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Thursday, February 28, 2008

दुर्योधन की डायरी - पेज ७६




पाठशाला आने के बाद अजीब-अजीब बातें सामने आ रही हैं. बहुत सारी घटनाएं ऐसी हुईं जिनसे लगा जैसे भ्रष्टाचार हमाने राज्य की सीमा में पहुँच चुका है. आज की बात ले लो. दोपहर को 'मिड डे मील' में जो खाना मिला उसे खाकर बहुत गुस्सा आया. चावल पूरी तरह से सड़ा हुआ और दाल तो केवल नाम की थी. लगा जैसे पानी में दो-चार दाल के दाने भर हैं.

पूछने पर जो बातें सामने आईं उसे सुनकर भौचक्का रह गया. पिताश्री ने विद्यार्थियों के लिए 'मिड डे मील' पर इतना पैसा खर्च किया लेकिन सुनने में आया है कि सारा पैसा पाठशाला में काम करने वाले तमाम कर्मचारियों की जेब में चला जाता है.

शाम को मैंने साफ तौर पर बता दिया कि मैं राजा का पुत्र इस तरह का खाना नहीं खा सकता. लेकिन जब मैंने कर्मचारियों से चिकेन खाने की मांग रखी तो उन्होंने बहाना बनाया कि मुर्गियों को बर्ड फ्लू हो गया है इसलिए चिकेन की सप्लाई बंद है. पता नहीं बात कितनी सच है, लेकिन मैंने निश्चय किया है कि सच्चाई का पता लगाकर रहूँगा.

भ्रष्टाचार की बात पर शक एक और वजह से उपजा. आज जब गुरुदेव मुझे और भीम को गदा चलाने की 'नैट प्रैक्टिस' करवा रहे थे तो भीम के एक प्रहार से मेरी गदा पूरी तरह से टूट गई. मुझे शक है कि गदा बनाने
के लिए इस्तेमाल किए गए धातु में स्टील और तांबे का मिश्रण ठीक नहीं है.

दु:शासन ने शक जाहिर किया कि पैसा बचाने के लिए हथियार निर्माता ने धातु में स्टील की मात्रा ज्यादा कर दी होगी. मुझे शक है कि रक्षा सचिव, जिन्हें हथियारों की खरीद-फरोख्त की जिम्मेदारी सौंपी गई है, कुछ घपला कर रहे हैं.

मैंने सोचा है कि कुछ दिन और देख लूँ. अगर तलवार, भाले और धनुष-बाण के केस में भी ऐसी कोई बात नज़र आई तो मैं विदुर चाचा को इस बात की जानकारी दूँगा. फिर सोचता हूँ कि उन्हें बताकर भी क्या होना है. इन बातों को सुनकर ऐसा न हो कि वे एक कमीशन बैठा कर अपना पल्ला झाड़ लें.

आज मुझे भीम पर बड़ा क्रोध आया. गुरु द्रोण हम दोनों को गदा भाजने की 'नेट प्रैक्टिस' करवा रहे थे. लेकिन मुझे लगा कि भीम किसी न किसी बहाने गदा का प्रहार जानबूझ कर मेरे ऊपर कर रहा था. अगर इस भीम को नहीं रोका गया तो इसकी तो हिम्मत बढ़ जायेगी. अभी से इसका ये हाल है तो आगे चलकर क्या करेगा? आगे चलकर तो ये भीम मुझे और मेरे भाइयों की धुलाई करता ही जायेगा।

इसीलिए पाठशाला से अपने रूम में आकर मैंने भीम को मारने की योजना बनाई. दु:शासन ने रास्ता सुझाया कि ये भीम बड़ा पेटू टाइप है. इसे अगर खीर खाने का लालच दे दिया जाय तो उस खीर में जहर मिलाकर इसको सलटाया जा सकता है. जब मैंने दु:शासन से कहा कि कल किसी केमिस्ट की दुकान से पोटैसियम सायनायड खरीद ले आए तो दु:शासन ने बड़ा बढ़िया आईडिया दिया. बोला; "भ्राताश्री क्या जरूरत है भीम को जहर देकर मारने की. अरे खीर तो हमलोग दूध में ही बनायेंगे. आजकल जिस तरह से दूध में यूरिया की मिलावट हो रही है, ऐसे में अगर हम भीम को शुद्ध दूध में पकाई गई खीर खिला दें तो वह ऐसे ही सलट लेगा."

