Show me an example

Friday, August 14, 2009

एक मौसमी पोस्ट - स्वाइन फ्लू




ये स्वाइन फ्लू भी बड़ा जबर रोग है. इतनी दूर से चला लेकिन भारत पहुँच कर ही दम लिया. दम भी ऐसा कि भारतवासियों को दम नहीं लेने दे रहा. इससे अच्छा तो चायनीज फ्लू था जो चला तो ठीक लेकिन कहीं नहीं जा सका. जाता भी कैसे, चीन में पैदा हुई चीजें वैसे भी ज्यादा दिन नहीं चलतीं.

लेकिन स्वाइन फ्लू तो आकर ही बैठ गया. हालत यह है कि छींकना मुश्किल हो गया है. इस बात का डर रहता है कि छींक सुनकर (अब छींक को देख तो नहीं सकते न) दोस्त-यार साथ ही न छोड़ दें. किसी को एक बार खांसी आ जाए तो लोग ऐसे देखते हैं जैसे धमकी दे रहे हों कि; "अगर मुझे स्वाइन फ्लू हुआ तो मैं तुम्हें नहीं छोडूंगा."

हमारे एक मित्र स्वाइन फ्लू को लेकर अति-उत्साही हो गए. इतने उत्साही जैसे कोई नया ब्लॉगर पहली पोस्ट पर चार से ज्यादा टिप्पणियां मिलने पर होता है. उत्साह ने उनके मन में घर बसाया तो मुझसे बोले; "ऐसा करें न, कि अगले दस दिन के लिए आफिस बंद कर देते हैं."

मैंने पूछा; "क्या ज़रुरत है आफिस बंद करने की? कलकत्ते में तो अभी तक स्थिति सामान्य है."

मेरी बात सुनकर उन्होंने विश्व-प्रसिद्द कहावत ठेल दी. बोले; "प्रेवेंशन इज बेटर दैन क्योर."

जब मैंने कहा कि वे ओवर रेअक्ट कर रहे हैं तो बोले; "अच्छा, ठीक है लेकिन डॉक्टर से मिलकर स्वाइन फ्लू के बारे जानकारी तो हासिल कर ही लेना चाहिए."

इतना कहते हुए तुंरत अपने डॉक्टर को फ़ोन कर दिया. बोले; "आज मैं आपसे मिलना चाहता हूँ. मुझे स्वाइन फ्लू के बारे में जानकारी चाहिए."

उन डॉक्टर साहब को मेरे दोस्त के साथ बात करने में बड़ा मज़ा आता है. वे तुंरत राजी हो गए. एक बार भी नहीं कहा कि; "मेरे पास आने की क्या ज़रुरत है? इन्टरनेट पर उसके बारे में जानकारी हासिल कर लो. टीवी देख लो. अभी सारे चैनल स्वाइन-मय हो लिए हैं."

और तो और यह भी कह सकते थे कि हिंदी ब्लॉग पढ़ लो. स्वाइन फ्लू तो क्या, उसके बाप के बारे में भी जानकारी मिल जायेगी. लेकिन नहीं.

अब मित्र के साथ ही शाम को घर के लिए निकलता हूँ तो उनके साथ डॉक्टर के पास जाना पड़ा. साढ़े आठ बजे उन्होंने डॉक्टर साहब को फ़ोन करके बता दिया कि; "आप अपने चेंबर में ही रहें. मैं आपसे मिलने आ रहा हूँ."

नौ बजे डॉक्टर साहब के पास पहुंचे. डॉक्टर साहब से मिलने में मुझे दिलचस्पी नहीं थी. इस बात का पता मेरे दोस्त को था. इसलिए वे मुझसे बोले; "आप तो जायेंगे नहीं. गाडी में बैठिये. मैं पॉँच मिनट में आता हूँ."

चले गए. चालीस मिनट बाद आये. मैंने पूछा; "क्या-क्या सावधानी के लिए कहा डॉक्टर साहब ने?"

बोले; "अरे कुछ नहीं. वही सब कहा जो टीवी में बताता है. हाथ धोकर रखिये. ज्यादा लोगों से नहीं मिलना है. स्वीमिंग बंद कर दीजिये. और ज्यादा कुछ नहीं."

