Show me an example

Wednesday, September 8, 2010

मुन्नी जी, कोई भी बदनामी आख़िरी नहीं होती.




बहुत हो चुका. मुन्नी की बदनामी अब और बर्दाश्त नहीं होती. पिछले एक महीने से मुन्नी है कि उठते-बैठते बदनाम हुई जा रही है. बार-बार लगातार. सुबह हुई नहीं कि रेडिओ पर बदनामी का नगाड़ा पीट दिया. दोपहर में टीवी पर बदनामी की ढोलक पीट दी. रात को, इंटरटेनमेंट चैनल पर, फ़िल्मी चैनल पर, म्यूजिक चैनल पर, न्यूज चैनल पर, बदनामी की शहनाई बजा दी. कल तो सड़क पर बदनाम हो गई. मैंने देखा कि एक रिक्शावाला अपने रिक्शे में रेडिओ टाँगे रिक्शा चलाते जा रहा था कि अचानक मुन्नी 'रिश्के' पर बदनाम होने लगी. आस-पास के लोग चौंक करके मुन्नी की बदनामी सुनने लगे. कुछ ने ऐसी भाव-भंगिमा बनाई जिसे देखकर लगा कि बन्दा सोच रहा है कि कहीं मुन्नी ने उसी को तो डार्लिंग नहीं कहा? कहीं उसी के लिए तो बदनाम नहीं हुई?

कोई जगह नहीं बची है जहाँ मुन्नी बदनाम नहीं हो रही. ऊपर से तुर्रा ये कि; 'मैंने बदनामी का यह कार्यक्रम तो डार्लिंग तेरे लिए किया है." जैसे कह रही हो कि; "बदनाम होने का मेरा कोई प्लान नहीं था लेकिन हे डार्लिंग तुम मुझे इतने क्यूट लगे कि कि मैंने नाम को छोड़कर बदनाम होने का फैसला कर डाला."

मुन्नी का डार्लिंग मुन्नी के साथ जहाँ-तहाँ बदनामी का कार्यक्रम आयोजित कर ले रहा है. होड़ सी लगी है लोगों में.देखकर लगता है जैसे आक्शन सिस्टम के तहत बोली लग रही है और मुन्नी और उसके डार्लिंग से भाई लोग सिफारिश कर रहे हैं कि; "डार्लिंग जी, आज अगर मुन्नी को हमारे चैनल पर बदनाम कर देते तो बहुत बढ़िया होता. हम बड़ी आशा लेकर आये हैं कि मुन्नी जी पहले हमारे ही चैनल पर बदनाम होंगी. ना मत कहियेगा."

या फिर इसका उल्टा भी हो सकता है यानि डार्लिंग जी चैनल वालों से कह रहें हों कि; "भाई साहब, आप इजाजत दें तो मैं अपनी मुन्नी को आपके चैनल पर प्राइम टाइम पर बदनाम कर लूँ."

कहीं-कहीं तो वे भाई भी मुन्नी को अपने चैनल पर बदनाम कर लेना चाहते हैं जिनके चैनल पर छोटे-छोटे बच्चे गाने में अपनी किस्मत और आवाज़ आजमा रहे हैं. उधर बच्चे स्टेज पर गाना गाने के लिए तैयार हुए और इधर डार्लिंग अपनी मुन्नी को लिए पहुँच गए उसे बदनाम करने के लिए. बच्चे भी मुन्नी की बदनामी की सरगम सुन ले रहे हैं ताकि अपने गाने में कभी फिट कर सकें.

एक चैनल पर देखा कि मुन्नी को बदनामी के गुर सिखाने वाली जज के रूप में बैठी थी. बस फिर क्या था, मुन्नी अपने डार्लिंग जी को पर्स की तरह दबाये पहुँच गई और फटाफट बदनाम हो ली. बदनामी का गुर सिखाने वाली फारहा जी ने भी साथ दिया तो बदनामी में चार चाँद लग गए. डार्लिंग जी भी खुश. मन ही मन सोच रहे होंगे कि; "आज तो बढ़िया बदनामी हुई. ऐसी बदनामी पिछले चैनल पर नहीं हो पाई थी."

