Tuesday, October 1, 2013
गाँधी जी थैंक यू
हर साल की तरह इस साल भी २ अक्टूबर आ ही गया. हर साल की तरह इस साल भी भाषणों की झड़ी लगेगी, टीवी पर गाँधी फिल्म दिखाई जाएगी, रेडिओ पर "दे दी हमें आज़ादी बिना खडग बिना ढाल.…." बजेगा और टीवी पर चल रहे रियलिटी शो में लोग गाँधी जी के बहाने ऐ मेरे वतन के लोगों ………….गायेंगे. ऐसे में पेश है एक नेता का भाषण जो उसने २ अक्टूबर २०१२ के दिन अपनी जनता पर चेंप दिया था. आप बांचिये.
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सभा में उपस्थित देशवासियों, आज गाँधी जी का जन्मदिन है. यह न सिर्फ गाँधी जी के लिए बल्कि हमारे लिए भी सौभाग्य की बात है कि आज यानि २ अक्टूबर को गाँधी जी का जन्मदिन है. आज अगर उनका जन्मदिन नहीं होता तो न ही हमारे लिए यह सौभाग्य की बात होती और न ही हम उनका जन्मदिन मना पाते. ऐसे में हम कह सकते हैं कि आज के दिन जन्म लेकर उन्होंने हमसब को उनका जन्मदिन मनाने का चांस दिया जिसके लिए हम उनके आभारी हैं. भाइयों, देखा जाय तो मौसम के हिसाब से भी अक्टूबर के महीने में जन्म लेकर उन्होंने हमें एक तरह से उबार लिया. फर्ज करें अगर वे मई या जून के महीने में पैदा हुए होते तो गरमी की वजह से उनके जन्मदिन पर मैं शूट नहीं पहन पाता. अब आप खुद ही सोचिये कि बिना शूट के गाँधी जी जैसे महान व्यक्ति का जन्मदिन समारोह कितना फीका लगता. सच बताऊँ तो बिना शूट के मैं गाँधी जी का जन्मदिन मना ही नहीं पाता और अगर ऐसा नहीं होता तो बहुत बड़ा नुक्सान हो जाता. मुझे भाषण देने का चांस नहीं मिलता और आपको भाषण सुनने का चांस नहीं मिलता. ऐसे में हमारी और आपकी मुलाक़ात नहीं हो पाती. और आपतो जानते ही हैं कि नेता और जनता की मुलाकात न हो तो लोकतंत्र को क्षति पहुँचती है. इससे साबित होता है कि २ अक्टूबर लोकतंत्र के लिए भी शुभ है.
इन सारे संयोंग पर गहरे से सोचें तो कह सकते हैं कि गांधी जी हमसब का थैंक्स डिजर्व करते हैं. आइये लगे हाथ हम उन्हें थैंक्स कह ही दें. मैं कहूँगा गांधी जी और आपसब एक स्वर में कहेंगे थैंक यू.
गांधी जी
थैंक यू
गाँधी जी
थैंक यू
भाइयों, आपका तो नहीं पता लेकिन हमें बचपन से ही सिखाया गया कि हमें गांधीजी के रस्ते पर चलना है. हमारे पिताजी ने तो हमें यह सीख चार वर्ष की उम्र में ही दे दी थी कि हमें गाँधीजी के रस्ते पर चलने की जरूरत है. यह मैं आपको तब की बात बता रहा हूँ जब वे अपने एरिया के म्यूनिसिपल काउंसिलर थे. मुझे अच्छी तरह से याद है उन्होंने म्यूनिसिपल कारपोरेशन में संघर्ष करके हमारे मोहल्ले में पाँच सौ मीटर की एक सड़क बनवाई और उसका नाम गाँधी जी के नाम पर एम जी रोड रखा. मैं और मेरा छोटा भाई दोनों उस रोड पर चलकर स्कूल जाते थे. बाद में जब पिताजी ने म्यूनिसिपल कारपोरेशन में मेयर का पद हथिया लिया तब हम दोनों भाई उनकी आफिसियल कार में बैठकर उसी एम जी रोड के ऊपर से जाते थे. वैसे मोहल्ले के कुछ दुष्ट लोगों ने कानाफूसी करके यह बात फैला दी थी कि चूंकि मेरे दादाजी का नाम मुकुंदीलाल गुप्ता था इसलिए पिताजी ने रोड का नाम एम जी रोड रखा था. पिताजी और भगवान को पता है कि यह सच नहीं है.
भाइयों, आप खुद देखें कि अपने पिताजी के पढाये पाठ पर हम कितनी छोटी उम्र से अमल कर रहे हैं.
