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Monday, January 3, 2011

एक अधूरा इंटरव्यू




डॉक्टर विनायक सेन की सजा पर टीवी पैनल डिस्कशन किये जा रहे हैं. इनपर कुछ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को बोलते हुए देखकर मुझे नरोत्तम कालसखा ज़ी याद आ गए. उनका इंटरव्यू फिर से प्रकाशित कर देता हूँ. आपने अगर पहले नहीं बांचा है तो बांचिये.

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नरोत्तम कालसखा बहुत बड़े मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं. बड़े से मेरा मतलब काफी लम्बे हैं. कह सकते हैं ये मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के शिरोमणि हैं. वैसे तो ये और भी काम करते हैं लेकिन इनका जो सबसे प्रिय काम है वो है इन्टरव्यू देना और पैनल डिस्कशन में भागीदार बनना. इन्टरव्यू देने में तो इन्होने हाल ही में विश्व रिकॉर्ड बनाया हैं.

प्रस्तुत है उनका एक इन्टरव्यू.

पत्रकार: नमस्कार कालसखा जी. धन्यवाद जो आपने अपना बहुमूल्य समय इन्टरव्यू के लिए निकाला.

नरोत्तम जी: धन्यवाद किस बात का? हमें इन्टरव्यू देने के अलावा काम ही क्या है? हमें तो इन्टरव्यू देना ही है. आपको पता है कि नहीं, मैंने हाल ही में इन्टरव्यू देने का विश्व रिकॉर्ड बनाया है?

पत्रकार: हाँ हाँ. वो तो पता है मुझे. इसीलिए मैंने सोचा कि जब तक मैं आपका इन्टरव्यू नहीं लूँगा मेरा पत्रकार जीवन धन्य नहीं होगा.

नरोत्तम जी: ठीक है. ठीक है. आप इन्टरव्यू शुरू करें. मुझे इन्टरव्यू ख़त्म करके अपने कॉलेज में एक भाषण देने जाना है.

पत्रकार: ज़रूर-ज़रूर. तो चलिए, पहला सवाल इसी से शुरू करते हैं कि कौन से कॉलेज में थे आप?

नरोत्तम जी: मैं सेंट स्टीफेंस में था.

पत्रकार: वाह! वाह! ये तो बढ़िया बात है. दिल्ली में सेंट स्टीफेंस वाले छाये हुए हैं. वैसे एक बात बताइए. आप सेंट स्टीफेंस के हैं उसके बावजूद आप न तो सरकार में हैं और न ही पत्रकार. ऐसा क्यों?

नरोत्तम जी: हा हा...गुड क्वेश्चन. ऐसा तो मेरी सबसे अलग सोच के कारण हुआ. मैंने सोचा कि सेंट स्टीफेंस वाले सभी सरकार में जाते हैं या फिर पत्रकार बन जाते हैं. मुझे अगर सबसे अलग दिखना है तो मैं मानवाधिकार में चला जाता हूँ. वैसे भी मानवाधिकार वाला सबके ऊपर भारी पड़ता है. सरकार के ऊपर भी और पत्रकार के ऊपर भी. वैसे आप भी तो पत्रकार हैं. आप भी क्या सेंट स्टीफेंस के....

पत्रकार: नहीं साहब नहीं. मैं तो माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय की पैदाइस हूँ.

नरोत्तम जी: वही तो. मैं भूल ही गया कि आप हिंदी के पत्रकार हैं. ऐसे में सेंट स्टीफेंस के...

पत्रकार: हा हा हा..सही कहा आपने. वैसे ये बताइए कि आपसे लोगों को यह शिकायत क्यों रहती है कि आप केवल आतंकवादियों, नक्सलियों या फिर अपराधियों का पक्ष लेते हैं? जब किसी निरीह आम आदमी की हत्या होती है, आप उस समय कुछ नहीं कहते. कहीं दिखाई नहीं देते?