मुझे दु:शासन का आईडिया बढ़िया लगा. देखता हूँ कि कितनी जल्दी इस योजना को कार्यान्वित किया जा सकता है.

पुनश्च:

आज बड़ी अजीब घटना घट गई. भृगु मिले थे. मुझे देखते ही कहा; "तो डायरी लिख रहे हो वत्स." उनकी बात सुनकर मैं अचंभित हो गया. मेरे मन में एक बात आई कि; "इन्हें कैसे मालूम कि मैं डायरी लिखता हूँ." जब मैंने उनसे पूछा कि मैं डायरी लिखता हूँ, इस बात का पता उन्हें कैसे चला तो बोले; "वत्स दुर्योधन, मेरा नाम भृगु है. जो हो चुका है और जो हो रहा है, उसे तो मैं जानता ही हूँ लेकिन भविष्य में जो कुछ भी होगा उसकी जानकारी भी मुझे है. इसिलए मैंने निश्चय किया है कि मैं दुनिया में होने वाली सभी घटनाओं की एक लिस्ट बनाकर और उसका वर्णन करके एक किताब लिख डालूँगा."

उनकी बात पर एक बार तो मुझे विश्वास नहीं हुआ. लेकिन फिर मैं अपनी उत्सुकता रोक नहीं सका और उनसे पूछ बैठा; "अच्छा अगर ऐसी बात है तो बताईये कि मेरी लिखी हुई डायरी का क्या होगा?"

मेरी बात सुनकर हंसने लगे. कुछ देर तक हंसने के बाद मुझसे बोले; "तो सुनो वत्स, तुम्हारी लिखी हुई डायरी का क्या होगा. कलयुग में एक हिन्दी टीवी न्यूज़ चैनल को तुम्हारी ये डायरी मिलेगी. जिसे ये डायरी मिलेगी, उस मनुष्य से यह डायरी एक ब्लॉगर उड़ा लेगा. फिर तुम्हारी इस डायरी के अंश वो अपने ब्लॉग पर छापेगा."

उनकी बात सुनकर मेरी उत्सुकता और बढ़ गई. मैंने उनसे पूछा; "ऋषिवर एक बताईये, ये ब्लॉग क्या है?"

मेरी बात सुनकर उन्होंने अपने कमंडल के पानी में झाँका और आँख बंद किए ही बोलना शुरू किया; " वत्स दुर्योधन, कलयुग में ब्लॉग एक ऐसा माध्यम होगा जहाँ लोग अपने मन में आने वाली बातों को लिखेंगे. ठीक वैसे ही जैसे तुम यह डायरी लिखते हो. ब्लॉग शब्द सुनकर हड़क मत जाना वत्स. असल में लिखने वाले दूसरों को यह बताएँगे कि वे अपने मन की बातें लिखते हैं लेकिन यह सच नहीं है."

उनकी बात सुनकर मैंने सोचा; 'मुझे हड़कने की क्या जरूरत? मैं वैसे ही सबको हड़काता रहता हूँ. फिर मैंने उनसे पूछा; "ऋषिवर, यह बताईये, अगर कोई ब्लॉगर मेरी डायरी अपने ब्लॉग पर छाप ही देगा तो इससे मुझे कोई रायल्टी मिलने की उम्मीद दिखाई देती है क्या?"

