"अदालत की वजह से कभी-कभी बड़े लोगों को सज़ा भी होनी चाहिए" नामक सिद्धांत के तहत संजय दत्त को सजा हो गई। इस सज़ा ने तमाम लोगों को एक्टिव कर दिया। कुछ अति-एक्टिव भी हुए। इसने लोगों को गुटबाजी के लिए भी प्रेरित किया। प्रेरणा लेकर दो गुट उभरे। एक वह जो यह चाहता है कि संजय दत्त को जेल होनी चाहिए और दूसरा वह जो चाहता है कि संजय को जेल नहीं होनी चाहिए बल्कि उन्हें राज्यपाल से माफी मिल जानी चाहिए।
इस दूसरे गुट का प्रतिनिधित्व जस्टिस काटजू कर रहे हैं। उन्होंने प्रण टाइप किया है कि वे राज्यपाल से अपील करके संजय दत्त जी को माफी दिलाकर ही दम लेंगे। लोग उनके विरोध में भी बात कर रहे हैं।
ये मैं क्या लिख रहा हूँ? मुझे यहाँ जस्टिस काटजू का इंटरव्यू छापना है और मैं कुछ भी अंट-संट लिख रहा हूँ। वैसे आप मन ही मन सोचने के लिए स्वतंत्र हैं कि जस्टिस काटजू के इंटरव्यू की बात पर अंट-संट लिख दिया जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं। तो आप बांचिये जस्टिस काटजू का इंटरव्यू जिनके साथ बात की हमारे ब्लॉग संवाददाता चंदू चौरसिया ने।
चंदू: नमस्कार सर।
जस्टिस काटजू : नमस्कार? क्या कह रहे हैं आप? आपको तमीज नहीं है? यू आर मच यंगर टू मी फिर भी आप नमस्कार कर रहे हैं। क्या आपको नहीं लगता कि आपको प्रणाम करना चाहिए?
चंदू : नहीं, ऐसी बात नहीं है सर। दरअसल मुझे लगा कि "सर" के साथ नमस्कार ही ठीक जाता है। "प्रणाम सर" कहने से कैसा तो फील होता है। फिर भी आपने याद दिलाया तो मैं अपना नमस्कार वापस लेता हूँ और उसके बदले प्रणाम देता हूँ।
जस्टिस काटजू : ये ठीक है। वैसे आपका नाम क्या है और आप किस चैनल से हैं?
चंदू : सर, मेरा नाम चंदू चौरसिया है और मैं किसी चैनल से नहीं बल्कि ब्लॉग संवाददाता हूँ।
जस्टिस काटजू : अच्छा!! आप भी चौरसिया हैं?
चंदू : आप भी से क्या तात्पर्य था सर आपका?
जस्टिस काटजू : आप भी से मेरा मतलब ...दरअसल आपका सर-नेम सुनकर मुझे दीपक चौरसिया याद आ गए इसलिए मेरे मुंह से निकल आया। अभी हाल में मैंने एक इंटरव्यू में दीपक चौरसिया को बेवकूफ कहा था और बीच में भी इंटरव्यू छोड़कर बाहर निकल आया था ..... आप भी क्या उसी तरह के सवाल करेंगे?
चंदू : अरे नहीं सर। सोशल मीडिया वाले अभी तक मेनस्ट्रीम मीडिया वालों की तरह ज्यादा बेवकूफ नहीं हुए हैं। ऐसे में .....सोशल मीडिया वालों को वहां तक पहुँचने में अभी समय लगेगा।
जस्टिस काटजू : अरे हाँ मैं तो भूल ही गया कि आप सोशल मीडिया से हैं। खैर, पूछिए आप अपना सवाल। मुझे जल्दी है। कई न्यूज चैनल्स पर मुझे पैनल डिस्कशन के लिए जाना है।
चंदू: जरूर सर जरूर। मेरा पहला सवाल यह है कि आपने ये संजय दत्त की माफी के लिए गवर्नर से रिक्वेस्ट किया है, वह कहाँ तक जायज है?
जस्टिस काटजू : कहाँ तक जायज है से क्या मतलब आपका? वह संविधान तक जायज है। माफी की बात हमारे संविधान में है और यह हमारा अधिकार है।
चंदू: सर, लेकिन कुछ लोग मानते हैं कि ये आपका अधिकार कैसे हुआ? सज़ा संजय दत्त को हुई है, अधिकार तो उनका है।
जस्टिस काटजू : एक ही बात है। संजय दत्त और मुझमें क्या अंतर ..अरे, ये मैं क्या बोल ... मेरा मतलब था कि अब जब मामला मैंने उठाया है तो अधिकार भी तो मेरा ही हुआ। वैसे भी जो लोग ऐसा मानते हैं वे उसी नब्बे प्रतिशत में से होंगे जिन्हें मैं बेवकूफ समझता हूँ।
चंदू: लेकिन सर, संजय दत्त जी ने संवाददाता सम्मलेन करके बताया कि वे चूंकि सुप्रीम कोर्ट का बहुत आदर करते हैं इसलिए सज़ा भुगतने के लिए तैयार हैं। उन्होंने ये भी कहा कि वे कोई अपील फाइल नहीं करेंगे।
जस्टिस काटजू : संजय दत्त के कहने से क्या होता है? वे भी तो उसी नब्बे प्रतिशत ...उनके अन्दर अभी बहुत बचपना है। और फिर अपील मैं न फाइल कर रहा हूँ, उनके कहने से क्या होगा? मेरा मैसेंजर मेरी अपील राष्ट्रपति तक पहुंचा भी चुका है और मैं यहाँ संत मानिक दास को कोट करना चाहूँगा जिन्होंने कहा था कि ; "कमान से निकला तीर और संवैधानिक अधिकार वाले के हाथ से निकली अपील वापस नहीं आते।"
चंदू: आपके कहने का मतलब अब संजय दत्त जी को यह अपील स्वीकार करनी ही पड़ेगी?
जस्टिस काटजू : किस तरह का बेतुका सवाल है ये? अपील तो गवर्नर को स्वीकार करनी है। मैंने अपील की और गवर्नर ने स्वीकार की, इसमें संजय दत्त बीच में कहाँ से आ गए?
चंदू : आपके विरोधी यह भी कहते हैं कि आप इसलिए अपील कर रहे हैं क्योंकि संजय एक सेलेब्रिटी हैं।
जस्टिस काटजू : यह बकवास बात है। मैंने इसके पहले तमाम अपील की हैं। लोगों को पता नहीं कि मैंने गोपालदास के लिए भी अपील की है। मैंने सरबजीत के लिए भी अपील की है। मैंने बनवारी लाल, अशफाक चेम्बूरी और रामजतन के लिए भी अपील की है। वे तो सेलेब्रिटी नहीं है।
चंदू : वैसे सर, आप ये जो अपील कर रहे हैं, ऐसा क्यों कर रहे हैं? तमाम कोर्ट्स से निकल कर केस का फैसला हुआ है। अगर सब ऐसे ही माफी की अपील करते रहेंगे तो कोर्ट का क्या औचित्य रह जाएगा?
जस्टिस काटजू : यही तो समझने की बात है लेकिन आप कैसे समझेंगे? आप तो उसी नब्बे .... देखिये, ये जो अपील का रूट मैंने अपनाया है वह देश के लिए मेरी सेवा भावना से पैदा हुआ है। इतने वर्षों तक न्याय प्रक्रिया से जुड़े रहकर मैंने देखा कि कोर्ट्स में मुकदमों की भरमार है। जजों को समय नहीं मिलता। इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी है। केस वर्षों तक लटके रहते हैं। वर्षों के बाद फैसले होते हैं। ऐसे में मुकदमों की संख्या कम करने का सबसे बढ़िया तरीका यह है कि जब फैसला हो तो उसके खिलाफ माफी की अपील फाइल करके मुजरिम को माफी दिला देनी चाहिए।
चंदू: इससे क्या हासिल होगा?
जस्टिस काटजू : थोड़ी देर पहले तो आपने कहा कि सोशल मीडिया वाले अभी तक बड़े बेवकूफ नहीं हुए हैं।
चंदू: मैंने समझा नहीं?
जस्टिस काटजू: मैं इसीलिए तो कह रहा हूँ कि अगर आप बेवकूफ नहीं हैं तो फिर मेरी सीधी बात आपकी समझ में क्यों नहीं आई? आपको क्यों समझ में नहीं आया कि जब सजा होने के बाद आपील की वजह से मुज़रिम को जेल नहीं जाना पड़ेगा तो लोग अदालत में यह सोचकर जाना बंद कर देंगे कि क्या फायदा वहां जाने से जब सज़ा ही नहीं होगी तो? यह होना शुरू होगा तो फिर मुक़दमे अदालत तक जायेंगे ही नहीं। ऐसा हुआ तो न्याय-प्रक्रिया में 'लिप्त' लोगों को राहत मिलेगी। अदालतों पर बोझ कम होगा।यहाँ मैं कवि कैलाश गौतम की कविता की पंक्तियाँ कोट करना चाहूँगा जिन्होंने लिखा था ;
कचहरी हमारी तुम्हारी नहीं है
कहीं से कोई रिश्तेदारी नहीं है
....................................
कचहरी की महिमा निराली है बेटे
कचहरी वकीलों की थाली है बेटे
................................................
खुले आम कतिल यहाँ घूमते हैं
सिपाही दरोगा चरण चूमते हैं
यहाँ झूठ की ही कमाई है बेटे
यहाँ झूठ का रेट हाई है बेटे
अब आपही बताइए कि मेरा प्लान क्या बुरा है? क्या मैं अपील इंडस्ट्री चलाकर देशसेवा नहीं कर रहा हूँ? वैसे आपने कैलाश गौतम के बारे में सुना था पहले?
चंदू: हाँ, सर गौतम जी के बारे में मैंने सुना है। उनकी कवितायें भी पसंद है।
जस्टिस काटजू : यह तो कमाल हो गया। हमारे बीच ऐसे संवाददाता भी हैं तो कैलाश गौतम के बारे में जानते हैं!!! अच्छी बात है कि आपने उनके बारे में सुना है। और शेक्सपीयर के बारे में भी सुना है क्या?
चंदू: हाँ सर, उनके बारे में भी सुना है। फिर आपने अपनी दलील में शेक्सपीयर जी को कोट करके उन्हें फेमस भी तो कर दिया है।
जस्टिस काटजू : वे मेरे कोट किये जाने से फेमस हुए, यह तो महज संयोग है। वैसे फेमस तो मैंने तुलसीदास को भी कर दिया है। मेरी इस अपीली प्रक्रिया की वजह से कबीर भी फेमस हो गए हैं। लेकिन मुद्दा माफी का है, ये कोट्स वगैरह तो महज तरीके हैं।
चंदू: लेकिन सर केवल लेखकों और कवियों को कोट करके अपील का माहौल बनाना ठीक है क्या?
जस्टिस काटजू : मैंने केवल कोट्स का सहारा तो नहीं लिया। मैंने तो यह खुलासा भी किया है कि संजय दत्त की अब शादी हो गई है। उनके बच्चे हो गए हैं। ऐसे में उनको ...
चंदू: लेकिन सर, शादी को कई मुजरिमों की होती है। बच्चे भी होते हैं। तो क्या इस तरह के सारे मुज़रिम सजा होने के बाद छोड़ दिए जायेंगे?
