Show me an example

Thursday, August 12, 2010

ओलिम्पिक और एथेलेटिक अमरत्व




सुरेश कलमाडी को हम सब जानते हैं. न जाने कितने वर्षों से वे भारतीय एथेलेटिक्स और भारतीय ओलंपिक संघ की गाड़ी हांक रहे हैं. भारत में एथेलेटिक्स और ओलंपिक की बात होती है तो एक ही चेहरा आँख के सामने घूम जाता है और वो है सुरेश कलमाडी जी का. ठीक वैसे ही जैसे पहले भारतीय क्रिकेट की बात होने पर एक ही चेहरा आँख के सामने घूमता था और वो था जगमोहन डालमिया जी का. अब उस चेहरे को ललित मोदी के चेहरे ने रिप्लेस कर दिया है.

वैसे भारतीय क्रिकेट की बात होने पर बीच-बीच में सचिन तेंदुलकर का चेहरा भी आँख के सामने घूम जाता है. लेकिन एथेलेटिक और ओलंपिक की बात पर किसी पी टी ऊषा या फिर किसी मिल्खा सिंह का चेहरा आँख के आगे नहीं घूमता. मुझे तो लगता है कि कभी-कभी खुद मिल्खा सिंह भी मन में सोचते हुए लाउडली बात करते होंगे कि; "जब से होश संभाला, कलमाडी को सामने पाया."

कलमाडी साहब हैं कि उन्हें देखकर लगता है जैसे वे ओलंपिक और एथेलेटिक्स अमरत्व को प्राप्त कर गए हैं.

अब आपको एक राज की बात बताता हूँ. कल मेरी नज़र अचानक युवराज दुर्योधन की डायरी के पेज ९०३ पर पड़ गई. लिखा था;

"आज गुरु द्रोणाचार्य, पितामह और चचा विदुर के विरोध के बावजूद मामाश्री और पिताश्री ने सुरेश कलमाडी को एक बार फिर से भारतीय ओलंपिक संघ का अध्यक्ष बना दिया. सुरेश कलमाडी पिछले दस सालों से इस पद पर जमे हुए हैं. भारतीय ओलंपिक संघ की स्थापना दस साल पहले ऋषि भृगु के कहने पर हुई जिन्होंने एक दिन अपने कमंडल के पानी में भविष्य दर्शन करके बताया था ग्रीस में करीब तीन हज़ार साल बाद ओलंपिक के खेल शुरू होंगे इसलिए खेल-कूद में महान महाराज भरत के योगदान को याद रखते हुए भारतीय ओलंपिक संघ की स्थापना अभी कर देनी चाहिए."

युवराज दुर्योधन की डायरी का पेज ९०३ के अंश पढ़कर मुझे अचानक एक घटना याद आ गई. पिछले साल कोलकाता के इंडियन म्यूजियम से एक विदेशी एजेंट कुछ न्यूजपेपर कटिंग्स के साथ गिरफ्तार हुआ था. पूछताछ से पता चला था कि न्यूजपेपर कटिंग्स की चोरी करके वह क्रिष्टीज के एक ऑक्शन में बेचने का प्लान बनाकर आया था.

आप पढ़ना चाहेंगे कि ये न्यूजपेपर कटिंग्स में क्या लिखा हुआ था? तो पढिये.

लेकिन मुझसे यह मत पूछिए कि ये कटिंग्स मुझे कहाँ से मिलीं? मैंने (ब्लॉगर)पद और गोपनीयता की कसम खाई है इसलिए मैं नहीं बताऊंगा. आप अलग-अलग तारीख की न्यूजपेपर कटिंग्स पढ़िये.

काशी, ईसा पूर्व तारीख २० अक्टूबर, २३९

हमारे खेल संवाददाता द्बारा

आज सारनाथ में एक रंगारंग कार्यक्रम में सम्राट अशोक ने एक बार फिर सुरेश कलमाडी को भारतीय ओलंपिक संघ का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया. ज्ञात हो कि सुरेश कलमाडी को पहली बार महाराज धृतराष्ट्र ने भारतीय ओलंपिक संघ का अध्यक्ष बनाया था. सुरेश कलमाडी तब से इस पद पर जमे हुए हैं. अपनी नियुक्ति पर प्रसन्न होते हुए श्री कलमाडी ने सम्राट अशोक को धन्यवाद दिया और एक बार फिर से विश्वास दिलाया कि वे पहले भी राष्ट्र के लिए समर्पित थे और आगे भी समर्पित रहेंगे..........

