करीब पंद्रह दिन हो गए जब इंग्लैंड के एक बुकी मज़हर मजीद ने एक अखबार के साथ मिलकर पाकिस्तान के तीन निर्दोष खिलाड़ियों को फिक्सिंग में फँसा दिया. ये खिलाड़ी निर्दोष हैं बेचारे. साथ ही टैलेंटेड भी हैं. निर्दोष और टैलेंटता के अद्भुत संगम वाले इन तीन खिलाड़ियों में से दो ने नो-बॉल फेंकी थी और एक ने फिंकवाई.
आप पूछ सकते हैं कि पुरानी घटना पर मैं आज क्यों लिख रहा हूँ? तो मैं आपको बता दूँ कि पाकिस्तानी खिलाड़ियों ने इंग्लैंड में नो-बॉल फिक्स किया. जिस अखबार ने बेचारे निर्दोष खिलाड़ियों को फंसाया वह इंग्लैंड का था. ऐसे में यह एक ग्लोबल घटना हुई कि नहीं?
तो ग्लोबेलाइजेशन के इस युग में ग्लोबल घटना पर लोकल बात करना जायज है क्या? नहीं न? इसीलिए मैंने अपने ब्लॉग पत्रकार चंदू चौरसिया को दुनियाँ भर में भेजकर लोगों की प्रतिक्रिया लेनी चाही. आप बांचिये कि लोगों ने क्या कहा?
हिलेरी क्लिंटन, यूएस सेक्रेटरी ऑफ स्टेट्स : "वी री-टरेट आर पोजीशन दैट इंडिया इज ऐन एमर्जिंग इकॉनोमिक सुपरपॉवर इन साउथ एशिया. वी वुड आल्सो लाइक टू स्टेट दैट पाकिस्तान इज आर नेचुरल-अलाई ह्वेन इट कम्स टू एलिमिनेटिंग दिस मेनेस ऑफ नो-बॉल नॉट ओनली फ्रॉम एशिया बट शुड आई से, फ्रॉम होल वर्ल्ड ...वी विल वर्क क्लोजली विद पकिस्तान टू डिस्मैन्टेल द फोर्सेस बिहाइंड बाउलिंग नो-बॉल. दिस सॉर्ट ऑफ एक्टिविटीज...वी अवेट अ रिपोर्ट फ्रॉम आर नेटो अलाई, यूनाइटेड किंगडम टू लुक इन टू ह्वाट ट्रान्स्पायर्ड फॉर दीज यंग नो-बॉल बॉलर्स..."
आसिफ अली ज़रदारी, टेन परसेंट प्रेसिडेंट, इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ पाकिस्तान: "ओ ज़ी ये कोई बहुत बड़ी बात नहीं है. ये लड़के टैलेंटेड हैं इसलिए नो-बॉल कर दिया. और मैं आपसे पूछता हूँ कि कितनी परसेंट नो-बॉल फेंकी है बच्चे ने? अब छ बॉल का एक ओवर होता है. उसमें से एक नो-बॉल फेंक ही दे तो करीब १६ पारसेंट होती है नो-बॉल....मैं आपकी बात मानता हूँ कि बच्चों को नो-बॉल का पारसेंट कम कर के करीब दस तक लाना चाहिए. मतलब ये कि हर दास बॉल में एक नो-बॉल चलेगा. मैं खुद भी इस बात को मानता हूँ कि कोई भी काम दस पारसेंट तक ठीक है..."
एजाज बट, प्रेसिडेंट, पकिस्तान क्रिकेट बोर्ड एंड चीफ कांस्पीरेसी थेओरिस्ट, एजाज बट स्कूल ऑफ क्रिकेट मैनेजमेंट : "ये ज़ी, हमारे बच्चों को फंसाया गया है. नो-बॉल फिक्सिंग सरासर झूटी बात है. ये पाकिस्तान के खिलाफ साजिश है. कल ही एक बुकी ने मुझे बताया कि दारसल अम्पायर ने क्रीज की सामने वाली लाइन को पीछे खिसका दिया था इसलिए नो-बॉल हो गया. क्रीज की सामने वाली लाइन को पीछे खिसकाने में अम्पायर के साथ इंग्लैंड के खिलाड़ी भी इन्वोल्व हैं. इस काम के लिए अम्पायर को डेढ़ लाख पाउंड पेमेंट किया गया है. आई सी सी के पास कोई सुबूत नहीं है कि हमारे बच्चे फिक्सिंग में इन्वोल्व हैं. वहीँ मेरे बुकी के पास सुबूत है कि अम्पायर ने क्रीज -लाइन को पीछे खिसका दिया था...."