जस्टिस काटजू : लेकिन हर शादी-शुदा और बच्चों वाला मुज़रिम एक्टर तो नहीं होता न। दूसरी बात यह है कि संजय दत्त के पिता जी और माताजी ने समाज सेवा की है। वे सैनिकों का मनोरंजन करते थे। संजय दत्त ने खुद मुन्नाभाई जैसी फिल्म करके देश को गांधीगीरी का महत्वपूर्ण सिद्धांत दिया है। उन्होंने पूरी दुनियाँ में मेडिकल प्रोफेशन के लिए जादू की झप्पी जैसा एक पाथ-ब्रेकिंग इलाज दिया है जो हर मर्ज में फायदेमंद है।
चंदू : लेकिन सर, आप सबसे कहते फिर रहे हैं कि आपने पिछले चालीस वर्षों में एक भी फिल्म नहीं देखी। ऐसे में ये यह मुन्नाभाई जैसी फिल्म को आगे रखकर आप बात कर रहे हैं, यह कहाँ तक जायज है?
जस्टिस काटजू : यह किस तरह का बेहूदा सवाल है? यह तरीका है क्या अपने एल्डर्स से बात करने का? अगर इस तरह की बेवकूफी वाली बातें करनी है तो मैं इंटरव्यू छोड़कर चला जाऊंगा।
चंदू: माफ़ कीजिये सर ...
जस्टिस काटजू : ऐसे कैसे माफ़ कर दें? मैं माफी दिलवाता हूँ, माफ़ करता नहीं। और फिर मुन्नाभाई द्वारा प्रतिपादित सारे सिद्धांत क्या देशहित में नहीं हैं?
चंदू : आप कहते हैं तो यह सही ही होगा। वैसे मेरा एक सवाल यह है कि ये आपने जो अपील इंडस्ट्री खोली है, उसे क्या और व्यापक करेंगे? क्या आनेवाले समय में हम उसका फैलाव देखेंगे?
जस्टिस काटजू : जरूर देखेंगे, क्यों नहीं देखेंगे? अभी मेरे साथ मजीद मेमन जुड़े हैं। आनेवाले समय में और लोग जुड़ेंगे। मेरी इच्छा है कि अखिल भारतीय अपील महासभा का कार्यालय हर राज्य और हर महत्वपूर्ण शहर में हो ताकि आनेवाले समय में ज्यादा से ज्यादा लोगों को माफी दिलाई जा सके। मुझे आशा ही नहीं बल्कि पूरा विश्वास है कि एक दिन इस देश के हर उस मुजरिम को, जो आतंकवादी न हो, किसी न किसी तरह की माफी मिलकर रहेगी।
चंदू : मेरा अगला सवाल इस केस से हटकर है सर। सोशल मीडिया में आपकी बहुत आलोचना हो रही है। आपने हाल ही में कहा था कि सोशल मीडिया को रेगुलेट किये जाने की आवश्यकता है। तो क्या आप ऐसा कोई प्रस्ताव सरकार को भेज रहे हैं?
जस्टिस काटजू : जरूर भेजेंगे। और मेरा यह मानना कि सोशल मीडिया को रेगुलेट की आवश्यकता है, बिलकुल सही है। दूसरी बात यह है कि सोशल मीडिया के लिए कानून बने यह मैं इसलिए चाहता हूँ ताकि उस कानून के तहत सोशल मीडिया वालों को सज़ा मिले। जब तमाम लोगों को उस कानून के तहत सज़ा मिलेगी तो मैं उनको माफी दिल दूंगा। तो आप यह समझें कि मेरी इच्छा कानून बनवाकर सजा दिलाने की नहीं बल्कि कानून बनवाकर सजा दिलाकर माफी दिलवाने की है।
चंदू : आपने अपनी दलील में मर्चेंट ऑफ़ वेनिस से पोर्सिया को कोट किया। शाईलॉक को कोट किया। तुलसीदास को कोट किया। ऐसे में ....
जस्टिस काटजू : मैंने इनलोगों को इसलिए कोट किया कि आज की पीढी को संस्कृत का ज्ञान नहीं है। अगर होता तो मैंने संस्कृत के श्लोक कोट करता। अब आप ही समझिये कि कहा गया है; "येषां न विद्या, न तपो, न दानं, ज्ञानं न शीलं, न गुणो न ...."
चंदू: सर ये क्या कर रहे हैं आप? इस श्लोक का आपकी दलील से क्या लेना-देना है?
जस्टिस काटजू : मतलब ये कि आपको संस्कृत आती है? पहले क्यों नहीं बताया, मैं रेलीवेंट श्लोक कोट करता। क्या बेवकूफी है ये?
चंदू: सर, आपने शेक्सपीयर, तुलसीदास, कबीर वगैरह को कोट किया और जैसा कि आपने बताया कि वे फेमस हो गए, लेकिन आपने हमारे समय के किसी कवि को कोट नहीं किया। ऐसा क्यों?
जस्टिस काटजू : मैं तो चाहता था कि मैं कविवर अमर सिंह को कोट करूँ लेकिन तबतक वे जयाप्रदा के साथ गवर्नर से संजय दत्त की माफी के लिए मिलने चले गए। इसलिए मैंने डिसाइड किया कि मैं उनको कोट नहीं करूंगा।
चंदू : सर, आपने यह भी कहा है कि आप सलमान खान और सैफ अली खान को भी माफी दिलवाएंगे। क्या आप ऐसा करेंगे?
जस्टिस काटजू : बिलकुल करूंगा। अब मैंने अपना जीवन माफी और अपील इंडस्ट्री को समर्पित कर दिया है।
चंदू: लेकिन सर, सलमान खान तो शादी-शुदा नहीं है और सैफ अली खान के बच्चे नहीं हैं। इन दोनों ने मुन्नाभाई की तरह कोई महत्वपूर्ण सिद्धान्त भी नहीं दिया है।
जस्टिस काटजू : देखिये सलमान खान का गैर शादी-शुदा होना ही मेरी अपील का आधार रहेगा। कि सज़ा होने के डर से उन्होंने शादी नहीं की। उधर सैफ का शादी-शुदा होना मेरी अपील का आधार होगा। कि उन्होंने करीना कपूर से शादी की जो राजकपूर की के खानदान से हैं। और फिर सैफ अली खान ने एजेंट विनोद जैसी फिल्म की जिसमें उसने भारत और पाकिस्तान के आपसी संबंधों को सुधारने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
चंदू: सर, आपने ही कहा कि आपने चालीस साल से कोई फिल्म नहीं देखी। ऐसे में एजेंट विनोद ...
जस्टिस काटजू : किस तरह का बेहूदा सवाल है ये? आपने फिर बेवकूफी शुरू कर दी। मैं ये इंटरव्यू करूंगा ही नहीं। मैं जा रहा हूँ। गेट आउट फ्रॉम हीयर।
इतना कहकर जस्टिस काटजू उठ गए और कमरे से बाहर जाने लगे। चंदू डर गया था फिर भी उसने उनके जाते-जाते एक सवाल दाग ही दिया। उसने पूछा; "सर, आप अभी तक शेक्सपीयर, तुलसीदास, कबीरदास, मानिक दास वगैरह को कोट कर चुके हैं। अगर इससे काम न बना तो?
जस्टिस काटजू जाते-जाते चिल्लाकर बोल गए कि ; "इन सबको कोट करने से काम न बना तो फिर मैं ऑस्कर वाइल्ड, बर्नार्ड शा, ओ हेनरी, ओसोलन मोशावा, कीट्स, ग़ालिब को कोट करूंगा। ये समझ लो कि चाहे मुझे रतिराम चौरसिया को कोट करना पड़े लेकिन मैं हारने वाला नहीं हूँ। मैं कोट्स के सहारे संजय दत्त को माफी ......."
Monday, April 1, 2013
चंदू' ज एक्सक्लूसिव चैट विद जस्टिस काटजू
Friday, May 25, 2012
चंदू इन एक्सक्लूसिव चैट विथ डॉक्टर सिंह
चंदू ने उत्तरप्रदेश चुनावों के समय राहुल गांधी जी का एक इंटरव्यू किया था. चूंकि राहुल जी हमेशा सच बोलने और लिखने वालों के साथ रहते हैं, लिहाजा उन्होंने चंदू की बड़ी प्रशंसा की. चंदू की प्रशंसा के चर्चे इतने फैले कि प्रधानमंत्री ने फैसला किया कि वे पाँच संपादकों से मिलें उससे अच्छा केवल चंदू को इंटरव्यू दे दें. जो काम पाँच सम्पादक मिलकर नहीं कर सकेंगे वह काम चंदू अकेले ही कर देगा. परसों यूपीए-टू की तीसरी सालगिरह मनाई गई. मीटिंग हुई. खाना-पीना हुआ. मुस्कुराहटें बिखेरी गईं. विचार-विमर्श करने की ऐक्टिंग की गई. कुछ ने खुश दिखने की ऐक्टिंग की. कुछ ने दुखी दिखने की. कुछ पुराने मित्र नहीं आये. सरकार को नए मित्र मिले. फोटो वगैरह की खिचाई हुई. इन्ही सब के बीच चंदू को मौका मिला कि वह प्रधानमंत्री का इंटरव्यू ले सके.
कल ही दिल्ली से लौटा और इंटरव्यू की ट्रांसक्रिप्ट मुझे थमा दी. बोला; "एक्सक्लूसिव इंटरव्यू है. तमाम पत्र-पत्रिकाएँ चाहती थीं कि मैं उन्हें बेंच दूँ लेकिन चूंकि मैं ब्लाग-पत्रकारिता धर्म का पालन करना चाहता था इसलिए ये मैं आपको दे रहा हूँ. आप ही छापिये."
तो पेश है प्रधानमंत्री का एक्सक्लूसिव इंटरव्यू. आप बांचिये.
चंदू: सर, नमस्कार.
प्रधानमंत्री:
चंदू: सर नमस्कार.
प्रधानमंत्री:
चंदू: सर, मैंने कहा नमस्कार. आप कुछ बोलिए.
प्रधानमंत्री: बोलूँ? मतलब आप मुझे बोलने की इजाजत देते हैं?
चंदू: सर, आप देश के प्रधानमंत्री हैं. मैं एक अदना सा पत्रकार. मेरी क्या हैसियत कि मैं आपको इजाजत दूँ.
प्रधानमंत्री: देखिये यह इजाजत नहीं चंदू जी, दरसल यह आदत की बात है.
चंदू: समझ गया सर, समझ गया.
प्रधानमंत्री: आप तो बहुत समझदार हैं. काश इतनी समझदारी अरनब गोस्वामी के पास होती. वैसे मुझे आने में थोड़ी देर हो गई. दरअसल हमलोग खा रहे थे.
चंदू: कोई बात नहीं सर. पार्टी है तो खाना-पीना तो होगा ही.
प्रधानमंत्री: हे हे..क्या बात कही आपने. पार्टी है तो खाना-पीना तो होगा ही. वैसे भी सबके साथ खाने में समय ज्यादा लगता है. और लोग़ रहते हैं तो बातचीत करते हुए खाते हैं. हँसते हुए खाते हैं. विचार-विमर्च करके खाते हैं. ऐसे में समय ज्यादा लग ही जाता है.
