामिति का प्रमेय याद करता है; "त्रिभुज क ख ग में कोण क ख ग.....त्रिभुज क ख ग में कोण क ख ग.."
बाद में पता चला कि मोक्ष मार्ग पर बाधा आ गई. गाड़ी आगे नहीं जा पा रही थी और वे आगे बढ़ने पर अड़े हुए थे. ऐसे में एक्सीडेंट हो गया. अब अस्पताल में हैं और घाव सहला रहे हैं.
सरकार के मर्जों की दवा भी क्रिकेट है. सरकार के भी कोई गुरु होंगे. सरकार एक दिन उनके पास पहुँच गए होंगे; "अब क्या किया जाय गुरुदेव? महिला आरक्षण बिल लोकसभा में पेश करने का समय आ रहा है. अपने और पराये सभी नाराज हैं. फिनांस बिल पास करवाना है. संसद में मंहगाई पर बहस और वाक्आउट होने का चांस है. पिछले आठ महीने से कहते आ रहे हैं कि मंहगाई कम होगी, दस दिन बाद कम हो जायेगी लेकिन ऐसा नहीं हो रहा. बहुत झमेला है. क्या किया जाय?"
गुरुदेव ने कहा होगा; "वत्स क्रिकेट किस दिन काम आएगा?"
सरकार जी बोले होंगे; "क्या बात कर रहे हैं गुरुदेव? अब सरकार क्रिकेट टीम खरीदेगी ?"
गुरुदेव ने कहा होगा; "टीम खरीदने के लिए कौन कह रहा है वत्स? क्रिकेट से जुड़ना है. जो काम आपको २००८ में करना चाहिए था वह अब कर डालिए. सी बी आई, इनकम टैक्स, रा, इन्फोर्समेंट डायरेक्टरेट...ये सब किस दिन काम आयेंगे? इन्हें क्रिकेट से जोड़िये और चैन की नींद सोइए. चाहे तो ऍफ़ बी आई, सी आई ए वगैरह को भी उधार ले लीजिये और ललित मोदी को दलित मोदी बना दीजिये. इन्वेस्टिगेशन में नेताओं के खिलाफ सुबूत इकठ्ठा कीजिये और समय-समय पर उनके हाथ मरोड़ते रहिये."
अब सरकार अपने मोक्ष का रास्ता साफ़ करने में लगी हुई है.
पूरे देश को क्रिकेट चला रहा है या पूरा देश क्रिकेट को चला रहा है, समझ में नहीं आ रहा. एक कमीशन बैठाया जा सकता है.
जय क्रिकेट.
Tuesday, February 2, 2010
इन्ही के लिए सब इतना हलकान है???
.
शाहिद आफरीदी हैं न. अरे वो पाकिस्तान वाले. अरे वही जो यंग हैं. अरे यार, वही विश्व के नंबर एक खिलाड़ी.... अरे गजब हो.... नंबर एक क्या केवल तेंदुलकर ही हो सकते हैं? अरे वही यार, जिनको आई पी एल में नहीं लेने पर झमेला हो गया.
हाँ वही-वही. दो दिन पहले आस्ट्रेलिया की आस्ट्रेलियाई पिच पर क्रिकेट की बाल चबाते हुए देखे गए. आफरीदी को बाल चबाते देख, पाकिस्तानी टीम मैनेजमेंट को बहुत गुस्सा आया. उन्होंने प्लान बनाया कि वे इस बात की शिकायत आई सी सी से करेंगे. वे उन्हें बताएँगे कि आस्ट्रेलिया में पाकिस्तानी खिलाड़ियों को ढंग से खाना नहीं खिलाया जाता. खाना नहीं मिलने की वजह से खिलाड़ी भूखे रहते हैं और बाल चबाने लगते हैं. यही कारण है कि पाकिस्तानी टीम आस्ट्रेलिया में एक भी मैच नहीं जीत पाई.
अभी मैनेजर साहब शिकायत ड्राफ्ट कर ही रहे थे कि किसी ने उन्हें बताया कि जिसे वे भूख बताने पर आमादा हैं, असल में उसे बाल टेम्पेरिंग कहते हैं. मतलब बाल के साथ छेड़-छाड़. उन्हें इस बात पर विश्वास ही नहीं हुआ. पिछले कई वर्षों से पाकिस्तानी टीम के साथ रहकर उन्होंने यही जाना था कि छेड़-छाड़ केवल महिलाओं के साथ हो सकती है. खुद आफरीदी भी एक बार हवाई जहाज में लड़की से छेड़-छाड़ करते धर लिए गए थे.
जितना ड्राफ्ट किया गया था, उसे सेव कर के छोड़ दिया गया. बाद में अम्पायर लोगों ने बताया कि आफरीदी तो बाल के साथ सचमुच छेड़-छाड़ कर रहे थे. अब तो छेड़-छाड़ का ये मामला मैच रेफरी तक जाएगा.
यह सब सुनकर मैनेजर बोले; "मैं मान ही नहीं सकता जी. अल्ला-ताला के फज़ल से बाल टेम्पेरिंग वो होती है जो कोक की बोटल कैप से की जाय. इमरान भाई ने इसी को बाल टेम्पेरिंग बताया था. वे खुद भी ऐसे ही बाल टेम्पेरिंग करते थे."
किसी ने कहा; "उसी अल्ला-ताला के फज़ल से अब जमाना बदल गया है. अब बाल टेम्पेरिंग ऐसे भी होती है जैसे आफरीदी ने किया है. बाल को ही चबा जाओ. काहे कोक की बोटल का एहसान लो?"
मैनेजर साहब इस बात पर आश्वस्त हुए कि पाकिस्तानी क्रिकेट सही तरक्की कर रहा है.
बाद में शाहिद आफरीदी ने माना कि जो उन्होंने किया उसे बाल टेम्पेरिंग ही कहते हैं. टीम मैनेजमेंट के ह्रदय में क्रैक हो गया. टीम मैनेजमेंट ने सोचा था कि मीडिया-वीडिया में हल्ला मचा देंगे और इस बात को नहीं मानेंगे कि शहिद आफरीदी ने टेम्पेरिंग जैसी कोई हरकत की है.
लेकिन आफरीदी जी ने क़ुबूल करके सब गड़बड़ कर दिया.
आफरीदी जी ने क़ुबूल भी बड़े मस्त अंदाज़ में कहा. बोले; "इल्लीगल तो है जी. लेकिन वो क्या है न कि फ्रस्ट्रेशन थी जी. पाकिस्तान टीम एक भी मैच जीत नहीं पा रही थी." इतना कहने के बाद शायद उन्हें लगा होगा कि ये क़ुबूल करना तो एक तरफ़ा हो रहा है इसलिए फट से बोले; "और वैसे भी जी, दुनियाँ की हर टीम करती है जी, बाल टेम्पेरिंग."
कहने का मतलब यह कि मुल्क के लिए जो करें कम है जी.
बाल टेम्पेरिंग करके उन्होंने बता दिया कि टीम के न जीतने की दशा में कुछ न कुछ किया जा सकता है. पिच को स्पाइक से खोदने का काम वे पहले ही कर चुके थे. गाली-वाली देकर भी टीम को जिताने का प्रयास कर ही लिया था. अब बाल टेम्पेरिंग भी आजमा लिया.
आगे अगर इसे बढ़ाएंगे तो क्या-क्या आजमा सकते हैं?
अब पाकिस्तान में तो वैसे भी कोई खेलने नहीं जाता. इन्हें खेलना होगा तो किसी और देश में जाना ही पड़ेगा. देखेंगे कि किसी दौरे पर पकिस्तान टीम मैच नहीं जीत पा रही है. कप्तान की समझ में नहीं आ रहा है कि क्या किया जाय? कौन सा दांव खेला जाय? डेढ़ सौ रन बनाकर खेल रहे बैट्समैन को आफरीदी अचानक बाल मारकर घायल कर देंगे.
अम्पायर पूछेगा कि यह क्या कर रहे हो तो आराम से बोल देंगे; "फ्रस्ट्रेशन है जी. मुल्क जीत नहीं पा रहा है जी. क्या करें जी? मानता हूँ इल्लीगल है लेकिन जीतने के लिए... मुल्क के लिए कुछ करना तो पड़ेगा जी...."
इन्ही वर्ल्ड नंबर वन के न खरीदे जाने पर अपने देश में इतना बड़ा बवाल हो गया. मीडिया ने आई पी एल को गाली दी. शाहरुख़ खान को शिवसेना वालों ने गाली दी. बुद्धिजीवियों ने टीम के मालिकों को गाली दी.मीडिया, सरकार, शाहरुख़, पत्रकार, बुद्धिजीवी और न जाने कौन-कौन हलकान हुए जा रहे थे.
Saturday, January 23, 2010
पकिस्तान प्रीमियर लीग
आई पी एल में खिलाड़ी बिकने के लिए तैयार थे. कुछ खरीद लिए गए तो कुछ को किसी ने पूछा ही नहीं. नहीं पूछा माने बिलकुल नहीं पूछा. जिन्हें नहीं पूछा गया ऐसे लोगों के लिए खरीदार मोल-भाव करने के लिए भी राजी नहीं हुए. वैसा भी नहीं हुआ जैसा बाज़ार ख़त्म होने के समय आनेवाला ग्राहक दुकानदारों के साथ करता है. मोल-भाव में चालीस परसेंट कम बोलता है तो भी दूकानदार उसे सबकुछ देकर चला जाता है. वैसा भी नहीं हुआ.
आस्ट्रेलिया के खिलाड़ी नहीं बिके. वेस्टइंडीज के भी पूरे नहीं बिक सके. श्रीलंका, न्यूजीलैंड, बरमूडा, कनाडा, बंगलादेश, मालदीव, अफगानिस्तान, चीन, दक्षिण अफ्रीका, केन्या, नामीविया, सूडान, इरान, ईराक, जापान, दक्षिण कोरिया, सीरिया, लीबिया और न जाने कहाँ-कहाँ के खिलाडियों को किसी खरीदार ने नहीं पूछा.
इन देशों की सरकारों ने भारत के ऊपर या फिर खरीदारों के ऊपर आरोप नहीं लगाया. किसी ने नहीं कहा कि वे भारत से रिश्ता तोड़ लेंगे. किसी ने नहीं कहा कि वे अब भारत में बना हैन्डीक्राफ्ट का सामान नहीं खरीदेंगे या अब वे भारत से आयातित चीनी का शरबत नहीं पीयेंगे. और तो और किसी ने यह भी नहीं कहा कि वे भारतीय साफ्टवेयर इंजीनीयरों को अपने देश में काम नहीं करने देंगे या वे अब भारतीय कॉल सेंटर में फ़ोन नहीं करेंगे.