नरोत्तम जी: देखिये भारत में सत्तर प्रतिशत से ज्यादा लोगों की प्रति दिन आय नौ रुपया अड़तालीस पैसा से ज्यादा नहीं है. साढ़े सत्ताईस करोड़ लोग प्रतिदिन केवल एक वक्त का खाना खा पाते हैं. आजादी से लेकर अब तक कुल सात करोड़ चौसठ लाख तेरह हज़ार पॉँच सौ सत्ताईस लोग सरकारी जुर्म का शिकार हुए हैं. आंकड़े बताते हैं कि.....

बोलते-बोलते अचानक नरोत्तम जी जोर-जोर से बोलने लगे. बोले; "पहले मेरी बात सुनिए आप. मुझे बोलने दीजिये पहले. मेरी बात नहीं सुननी तो मुझे बुलाया ही क्यों?"

पत्रकार भौचक्का. उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि नरोत्तम जी को अचानक यह क्या हो गया? घबराते हुए वह बोला; "सर, आप ही तो बोल रहे हैं. मैंने तो आपको बोलने से बीच में रोका नहीं."

अचानक नरोत्तम जी को याद आया कि वे पैनल डिस्कशन में नहीं बल्कि इंटरव्यू के लिए बैठे हैं. लजाने की एक्टिंग करते हुए बोले; "माफ़ कीजियेगा, मैं भूल गया कि मैं पैनल डिस्कशन में नहीं बल्कि इंटरव्यू के लिए बैठा हूँ."

पत्रकार: चलिए कोई बात नहीं. लेकिन आपने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया. मेरा सवाल यह था कि लोगों को शिकायत रहती हैं कि....

नरोत्तम जी: मैं आपके सवाल का ही जवाब दे रहा था.डब्लू एच ओ की एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले चार साल आठ महीने और सात दिन में कुल सात लाख पचहत्तर हज़ार चार सौ नौ लोग सरकारी आतंकवाद का शिकार हुए हैं. नए आंकड़ों के अनुसार....

पत्रकार: डब्लू एच वो? आपके कहने का मतलब वर्ल्ड हैल्थ आरगेनाइजेशन?

नरोत्तम जी: नहीं-नहीं. डब्लू एच ओ से मेरा मतलब था वुडमंड ह्युमनराइट्स आरगेनाइजेशन. आपको इसके बारे में नहीं पता? यह अमेरिका का सबसे बड़ा ह्यूमन राइट्स आरगेनाइजेशन है.

पत्रकार: लेकिन आपको लगता है कि अमेरिका का कोई आरगेनाइजेशन भारत में होने वाली घटनाओं पर इतनी बारीक नज़र रख पायेगा? खैर, जाने दीजिये. आप ने अभी भी मेरे मूल सवाल का जवाब नहीं दिया.

नरोत्तम जी: मैं वही तो कर रहा था..... मैं ये कह रहा था कि सरकारी आतंकवाद को रोकने के लिए हम प्रतिबद्ध है. हमारा जीवन इसी रोक-थाम के लिए समर्पित है.

पत्रकार: लेकिन आप उनको क्या कहेंगे जो पुलिस वालों को मारते हैं? जो आम आदमी को आतंकित करके रखते हैं? क्या वे आतंकवादी नहीं हैं?

नरोत्तम जी: देखिये, आतंकवाद को परिभाषित करना पड़ेगा. आतंकवाद क्या है? ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के अनुसार टेरोरिज्म इज अ कंडीशन व्हिच...

पत्रकार: सर, आप क्या आतंकवाद की परिभाषा अब डिक्शनरी से देना चाहते हैं?

नरोत्तम जी: हमारे पास सारे तथ्य पूरे प्रूफ़ के साथ रहते हैं. आप अगर सुनना नहीं चाहते हैं तो फिर हमें बुलाया क्यों?