रहमान मलिक, इन्टेरियर मिनिस्टर एंड चीफ एविडेंस सीकर, इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ पकिस्तान: "हामने जांच की है और मैं आपको गारंटी से बता सकता हूँ कि न्यूज़ ऑफ ड वर्ल्ड के एविडेंस काफी नहीं हैं. हामने पता लगाया है कि ये पाकिस्तान टीम के खिलाफ साजिश है और इसमें हिन्दस्तान का रा ही सही लेकिन हाथ ज़रूर है. हिन्दस्तान जब पकिस्तान को बॉल में नहीं फँसा ससका तो फिर साजिश करके नो-बॉल में फंसाने की कोशिश कर रहा है. हामने चार और डोस्सियर मांगे हैं इंग्लैंड से....."
मुल्लाह ओमर, स्पिरिचुअल लीडर, तालिबान स्कूल ऑफ स्पिरिचुअलिटी: "आल्लाह ने हमें एक और तरीका दे दिया दिया है अमेरिकियों से लड़ने का. पहले जब हम ख़ुदा के सिपाही कहीं बॉल-बम रखने जाते थे तो 'स्क्यूरिटी' की वजह से पकड़ लिए जाते थे. अब पाकिस्तानी साइंस-दानों की मदद से हम नो-बॉल बम बनायेंगे. हमारे साइंस-दान और पाकिस्तानी साइंस-दान मिलकर काम कर रहे हैं और ख़ुदा के करम से हम जल्द ही नो-बॉल बम बना लेंगे. नो-बॉल बम का फायदा ये होगा कि वो दिक्खेगा ही नहीं. फिर हमें अमरीकी 'स्क्यूरिटी' वाले कैसे पकड़ेंगे...."
शाह महमूद कुरैशी, फ़ारेन मिनिस्टर एंड एड रिजेक्टर, इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ पकिस्तान: "हम इंडिया से कहेंगे कि हम उनके साथ मिलकर इस नो-बॉल को ख़त्म करना चाहते हैं. हम ये भी कहेंगे कि इंडिया हमारे साथ नो-बॉल पर इंटेलिजेंस शेयर करे.....हाल ही में अपने वाशिंगटन 'टूर' में मैंने प्रेसिडेंट ओबामा से डिमांड की है कि अमेरिका पकिस्तान को एंटी नो-बॉल मिसाइल दे जिससे हम नो-बॉल को कंट्रोल कर सकें...हमारी कोशिश रहेगी कि नो-बॉल को अफगानिस्तान में फैलने से रोका जाय लेकिन उसके लिए हमारी फ़ौज का नॉर्थ-वेस्टर्न बोर्डर पर रहना जुरुरी है...."
श्री मनमोहन सिंह, ऑनेस्टी पर्सानफाइड एंड लोंगेस्ट सर्विंग ऑनेस्ट प्राइम मिनिस्टर ऑफ इंडिया : "ये नो-बॉल की प्रॉब्लम कोई प्रॉब्लम नहीं है. पकिस्तान को चाहिए कि नो-बॉल से हटकर अपनी इकोनोमी के बारे में कुछ करे. केवल चार परसेंट ग्रोथ है पकिस्तान की. उन्हें कोशिश करनी चाहिए कि वे कम से कम टू थाऊजैंड एलेवेन से नौ परसेंट ग्रोथ रेट ले आयें. और नो-बॉल की प्रॉब्लम सॉल्व करने के लिए तो ज़ी क्रिकेटिकल विल चाहिए....क्रिटिकल नहीं क्रिटिकल नहीं...मैंने कहा क्रिकेटिकल...क्रिकेटिकल...जैसे पोलिटिकल वैसे ही क्रिकेटिकल..हैं ज़ी? और फिर वे एक ज़ीओएम भी तो बना सकते हैं...ज़ीओएम से कोई भी प्रॉब्लम सॉल्व हो सकती है...."