मैंने कहा; "और क्या बातें हुईं?"

मित्र बोले; "वही सब. कह रहे थे कि मुझे अपना बिजनेस और आगे बढ़ाना चाहिए. फिर बोले कि कौन सी पिक्चर देखी मैंने? फिर बोले एक दिन चलिए साथ में पिक्चर देखने चलते हैं."

लीजिये. मैंने सोचा था कि स्वाइन फ्लू के बारे में जानकारी लेने गए हैं. और यहाँ पिक्चर देखने की बातें हो रही हैं. जहाँ रात को नौ बजे घर पहुँचते हैं, वहां साढ़े दस बजे घर पहुंचे.

घर पहुंचे और टीवी देखा तो वहां भी स्वाइन फ्लू से कोई बचाव नहीं. कोई चैनल खोल लीजिये आज कल हर ब्रेकिंग न्यूज स्वाइन फ्लू के बारे में है. एक हैल्थ मिनिस्टर है. बेचारा न घर का रहा न मंत्रालय का. केवल न्यूज चैनल का होकर रह गया है. पिछले सात दिनों से बयान की सफाई करते फिर रहा है. मैंने ये नहीं कहा. मैंने वो नहीं कहा. मैंने ३३ प्रतिशत वाली बात नहीं कही. टैमीफ्लू के बारे में दिए गए मेरे बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया.

बेचारा यही कहते फिर रहा है. मिनिस्ट्री का बारह तो क्या साढ़े बारह बज गया है.

टीवी चैनल के संवाददाता मास्क पहने घूम रहे हैं. बड़े क्यूट लग रहे हैं. चिरकुट संवाददाता भी डॉक्टर लग रहा है. हॉस्पिटल से रिपोर्टर लोग रिपोर्टिंग कर रहे हैं. मास्क पहने संवाददाता ऐसा लग रहा है जैसे कोई डॉक्टर हो और माइक्रोफोन से ही ऑपरेशन करने के लिए कमर कसे है.

आज नीरज भैया से बात हो रही थी. मैंने कहा; "खोपोली तो पुणे और मुंबई के बीच है. ऐसे में वहां की स्थिति क्या है?"

वे बोले; " बड़ी हालत खराब है यहाँ तो. सब डरे हुए हैं. फैक्टरी में लोगों को देखकर लग रहा है जैसे डब्लूएचओ ने डॉक्टरों का एक विशिष्ट दल हमारी फैक्टरी के लिए भेज दिया है. चश्मा पहने मजदूर भी डॉक्टर दिखाई दे रहा है."

मैंने पूछा और क्या हो रहा है तो बोले; "हमें तो डर है कि कहीं कोई बुजुर्ग वायरस बाकी के वायरसों को यह न कह दे कि खोपोली में एक शायर रहता है. जाओ उनसे तरन्नुम में गजलें सुनकर आ जाओ. हम बताते हैं बंधुवर, अगर ऐसा हो गया तो खोपोली में भी स्वाइन फ्लू फैलने की आशंका है."

अब हम तो यही कहेंगे कि ऐसा न हो.

और यह कहेंगे कि स्वाइन तो जाने से रहे. भला स्वाइन फ्लू ही चला जाए.

Thursday, August 13, 2009

दुर्योधन की डायरी - पेज १७२१




हम आये दिन यह कहते रहते हैं कि द्वापर और सतयुग में सबकुछ ठीक चलता था. लेकिन कल दुर्योधन जी की डायरी पढ़कर लगा कि ऐसी बात नहीं है. द्वापर में भी सूखा पड़ता था. सर्दी भी पड़ती है. विश्वास न हो तो दुर्योधन जी की डायरी का यह पेज पढिये. उन्होंने हस्तिनापुर में सूखे की स्थिति से उत्पन्न हुई समस्याओं का जिक्र किया है. उनकी डायरी से यह भी पता चलता है कि उनदिनों भी राजा जी लोग वैसे ही काम करते थे जैसा आज करते हैं.

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समझ में नहीं आता कि प्रजा बात-बात पर परेशान क्यों होती रहती है? मैं कहता हूँ, अगर प्रजा शरीर धारण ही किया है तो फिर परेशानी से क्या डरना? परेशानी से डरना ही था तो प्रजा क्यों बने? काहे नहीं राजा बन गए? मेरी तरह राजकुमार ही बन जाते.