दिल्ली, तारीख ७ अक्टूबर, १२०८

आज बादशाह कुतुबुद्दीन ऐबक ने एक बार फिर से सुरेश कलमाडी को भारतीय ओलंपिक संघ का अध्यक्ष बना दिया. बसद रसूल ने श्री कलमाडी के एक बार फिर अध्यक्ष बनाने पर अपना विरोध यह कहते हुए दर्ज करवाया कि श्री कलमाडी पिछले चार हज़ार से ज्यादा सालों से इस पद पर जमे हुए हैं. उनके इस विरोध को बादशाह ने ज्यादा तवज्जो नहीं दिया. बादशाह का मानना है कि श्री कलमाडी जैसा प्रशासक इतना काबिल है कि वह दस हज़ार सालों तक इस पद पर बने रहने लायक है..................

दिल्ली ९ सितम्बर, १६०४

आज बादशाह अकबर द्बारा आयोजित एक कार्यक्रम में श्री सुरेश कलमाडी को एक बार फिर से भारतीय ओलंपिक संघ का अध्यक्ष चुन लिया गया. इस मौके पर राजा बीरबल ने कुल इक्कीस चुटकुले सुनाये. अबुदुर्रहीम खानखाना ने अपने ताजे दोहे पेश किये जिनमें श्री कलमाडी के भारतीय ओलंपिक संघ के अध्यक्ष के रूप में दिए गए उनके योगदान की सराहना की गई है. श्री कलमाडी ने भारतीय ओलंपिक संघ के अध्यक्ष के रूप में अपनी प्रतिबद्धता को एक बार फिर से दोहराया......................

ज्ञात हो कि ऐसा वे लगभग पैंतालीस सौ सालों से करते आ रहे हैं.

दिल्ली १६ सितम्बर, १८४६

आज दरबार में आयोजित एक समारोह में जहाँपनाह बहादुर शाह ज़फर ने सुरेश कलमाडी को एक बार फिर से भारतीय ओलंपिक संघ का अध्यक्ष बना दिया. श्री कलमाडी ने जहाँपनाह को धन्यवाद देते हुए आभार प्रकट किया. इस मौके पर जनाब मिर्जा असदुल्लाह बेग खान 'गालिब' ने जनाब कलमाडी की शान में एक शेर भी कहा. शेर कुछ यूं था;

तुम जियो हजारों साल
साल के दिन हों पचास हज़ार

श्री कलमाडी ने मिर्जा गालिब को धन्यवाद देते हुए भारतीय ओलंपिक संघ के अध्यक्ष के रूप में किये गए आपने कार्यों का लेखा-जोखा पेश किया. लेखा-जोखा देखने के बाद एक बार फिर से साबित हो गया कि इस पद के लिए उनसे काबिल और कोई न तो पहले था और न ही होगा....

दिल्ली, १३ जून, १९४७

आज लार्ड माउंटबेटन ने अंतिम नियुक्ति करते हुए श्री सुरेश कलमाडी को भारतीय ओलंपिक संघ का अध्यक्ष बना दिया. श्री कलमाडी अपनी इस नियुक्ति पर बहुत खुश हुए. कुछ खेल पत्रकारों के बीच ऐसी अफवाह है कि क्वीन विक्टोरिया ने १८९० में ही ब्रिटिश गवर्नर को यह आदेश दिया था कि भारत को स्वतंत्र करने से पहले वे भावी भारतीय शासकों से यह वचन ले लें कि श्री कलमाडी को कभी भी उनके पद से हटाया नहीं जाएगा. सुनने में आया है कि प्रधानमंत्री श्री नेहरु यह बात मान गए हैं.

और अब आज की न्यूजपेपर रिपोर्ट..