दलेर मेहँदी, फार्मर सिंगर एंड प्रजेंट डे रिअलिटी शो जज: "मैं तो मोहम्मद आमिर से यही कहूँगा ज़ी कि पुत्तर तुझे रब्ब ने, उस मालिक ने, उस ख़ुदा ने टैलेंट दिया है नो-बॉल फेंकने का. तू तो पुत्तर ऐसे ही नो-बॉल फेंकता रह. रब राखां पुत्तर...चक दे फट्टे.."
अमिताभ बच्चन, एक्टर, मॉडल, ट्वीटर, ब्लॉगर एंड अ फादर-इन-ला : "अब देखिये मैं तो एक कलाकार हूँ. मैं इसके बारे में क्या कहूँ? वैसे अगर कुछ कहना ही है तो मैं कहूँगा कि भाई साहब, माना कि आपकी टीम प्रचंड है लेकिन नो-बॉल फेंकने की वजह से खंड-खंड है....आईं? लगी..लगी मिर्ची लगी. और फिर देखिये आप क्रिकेटर हैं. आप बालिंग कीजिये, अपना पारिश्रमिक लीजिये और घर जाइए. नो-बॉल फेंककर क्या मिलेगा आपको? कुछ एक्स्ट्रा पाऊंड? पूज्यनीय बाबूजी कहा करते थे कि जो एक बार नो-बॉल फेंककर अपनी गलती न दोहराए वही असली खिलाड़ी है.....मैंने इस नो-बॉल वाली घटना पर कल ही मधुशाला में एक रुबाई जोड़ी है...हाँ, सुनिए
बालिंग पथ पर बालिंग करने चलता है बालर आला
जोर से दौड़े या फिर धीरे दुविधा में है मतवाला
कोच बताते राहें कितनी पर मैं यह बतलाता हूँ
धीरज के संग कदम धरो तो फेंकोगे फिर नो-बॉला
बाबा रामदेव, ब्रीदिंग एक्सपर्ट, आंटरप्रेनर एंड पोलिटिसियन-इन-मेकिंग: "हे हे हे. लोग पाकिस्तान से फोन करके पूछते हैं बाबा जी, ये अपने नौजवान क्रिकेटर इतना नो-बॉल क्यों फेंक रहे हैं. मैं कहता हूँ ये नो-बॉल फेंके जाने का कारण है कि एम् एन सी का आटा. पकिस्तान लीवर जो आटा पकिस्तान में बेंच रहा है उसको खाकर ही बालर नो-बॉल फेंक रहे हैं. एम् एन सी कम्पनियाँ पाकिस्तान में करीब एक लाख करोड़ का आटा और तेल बेंचती हैं. अब कोई क्रिकेटर इन कंपनियों का आटा और तेल खायेगा तो वह जो है नो-बॉल तो फेंकेगा ही. यह बात हमारे राष्ट्र के लिए एक सन्देश है कि एम एन सी के बनाये खाद्य पदार्थों को अगर न रोका गया तो हमारा भी एक-एक क्रिकेटर नो-बॉल फेंकने लगेगा. यह जो है वह पूरे राष्ट्र के लिए बहुत ही खराब होगा. इसीलिए पतंजलि योगपीठ ने चावल, बाजरा, गेंहू और जौ को मिलाकर एक आटा बनाया है जिसकी रोटी खाने से बोलर कभी भी नो-बॉल नहीं फेंकेगा. हम तो राष्ट्र निर्माण करते हैं. उसके लिए हम कटिबद्ध हैं. आज ज़रुरत है......."
चन्दन सिंह हाठी, मैनेजर गंगोत्री यन्त्र प्रतिष्ठान: "क्या आप अपने बालिंग रन-अप से परेशान हैं? क्या आप इन-स्विंगर करते हैं और वो आउट-स्विंगर हो जाता है? क्या आप जब भी नो-बॉल फेंकना चाहते है तब नहीं फेंक पाते? क्या आपकी एल बी डब्ल्यू की अपील पर अम्पायर बैट्समैन को आउट दे देता है? क्या आप विश्व के सबसे बड़े नो-बॉलर बनना चाहते हैं? क्या नो-बॉल फिक्स करने की वजह से आप बार-बार पकड़े जाते हैं? तो पहली बार गंगोत्री यन्त्र प्रतिष्ठान लाया है नो-बॉल सुरक्षा रुद्राक्ष. यह पहनने के बाद आप जब भी चाहें नो-बॉल फेंक सकते है और पकड़े भी नहीं जायेंगे. हमारा दावा है ...."