पत्रकार: अच्छा कोई बात नहीं. आप यह बताइए कि सरकार के कदम के खिलाफ ही क्यों बोलते हैं आप?

नरोत्तम जी: सरकार के कदम इसी लायक होते हैं. साठ साल हो गए देश को आजाद हुए. लेकिन सरकार ने केवल निरीह लोगों के ऊपर अत्याचार किया है. विकास के कार्य को हाथ नहीं लगाया. विकास के सरकारी आंकड़े फर्जी हैं. शिक्षा का कोई विकास नहीं हुआ. उद्योगों के विकास के आंकड़े पूरी तरह से फर्जी हैं...आज नक्सल आन्दोलन को निरीह और पूअरेस्ट ऑफ़ द पूअर का समर्थन क्यों मिल रहा है?

पत्रकार: लेकिन नक्सल आन्दोलन को क्या केवल निरीह लोगों का ही समर्थन मिल रहा है? वैसे एक बात बताइए, इन निरीहों के पास ऐसे अत्याधुनिक हथियार कहाँ से आते हैं?

नरोत्तम जी: सब बकवास है. सब सरकारी प्रोपेगैंडा है. नक्सल आन्दोलन में शरीक लोग आदिवासी हैं. इनके पास हथियारों के नाम केवल धनुष-वाण और किसी-किसी के पास कटार है. इससे ज्यादा कुछ नहीं. आधुनिक हथियारों की बात झूठी है. सरकार की फैलाई हुई.

पत्रकार: आपके हिसाब से अत्याधुनिक हथियारों की बात सरकार ने एक प्रोपेगैंडा के तहत फैलाया है?

नरोत्तम जी: बिलकुल. आप अपना दिमाग लगायें और सोचें कि जिन गरीबों के पास खाने को रोटी नहीं है वे ऑटोमेटिक राइफल कहाँ से खरीदेंगे? कोई बैंक लोन देता है क्या इसके लिए?

पत्रकार: चलिए मान लेता हूँ कि ये हथियार नहीं हैं उनके पास. लेकिन कई बार देखा गया है कि ये लोग पुलिस वालों को बेरहमी से कत्ल कर देते हैं. कल रांची में नक्सलियों द्बारा एक इंसपेक्टर की हत्या कर दी गई. आप क्या इसे आतंकवाद नहीं मानते?

नरोत्तम जी: आपके पास क्या सुबूत है कि उस इंसपेक्टर की हत्या नक्सलियों ने की है? सब सरकार का फैलाया गया प्रोपेगैंडा है. देखिये आज से पंद्रह साल पहले तक अट्ठाईस हज़ार चार सौ पैंतीस लोगों से कुल सात हज़ार नौ सौ तेरह एकड़ जमीन छीन ली गई थी जिसपर कुल तिरालीस हज़ार आठ सौ पंद्रह क्विंटल अनाज पैदा होता था. इसमें से बारह हज़ार तीन सौ उन्नीस क्विंटल अनाज खाने के काम आता था और बाकी.....एक अनुमान के हिसाब से सरकार ने कुल उनतालीस हज़ार छ सौ सत्ताईस एकड़ जमीन तेरह उद्योगपतियों के हवाले किया जिसकी वजह से चौबीस हज़ार लोग अपनी ज़मीन से हाथ धो बैठे...हाल ही में प्रकाशित हुए नए आंकडों के अनुसार....

नरोत्तम जी बोलते जा रहे थे. कोई सुनने वाला नहीं था. पत्रकार बेहोश हो चुका था.

(हाल ही में खबर आई है कि पत्रकारों के एक दल ने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सूचना और प्रसारण तथा गृहमंत्री को एक ज्ञापन दिया है जिसमें मांग की गई है कि पत्रकारिता विश्वविद्यालय से निकले नए-नए स्नातकों को ऐसे लोगों का इंटरव्यू लेने के लिए बाध्य न किया जाय. ऐसा करना नए पत्रकारों के मानवधिकारों का हनन है.)