हाँ, कभी-कभी यह ज़रूर लग रहा है जैसे मुन्नी इतनी भारी मात्रा में बदनाम होकर समाज में डिवाइड क्रियेट कर रही हैं. आखिर मुन्नी जी को भी सोचना चाहिए कि इतनी बड़ी मात्रा में बदनाम होकर वे न जाने कितनों को इन्फिरियारिटी कम्प्लेक्स दे रही होंगी और उनकी बदनामी देखकर न जाने कितने अपने भाग्य को कोस रहे होंगे कि; "हे भगवान, हमने क्या गुनाह किया था जो हमें बदनामी से महरूम रखा? मुन्नी जितनी न सही लेकिन उतनी बदनामी तो दे ही सकते थे कि हमें भी बदनाम होने पर गर्व होता."

शायद इसी इन्फिरियारिटी कम्प्लेक्स का नतीजा है कि कोई मुन्नी जी से पूछ नहीं रहा है कि; "क्या ज़रुरत है इतना बदनाम होने की? वह भी इस स्टाइल से बदनाम हुई हो कि ग्रेस पूरी तरह से एब्सेंट है. बदनाम होना है तो हो लो लेकिन ग्रेसफुली बदनाम हो. क्या तुम्हें यह नहीं पता कि बदनाम होने के बाद जब तुम झंडु बाम हो रही हो तो बहुत चीप लग रही हो? उस समय बदनामी रसातल में चली गई है?"

वैसे भी एक-दो बार कहीं बदनाम हों लें वह ठीक है लेकिन रोज-रोज हर दो घंटे पर बदनाम होना कहाँ तक जायज है? बदनामी की कोई लिमिट है कि नहीं? देखकर लगता है जैसे आपकी बदनामी ही भारत की प्रगति पर चार चाँद लगाएगी? अरे चैनल वालों का क्या है? उनके चैनल तो बदनामी पर ही चल रहे हैं. आज आपकी बदनामी है कल किसी और की होगी. हर न्यूज चैनल पर कोई न कोई नीलाभ, रोहित और अमिताभ बैठे हैं जो हर घंटे आपकी बदनामी पर विशेष झाड़े जा रहे हैं. कई बार तो लगता है जैसे चलता हुआ प्रोग्राम बंदकर ब्रेकिंग न्यूज दिखाना न शुरू कर दें कि मुन्नी पाँच मिनट पहले शाबाश चैनल पर एक बार फिर से बदनाम हो गई हैं.

तो हे मुन्नी जी, माना कि आपके हिसाब से आपने बदनामी की दुनियाँ में नया रिकार्ड बना डाला है लेकिन आप बदनामी के हथौड़े से हमारे सिर पर कितनी बार चोट करेंगी? हम आपको बताना चाहते हैं कि अब सिर तो क्या आपके बदनाम हथौड़े की चोट से हमारी आँखें भी सूज गई हैं. अब आपकी बदनामी बर्दाश्त के बाहर हो गई है. इसलिए अपनी बदनामी पर लगाम लगायें. इस बात को ध्यान में रखें कि बदनामी क्या है कल कोई और आएगा और वह आपसे भी ज्यादा बदनाम होकर दिखा देगा. कोई भी बदनामी आख़िरी नहीं होती.

Saturday, September 4, 2010

सेलिंग वुवुज़ेला थ्रू पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम




"बट बट बट मिस्टर पवार..मिस्टर पवार, टेल अस टूनाइट ऑन दिस चैनल, ह्वाट इज राँग इन ओबेयिंग सुप्रीमकोर्ट ऑर्डर? आई मीन, इजंट इट रिस्पोंसिबिलिटी ऑफ द गाव्मेंट टू डिस्चार्ज इट्स ड्यूटी?" अरनब गोस्वामी ने अपने चिर परिचित अंदाज़ में शरद पवार से पूछा.

अरनब की बात सुनकर पवार बोले; "यू सी मिस्टर गोस्वामी, आई एम आन्स्वरेबल नॉट ओनली टू सुप्रीम कोर्ट बट आल्सो टू द इंटर्नेशनल कम्यूनिटी. आई एम आल्सो प्रेसिडेंट ऑफ आई सी सी. इफ आई स्पेंड आल माई टाइम एक्ज्क्यूटिंग सुप्रीमकोर्ट ऑर्डर, ह्वेन विल आई वर्क फॉर आई सी सी? आल्सो, प्लीज नोट दैट जस्ट ऐज इट इज नॉट ईजी टू पनिश क्रिकेटर्स इन फिक्सिंग स्कैंडल्स, इट्स आल्सो नॉट ईजी टू डिस्ट्रीब्यूट वन ट्वेंटी टू मिलियन बुबुज़ेला थ्रो पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम".