मेरी बात सुनकर उन्होंने कहा; "हाँ. एक काम करो अपनी डायरी का कॉपीराईट अभी से अर्जुन को सौंप दो. ये अर्जुन कलयुग में अरुण अरोरा के नाम से जाना जायेगा. जब तुम्हारी डायरी के अंश कोई ब्लॉगर छापेगा तो उसे अरुण अरोरा को रायल्टी देनी ही पड़ेगी. अगर उस ब्लॉगर ने आना-कानी की तो अरुण उस ब्लॉगर से तुरंत पंगा लेकर रायल्टी वसूल कर लेगा......:-)"

मुझे उनकी बात ठीक तो नहीं लगी. मेरा इतना बड़ा ईगो
लेकर मैं अर्जुन के पास कैसे जाऊँगा? फिर भी इस बात पर पुनः विचार करने की जरूरत है मुझे. आख़िर पैसे का मामला है.....:-)

Wednesday, February 27, 2008

दुर्योधन की डायरी - पेज २२




दुर्योधन की डायरी - पेज २२

बीस दिन से ज्यादा बीत चुके हैं राजमहल छोड़कर गुरु द्रोण की पाठशाला आए हुए. जब राजमहल से बाहर निकल कर पाठशाला आने की बात शुरू हुई तो मैंने सोचा था बड़ा मज़ा आएगा. पाठशाला में जाने के बाद अपने मन से रह सकूंगा. लेकिन यहाँ आकर पता चला कि मामला बिल्कुल उल्टा है. पाठशाला को-एड भी नहीं है. ऊपर से ये गुरु द्रोण पढाई-लिखाई को लेकर बड़े सख्त निकले. हालत ये हो गई है कि पूरा समय होमवर्क करने में लग जाता है. रात को हॉस्टल की दीवार फांद कर आज तक बाहर नहीं जा सका.

मेरी समझ में यह नहीं आता कि पढाए-लिखाई को गुरुदेव इतनी अहमियत क्यों देते हैं. उन्हें समझने की जरूरत है कि मैं एक राजा का पुत्र हूँ. राजा के पुत्र को पढ़ने-लिखने की क्या जरूरत है? अरे मुझे तो राजा ही बनना है. कौन सा पढ़-लिख कर क्लर्क बनना है. ये पढाई-लिखाई की जरूरत उन्हें होती है जिनके पिता राजा नहीं होते.

इतनी छोटी बात गुरुदेव की समझ में क्यों नहीं आती? कभी-कभी सोचता हूँ कि जिस गुरु को इतनी छोटी सी बात की समझ नहीं है, वो क्या एक राजा के पुत्र को पढ़ाने लायक है.

गुरुदेव की सख्ती की तो हद हो गई है. कहते हैं मैं किताबों से भरा अपना बस्ता ख़ुद लेकर पाठशाला आया करूं. अरे मैं ऐसा क्यों करूं? इस तरह से तो बस्ता ढोते-ढोते ही थक जाऊंगा. और फिर मैं एक राजा का पुत्र हूँ. मुझे बस्ता ढोने की क्या जरूरत है? पिता श्री ने साथ में नौकर क्या इसीलिए भेजे थे कि उन्हें मेरा बस्ता न ढोना पड़े बल्कि वे मुझे बस्ता ढोते देख हँसें.

मुझे तो गुरुदेव से कोफ्त सी होने लगी है. कई बार सोचता हूँ कि गुरुदेव प्राइवेट ट्यूशन करते हैं, यह आरोप लगाकर उन्हें गुरु के पद से सस्पेंड करवा दूँ. फिर सोचता हूँ कुछ दिन और देख लेता हूँ, फिर कोई फैसला लूंगा.

आज की ही बात ले लो. रीतिकाल की एक कविता की व्याख्या ठीक तरह से नहीं कर पाया तो गुरुदेव ने मुझे क्लास में खडा कर दिया. अरे मैं कहता हूँ एक राजा के पुत्र को कविता पढ़ने और उसकी व्याख्या करने की जरूरत ही क्या है. राजा के दरबार में कवियों की कोई कमी रहती है क्या? मैं तो कहता हूँ कि जितनी कविता व्याख्या के लिए देनी हो, एक बार में ही सब दे दें. मैं जब राजा बनूँगा तो दरबार में बैठे तमाम कवियों से उनकी व्याख्या करवा लूंगा.