भाइयों, यह तो हुई मेरे पिताजी और मेरी बात. लेकिन आपलोग उनके रस्ते पर चलें उसके लिए सबसे पहले जरूरत है कि आप गाँधी जी के बारे में जानें. आखिर उनके बारे में बिना जाने आप उनके रस्ते पर कैसे चलेंगे? इसलिए मैं अब आपको गाँधी जी के बारे में बताता हूँ. भाइयों, गांधी जी ने वकालत की पढाई की थी जिससे वे वकील बन सकें. आप पूछ सकते हैं वे डॉक्टर या इंजिनियर क्यों नहीं बने? तो इसका जवाब यह है कि उन दिनों वकालत में जितना पैसा था, उतना डाक्टरी में नहीं था. दूसरी बात कह सकते हैं कि वकालत करना उस ज़माने में फैशन की तरह था. ऊपर से गाँधी जी इंटेलिजेंट थे और उनको पता था वकालत में बहुत पैसा था. भाइयों, वकालत में पैसा था तभी गांधी जी उस जमाने में फर्स्ट क्लास में चलते थे.
भाइयों, वकील बनकर उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में अपनी प्रैक्टिस शुरू की. वही दक्षिण अफ़्रीका जहाँ के हैन्सी क्रोनिये थे. हैन्सी क्रोनिये से याद आया कि जब मैं क्रिकेट बोर्ड का अध्यक्ष था तब एकबार दक्षिण अफ्रीकी टीम भारत के दौरे पर आई और मुझे हैन्सी क्रोनिये से मुलाकात करने का सौभाग्य प्राप्त …… (पब्लिक शोर करती हैं)
अच्छा अच्छा मैं मुद्दे पर आता हूँ. मैं जरा अलग लैन पर चला गया था. नहीं.. नहीं.. ऐसा न कहें, मैंने सोचा कि मैं आपसे अपना अनुभव बाटूंगा तो आपलोगों को प्रेरणा मिलेगी. वैसे आप चाहते हैं तो मैं वापस मुद्दे पर आता हूँ. तो भाइयों मैं कह रहा था कि गाँधी जी ने दक्षिण अफ्रीका में अपनी वकालत की प्रैक्टिस शुरू की. आप तो जानते ही हैं कि दक्षिणी अफ्रीका सोने की खानों के लिए प्रसिद्द है. इसीलिए मैंने गाँधी जी से प्रेरणा ली और आज आप खुद ही देखिये कि सोना मुझे कितना प्रिय है. मैं न सिर्फ सोना पहनता हूँ बल्कि संसद में भी सोने का कोई चांस हाथ से जाने नहीं देता.
भाइयों दक्षिणी अफ्रीका की बात चली हैं तो मैं आपको गांधी जी से संबंधित एक संस्मरण सुनाता हूँ. गाँधी जी हमेशा फर्स्ट क्लास में ही सफ़र करते थे. पैसे की कोई कमी तो थी नहीं उनको. तो एकबार वे फर्स्ट क्लास में बैठे कहीं जा रहे थे तो हुआ क्या कि वहां के एक अँगरेज़ टीटी ने उन्हें डिब्बे से बाहर फेंक दिया. मुझे पता है आपके मन में यह उत्सुकता होगी कि उस टीटी ने गाँधी जी को डिब्बे से बाहर कैसे फेंका? तो मैं कहना चाहूँगा कि जिन्होंने गाँधी फिल्म देखी है उन्हें तो पता होगा ही कि उस टीटी ने गाँधी जी को डिब्बे के बाहर कैसे फेंका था लेकिन जिन्होंने वह फिल्म नहीं देखी है उनके लिए मैं बताता चलूँ कि उस टीटी ने उन्हें वैसे ही फेंका जैसे हमलोग कई बार इमरजेंसी पड़ने पर फर्स्ट क्लास या सेकंड क्लास के यात्रियों को डिब्बे से बाहर फेंक देते हैं. अब देखिये हमने इतना बता दिया. जो नहीं बताया वो आपलोग कल्पना कर लीजिये.