इतना कहकर शरद पवार चुप हो गए.

बात यह थी कि टाइम्स नाऊ के प्राईम टाइम पर रोज की तरह पैनल डिस्कशन चल रहा था.

फ़ुटबाल वर्ल्डकप में वुवुज़ेला की अपार सफलता को देखते हुए और देशवासियों में खेल की भावना जागृत करने के लिए कॉमनवेल्थ गेम्स की आर्गेनाइजिंग कमिटी ने किसी विदेशी कंपनी से एक करोड़ बाईस लाख बुबुज़ेला इम्पोर्ट कर लिया था. स्टेडियम वगैरह के समय पर तैयार नहीं होने की वजह से और इन गेम्स में भ्रष्टाचार की बातों की वजह से आर्गेनाइजिंग कमिटी यह भूल गई कि उसे इम्पोर्ट किये गए बुबुज़ेला को बाज़ारों में किसी रिटेल चेन के थ्रू बेंचना भी था. एक रेलवे यार्ड में खुले में रखे गए ये बुबुज़ेला बरसात की वजह से वैसे ही सड़ रहे थे जैसे सरकार द्वारा खरीदा गया गेंहू. ऊपर से खुले में रखे जाने की वजह से कोई भी यार्ड से वुवुज़ेला की चोरी कर ले रहा था.

एक दिन पी आई एल के धंधे में माहिर किसी महापुरुष को याद आया कि सरकार को घेरने का यह सही समय था. सरकार की फजीहत तो होगी ही, फ्री में प्रचार भी मिलेगा. उसने न केवल इस बात पर शोर मचाया कि रेलवे यार्ड में इतनी बड़ी मात्रा में वुवुज़ेला सड़ रहे थे बल्कि उसने कुछ जासूसी की अपनी काबिलियत और कुछ आर टी आई के सहारे यह पता भी लगाया कि जहाँ एक बुबुज़ेला बाज़ार में चार रूपये में बिकता है वहीँ कॉमनवेल्थ गेम्स आर्गेनाइजिंग कमिटी ने विदेशी कंपनी को एक बुबुज़ेला के लिए तीन सौ नब्बे रूपये चालीस पैसे पेमेंट किये थे. ऊपर से इतना पैसा खर्च करने के बाद इम्पोर्ट किया गया पूरा कन्साइन्मेन्ट रेलवे यार्ड में सड़ रहा था.

उसने इन्ही बातों के ऊपर सुप्रीमकोर्ट में एक पी आई एल फ़ाइल कर दिया था.

पी आई एल की बात सुनकर टीवी न्यूज चैनल वालों की तो जैसे चांदी हो गई थी. पंद्रह दिन बीत गए थे और कॉमनवेल्थ गेम्स में भ्रष्टाचार का एक भी नया मुद्दा नहीं आया था. इन गेम्स के लिए खरीदे गए चार हज़ार रूपये प्रति रोल के टायलेट पेपर की बात अब तक पुरानी हो गई थी. बस फिर क्या था, सारे चैनल वाले एक बार फिर से कलमाडी और सरकार के पीछे पड़ गए थे.

पी आई एल की सुनवाई पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से जवाब माँगा कि क्यों नहीं खरीदे गए वुवुज़ेला देशवासियों को सार्वजानिक वितरण प्रणाली यानि पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम के थ्रू बेंच दिए जाएँ? ऐसा करने से नुक्सान की भरपाई हो सकेगी. सुप्रीमकोर्ट ने सरकार को जवाब देने के लिए एक सप्ताह का समय दिया था.

सरकार ने एक ग्रूप ऑफ मिनिस्टर्स बना दिया जो मीटिंग वगैरह करके बताएगा कि वुवुज़ेला के मामले में सरकार को क्या कदम उठाने चाहिए. ग्रूप ऑफ मिनिस्टर्स की मीटिंग हुई. जी ओ एम के हेड ने मीटिंग शुरू करते हुए कहा; "ऐज उइ नो, सुप्रीमकोर्ट हैज आस्क्ड दा गभारमेंट टू फाईल आ रिप्लाई ईन दी मैटार ऑफ दीस वुवुज़ेला इम्पोर्ट केस."