लेकिन पकिस्तान एक ऐसा 'मुलुक' है जो बाकी सबसे अलग है. वहाँ की न केवल सरकार बल्कि, जनता, नेता, क्रिकेट खिलाड़ी, हॉकी खिलाड़ी, कबड्डी खिलाड़ी, डॉक्टर, इंजिनियर, ड्राईवर, कंडक्टर,अफसर, वकील, पत्रकार, पुलिस, सेना, आतंकवादी, नदी,सड़क, मस्जिद, पुल, मकान और न जाने कौन-कौन भारत से रिश्ता तोड़ने के लिए तैयार है.
कहते हैं कि ये उनके खिलाड़ियों की बेईज्जती है जो उन्हें किसी ने नहीं खरीदा. तुर्रा ये कि उनके खिलाड़ी वर्ल्ड चैपियन हैं. बता रहे हैं कि शाहिद आफरीदी विश्व के सबसे बड़े खिलाड़ी हैं. उन्हें तो कम से कम खरीदना चाहिए था. ऐसा नहीं होने से केवल खिलाडियों का ही नहीं, पूरे पकिस्तान का अपमान हुआ है.
पकिस्तान का अपमान इस बात पर निर्भर करता है कि उनके खिलाड़ियों को नहीं खरीदा गया? अगर क्रिकेट खिलाड़ियों की खरीद-बिक्री पर ही देश का मान-अपमान टिका है तो फिर पाकिस्तान का मान तब-तब चार गुना बढ़ जाना चाहिए था जब-जब इनके खिलाड़ी बिके हैं.
अरे भाई, माना कि आई पी एल में किसी ने नहीं खरीदा लेकिन पहले तो लोग पाकिस्तानी खिलाड़ियों को 'खरीदते' रहे हैं और ये खिलाड़ी बिकते भी रहे हैं. कितना मान बढ़ गया था तब, पाकिस्तान का?
जो खिलाड़ी बिके नहीं वे कह रहे हैं; "यह हमारे खिलाफ साज़िश है."
गज़ब शब्द है ये साज़िश भी. कभी-कभी लगता है जैसे इस शब्द का आविष्कार पकिस्तान में ही हुआ होगा. और पकिस्तान की वजह से ही यह शब्द अमर हो जाएगा. इस देश में या दुनियाँ में कुछ भी होता है उसे ये बेचारे साज़िश बताते हैं. यह देश ऐसा है जहाँ नेता जीता है तो साज़िश की वजह से, मरता है तो साजिश की वजह से. क्रिकेट टीम मैच जीत जाती है तो साज़िश की वजह से और हार जाती है तब तो साज़िश होनी ही है. यहाँ तक कि बाढ़ आती है तो भी साज़िश की वजह से और सूखा पड़ जाता है तो उसमें भी साज़िश है.
अब वहाँ के लोग कह रहे हैं कि इस साजिश का बदला ले लेंगे. कैसे लेंगे? कह रहे हैं कि भारत में होनेवाले हॉकी वर्ल्डकप का बहिष्कार कर देंगे. कबड्डी टीम को भारत नहीं आने देंगे. आई पी एल का टेलीकास्ट पकिस्तान में नहीं होने देंगे.
मैं कहता हूँ इतना सबकुछ करने की क्या ज़रुरत है? भारत को नीचा दिखाने का सबसे बढ़िया तरीका है कि पकिस्तान अपना एक प्रीमियर लीग शुरू कर ले.
क्या कहा? पैसा कहाँ से आएगा? अरे भाई आई एस आई ने जो नकली भारतीय नोट छापे हैं उन्हें असली डालर में कन्वर्ट कर लो. क्या कहा? ऐसा संभव नहीं है?
तो फिर भैया एक ही रास्ता है. बराक ओबामा से पकिस्तान सरकार कहे कि; "अमेरिका पकिस्तान को अपना प्रीमियर लीग शुरू करने के लिए पैसा दे."
अगर अमेरिका प्रीमियर लीग शुरू करने के लिए पैसा नहीं देता तो शिक्षा वगैरह के प्रसार के लिए अमेरिका से जो पैसा मिला है वो प्रीमियर लीग में लगा दो. एक बार शुरू कर लो जो होगा देखा जाएगा.
आखिर पहले भी तो अमेरिकी सहायता राशि से हथियार खरीदे गए हैं.
सोचिये ज़रा क्या सीन होगा? पकिस्तान प्रीमियर लीग की शुरुआत होगी. बड़े धूम-धाम के साथ. उदघाटन समारोह में गाने वगैरह गाने के लिए उन कलाकारों को बुला लो जो भारतीय रीयलिटी शो में हिस्सा ले चुके हैं. उसको तो पक्का बुलाना जिसके घर में हिमेश रेशम्मैया रोटी खाना चाहते थे.
साथ ही पाकिस्तानी स्टैंड-अप कॉमेडियन लोगों को बुला लो जो भारतीय शो में पार्टिसिपेट करके मुंबई हमले के बाद अपने 'मुलुक' वापस चले गए हैं. अताउल्लाह खान को बुला लेना. वो स्टेज पर गायेगा; "अच्छा सिला दिया तूने मेरे प्यार का..."
आतिशबाजी का कान्ट्रेक्ट तालिबानियों को दे देना. विकट आतिशबाजी करेंगे तालिबानी. क्या कहा? उनके साथ सेना लड़ रही है. कोई बात नहीं. डॉक्टर अब्दुल कादिर खान को बुला लेना. वे चार ठो न्यूक्लीयर बम फोड़ देंगे. आतिशबाजी का कोरम पूरा हो जाएगा.
कुल मिलाकर "मस्त महौल में जीने दे" टाइप वातावरण हो जाएगा. बिलकुल झक्कास उदघाटन.
अब विदेशी खिलाड़ी तो पकिस्तान में खेलने से रहे. आठ दस टीम बनेगी तब जाकर प्रीमियर लीग चालू होगा. क्रिकेटर कम पड़ेंगे ही. इमरान खान, जावेद मियाँदाद, तसलीम आरिफ वगैरह को रिटायरमेंट से वापस आने के लिए उकसा दो. सरफ़राज़ नवाज़ को तो पक्का लाना. साज़िश शब्द उनसे ही परिभाषित है. पाकिस्तानी क्रिकेट में तीन-चौथाई साज़िश का क्रेडिट उन्हें ही जाता है.
टीम का नाम भी बढ़िया रखना. जैसे वजीरिस्तान वैरियर्स, करांची बाम्बर्स, लाहौर शूटर्स, स्वात चार्जर्स, और नोर्थ-वेस्ट गनरनर्स, रावलपिंडी बादशाह...
अब सरकार पैसा दे रही है तो टीम के मालिक भी सरकारी लोगों को ही बनाना. रहमान मलिक को रावलपिंडी बादशाह का मालिक बना देना और इमरान खान को उसी टीम का कैप्टेन. टीम का मालिक और कैप्टेन एक-दूसरे से भिड़ते आये हैं. यहाँ भी भिड़ लेंगे. इमरान खान अपने क्रिकेटीय अचीवमेंट का जो डोस्सियर रहमान मलिक को देंगे, रहमान मलिक उसे रिजेक्ट कर देंगे. यह कहते हुए कि डोस्सियर पूरा नहीं है.....
एक टीम शेरी रहमान को ज़रूर देना. उन्हें सरकार में लाने का यही तरीका है कि उन्हें किसी चीज की मालकिन बना दिया जाय.
कुल मिलाकर विकट प्रीमियर लीग बनेगी. जितनी टीमें होंगी और जितने खिलाडियों की खरीदारी होगी सब का दस परसेंट मिस्टर टेन परसेंट को घर पहुंचा देना.....
अब पूरा प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनावावोगे क्या?
जितना दिमाग भारत पर हमला करवाने के लिए लगाते हो, उसका आधा भी लगा दोगे तो बड़ी झक्कास प्रीमियर लीग बनेगी...
मेरी तरफ से आल द बेस्ट!!
Saturday, August 22, 2009
एक मुलाकात कृषि मंत्री के साथ
इस वर्ष मानसून की कमी हो गई है. अपना देश ही ऐसा है. यहाँ भ्रष्टाचार को छोड़कर आये दिन किसी न किसी चीज की कमी होती रहती है. इस कमी वाली वर्तमान संस्कृति में शायद कमी के लिए और कुछ नहीं बचा था इसीलिए इस बार मानसून की कमी हो गई. दाल की कमी, चीनी की कमी, प्याज-आलू की कमी को देश कितने दिन झेलेगा? कुछ नया भी तो कम होना चाहिए.
विद्वान बता रहे हैं कि बादलों की कमी नहीं है लेकिन बादलों में पानी की कमी ज़रूर है. आश्चर्य इस बात का है कि अभी तक सरकार ने यह नहीं कहा कि मानसून की कमी के पीछे विदेशी ताकतों का हाथ है. शायद सरकार अभी तक इतनी काबिल नहीं हुई कि मानसून की कमी के लिए विदेशी ताकतों को जिम्मेदार बता दे.
लेकिन यह सब मैं क्यों लिख रहा हूँ? इसी को कहते हैं घटिया ब्लॉग-लेखन.
अब देखिये न, मुझे प्रस्तुत करना है हमारे कृषि मंत्री का साक्षात्कार और मैं प्रस्तावना में न जाने क्या-क्या ठेले जा रहा हूँ. इसलिए प्रस्तावना को यहीं खत्म करता हूँ और हमारे कृषि मंत्री का साक्षात्कार प्रस्तुत करता हूँ.
आप यह मत पूछियेगा कि इस साक्षात्कार के ट्रांसक्रिप्ट मुझे कहाँ मिले? मैं नहीं बताऊँगा. मैंने (ब्लॉगर) पद और गोपनीयता की कसम खाई है.आप साक्षात्कार पढिये.
.......................................................
पत्रकार: नमस्कार मंत्री जी.