नई दिल्ली, तारीख २० अक्टूबर, २००९

राष्ट्रमंडल खेल महासंघ (सीजीएफ) और आयोजन समिति के बीच राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारियों को लेकर चरम पर पहुंच गए गतिरोध को तोड़ने की कोशिशों में लगे खेलमंत्री एमएस गिल ने आयोजन समिति के प्रमुख सुरेश कलमाडी से मंगलवार को मुलाकात करके विवादास्पद मुद्दों पर लंबी बातचीत की।

कलमाडी मंगलवार की सुबह गिल के घर पहुंचे और उन्हें इन खेलों की तैयारियों की मौजूदा स्थिति तथा सीजीएफ और आयोजन समिति के बीच उठे विवाद के बारे में जानकारी दी। गिल ने कलमाडी से मुलाकात के बाद कहा ‘मेरी आज उनसे मुलाकात हुई और हम दोनों ने सभी मुद्दों पर विस्तापूर्वक बातचीत की। मैं जल्दी ही सीजीएफ के अध्यक्ष माइक फेनेल से............


नोट: यह एक पुरानी पोस्ट है जो पिछले साल अक्टूबर में लिखी गई है. आज एक बार फिर से इसलिए पब्लिश किया है क्योंकि इसे मेरी अगली पोस्ट के 'कर्टेन रेजर' के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है:-)

Friday, August 6, 2010

हलवा-प्रेमी राजा




उसने कभी राजा के ऊपर एहसान कर दिया होगा. ये राजे-महाराजे होते ही ऐसे हैं कि उनके ऊपर लोग खेल-खेल में भी एहसान कर डालते हैं. हमारा इतिहास राजाओं की बेचारगी के किस्सों से पटा पड़ा है. औरों की जाने दीजिये, सूर्यवंशी दशरथ जी भी कभी इतनी बेचारगी के दौर से गुजरे कि कैकेयी जी जैसों के एहसान तले दबे. नतीजा हम सभी जानते हैं. मजे की बात ये कि कभी-कभी ये राजा जी लोग कैश वगैरह पेमेंट करके मामला वहीँ पर, माने ऑन द स्पाट नहीं सल्टाते थे. बेचारे कैरीड-अवे होकर वादा कर डालते थे; "हम तुम्हें एक वचन देते हैं. अभी तो अपनी तिजोरी में रख लो. जब इच्छा हो, भंजा लेना."

दशरथ जी से प्रभावित इस राजा ने भी इस आदमी को वचन की हुंडी थमा दिया था. एक दिन इस आदमी ने अपनी तिजोरी में रखे राजा के वचन को निकाला. उसे धोया-पोंछा और उसे लेकर राजा जी के पास पहुँचा. बोला; "वो आपने मुझे जो वचन दिया था, आज मैं उसे इन-कैश करवाने आया हूँ."

राजा जी के पास कोई चारा नहीं था. एक बार तो उन्होंने सोचा कि वचन की इस हुंडी को एक कटु-वचन कहकर बाऊंस करवा दें. लेकिन इस बात की चिंता थी कि अगर ऐसा हुआ तो ये आदमी उन्हें बदनाम कर सकता था. हल्ला मच देता कि राजा जी के वचन की हुंडी तो बाऊंस हो गयी. एक प्रेस कांफ्रेंस ही तो करना था. राजा की इज्जत धूल में मिल जाती. टीवी न्यूज चैनल वाले चटखारे लेकर राजा की ऐसी-तैसी करने में देर नहीं लगाते.

इन्ही सब बातों को ध्यान में रखकर राजा जी बोले; "अच्छा मांगो. क्या चाहिए तुम्हें?"

वो बोला; "मैं कुछ दिनों के लिए राजा बनना चाहता हूँ. देखना चाहता हूँ कि राजा बनकर कैसा लगता है? राजा लोग कैसे-कैसे मजे लेते हैं?"

राजा जी बोले; "ठीक है. तुम बन जाओ राजा."

यह कहते हुए राजा जी ने पूरा इंतजाम करके उसे सिंहासन पर बैठा दिया. सिंहासन मिलते ही उसने कंधे पर लटक रही अपनी झोली को महामंत्री के हवाले कर दिया. महामंत्री को हिदायत दी कि उसकी झोली को बहुत संभालकर रखा जाय. आख़िर अब वो एक राजा की झोली थी. बड़ी कीमती.

सिंहासन पर पसरते ही इसने मज़ा लूटना शुरू कर दिया. दरबारियों को बुलावा भेजा. जब सारे दरबारी हाज़िर हुए तो उसने आदेश दिया; "सबके लिए सोने की कटोरी में हलवा पेश किया जाय."