चंदू: बिलकुल सही बात कह रहे हैं सर. इंसान को अकेले खाना हो तो उसे कितना टाइम लगेगा खाने में? साथ की बात कुछ और है.
प्रधानमंत्री: हे हे हे..बिलकुल सही कहा आपने. वैसे आपने खाया या नहीं?
चंदू: नहीं सर, मैंने नहीं खाया. वो पार्टी में दाल-रोटी नहीं थी न. यहाँ तो सारे परदेशी-विदेशी व्यंजन हैं.
प्रधानमंत्री: क्या बात कर रहे हैं? आप पत्रकार होकर दाल-रोटी खाते हैं?
चंदू: सर, अब आप तो जानते ही हैं कि मैं एक ब्लाग-पत्रकार हूँ इसलिए मेरे पास कोई च्वायस नहीं है.
प्रधानमंत्री: चंदू जी पत्रकार को बहुत चूजी होना चाहिए. च्वायस तो पत्रकार खुद बनाता है.
चंदू: क्या फरक पड़ता है सर. बात तो पेट भरने से है. मेरा पेट दाल-रोटी से ही भर जाता है. कह सकते हैं यह बुरी आदत हो गई पेट भरने की. वैसे भी सर, दाल-रोटी खाने का फायदा यह रहता है कि खानेवाले को आटा-दाल का भाव पता लगता रहता है.
प्रधानमंत्री: हे हे हे..ये खूब कही आपने. इसी बात पर आपको एक शेर सुनाता हूँ.
चंदू: अरे सर, अभी तो इंटरव्यू की शुरुआत है. शेर कहने के लिए तो और भी मौके आगे आयेंगे.
प्रधानमंत्री: चलिए आपने कहा तो मैं रुक जात हूँ नहीं तो मैं सुनाता कि; माना कि तेरी दीद के काबिल..
चंदू: हाँ सर, मुझे पता है कि आप यही सुनाते.
प्रधानमंत्री: हे हे हे..
चंदू: सर, आपसे मेरा पहला सवाल है कि आप इन आठ सालों को कैसे देखते हैं? कैसे गुज़रे ये साल?
प्रधानमंत्री: कैसे देखते हैं की बात पर तो यही कहूँगा कि पीछे मुड कर देखते हैं. रही बात कि ये आठ कैसे गुजरे तो उसपर यह कहूँगा कि गुजरे तो क्या हमने गुज़ार दिए.
चंदू: वैसे सर, आप अपनी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या मानते हैं?
प्रधानमंत्री : सबसे बड़ी उपलब्धि की बात पूछेंगे तो मैं यही कहूँगा कि हमारी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही है कि वह खड़ी रह गई.
चंदू: और आपकी सबसे बड़ी उपलब्धि?
प्रधानमंत्री: मेरी सबसे बड़ी व्यक्तिगत उपलब्धि की बात करेंगे तो मैं कहूँगा कि मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि मैंने अपनी सरकार को खड़ी रखा.
चंदू: इसी के साथ यह भी पूछता चलूं कि इन आठ सालों में देश की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या रही?
प्रधानमंत्री: देश की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि देश ने मेरी सरकार को झेला.
चंदू: लेकिन वहीँ यह आरोप भी लगते रहे हैं कि बहुत सारी पार्टियों और नेताओं को मैनिपुलेट करके सरकार को खड़ी रखा गया.
प्रधानमंत्री: अब राजनीति की बातों में मुझे मत घसीटिए. मैं एक इकॉनोमिस्ट हूँ. मुझे राजनीति नहीं आती.
चंदू : परन्तु सर, तमाम लोग़ यह मानते हैं कि आप राजनीतिज्ञ हैं. अगर ऐसा नहीं होता तो माइनॉरिटी की सरकार आठ सालों तक नहीं चलती.
प्रधानमंत्री : आप मेजर प्वाइंट मिस कर रहे हैं. यह राजनीति की बात नहीं बल्कि इकॉनोमिक्स की बात है. देश की इकॉनोमी को आगे बढ़ाने के लिए हमें समर्थन मिलता रहता है. हम लेते रहते हैं और सरकार चलती रही है.
चंदू : लेकिन सर, कुछ लोग़ कहते हैं यह इकॉनोमिक्स की नहीं बल्कि फिनांस की बात है.
प्रधानमंत्री: देखिये मैं इकॉनोमिस्ट हूँ और मेरा मानना है कि इकॉनोमिक्स और फिनांस एक ही सिक्के के दो पहलू हैं.
चंदू: कौन से सिक्के के, सर?
प्रधानमंत्री: उस सिक्के के जो हमें आगे ले जाता है.
चंदू: लेकिन सर, सिक्का खरा है या खोटा, यह भी तो देखना पड़ेगा.
प्रधानमंत्री: नहीं-नहीं, असली प्वाइंट यह है कि सिक्का पहलू में है या नहीं. यह अर्थशास्त्र के सिद्धांत के अनुसार बात कर रहा हूँ मैं. आपतो जानते ही हैं कि मैं बेसिकेली एक इकॉनोमिस्ट हूँ.
चंदू; ओके सर. आपकी सरकार पर यह आरोप लगता रहा है कि विकास की बात बहुत हद तक बेमानी है. आप इसे कैसे देखते हैं?
प्रधानमंत्री: विकास की बात में कैसी बेईमानी चंदू जी? विकास में बेईमानी की बात करने वाले सही नहीं कह रहे.
चंदू: आपने शायद सुना नहीं. मैंने बेमानी की बात की. बेमानी की सर. बेईमानी की नहीं.
प्रधानमंत्री : ओह, आपका मतलब बेमानी से था? अब समझा, अब समझा. देखिये, यह तो देखने वाले की नज़र पर निर्भर करता है. हम प्रधानमंत्री की हैसियत से देखते हैं तो हमें तो यह लगता है कि विकास की बात बेईमानी ..सॉरी बेमानी नहीं है. मेरे हिसाब से तो भरपूर विकास हुआ है.
चंदू: लेकिन सर..
प्रधानमंत्री: मुझे पता है कि आपको और आपकी तरह ही तमाम लोगों को यही लगता है कि विकास नहीं हुआ. लेकिन आंकड़े यह बताते हैं कि विकास हुआ है. गरीबी कम हुई है. अमीरी बढ़ी है. लोगों के हाथ में पैसा आया है. खर्च बढ़ा है. लोगों का फेसबुक स्टेटस...सॉरी स्टेटस बढ़ा है. एक्सपोर्ट बढ़ा है. इम्पोर्ट बढ़ा है. डॉलर तक बढवा दिया हमने. और सब तो जाने दीजिये मंहगाई बढ़ गई. अब आपको इससे बड़ा और क्या सबूत चाहिए?
चंदू: आप खुद कह रहे हैं कि मंहगाई बढ़ी है.
प्रधानमंत्री: देखिये, मंहगाई बढ़ने का मतलब है विकास हो रहा है. यह अर्थशास्त्र का सिद्धांत है. हम अर्थ-सिद्धांतवादी हैं इसलिए अगर विकास की बात करेंगे तो वह भी अर्थशास्त्र के सिद्धांत के अनुसार ही करेंगे.
चंदू : परन्तु सर, क्या आंकड़े सबकुछ दर्शाते हैं? आचार्य नवजोत सिंह सिद्धू ने खुद कहा है कि आंकड़े बिकिनी की तरह होते है.....
प्रधानमंत्री: मैं समझ गया, मैं समझ गया. आचार्य सिद्धू का प्रसिद्द सदुपदेश जो वे किसी और से चुरा कर एक्स्ट्रा इनिंग्स में बोलते रहते हैं, उसके बारे में मुझे पता है. लेकिन लोकतंत्र में आंकड़ों का बहुत महत्व है.
चंदू: सर, मेरा अगला सवाल यह है कि अब आठ परसेंट वाली ग्रोथ रुक गई है. ग्रोथ कम होने लगी है. इसका क्या कारण है?
प्रधानमंत्री: इसका सबसे बड़ा कारण ग्रीस है. ग्रीस ने भारत की ग्रोथ रोक दी है. क्या आपने अखबारों में नहीं पढ़ा?
चंदू: लेकिन कुछ लोग़ मानते हैं कि सरकार ग्रीस को एस्केप-गोट बना रही है.
प्रधानमंत्री: देखिये अगर ऐसा है भी तो लोगों को इस बात पर खुश होना चाहिए कि सरकार कुछ बना ही तो रही है, बिगाड़ तो नहीं रही न.
चंदू: लेकिन सर, ये एस्केप-गोट बनाने की जगह कुछ सड़क वगैरह बनाने से अच्छा रहता न.
प्रधानमंत्री: देखिये, एक देश की सरकार के लिए एस्केप-गोट बनाना शासन के तमाम सिद्धांतों में सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत है.
चंदू: मतलब क्या ग्रीस सचमुच इतना इम्पार्टेंट है?
प्रधानमंत्री: बहुत इम्पार्टेंट है. और मैंने तो अपने हर मंत्री से कह दिया कि उन्हें अपना-अपना ग्रीस खोज लेना चाहिए.
चंदू: मसलन?
प्रधानमंत्री: मसलन इंडियन इकॉनोमी का सबसे बड़ा ग्रीस खुद ग्रीस है. इसके अलावा भी सरकार का अपना ग्रीस है. ममता जी सरकार की सबसे बड़ी ग्रीस हैं. उनकी वजह से ही तमाम रिफार्म्स रुक गए. चिदंबरम जी के ग्रीस रहमान मलिक हैं जो उनकी बात नहीं मानते. प्रनब बाबू का ग्रीस गिरता हुआ रुपया और यूरोपियन इकॉनोमी है....आप देखिये कि हमसे प्रेरित होकर ही बीजेपी वालों ने भी अपने-अपने ग्रीस खोज लिए हैं. जैसे गडकरी के ग्रीस नरेन्द्र मोदी हैं. वैसे ही सुषमा जी के ग्रीस अरुण जेटली हैं. अब तो ममता जी ने भी इस ग्रीस खोजो अभियान के तहत कार्टूनिस्ट और सवाल करने वाली छात्राओं में अपना ग्रीस ढूढ़ लिया है. मैं आपको बताता हूँ कि यह ग्रीस सच में बहुत इम्पार्टेंट है. हमारी बड़ी उपलब्धियों में यह भी है कि हमने लोगों को अपने-अपने ग्रीस खोजना सिखा दिया है.
चंदू : सर, मेरा एक सवाल करप्शन को लेकर है. लोगों में यह धारणा बनी है कि आपकी सरकार में भ्रष्टाचार बढ़ा है.
प्रधानमंत्री : हे हे..ऐसी बात नहीं है. लोगों को आधा-सच देखने की आदत है. अगर आप देखें तो यह भी जानेंगे कि हमारी सरकार ने ही सबसे ज्यादा नेताओं को जेल भेजा है.हमने तो यह सिद्धांत ही बना दिया है हम भ्रष्टाचार बिलकुल बर्दाश्त नहीं करेंगे.
चंदू: लेकिन सर, भ्रष्टाचार हुए है तभी तो लोग़ जेल जा रहे हैं. भ्रष्टाचार होते ही नहीं तो लोग़ जेल क्यों जाते?
प्रधानमंत्री: यही तो आप नहीं समझ पाए. दरअसल यह लोकतंत्र को मज़बूत करने वाला प्रोसेस है. भ्रष्टाचारी को छूट है कि वह भ्रष्टाचार करे और सरकार को छूट है कि वह उन्हें पकड़े.