जी ओ एम के एम मेंबर ने कहा; "माननीय सुप्रीमकोर्ट तो आजकल हर बात में सरकार को निर्देश दे रहे हैं. लगता है जैसे विधायिका की कोई इज्ज़त ही नहीं है. अभी हाल ही में ऑर्डर दिया कि सड़ता हुआ गेंहू गरीबों में बाँट देना चाहिए. अरे ऐसे कैसे बाँट दिया जाय?"

एक और मेंबर ने कहा; "बिलकुल. अरे सरकार का काम करने का अपना तरीका है कि नहीं? जब इच्छा हुई तब गेंहू गरीबों में बाँट दो. ऐसे सरकार चलती है क्या?"

हेड बोले; "बाट, उइ हैब टू टेक ए स्टांड. उइ उविल हैब टू रिप्लाई टू दा सुप्रीमकोर्ट. इट्स मैटार ऑफ ग्रेट इम्पार्टेंस."

एक मेंबर बोले; "वो तो है. वैसे भी सुप्रीमकोर्ट इस बात पर नाराज़ है कि कृषिमंत्री ने सड़ते हुए अनाज को गरीबों में बाँट देने की बात पर दो टूक जवाब दे दिया कि वे ऐसा नहीं कर सकते. अगर माननीय सुप्रीम कोर्ट और नाराज हो गए तो सरकार की बड़ी बेइज्जती होगी."

सभी मेम्बर्स सोच रहे थे कि सुप्रीम कोर्ट को कैसे शांत किया जाय? क्या जवाब दिया जाय? सरकार की नाक कैसे बचाई जाय?

तभी धीर-गंभीर श्वेत वस्त्र पहने चश्मा लगाये एक मेम्बर जो अपने ब्रेनवेव के लिए मशहूर हैं, ने कहा; "सी, ह्वाट वी कैन डू इज वी कैन रिप्लाई टू द आनरेबल सुप्रीम कोर्ट दैट वी आर रेडी टू सेल वुवुज़ेला थ्रू पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम. बाई डूइंग दिस, वी विल बी एबिल टू नॉट ओनली सेव द गोवंमेंट्स फेस बट आल्सो न्यूट्रेलाइज द इफेक्ट्स ऑफ आवर इन-एबिलिटी टू डिस्ट्रीब्यूट राटिंग ग्रेन्स टू पूअर्स."

जी ओ एम के हेड ने पूछा; "बाट इयु बिलीभ, दीस वूड बी ए नाईस आईडिया टू डू दीस?"

उस मेंबर ने कहा; "प्लीज डोंट डाऊट माई आइडीयाज. हैड आई बीन फिनांस मिनिस्टर इन योर प्लेस, आई वूड हैव इंट्रोड्यूसड नक्सल काम्बैटिंग सेस बाई नाऊ एंड गाव्मेंट वूड हैव हैड ए न्यू अवेन्यू ऑफ इनकम."

उनकी बात का समर्थन करते हुए एक और मेंबर ने कहा; "आप सही कह रहे हैं. अरे जनता को अनाज नहीं देंगे तो कुछ तो देंगे जिससे उसका मन लगा रहे. और इसके लिए वुवुज़ेला से बढ़िया और क्या होगा? जनता कॉमनवेल्थ गेम्स में मैराथन देखेगी और वुवुज़ेला बजाएगी. उसका मन भी लगा रहेगा और सरकार को भी विरोध वगैरह से राहत मिलेगी."

दो दिन बाद सरकार ने सुप्रीमकोर्ट को जो रिप्लाई दिया उसमें लिखा था;

माननीय सुप्रीमकोर्ट को यह बताते हुए सरकार को प्रसन्नता हो रही हैं कि वह सार्वजनिक वितरण प्रणाली की सहायता से कॉमनवेल्थ गेम्स आर्गेनाइजिंग कमिटी द्वारा आयात किये गए वुवुज़ेला को आम जनता को सस्ते दरों पर बेंचने के लिए लिए तैयार है. सरकार ने यह फैसला भी किया है कि चूंकि आर्गेनाइजिंग कमिटी ने केवल एक करोड़ बाईस लाख वुवुज़ेला का आयात किया है और हमारे देश की आबादी देखते हुए यह संख्या बहुत कम है इसलिए सरकार करीब तीस करोड़ वुवुज़ेला और आयात करने का प्रस्ताव रखती है. इसके लिए जल्द ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर टेंडर फ्लोट किये जायेंगे जिससे देश की जनता को पर्याप्त मात्रा में वुवुज़ेला उपलब्ध कराया जा सके. सरकार देश की जनता को सस्ते दरों पर वुवुज़ेला उपलब्ध कराने के लिए कटिबद्ध है.
देश की जनता वुवुज़ेला का इंतज़ार कर रही है. कहते हैं लगातार झुनझुना बजाते हुए लोग बोर भी हो जाते हैं.