Wednesday, April 7, 2010

गोली मत चलाओ खून बह सकता है.




गृहमंत्री परेशान हैं. नक्सलियों ने बड़ा हड़कंप मचा रखा है. जब चाहते हैं किसी को मार देते हैं. पुलिस से वही हथियार छीन लेते हैं जो पुलिस को आत्मरक्षा और जनता की सुरक्षा के लिए मिला है. रेल लाइन उड़ा देते हैं. रेलवे स्टेशन जला देते हैं. इतना सब करने से मन नहीं भरता तो इलाके में बंद भी कर डालते हैं.

मंत्री जी ने कई बार इन नक्सलियों को बताया; "तुम हमारे अपने ही तो हो. मुख्यधारा में लौट आओ. तुमको केवल इसी बात की शिकायत है न कि हमने तुम्हारे लिए कुछ नहीं किया? चलो एक काम करते हैं. हम और तुम मिलकर राष्ट्र-निर्माण का कार्यक्रम चलायेंगे. दोनों के चलाने से कार्यक्रम की सफलता पर कोई संदेह नहीं रहेगा."

नक्सली जी को लगता है मंत्री जी की बात में दम तो है लेकिन अगर वे भी सरकार में बैठ जायेंगे तो उनके बाकी कर्मों और कमिटमेंट का क्या होगा? इसलिए वे मंत्री जी की बात पर ज्यादा ध्यान नहीं देते. उल्टे दूसरे दिन ही दो-चार और घटनाएं कर डालते हैं. मंत्री जी परेशान हैं. पिछले दो-तीन सालों में बड़ी मेहनत की लेकिन नक्सली जी के ऊपर कोई असर नहीं हुआ.

तमाम जुगत लगाई गई लेकिन सब फेल हो गईं. टीवी पर पैनल डिस्कशन कराये गए, देश के महानगरों में सेमिनार कराये गए, गाँधी जयंती पर अपील की गई लेकिन मामला जमा नहीं.

आजकल मंत्री जी की परेशानी का सबब प्रधानमंत्री का बयान है. दो महीने पहले प्रधानमंत्री ने एक कार्यक्रम में नक्सली हिंसा पर चिंता जाहिर करते हुए कह डाला; "हम नक्सली हिंसा को काबू में नहीं कर पा रहे."

अब प्रधानमंत्री ऐसा कहेंगे तो मंत्री जी तो परेशान होंगे ही. आज परेशानी इतनी बढ़ गई कि सचिव से रपट मंगा ली है. सचिव जी ढेर सारी फाईलें लिए खड़े हैं.

"माननीय प्रधानमंत्री ने जब से कहा है कि हम नक्सली हिंसा रोकने में कामयाब नहीं हुए हैं, तब से नक्सली हिंसा रोकने के लिए क्या-क्या हुआ है, उसकी पूरी जानकारी दीजिये. सबसे पहले मुझे महानगरों में आयोजित सेमिनारों का डिटेल दीजिये"; मंत्री जी ने सचिव जी से कहा.

"जी सर. देखिये सर, कलकत्ते में मार्च महीने में सेमिनार आयोजित किया गया था. मोशन का शीर्षक था, " नक्सली समस्या का कारण समुचित विकास का न होना है."

सर इसमें गृह राज्यमंत्री ने भी अपने विचार व्यक्त किए थे. सर उनके अलावा विपक्ष के एक नेता थे. अखबारों के तीन सम्पादक थे जिसमें से दो कलकत्ते के और एक चेन्नई के थे. इनके अलावा एक रिटायर्ड अफसर थे जो कभी गृह सचिव रह चुके हैं. हाँ सर, इस सेमिनार में विज्ञापन जगत की एक मशहूर हस्ती और नक्सलियों से सहानुभूति रखने वाले एक कवि भी थे"; सचिव ने जानकारी दी.