मंत्री जी: नमस्कार. बाहर आसमान साफ़ है. मौसम अच्छा है....अब यहाँ कोई अंपायर तो है नहीं कि वो हाथ नीचे करके इंटरव्यू शुरू करने का इशारा करेगा. जब मैं खुद ही जसवंत सिंह बन गया हूँ तो अंपायर का रोल भी खुद ही निभा देता हूँ.....वैसे भी क्रिकेट चलाने के लिए मैं ही अध्यक्ष बना रहता हूँ. मैं ही सेलेक्टर भी बन जाता हूँ. मैं ही...इसलिए यहाँ भी मैं ही अंपायर भी बन जाता हूँ... ये लीजिये. मैंने हाथ नीचे किये. अब आप पहला सवाल फेंक सकते हैं.
पत्रकार: जसवंत सिंह? ये वही जिन्हें पार्टी से...
मंत्री जी: सॉरी सॉरी. जसदेव सिंह की जगह मेरे मुंह से जसवंत सिंह निकल गया. कोई बात नहीं. आप सवाल फेंकिये.
पत्रकार: सबसे पहले मेरा सवाल यह है कि आप कृषि मंत्री भी हैं और इस देश की क्रिकेट भी चलाते हैं. क्या आप दोनों काम एक साथ कर पाते हैं?
मंत्री जी: जी हाँ. बिलकुल कर पाता हूँ.... वैसे भी क्रिकेट में पॉलिटिक्स है और पॉलिटिक्स में क्रिकेट..कृषि मंत्रालय में भी पॉलिटिक्स है...जब सब जगह पॉलिटिक्स ही है तो फिर और क्या चाहिए? डबल रोल करने से समय का बेहतर तरीके से मैनेजमेंट होता है...
पत्रकार: वह कैसे? अपनी बात पर प्रकाश डालेंगे?
मंत्री जी: अब देखिये. अगर मैं क्रिकेट देखने दक्षिण अफ्रीका जाऊंगा तो साथ-साथ वहां की कृषि के बारे में भी जानकारी हो जायेगी...... मान लीजिये मैं श्रीलंका में कोई टूर्नामेंट देखने गया. अब हो सकता है वहां यह देखने को मिले कि श्रीलंका वालों ने समुद्र के पानी से खेती करने के लिए कोई नया कैनाल प्रोजेक्ट कर लिया हो. ऐसे में श्रीलंका जाना तो हमारे मंत्रालय के लिए लाभकारी तो साबित होगा ही न?
पत्रकार: जी हाँ. आपकी बात से सहमत हुआ जा सकता है.
मंत्री जी: सहमत हुआ जा सकता है से क्या मतलब है आपका? आपको कहना चाहिए कि आप मेरी बात से सहमत हैं.
पत्रकार: ठीक है. वही समझ लीजिये.
मंत्री जी: हाँ, ये ठीक है. अब आगे का सवाल पूछिए.
पत्रकार: मेरा सवाल यह है कि आप कृषि और क्रिकेट, दोनों को चला सकते हैं इसके बारे में आपने प्रधानमंत्री को कैसे कन्विंस किया?
मंत्री जी: फोटो खिंचवा कर.... आप मेरा यह वाला फोटो देखिये. देख लिया? अब आप बताइए, पगड़ी पहनकर मैं मिट्टी से जुडा हुआ किसान लग रहा हूँ कि नहीं? ये वाला फोटो देख लिया?... अब आप मेरा ये वाला फोटो देखिये. इस फोटो को देखने से क्या आपको नहीं लगता कि मैं आई सी सी का भावी अध्यक्ष लग रहा हूँ?
पत्रकार: जी हाँ. मैं आप की बात से सहमत हूँ. बल्कि इस फोटो में आप आईसीसी के भावी नहीं बल्कि प्रभावी अध्यक्ष लग रहे हैं.
मंत्री जी: है न. कन्विंस करना कितना इजी है, आपको समझ में आ ही गया होगा.
पत्रकार: जी हाँ, समझ में आ गया.... अब मेरा सवाल यह है कि इस वर्ष पहले चरण में मानसून पूरे बासठ प्रतिशत कम रहा. मानसून की इस कमी से उत्पन्न होने वाली परिस्थितियों से निबटने के लिए आपके मंत्रालय ने क्या किया है?
मंत्री जी: देखिये, अभी तक तो कुछ नहीं किया. और कुछ नहीं करने के पीछे एक कारण है. हम कोई भी काम जल्दबाजी में नहीं करते. आपको ज्ञात हो कि जब से मैंने देश की क्रिकेट को चलाना शुरू किया है तब से अगर कोई बैट्समैन अपने पहले टेस्ट में असफल रहे तो हम उसे और मौका देते हैं. हम उसे तुंरत टीम से नहीं निकालते. इसी तरह से हम मानसून को और मौका दे रहे हैं.... अब हम दूसरे चरण के मानसून का परफॉर्मेंस देखेंगे. अगर वह दूसरे चरण में भी कम रहा फिर हम स्थिति से निबटने पर सोचेंगे. क्रिकेट चलाने की वजह से हमने बहुत कुछ नया सीखा है जिसे हम मंत्रालय में भी लागू कर रहे हैं.
पत्रकार: हाँ, वह तो दिखाई दे रहा है. अच्छा यह बताइए कि इतने वर्षों से आपकी पार्टी देश पर शासन कर रही है लेकिन किसानों के लिए आधारभूत योजनायें क्यों नहीं लागू की जा सकी?
मंत्री जी: देखिये, जहाँ तक मेरी पार्टी द्बारा देश पर शासन करने की बात है तो आपको मालूम होना चाहिए कि मेरी पार्टी तो एक रीजनल पार्टी है. मेरी पार्टी ने देश पर शासन नहीं किया है. आपको इतनी छोटी सी बात का पता नहीं है? किसने आपको पत्रकार बना दिया?
पत्रकार: नहीं...., वो तो मैं डिग्री लेकर पत्रकार बना हूँ. लेकिन एक बात तो सच है न कि आप पहले कांग्रेस पार्टी में थे तो यह कहा ही जा सकता है कि आपकी पार्टी ने वर्षों से देश पर शासन किया है.
मंत्री जी: अच्छा अच्छा. आप उस रस्ते से आ रहे हैं. तब ठीक है. आगे का सवाल पूछिए.
पत्रकार: सवाल तो मैंने पूछ ही लिया है. आधारभूत योजनायें...
मंत्री जी: यह कहना गलत है. वैसे भी जब लोन-माफी से काम चल जाए तो फिर आधारभूत योजनाओं की क्या ज़रुरत है? ....अभी हाल में ही हमारी सरकार ने किसानों द्बारा लिया गया सत्तर हज़ार करोड़ रूपये का क़र्ज़ माफ़ किया है....आपको पता है कि कर्ज माफी का यह आईडिया भी मुझे एक क्रिकेट मैच के दौरान मिला?
पत्रकार: कैसा आईडिया? आप प्रकाश डालेंगे?
मंत्री जी: वो हुआ ऐसा कि मैं नागपुर में एक क्रिकेट मैच देख रहा था. क्रिकेट मैच देखने के लिए स्टेडियम में पहुँचने से पहले मैंने विदर्भ के किसानों के एक प्रतिनिधिमंडल से मुलाक़ात की थी. मैच देखते हुए मैंने देखा कि बैट्समैन ने शाट मारा और उसे कवर का फील्डर नहीं रोक सका. संयोग देखिये कि सजी हुई फील्ड में एक्स्ट्रा-कवर था ही नहीं. नतीजा यह हुआ कि बाल बाउंड्री लाइन से बाहर चली गई. चौका हो गया....यह देखते हुए मुझे लगा कि अगर किसानों को एक एक्स्ट्रा-कवर दिया जाय...मेरा मतलब अगर लोन-माफी का एक्स्ट्रा-कवर उन्हें मिल जाए तो फिर...
पत्रकार: समझ गया-समझ गया. सचमुच आप क्रिकेट की वजह से बहुत कुछ सीख गए हैं...लेकिन कुछ आधारभूत योजनायें नहीं बनीं. डॉक्टर एम एस स्वामीनाथन का कहना है कि...
मंत्री जी: मैं भी समझ गया कि आप क्या कहना चाहते हैं. आप डॉक्टर स्वामीनाथन के हवाले से यही कहना चाहते हैं न कि उनके सुझाव पर सरकार ने ध्यान नहीं दिया?
पत्रकार: हाँ. मेरा मतलब यही है.
मंत्री जी: देखिये डॉक्टर स्वामीनाथन हरित क्रान्ति ले आये वह एक अलग बात है. लेकिन उनके सुझाव बहुत लॉन्ग टर्म प्लानिंग की बात लिए हुए हैं और यहाँ हमें चाहिए तुंरत समाधान वाले सुझाव. ऐसे में कर्ज-माफी से बेहतर और क्या हो सकता है? डॉक्टर स्वामीनाथन को यह समझने की ज़रुरत है कि अब ज़माना ट्वेंटी-ट्वेंटी क्रिकेट का है. टेस्ट मैच देखकर पब्लिक बोर हो जाती है. हमें तुंरत रिजल्ट चाहिए.
पत्रकार: लेकिन डॉक्टर स्वामीनाथन की बात में प्वाइंट तो है ही.
मंत्री जी: कोई प्वाइंट नहीं है. आप जिसे प्वाइंट कह रहे हैं, वे सारे सिली प्वाइंट हैं.
पत्रकार: आपके कहने का मतलब लॉन्ग टर्म योजनायें नहीं लागू की जा सकती? यहाँ भी वही क्रिकेट?
मंत्री जी: जी बिल्कुल. अब बिना क्रिकेट के इस देश में कुछ चलता है क्या? वैसे भी डॉक्टर स्वामीनाथन की उम्र हो गई है अब....आप खुद ही सोचिये न. सचिन तेंदुलकर इतने बड़े खिलाड़ी हैं लेकिन क्या वे पचपन साल की उम्र में भी क्रिकेट खेल सकते हैं?...मानते हैं न कि नहीं खेल सकते...बस वैसा ही कुछ डॉक्टर स्वामीनाथन के साथ भी है...अब कृषि-विज्ञान के क्षेत्र में हम यंग टैलेंट लाना चाहते हैं...आप जानते हैं कि यंग टैलेंट लाने का आईडिया मुझे ट्वेंटी-ट्वेंटी क्रिकेट की वजह से मिला?...मैं आपको बताता हूँ कि क्रिकेट की वजह से हमारे मंत्रालय में बहुत कुछ बदल दिया है मैंने.
वैसे, ये आप बार-बार लॉन्ग टर्म, लॉन्ग टर्म की रट क्यों लगा रहे हैं? लॉन्ग टर्म सुनने से मुझे लॉन्ग लेग, लॉन्ग ऑन, लॉन्ग ऑफ वगैरह की याद आती है.