Tuesday, August 31, 2010

इंडिया टुडे - राष्ट्रीय ब्लॉग सर्वे - २०१०






इंडिया टुडे ने जुलाई महीने के अंतिम सप्ताह में देश भर में हिंदी ब्लागिंग पर एक सर्वेक्षण किया. पत्रिका के अनुसार यह सर्वेक्षण अपनी तरह का पहला सर्वेक्षण है जो हिंदी ब्लागिंग के लिए न सिर्फ महत्वपूर्ण है अपितु उसकी दिशा तय करने में निर्णायक साबित होगा.

इस मामले में पत्रिका के प्रधान सम्पादक का कहना है; "हिंदी ब्लागिंग स्वतंत्र अभिव्यक्ति का ऐसा माध्यम बन चुकी है जिसका भविष्य तो उज्जवल है ही, वर्तमान भी कम महत्वपूर्ण नहीं है. लेखन के मीडियम के तौर पर हिंदी ब्लागिंग अब पर्याप्त रूप से पुरानी हो चुकी है. इतनी पुरानी हो चुकी है कि अब तो इस मीडियम का विस्तार दलों, गुटों और एशोसियेशन के तौर पर भी हो रहा है. आज पूरे भारतवर्ष में बीस हज़ार से ज्यादा हिंदी ब्लॉगर हैं. यही कारण था कि हमने पहली बार इतने विशाल स्तर पर एक सर्वे किया. हमने पूरे देश के अट्ठारह बड़े और तैंतीस छोटे शहरों में अपने संवाददाताओं को भेजकर करीब आठ हज़ार हिंदी ब्लागरों से कुल तेरह प्रश्न किये और उनपर उनका मत लेते हुए यह सर्वे करवाया जिसमें कई चौकानेवाले तथ्य सामने आये हैं. आशा है कि हमारी पत्रिका हिंदी ब्लागिंग पर आगे भी सर्वेक्षण करती रहेगी. हम अपना यह सर्वेक्षण राष्ट्र को समर्पित करते हैं."

प्रस्तुत है सर्वेक्षण का परिणाम जो इंडिया टुडे के १६-२३ सितम्बर अंक में प्रकाशित होगा. वैसे आपको इंतज़ार करने की ज़रुरत नहीं है, सर्वेक्षण के परिणाम आप यहीं बांचिये.

०१. ब्लागरों से जब यह पूछा गया कि "उनकी ब्लागिंग का उद्देश्य क्या है?" तो कुल ५७.३७ प्रतिशत ब्लॉगर का यह मानना था कि ब्लागिंग का कोई उद्देश्य हो, यह ज़रूरी नहीं है. जहाँ बड़े शहरों में इस तरह का विचार रखने वाले कुल ४०.२६ प्रतिशत लोग थे वहीँ छोटे शहरों में यह आंकड़ा ५२.१८ प्रतिशत रहा. बड़े शहरों में करीब १९.२७ प्रतिशत ब्लॉगर का मानना था कि वे इन्टरनेट पर अमर होने के लिए ब्लागिंग कर रहे हैं वहीँ ९.८३ प्रतिशत ब्लॉगर यह मानते हैं कि वे अपनी ब्लागिंग से समाज को बदल डालेंगे. छोटे शहरों में समाज बदलने को ब्लागिंग का उद्देश्य बनाने वाले ब्लागरों का आंकड़ा करीब १७.३१ प्रतिशत रहा.

०२. जब ब्लागरों से यह सवाल पूछा गया कि; "ब्लागिंग की वजह से सम्बन्ध बनाने में सहायता मिलती है?" तो ७०.१९ प्रतिशत ब्लॉगर यह मानते हैं कि ब्लागिंग की वजह से सम्बन्ध बनते है. वहीँ १९.८३ प्रतिशत ब्लॉगर यह स्वीकार करते हैं कि ब्लागिंग की वजह से सम्बन्ध बिगड़ते है. ७.१२ प्रतिशत ब्लॉगर का यह मानना है कि ब्लागिंग की वजह से सम्बन्ध बनते-बिगड़ते रहते हैं. बाकी ब्लॉगर यह मानते हैं कि समबन्ध बने या बिगडें, उन्हें इसकी परवाह नहीं है.