तो मैं कह रहा था कि उस अँगरेज़ टीटी ने गाँधी जी को डब्बे से बाहर फेंक दिया. सच तो ये है कि उन दिनों वहां अंग्रेजों का राज था. और अँगरेज़ बहुत ख़राब होते थे. बहुत ख़राब माने बहुत खराब. लेकिन इसका मतलब क्या वे कुछ भी करते और गाँधी जी बर्दाश्त कर लेते? कदापि नहीं. अब वे अगर गाँधी जी को डिब्बे से बाहर फेंकेंगे तो क्या गाँधी जी चुप रहते? क्यों चुप रहते? क्या कोई विदाउट टिकेट चल रहे थे जो चुप रहते? बस जब टीटी ने उन्हें बाहर फेंका उसी दिन से गाँधी जी का अंग्रेजों से लफड़ा शुरू हो गया. उन्होंने उसी दिन कसम खाई कि वे अंग्रेजों को भारत में नहीं रहने देंगे. उनको पता था कि जो अँगरेज़ दक्षिण अफ्रीका में राज करते थे वहीँ अँगरेज़ भारत में भी राज करते थे. फिर क्या था, अंग्रेजों से बदला लेने के लिए वे भारत वापस आ गए. भारत आकर उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया. जाकर उनसे सीधा-सीधा कह दिया कि अंग्रेजों भारत छोड़ दो. अँगरेजों ने आना-कानी तो की लेकिन गाँधी जी भी कहाँ छोड़ने वाले थे? उन्होंने उनको भारत से भगा कर ही दम लिया. वो गाना तो सुना ही होगा आपने. अरे वही जो आज के दिन खूब बजता है. अरे वही बस मुंह में है याद नहीं ……हाँ, याद आ गया. वो गाना था न कि दे दी हमें आजादी बिना खडग बिना ढाल साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल.
मुझे पता है आपके मन में सवाल उठा रहा होगा कि ये साबरमती का संत कौन है? तो मैं आपको बता ही देता हूँ कि ये और कोई नहीं खुद गाँधी जी ही थे. वो क्या था कि साबरमती में ही उनका आश्रम था और आपतो जानते ही हैं कि आश्रम में संत रहते हैं इसलिए उनको साबरमती का संत कहा जाता है.
भाइयों, अब मैं आपको गांधी जी से सम्बंधित अन्य पहलुओं के बारे में बताता हूँ. आपको जानकर हैरानी होगी कि उनको बंदरों से बहुत प्यार था. आपके मन में बात आती होगी कि बन्दर भी कोई प्यार करने की चीज हैं? तो इसका जवाब मैं ये दूंगा कि दरअसल गाँधी जी श्री रामचन्द्र से बहुत प्रभावित थे इसलिए वे कई बार न सिर्फ रामराज की बात करते थे बल्कि वे श्री रामचन्द्र जी की तरह ही बंदरों से प्यार भी करते थे. सच तो ये हैं कि उन्हें बंदरों से उतना ही प्यार था जितना आजकल हम कुत्तों, गधों वगैरह से करते हैं.
आप पूछ सकते हैं कि गाँधी जी को बन्दर ही प्रिय क्यों थे? हमारी तरह उन्हें कुत्ते या गधे प्रिय क्यों नहीं थे? भाइयों, इस सवाल का जवाब जानने के लिए आपको थोडा इतिहास की पढाई करनी पड़ेगी. लेकिन चूँकि पढाई करने के लिए आपका साक्षर होना जरूरी है और हमने आपको साक्षर होने नहीं दिया इसलिए हमारी जिम्मेदारी बनती है कि हम आपको बताएं कि इतिहास में क्या लिखा गया गया है या फिर गाँधी जी के इस पहलू को लेकर इतिहासकार क्या कहते हैं? क्या विचार रखते हैं? तो भाइयों वैसे तो इतिहासकारों में इसको लेकर भिन्न-भिन्न मत हैं लेकिन ज्यादातर इतिहासकार यह मानते हैं कि उन दिनों देश के कुत्तों और गधों पर राजाओं और नवाबों का कब्ज़ा था. उन लोगों ने ही सारे कुत्तों और गंधों को पाल रखा था.
ऐसे में गाँधी जी ने बंदरों को चुना. आप ने देखा भी होगा कि उनके तीन बन्दर थे जो अपना कान, मुंह और आँख बंद रखते थे. भाइयों, वैसे तो बहुत लोग इन बंदरों से बहुत इम्प्रेस्ड रहते हैं लेकिन मैं आपको अपना पर्सनल विचार बताऊँ तो मुझे ये तीनों बन्दर कोई बहुत इम्प्रेसिव नहीं लगे. मैं पूछता हूँ कि जब भगवान ने आँख, कान, मुंह वगैरह दिए हैं तब उनको बंद रखने का क्या तुक है? मैं पूछता हूँ कि खुला रखने में कौन सा पैसा खर्च हो जाता? ऊपर से अगर आप साइंस के लिहाज से देखें तो वैज्ञानिक बताते हैं कि अगर अंगों का इस्तेमाल न हो तो उनके नष्ट हो जाने का भय रहता है. अब इन सब बातों को देखा जाय तो ये बन्दर सच में कोई इम्प्रेसिव बन्दर नहीं थे.