परेशानियों का रोना तो नहीं रहता.

गुप्तचर बता रहे हैं कि पिछले एक महीने से प्रजा सूखे से परेशान है. अजीब बात है. पिछले बरस इसी मौसम में जो प्रजा बाढ़ से परेशान थी, वही लोग इस बरस सूखे से परेशान है. सुनकर लगता है जैसे इनलोगों को परेशान होने का बहाना चाहिए. ये हर बात पर परेशान होने के लिए कमर कसे बैठे हैं. मैं कहता हूँ इस मौसम में सूखा नहीं पड़ेगा तो क्या जाड़े के मौसम में पड़ेगा?

मुझे तो लगता है कि ये लोग गर्मी के मौसम में भी इस बात के बहाने परेशान रहने के लिए तैयार हो सकते हैं कि गर्मी ढंग से नहीं पड़ रही. मैं पूछता हूँ परेशान होने की कोई लिमिट है कि नहीं?

वैसे मुझे इस बात से संतोष है कि बाढ़ आये चाहे सूखा, दोनों ही सूरत में इन्द्र की बड़ी छीछालेदर होती है. प्रजा मिलकर उन्हें ही कोसती है. जब भी गुप्तचर इस बात की जानकारी लेकर आते हैं कि फलाने इलाके से आज इन्द्र को पूरे दो सौ किलो गालियाँ मिलीं, मुझे बहुत खुशी होती है.

मेरी खुशी के दो कारण हैं. पहला तो यह कि इन्द्र ठहरे अर्जुन के मेंटर. ऐसे में उन्हें गालियों का चढ़ावा मिले तो मुझसे ज्यादा ख़ुशी और किसे होगी? दूसरी बात यह है कि सूखा झेलकर जब प्रजा इन्द्र को गरियाती है तो उसका ध्यान राजमहल के निठल्ले, निष्क्रिय कर्मचारियों और मंत्रियों की चिरकुटई पर नहीं जाता.

गुप्तचर बता रहे थे कि पानी की किल्लत की वजह से किसान आत्महत्या पर उतारू हैं. मैं पूछता हूँ, आत्महत्या करने की क्या ज़रुरत है? किसानों के इस कदम से राजमहल की कितनी बदनामी होती है, उसके बारे में ये किसान सोचते ही नहीं हैं. ठीक है, मैं मानता हूँ कि सूखे की वजह से खेती-बाड़ी में समस्या आती है लेकिन समस्या कहाँ नहीं है?

क्या हमें कम समस्याओं का सामना करना पड़ता है? जब से सूखा पड़ा है तब से हर सूबे के सूबेदार अपने इलाके को सूखा-ग्रस्त घोषित करवाने में एड़ी-छोटी का जोर लगा रहे हैं. हर सूबेदार रोज मीडिया में कुछ न कुछ बोलता रहता है. किसी के इलाके में अगर चार वर्ग किलोमीटर में भी बरसात नहीं होती तो वह चाहता है कि पूरा इलाका ही सूखा-ग्रस्त घोषित कर दिया जाए. कोई नहीं सोचता कि ऐसे में राजमहल की परेशानियाँ बढ़ जाती हैं.

अभी पिछले महीने ही चेंबर ऑफ़ कामर्स की मीटिंग में विदुर चाचा ने अपने भाषण में बताया था कि इस बार हस्तिनापुर की अर्थव्यवस्था नौ-दस प्रतिशत से ग्रो करेगी. अब सूखे की वजह से ये हाल हो गया है तो क्या ख़ाक ग्रो करेगी?

मुझे तो लगता है जैसे विदुर चाचा का भाषण सुनकर ही अर्जुन ने इन्द्र से बोलकर बरसात रोकवा दी.

खैर, ये सूखा हमारे लिए अच्छे दिन लेकर आया है. ऐसा मुझे इसलिए लगता है कि तमाम सूबेदार हमसे मिलने के लिए उतावले हो रहे हैं. ये लोग चाहते हैं कि मैं हस्तक्षेप करके उनके इलाके को सूखा-ग्रस्त घोषित करवा दूँ. कह रहे हैं कि राजमहल से जितनी भी सहायता राशि दी जायेगी, उसमें से पचीस परसेंट मुझे दे देंगे.