०३. एक और महत्वपूर्ण प्रश्न था; "ब्लागिंग करने की वजह से क्या ब्लॉगर को एक पारिवारिक माहौल मिलता है?" इस प्रश्न पर ८९.१६ प्रतिशत ब्लॉगर का मानना था कि उन्हें ब्लागिंग में आने के बाद एक ही चीज मिली है और वह है पारिवारिक माहौल. ६.८७ प्रतिशत ब्लॉगर का ऐसा मानना है कि वे स्योर नहीं है कि उन्हें पारिवारिक माहौल मिला है या नहीं? ऐसे ब्लॉगर का मानना है कि अगर झगड़ा वगैरह होता रहे तो पारिवारिक माहौल का एहसास बना रहता है परन्तु चूंकि झगड़ा परमानेंट फीचर नहीं है इसलिए वे अपने विचार पर पूरी तरह जम नहीं सकते.

०४. एक प्रश्न कि; "ब्लागिंग की वजह से ब्लॉगर को कौन-कौन से रिश्तेदार मिलने की उम्मीद रहती है?" इस प्रश्न के जवाब में ८.९३ प्रतिशत ब्लॉगर का कहना था कि वे एक 'फादर फिगर' मिलने की उम्मीद से रहते हैं वहीँ ४५.६६ प्रतिशत लोग भाई-बहन मिलने की उम्मीद करते हैं. करीब १४.५७ प्रतिशत ब्लॉगर को एक अदद चाचा मिलने की उम्मीद रहती है तो १९.३१ प्रतिशत ब्लॉगर एक दोस्त मिलने की उम्मीद में ब्लागगिंग करते हैं. केवल ७.५६ प्रतिशत ब्लॉगर यह उम्मीद करते हैं कि उन्हें पूरा परिवार ही मिल जाए जिससे उन्हें किसी रिश्ते की कमी नहीं खले. करीब ३.१६ प्रतिशत लोग यह मानते हैं कि पारिवारिक रिश्तों से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि उन्हें टिप्पणियां मिले.

०५. हमारे संवाददाताओं ने ब्लागरों से एक सवाल किया कि; "क्या केवल अपना ब्लॉग लिखकर ब्लॉगर बना जा सकता है?" इस सवाल के जवाब में ह्वोपिंग ९७.६८ प्रतिशत ब्लॉगर का यह मानना था कि केवल ब्लॉग लिखकर ब्लागिंग नहीं की जा सकती. जहाँ २२.४४ प्रतिशत ब्लॉगर का यह मानना था कि वे अपना ब्लॉग लिखने के अलावा चर्चा करना पसंद करते हैं वहीँ ५३.७१ प्रतिशत ब्लॉगर का यह मानना है कि वे ब्लॉग लिखने के अलावा ब्लॉगर सम्मलेन को महत्वपूर्ण मानते हैं. १८.८८ प्रतिशत ब्लॉगर यह मानते हैं कि लिखने के अलावा वे एशोसियेशन बनाने को ब्लागिंग का अभिन्न अंग मानते हैं. ४१.५१ प्रतिशत ब्लॉगर यह मानते हैं कि लिखने के अलावा ब्लॉगर सम्मलेन, एशोसियेशन और गुटबाजी करके ही एक सम्पूर्ण ब्लॉगर बना जा सकता है. वहीँ ७.३९ प्रतिशत ब्लॉगर यह मानते हैं कि लेखन, एशोसियेशन और सम्मलेन के अलावा पुरस्कार वितरण करके ही पूर्ण ब्लॉगर बना जा सकता है.

०६. सर्वे में एक प्रश्न था; "आप लेखन की किस विधा का समर्थन करते हैं?" इस प्रश्न के जवाब में जहाँ ८३.१५ प्रतिशत लोगों ने कविता लेखन का समर्थन किया वहीँ १४.१३ प्रतिशत लोगों ने गद्य लेखन का समर्थन किया. केवल १.१८ प्रतिशत लोगों ने दोनों का समर्थन किया. करीब १.५ प्रतिशत लोगों ने यह कहकर किसी का समर्थन नहीं किया कि वे गुट निरपेक्ष संस्कृति को जिन्दा रखना चाहते हैं.