इतने दिनों तक गुरुदेव की सख्ती झेलकर कल मेरा धैर्य जवाब दे गया. कल क्लास बंक करके मैं आखेट करने चला गया था. जब वापस आया तो देखा कि मेरा ही इंतजार कर रहे थे. मुझसे पूछने लगे कि मेरी हिम्मत कैसे हुई क्लास बंक करके आखेट करने की? मैंने तो दो टूक जवाब दे दिया कि राजा का पुत्र आखेट नहीं करेगा तो क्या क्रिकेट खेलेगा? जो मजा आखेट करने में है वो क्रिकेट खेलने में कहाँ? ऐसे भी क्रिकेट एक टीम गेम है. और एक राज-पुत्र का टीम गेम से क्या लेना-देना?

मैंने तो तंग आकर आज उन्हें कह ही दिया कि मुझे उनकी सख्ती पसंद नहीं है. दुशासन तो सजेस्ट कर रहा था कि मैं उन्हें कह दूँ कि वे अपनी औकात में रहें. आज तो मैंने ऐसा नहीं कहा लेकिन अगली बार वे नाराज हुए तो मैं पक्का ही कह दूँगा.

कभी-कभी लगता है जैसे गुरुदेव मुझे जलील करने के लिए कुछ बोलने से नहीं हिचकते. कल जब मैं आखेट से थका-हारा वापस लौटा तो मेरे ऊपर बमक गए. जब मैंने उन्हें दो टूक जवाब दे दिया तो जाते-जाते किसी शायर की गजल के शेर बोल गए. बोले;

उसूलों पर जो आंच आए तो टकराना जरूरी है
अगर जिंदा हैं तो जिंदा नज़र आना जरूरी है

नई उम्रों की ख़ुदमुख्तारियों को कौन समझाए
कहाँ से बच के चलना है, कहाँ जाना जरूरी है

एक बार तो इच्छा हुई कि उन्हें बता दूँ कि इसी गजल का अगला शेर है;

थके-हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें
सलीका-मंद साखों का लचक जाना जरूरी है

Monday, February 25, 2008

दुर्योधन की डायरी -पेज ३३५०




आजकल टीवी न्यूज़ चैनल में जिस तरह से कम्पीटीशन बढ़ा है, उससे नित नए-नए कारनामें देखने को मिल रहे हैं. हाल ही में एक न्यूज़ चैनल ने रावण की खोज कर डाली और प्रोग्राम दिखाया 'जिंदा है रावण'. चैनल ने बताया कि रावण की लाश एक संदूक में रखी हुई है. इस चैनल के कम्पीटीशन में एक और चैनल ने दुर्योधन के बारे में पूरी जानकारी निकाल ली. चैनल के जरिये ही पता चला कि दुर्योधन डायरी लिखता था. पढिये उसी डायरी में से कुछ अंश. (अब चूंकि डायरी बहुत पुरानी है तो लाजमी है कि डायरी के पन्ने अलग-अलग हो चुके हैं.)

दुर्योधन की डायरी (पेज ३३५०)

आज केशव आए थे. कह रहे थे संदेश लेकर आए हैं कि पांडवों को पाँच गाँव चाहिए.कैसे दे देता पांच गाँव? इन पांच गावों में एक गुडगाँव भी था. एक बार तो इच्छा हुई कि केशव को जमीन की कीमतों के बारे में जानकारी देने के लिए एक क्लास ले लूँ. उन्हें मेरी मनोदशा की जानकारी कहाँ है?

जब से जमीन की कीमतें बढ़ी हैं, रात को नींद नहीं आती. अपनी बेवकूफी पर गुस्सा ऊपर से आता है.