भाइयों, वैसे तो गाँधी जी महान थे लेकिन एक बात में वे कच्चे थे. वे अपने बेटों को आगे नहीं बढ़ा सके. देखा जाय तो एक पिता का असली कर्त्तव्य नहीं निभा सके. आप तो जानते ही हैं कि वे राष्ट्रपिता थे. मतलब भारत उनका था. ऐसे में उन्हें चाहिए था कि वे अपने बेटों को, पोतों को आगे बढाते. उन्हें प्रेजिडेंट, प्राइम मिनिस्टर, मिनिस्टर बनाते. लेकिन वे ऐसा नहीं कर पाए. मैं पूछता हूँ कि एक पिता का कर्त्तव्य क्या केवल अपने बच्चों का लालन पालन ही होता है? क्या पिता का यह कर्त्तव्य नहीं कि वह उसे पद दिलाये? अपने प्रभाव से जमीन का प्लाट दिला दे? कोई कंपनी खोल दे? यह सब वे नहीं कर सके तो यही एक बात है जहाँ वे न सिर्फ कच्चे साबित हुए बल्कि हमलोगों से पीछे रह गए. आखिर बच्चों का भला करना एक पिता का कर्त्तव्य है. आज मुझे ही देख लीजिये. मैं खुद केन्द्रीय मंत्री हूँ. मेरा एक बेटा सांसद है. दूसरा बेटा स्टेट कैबिनेट में है. उसका बेटा अपने शहर का मेयर …… भाइयों अब आप ही बताइए, इस मामले में हम बड़े कि वे?
फिर मैं यह सोचकर संतोष कर लेता हूँ भाइयों कि मैं भी तो उन्ही की संतान हूँ. अरे जो राष्ट्रपिता है उसकी संतान तो उस राष्ट्र का एक-एक नागरिक है. अब मैं आगे बढ़कर नेता बन गया तो समझ लीजिये कि उन्होंने मुझे आशीर्वाद दिया. आप वहीँ रह कर जनता बने रहे तो समझ लीजिये कि उन्होंने आपको आशीर्वाद नहीं दिया. सब आशीर्वाद का खेल है. मुझे तो गाँधी जी के अलावा मेरे पूज्यनीय पिताजी का भी आशीर्वाद प्राप्त था.
भाइयों, गाँधी जी तो महान थे. इतने महान थे कि उनकी गाथा का कोई अंत नहीं है. खुद मैं पिछले चालीस साल से आज के दिन उनके बारे में भाषण देता आ रहा हूँ लेकिन हर साल मुझे लगता है कि अभी कितना कुछ है उनके बारे में कहने को. हर साल मुझे सुनाने में मज़ा आता है और आपको सुनने में. इसका एक फायदा यह है कि उनकी गाथा पीढ़ी दर पीढ़ी चलती जा रही है. मुझे आशा है कि अगले वर्ष भी हमलोग इसी मैदान में मिलेंगे और मैं आपको उनके बारे में और बहुत सारी बातें बताऊँगा. तबतक चांस यह है कि मैं गृहराज्य मंत्री से प्रमोट होकर कोल मिनिस्ट्री में चला जाऊं. आजकल सबसे मलाईदार मिनिस्ट्री वही है. मैं कोयला मंत्री बन गया तो फिर गाँधी जी के बारे में कहानियां सुनाने का मजा और आएगा. भाइयों, कहानी जितनी पुरानी हो, उतनी मज़ा देती है. इसलिए मैं अपने इस वादे के साथ कि अगले साल इसी मैदान आपको फिर से कहानी सुनाऊंगा, आपसे विदा लेता हूँ.
तबतक के लिए बोलो गाँधी जी की जय!
डिस्क्लेमर: मैंने गाँधी-जयंती पर एक नेता का भाषण साल २००८ में लिखा था. अब आप नेताओं के स्पीच राइटर्स को तो जानते ही हैं. किसी ने उस नेता के भाषण को ब्लॉग से कॉपी कर के थोड़ी-बहुत हेर-फेर करके अपने मंत्री को दे दिया और उस मंत्री ने यह भाषण अपनी जनता पर २ अक्टूबर २०१२ के दिन चेंप दिया. यह वही भाषण है. यह डिस्क्लेमर मैंने उन लोगों के लिए लिखा है जिन्होंने २००८ वाला भाषण पढ़ रक्खा है:-)
Tuesday, September 24, 2013
दुर्योधन की डायरी - पेज १३७७
आज दिन भर बहुत व्यस्त रहा. प्रजा के लिए बनी महाराज भरत मुफ्त में पेट भरो योजना का उद्घाटन करने के लिए पिताश्री के साथ जाना पड़ा. जयद्रथ और दुशासन ने उद्घाटन समारोह के सारे इंतजाम बहुत मस्त किये थे. राजकवि तो काशीनरेश द्वारा आयोजित किसी कवि सम्मलेन में गए थे इसलिए योजना के लिए नारा लिखने का काम उप राजकवि ने किया. उन्होंने जो नारा लिखा वह भी ठीक-ठाक ही लगा. वैसे सिस्टर दुशाला ने सजेस्ट किया कि मुफ्त का गेंहू दो किलो, कार्ड दिखाओ और ले लो की जगह अगर दान का गेंहू दो किलो, कार्ड दिखाओ और ले लो होता तो अच्छा रहता. उसका कहना था कि ऐसा करने से बिना किसी मेहनत के यह बात प्रजा के बीच साबित हो जाती कि हमलोग दानी भी हैं. साथ ही यह बात एकबार फिर से बता दी जाती कि हम राजा है.