०७. एक प्रश्न कि; "टिप्पणियां कितनी महत्वपूर्ण हैं?" के जवाब में ९१.८९ प्रतिशत ब्लॉगर ने बताया कि टिप्पणियां सबसे महत्वपूर्ण हैं. इसमें से जहाँ ८४.५६ प्रतिशत ब्लॉगर यह मानते हैं कि टिप्पणियां पोस्ट से भी ज्यादा महत्वपूर्ण हैं वहीँ ७.१६ प्रतिशत ब्लॉगर मानते हैं कि टिप्पणियां और पोस्ट दोनों महत्वपूर्ण हैं. करीब ८.७८ प्रतिशत ब्लॉगर मानते हैं कि पोस्ट और टिप्पणियों से ज्यादा महत्वपूर्ण वे खुद हैं.

०८. एक प्रश्न कि; "फीड अग्रीगेटर का रहना कितना ज़रूरी है?" के जवाब में करीब ९२.३९ प्रतिशत ब्लॉगर का यह मानना है कि हिंदी ब्लागिंग के लिए फीड अग्रीगेटर का होना बहुत ज़रूरी है. जहाँ ६७.७२ प्रतिशत ब्लॉगर यह मानते हैं कि फीड अग्रीगेटर के रहने से लोगों को उठाने-गिराने में सुभीता रहता है वहीँ २८.७५ प्रतिशत ब्लॉगर का मानना था कि फीड अग्रीगेटर को पंचिंग बैग की तरह इस्तेमाल करने में मज़ा आता है इसलिए उसका रहना बहुत ज़रूरी है. करीब ३.१८ प्रतिशत ब्लॉगर यह मानते हैं कि फीड अग्रीगेटर रहे या न रहे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि वे लोगों को मॉस-मेल के जरिये सूचित करते हैं कि उनकी नई पोस्ट आ गई है.

०९. जब ब्लागरों से यह प्रश्न किया गया कि "ब्लागिंग करने की वजह से उनका कितने लोगों से झगड़ा हुआ है?" तो जो परिणाम सामने आये वे चौकाने वाले थे. करीब ८.१२ प्रतिशत लोग ही यह जवाब दे सके कि ब्लागिंग करने के बावजूद उनका किसी ब्लॉगर के साथ झगड़ा नहीं हुआ. ९०.१७ प्रतिशत का मानना था कि ब्लागिंग करते हुए उनका किसी न किसी ब्लॉगर से झगड़ा अवश्य हुआ है. वहीँ १.७१ प्रतिशत ब्लॉगर का मानना था कि वे स्योर नहीं है कि उनका किसी अन्य ब्लॉगर के साथ झगड़ा हुआ या नहीं? ऐसे लोगों का मानना था कि अन्य ब्लॉगर से उनकी तू-तू-मैं-मैं हुई भी तो उसे झगड़ा कह जा सकता है या नहीं इस बात पर संदेह है. केवल २४.८९ प्रतिशत ब्लॉगर ही ऐसे थे जिनका दो या दो से कम लोगों से झगड़ा हुआ है. करीब ४०.३७ प्रतिशत ब्लॉगर ऐसे हैं जिनका पाँच से ज्यादा लेकिन नौ से कम लोगों के साथ झगड़ा हुआ. जहाँ १३.७८ प्रतिशत ब्लॉगर का दस से ज्यादा और पंद्रह से कम ब्लॉगर के साथ झगड़ा हुआ वहीँ ११.१० प्रतिशत ब्लॉगर का पंद्रह से ज्यादा और तीस से कम ब्लॉगर के साथ झगड़ा हुआ. कुल ०.३ प्रतिशत ब्लॉगर थे जिन्होंने मॉस लेवल पर यानि पचास से ज्यादा लोगों के साथ झगड़ा किया है.

१०. जब ब्लागरों से यह प्रश्न किया गया कि "हिंदी ब्लागिंग में ज्यादातर झगड़े की वजह क्या है?" तो करीब केवल ७.८९ प्रतिशत लोगों ने व्यक्तिगत मतभेद को झगड़े की वजह बताया. दूसरी तरफ जहाँ ६७.१८ प्रतिशत लोगों ने धार्मिक वैमनष्य को झगड़े की जड़ बताया वहीँ १९.०९ प्रतिशत ब्लागरों ने राजनैतिक विचारधारा को झगड़े की वजह बताया. वैसे एक बात पर सारे ब्लॉगर एकमत थे कि कहीं पर झगड़ा होने से उस संस्था के डेमोक्रेटिक होने का गौरव प्राप्त होता है इसलिए हिंदी ब्लागिंग में झगड़े का मतलब है कि डेमोक्रेटिक सेटअप सुदृढ़ हो रहा है.