"कलकत्ते में सेमिनार के अलावा और कहाँ-कहाँ सेमिनार आयोजित हुए?"; मंत्री जी ने जानना चाहा.

सचिव को सवाल शायद ठीक नहीं लगा. शायद उन्हें लगा कि मंत्री जी के इस कवायद का कोई मतलब नहीं है. इसलिए उन्होंने मुंह विचकाते हुए एक और फाइल उठा ली. फाइल देखते हुए उन्होंने बोलना शुरू किया; "सर, मुम्बई में एक सेमिनार अप्रिल महीने के पहले सप्ताह में हुआ था. वहाँ से पब्लिश होने वाले एक अखबार के प्रकाशकों ने करवाया था. उसमें एक रिटायर्ड आईजी, विपक्ष के एक नेता, दो सम्पादक, एक फ़िल्म प्रोड्यूसर और वही कवि थे जो कलकत्ते के सेमिनार में भी थे. यहाँ मोशन का शीर्षक था, "नक्सलवाद सामाजिक अन्याय की परिणति है". इसके अलावा सर, एक सेमिनार हैदराबाद में, एक दिल्ली और एक पटना में आयोजित किया गया."

मंत्री जी सचिव की बात बहुत ध्यान से सुन रहे थे. उन्होंने सामने रखे पैड पर अपनी पेंसिल से कुछ लिखा. लिखने के बाद सचिव से फिर सवाल किया; "और टीवी पर पैनल डिस्कशन का क्या हाल है? कौन-कौन से चैनल पर पैनल डिस्कशन हुए? उसका डिटेल है आपके पास?"

"जी सर. पूरा डिटेल है हमारे पास. मैंने सारे पैनल डिस्कशन की वीडियो रेकॉर्डिंग भी रखी है. आप देखेंगे?"; सचिव ने अपनी कार्य कुशलता का परिचय देते हुए पूछा.

"नहीं नहीं, वो सब देखने का समय नहीं है. आप केवल ये बताईये कि कौन-कौन से चैनल पर क्या पैनल डिस्कशन हुआ"; मंत्री जी की बात से लगा जैसे सचिव की वीडियो रेकॉर्डिंग देखने वाली बात उन्हें ठीक नहीं लगी.

"सॉरी सर. देखिये सर, सीसी टीवी पर एक पैनल डिस्कशन हुआ सर. इस आयोजन में एंकर थे सर, प्रमोद मालपुआ. उनके अलावा सर फ़िल्म प्रोड्यूसर सुरेश भट्ट, यूपी के पूर्व आईजी विकास सिंह, ओवरलुक पत्रिका के सम्पादक मनोज मेहता थे. सर, इस डिस्कशन में नेपाल से भी एक माओवादी नेता ने भाग लिया था सर. इनके अलावा नुक्कड़ नाटक करने वाले एक अभिनेता थे सर. चैनल ने एसएमएस पोल भी करवाया था सर. सवाल था, "नक्सलवाद की समस्या को सरकार क्या गंभीरता से ले रही है?" सर आपको जानकर खुशी होगी कि इस बार सैंतीस प्रतिशत लोगों ने जवाब दिया कि सरकार समस्या को गंभीरता से ले रही है"; सचिव ने पूरी तरह से जानकारी देते हुए कहा.

"केवल सैंतीस प्रतिशत लोगों ने हमारी गंभीरता को समझा! और आप इसपर मुझे खुश होने के लिए कह रहे हैं?"; मंत्री जी ने खीज के साथ सवाल किया. शायद उन्हें सचिव द्वारा कही गई खुश होने की बात ठीक नहीं लगी.

"नहीं सर, बात वो नहीं है. मेरे कहने का मतलब है सर कि पिछली बार इसी तरह के एक सवाल पर केवल बत्तीस प्रतिशत लोगों ने सरकार के प्रयासों को गंभीर प्रयास बताया था"; सचिव ने सफाई देते हुए कहा.