पत्रकार: हाँ, वह तो है. वैसे एक सवाल का जवाब दीजिये. अगर मानसून दूसरे चरण में भी ढीला रहा तो आपका प्लान क्या रहेगा?
मंत्री जी: उसके लिए मैंने सेलेक्टर नियुक्त कर दिए हैं.
पत्रकार: सेलेक्टर नियुक्त कर दिया है आपने? क्या मतलब?
मंत्री जी: माफ़ कीजिये, आप पत्रकार तो हैं लेकिन आपका दिमाग नहीं चलता. केवल कलम चलाने से कोई पत्रकार नहीं हो जाता....सेलेक्टर नियुक्त करने से मेरा मतलब यह है कि मैंने अपने मंत्रालय के अफसरों को सेलेक्टर बना दिया है. वे देश के जिलों का सेलेक्शन करके एक लिस्ट देंगे. फिर मैं एक प्रेस कांफ्रेंस में उन जिलों को सूखा-ग्रस्त घोषित कर दूंगा...आपने बीसीसीआई के सचिव द्बारा टीम सेलेक्शन की सूचना वाला प्रेस कांफ्रेंस अटेंड किया है कभी?
पत्रकार: नहीं. मैं तो कृषि मामलों का पत्रकार हूँ. मैं केवल कृषि मामलों पर रिपोर्टिंग करता हूँ.
मंत्री जी: इसीलिए तो आपके अखबार का सर्कुलेशन ख़तम है...अपने एडिटर से कहें कि वे आपको क्रिकेट मामलों को कवर करने का भी मौका दें....आप देखेंगे कि आपकी एफिसिएंसी बढ़ जायेगी...जैसे मेरी बढ़ गई है...अखबार का सर्कुलेशन भी बढ़ जाएगा. क्रिकेट की वजह से एफिसिएंसी बढ़ जाती है.
पत्रकार: जी. मैं सम्पादक महोदय से आपके सुझाव के बारे में बात करूंगा. वैसे एक प्रश्न मेरा यह है कि अगर कम मानसून की वजह से देश में अनाज की कमी हुई तो क्या आप इसबार भी आस्ट्रेलिया से गेंहू का आयात करेंगे?
मंत्री जी: गेंहूँ का आयात करने के लिए देश में अनाज की कमी का होना ज़रूरी नहीं है.गेंहूँ का आयात तो हमने तब भी किया था जब अनाज की कमी नहीं थी...हाँ इस बात की गारंटी नहीं दे सकता कि इस बार भी आस्ट्रेलिया से ही गेंहूँ का आयात करूंगा.
पत्रकार: ऐसा क्यों? मेरा मतलब क्या ऐसा आप इसलिए करेंगे क्योंकि पिछली बार आस्ट्रलिया वालों ने सडा गेंहूँ भेज दिया था?
मंत्री जी: नहीं वो बात नहीं है....मैं ऐसा इसलिए करूंगा कि एक बार फोटो खिचाने के चक्कर में आस्ट्रलियाई खिलाड़ियों ने मुझे मंच पर धक्का दे दिया था...इसी बात को ध्यान में रखते हुए हमारे बीसीसीआई के पदाधिकारियों ने मुझे सजेस्ट किया कि आस्ट्रलिया से बदला लेने का यही तरीका है कि आप कृषि मंत्री के रोल में उनसे गेंहूँ मत मंगवाईये.
पत्रकार: वैसे आपको नहीं लगता कि गेंहू का आयात करके तबतक कोई फायदा नहीं होगा जब तक आप सार्वजनिक वितरण प्रणाली, मेरा मतलब पब्लिक डिस्ट्रीव्यूशन सिस्टम को ठीक नहीं करेंगे. वैसे क्या कारण है कि पब्लिक डिस्ट्रीव्यूशन सिस्टम ठीक से काम नहीं कर रहा?
मंत्री जी: असल में पब्लिक डिस्ट्रीव्यूशन सिस्टम थर्ड मैन के होने की वजह से काम नहीं कर रहा.
पत्रकार: लेकिन अगर सिस्टम में थर्ड मैन हैं तो उन्हें हटाने की जिम्मेदारी भी तो आपकी ही है.
मंत्री जी: अब देखा जाय तो थर्ड मैन भी तो ज़रूरी होते हैं. पब्लिक डिस्ट्रीव्यूशन से थर्ड मैन हटाने के बारे में मैंने बैठक की थी लेकिन सलाहकारों का विचार था कि थर्ड मैन का रहना दोनों के लिए ज़रूरी है. क्रिकेट में भी और पब्लिक डिस्ट्रीव्यूशन सिस्टम में भी. हमने सुझाव मानते हुए थर्ड मैन नहीं हटाये...देखा आपने? डबल रोल कितने काम की चीज है?
पत्रकार: जी हाँ. वो तो मैं देख रहा हूँ. अच्छा मेरा एक और सवाल यह है कि इस बार सरकार ने किसानों के लिए मिनिमम सपोर्ट प्राइस की घोषणा फसल होने से पहले ही कर दी. ऐसा पहले तो नहीं हुआ था. तो इसबार ऐसा करने का कारण क्या इलेक्शन था?
मंत्री जी: जी नहीं. मिनिमम सपोर्ट प्राइस पहले ही घोषणा करने का आईडिया मुझे क्रिकेट चलाने की वजह से ही मिला......आपके मन में सवाल ज़रूर उभर रहा होगा...उसका जवाब यह है कि क्रिकेट खिलाड़ियों को जब से कान्ट्रेक्ट सिस्टम के तहत पेमेंट होना शुरू हुआ है तब से फीस की घोषणा कान्ट्रेक्ट साइन करने से पहले ही हो जाती है...मिनिमम सपोर्ट प्राइस का आईडिया मुझे वहीँ से मिला...देखा आपने कि क्रिकेट...
पत्रकार: हाँ देखा मैंने कि क्रिकेट चलाने की वजह से आप एक अच्छे कृषि मंत्री बन पाए. वैसे मेरा एक आखिरी सवाल है. आये दिन क्रिकेट खिलाड़ी आपके कहने पर तमाम लोगों के सहायतार्थ मैच खेलते रहते हैं. ऐसे में आपने कभी किसानों की सहायता के लिए क्यों नहीं मैच आयोजित किये?
मंत्री जी: अरे वाह. आप एक कृषि पत्रकार होते हुए भी इतना दिमाग रखते हैं. हमने तो सोचा था कि....चलिए आपके सुझाव को मैं याद रखूँगा और आज ही अपने मंत्रालय के अफसरों की एक मीटिंग बुलाकर इस मसले पर विचार करूंगा.
पत्रकार: लेकिन इस बात पर विचार करने के लिए तो आपको बीसीसीआई की मीटिंग बुलानी चाहिए.
मंत्री जी: वही तो बात है न. मेरे लिए दोनों एक सामान हैं. मैं मंत्रालय वालों से क्रिकेट डिस्कस कर सकता हूँ और क्रिकेट वालों से कृषि...आप नहीं समझेंगे...आप समझते तो क्रिकेट के पत्रकार नहीं बन जाते...खैर, अब मेरे पास और सवाल के लिए वक्त नहीं है...मुझे क्रिकेट असोसिएशन की मीटिंग में जाना है...
Thursday, April 30, 2009
ऐसे में यह बालर तो सस्ता साबित हुआ.......
क्रिकेट है तो देश है. देश है तो नेता है. नेता हैं तो उद्योगपति है. उद्योगपति है तो नेतागीरी है. नेतागीरी है तो चमचागीरी है. चमचागीरी है तो नेता हैं. और नेता हैं तो क्रिकेट है.
लीजिये वृत्त पूरा हुआ और हम वहीँ पहुँच गए, जहाँ से चले थे.
फालतू में भूगोल-विदों ने पृथ्वी को गोल साबित करने के लिए तरह-तरह के प्रयोग किये. मैं तो कहता हूँ क्रिकेट से शुरू करते नेता, चमचा वगैरह से होते आगे चले जाते तो क्रिकेट पर पहुँच जाते. साबित कर देते कि पृथ्वी गोल है.
लेकिन शायद उनदिनों क्रिकेट ऐसा नहीं था.
अब ऐसा हो गया है.
वैसे यह बात तो बहुत दिनों पहले की है. दस साल पहले की बात ही ले लीजिये. उनदिनों क्रिकेट में पैसा होता था. अब स्थिति बदल गई है. अब पैसे में क्रिकेट है. अब सच बात तो यह है कि कवि ने; "सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी है" नामक महान 'काव्य एक लाइना' पहले न लिखा होता तो हम ताल ठोंक कर कह देते कि उन्होंने आज के क्रिकेट को देखकर ही प्रेरणा ली कि वे ऐसी लाइन गढ़ सकें.
पैसे में क्रिकेट समा गया है. बहुत मज़ा आ रहा है. आज ही अखबार में पढ़ रहा था कि इंग्लैंड के खिलाड़ी श्री एंड्र्यू फ्लिंटाफ ने आई पी एल में खेलते हुए तीन विकेट लिए. लिए क्या कमेंटेटर की भाषा में कहें तो झटक लिए. झटक के चल दिए.
इस साल के आई पी एल में अब और नहीं खेलेंगे. तीन विकेट लेकर ही घायल हो गए. जब चले गए तब हिसाब लगाया गया. पता चला उन्होंने जो तीन विकेट लिए उसपर विजय माल्या जी का करीब ढाई करोड़ रुपया खर्च हो गया. तिरासी लाख रुपया प्रति विकेट.
सुनकर लगा जैसे इस फीस में से अगर बैट्समैन को कुछ किकबैक देने के लिए तैयार हो जाते तो बैट्समैन बेचारा बिना खेले ही अपना विकेट दे देता. न रन-अप पर दौड़ने का झमेला रहता न ही ताकत लगाकर गेंद फेंकनी पड़ती.
अब आप यह तो नहिये पूछिए कि माल्या जी कौन ठहरे? आपने अगर यह पूछ लिया तो याद रखिये ममता दी को कहकर आपके घर के सामने धरना करवा दूंगा.
खैर, वापस आते हैं माल्या जी पर. माल्या जी कुछ महीने पहले ही अड़ गए थे. नरेश गोयल जी के साथ मिलकर सरकार से लड़ गए थे. बोले; "हमारे पास पैसे नहीं हैं. अगर सरकार ने हमें बिना ब्याज वाला लोन नहीं दिया तो हम अपनी एयरलाइन्स बंद कर देंगे."