११. एक सवाल कि; "संबंध बनाने के लिए कौन से साधन महत्वपूर्ण हैं?" के जवाब में जो परिणाम आये वे चौकाने वाले थे. जैसे करीब ६३.३९ प्रतिशत लोगों का मानना था कि संबंध बनाने के लिए फ़ोन सबसे महत्वपूर्ण साधन है. वहीँ करीब ८.९७% प्रतिशत ब्लॉगर यह मानते हैं कि संबंध बनाने के लिए वे ई-मेल का सहारा लेते हैं. ६.९८ प्रतिशत ब्लॉगर मेल और फ़ोन दोनों का इस्तेमाल करते हैं और बाकी के ब्लॉगर मेल, फ़ोन के अलावा सम्मलेन और व्यक्तिगत मुलाकातों को सम्बन्ध बनाने के लिए महत्वपूर्ण मानते हैं.

१२. जब ब्लागरों से यह पूछा गया कि; "सिनेमा, राजनीति, क्रिकेट और सामजिक मुद्दों के अलावा ब्लॉग पोस्ट के लिए सबसे महत्वपूर्ण विषय क्या है?" तो उसपर करीब ७५.४३ प्रतिशत ब्लागरों का मानना था कि इन सब विषयों के अलावा सबसे महत्वपूर्ण विषय है "चिट्ठाकारों" के बारे में लिखना. करीब ६.७३ प्रतिशत लोगों के लिए यात्रावर्णन एक महत्वपूर्ण विषय है वहीँ ९.११ प्रतिशत लोगों के लिए ब्लागिंग कार्यशाला महत्वपूर्ण विषय है. दूसरी तरफ ८.२७ प्रतिशत लोगों के लिए सम्मान लेन-देन कार्यक्रम महत्वपूर्ण है तो करीब ०.५% प्रतिशत लोगों ने स्वीकार किया कि वे खुद सबसे महत्वपूर्ण विषय हैं.

१३. जब ब्लागरों से यह प्रश्न किया गया कि; "बीच-बीच में ब्लागिंग छोड़ देने की घोषणा एक ब्लॉगर के भविष्य के लिए कितनी महत्वपूर्ण है?" तो उसके जवाब में करीब ९२.१३ प्रतिशत ब्लॉगर मानते हैं कि ब्लागिंग छोड़ देने की घोषणा किसी भी ब्लॉगर के ब्लॉग-जीवन के लिए अति महत्वपूर्ण है. इसमें से करीब ६६.८९ प्रतिशत ब्लॉगर का मानना है कि ऐसी घोषणा से किसी भी ब्लॉगर का ब्लॉग-जीवन न सिर्फ बढ़ जाता है अपितु उसे टिप्पणियां भी ज्यादा मिलने लगती हैं. करीब ७.१६ प्रतिशत ब्लॉगर ही मानते हैं कि ब्लागिंग छोड़ देने की घोषणा से एक ब्लॉगर के ब्लॉग-जीवन पर ख़ास असर नहीं पड़ता. वहीँ जिन लोगों का मानना है कि ऐसी घोषणा से एक ब्लॉगर का ब्लॉग जीवन बढ़ जाता है उनमें से करीब २४.३१ प्रतिशत लोग यह मानते हैं कि दो से ज्यादा बार ब्लागिंग छोड़ देने की घोषणा करने से एक ब्लॉगर का ब्लॉग जीवन औसतन तीन वर्ष बढ़ जाता है. वहीँ चार से ज्यादा घोषनाएं करने वाले ब्लॉगर का ब्लॉग जीवन औसतन पाँच वर्ष बढ़ जाता है.

तो ये थे हमारे प्रथम राष्ट्रीय ब्लॉग सर्वेक्षण के परिणाम. हमारे संवाददाताओं ने न सिर्फ पूरे देश का दौरा किया अपितु सही परिणामों के लिए सैम्पल साइज़ से कोई समझौता नहीं किया. उद्देश्य केवल एक ही था कि पूरे देश के सामने एक सच्ची तस्वीर उभर कर आये. हम उन हिंदी ब्लागरों के भी आभारी हैं जिन्होंने इस सर्वे के लिए अपना समय निकाला. आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि यह सर्वे हिंदी ब्लागिंग में एक मील का पत्थर साबित होगा.

---सम्पादक