प्रणब मुख़र्जी, फिनांस मिनिस्टर एंड पोलिटिकल मैनेजर, यूनाइटेड प्रोग्रेसिव अलायंस : "दीस ईभेंट हुविच हैपेण्ड ईन इंग्लैंड शूड नाट हैभ हैपेण्ड...उई फार्मली बिलीभ दैट पकिस्तान शूड ट्राई एंड ब्रिंग डाउन दा नो-बाल बोल्ड टू आंडर एट पारसेंट...आल्दो उई आर कोंसोटेंटोली मोनिटोरिंग दा सिचुयेशान एमार्जिंग फ्रॉम...."
यह था हमारे ब्लॉग-पत्रकार चंदू चौरसिया की विश्व के तमाम बड़े नेताओं और लोगों से नो-बॉल फिक्सिंग पर बातचीत. चंदू चौरसिया का अगला असाइंमेंट है कि वे युवा-नेता, युवराज, भावी प्रधानमंत्री श्री राहुल गाँधी का इंटरव्यू लेंगे. हम जल्द ही वह इंटरव्यू अपने ब्लॉग पर प्रकाशित करेंगे. तब तक हम आपसे विदा लेते हैं.
Wednesday, September 22, 2010
"..अमेरिका पकिस्तान को एंटी नो-बॉल मिसाइल दे."
Wednesday, September 15, 2010
दिखला के यही मंज़र ब्लॉगर चला जाता है
श्री बशीर बद्र से क्षमा याचना सहित ये ब्लॉग-गजलें पेश कर रहा हूँ. ब्लॉग ग़ज़ल क्या होती है, कृपया यह न पूछें. मैं जवाब नहीं दे पाऊँगा.
हँसी-मजाक की बातें हैं. कृपया इसे सीरियसली न लें. केवल हल्की-फुल्की पैरोडी है.
ब्लॉग ग़ज़ल न.१
दिखला के यही मंज़र ब्लॉगर चला जाता है
चुटकी में शाश्वत लेखन कैसे किया जाता है
उस पोस्ट की लाइन पर झगड़े बहुत वे दोनों
जिस पोस्ट की बातों को सड़ियल कहा जाता है
दोनों से चलो पूछें उसको कहीं देखा है
जो टिप्पणी देने को आता है न जाता है
दुनियाँ में जो कुछ शाश्वत, ब्लागों पे लिखा है वो
अखबार में जो कुछ है, घर में पढ़ा जाता है
मिल जाए गर फालोवर तो नाम हुआ समझो
गर न मिले कभी तो दिल डूबता जाता है
ब्लॉग ग़ज़ल न.२
खुश रहे न कभी उदास रहे
पोस्ट लिक्खा औ बदहवाश रहे
आज टिप्पणियां मिलें कम ही सही
कल बढेंगी यही बस आस रहे
नामवाले तो आते रहते हैं
कोई बेनामी आस-पास रहे
बढ़िया, रोचक, बधाई खूब सुनी
कभी तो गालियों की बास रहे
मिली जो टिप्पणी तो खूब हँसे
नहीं जब भी मिली, उदास रहे
Tuesday, September 14, 2010
सिंगिंग रियल्टी शो- एक निबंध
एक जमाना था जब परीक्षा का प्रश्नपत्र सेट करने वाले विद्वान् विद्यार्थियों को चैलेन्ज जैसा देते थे कि वे पोस्टमैन, मेरा गाँव, रेलयात्रा जैसे विषयों पर निबंध लिख कर दिखायें. पोस्टमैन नहीं आते तो मेरा गाँव आ जाता. मेरा गाँव नहीं आता तो रेलयात्रा आ जाता. कुल मिलाकर विकट सरल दिन थे. विद्यार्थीगण बहुत जोर रटते थे और परीक्षा की कापी रंग आते थे. अब चूंकि ज़माना हर ज़माने में बदलता है इसलिए अब ऐसे पुराने विषयों पर निबंध लिखने के लिए नहीं कहा जाता. और कारण यह भी हो सकता है कि पोस्टमैन की जगह कूरियर बॉय ने ले ली है और उसके चरित्र चित्रण की बारीकियों का निर्धारण अभी तक नहीं हो पाया है.