सरकारी सहारे पर या फिर मंदी पर कोई विज्ञापन तो बनता नहीं. बनता होता तो कोई लिख डालता कि;
ये बेचारा मंदी का मारा
इसे चाहिए सरकारी सहारा
अब हमदर्द का सिंकारा नहीं होता. अब हमदर्द का सहारा होता है. माल्या जी को दर्द हुआ. ऐसे में उनके हमदर्द निकले हमारे नागरिक उड्डयन मंत्री. दर्द से पीड़ित इन मंत्री जी ने माल्या जी के लिए खुलकर बैटिंग की. प्रेस कांफ्रेंस में चौकों-छक्कों की झड़ी लगा दी.
तमाम लोगों ने ताली बजाई. बोले; "क्या खेलते हैं. वाह!"
जिनके पास पैसा नहीं होता वे तीन विकेट के लिए केवल ढाई करोड़ देते हैं. पैसा रहता तो न जाने क्या दे देते. शायद पचास करोड़ दे देते. बैटिंग करके बनाये गए रनों का हिसाब अलग से होता. उसके पैसे श्री एंड्र्यू फ्लिंटाफ को अलग से मिलते.
क्रिकेट को चलनेवाले नहीं बदलते तो कोई बात नहीं, क्रिकेट तो बदल ही गया है. टेस्ट मैच होता था. वन डे होने लगा. उससे भी बोर हो लिए तो ट्वेंटी-ट्वेंटी खेलवा डाला. इससे बोर होंगे तो क्या करेंगे? वो अगले तीन-चार साल में पता चल जाएगा.
विद्वान टाइप लोग बता रहे हैं कि मंदी की मारी अर्थव्यवस्था में पैसे की कमी हो गई है. उधर विद्वान बता रहे हैं कि पैसे की कमी है और इधर अज्ञानी टाइप लोग पूछ रहे हैं कहाँ है कमी? क्रिकेट खिलाड़ियों को इतना पैसा मिल रहा है.
अरे अज्ञानियों, यह समझो कि पैसे की कमी है तब इतना पैसा मिल रहा है. नहीं तो एक-एक खिलाड़ी को एक विकेट लेने के लिए कम से कम चालीस करोड़ मिलते.
शाहरुख़ खान परेशान हैं. उन्होंने भी एक-एक विकेट के लिए कितना पैसा खर्चा किया है. पैसा खर्चा हो गया लेकिन टीम नहीं जीत पा रही है. दो मैच तक तो बोले कि; "हम स्पोर्ट्समैन स्पिरिट वाले लोग हैं." तीसरे मैच तक स्पिरिट में कमी हो गई. चौथे तक स्पोर्ट्स जाता रहा. टीम हारती रही.
अब तो खान साहब दक्षिण अफ्रीका से भारत चले आये हैं. आते-आते बोले; "अब तो तभी आऊंगा जब टीम जीतेगी."
हाय रे. इतने अमीर आदमी की टीम नहीं जीत पा रही. इतना पैसा खर्चा किया इन्होने. इसके बावजूद टीम नहीं जीत पा रही.
मेरे एक मित्र एक मैच के दूसरे दिन बोले; "कल देखा युवराज सिंह ने दो रन पर आउट होकर क्या किया?"
मैंने कहा; "नहीं तो. क्या किया उन्होंने?"
वे बोले; "आउट होते ही अपनी टीम के मालकिन का चेहरा देखने लगा. शायद देखने की कोशिश कर रहा था कि मालकिन कितनी नाराज़ है."
सही बात है. इस क्रिकेट में कोच का चेहरा ज्यादा मायने नहीं रखता. मालिक-मालकिन का चेहरा मायने रखता है. फोटोजेनिक चेहरा है न. हमेशा फोटोजेनिक चेहरे ही मायने रखते हैं.
अजीब क्रिकेट है यह ट्वेंटी-ट्वेंटी. तमाम नए तरीके इस्तेमाल होते हैं. अलग तरह का विश्लेषण होता है. स्ट्रेटजी ब्रेक होता है. मैदान में खेल रहे खिलाड़ी से कमेंटेटर भाई लोग डायरेक्ट बात कर लेते हैं. "कैसा फील कर रहे हो?"
उधर से आवाज़ आती है; "हवा चल रही है. हम ऐसा खेल रहे हैं. फील्डिंग साइड वैसा खेल रही है."
अरे प्रभु. आप कैसा खेल रहे हैं वो तो हम देख ही रहे हैं. मुंह से नहीं बताएँगे तो हमें पता नहीं चलेगा क्या?
आने वाले दिनों में नए-नए तरीके और जुडेंगे. जन टूर्नामेंट पूरा हो जाएगा तो हर खिलाड़ी की बैलेंसशीट बनेगी. देखेंगे इस बात पर बहस हो रही है कि फलाने बालर ने पॉँच विकेट तो लिए लेकिन इस पांच विकेट को अगर उनके फीस से डिवाइड करें तो देखेंगे कि प्रति विकेट एक करोड़ का खर्च आया.
कोई विद्वान यह बात भी बीच में ला पटकेगा कि इन पांच विकेट में से दो विकेट ऐसे थे जिन बैट्समैन को फीस के तौर पर दो-दो करोड़ मिले थे. बाकी के तीन को अस्सी-अस्सी लाख मिले थे. मतलब यह कि इन्होने जिन पांच बैट्समैन को आउट किया उनकी टोटल फीस चार करोड़ चालीस लाख थी.
ऐसे में यह बालर तो सस्ता साबित हुआ.......
Thursday, April 16, 2009
हम पुरस्कार से हैं कि पुरस्कार हमसे है?
सरकार ने धोनी को सूचित किया. बोली; "तुम तो पद्मश्री हो."
धोनी बोले; "हमें मालूम है. तुम हमें क्या बताओगी?"
सरकार बोली; "सॉरी. हमें लगा कि आपको बता दें."
धोनी जी बोले; "हमें हनुमान समझने की भूल न करो. हम क्या-क्या हैं, हमें मालूम है."
सरकार बोली; "तो अपना पुरस्कार लेने आ जाओ."
धोनी जी बोले; "तुम हमें सम्मान के लायक समझ रही हो. लेकिन हम बदले की भावना से काम करने वालों में से नहीं हैं. हम तुम्हें सम्मान के लायक नहीं समझते."
सरकार बोली; "यह कोई नई बात नहीं है. हमें वैसे भी सम्मान के लायक तो कोई नहीं समझता. हमारा सम्मान मत कीजिये लेकिन पुरस्कार का तो सम्मान कीजिये."
धोनी जी बोले; "ऐसे पुरस्कारों को हम सम्मान नहीं बल्कि सामान समझते हैं. वैसे भी ये पद्मश्री आई पी एल से बड़ा है क्या?"
सरकार बोली; "अरे, बड़ा तो है ही."
धोनी बोले; "काहे का बड़ा है? पुरस्कार देश में दिया जायेगा और आई पी एल विदेश में होगा. ऐसे में कौन बड़ा?"
सरकार बोली; "अरे पद्मश्री सबको नहीं मिलता."
धोनी बोले; "क्यों? सचिन को तो मिला हुआ है."
सरकार बोली; " इसीलिए तो सचिन ने आकर बाकायदा राष्ट्रपति से अपना पुरस्कार लिया था."
धोनी बोले; "सचिन को आई पी एल में हमसे कम पैसे भी तो मिले थे. ऐसे में वे पुरस्कार तो लेंगे ही."
सरकार बोली; "सचिन भी तो महान खिलाड़ी है. अगर वे पुरस्कार लेने आये तो आप क्यों नहीं?"
धोनी बोले; "काहे के महान? आज मेरे पास ज्यादा विज्ञापन हैं कि सचिन के पास?"
सरकार बोली; "पता नहीं."
धोनी बोले; "जब पता नहीं तो बहस काहे करती हो? ट्रेड रेकॉर्ड्स देखो. उसके बाद बात करो."
सरकार बोली; "ये पुरस्कार...."
धोनी बोले; "अरे क्या पुरस्कार पुरस्कार की रट लगाये जा रही हो? हम पुरस्कार से हैं कि पुरस्कार हमसे है?"
धोनी जी इतना कहकर दक्षिण अफ्रीका चले गए.
पुरस्कार धोनी जी का पंथ देखते-देखते सोच रहा है; "फालतू में गले पड़ने गए? न जाने कितने लेखक, कलाकार, अपना काम ईमानदारी से करते-करते इस दुनियाँ से चले गए. मेरी तरफ ताकते रहते थे. इस अभिलाषा के साथ कि मैं उन्हें मिल जाता तो उनका जीवन सफल हो जाता....... "
Friday, November 14, 2008
तुम्हें याद है तो कि तुम रिटायरमेंट का एलान कर चुके हो?
सौरव गांगुली रिटायर हो गए. नेता और क्रिकेटर में बड़ा फरक है जी. क्रिकेटर बेचारा पैंतीस साल का हुआ नहीं कि लोग पूछना शुरू कर देते हैं; "कब रिटायर जो रहे हो?"
नेता होते तो भाषण देते समय मन की बात कहकर हलके हो लेते कि; "न तो टायर और न ही रिटायर." नेताओं के सामने तो पत्रकार भी सवाल नहीं उठाते. ऊपर से अनुभव से लबालब होने के बहाने अनुरोध तक लिख डालते हैं कि; "अभी तो आपके दिन शुरू हुए हैं. आप बने रहिये."
वैसे कम ही खिलाड़ियों को रिटायर होने का मौका मिलता है. सौरव बड़े खिलाड़ी थे तो रिटायर हुए. छोटे होते तो रिटायर होने का चांस नहीं मिलता. टीम से निकाल दिए जाते. अब बड़ा खिलाड़ी रिटायर होगा तो तमाम तरह के राग बजने शुरू हो ही जायेंगे.
टीवी वालों की बात मानें तो सौरव के रिटायर होने से देश भर में दुःख व्याप्त है. क्रिकेट प्रेमी इसलिए दुखी हैं कि एक अच्छा खिलाड़ी रिटायर हो गया. टीवी न्यूज़ चैनल वाले तो दुखी होने की होड़ में सबसे आगे हैं. कुछ भावुक हैं. कुछ इसलिए दुखी हैं कि न्यूज मेकर की उनकी लिस्ट से एक न्यूज मेकर निकल गया.