चंदू: सर, लोग़ ऐसा मानते हैं कि देश की अर्थव्यवस्था ठीक नहीं है. उसके लिए सरकार का क्या प्लान है?
प्रधानमंत्री: सब ठीक हो जाएगा. हम पेट्रोल और डीजल वगैरह का दाम बढ़ाके सब ठीक कर देंगे.
चंदू : लेकिन सर, क्या यह करना सही रहेगा? मंहगाई के मारे लोग़ परेशान हैं. क्या वे और परेशान नहीं हो जायेंगे?
प्रधानमंत्री: देखिये, देश को इस बोहरान से निकालने का सबसे बढ़िया तरीका यही है. आप लार्जर पिक्चर देखिये. मंहगाई जैसी छोटी बात से निकलिये.
चंदू: अच्छा सर, आप कहते हैं तो निकल जाता हूँ. मेरा अगला सवाल यह है कि यूपी इलेक्शन में आपकी पार्टी ह़र गई. उसे लेकर विचार-विमर्श चल रहा है?
प्रधानमंत्री: मुझे पोलिटिक्स में मत घसीटिए. मैं तो इकॉनोमिस्ट हूँ.
चंदू : लेकिन सर...
प्रधानमंत्री: देखिये इलेक्शन तो एन डी ए भी हारा था. इलेक्शन की बात पर भी हम एन डी ए को ही फालो करते हैं. टूजी पर भी हमने एन डी ए को ही फालो किया था. हम सारी नीति उन्ही की फालो करते हैं. इसलिए अगर आपको हमारी फैल्योर की बात याद आये तो यह समझ कर संतोष करें कि यह दरअसल एन डी ए का फैल्योर है.
चंदू : अब कुछ व्यक्तिगत सवालों पर आ जाते हैं.
प्रधानमंत्री: नहीं-नहीं. चंदू जी देखिये, एक देश के प्रधानमंत्री के लिए व्यक्तिगत कुछ नहीं होता. जो कुछ भी होता है सब पब्लिक होता है. इसलिए व्यक्तिगत सवालों का जवाब देना मैं ठीक नहीं समझता. अब इस इंटरव्यू को मैं इस शेर के साथ ख़त्म करना चाहूँगा कि; माना कि तेरी दीद के काबिल नहीं हूँ मैं, तू मेरा शौक तो देख, मेरा इंतजार तो देख.
चंदू: एक छोटा सा सवाल यह है सर कि आपने यह शेर क्यों कहा?
प्रधानमंत्री: बस ऐसे ही कह दिया. हमें यह शेर पसंद है इसलिए मैं कह देता हूँ. आप इसको ऐसे देखिये कि जो मुझे पसंद है उसको मैं कह देता हूँ.
चंदू: बहुत-बहुत धन्यवाद सर. इस इंटरव्यू और इस शेर के लिए.
Saturday, February 11, 2012
चंदू'ज एक्सल्यूसिव इंटरव्यू विद राहुल जी
२६ जनवरी के दिन चंदू मेरे पास आया. उदास टाइप लग रहा था. मैंने पूछा; "क्या बात है चंदू? कुछ उदास-उदास लग रहे हो. उदास होने का तो मौसम नहीं है. अभी भी जाड़े का मौसम ही है."
वो बोला; "अब जाने दीजिये पूछकर क्या फायदा?"
मैंने कहा; "आज तुम टीवी के पत्रकारों की तरह बात क्यों कर रहे हो?
वो बोला; "क्या मतलब?"
मैंने कहा; "मेरा मतलब फायदे की बात से था."
वो फिर बोला; "जाने दीजिये."
मैंने कहा; "जाने तो दूंगा ही. तुम्हें जहाँ जाना है तो जाओ लेकिन उदासी का कारण भी तो बताओ."
वो बोला; "तुकबंदी में आपका जवाब नहीं. आपकी इस लाइन को कई शायर अपने शेर की दूसरी लाइन बनाकर पहली लाइन की खोज में निकलें तो एक अदद शेर बन जाएगा. वैसे मेरी उदासी का कारण आज सुबह कुछ पत्रकार मित्रों से मुलाकात है."
मैंने कहा; "पत्रकार आपस में मिलकर उदास हो जाते हैं? लेकिन क्यों?"
वो बोला; "नहीं ऐसी बात नहीं है कि पत्रकार मिलकर उदास होते हैं. दरअसल सच तो यह है कि वे मिल-बाँट कर उदास होते हैं. वैसे मेरी उदासी का कारण एक पत्रकार द्वारा मुझसे किया गया सवाल है."
मैंने कहा; "पत्रकार भी पत्रकार से सवाल करते हैं? वैसे सवाल क्या है?"
वो बोला; "दरअसल मेरे एक पत्रकार मित्र ने आज मुझसे पूछा कि मैंने अब तक किसका-किसका इंटरव्यू लिया? मैंने उसे बता दिया कि मैंने अभी तक बराक ओबामा, सुरेश कलमाडी, पैरिस हिल्टन वगैरह का इंटरव्यू लिया. इस बात पर वो बोला कि टुटपुजियों का इंटरव्यू लिया तो कौन सा तीर मार दिया? बड़े नेताओं का इंटरव्यू लेते तब पता चलता. आगे बोला कि ब्लॉग पत्रकार बना हूँ तो नसीब में ऐसे ही लोगों का इंटरव्यू मिलेगा."
मैंने कहा; "तो फिर किसी बड़े नेता का इंटरव्यू ले लो. मैं तो कहता हूँ कि शरद पवार जी का ले लो. वो भी काफी बड़े हैं. ६ फीट के तो होंगे ही. वैसे तुम किसका इंटरव्यू लेना चाहोगे? तुम्हारी नज़र में कौन है बड़ा नेता?'
वो बोला; "आप कहें तो राहुल गांधी जी का इंटरव्यू ले लूँ. सब बताते हैं कि वे भी बड़े नेता हैं. मेरी बड़ी इच्छा है एक बड़े नेता को नज़दीक से देखने की."
मैंने कहा; "ले लो. मैं तो २८ तारीख को मुंबई जा रहा हूँ. तुम उसी दिन चले जाओ. कुछ दिन राहुल जी के साथ रहो. उनका इंटरव्यू लो. वापस आकर दो मुझे फिर ब्लॉग पर छापा जाएगा."
कल शाम को चंदू वापस आया. आज यह इंटरव्यू छाप रहा हूँ. आप भी पढ़िए और राहुल जी के प्लान, उनके विचार, उनके नेतृत्व और उनसे मिलिए.
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चंदू: नमस्कार राहुल जी.
राहुल: नमस्कार. अपना परिचय दें.
चंदू: सर मैं चंदू चौरसिया. एक ब्लॉग पत्रकार हूँ और आपका इंटरव्यू लेने के लिए कोलकाता से आया हूँ.
राहुल: क्या बात कर रहे हैं? आप कोलकाता से आये हैं! मेरा इंटरव्यू लेने? वैसे इतनी दूर से आये तो आप अकेले क्यों आये? अपने साथ अपने ब्लॉग सम्पादक को भी क्यों नहीं लाये?
चंदू: दरअसल सर, मेरे ब्लॉग सम्पादक किसी काम से मुंबई चले गए हैं. इसीलिए नहीं आ सके.
राहुल: मुंबई चले गए? कोलकाता वाले...मेरा मतलब वेस्ट बंगाल वाले भी मुंबई जाते हैं? मैंने तो सोचा था कि केवल यूपी वाले ही महाराष्ट्र जाते हैं भीख मांगने. वैसे आपके ब्लॉग सम्पादक भी क्या वहाँ भीख मांगने गए हैं?
चंदू: पता नहीं सर. जाते समय तो कह गए कि वे किसी काम से जा रहे हैं. अब वहाँ जाकर क्या करते हैं इसके बारे में कम से कम मुझसे कभी जिक्र नहीं किया.
राहुल: मुझे शक है कि वे भी वहाँ भीख मांगने ही गए होंगे. वैसे वे प्रॉपर कोलकाता के हैं या कहीं और से जाकर वहाँ बसे हैं?
चंदू: नहीं सर, वे यूपी के ही हैं. बनारस के.
राहुल: मेरा अनुमान सही निकला. मेरे मन में था कि अगर इंसान महाराष्ट्र जाता है तो उसका ज़रूर यूपी से कोई न कोई कनेक्शन पक्का होगा. अब तो मुझे डेटा देखना पड़ेगा कि यूपी के लोग़ जो और प्रदेशों में रहकर महाराष्ट्र भीख मांगने जाते हैं, उनकी संख्या कितनी है?
चंदू: लगता है आप आंकड़ों पर बहुत काम करते हैं.
राहुल: यही हमारी कांग्रेस पार्टी की खासियत है चंदू जी. हमारी पूरी पार्टी आंकड़ों पर न केवल खूब काम करती है बल्कि उसे काम में लगाती भी है. अब आठ प्रतिशत जी डी पी ग्रोथ के आंकड़े को ही ले लीजिये. हमारी पार्टी का शायद ही कोई महामंत्री, मंत्री, प्रधानमंत्री, उपमंत्री, राज्यमंत्री वगैरह वगैरह हो, जिसने पिछले ५ सालों में इस आंकड़े को दिन भर में दस बार नहीं दोहराया हो. वित्तमंत्री तो जी डी पी के आंकड़े के साथ-साथ इन्फ्लेशन के आंकड़े का भी खास ख्याल रखते रहे हैं. हमने यूपीए और कांग्रेस पार्टी के हर पदाधिकारी के लिए यह कम्पलसरी कर दिया है कि वह सुबह-शाम कुल तीन घंटे आंकड़ों की किताब का अध्ययन करे. कई बार सम्मेलनों में इन आंकड़ों का सामूहिक पाठ करवाया जाता है. यह पाठ बड़ा फलदायक होता है. आंकड़े कितने महत्वपूर्ण हैं उसका अंदाजा इस बात से लगायें....
चंदू: समझ गया. मैं समझ गया सर कि आंकड़े कितने महत्वपूर्ण हैं. ये बताएं कि आपका चुनाव प्रचार कैसा चल रहा है?
राहुल: सबकुछ बढ़िया चल रहा है. आप देख ही रहे हैं कि मैं भी चल रहा हूँ. बहन-बहनोई चल रहे हैं. बहन के बच्चे तक चल रहे हैं. पार्टी चल रही है. देश चल रहा है. यहाँ तक कि मोतीलाल बोरा और नारायण दत्त तिवारी जी तक चल रहे हैं. ऐसे में चुनाव प्रचार भी बढ़िया ही चलेगा.
चंदू: मेरा अगला सवाल ये है कि...
राहुल: इससे पहले कि आप मुझसे सवाल पूछें, चलिए मैं आप से एक सवाल पूछता हूँ. ये बताइए कि आपको गुस्सा आता है? क्या आपको भी उतना ही गुस्सा आता है जितना मुझे आता है? (इतना कहकर राहुल जी अपने कुर्ते की बांह ऊपर उठाने लगे. एक क्षण के लिए तो चंदू डर गया.)
चंदू: लेकिन राहुल जी, ये आपको अचानक गुस्सा क्यों आ गया? आप कुर्ते की बांह ऊपर क्यों चढ़ा रहे हैं सर? मुझसे कोई भूल हो गई?