हाल ही में एक विद्यार्थी के परीक्षा की कॉपी मिल गई. अरे भाई साहब, हाल ही में से मेरा मतलब है परसों. अब हिंदी दिवस से दो दिन पहले इतिहास की कॉपी थोड़े न मिलेगी. तो प्रस्तुत है उस विद्यार्थी द्वारा लिखा गया निबंध जिसका शीर्षक है; सिंगिंग रियलटी शो. अब मेरे ऊपर गुस्सा न होइए कि शीर्षक अंग्रेजी में क्यों है? है तो है. शीर्षक पर ध्यान मत दीजिये अब निबंध बांचिये.
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भारत में रियल्टी शो का इतिहास बहुत पुराना नहीं है. हाँ, यह ज़रूर है कि तमाम तरह के रियल्टी शो में सबसे पुराना शो गाने का ही है. वैसे इतिहासकारों और विद्वानों का मानना है कि हमारे देश में भी रियल्टी शो का इतिहास पुराना हो सकता था लेकिन उनदिनों सेल फ़ोन न होने के कारण ऐसा हो नहीं सका.
विद्वानों का मानना है कि १९८५ में जब श्री वारेन एंडरसन को सरकारी कार में हवाई अड्डे ले जाया जा रहा था उस समय उनके कार में बैठाकर एयरपोर्ट प्रस्थान करने की रीयल तस्वीर टीवी कैमरे से ले ली गई थी लेकिन उनदिनों सेल फ़ोन न होने के कारण दूरदर्शन वो फूटेज दिखाकर दर्शकों से यह नहीं कह सका कि; "वारेन एंडरसन को कार में बैठाकर भगाने के लिए कौन जिम्मेदार है? आपके आप्शन हैं; (ए) राजीव गाँधी (बी) अर्जुन सिंह (सी) नरसिम्हा राव और (डी) रतन नूरा. अपना जवाब हमें पाँच शून्य शून्य सात एक पर भेज दीजिये. जवाब के आगे अपना नाम और अपना पता ज़रूर लिखिए."
ऐसा न हो सका और हम इतिहास का निर्माण नहीं कर सके. एक अदद सेल फ़ोन न होने की वजह से सब गुड़ गोबर हो गया. अगर सेल फोन होता तो हम रीयल्टी शो के आविष्कार का पेटेंट करवा लेते और फिर अमेरिकी इंटरटेनमेंट कम्पनियाँ भारत सरकार को लाइसेंस फीस देकर ही अपने देश में रीयल्टी शो कर पातीं. खैर, जो हो गया सो हो गया.
गाने का रियल्टी शो केवल गाने के बारे में नहीं होता. यह जजों के बारे में भी होता है. यह प्रतियोगी के माँ-बाप के बारे में भी होता है और यह एंकर के बारे में भी होता है. सेलेक्शन का प्रोसेस बहुत झमेले वाला होता है. (सर जी, नंबर मत काटियेगा. प्रोसेस का हिंदी शब्द दिमाग में नहीं आ रहा है) कभी-कभी सेलेक्शन में इतना झमेला हो जाता है जितना इलेक्शन में नहीं होता. (सर जी, सेलेक्शन से इलेक्शन की तुकबंदी मिला दिया है मैंने. आशा है आप उसके लिए एक नंबर ज्यादा देंगे).
जहाँ सिंगिंग रियल्टी शो के लिए सेलेक्शन होने वाला रहता है वहाँ कई घंटे पहले से ही भीड़ हो जाती है. अक्सर ऐसा देखा जाता है कि प्रतियोगी के माँ-बाप एक दिन पहले शाम पाँच बजे से ही लाइन लगा देते हैं. जिन माँ-बाप को गाने और संगीत के बारे में थोड़ा-बहुत आईडिया होता है वे पाँच बजे से लाइन लगाते हैं और जिन माँ-बाप को गाने के बारे में कम जानकारी रहती है वे उनसे भी दो घंटे पहले से यानि ३ बजे शाम से ही लाइन लगा देते हैं.