"अच्छा अच्छा, कोई बात नहीं. और बताईये, और किस चैनल पर डिस्कशन हुआ?"; मंत्री जी ने और जानकारी चाही.

"सर इसके अलावा एक पैनल डिस्कशन सर्वश्रेष्ठ चैनल अभी तक पर, एक डिस्कशन हाईम्स नाऊ पर और एक डीएनएन बीएनएन पर हुआ. सर, लगभग सारे पैनल डिस्कशन में घूम-फिर कर वही सब ज्ञानी थे. लेकिन सर, एक बात कहना चाहूंगा. अगर आपकी इजाजत हो तो अर्ज करूं"; सचिव जी ने मंत्री से कहा.

"हाँ-हाँ बोलिए. जरूर बोलिए. आप भी तो सरकार का हिस्सा हैं. कोई सुझाव हो तो बोलिए"; मंत्री जी ने सचिव को लगभग आजादी देते हुए बताया.

मंत्री जी की बात से सचिव का उत्साह जग गया. उन्होंने बोलना शुरू किया; "देखिये सर, सेमिनार और पैनल डिस्कशन वाली बात तो अपनी जगह ठीक है. लेकिन सर, हमें प्रशासनिक स्तर पर भी कोई कार्यवाई करनी चाहिए. सर, लोगों का मानना है कि पुलिस की ट्रेनिंग और उनके लिए आधुनिक हथियार वगैरह मुहैया कराने से पुलिस अपने काम में और सक्षम होगी. हमें इस बात पर भी विचार करना चाहिए."

"देखिये, पुलिस को आधुनिक हथियार मुहैया कराने वाली बात मैं सालों से सुन रहा हूँ. लेकिन मुझे नहीं लगता कि ऐसा करने से कोई फर्क पड़ेगा. देखिये, अगर हम पुलिस को आधुनिक हथियारों से लैस कर देंगे तो खून-खराबा बढ़ने के चांस हैं. गाँधी जी जैसे शान्ति के मसीहा के देश में इस तरह का खून-खराबा होगा तो पूरी दुनिया में हमारी साख गिरेगी. वैसे भी महात्मा के देश में हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं है"; मंत्री जी ने समझाते हुए कहा.

मंत्री जी की बात सुनकर सचिव जी को हँसी आ गई. लेकिन बहुत कोशिश करके उन्होंने अपनी हँसी रोक ली. उन्हें एक बार तो लगा कि मंत्री जी से कह दें कि; "सर दो मिनट का समय दे दें तो मैं बाहर जाकर हंस लूँ"; लेकिन मंत्री के सामने ऐसा करने की गुस्ताखी नहीं कर सके. उन्होंने एक मिनट की चुप्पी के बाद कहना शुरू किया; "सर, कुछ लोगों का मानना है कि नक्सली हिंसा की समस्या कानून-व्यवस्था की समस्या है."

"अरे ऐसे लोगों की बात पर ध्यान देने की जरूरत नहीं है. मैंने कम से कम दो बार देश भर के बुद्धिजीवियों के साथ बैठक की है. सारे बुद्धिजीवी इस बात पर सहमत थे कि नक्सली समस्या कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं बल्कि सामाजिक और आर्थिक समस्या है"; मंत्री जी ने अपनी सोच का खुलासा करते हुए बताया.

"तब तो ठीक है सर. फिर तो कोई समस्या ही नहीं है. जब बुद्धिजीवियों ने इसे कानून-व्यवस्था की समस्या मानने से इनकार कर दिया है फिर आम जनता की बात सुनकर क्या आनी-जानी है. वैसे भी आम जनता के पास इतनी बुद्धि नहीं है कि वो इस तरह की जटिल समस्याओं के बारे ठीक से विचार कर सके"; सचिव ने मंत्री की हाँ से हाँ मिलाई.