राहुल: नहीं-नहीं डरिये मत चंदू जी, डरिये मत. कुर्ते की बांह मैं बार-बार इसलिए ऊपर चढ़ाता हूँ ताकि लोग़ जान सकें कि यूथ पॉवर क्या होता है. मेरा मतलब है कि यूथ काम करने के लिए हमेशा तैयार रहता है, यह बात वोटरों तक जानी ज़रूरी है. बाकी पार्टियों में आपने किसी नेता को कुर्ते की बांह उठाते देखा है? कैसे देखेंगे, बाकी किसी पार्टी में यूथ है ही नहीं. लेकिन आपने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया. आपको गुस्सा आता है?
चंदू: आता है सर, आता है. मुझे भी गुस्सा आता है. भ्रष्टाचार और मंहगाई देखकर बहुत गुस्सा आता है.
राहुल: एक्जैक्टली. वही तो मैं लोगों को बताता हूँ कि यूपी के भ्रष्टाचार और उसमें फ़ैली मंहगाई पर जैसे मुझे गुस्सा आता है वैसे ही सबको आना चाहिए.
चंदू: लेकिन सर, भ्रष्टाचार और मंहगाई तो यूपी के अलावा और जगहों पर भी तो है. पूरे देश में है.
राहुल: पूरे देश की बात अभी क्यों कर रहे हैं आप चंदू जी? इलेक्शन तो यूपी में है. देखिये इंसान को फोकस से नहीं हटना चाहिए. यूपी पर फोकस कीजिये. अभी यही सवाल मैंने भदोही में वहाँ के बुनकरों से किया था कि क्या उन्हें गुस्सा आता है? लगभग सभी ने कहा कि उन्हें गुस्सा आता है. इलेक्शन के समय गुस्सा करना उतना ही ज़रूरी है जितना बटला हाउस एनकाऊँटरकी बात करना.
चंदू: तो जब वे लोग़ कहते हैं कि उन्हें गुस्सा आता है तो आप उन लोगों की बात मान लेते हैं?
राहुल: पहले मान लेते थे. बाद में दिग्विजय सिंह जी ने सलाह दी कि आँख मूंदकर उनकी बात मानना ठीक नहीं होगा. इसलिए हमने फिर गुस्सा मापने वाली एक मशीन इम्पोर्ट की. अब जब भी कोई वोटर कहता है कि वह मायावती सरकार से गुस्से में है तो उसकी बात सच है या नहीं, यह जांचने के लिए हमारे कार्यकर्त्ता उस मशीन को लगाकर उसका गुस्सा माप लेते हैं. हम उसकी बात कन्फर्म भी कर लेते हैं और अगर किसी का गुस्सा कम रहता है तो फट से कुछ न कुछ बोलकर उसे बढ़ा देते हैं. बड़े काम की है ये गुस्सा मापक मशीन.
चंदू: अच्छा सर, ये बताएं कि आपने बुनकरों का लोन माफ़ करने का वादा किया है लेकिन और भी तो लोग़ हैं यूपी में जिनके लिए आप वादा कर सकते थे. जैसे किसान...
राहुल: बिलकुल कर देते हैं वादा. अरे चंदू जी वादा करना कौन सा कठिन काम है. आप कहिये तो हम पत्रकारों का लोन माफ़ करने का भी वादा कर देते हैं.
चंदू: आपके कहने का मतलब मैं समझा नहीं.
राहुल: ऐसी कौन सी कठिन बात कर दी मैंने? मेरा मतलब यह था कि पत्रकारों ने अगर लोन लिया हो तो हम उसे माफ़ करने का का वादा भी कर देते हैं. अरे भाई पत्रकार भी तो अपने प्रोफेशन के लिए कुछ न कुछ तो खरीदते ही होंगे. मसलन पेन, कागज़, डेस्क चेयर वगैरह वगैरह.
चंदू: अरे कहाँ सर. पत्रकार पेन खरीदते कहाँ हैं आजकल. वे तो पेन बेंचते हैं. रही बात डेस्क और चेयर की तो उन्हें आपलोगों की कृपा से कोई न कोई चेयर मिल ही जाती है.
राहुल: हाहाहा..ये सही कहा आपने. इसीलिए मैंने पत्रकारों का लोन माफ़ करने की बात नहीं की कभी.
चंदू: वैसे आपका प्रचार और किन मुद्दों पर है?
राहुल: खाने और पीने पर. मेरा मतलब आपने तो देखा ही होगा टीवी पर. मैं हमेशा इस बात को दोहरा-तिहरा रहा हूँ कि मैं गरीब के घर जाकर खाना खाता हूँ. उनके कुएं का पानी पीता हूँ. आपने और किसी पार्टी के नेता को खाते हुए देखा है? कैसे देखेंगे वे उतना नहीं खा पाते जितना मैं खाता हूँ.
चंदू: खाने-पीने के अलावा और किस बात पर केन्द्रित है आपका प्रचार?
राहुल: अभी खाने-पीने की अपनी बात मैंने पूरी कहाँ की? मेरा मतलब यह है कि देखिये अमीर आदमी का खाना तो कोई भी खा सकता है लेकिन गरीब आदमी का खाना खाने के लिए बहुत हाइ-क्लास की मैनेजेरियल स्किल्स चाहिए और वो सिर्फ मेरे पास है. खाने-पीने के अलावा मेरा प्रचार इस बात पर भी केन्द्रित रहता है कि आंकड़े क्या कहते हैं...मैं एक बार फिर से आंकड़ों पर आता हूँ. अब देखिये, अगर हमारी पार्टी ने आंकड़ों को महत्त्व नहीं दिया होता तो मेरे पिताजी का वो एक रुपया में से पंद्रह पैसे वाला विश्व प्रसिद्द बयान कहाँ से आता? आपको याद होगा उन्होंने ही पहली बार देश को बताया था कि एक रुपया चलता है तो आम जनता तक पंद्रह पैसे पहुँचते हैं.
चंदू: लेकिन राहुल जी, पंद्रह पैसे तो सन छियासी में पहुँचते थे. आज कितने पहुँचते हैं ये भी तो देखना होगा. उस पंद्रह पैसे को रिवाइज भी तो किया जाना चाहिए.
राहुल: वो हम करना चाहते थे लेकिन बात यहाँ आकर अटक गई कि अब कितने पैसे पहुँचते हैं? मेरा मानना है कि अब दस पैसे पहुँचते हैं. कुछ समझशास्त्री हमसे सहमत नहीं है. उनका मानना है कि अब सात पैसे पहुँचते हैं. इसलिए ये रिविजन वाला मामला अटका पड़ा है. हमने प्लानिंग कमीशन से कहा है कि वे समझशास्त्रियों से एक फिगर पर अग्री करें ताकि हम जनता को बता सकें कि अब रूपये में से कितने पैसे पहुँचते है? मुझे आशा है कि साल २०१४ के आम चुनावों तक आठ पैसे पर अग्रीमेंट हो जाएगा. एक बार अग्रीमेंट हुआ तो हम उसकी घोषणा करवा देंगे.
चंदू: तो आपको लगता है कि इस बार आपकी पार्टी यूपी में सरकार बना लेगी?
राहुल: बिलकुल बनाएगी. यूपीए से लोगों की नाराजगी यह है कि उसने केंद्र में पिछले आठ साल शासन करने के बावजूद देश के लिए कुछ बनाया नहि सिर्फ बिगाड़ा ही बिगाड़ा है. हम यूपी में सरकार बनाकर यह दिखाना चाहते हैं कि हमें केवल
बिगाड़ना ही नहीं बनाना भी आता है. हमें ढाई सौ सीटें ज़रूर मिलेंगी और हम सरकार बनायेंगे. आप देखेंगे कि यूपी में कांग्रेस ऐसे उठेगी इसबार.
इतना कहकर राहुल जी कुर्सी से उठ गए. उनके उठने के स्टाइल से चंदू भी कन्विंस हो गया कि कांग्रेस इस बार यूपी में उठ जायेगी. चंदू ने उनसे विदा ली. एक बड़े नेता इंटरव्यू लेने का उसका सपना पूरा हो चुका था.
नोट: चंदू द्वारा लिए गए राहुल जी के इंटरव्यू का यह संपादित वर्सन है. मुझे पता है कि ब्लॉग पर इंटरव्यू को संपादित करना ब्लॉग के मूल सिद्धांत के खिलाफ है लेकिन मैं क्या करता जब चंदू ने राहुल जी के सामने मुझे सम्पादक कहा तो.
Saturday, October 8, 2011
चंदू'ज एक्सक्लूसिव चैट विद पैरिस हिल्टन...

पैरिस हिल्टन भारत आईं. वैसे अब यह नॉर्मल बात हो गई है. कोई न कोई भारत आता ही रहता है. पैरिस नहीं आती तो ब्रिटनी आ जाती. ब्रिटनी नहीं आती तो अंजेलिना जोली आ जाती. अपने यहाँ आनेवालों की कमी नहीं है. पिछले साल इन्ही दिनों सुश्री पामेला एन्डरसन आई थीं. अभी हाल ही में शोएब अख्तर अपना किताबी मंजन बेंचने आये थे. उसके लिए उन्होंने सचिन को बिना कुछ दिए अपना ब्रांड अम्बेसेडर बना लिया. पैरिस भी आईं थीं कुछ बेंचने ही. पता चला बैग बेचने आई थीं.
मेरे कहने का मतलब यह था कि अब हम ऐसे कंज्यूमर देश हो चुके हैं कि आनेवाले लोगों की कमी नहीं है.
कई लोगों ने मुझसे कहा कि चंदू को भेजकर पैरिस हिल्टन का इंटरव्यू लूँ. अब मैं ठहरा ब्लॉगर. अगर अपने पाठकों के आदेश का पालन न करूं तो ब्लॉगर-धर्म का निर्वाह कैसे करूँगा? मैंने चंदू को मुंबई भेज तो दिया लेकिन इंटरव्यू लेकर आने में उसने काफी समय लगा दिया. वैसे तो उसने बताया कि वह मुंबई भ्रमण कर रहा था इसलिए देर हो गई लेकिन सूत्रों ने बताया कि उसने फिल्म निर्माताओं से मुलाक़ात की है. शायद फ़िल्मी लेखक बनने का प्लान है उसका.
खैर, पेश है चंदू इन एक्सक्लूसिव चैट विद पैरिस हिल्टन.
चंदू: पेरिश जी नमस्कार.
पैरिस हिल्टन: चंदू जी, पेरिश मत कहो न. पेरिश का मतलब कुछ और ही होता है. पेरिश कहने से लगता है जैसे में...
चंदू: (सकपकाते हुए) सॉरी सॉरी मैडम. मैं समझ गया. मुझको याद आ गया कि डिक्शनरी में पेरिश का मतलब सड़ जाना होता है. माफ़ कीजियेगा.
पैरिस हिल्टन: कोई बात नहीं.
चंदू: सबसे पहले तो ये बताइए मैडम कि इंडिया आकर कैसा लग रहा है?
पैरिस हिल्टन: चंदू जी, आप तो ब्लॉग पत्रकार हैं. आप तो कभी टीवी पत्रकार नहीं रहे. फिर भी आप "आपको कैसा लग रहा है" टाइप सवाल कर रहे हैं?