वह कह रही थी कि यह बात बीच बीच में प्रजा पर जाहिर करते रहना चाहिए क्योंकि कई बार प्रजा की हरकतों से लगता है जैसे वह हमारे राजत्व पर सवाल कर रही है.
राजमहल ने योजना के विज्ञापन के लिए कुल सत्रह अखबारों का फ्रंट पेज बुक कर लिया था. हस्तिनापुर एक्सप्रेस का तो फ्रंट और बैक-पेज दोनों ही बुक कर लिया गया था. एक समय था जब यह अखबार राजमहल के विरुद्ध खूब लिखा करता था. वो तो भला हो मामाश्री का जिन्होंने इसके नए संपादक को साध लिया और तब से अखबार हमारे पक्ष में लिखने लगा. मुझे याद है पहली बार इसी संपादक के साथ मिलकर मैंने और मामाश्री ने भीम को बदनाम किया था. गुप्तचरों द्वारा खींचकर लाई गई भीम और हिडिम्बा के विवाह की तस्वीरें सबसे पहले इसी संपादक के लिए लीक की गई थीं. साथ ही इस संपादक ने तमाम संपादकीय लिखकर साबित कर दिया था कि कैसे एक आर्य ने राक्षस कुल की एक कन्या के साथ विवाह कर घोर अपराध किया है. बड़ी थू थू हुई थी भीम की.
लिखना पड़ेगा कि प्रेस मैनेजमेंट के जो गुर मामाश्री ने तब सिखाये वह आजतक काम आ रहा है. आज ये अखबार न होते तो प्रजा को यह बताना कितना मुश्किल होता कि हाल ही में हमने चाय-पान की दुकानों पर जो स्पेशल मनोरंजन कर लगाया है वह कितना जरूरी था. इसी अखबार ने लोगों में यह बात फैलाई कि राजमहल का घाटा किस तरह से इतना बढ़ गया है कि नए कर जरूरी हो गए हैं. कैसे नहीं लगाता चाय-पान की दुकानों पर कर? प्रजा के लोग इन्हीं दुकानों पर बैठकर राजमहल और उसके लोगों की आलोचना करते हैं. जिसे देखो वह मुझे गाली देता है. मुझे अत्याचारी कहता है. दुशासन को अधर्मी कहता है. जयद्रथ के बारे में अनाप-सनाप बकता है. दुशासन ने यहाँ तक सुझाव दिया कि हस्तिनापुर में चाय-पान की दुकानों पर बैन लगा देना चाहिए. मैं तो तैयार हो गया था, वो तो कर्ण और मामाश्री ने बताया कि अगर इन दुकानों पर बैन लगा दिया गया तो लोगों में असंतोष बढ़ेगा. मामाश्री ने उसी दिन यह रहस्योद्घाटन किया कि प्रजा को आपस में बात करने से कभी रोकना नहीं चाहिए. बातचीत करने से उनके मन की भड़ास निकल जाती है. बोले; "हमें चाय और पान की दुकानों का आविष्कार करने वाले को धन्यवाद कहना चाहिए भांजे जिसने बहुत सोच समझकर इसका आविष्कार किया. अगर ये दुकानें न होंगी तो प्रजा अपनी भड़ास कहाँ निकालेगी? और यदि भड़ास न निकली तो उसके आन्दोलन का रूप लेने का खतरा हमेशा मंडराता रहेगा"
मामाश्री द्वारा सिखाये गए इसी पाठ का कमाल है कि प्रेस मैनेजमेंट में आजतक कोई दिक्कत नहीं आई. मुझे याद है, एकबार दुशासन ने पितामह और काकाश्री विदुर के हस्ताक्षर फोर्ज कर काशीनरेश को पत्र लिखकर आग्रह किया कि वे भीम को काशी नगरी में प्रवेश की अनुमति न दें क्योंकि उसने गुरु द्रोण की पाठशाला में मेरी और दुशासन की कुटाई की थी. पता नहीं कैसे वह पत्र हस्तिनापुर टाइम्स के हाथों लग गया और जब बात प्रजा के बीच निकल