सेलेक्शन के समय प्रतियोगी का कर्त्तव्य होता है कि वह जजों को अपने कर्म से रिझाए.रिझाने के इस महत्वपूर्ण काम को करने के ढेरों तरीके हैं. जैसे प्रतियोगी अगर गरीब रहे तो जज जल्द रीझते हैं. या फिर प्रतियोगी अगर सात सौ किलोमीटर चलकर सलेक्शन के लिए आडिशन देने आये तो भी जज लोग रीझ जाते हैं. सेलेक्शन प्रोसेस (सर जी, क्षमा कीजियेगा अभी तक माइंड में प्रोसेस का हिंदी शब्द नहीं घुसा) का एक महत्वपूर्ण विषय होता है प्रतियोगी का खाना न खाने की वजह से बेहोश हो जाना.
रीयल्टी शो रीयल लगे इसके लिए कई बार प्रतियोगी जजों को घटिया और निकम्मा बता देता है. कोई-कोई प्रतियोगी गाली भी दे डालता जिसे चैनल वाले आवाज़ के पैबंद से ढक देते हैं. ऐसा होने से शो करीब बावन प्रतिशत ज्यादा रीयल लगता है.
जो प्रतियोगी गाना गाकर जजों को खुश कर देता है जज उसे तुरंत सेलेक्ट कर लेता है और उसे मुंबई बुला लेता है.मुंबई बुलाने का यह सिद्धांत नया नहीं है. इतिहास गवाह है कि पिछले करीब साठ वर्षों से कोई भी भारत के किसी भी कोने से चलता है तो वह मुंबई ही पहुँचता है. भारत के हर कोने से चली हुई सड़क, रेलगाड़ी और ट्रक अक्सर मुंबई ही पहुँचती है. विद्वानों का मत है कि मुंबई पहुँचने के इस ऐतिहासिक सिद्धांत की नींव श्री देवानंद ने रखी जब वे पंजाब से निकलकर फ्रोंटियर मेल पकड़कर सीधा मुंबई पहुंचे थे.
मुंबई पहुंचकर सारे प्रतियोगी अभ्यास वगैरह करते हैं. उन्हें हमेशा कान में आई-पॉड का हेडफोन लगाये देखा जा सकता है. वे अभ्यास करके जजों के सामने गाते हैं. इस दौरान प्रतियोगी पाँव छूने का भी अभ्यास करता है. वह ऐसा इसलिए करता है जिससे प्रोग्राम में आनेवाले हर गेस्ट जज का और बाकी जजों का जब-तब पाँव छूता रहे. पाँव छूना गायक बनने के लिए गायन के रियाज से भी ज़रूरी है.
जज लोग करीब नब्बे प्रतिशत प्रतियोगियों को बताते हैं कि उनके पास प्ले-बैक की वायस है. वैसे जानकारों का ऐसा मानना है कि जजों की यह बात सही नहीं है क्योंकि अगर ऐसा होता तो अभी तक भारतवर्ष में प्ले-बैक गायकों की संख्या करीब तीन लाख सत्तावन हज़ार होती.
यह भी देखा गया है कि अपने कमेन्ट में जज लोग ऐसे स्टेटमेंट देते हैं जो किसी की समझ में नहीं आता. उनमें कुछ स्टेटमेंट हैं; "तुम्हारी आवाज़ का थ्रो बहुत बढ़िया है", "तुम्हारी वायस की टेक्सचर गज़ब है", "तुम्हारी आवाज़ जो है उसकी फैब्रिक मुझे बहुत पसंद है".
ऐसी बातें सुनकर प्रतियोगी को अपने ऊपर शंका होने लगती है. वह यह सोचने में बिजी हो जाता है कि; "वह एक गायक है या बुनकर?"