चंदू: वो क्या है मैडम कि यह सवाल भारतीय जर्नलिस्ट का शास्वत सवाल है. अगर यह पूछा न जाय तो इंटरव्यू की तो जाने दें, बाईट भी नहीं पूरी होती. वैसे मैडम जी, हम बहुत खुश हुए कि आपको हमारे बारे में इतना पता है. हम इमोशनल टाइप हो गए यह जानकर कि आपको हमारे बारे में भी पता है.
पैरिस हिल्टन: अरे चंदू जी, हमें पता नहीं रहेगा आपके बारे में? हम सब कुछ जांच-परख कर इंटरव्यू के लिए राजी होते हैं. अब आप यही देख लें कि एक अंग्रेजी ब्लॉग से रिक्वेस्ट आई थी कि हम उन्हें भी इंटरव्यू दें लेकिन हमने मना कर दिया. हमारे एजेंट ने बताया कि उस ब्लॉगर ने अपने ब्लॉग पर हमारे ऊपर पोस्ट लिखी है लेकिन फोटो लगाई है बिनोद काम्बली की. अब आप ही बताइए, यह ठीक है क्या? हमारे अमेरिका में लोग़ सुनेंगे तो क्या कहेंगे? और आपके बारे में कौन नहीं जानता? आपने हमारे प्रेसिडेंट का इंटरव्यू लिया था. ...वैसे अब मैं आपके सवाल का जवाब देती हूँ. इंडिया आकर मुझे बहुत अच्छा लग रहा है.
चंदू: यह अच्छी बात है मैडम. इंडिया आकर बाहरवालों को अब अच्छा ही लगता है. पहले की बात और थी जब बाहर वालों को इंडिया आने पर खराब के साथ-साथ कभी-कभी पत्थर तक लग जाता था.
पैरिस हिल्टन: अरे नहीं, हमें तो बहुत अच्छा लगा.
चंदू: वैसे इंडिया आने से पहले आपने क्या-क्या तैयारी की?
पैरिस हिल्टन: बहुत तैयारी की. बिना तैयारी के मैं कहीं नहीं जाती. दो दिन तो मैंने दोनों हाथ जोड़कर नमास्टे बोलने की प्रैक्टिस की. फिर दो दिन मैंने दो लाइन; "इंडिया इज अ ग्रेट नेशन.....वेस्ट ओ सो मच टू इंडिया" जैसे सेंटेंस याद किये. मेरे एजेंट ने तो कहा कि मैं गूगल करके महात्मा गांधी के बारे में भी जान लूं लेकिन उसदिन पार्टी में देर हो जाने के कारण मैं उसकी बात भूल गई.
चंदू: आप तो सचमुच बहुत तैयारी से आई हैं. वैसे मेरे मन में एक सवाल है पेरिश जी. आप असल में क्या हैं?
पैरिस हिल्टन: चंदू जी, पेरिश मत कहो न. पेरिश सुनने से लगता है...
चंदू: सॉरी सॉरी मैडम, मैं फिर से भूल गया. वैसे मेरा सवाल यह था कि आप क्या हैं? मॉडल हैं, टीवी एक्टर हैं, सिनेमा एक्टर हैं, होटल मालकिन हैं....आप हैं क्या? हम आपको क्या समझें?
पैरिस हिल्टन: गुड क्वेश्चन चंदू जी. वैसे ये बताइए कि आप मुझे समझना क्यों चाहते हैं?
चंदू: (सकपकाते हुए) वो अब मैं कैसे बताऊँ आपको? मेरा मतलब यह था हम क्या मानें कि आप क्या हैं?
पैरिस हिल्टन: यह तो बड़ा कठिन सवाल कर दिया आपने. आजतक हमें भी नहीं पता चला कि मैं क्या हूँ. दरअसल में खुद को खोज रही हूँ. इसीलिए मैं हमेशा बदलती रहती हूँ. अब किसे पता कि कौन से किरदार में खुद को खोज लूँ? इसीलिए मैं कभी ये बनती रहती हूँ तो कभी वो. आप समझ रहे हैं न? वैसे भी आप तो फिलास्फी और योगा के देश के हैं तो आशा है कि आपको मेरी बात समझ में आ गई होगी.
चंदू: हाँ-हाँ समझ में आ गई. आपकी बात समझ में आ गई. वैसे ये बताएं कि आप इस बार इंडिया क्यों आई हैं?
पैरिस हिल्टन: मैं बैग बेचने आई हूँ. मैंने एक बैग लॉन्च किया तो सोचा कि इसे इंडिया में बेंचा जाय.
चंदू: लेकिन आपको क्यों लगा कि इंडिया में आपका बैग बिक जाएगा?
पैरिस हिल्टन: वो अभी हाल ही में आपके फिनांस मिनिस्टर हमारे देश में थे. उन्होंने वहाँ बताया कि इंडिया एट प्वाइंट फाइव परसेंट से ग्रो करेगा. उनकी बात हमारे एजेंट ने कहीं सुन ली और हमसे बोला कि अगर ऐसा है तो सारा रुपया तो इंडिया में होगा. और अगर सारा रुपया इंडिया में होगा तो उसे रखने के लिए बैग की सबसे ज्यादा ज़रुरत इंडिया के लोगों को होगी. ऐसे में इंडिया मेरे बैग के लिए सबसे बड़ा मार्केट है.
चंदू: बहुत बढ़िया. और आप यहाँ आई हैं तो किस-किस से मिलना चाहेंगी आप?
पैरिस हिल्टन: मैं राखी सावंत से मिलना चाहूँगी. मैंने उनके बारे में बहुत सुना है. हमारे देश में मुझे लोग़ यूएस का राखी सावंत कहते हैं तो मैंने सोचा कि इस महान हस्ती से मिलना चाहिए मुझे. और मिलने की बात है तो मेरे पास सिमी गरेवाल के शो पर जाने की ऑफर आई थी लेकिन मेरे एजेंट ने जाने से मना कर दिया. मैंने सुना है कि उनके शो पर चाहे हमारे प्रेसिडेंट ओबामा भी चले जायें तो भी लोग़ सिमी गरेवाल को ही देखेंगे. अब आप ही बताएं कि ऐसे शो पर जाने का क्या फायदा?
चंदू: आपने बिलकुल सही कहा मैडम. एक बार क्या हुआ कि एक बहुत बड़ा टीवी पत्रकार, मैं नाम नहीं लेना चाहूँगा, वह सिमी गरेवाल के शो पर गया और वापस आकर मुँह लटका कर बैठ गया. तीन दिन तक घर से नहीं निकला. बाद में लोगों ने पूछ तो उसने बताया कि सिमी के शो पर लोग़ उसे नहीं बल्कि सिमी गरेवाल को देख रहे थे. आपने बिलकुल ठीक किया. वैसे एक सवाल यह था मैडम कि सुना कि आपने एक भिखारी को सौ डॉलर दिए? क्या यह सच है?
पैरिस हिल्टन: हाँ यह सच है.
चंदू: आपने भिखारी के साथ फोटो भी खिंचाया या नहीं?
पैरिस हिल्टन: चंदू जी, आपतो जानते ही हैं. मैंने उसके साथ फोटो खिंचाने के लिए ही तो उसे पैसे दिए. हमें हमारी फोटो बहुत प्यारी लगती हैं. और मैं अपने फोटो के लिए कुछ भी कर सकती हूँ.
चंदू: वैसे मैडम एक सवाल था. सुना है आप कन्वर्ट हो गई हैं और आपने इस्लाम धर्म क़ुबूल कर लिया है?
पैरिस हिल्टन: क़ुबूल तो हम कुछ नहीं करते चंदू जी. हाँ, कन्वर्ट हो सकते हैं. हे हे हे ....आप समझ रहे हैं न.
चंदू: हाँ-हाँ, मैडम मैं समझ गया. वैसे आख़िरी सवाल यह था कि आपन अगली बार कब आएँगी इंडिया? और क्या बेचने आएँगी?
पैरिस हिल्टन: हे हे हे..चंदू जी आप तो जानते ही हैं. हम अमेरिका वाले हैं. ऐसे में बेचने के लिए हमारे पास बहुत कुछ है. जब इच्छा हुई कुछ न कुछ बेंचने वापस आ जायेंगे.
चंदू: अगली बार आएँगी तो मैं मिलूंगा मैडम आपसे. फिर से ज़रूर इंटरव्यू दीजियेगा.
पैरिस हिल्टन: अरे चंदू जी, ज़रूर. आपके लिए तो मेरी...
चंदू: मेरी क्या? मेरी क्या मैडम? आपके लिए मेरी क्या?
पैरिस हिल्टन: अरे अरे...मेरा मतलब यह था कि आपके लिए मेरी इंटरव्यू भी हाज़िर है.
चंदू: मेरी इंटरव्यू नहीं मैडम, मेरा इंटरव्यू. ओके मैडम आपको धन्यवाद.
पैरिस हिल्टन: ओके धान्यवाद. नमास्टे.
Wednesday, July 27, 2011
एक मुलाक़ात सुरेश कलमाडी के साथ
पत्रकारिता केवल वह नहीं होती जो टीवी न्यूज़ स्टूडियो में बैठकर की जाती है. पत्रकारिता वह भी होती है जो फील्ड में रहकर की जाती है. अब हमारे चंदू को ही ले लीजिये. उधर सुरेश कलमाडी जी को डिमेंसिया यानि भूलने की बीमारी की खबर आई और इधर चंदू को बेचैनी की बीमारी ने घेर लिया. बेचैन रहने लगा कि सुरेश कलमाडी जी का इंटरव्यू किसी भी तरह से लेकर आये. मैंने कहा; "वे जेल में बंद हैं. वहाँ इंटरव्यू नहीं लिया जा सकेगा"
वह बोला; "जेल से फिरौती का धंधा चल सकता है, जेल से राजनीति चल सकती है, कलमाडी जी जेल में रहकर अपने एमपी फंड से चेक काट सकते हैं तो फिर जेल में इंटरव्यू क्यों नहीं लिया जा सकता?"
मैंने कहा; "मेरी तो कोई जान-पहचान नहीं है कि मैं किसी को कहकर उनके इंटरव्यू का इंतज़ाम करवा सकूँ. तुम्हारी कोई जान-पहचान हो तो तुम जाओ."
चंदू बोला; "एक बार मैंने तिहाड़ में एक हवलदार की हेल्प से एक स्वामी जी का इंटरव्यू लिया था. उसी को फिर से पटाते हैं."
इतना कहकर चला गया. कल शाम को लौटा तो हाथ में कलमाडी का इंटरव्यू था. पेपर देते हुए बोला; "सुबहे ब्लॉग पर छाप दीजिये नहीं तो कोई न्यूज़ चैनल इसी को एक्सक्लूसिव बताकर दिखा देगा."
तो मैं चंदू द्वारा लिया गया कलमाडी जी का इंटरव्यू छाप रहा हूँ. आप बांचिये.
चंदू: कलमाडी जी, सुना है आप डिमेंसिया के शिकार हो गए हैं?
कलमाडी: ये डिमेंसिया क्या होता है?
चंदू: (धीरे से) लगता है सही में शिकार हो गए हैं.
कलमाडी : आपने कुछ कहा?
चंदू: नहीं-नहीं, मैंने कुछ कहा नहीं. मैं यह पूछ रहा था कि आपको कब लगा कि आपकी याददाश्त जा रही है?