आई तब इसी संपादक ने अपने अखबार में तरह तरह से सम्पादकीय लिखकर यह बात फैलाई कि दरअसल वह पत्र दुशासन ने नहीं बल्कि पांडवों के दल में से ही किसी ने लिखा था क्योंकि पांडव एक-दूसरे को पसंद नहीं करते थे. जब यह लगा कि प्रजा को इसबात का विश्वास नहीं हो रहा है तब इस मामले को दबाने के लिए यह बात फैलाई गई कि माताश्री मुझसे, दुशासन और मामाश्री से बहुत रुष्ट हैं. खुद मामाश्री ने सम्पादक को यह आईडिया दिया कि वह ऐसा छापेगा तो लोगों का ध्यान उसपर चला जायेगा और काशीनरेश के नाम लिखे जाने वाले पत्र की बात दब जायेगी।
वैसे तो आज के कार्यक्रम के समय लिए जाने वाली तस्वीरों से कल के अखबार भरे रहेंगे लेकिन सुनने में यह भी आया है कि कुछ लोग इस योजना का विरोध कर रहे हैं. इन लोगों से निपटना मुझे अच्छी तरह से आता है. अगर यह भी नहीं कर सका तो फिर मामाश्री के रहने का क्या फायदा? मामाश्री ने चुनकर इक्यावन अर्थशास्त्री, इक्कीस अख़बारों के सम्पादक, ग्यारह बुद्धिजीवी, पाँच नाट्यकर्मी और एक सौ एक गुप्तचर को भाड़े पर ले लिया है जो यह फैलायेंगे कि यदि यह योजना लागू नहीं हुई तो प्रजा भूख से मर जाएगी और किस तरह से यह योजना महाराज भरत को असली श्रद्धांजलि होगी। मामाश्री ने प्लान बनाया है कि चूंकि आगे चलकर मुझे ही हस्तिनापुर का राज बनना है इसलिए प्रजा में यह सन्देश जाना जरूरी है कि इस योजना की रूपरेखा न सिर्फ मैंने तैयार की है बल्कि मैं ही यह निश्चित करूंगा कि यह योजना पूरी तरह से लागू हो और हर हस्तिनापुरवासी का कल्याण हो.
अब सोने चलता हूँ क्योंकि कल सुबह ही इन अर्थशास्त्रियों, संपादकों और बुद्धिजीवियों की क्लास लेकर उन्हें बताना है कि इस योजना के बारे में क्या-क्या बातें फैलानी हैं.
Friday, September 6, 2013
कबीर के दोहों के ट्विटरीय अर्थ
कबीरदास जी दोहे लिखते थे. तमाम लोग उनके दोहे पढ़कर बड़े हुए. कुछ ने उन दोहों से कुछ तो कुछ ने बहुत कुछ सीखा. इन दो के अलावा तीसरी तरह के लोगों ने उन्हें दूसरों के सामने बोलकर खुद के लिए ज्ञानी की उपाधि पक्की कर ली. इन तीनो के अलावा एक और प्रजाति है जिसने उनके दोहों का ब्लॉग खोल लिया और ट्विटर पर अकाउंट बनाकर उन्हें ट्वीट भी करते रहे.
ट्विटर पर कबीरदास जी के दोहे पढ़कर हमलोगों के मन में एकदिन आया कि अगर वे आज रहते तो ट्विटर पर जरूर होते और अपने दोहे ट्वीट करते तो उन्हें खूब आरटी मिलती. दोहों का साइज भी ऐसा कि ट्विटर पर एक सौ चालीस करैक्टर की शर्त में फिट बैठता है. फिर मन में आया कि अगर वे अपने दोहे ट्वीट करते तो तमाम लोग उन दोहों को स्लाई समझकर अपने-अपने हिसाब से उसका अर्थ निकालते. सोचकर देखिये कि कैसे कैसे भावार्थ निकाले जाते। यह पोस्ट कुछ ऐसे ही संभावित भावार्थों का संकलन है. आप बांचिये।
नोट: यह पोस्ट बीबीपी यानि ब्लॉगर-ब्लॉगर पार्टनरशिप की पोस्ट है जिसे मैंने और विकास गोयल जी ने लिखा है.