जजों के कमेन्ट के बारे में प्रतियोगियों की इस नासमझी को दूर करने के लिए हाल ही में आल इंडिया सिंगिंग रिअलिटी शो पार्टीसिपेंट्स पैरेंट्स एसोसियेशन ने यूजीसी से यह मांग रखी कि वह एक शोध करवाए जिससे प्रतियोगियों और उनके अभिभावकों को जजों के कमेन्ट समझने में आनेवाली मुश्किलों को दूर किया जा सके. सरकार पहले तो नहीं मान रही थी लेकिन जब किसी विद्वान ने उसे यह बताया कि सिंगिंग रियल्टी शो के पार्टिसिपेंट्स बहुत बड़ा वोटबैंक साबित हो सकते हैं तो सरकार ने उनकी मांग मान ली.
रियल्टी शो के दौरान जज यह बताते रहते हैं कि जैसे ही यह शो ख़त्म हुआ देश को उसकी आवाज़ मिल जायेगी. उनकी बात सुनकर लगता है जैसे यह शो नहीं होता तो देश गूंगा ही रहता. कुछ सूत्रों का यह भी मानना है कि जब चैनल वाले अपने विज्ञापनों में देश की आवाज़ खोजने का दावा करते हैं उनदिनों देश की सबसे पावरफुल नेत्री को अपनी आवाज़ पर शंका होने लगती है और वे ज्यादा बोलने लगती हैं.
कई बार ऐसा भी होता है कि शो में आनेवाले प्रतियोगी जजों से ज्यादा जानकार होते हैं. ऐसे में जब कोई प्रतियोगी शास्त्रीय संगीत पर आधारित कोई गीत, ठुमरी या टप्पा गाता है तब जज घबड़ाकर राग और सरगम के साथ-साथ अपना हाथ हिलाते-डुलाते और ऊपर-नीचे करते हैं. जानकारों का ऐसा मानना है कि जज ऐसा इसलिए करते हैं जिससे देशवासियों का यह भ्रम बना रहे कि उन्हें संगीत का ज्ञान है.
हाल ही में किये गए एक सर्वेक्षण के अनुसार जब टीवी पर रियल्टी शो देखनेवाला दर्शक जब इस बात पर स्योर हो जाता है कि कोई प्रतियोगी बहुत अच्छा गा रहा है उसी समय जज उस प्रतियोगी के गाने को घटिया बता देता है. ऐसा करने से जज और जनता के बीच ज्ञान की खाई और चौड़ी हो जाती है. मनोरंजन की दुनियाँ में इसे जजेज सरप्राइज अटैक कहते हैं.
चूंकि ऐसे शो में ज्यादातर जज फ़िल्मी दुनियाँ के चुक गए संगीतकार होते हैं इसलिए उन्हें प्रतियोगियों से यह कहते हुए शर्म नहीं आती वे अपनी अगली फिल्म में फलां प्रतियोगी से एक गाना गवाएंगे. सबको यह मालूम रहता है कि जब इस जज को ही कोई फिल्म नहीं मिलेगी तो फिर उस फिल्म में प्रतियोगी के गाना गाने का सवाल ही नहीं उठता. ऐसे में जजों द्वारा किया जानेवाला यह अनाऊँस्मेंट देशवासियों के मनोरंजन का साधन बनता है.
कम्पीटीशन से धीरे-धीरे करके प्ले-बैक की वायस वाले एक-एक प्रतियोगी का निष्कासन होता रहता है. अंत में जिसका निष्काशन नहीं हो पाता उसे विजेता घोषित कर दिया जाता है और उसकी आवाज़ को ही देश की आवाज़ मान लिया जाता है. कुछ विद्वानों का मानना है कि अभी तक सारे रियल्टी शोज मिलाकर देश को करीब तीन हज़ार चार सौ तेरह आवाजें मिल चुकी हैं. शायद यही कारण है कि देश में हर मामले पर अलग-अलग आवाज़ सुनाई देती है.
प्ले-बैक वायस के मालिक प्रतियोगी जब प्रतियोगिता से निकलते हैं तो उनके माँ-बाप को भी टीवी कैमरे के सामने अपना हुनर दिखाने का मौका मिलता है. ये माँ-बाप अपनी हैसियत और टैलेंट के हिसाब रो लेते हैं और दुखी दीखते हैं.