कलमाडी: मुझे नहीं लगा. दस दिन पहले मेरे वकील ने बताया कि मेरी याददाश्त धीरे-धीरे चली जा रही है.
चंदू: लेकिन याददाश्त तो आपकी है. उन्हें कैसे पता चला?
कलमाडी: क्या कैसे पता चला?
चंदू: (धीरे से बुदबुदाते हुए) लगता है सही में गए...नहीं मैं पूछ रहा था कि याददाश्त तो आपकी पर्सनल है, आपके वकील को कैसे पता चला कि वो खो रही है.
कलमाडी: अच्छा, वो पूछ रहे हैं. वो हुआ ऐसा कि मैंने उनकी फीस का जो चेक दिया उसमें तारीख गलत लिख दी. उसे देखकर वे बोले कि मैं डिमेंसिया का शिकार हो गया हूँ.
चंदू: केवल तारीख गलत लिख देने से वे इस नतीजे पर पहुँच गए.
कलमाडी: कौन पहुँच गया?
चंदू: वही, आपके वकील साहब.
कलमाडी: कहाँ पहुँच गए?
चंदू: सर, आप मेरी बात समझ नहीं रहे हैं. आपकी बात सुनकर लग रहा है कि आप मेरा इंटरव्यू ले रहे हैं. मैं यह कह रहा था कि चेक पर केवल तारीख गलत लिख देने से वकील साहब मान गए कि आप डिमेंसिया के शिकार हो गए हैं?
कलमाडी: हाँ, ऐसा ही तो हुआ. वैसे भी वकील कुछ भी मान सकते हैं और कुछ भी मनवा सकते हैं.
चंदू: और कोई घटना ऐसी हुई क्या जिससे लगे कि आप डिमेंसिया के शिकार हो गए हैं?
कलमाडी: मैं तो नहीं मान रहा था लेकिन वकील साहब ने ही बताया कि एक घटना हाल में ही घटी जिससे मेरी याददाश्त के खो जाने की बात साबित होती है.
चंदू; कौन सी घटना?
कलमाडी: वकील साहब ने ही याद दिलाया कि मैं उस दिन जेलर के आफिस में बैठकर जो चाय, बिस्कुट और नमकीन उड़ा रहा था वह भी डिमेंसिया की वजह से ही हुआ होगा.
चंदू: वह कैसे?
कलमाडी: उनका मानना है कि डिमेंसिया के चलते ही मैं जेलर के आफिस को अपना घर समझ बैठा.
चंदू: लेकिन मैंने तो यह भी सुना है कि आप जेल में ही रहते हुए अपने एमपी फंड से खर्च भी कर रहे हैं.
कलमाडी: उसको लेकर भी वकील साहब ने साबित कर दिया कि एमपी फंड से खर्च करना इस बात को साबित करता है कि मैं सच में डिमेंसिया का शिकार हो गया हूँ.
चंदू: वह कैसे?
कलमाडी: एक दिन वकील साहब ने बताया कि मैं यह भूल गया हूँ कि मैं एमपी भी हूँ और मेरा एमपी फंड खर्च के लिए तरस रहा है. उनके याद दिलाने के बाद कि मैं एक एमपी हूँ, मैंने अपने फंड से खर्च करना शुरू किया.
चंदू: लेकिन मुझे तो लगता है कि डिमेंसिया आपका कानूनी दाव-पेंच है खुद को बचाने के लिए.
कलमाडी: मिस्टर अरनब गोस्वामी आप मेरे ऊपर ऐसे आरोप लगाकर गलती कर रहे हैं. मैं वार्निंग दे रहा हूँ कि अगर एक बार और आपने ऐसा आरोप लगाया तो मैं आपके खिलाफ और आपकी टाइम मैगजीन के खिलाफ आदालत में डिफेमेशन केस फाइल कर दूंगा.
चंदू: सर जी, मैं अरनब गोस्वामी नहीं हूँ. मैं चंदू चौरसिया हूँ. और बाइ द वे, अरनब गोस्वामी टाइम मैगजीन में काम नहीं करते वे टाइम्स नाउ चैनल के पत्रकार हैं.
कलमाडी: ओह, मैं तो भूल ही गया था. देखिये ये डिमेंसिया का ही असर होगा.
चंदू: आपके वकील साहब को क्या लगता है? क्या आपकी यह डिमेंसिया वाली बात सचमुच ठोस है?
कलमाडी: क्या ठोस है?
चंदू: मैं पूछ रहा था कि यह डिमेंसिया वाली बात क्या साबित कर पायेंगे आप और आपके वकील साहब?
कलमाडी: हाँ, बिलकुल कर पायेंगे. दरअसल मेरी खराब होती याददाश्त और अपनी तेज याददाश्त के सहारे मेरे वकील साहब फिर साल २००९-१० में गए. उन्होंने मुझे याद दिलाया कि गेम्स ओर्गेनाइजिन्ग कमिटी का चीफ होने के बावजूद मैंने समय पर तैयारी नहीं की. दरअसल मैं भूल जाता था कि मुझे तैयारी करनी है. फिर उन्होंने याद दिलाया कि मैंने इंडियन हाइ कमीशन के डोक्यूमेंट फोर्ज करने के बाद भी लोगों को बताया कि मैंने डोक्यूमेंट फोर्ज नहीं किया. यह डिमेंसिया की वजह से ही था. फिर उन्होंने याद दिलाया कि सारे फैसले मैंने लिए लेकिन याददाश्त ख़राब होने के कारण मैंने दरबारी, महेन्द्रू वगैरह को फँसा दिया. फिर उन्होंने बताया कि........सबसे अंत में उन्होंने बताया कि इन सारी बातों की वजह से मुझपर डिमेंसिया का केस तो बनता ही बनता है.
चंदू: मतलब आपकी तैयारी फूल-प्रूफ है.
कलमाडी: अपनी तरफ से तो तैयारी फूल-प्रूफ ही रहती है. अरनब गोस्वामी जी, चलिए अब इंटरव्यू ख़त्म कीजिए मुझे मूवी देखना है. वकील साहब ये सीडी दे गए थे. देखने के लिए कहा है. हाँ, आपकी टाइम मैगजीन के जिस एडिशन में यह इंटरव्यू छापेंगे उसकी एक कॉपी ज़रूर भेज दीजियेगा.
चंदू: सर जी, मैं अरनब गोस्वामी नहीं हूँ. बाइ द वे, अरनब गोस्वामी टाइम मैगजीन के नहीं बल्कि टाइम्स नाउ टीवी चैनल के पत्रकार हैं.
कलमाडी: वकील साहब ठीक ही कहते हैं. मैं सच में डिमेंसिया का शिकार हो गया हूँ. ठीक है, आप जाइए. मैं मूवी देखने जाता हूँ.
चंदू ने सीडी हाथ में लेकर देखा तो वह आमिर खान की फिल्म गजनी की सीडी थी. उधर कलमाडी जी गज़नी एन्जॉय करने गए और इधर चंदू जेल से बाहर.
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उतरा है रामराज विधायक निवास में
पक्के समाजवादी हैं, तस्कर हों या डकैत
इतना असर है ख़ादी के उजले लिबास में
आजादी का वो जश्न मनायें तो किस तरह
जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में
पैसे से आप चाहें तो सरकार गिरा दें
संसद बदल गयी है यहाँ की नख़ास में
जनता के पास एक ही चारा है बगावत
यह बात कह रहा हूँ मैं होशो-हवास में
---अदम गौंडवी
Monday, November 8, 2010
बराक ओबामा इन एक्सक्लूसिव चैट विद चंदू चौरसिया
पत्रकारिता मेहनत का काम है. ईमानदारी का काम है. अब देखिये न, बड़े-बड़े पत्रकार अपने टीवी स्टूडियो में बैठे-बैठे ही एनालिसिस करते रह गए लेकिन असली पत्रकार राष्ट्रपति ओबामा से मिलकर उनका इंटरव्यू निकाल लाया. ज़ी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ हमारे ब्लॉग पत्रकार चंदू चौरसिया की.
चंदू ने मुझे एक महीना पहले ही भरोसा दिलाया था कि चाहे जो हो जाए, वह बराक ओबामा ज़ी का इंटरव्यू लेकर रहेगा. मेहनती इतना कि पाँच तारीख से ही आगरा में डेरा जमाये था. सुबह से ही ताजमहल के सामने वाले दरवाजे पर पेन और पेपर लेकर बैठ गया. जब शाम तक ओबामा ज़ी नहीं निकले तो उसने सोचा कि कोई न कोई लफड़ा है. पूछताछ करने पर पता चला कि ओबामा ज़ी छ तारीख को आयेंगे और आगरा वाले ताजमहल में नहीं बल्कि मुंबई वाले ताजमहल में रहेंगे.
यह भी पता चला कि वे मुंबई से सीधा दिल्ली आयेंगे तो चंदू ने निश्चय किया कि वह अब दिल्ली में ही इंटरव्यू लेगा. मुंबई नहीं गया. नहीं जाने का एक कारण और भी था, उसे डर था कि मुंबई जाने के बाद उसके मन में कहीं हीरो बनने का लालच न आ जाए. उसने अपना जीवन पत्रकारिता को समर्पित कर दिया है इसलिए अब हीरो बनने में उसे शर्म आती है.
आज सुबह ही दिल्ली से कोलकाता पहुँचा. मैं इंटरव्यू टाइप कर दे रहा हूँ. आप बांचिये.
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चंदू: गुड ईविनिंग सर. वेलकम तो आवर इंटरव्यू, सर.
ओबामा: चंदू ज़ी, अंग्रेजी में बात क्यों कर रहे हैं? अरे भाई मुझे हिंदी आती है.
चंदू: सर! ये तो चमत्कार हो गया. आपको हिंदी आती है? कहाँ सीखी, सर?
ओबामा: हाँ भाई, मुझे हिंदी आती है. मैं अमेरिका का प्रेसिडेंट हूँ. और आपको बता दूँ कि अमेरिका का प्रेसिडेंट कुछ भी कर सकता है. यहाँ तक कि हिंदी भी सीख सकता है. भाई व्यापार करने निकला हूँ भाषा का ज्ञान नहीं रहेगा तो व्यापार कैसे होगा? वैसे आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि मैंने हिंदी सीखने के लिए टेली-शॉपिंग का महागुरु हिंदी स्पीकिंग कोर्स खरीदा और हिंदी सीख ली.
चंदू: अरे सर, आपने तो हमारी मुँह की बात छीन ली. बहुत बढ़िया कोर्स है सर.
ओबामा: अच्छा, क्या आपने भी हिंदी वहीँ से सीखी है?
चंदू: नहीं सर. हमने तो महागुरु के कोर्स से अंग्रेजी सीखी है. वैसे सर, यह बताइए कि आपने हिंदी कब और क्यों सीखी?
ओबामा: जब मैं प्रेसिडेंट बना तभी मैंने निश्चय किया कि मुझे हिंदी सीखनी है. साल २००८ में मैंने आपके तत्कालीन विदेशमंत्री द्वारा अंग्रेजी में दिया गया भाषण सुना. भाषण ख़त्म होने के बाद मैंने उसी अंग्रेजी भाषण का अंग्रेजी ट्रांसलेशन माँगा. उसे पढ़ने के बाद मैंने अपने अफसरों के साथ मीटिंग की और यह तय किया हिंदी सीखकर झमेला ख़तम किया जाय और भारतीय नेताओं के साथ हिंदी में ही बात कर ली जाय.