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पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।
उपरोक्त दोहे के माध्यम से कबीर दास जी सन्देश देना चाहते हैं कि हे ट्वीपल न ही मोटी-मोटी पुस्तकें पढने से और न ही अपने ट्विटर बायो में आईआईटी/आईआईएम लिख देने से ट्विटर पर पंडित या विद्वान कहलाये जाओगे. यह न भूलो कि ज्ञान नहीं, अपितु ज्ञान की बातें ट्विटर पर तुम्हारे विद्वान या पंडित कहे जाने का मार्ग प्रशस्त करती है. इसलिए हे ट्वीपल अगर विद्वान कहलाने की लालसा है तो फिर ट्वीट लिखकर बताओ कि ‘Just got my copy of ‘Human Psychology’ from flipkart, #nowreading.
धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय,
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय।
उपरोक्त दोहे के माध्यम से कबीरदास ट्वीपल से कह रहे हैं कि टेक इट ईजी डूड. बार-बार मेंशन या प्लीज आरटी लिखने से कुछ नहीं होगा. हे ट्वीपल वैसे तो आईफ़ोन, आईपैड, एस-फोर वगैरह रखना ईजी है और धीरज रखना कठिन, किन्तु सफलता की कुंजी बताती है कि धीरज ही रखने की जरूरत है. जब तुम्हारा समय आएगा और सामने वाले को पता चल जायेगा कि तुम बड़ी कंपनी में उच्च-पद पर कार्यरत हो, तब तुम्हें आरटी अपने आप मिलने लग जाएगी क्योंकि सामनेवाला जबतक आरटी नहीं करेगा वह तुम्हें लिंक्ड-इन पर इनवाईट नहीं कर पायेगा.
निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय,
बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।
उपरोक्त दोहे के माध्यम से कबीरदास जी यह सन्देश देना चाहते हैं कि हे ट्वीपल अपने आलोचक को न केवल फालो करो अपितु उसे अपने और पास रखने के लिए उसके साथ डीएम का आदान-प्रदान भी करो. क्योंकि ट्विटर पर असली आलोचक वह होता है जो तुम्हारी गल्तियाँ तुम्हें बताकर उनमें सुधार कर पाए या न कर पाए, अपनी आलोचना से तुम्हें फेमस जरूर कर देता है.
जहाँ एक तरफ कुछ विद्वान इस दोहे का भावार्थ यह निकालते हैं वहीँ सोशल मीडिया के कुछ और भावार्थ-वीरों का मानना है कि यह दोहा कबीरदास जी ने एक्स्क्लुसिवली ऐसे ट्विटर सेलेब के लिए लिखा है जिन्हें अपनी असाधारण रूप से साधारण ट्वीट के लिए भी एपिक नामक टिप्पणी पढने का नशा होता है. कबीरदास जी ऐसे ट्विटर सेलेब्स को इस दोहे के माध्यम से सन्देश दे रहे हैं कि हे ट्वीपल तुम मानो या न मानो लेकिन सत्य यही है कि हरबार तुम ऐसा ट्वीट नहीं ठेल सकते जो एपिक हो और एपिक के अलावा कुछ भी न हो. इसलिए जब तुम्हारा कोई फालोवर उसे रद्दी करार दे दे, तो उसकी आलोचना का सम्मान करो और उसे कुछ मत कहो क्योंकि तुम्हारे बाकी चेले-चपाटे उससे खुद ही निपट लेंगे.
जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान,
मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।
उपरोक्त दोहे के माध्यम से कबीरदास जी ट्वीपिल को संदेश देते हैं कि ट्विटर पर फालोवर से यह पूछने की जरूरत नहीं कि वह रागां का फैन है या नमो का. कौन किसका फैन-शैन है यह जानने में कुछ आनी-जानी नहीं है. असल ज्ञान यह जानना है कि कौन से फैन फालोविंग से ज्यादा आरटी मिल सकती है? जिस ग्रुप से ज्यादा आरटी मिले, बस उसी के फैन बन जाओ, फालोवर भला करेंगे.
हिन्दू कहे मोहि राम पियारा, तुरक कहे रहमाना,
आपस में दोउ लडि लडि मुए, मरम न कोऊ जाना।
इस अत्यंत महत्वपूर्ण दोहे के माध्यम से कबीरदास जी कहते हैं कि ट्विटर पर कोई शाहरुख़ का भक्त है तो कोई सलमान का. इन दोनों के भक्तों की मंडली सुबह-शाम आपस में लडती-भिड़ती रहती है. यह साबित करने के लिए दोनों में से कौन महान है? लेकिन लड़ने-भिड़ने में बिजी दोनों ग्रुप आजतक इस मरम का पता नहीं लग पाए कि लाखों लोग जस्टिन बीबर और केआरके दीवाने क्यों हैं?