टीवी चैनल वाले बता रहे थे कि सौरव ने भारतीय क्रिकेट को ढेर सारे यादगार लम्हें दिए हैं. ये बताते हुए उन्होंने सौरव द्बारा शर्ट उतार कर हवा में घुमाकर गाली देने का सीन दिखाया. हमें इन यादगार लम्हों की याद आ गई.
आशा है, आने वाले दिनों में गुलज़ार साहब सौरव द्बारा दिए गए यादगार लम्हों पर एक नज़्म जरूर लिखेंगे. यादगार लम्हों को नज़्म में ढालने का काम उनसे अच्छा कोई नहीं कर सकता.
सौरव ने प्रेस कान्फरेन्स में पहले ही बता दिया था कि वे रिटायर हो रहे हैं. ये उन्होंने अच्छा किया. पत्रकार पूछें, इससे पहले ही बता दो. जब उन्होंने ये बात कही तो लोगों ने कहना शुरू किया कि रिटायर होने के उनकी घोषणा से सीनियर खिलाड़ियों पर दबाव पड़ेगा. इस सीरीज में वे अच्छा नहीं खेल सके तो उन्हें भी रिटायर होना पड़ेगा. लेकिन ऐसी नौबत नहीं आई. ज्यादातर सीनियर खिलाड़ियों ने अच्छा खेला.
नतीजा ये हुआ कि लोगों को अब उस मैच का इंतजार करना पड़ेगा जिसमें सचिन सेंचुरी नहीं बना सकेंगे. वैसा ही कुछ 'लक्ष्मन' जी के साथ है.
आते हैं सौरव के रिटायरमेंट पर. अपने प्लान के बारे में बताने के बाद जब उन्होंने अगले ही मैच में शतक बना डाला तो लोगों ने कहना शुरू किया; "सौरव को रिटायर नहीं होना चाहिए था. अभी भी दो साल खेल सकते थे."
कलकत्ते के कुछ खेल संवाददाता सौरव के बारे में ही लिखते-पढ़ते हैं. दिन-रात उन्हें ही ओढ़ते-बिछाते हैं. एक-दो तो ऐसे हैं जिन्हें सौरव के बारे में उतना मालूम है, जितना ख़ुद सौरव को मालूम नहीं होगा. ऐसे ही एक संवाददाता ने बताया; "सौरव से बात करने के बाद मुझे लगा जैसे वे चाहते हैं कि कोई उनसे कहे तो वे रिटायरमेंट कैंसल कर देंगे."
इनकी बात सुनकर बड़ा अजीब लगा. अपने मन से रिटायर होंगे और दूसरों के मन से वापस आयेंगे? ये कैसी बात. लेकिन इस घोषणा के बाद उनके साथ जो कुछ भी किया गया उससे लगा कि सौरव के मन की बात शायद टीम वालों ने समझ ली होगी. यही कारण था कि मैदान पर जब-तब सौरव को कन्धों पर उठा रहे थे. सुबह का खेल शुरू होने पहले लाइन लगाकर खड़े हो गए. सौरव जब मैदान पर आए तो उनसे टीम को लीड करने के लिए कहा. चाय पीने का ब्रेक हुआ तो उन्हें घेरकर ताली बजाने लगे.
देखकर लगा जैसे कह रहे हों; "हम ऐसा इसलिए कर रहे हैं जिससे तुम्हें याद रहे कि तुम रिटायरमेंट की घोषणा कर चुके हो."
और तो और अन्तिम मैच के अन्तिम ओवेरों तक भाई लोगों को विश्वास नहीं था. शायद इसीलिए अन्तिम पॉँच ओवर के लिए धोनी ने कप्तान बना दिया. वही, जैसे बता रहे हों;"आप रिटायर होने का एलान कर चुके हैं."
सीनियर खिलाड़ी को कंधे पर उठाने का काम जूनियर खिलाड़ी करते हैं. लेकिन अन्तिम मैच ख़त्म होने के बाद तो हद ही हो गयी. लक्ष्मण ने सौरव को कंधे पर उठा लिया. लगा जैसे कह रहे हों; "अभी तो हम जूनियर हैं. सौरव को कंधे पर उठाकर हम बता देन अचाहते हैं कि हम अभी और खेलेंगे."
शायद उन्हें डर था कि अगले मैच में जूनियर खिलाड़ी उन्हीं को कंधे पर न उठा लें.
खैर, अब तो लक्ष्मण ऐसा करके जूनियर खिलाड़ी बन गए हैं. आशा है कम से कम एक साल तक जूनियर बने रहेंगे. सौरव भी क्रिकेट खेलकर घर पहुँच गए हैं. सुना कि पूरा कोलकाता ही उन्हें रिसीव करने एअरपोर्ट पहुँच गया था. वैसे तो एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि वे बिजनेस में ध्यान लगायेंगे. कमेंट्री वगैरह भी कर सकते हैं.
लेकिन हमें तो इंतजार है उनके नेता बनने का. एक बार बन गए तो उन्हें रिटायरमेंट की घोषणा के बारे में सोचना भी नहीं पड़ेगा.
Friday, February 22, 2008
अच्छा ई बताईये, सेल टैक्स और भैट-वैट मिलाकर धोनी का फाईनल दाम का रहा
कल रतीराम की पान दुकान पर गया था. मैंने जाते ही कहा; "एक पान दीजिये." मैंने उनसे पान लगाने को कहा लेकिन देख रहा हूँ कि वे अखबार पढने में व्यस्त हैं. पूरी तन्मयता के साथ लीन. मैंने फिर से कहा; "रतीराम भइया, एक ठो पान दीजिये."
मेरी तरफ़ देखे बिना ही बोले; "तनी रुकिए, लगा रहे हैं." ये कहकर अखबार पढ़ने में फिर से लग गए.
मैंने कहा; "अरे ऐसा क्या छप गया है जो पढ़ने में इतना व्यस्त हैं."
बोले; "अरे ओही, खिलाड़ी सब केतने-केतने में बिका, वोही देख रहे हैं." तब मेरी समझ में आया कि क्या पढ़ रहे हैं.
मैंने कहा; "अब पढ़ने से क्या मिलेगा. टीम तो आप खरीद नहीं सके."
बोले; "हाँ लेकिन हम देखना चाहता हूँ कि ई लोग का केतना दाम लगा."
मैंने कहा; "बहुत पैसा मिला है सबको. देखिये न धोनी ही छ करोड़ में बिके. तेंदुलकर चार करोड़ में. ऐसा पहली बार हुआ कि खिलाड़ी भी बिक गए."
मेरी बात सुनकर मुस्कुरा दिए. बोले; "अरे आप भी बड़े भोले हैं. ई लोग का पहला बार बिक रहा है. का पहले नहीं बिका है. काहे, भूल गए अजहरुद्दीन को, जडेजा को."
उनकी बात सुनकर मैं चुप हो गया. क्या करता, कोई जवाब भी तो नहीं था. फिर सोचते हुए मैंने कहा; "बहुत ख़बर रखते हैं क्रिकेट की."
अब तक वे अखबार छोड़ चुके थे. उन्होंने मेरी तरफ़ देखते हुए कहा; "अरे ई जो लोग टीम खरीदा है न, उनसे तो ज्यादा ही जानकारी रखते हैं. आपको का लगता है, मुकेश अम्बानी अपना काम करते-करते क्रिकेट देखते होंगे का? ऊ दारू वाले, का नाम है उनका, हाँ माल्या जी, ऊ देखते होंगे का. हम तो काम करते-करते कमेंट्री सुनते हैं. पूरा-पूरा जानकारी रखते हैं क्रिकेट का."
मैंने कहा; "ये बात तो है. ऐसे में एक टीम आपको जरूर मिलनी चाहिए थी."
बोले; "जाने दीजिये, अब का मिलेगा उसपर बात कर के. ओईसे एक बात बताईये, छ करोड़ में तो धोनी बिक गए लेकिन सेल टैक्स, भैट-वैट मिलकर केतना दाम पडा होगा, इनका?"
उनकी बात सुनकर मुझे हंसी आ गई. मैंने कहा; "अरे महाराज आप भी गजबे बात करते हैं. ये लोग आदमी हैं, कोई सामान नहीं कि इनके ऊपर भी सेल्स टैक्स लगे."
मेरी बात से कन्विंस नहीं हुए. बोले; "आदमी हैं तो फिर आलू-गोभी का माफिक काहे बिक रहा है ई सब?"
मैंने कहा; "आलू-गोभी की माफिक नहीं बोलिए हीरा-जवाहरात की तरह. बोली लगाकर खरीदे गए हैं."
मेरी बात सुनकर मुस्कुरा दिए. बोले; "बोली लगाकर बिके हैं, इतना त हमहू जानते हैं. सुनने से कैसा लगता है न. ऊ जो फिलिम में देखाता है कि कौनो सेठ का सबकुछ बरबाद हो गया और ऊ कर्जा में डूब जाता है तब उसका घर-दुआर जैसे हथौड़ा मार के बिकता है. ओईसे ही तो?"
मैंने कहा; "एक दम ठीक पहचाने. वैसे ही बिके हैं सब."
बोले; "एक बात बाकी गजबे होई गवा."
मैंने पूछा; "क्या?"
बोले; "विदेशी तेल, साबुन, शेम्पू वगैरह तो ठीक लगता है. ऊ का वास्ते हमरे देश का लोग सब बहुत पैसा पेमेंट कर देता है लेकिन विदेशी खेलाड़ी सब तो बहुत सस्ता में खरीद लिया सब. खिलाडी लोगों का वास्ते ज्यादा पईसा नहीं दिया कोई भी. सुने कि पार्थिव पटेल भी पोंटिंग से जादा दाम में बिक गए."
मैंने कहा; "ऐसा होता है. किस खिलाड़ी का कितना महत्व है, वो तो टीम वाले ही बता सकते हैं. वो लोग जिन्होंने टीम खरीदे है."
मेरी बात सुनकर उन्होंने मेरी तरफ़ कुछ ऐसे देखा जैसे मुझे बेवकूफ साबित करने पर तुले हैं. फिर बोले; "हम पाहिले ही बोले रहे न, आप बहुते भोले हैं. अरे ई सब चाल है टीम का मालिक लोगों का. नहीं तो आप ही कहिये, पार्थिव पटेल का इतना दाम. लगा जईसे बँगला पान खरीद रहा है लोग ऊ भी बनारसी पान का दाम देकर."