हंसी-मज़ाक करते सबने हलवा खाया. दरबारियों को भी खूब मज़ा मिल रहा था. राजा और उसके दरबारियों की शाम हलवामयी होने लगी.

सुबह-शाम हलवे में डूबा ये राजा मस्त था. एक दिन मंत्री ने आकर कहा; "महाराज, पड़ोस के राजा ने हमारे राज्य पर चढ़ाई कर दी है."

राजाओं को भी कोई काम-धंधा तो था नहीं. शिकार करने से बोर हुए तो पड़ोस के राज्य पर चढ़ाई कर दो.

मंत्री की बात सुनकर राजा बोला; "चढ़ाई कर दी? अच्छा कोई बात नहीं. दरबारियों को बुलाओ."

सारे दरबारी आ पहुंचे. सबके आने के बाद राजा ने फ़िर वही फरमाइस की; "सबके लिए हलवा ले आओ."

प्रेम से हलवा भक्षण किया गया. हलवा खाकर सारे दरबारी खुश. दरबार खारिज.

दूसरे दिन मंत्री फिर दौड़ते हुए आया. बोला; "महाराज पड़ोस के राज्य का राजा तो हमारे नगर में प्रवेश कर चुका है."

राजा ने कहा; "अच्छा! हमारे नगर में प्रवेश कर चुका है? कोई बात नहीं. दरबारियों को बुलाओ."

फिर दरबारियों को बुलाया. फिर वही हलवे की फरमाइस. फिर वही हलवा भक्षण कार्यक्रम और फिर से दरबार खारिज. ऐसे ही एक दिन और बीता.

तीसरे दिन मंत्री फिर दौड़ता हुआ आया. बोला; "महाराज, पड़ोस का राजा तो आपके महल में प्रवेश कर चुका है."

मंत्री की बात सुनकर उसने बिना किसी चिंता के कहा; "महल में प्रवेश कर चुका है? अच्छा, एक काम करो. मेरी झोली ले आओ. वही झोली जो मैंने तुम्हें रखने के लिए दी थी."

झोली को हाज़िर किया गया. उसने अपनी झोली कंधे पर टांगी और वहां से चलने लगा. मंत्री ने कहा; "महाराज कहाँ जा रहे हैं? इस समय सिंहासन छोड़कर जाना उचित नहीं. "

वो बोला; "भइया, मैं तो हलवा खाने आया था. मैंने पेट भरकर अपनी साध पूरी कर ली. अब तुम जानो और तुम्हारे राजा. मैं तो चला."

ये कहते हुए वो आदमी निकल लिया.

इस हलवा-प्रेमी राजा का 'लेटेस्ट एडिशन' इस समय.....

Wednesday, August 4, 2010

वर्ष के सर्वश्रेष्ठ सम्मान वितरक - हलकान 'विद्रोही' .




सुबह-सुबह उनके दर्शन हो गए तो सवा सौ ग्राम शुद्ध तुकबंदी वाला वह गाना याद आ गया कि; 'राह में उनसे मुलाकात हो गई, जिससे डरते थे वही बात हो गई....ल ला ला ला ल ला ला ला ला..'
'

जी हाँ, आज सुबह-सुबह हलकान भाई से मुलाकात हो गई. इधर-उधर की बातें हुईं. उन्होंने बिभूति नारायण राय के बयान की निंदा की. उसके बाद मंहगाई पर चिंतित हुए. बात आगे बड़ी तो सुरेश कलमाडी की आलोचना करते हुए इस बात पर चिंता व्यक्त की कि सरकार हम नागरिकों का पैसा पानी की तरह बहा रही है. पैसे के पानी की तरह बहने की बात शुरू हुई तो याद आया कि मानसून की कमी और बाढ़ पर भी बात कर सकते हैं. फिर उसपर भी बात हुई. उसके बाद उन्होंने सरकार की नीतियों पर क्षोभ प्रकट करते हुए आशंका जताई कि आनेवाला समय मिडिल क्लास और लोवर मिडिल क्लास के लिए बहुत कष्टदायक होगा.