चंदू: सर, यह बताइए कि आप अभी अपने देश का मध्यावधि चुनाव हार गए हैं. क्या आप अपने पद से इस्तीफ़ा देंगे?
ओबामा: पद से इस्तीफ़ा? क्यों? मैं मिड-टर्म इलेक्शन हारा हूँ, उसके लिए इस्तीफ़ा क्यों दूँ?
चंदू: दरअसल सर, आपको इस्तीफ़ा देने की ज़रुरत नहीं है. मैंने यह सवाल तो पत्रकार धर्म का पालन करने के लिए पूछा है. हमारे देश में जब कोई सरकार मिड-टर्म इलेक्शन हारती है तो विपक्ष और पत्रकार दोनों उसके इस्तीफे की बात करते हैं. यह अलग बात है कि सरकार इस्तीफ़ा नहीं देती.
ओबामा: अच्छा यह बात है? आपके देश के पत्रकार तो बहुत अच्छे हैं.
चंदू: हाँ सर. एक से बढ़कर एक हैं. वैसे मेरा आपसे अगला सवाल है कि आप भारत क्यों आये? आपके आने का उद्देश्य मेरे लिए जानना इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि कुछ लोग़ कह रहे हैं कि इतने सारे लोगों को भारत लेकर आये हैं इतने बड़े-बड़े व्यापार समझौते किये आपने जिसे देखकर लगता है जैसे आप साल २०१२ के लिए अपना चुनाव प्रचार मुंबई से शुरू कर रहे हैं.
ओबामा: नहीं-नहीं यह सच नहीं है. मैं यहाँ चुनाव प्रचार करने नहीं आया हूँ. दरअसल मैं यहाँ कुछ और अजेंडा लेकर आया हूँ.
चंदू: मैं आपकी बात मान गया सर. वैसे भी अगर आप चुनाव प्रचार करते तो आपके साथ हमारी फिल्म इंडस्ट्री का कोई न कोई हीरो अवश्य होता. वैसे आपका अजेंडा क्या है सर?
ओबामा: देखिये ऐसा है कि अमेरिका में तो मैं गाँधी ज़ी को कई बार महान बता चुका हूँ. अपने देश में भाषण देते हुए मैं कई बार भारत को इकॉनोमिक पावरहाउस बता चुका हूँ. कई बार आपके प्रधानमंत्री को मैं महान बता चुका हूँ. मैंने सोचा कि क्यों न यही बातें भारत में की जाएँ. उससे मेरी ईमेज भी बढ़िया होगी और आपके प्रधानमंत्री की ईमेज में भी चार चाँद लग जायेंगे.
चंदू: वैसे सर, मेरा अगला सवाल यह है कि आप पाकिस्तान को मदद पर मदद दिए जा रहे हैं. जिस पाकिस्तान में आपको सैनिक झोंकने चाहिए उसमें आप डालर झोंके जा रहे हैं. ऐसा क्यों?
ओबामा: मुझे पता था कि आप कभी न कभी यह सवाल पूछेंगे. देखिये पाकिस्तान पूरे विश्व के लिए बहुत महत्वपूर्ण है. अमेरिका भी पूरे विश्व के लिए महत्वपूर्ण है. ऐसे में एक महत्वपूर्ण देश का धर्म बनता है कि वह दूसरे महत्वपूर्ण देश के लिए कुछ करे...... भारत एक उभरता हुआ इकॉनोमिक पॉवर हाउस है. दक्षिणी पूर्वी एशिया में ही नहीं भारत का विश्व के मंच पर एक अपना रोल है. भारत आनेवाले समय में पूरी दुनियाँ को विकास का रास्ता दिखा सकता है. आज के विश्व में भारत का जो स्थान है वह उसे मिलना चाहिए. मैं जब प्रधानमंत्री श्री सिंह से पहली बार मिला था तभी मैंने उन्हें बताया था कि मैं उनका बहुत बड़ा फैन हूँ. मुंबई में रहकर मैंने जो महसूस किया वह यह है कि आनेवाले समय में भारतीय युवा अपन रोल बखूबी समझता है. देखने वाली बात यह है कि......
चंदू: सर, आप मेरे सवाल का जवाब नहीं दे रहे हैं.
ओबामा: आपके सवाल का उचित जवाब यही है जो मैंने दिया है. अगर आपको कोई और जवाब सुनना है तो फिर मैं सच बता देता हूँ. देखिये हमारे देश में डालर प्रिंट करने वाले प्रेस अभी ओवरटाइम काम कर रहे हैं. जब हम टार्गेट से ज्यादा डालर प्रिंट कर लेते हैं तो उसमें से कुछ पाकिस्तान को दे देते हैं. हमारे यहाँ रखने की भी दिक्कत होती है न.
चंदू: अच्छा सर यह बताइए कि आप इतने बड़े-बड़े सीईओ को लेकर आये हैं. व्यापार समझौते के अलावा और किन मुद्दों पर पर समझौता करना चाहेंगे?
ओबामा: बहुत सारे और क्षेत्र हैं जिनमें भारत और अमेरिका को एक साथ आने की ज़रुरत है. मैं प्रधानमंत्री श्री सिंह से कहूँगा कि व्यापार के अलावा सांस्कृतिक क्षेत्र में भी समझौते हों. जैसे कि ढेर सारे अमेरिकी टीवी प्रोग्राम की नक़ल करके आपके देश में प्रोग्राम चल रहे हैं. मेरा मानना है कि हमारे देश की टीवी इंटरटेनमेंट को और ज्यादा से ज्यादा भारत में दिखाया जा सके तो बढ़िया रहेगा. आपके हिंदी न्यूज चैनल जिस तरह से कानपुर, मेरठ, दिल्ली, सहारनपुर जैसी जगहों के आपराधिक मामले दिखाते हैं वैसे ही अब वे न्यूयार्क, लास वेगास और लास एंजेलिस के आपराधिक मामले दिखा सकते हैं. जैसे वे रामपुर, बदलापुर, नजफगढ़ जैसी जगहों के भूत-प्रेत, चुड़ैल, जिन्न आदि की कहानियां दिखाते हैं वैसे ही वे अमीरीक भूत-प्रेत, चुड़ैल वगैरह........जैसे वे राखी सावंत, सम्भावना सेठ और डाली बिंद्रा के किस्सों वाले प्रोग्राम्स दिखाते हैं वैसे ही वे अब ब्रिटनी स्पीयर, पेरिस हिल्टन वगैरह के प्रोग्राम्स दिखायें.
चंदू: अरे सर, आप राखी सावंत और डाली बिंद्रा को भी जानते हैं?
ओबामा: उन्हें कौन नहीं जानता? ह्वाईट हाउस का मेरा स्टाफ बिग बॉस और राखी का इन्साफ जैसे प्रोग्राम का बहुत बड़ा फैन है.
चंदू: दोनों देशों के बीच और किस तरह के सांस्कृतिक आदान-प्रदान हो सकते हैं सर?
ओबामा: मेरा मानना है कि एक क्षेत्र और है जिसमें सांस्कृतिक आदान-प्रदान की अद्भुत सम्भावना है. मुझे लगता है कि अगर भारतीय ज्योतिषाचार्य लोग़ अमेरिका में अपनी सर्विस दें तो यह अमेरिका के लिए बहुत अच्छा रहेगा. मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूँ कि हमारे देशवासियों का अब हमारे इकॉनोमिस्ट में विश्वास नहीं रहा. ऐसे में हम देश की आर्थिक समस्याओं को सॉल्व करने के लिए ज्योतिष का सहारा ले सकते हैं. दरअसल ऐसा है कि अब हमारे देश के इकॉनोमिस्ट इकॉनोमी के बारे में सही भविष्यवाणी नहीं कर पा रहे हैं. आपके देश के ज्योतिषी लोग़ हमारे बहुत काम आ सकते हैं. मुंबई में ताजमहल होटल में मैंने कुछ न्यूजपेपर देखे जिनमें आपके ज्योतिषी लोगों की भविष्यवाणियाँ पढ़ने को मिलीं जिनमें बताया गया था कि चन्द्र, सूर्य, राहु-केतु वगैरह का देश के शेयर बाज़ार पर क्या असर पड़ता है? खासकर मेटल ट्रेडिंग पर ग्रहों के प्रभाव के बार में जानकार मुझे बहुत अच्छा लगा. मैंने अपने सलाहकारों से बात कर ली है और आशा करता हूँ कि जल्द ही आपके ज्योतिषी हमारे देश के गोल्डमैन सैक्श और मेरिल लिंच को अपनी सर्विस देंगे. वैसे भी हमारे इन्वेस्टमेंट बैंकर आपके ज्योतिषियों के आगे नहीं ठहरते. मेरा....
चंदू: सर, भारतीय पत्रकारिता का आपका अनुभव कैसा रहा?
ओबामा: बहुत बढ़िया रहा. आपके पत्रकारों ने मुझे जो इज्ज़त दी, उतनी तो मैं भी खुद को नहीं देता. मैं सोच रहा था कि आपके देश से कुछ पत्रकारों को मैं अपने साथ अमेरिका ले जाऊं. पिछले कुछ न्यूज प्रोग्राम देखकर मैं इस नतीजे पर पहुँचा हूँ कि अगर आपके अंग्रेजी पत्रकार हमारे देश में होते तो ग्राउंड जीरो पर मस्जिद बनने में मुझे कोई दिक्कत नहीं आती. मैं बरखा दत्त ज़ी से बहुत प्रभावित हूँ. और अरनब....मुझे आपका राष्ट्रीय चैनल इंडिया टीवी देखकर बहुत ख़ुशी हुई.
चंदू: अच्छा सर, यह बताएं कि आपकी अफगानिस्तान नीति अब क्या होगी? खासकर तब जब आप मिड-टर्म इलेक्शन हार गये हैं?
ओबामा: देखिये अफगानिस्तान में हम सफल रहे हैं. दो साल पहले तक जिस देश में गुड तालिबान और बैड तालिबान थे वहाँ अब केवल तालिबान है. ऐसे में कहा जा सकता है हम सफल रहे हैं. हम तालिबान से बात कर रहे हैं. हाँ, अब हमें यह तय करने में दिक्कत आ रही है कि असली तालिबान कौन है? हामिद करजई या हक्कानी? लेकिन सी आई ए ने केस हाथ में ले लिया है. हम जल्द ही पता लगा लेंगे कि....
चंदू: सर, मेरा एक सवाल और है कि...
ओबामा: बस-बस चंदू ज़ी बस. बाहर आपके सरकारी राष्ट्रीय चैनल इंडिया टीवी के पत्रकार भी इंतजार कर रहे हैं. उन्हें भी तो मौका मिलना चाहिए.
चंदू: अरे, सर, आप नाम पर न जाएँ. इंडिया टीवी का मतलब सरकारी टीवी नहीं है....
ओबामा: लेकिन नाम तो...
चंदू: अरे सर, नाम से धोखा हो जाता है. अब देखिये न पकिस्तान के एक नेता हैं नवाज़ शरीफ...शराफत नाम में भी है लेकिन क्या वे...
ओबामा: हा हा हा...
चंदू: अच्छा सर, नमस्कार. आपने इतना समय दिया. उसके लिए आपको धन्यवाद.
ओबामा: धन्यवाद.