अब जाकर पता चल रहा है कि जोश में होश नहीं खोना चाहिए. अर्जुन के ख़िलाफ़ कर्ण को खड़ा करना था. जोश में आकर बेवकूफी कर बैठा. पूरा का पूरा अंग प्रदेश दे दिया उसको. अरे, केवल राजा ही तो बनाना था उसे. कोई छोटा-मोटा राज्य देने से ही काम चल जाता. लेकिन जोश में होश कहाँ रहता है. इतना बड़ा अंग प्रदेश दे डाला उसको. वैसे भी ये कर्ण इतना सीरियस रहता है. न तो हमारे साथ दारू पीता है और न ही नाच वगैरह में कोई दिलचस्पी है इसकी. ऐसे में इतना बड़ा अंग प्रदेश देकर पछताने के अलावा और कोई रास्ता नहीं.

जिस तरह से रीयल इस्टेट डेवेलप होने शुरू हुए हैं, जमीन की कीमतें आसमान छूने लग गई हैं. आज अगर अंग प्रदेश पास में होता तो उसकी कीमत कम से कम सौ खरब डॉलर होती. और कुछ नहीं तो दुशासन के लिए एक रीयल इस्टेट कंपनी खोल देता. जब से वो द्रौपदी की साड़ी उतारने में असफल रहा है, बहुत डिप्रेस्ड रहता है.

पास के राज्य की रीयल इस्टेट कंपनी से बात चली थी. कह रहा था शापिंग माल, होटल, रहने के लिए फ्लैट और कुछ स्कूल बनाना चाहता था. कह रहा था कंपनी में पचास परसेंट का कैपिटल दे देगा. आज शाम की ही तो बात है. जब से केशव को पाँच गाँव देने से मना किया है, बिल्डर कह रहा है कि अब तो युद्ध निश्चित है. युद्ध के लिए बड़ा सा मैदान चाहिए. उसे ही डेवेलप करने का ठेका दे दो कंपनी को. पचीस परसेंट देने के लिए राजी है.

काश इस बात का पता रहता कि रीयल इस्टेट का दाम एक दिन खूब बढेगा तो कर्ण को अंग प्रदेश देता ही नहीं.

कई बार सोचता हूँ कर्ण को बोल दूँ कि अंग प्रदेश वापस कर दो. वैसे भी अब तो अर्जुन से उसका डायरेक्ट झगड़ा शुरू हो चुका है. अब उसे राजा बने रहने की जरूरत भी नहीं है. लेकिन मेरी बात सुनकर क्या सोचेगा. क्या करूं बड़ी दुविधा में हूँ. कभी-कभी सोचता हूँ, एक बार बेशरम होकर मांग ही लूँ. एक बार ही तो शर्म खोनी है. लेकिन शर्म खोने के बदले जो मिलेगा उसकी कीमत का अंदाजा सच पूछो तो मुझे भी नहीं है.

फ्रश्ट्रेशन इतना बढ़ गया है कि कई बार तो सोचा कि कर्ण के नाम के सुपारी दे डालूँ किसी को. लेकिन फिर सोचता हूँ कि अगर कहीं ये बच गया तो फिर मेरी तो दुर्गति पक्की है. किसी को नहीं छोड़ेगा. मैं, दुशासन, जयद्रथ वगैरह तो दौड़ के भाग भी लेंगे लेकिन मामा श्री का क्या होगा. वैसे ही चल नहीं पाते. उनकी हालत तो बहुत बुरी हो जायेगी. ये सब के बारे में सोचकर फिर ये सुपारी वाला आईडिया छोड़ देना पड़ता है.अब समझ में आता है कि राजा का पुत्र जितना भी अग्रेसिव हो, उसे भी कभी-कभी होश से काम लेना चाहिए.


मेरी हालत पर मुझे उस शायर का शेर याद आ रहा है जिसने लिखा था;

हँसी आती है अपने रोने पर
और रोना है जग हँसाई का