मुझे तो एक बार लगा कि ऐसा करना उचित नहीं रहेगा लेकिन फिर दुशासन और जयद्रथ ने बताया कि तमाम सूबों को सूखा-ग्रस्त घोषित करवाने के लिए दोनों ने कई सूबेदारों से एडवांस ले लिया है. इसी एडवांस की वजह से दुशासन ने अपनी विदेश यात्रा का कार्यक्रम बना लिया है. कह रहा था कि इस बार पूरे एक महीने के लिए उज़बेकिस्तान जाएगा ताकि वहां हो रही हरित क्रान्ति का अध्ययन कर सके.उज़बेकिस्तान में हुई हरित क्रान्ति का अध्ययन करके वो उज़बेकिस्तान का प्लान हस्तिनापुर में भी लागू करना चाहता है. उधर जयद्रथ ने प्लान बनाया है कि वो अपने किसी चमचे की पार्टनरशिप में नया धंधा शुरू करेगा.

खैर, अब सोने का समय हो गया है.

कल राजमहल में सूखे की स्थिति से निपटने के लिए मीटिंग अटेंड करना है. मैंने तो सोच लिया है कि इस मीटिंग में प्रस्ताव पारित कर के सबसे पहले मौसम विभाग के पदाधिकारियों को सस्पेंड करवाना है. ये लोग कभी मौसम की जानकारी ठीक से नहीं देते. इन लोगों को वित्त विभाग में ट्रांसफर करवा दूंगा. वे लोग भी कभी अर्थव्यवस्था के बारे में कोई जानकारी ठीक से नहीं दे सकते. ऐसे में दोनों विभागों के लोगों को सज़ा भी हो जायेगी और प्रजा में यह बात भी फ़ैल जायेगी कि राजमहल सूखे की स्थिति से निपटने के लिए कमर कस चुका है.

Monday, August 3, 2009

दुर्योधन की डायरी - पेज १३६९




कहते हैं फ्रेंडशिप डे की शुरुआत अमेरिका में हुई. अब आप तो जानते ही हैं कि पश्चिम के देशों में उन्नीसवीं और बीसवीं सदी में जो भी आविष्कार हुए, वे हमारी संस्कृति में हजारों साल पहले ही हो गए थे. परमाणु संरचना के बारे में विकसित देश हाल ही में बता पाए लेकिन हमलोगों के कणादि ऋषि ने सबकुछ पहले ही निबटा दिया था. इसके अलावा और भी बहुत कुछ है जो हमारे पूर्वज पहले ही निबटा चुके हैं.

ऐसे में मैं भी साबित कर सकता हूँ कि फ्रेंडशिप डे का अविष्कार अमेरिका ने नहीं किया. इस मामले में अमेरिका वाले झूठे हैं. अपनी संस्कृति में पांच हज़ार साल पहले से मनाया जाता रहा है. आपको विश्वास न हो तो दुर्योधन की डायरी के वह पेज पढ़िये जो उन्होंने फ्रेंडशिप डे के दिन लिखा था....:-)

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आज फ्रेंडशिप डे है. आज सुबह जब से नींद से जागा, एस एम एस आते जा रहे हैं. न जाने कहाँ-कहाँ से. अवन्ती के राजकुमार का एस एम एस तो सबसे मजेदार था. लिखा था;

"मित्रता धोतिका में सूसू की तरह होती है. अन्य जन केवल इसे देख सकते हैं लेकिन तुम इसकी उष्णता को महसूस कर सकते हो. अब मित्रता की उष्णता को महसूस करने के लिए धोतिका में सूसू मत कर देना. (स्माइली).

फ्रेंडशिप डे की हार्दिक शुभकामनाएं."


कैसे-कैसे एस एम एस? दुशासन सुबह से ही सेल लिए बैठा था. आज किसी काम को हाथ नहीं लगाया उसने. केवल एस एम एस रिसीव कर रहा हैं और भेज रहा है. न जाने कितनी गर्लफ्रेंड हैं इसकी. सन्देश भी ऐसे-ऐसे कि पढ़कर समझ नहीं आता कि मनुष्य हँसे कि रोये?