प्राइसवाटर हाउस कूपर्स द्वारा हाल ही में किये गए एक सर्वे के अनुसार भारत में अगले आठ वर्षों में करीब चालीस हज़ार सात सौ सिंगिंग रियल्टी शोज बनने की संभावना है. कुछ विद्वान मानते हैं कि अगर भारत को अपने ट्वेंटी-ट्वेंटी मिशन (सर जी, यहाँ क्रिकेट की बात नहीं कर रहा हूँ मैं. यहाँ मैं कलाम साहब के इंडिया ट्वेंटी ट्वेंटी मिशन की बात कर रहा हूँ) की सफलता के लिए भारतवर्ष को कुल तीन करोड़ सिंगर तैयार करने पड़ेंगे. यह संख्या करीब सात करोड़ होती लेकिन चूंकि चार करोड़ प्रतियोगी डांसिंग रियल्टी शोज में भी भाग लेंगे इसलिए गायकों की संख्या करीब तीन करोड़ ही रखी गई है.
कुल मिलाकर भारत में सिंगिंग रियल्टी शोज का भविष्य उज्जवल है. भविष्य इतना उज्जवल है कि हर माँ-बाप अपने बेटे-बेटियों को सिंगर ही बनाना चाहता है. अब माँ-बाप भी नहीं चाहते कि बेटी/बेटे डॉक्टर-इंजिनियर बने.समाजशास्त्रियों का ऐसा मानना है कि आनेवाले वर्षों में देश में डाक्टरों और इंजीनियरों की भयंकर कमी हो सकती है.
माँ-बाप की चाहत की बात को आप निम्नलिखित संवाद से आंक सकते हैं;
"नहीं माँ, मैं डॉक्टर बनना चाहती हूँ. मुझे सिंगर नहीं बनना है"; बेटी ने अपनी माँ को समझाते हुए कहा.
"क्या कहा!, डॉक्टर बनना चाहती हो? डॉक्टर बनकर हमारी नाक कटवावोगी क्या? बेटा, आजकल कोई डॉक्टर इंजीनियर बनता है भला?"; माँ कहती है.
"नहीं माँ. प्लीज मेरी बात सुनो. गाने की प्रैक्टिस करके मैं थक जाती हूँ. फिर पढाई नहीं कर पाती"; बेटी ने कहा.
"अरे बेटा, क्या जरूरत है पढाई करने की? आजकल कोई पढाई करता है भला?"; माँ कहती है.
"मेरी बात सुनो तो माँ. हमारी टीचर भी कहती हैं कि दुनियाँ में हर कोई सफल नहीं हो सकता. मैं मानती हूँ कि मैं डॉक्टर बनने से असफल कहलाऊंगी. तो क्या हुआ? मैं एवरेज बच्ची हूँ इसलिए डॉक्टर बन जाऊंगी. जो बच्ची तेज है, वो सिंगर बन जायेगी. यही तो होगा"; बच्ची कहती है.
माँ उसी जगह से पतिदेव को आवाज लगाती है; "अजी सुनते हो?"
पतिदेव वहीँ से जवाब देगे; "अरे क्या हुआ, क्यों शोर मचा रही हो?"
"शोर नहीं मचाऊंगी तो और क्या करूंगी. सुन लो, तुम्हारी लाडली बेटी क्या कह रही है. कह रही है डॉक्टर बनेगी. लो और सर पर चढ़ाकर रखो इसे. डॉक्टर बनकर हमारा नाम डूबोने के लिए ही बड़ा कर रहे हैं हम इसे"; माँ ने जवाब दिया.
अब बच्ची को समझाने की बारी पिताश्री की है; "बेटा, एक बार कांटेस्ट में पार्टीसिपेट कर लो. अगर नहीं जीत पाओगी तो हम अपने किस्मत को रो लेंगे. फिर तुम्हारी जो इच्छा हो, करना. हम तुम्हें डॉक्टर बनने से नहीं रोकेंगे."
नोट:
सर जी, अब और नहीं लिख पा रहा हूँ. पेन पकड़ने की वजह से अंगुलियाँ दर्द कर रही हैं. वैसे आपको राज की बात बताऊँ तो मैंने भी एक रियल्टी शो में ऑडिशन दिया था. मेरा सेलेक्शन हो गया है. परीक्षा के बाद मैं भी मुंबई जा रहा हूँ.