बात करते-करते जब मुझे यह लगने लगा कि अब लगभग सभी मुद्दे ख़त्म हो चुके हैं तभी उन्होंने अपनी वसीयत की बात शुरू कर दी. उन्होंने अपने ब्लॉग पर उनकी वसीयत टाइप करने के लिए मुझे धन्यवाद् जैसा कुछ देते हुए कहा; "दूसरे के लिए इतना कुछ करने का जज्बा मैंने बहुत कम ब्लॉगर में देखा है. मेरी वसीयत अपने ब्लॉग पर पब्लिश करने के लिए मैं पोस्ट लिख कर तुम्हें सम्मानित करना चाहता हूँ."

बस उनकी बात सुनकर मैं डर गया. मुझे लगा कि; 'जिस बात से हमेशा डरते रहे, कहीं ऐसा न हो वह हो ही जाए. ऐसा न हो कि हलकान भाई सचमुच मुझे सम्मानित कर दें. वैसे भी मुझे हमेशा डर लगा रहता है कि ब्लॉग पुरस्कार देने वाले किसी दिन पकड़कर सम्मानित कर देंगे तब क्या करूँगा? देखेंगे न लेते बनेगा और न ही ना करते.'

खैर, मैंने उनसे कहा; "हलकान भाई, जाने दीजिये न. क्या सम्मानित करना है? आपने उस पोस्ट पर कमेन्ट कर दिया, यही मेरे लिए बहुत बड़ी बात है."

वे बोले; "केवल कमेन्ट से ब्लॉगर का सम्मान पूरा नहीं होता. ब्लॉगर का असली सम्मान तब होता है जब उसके योगदान के लिए उसे पोस्ट लिखकर सम्मानित किया जाय."

मैंने कहा; "जाने दीजिये न हलकान भाई. मैंने आपकी वसीयत ही तो अपने ब्लॉग पर छापी थी. वह तो मुझे वैसे भी छापना ही था."

वे बोले; "अरे ऐसे कैसे जाने दें? नहीं जाने दूंगा.मैं तुम्हें सम्मानित करके रहूँगा."

फिर कुछ सोचने के बाद बोले; "लेकिन कौन सी कैटेगरी में सम्मानित करूं तुम्हें?"

मैंने कहा; "मैं समझा नहीं."

मेरी बात सुनने के बाद सोचते रहे. अचानक बुदबुदाए; "अच्छा, वर्ष का सर्वश्रेष्ठ टंकक सम्मान कैसा रहेगा?"

मैंने कहा; "टंकक? टंकक का मतलब क्या होता है, हलकान भाई? मैं समझा नहीं?"

वे बोले; "अरे टंकक का मतलब टंकण करने वाला. मतलब टाइप करने वाला. तुमने मेरी वसीयत अपने ब्लॉग पर जो छापी उसके लिए तुमने टाइप तो किया ही न."

कुछ समझ में नहीं आ रहा था. मैं सोचने लगा कि सम्मान मिलेगा और वो भी टंकक का! बड़ी दुविधा में फँसा था. क्या कहूँ हलकान भाई से? उन्हें सीधा-सीधा मना कर दूँ?

बीमारी-उपरान्त पटखनी-पांड़े सम्मानग्रस्त ब्लॉगर
मेरी 'सोचनीय' अवस्था को शायद वे भांप गए. मुझसे बोले; "अरे चिंता मत करो. मैं अपने ब्लॉग पर ज्ञान जी को भी सम्मानित करने वाला हूँ. साथ-साथ तुम्हें भी कर दूंगा. लोग यह तो नहीं कहेंगे कि केवल एक को सम्मानित किया और दूसरे को नहीं किया."

उनकी बात सुनकर मन में आया कि; 'मतलब मेरे साथ ज्ञान भइया भी गए?'

वैसे मुझे बड़ा अजीब लग रहा था. अजीब कैटेगरी है; वर्ष का सर्वश्रेष्ठ टंकक. फिर मन में उत्सुकता जागी कि हलकान भाई से पूछें कि वे भइया को कौन सी कैटेगरी में सम्मानित कर रहे हैं? मैंने उनसे पूछा; "वैसे हलकान भाई, आप ज्ञान भइया को कौन सी कैटेगरी में सम्मानित कर रहे हैं?"

वे बोले; " अभी तक तय नहीं हुआ है. असल में कैटेगरी तय करने वाली हमारी समिति में ज्ञान जी के सम्मान की कैटेगरी को लेकर मतभेद हो गया है. लेकिन चिंता करने की बात नहीं है. हम जल्द ही इस मतभेद को सुलझा लेंगे."