उनकी बात सुनकर मुझे लगा एक पान खाने आए थे और इतनी देर लग गई. बात खिलाड़ियों की बिक्री से होते हुए कहाँ-कहाँ से आखिर पान तक आ रुकी. मुझे लगा रतीराम जी से बात करते रहेंगे तो पता नहीं और कहाँ-कहाँ से होकर गुजरना पड़े. उनकी पार्थिव पटेल और बँगला पान वाली बात पर मैंने झट से कहाँ; "एक दम ठीक बोले हैं. इसी बात पर एक ठो बनारसी पान लगा दीजिये."
सुनकर हंस दिए. बोले; "ये लीजिये, अभिये लगा देते हैं."
चलते-चलते
सुनने में आया है कि अर्थशास्त्रियों के एक दल ने भारत सरकार के वित्त मंत्रालय और भारतीय रिज़र्व बैंक को एक ज्ञापन दिया है. इस ज्ञापन में इन्फ्लेशन के लिए बनाए गए होलसेल प्राईस इंडेक्स में बाकी चीजों के साथ-साथ क्रिकेट खिलाड़ियों को भी शामिल करने का आग्रह किया गया है. जब कुछ जानकारों ने क्रिकेट खिलाड़ियों के शामिल करने का विरोध यह कहकर किया कि; आख़िर आम जनता तो क्रिकेट खिलाड़ी खरीदती नहीं. ऐसे में उन्हें होलसेल प्राईस इंडेक्स में शामिल करने का औचित्य क्या है तो अर्थशास्त्रियों का जवाब था; "जिन लोगों ने टीम और खिलाडी खरीदे हैं, उन्हें इन्कम तो आम जनता की जेब से ही आनी है. ऐसे में पूरा भार जनता के ऊपर ही तो पड़ेगा."
आप का इस ज्ञापन के बारे में क्या विचार है?
Friday, January 25, 2008
बॉलर ने रतीराम का पान खाया और बैट्समैन बोल्ड हो गया
रतीराम चौरसिया, अरे वही चौरसिया पानवाले, कल बीसीसीआई दफ्तर के बाहर दिखाई दे गए. कभी इधर जाते, कभी उधर. जो सामने मिल जाता, उसी को पकड़ लेते. कुछ बात करते और फिर चेहरा लटक जाता. मुझसे टकरा गए. मैंने पूछा; "आप और यहाँ? कैसे आना हुआ?"
बोले; "टीम खरीदने आए रहे. पर ई लोग कह रहा है सब बिक गवा."
मैंने कहा; "आप भी टीम खरीद रहे हैं. लेकिन अब तक तो सारी टीमें बिक गईं. अब तो कुछ नहीं बचा."
बोले; "हाँ. एही बात का तो रोना है. हमरे आने से पहिले ही ई लोग सब बेंच-बांच कर खतम कर दिया."
मैंने कहा; "अब तो कुछ कर भी नहीं सकते. लेकिन आप क्रिकेट के धंधे में कब से कूद गए? पान का धंधा छोड़ दिए क्या?"
बोले; "अरे भइया पान का धंधा बढ़िया चल रहा है एही वास्ते क्रिकेट के धंधे में आए हैं. सभी खरीद रहा था. हम सोचे, हम भी खरीद लें. अरे जब एअरलाइन वाला से लेकर कपड़ा वाला और दारू वाला से लेकर फिलिम वाला खरीद रहा है, तो हम भी तो टिराई मार ही सकते हैं. पान बेंचते हैं तो का हुआ, करते तो धंधा ही हैं."
मैंने सोचा ठीक ही तो कह रहे हैं. सब अपना-अपना बिजनेस छोड़कर क्रिकेट के बिजनेस में जा रहे हैं तो रतीराम जी ने कौन सा पाप किया है. वे भी जा सकते हैं. मैंने कहा;" लेकिन जिन लोगों ने टीम खरीदी हैं, कह रहे थे कि उनकी वजह से क्रिकेट का भला होगा. आप भी भला करेंगे क्या इस क्रिकेट का?"
रतीराम ने मुस्कुराते हुए कहा; "कौन भला करेगा क्रिकेट का? ई लोग जो टीम खरीदा है? इन लोगों को क्रिकेट का बारे में का पता है? जो जो लोग खरीदा है, उसमें कौन क्रिकेट खिलाड़ी था, बोलिए तो."
मैंने सोचा सही ही तो कह रहे हैं. लेकिन मन में ये बात भी आई कि जिन लोगों ने टीमें खरीदी हैं, वे लोग तो यही कह रहे थे कि क्रिकेट का भला करेंगे. यही सोचते हुए मैंने रतीराम से पूछा; "तो आपको क्या लगता है. जिन लोगों ने टीमें खरीदी हैं, उनका अपना कोई स्वार्थ है?"
बोले; "और नहीं तो का. आपको का लगता है, हमें कोई टीम मिल जाती तो का हम क्रिकेट का भला करते?"
मैंने पूछा; "तो आप क्या करते?"
बोले; "प्रचार करवाते. जो ई लोग भी करवाएगा. अन्तर एही है कि ई लोग दारू, फिलिम, कपड़ा और गैस का प्रचार करवाता, हम पान का करवाते."
उनकी बात सुनकर हंसी आ गई. मैंने कहा;" क्या बात कर रहे हैं. पान का प्रचार करवाते. ये भला क्यों?
आपको नहीं लगता कि क्रिकेट के खेल में पान का प्रचार कुछ भद्दा मजाक नहीं लगेगा?"
रतीराम जी ने मेरी बात सुनकर मेरे ऊपर ऐसी दृष्टि डाली जैसे दुनियाँ में मुझसे बड़ा 'खतम' आदमी और कोई नहीं. मुझे देखते हुए बोले; "आप रेडियो नहीं न सुनते हैं. आ सुनते तो अईसा नहीं कहते."
मैंने कहा; "आप ठीक कह रहे हैं. मैं रेडियो नहीं सुनता. वैसे इस रेडियो में ऐसा क्या है?"
बोले; "रेडियो में क्रिकेट का कमेंटरी आता है. जब भी चौका लगता है, रेडियो से आवाज आता है 'और ये बीएसएनएल चौका'. सुनकर बड़ा हंसी आता है. एक बार सुनकर लगता है जैसे ई बीएसएनएल ने ही ई चौका लगवाया है. ई कंपनी नहीं होती त चौका नहीं लगता."
मैंने सोचा अगर ऐसा है तो ठीक ही तो कह रहे हैं. यही सोचते हुए मैंने उनसे पूछा; "अगर आपको टीम मिल जाती तो क्या आप अपनी पान दुकान का प्रचार करवाते खिलाडियों से?"
बोले; "काहे नहीं. जरूर करवाते. जब पैसा लगाकर टीम खरीदेंगे तो प्रचार भी करवाएंगे. और ओइसे भी जो लोग टीम सब को लिया है, वो भी तो एही कराएगा सब. काल को देखियेगा, ई खिलाड़ी सब दारू से लेकर कपड़ा तक बेंचते हुए दिखेगा. फिलिम का प्रचार करेगा, सो अलग."
मैंने पूछा; "लेकिन अब तो आपको टीम मिलेगी नहीं. सब तो बड़ा-बड़ा लोग खरीद लिया. कलकत्ते से लेकर मुम्बई और बंगलूरु तक की टीमें बिक चुकी हैं."
बोले; "असल में सुने रहे कि आजकल छोटा-छोटा शहर और कस्बा से खिलाड़ी आ रहा है सब. मुम्बई और दिल्ली वगैरह से कम खिलाड़ी आता है. एही वास्ते हम बीसीसीआई को सुझाव दिए हैं कि पटना, इलाहाबाद, कानपुर, रायबरेली अ चाहे भटिंडा का भी टीम बनाये जिससे हम जैसे छोटे धंधेबाजों को क्रिकेट का धंधा करने का मौका मिले."
इतना कह कर वे बीसीसीआई के एक पदाधिकारी की पीछे-पीछे चले गए.
उनकी बात सुनकर हम आनेवाले समय में ऐसे विज्ञापन के लिए तैयार हो चुके हैं जिसमें दिखाया जायेगा कि बॉलर को विकेट नहीं मिल रहा है. हारकर वह रतीराम की दुकान का बनारसी पान खाकर बोलिंग करता है और सामने वाले बैट्समैन को बोल्ड कर देता है.
Tuesday, November 20, 2007
ब्लॉग समाज के सदस्यों से अपील- सचिन को रास्ता दिखाये
सचिन फिर से शतक नहीं बना सके. कितने महीने बीत गए, एक शतक के लिए देश भर को तड़पा रहे हैं. देश के आधे लोगों की तड़प देखकर बाकी आधे तड़प रहे हैं. टीवी वाले सबसे ज्यादा दुखी दिख रहे हैं. धंधा ठीक ही चल रहा है लेकिन देश के लोगों के दुःख में शरीक हैं, ये भी दिखाना है, सो कैमरे पर आंखें दुखी हैं और माइक पर आवाज.
कोशिश के नाम पर केवल टीवी वालों ने ही मुंह पीट कर लाल कर लिया. एक चैनल पर देखा. ज्योतिषियों की भीड़ लगी थी. एक ने बताया; "देखिये, उनका चंद्र ठीक से ड्यूटी नहीं कर रहा है. उन्हें अपने चन्द्र के बारे में कुछ करना पडेगा."
टीवी चैनल के एंकर ने पूछा; "क्या लगता है आपको? सचिन को क्या करना चाहिए कि उनका चन्द्र ठीक से ड्यूटी पर आ जाए."
ज्योतिषी ने जवाब दिया; "उन्हें चांदी के गिलास में पानी पीना चाहिए. रात को चन्द्रमा को निहारना चाहिए. बैटिंग करने से पहले अगर वे चांदी का बुरादा पिच पर छिड़कें तो शतक बन जायेगा."
मैंने सोचा ऐसा सचिन कर सकते हैं. लेकिन कहीं ऐसा न हो कि क्रिकेट की 'गवर्निंग बाडी' आई सी सी उन्हें पिच की कंडीशन बदलने को लेकर सजा न सुना दें. अगर शतक बन भी जाए तो आई सी सी उस शतक को रेकॉर्ड बुक में जाने से ही रोक दे. मैच फीस की कटौती ऊपर से. सचिन भी सोचेंगे कि चांदी का बुरादा खरीदने में पैसे खर्च हो गए, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला.