आज तो ऐसे लोग भी मेसेज भेज रहे हैं जिनसे मेरा झगड़ा चल रहा है.

सुबह-सुबह केशव ने भी एस एम एस करके फ्रेंडशिप डे मना डाला. फ्रेंडशिप हो या नहीं, मेसेज भेजकर लोग फारिग हो ले रहे हैं.

अवंती के राजकुमार का मेसेज कर्ण को फॉरवर्ड कर दिया मैंने. पढ़कर बिदक गया. तुंरत दूरभाष करके बोला; "ये किस तरह का अहमकपना है मित्र? मित्रता को सूसू बता रहे हो? अरे मित्रता क्या किसी एस एम एस की मोहताज है?"

समझ में नहीं आया कि क्या कहूँ? वैसे भी ये बंदा इतना सीरियस रहता है. मैंने सोचा कि मेरा एस एम एस देखकर थोड़ा मुस्कुरा लेगा लेकिन ये ठहरा जन्मजात सीरियस आदमी. किसी बात का असर ही नहीं पड़ता इसके ऊपर.

आज जयद्रथ और विकर्ण खूब खुश हैं. किसी कंसल्टेंट्स के कहने पर दोनों ने आठ-दस एस एम एस बनवाकर दो-चार लोगों को फॉरवर्ड कर दिया था. उसके बाद तो लगा कि प्रजा जन को और कोई काम ही नहीं है. न तो कोई अपनी दूकान पर अपनी ड्यूटी कर रहा है और न ही कोई आफिस में. सब जयद्रथ और विकर्ण के फॉरवर्ड किये मेसेज भेजने में लगे हुए हैं.

विकर्ण इस बात से खुश है कि फ्रेंडशिप डे पर हस्तिनापुर टेलिकम्यूनिकेशन्स लिमिटेड की एस एम एस से ही कमाई बहुत होगी. बता रहा था कि फ्रेंडशिप डे पर मेसेज से इसबार कंपनी की कमाई पिछले वर्ष की तुलना में तीन गुना ज्यादा होगी.

उधर जयद्रथ ने अपने किसी चमचे की पार्टनरशिप में ग्रीटिंग कार्ड्स और फ्रेंडशिप बैंड का धंधा कर लिया है. बता रहा था कि फ्रेंडशिप बैंड की बिक्री पिछले चार दिनों से खूब हुई. कार्ड्स और बैंड की दूकान के सामने ही उसने तीन-चार तथाकथित शायरों और कवियों को बैठा दिया है जो कार्ड पर चवन्नी शायरी मुफ्त में लिख रहे हैं.

शायद इसी वजह से उसका धंधा इस बार खूब जोर हुआ है.

जयद्रथ ने सुझाव दिया कि मैं एक मेसेज एकलव्य को भेजकर उससे फ्रेंडशिप कर लूँ. बता रहा था कि एकलव्य के साथ फ्रेंडशिप आगे आने वाले समय में बहुत लाभदायक होगी. एक बार तो मन में आया कि उसके साथ मित्रता कर लूँ फिर सोचा कि गुरु द्रोण ने अंगूठा तो पहले ही कटवा लिया है. ऐसे में क्या तो वो धनुष-वाण चलाएगा?

यही सोचकर मैंने जयद्रथ का यह सुझाव खारिज कर दिया.

खैर, दुशासन और जयद्रथ ने आज रात को फ्रेंडशिप डे पर पार्टी का आयोजन किया है. सुबह से ही राजमहल में लाऊड स्पीकर पर फ़िल्मी गाने बज रहे हैं. "यारी है ईमान मेरा यार मेरी ज़िन्दगी से लेकर ये दोस्ती हम नहीं तोडेंगे" तक कोई भी गीत छूटा नहीं है.

चलता हूँ अब. पार्टी के लिए परिधान के सेलेक्शन में ही बहुत समय लग जाएगा. उसके बाद माला, परफ्यूम वगैरह के लिए और समय.....

आज तो पार्टी में मज़ा आ जाएगा.

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फुटनोट:
आज पार्टी में जाने से पहले ही डायरी लिख डाली. क्या पता पार्टी में कोल्ड ड्रिंक्स और पिज्जा खाने के बाद डायरी लिखने का होश रहेगा या नहीं.