मैंने कहा; "मतलब अभी तक तय नहीं हुआ है? वैसे क्या-क्या कैटेगरी हो सकती है उनके लिए?"

वे बोले; "देखो तीन कैटेगरी में मामला उलझा हुआ है. हमारी समिति के दो मेंबर चाहते हैं कि ज्ञान जी को वर्ष का सर्वश्रेष्ट मार्निंग ब्लॉगर सम्मान दिया जाय. दो मेंबर चाहते हैं कि उन्हें वर्ष का सर्वश्रेष्ठ गंगा प्रचारक ब्लॉगर सम्मान दिया जाय. वही समिति के एक मेंबर इस बात पर टिके हुए हैं कि ज्ञान जी को वर्ष का सर्वश्रेष्ठ संचारक ब्लॉगर सम्मान दिया जाय."

मैंने कहा; "संचारक? यह कौन सी कैटेगरी हुई?"

वे बोले; "संचारक ब्लॉगर का मतलब तो मुझे भी नहीं मालूम है लेकिन अगर हमारी समिति के मेंबर ने ऐसी कोई कैटेगरी बनाई है तो उसका कुछ न कुछ मतलब ज़रूर होगा."

मैंने कहा; "तो आपने बाकायदा समिति बना रखी है जो कैटेगरी का आविष्कार करती है? जिससे ब्लॉगर भाइयों और बहनों को पकड़ कर सम्मानित किया जा सके?"

वे बोले; "अरे इतना बड़ा महोत्सव है. बिना तैयारी के कैसे शुरू कर देता? बाकायदा समिति है. फाइव मेंबर कमीटी . मेजोरिटी का डिसीजन फाइनल होता है. हाँ, कभी-कभी किसी कैटेगरी पर झमेला हो जाता है जैसे ज्ञान जी वाली कैटेगरी पर. ऐसी परिस्थिति में मेरा निर्णय फाइनल और मान्य होता है."

मैंने कहा; "तो हलकान भाई, इसका मतलब आप और भी लोगों को सम्मानित करेंगे? वैसे और कौन-कौन सी कैटेगरी है?"

वे बोले; "बहुत लम्बी लिस्ट है कैटेगरी की. सुनाना शुरू करूँगा तो पूरा एक दिन लगेगा. अभी तक सत्तर कैटेगरी का अनाऊँसमेंट हो चुका है. लेकिन अभी भी करीब एक सौ पैसठ कैटेगरी बाकी हैं. कुछ प्रमुख कैटेगरी हैं जैसे सर्वश्रेष्ठ आंचलिक जूनियर ब्लॉगर, सर्वश्रेष्ठ आंचलिक सीनियर ब्लॉगर, सर्वश्रेष्ठ आंचलिक प्रचारक, सर्वश्रेष्ठ आंचलिक प्रताड़क, सर्वश्रेष्ठ कानूनी ब्लॉगर, सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मी ब्लॉगर, सर्वश्रेष्ठ भोजपुरी फ़िल्मी ब्लॉगर, सर्वश्रेष्ठ......"

मैंने कहा; "बस-बस...हलकान भाई मैं समझ गया. आप महान काम कर रहे हैं."

वे बोले; "ब्लागिंग का मतलब केवल पोस्ट और टिप्पणी लिखना नहीं होता है. ब्लागिंग का मतलब सम्मान भी होता है. ब्लागिंग का मतलब अपमान भी होता है. ब्लागिंग का मतलब गुमनाम भी होता है. ब्लागिंग का मतलब...."

मैंने कहा; "समझ गया हलकान भाई. पूरी तरह से समझ गया."

वे बोले; "तो तुम्हारा वर्ष के सर्वश्रेष्ठ टंकक के रूप में सम्मान पक्का..."

पुरस्कार प्रदाता वितरक माननीय हलकान विद्रोही

क्या कहता? कुछ नहीं बोला. हाँ यह सोचते हुए उनसे विदा हुआ कि जब तक पोस्ट लिख रहा हूँ तबतक ठीक है, जिस दिन पोस्ट नहीं लिख पाऊँगा उसी दिन से सम्मान देने का धंधा शुरू करूँगा और सबसे पहले हलकान भाई को वर्ष के सर्वश्रेष्ठ सम्मान वितरक के ख़िताब से सम्मानित करूँगा.