एक और ज्योतिषी को देखा. बोले असल में समस्या चन्द्र की नहीं है. ये सारा कुछ मंगल का किया धरा है. सचिन का मंगल उनके लिए अमंगल पैदा कर रहा है. बोल रहे थे कि नौ की संख्या का रिमोट मंगल के हाथ में रहता है इसलिए शतक बन नहीं पा रहा. नब्बे और निन्यानवे के बीच सब कुछ रह जाता है. मुझे लगा इससे पहले भी तो सचिन ने इतने शतक लागाये हैं, तो क्या उस समय ये मंगल रिमोट कहीं रखकर भूल गया था क्या. एक ज्योतिषी ने तो समाधान बताया कि जिस शहर में खेलने जाएँ, वहाँ बह रही नदी में एक गिलास पानी सुबह-सुबह डाल दें, शतक बन जायेगा. इन ज्योतिषियों की बातें सुनकर लगा कि सब कुछ बड़ा सरल है. क्या जरूरत है बैटिंग की प्रैक्टिस की. क्या जरूरत है मेहनत करने की. चांदी की गिलास, चांदी का बुरादा, शहर की नदी ही काफ़ी है.
सोचते-सोचते मुझे एक खबरिया चैनल पर राशिफल बताने वाली एक महिला की बात याद आ गई. किसी राशि के लोगों के लिए दिन कैसे जायेगा, बताते हुए इस महिला ज्योतिष ने कहा था; "आप काली गाय को आज सबेरे-सबेरे पालक खिलाईये. और पालक खिलाते समय ध्यान रहे, कि आपने हरे रंग की शर्ट पहनी हो." मुझे लगा जुलाई महीने में इतनी भयानक बरसात होती है. ऐसे मौसम में पालक किसान तो क्या किसान का बाप भी नहीं उगा सकेगा. और फिर अगर कोई शहर में रहता हो और काली गाय खोजने निकल पड़े तो शायद घंटों का समय बरबाद हो जाए. आफिस में अब्सेंट लगेगा सो अलग. उस बेचारे का दिन तो ऐसे ही ख़त्म.
वैसे सचिन के लिए सबसे बढ़िया सुझाव उनके पुत्र ने दिया. बोला; "क्या जरूरत है आउट होने की. जब चौरानवे पर पहुँचें, तो एक छक्का लगा दें, झमेला खत्म." ये हुई न बात. क्रिकेटर का बेटा क्रिकेट खेलने की ही सलाह देगा.
वैसे आपके पास कोई सलाह हो तो जरूर बतायें. सचिन को अगर ज्योतिषी सलाह दे सकते हैं तो फिर ब्लॉगर क्यों नहीं.
Sunday, November 11, 2007
हर रंग कुछ कहता है
आज सुबह एक टीवी चैनल पर एक रिपोर्ट देखी. कानपुर के ग्रीन पार्क स्टेडियम में सब कुछ नीला हो गया है. विपक्षी दल आरोप लगा रहे हैं कि मुख्यमंत्री ने स्टेडियम में नीले रंग का प्रयोग कर के अपनी पार्टी का प्रचार करना शुरू कर दिया है. अब चूंकि उनकी पार्टी का रंग नीला है तो ऐसे आरोप स्वाभाविक हैं. मैंने सोचा नीले रंग में स्टेडियम को रंगने के पीछे क्या कारण हो सकता है.
बहुत सोचने के बाद मुझे लगा शायद कुछ ऐसा हुआ हो:-
-------------------
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कार्यालय में सचिवों की भीड़ लगी हुई थी. निजी सचिव, खेल मंत्रालय के सचिव, अम्बेडकर मामलों की मंत्रालय के सचिव, मुख्य सचिव, जरूरी सचिव, गैर-जरूरी सचिव, सब मौजूद हैं. मुख्यमंत्री ने मीटिंग बुलाई थी.
जरूरी हथजोड़ और आशीर्वाद कार्यक्रम के बाद मुख्यमंत्री ने मीटिंग शुरू करते हुए कहा; "रंगीन कंपनी का प्रचार देखा है आप लोगों ने?"
सबके चेहरे पर आश्चर्य के भाव थे. 'रंगीन कंपनी' से मुख्यमंत्री का आशय समझ नहीं पाये, लेकिन हिम्मत नहीं हुई कि मुख्यमंत्री से कुछ कहें. मुख्यमंत्री ने इन डरे हुए सचिवों की हालत का अंदाजा लगा लिया. मुस्कुराते हुए कहा; "लगता है आपलोगों को समझ में नहीं आया. कोई बात नहीं है. सचिवों को नेताओं की भाषा अक्सर समझ में नहीं आती."
निजी सचिव ने बड़ी हिम्मत करके कहा; "नहीं, ऐसी बात नहीं है मैडम. हमें अब आपकी भाषा थोडी-थोडी समझ में आने लगी है. थोड़े दिन और लगेंगे पारंगत होने में. क्षमा कीजिये, लेकिन कौन से प्रचार की बात कर रही हैं आप?"
"अरे वही प्रचार, जिसमें कहा गया है कि "हर रंग कुछ कहता है"; मुख्यमंत्री ने समझाते हुए कहा।
"अच्छा, आप रंग बनाने वाली कंपनी के प्रचार की बात कर रही हैं. हाँ हाँ मैडम, हमने देखा है वो प्रचार"; निजी सचिव ने बताया.
"आप सब केवल देखते हैं या कभी सोचते भी हैं? कभी सोचा है कि अगर हर रंग कुछ कहता है तो ग्रीन मतलब हरा रंग भी कुछ कहता होगा. केवल देखने से काम नहीं चलता."; मुख्यमंत्री ने थोड़ा नाराज होते हुए कहा.
सभी सचिवों की बोलती बंद. बेचारे तुरंत 'सोचनीय' मुद्रा में आ गए. अभी सोच ही रहे थे कि मुख्यमंत्री को क्या जवाब दें कि मुख्यमंत्री ने पूछा; "वैसे आपको क्या लगता है, हरा रंग क्या कहता होगा?"
निजी सचिव ने सकुचाते हुए कहा; "मैडम आपके सामने कैसे कहूं, लेकिन मेरी समझ बताती है कि हरा रंग कुछ ठीक नहीं कहता. जब भी देखते हैं, हमें तो लगता है जैसे ये रंग समाजवादी पार्टी के बारे में कुछ कहता है."
अब तक लगभग सभी सचिवों को मुख्यमंत्री की बात समझ में आने लगी थी. खेल मंत्रालय के सचिव ने भी निजी सचिव का समर्थन करते हुए कहा; "सर ठीक कह रहे हैं मैडम. हमें भी ये हरा रंग उसी पार्टी की याद दिलाता है. वैसे, अचानक हरे रंग की याद कैसे आ गई आपको?"
मुख्यमंत्री ने बताया; "आएगी कैसे नहीं. अभी हाल ही में कानपुर के ग्रीन पार्क स्टेडियम की मरम्मत के लिए हमने पैसा दिया है. पहले मेरे दिमाग में नहीं आई बात, लेकिन बाद में लगा कि ग्रीन के बारे में मुझे सोचना चाहिए था."
निजी सचिव ने मुख्यमंत्री की बात का समर्थन करते हुए कहा; "आप ठीक कह रही हैं मैडम. लेकिन अभी भी देर नहीं हुई है, सोचना है तो अभी भी सोच सकते हैं."
"अच्छा, तो सोच कर बताईये कि क्या किया जा सकता है. अब पैसा तो हमने दे दिया है. उसे वापस तो ले नहीं सकते लेकिन ऐसा कुछ तो जरूर कर सकते हैं कि ग्रीन के ऊपर कोई और रंग आ जाए. मेरा मतलब रंग जमाने का कोई आईडिया निकालिए"; मुख्यमंत्री ने सोचते हुए कहा.
एक सचिव को ब्रेन-वेव आ गई. उसने कहा; "मैडम क्यों न इस ग्रीन की समस्या को ब्लू से सुलझाया जाय. आप इजाज़त दें तो मैं एक आईडिया देता हूँ."
"हाँ-हाँ बताईये, क्या कहना चाहते हैं आप?"; मुख्यमंत्री का चेहरा चमक उठा. उन्हें इस अफसर से कुछ अच्छा सुनने की उम्मीद जाग गई.
"मैं कह रहा था मैडम, स्टेडियम को नीले रंग से भर दें. नीले रंग का पैवेलियन, नीले रंग की कुर्सियाँ, नीले रंग का...मतलब मैडम सब कुछ नीला ही नीला"; अफसर ने अपना आईडिया बताया.
"नहीं नहीं. इसमें तो पूरी राजनीति दिखाई देगी वो भी सरे-आम. हमने पहले ही आधे लखनऊ को नीले रंग में रंग दिया है. अब नीला रंग लखनऊ से कानपुर पहुँच गया तो लोग सवाल उठाएंगे. हमारा हाथी ही नीला रहने दीजिये"; मुख्यमंत्री ने अपनी शंका जताते हुए कहा.
"देखिये मैडम, हाथियों का क्या भरोसा. आज जो हाथी नीले हैं, कल 'सफ़ेद' भी तो हो सकते हैं. आपने तो पहले भी देखा है अपने हाथियों को सफ़ेद होते हुए. जब तक हम सब कुछ नीला कर सकें, तब तक जारी रखें. मीडिया और विपक्षी पार्टियों की खिलाफत का तरीका निकल ही आएगा. आप निश्चिंत रहे"; निजी सचिव ने समझाया.
तब तक एक और सचिव की बुद्धि का ज्वालामुखी फूट पड़ा. उसने बताया; "मैडम, आप निश्चिंत होकर पूरे स्टेडियम को नीले रंग में रंगवा दें. हमें केवल ये प्रचार करना है कि ये नीला रंग टीम इंडिया की हौसला आफजाई के लिए है. हम ये भी जोड़ देंगे कि हमने 'चक दे इंडिया' के थीम पर स्टेडियम को नीला कर डाला है."
मुख्यमंत्री ने इस अफसर की जमकर प्रशंसा की. उसे प्रमोशन का वादा भी किया है. सुना है रविवार को दस मिनट के लिए वे क्रिकेट देखने कानपुर जा रही हैं.
वैसे हम उन्हें नहीं बल्कि फुरसतिया शुकुल जी को स्टेडियम में देखने की कोशिश करेंगे.
---------------
(चित्र ग्रीन पार्क स्टेडियम, कानपुर का। जब वैसे ही नीलाभ दीखता है तो नाम भी ब्ल्यू पार्क स्टेडियम
रखने में क्या हर्ज है?)