सात समंदर मसि करौ, लेखनि सब बनराइ,
धरती सब कागद करौ, हरि गुन लिखा न जाइ।
कबीरदास जी कहते हैं सात समंदर की स्याही घोल लो और संसार भर के वनों के पेड़ से कलम बना लो फिर भी ट्विटर पर विराजमान उस फ़िल्मी भगवान की रिप्लाई के जवाब के एवज में उसकी महिमा का बखान नहीं कर सकोगे जो उसने तुम्हारे एक हज़ारवें ट्वीट के बाद तुम्हें दिया है. हे ट्वीपल जब यह करके भी तुम धन्य नहीं हो सकते तो ट्वीट तो केवल एक सौ चालीस करैक्टर का होता है. ऐसे में अपने उस फ़िल्मी स्टार रुपी भगवान की रिप्लाई का बखान करने के लिए एक हज़ार ट्वीट लिखकर उसे थैंक यू बोलोगे तो भी उसका कर्ज नहीं उतार पाओगे.
जो जल बाढ़े नाव में, घर में बाढ़े दाम,
दोऊ हाथ उलीचिए, यही सयानो काम।
कबीरदास जी कहते हैं कि जब तुम्हारे फ़लोवर्स की संख्या हजारों में हो जायेगी और तुम अपने घर वालों को दिखाते हुए बताओगे तो तुम्हारे घर में तुम्हारा दाम बढेगा. अपना दाम बढाने के लिए तुम्हें और फ़ालोवर्स चाहिए और इसका एक ही मन्त्र है कि तुम नए नए फलोवार्स की ट्वीट की रिप्लाई दोनों हाथ से उलीच कर करते रहो. फालोवर्स की संख्या बढ़ती रहेगी और घर में तुम्हारा दाम भी बढ़ता रहे.
अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप,
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।
श्री कबीरदास का उपरोक्त दोहा ऐसे ट्वीपल के लिए नीतिवचन टाइप है जो दिनभर में दो ढाई सौ ट्वीट ठेल देता है. उपरोक्त दोहे में कबीरदास जी ऐसे ट्वीपल को इशारा करते हुए बताना चाहते हैं कि हे ट्वीटयोद्धा दिनभर ट्वीट करने से कुछ नहीं मिलेगा. ऊपर से लोग जान जायेंगे कि तुम्हारे पास और कोई काम-धंधा नहीं है इसलिए तुम सारा दिन ट्विटर से चिपके रहते हो. साथ ही वे ऐसे ट्वीपल को भी इशारा करके समझा रहे हैं जो दिन भर सरकार और मीडिया पर बरसते रहते हैं. वे उन्हें हिदायत दे रहे हैं कि ज्यादा बरसना ठीक नहीं है क्योंकि इधर तुम बरसोगे और उधर सरकार और मीडिया धूप करके इस बरसात को सुखा देंगे.
सांई इतना दीजिये जामे कुटुंब समाय,
मैं भी भूखा न रहूं, साधु न भूखा जाय।
इस दोहे के माध्यम से संत कबीरदास ने ट्वीटबाजों के लिए नहीं अपितु फेसबुकियों के लिए सन्देश दिया है. कबीरदास जी फेसबुकी से कहते हैं कि वह अपने सांई से फेसबुक के फोटो और एलबम वाले सेक्शन में उतनी जगह मांगे जिसमें उसके और उसके कुटुंब यानी परिवार के हर सदस्य की हर होलीडे की फोटो लग जाए और उसका पूरा कुटुंब उन अलबमों में समा जाय. वह फेसबुक प्रोफाइल पर इतनी फोटो डाल दे कि फिर उसे फोटो डालने की भूख न रहे. साथ ही फ्रेंड रुपी साधु उन फोटो को देखकर इतनी लाइक दे कि लाइक देने से उसका पेट भर जाए और उसे भूखा वापस जाने की जरूरत न पड़े.
रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय,
हीरा जन्म अमोल था, कोड़ी बदलेजाय।
इस दोहे के माध्यम से कबीरदास जी कटाक्ष करते हुए कहते हैं कि हे ट्वीपल रात को सोकर और दिन को खाकर अपना जीवन व्यर्थ न करो. असल मज़ा लेने के लिए पूरी-पूरी रात ट्वीट करो. यह चिंता न करो कि रात हो गई है और तुम्हारी ट्वीट कोई नहीं पढ़ेगा। अरे भारत में रात है तो क्या हुआ, ऑस्ट्रेलिया में तो दिन है और कैनाडा में शाम. इसलिए दिन रात ट्विटर पर लगे रहो. परिवार, मित्र वगैरह तो आते-जाते रहेंगे लेकिन ट्विटर पर फालो करने वाला एकबार चला गया तो फिर वापस नहीं आएगा और ट्विटर पर ही नहीं, घर में भी तुम्हारा मोल घट जायेगा.