"बिल्कुल ठीक कह रहे हैं आप. वैसे एक बात बताईये. ये नक्सली हिंसा की समस्या को लेकर और मंत्रालयों में क्या बात हो रही है? अरे भाई, आप भी तो बाकी मंत्रालयों के सचिव वगैरह से मिलते ही होंगे. मेरे कहने का मतलब है कि बाकी के मंत्री और सचिव क्या सोचते हैं हमारे मंत्रालय के बारे में?"; मंत्री जी ने सचिव के कान के पास धीरे से पूछा.

मंत्री जी की बात सुनकर सचिव जी मुस्कुराने लगे. उन्होंने इधर-उधर देखते हुए कहना शुरू किया; "सर, देखा जाय तो बाकी के मंत्रालय हमारे मंत्रालय के प्रयासों के बारे में कुछ अच्छा नहीं सोचते. वो परसों झारखंड में नक्सलियों ने रेलवे लाइन उड़ा डी न. उसी को लेकर कल कैंटीन में चर्चा हो रही थी. मैं, रक्षा मंत्रालय के सचिव और प्रधानमंत्री कार्यालय के सहायक सचिव थे. झारखण्ड वाली घटना पर रक्षा मंत्रालय के सचिव ने चुटकी लेते हुए कहा कि अगर यही हाल रहा तो अगले दो-तीन साल के अन्दर सेना को पाकिस्तान, बंगलादेश और चीन के बॉर्डर से हटाकर उड़ीसा, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, आँध्रप्रदेश और बिहार के बॉर्डर पर लगाना पड़ेगा."

सचिव की बात सुनकर मंत्री जी को बहुत बुरा लगा. उन्हें पूरा विश्वास हो चला कि रक्षा सचिव के अलावा प्रधानमंत्री कार्यालय का सहायक सचिव भी था तो उसने भी जरूर कुछ न कुछ कहा ही होगा. यही सोचते-सोचते वे पूछ बैठे; "और वो माथुर साहब क्या कह रहे थे? पी एम कार्यालय के सचिव भी तो कुछ बोले होंगे."

मंत्री जी का सवाल ही ऐसा था कि सचिव ने तुरंत बोलना शुरू कर दिया; "सर, प्रधानमंत्री कार्यालय भी हमारे प्रयासों को ज्यादा तवज्जो नहीं देता. माथुर साहब कह रहे थे कि माननीय प्रधानमंत्री के चिंता जाहिर करने के बावजूद हमारे मंत्रालय की तरफ़ से कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया. उन्हें तो सर इस बात से भी शिकायत है कि पीएम साहब के बयान के बाद गृहमंत्री महोदय ने एक बार संवाददाता सम्मेलन बुलाकर चिंता तक नहीं जताई."

सचिव की बात सुनकर मंत्री महोदय चुप हो गए. चेहरे पर कठोर भाव उमड़ पड़े. सोचने लगे; "देखो. प्रधानमंत्री कार्यालय का सचिव भी ऐसी बात करता है. फिर भी प्रधानमंत्री कार्यालय की बात थी. सो कुछ सोचते हुए उन्होंने सचिव से कहा; "कल से हमें इस समस्या के बारे युद्ध स्तर पर काम शुरू करने की जरूरत है. आप एक काम कीजिये. कल ही एक संवाददाता सम्मेलन बुलाईये. मुझे नक्सली हिंसा की समस्या पर चिंता व्यक्त करनी है. आगे की कार्यवाई के बारे में आप सारी डिटेल इस प्रेस कांफ्रेंस के बाद दूँगा."

इतना कहकर मंत्री जी उठ खड़े हुए. उन्होंने अपनी शेरवानी की जेब से दो पन्नों का एक कागज़ निकाला और पढने लगे. उन्हें आज ही इंडिया हैबिटैट सेंटर में एक सेमिनार में कुछ बोलना था. सेमिनार में डिस्कशन का मुद्दा था; 'लोकतंत्र और हम'.