अगर यह पार्ट -२ है तो जाहिर सी बात है कि पार्ट -१ भी होगा ही. तो पार्ट -१ को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक कीजिये.
अब आगे का हाल....
एक नेता जी से पत्रकार ने सवाल किया कि; "कट-मोशन में तो आप सरकार के साथ थे. आज उसके विरुद्ध क्यों हैं?"
उन्होंने जवाब दिया; "ढेर दिन हो गया था जे हम सरकार का विरोध नहीं किये थे. पब्लिक सब सोच रहा था कि कहीं हम सरकार के साथ त नहीं हो गए? दू महीना हो गया था आ हमलोग को विरोध करने का कोई मुद्दा नहीं मिल रहा था एही बास्ते हम विदेश नीति का बात पर सरकार के विरोध में चले गए."
उसके बाद पत्रकारों का सवाल और नेता जी का जवाब. पत्रकारों के हर सवाल का नेता जी ने जवाब दे डाला. विद्यार्थी जीवन में कॉपी में जवाब लिखते तो कम से कम ग्रैजुएट तो होकर निकलते लेकिन कोई बात नहीं. जब जवाब दो तभी सबेरा. पूरी प्रेस कॉन्फरेंस ख़त्म होने के बाद तीन-चार मोटी बातें निकल कर आयीं. जैसे नेताजी बहुत इम्पार्टेंट हैं. उनके पास तीन सांसद हैं तो क्या हुआ, सरकार चलाने के लिए उनका समर्थन चाहिए ही चाहिए. सरकार को आगे 'वूमेन रिजरभेशन' बिल, न्यूक्लियर लायबिलिटी बिल वगैरह-वगैरह लाना है. और लास्ट बट नॉट द लिस्ट जो बात थी वह ये थी नेता जी को सरकार हल्के में नहीं ले सकती.
ये तो रही अशुद्ध विपक्ष के नेता की बात.
उधर विशुद्ध विपक्ष के नेता लोग भी सरकार के खिलाफ बोल रहे थे. दबाव वगैरह बनाने में जब सफल नहीं हो सके तो बोले कि; "हम इस मुद्दे को जनता के बीच ले जायेंगे."
बताइए, जनता के बीच क्या मुद्दों की कमी है? ये नेता लोग बोलते समय कुछ सोचते नहीं. यहाँ तक कह देते हैं कि; "मंहगाई के मुद्दे को हम जनता के बीच ले जायेंगे." अब इन्हें कौन समझाये कि; "हे चिरकुट, तुम मंहगाई के मुद्दे को जनता के बीच क्या ले जाओगे? वह मुद्दा वहीँ से तो निकला है."
लेकिन वही बात है न. राजू श्रीवास्तव के शब्दों में; "मुँह खोला और भक्क से बोला."
विषयांतर हो गया. ब्लॉग पर रिपोर्टिंग में यही सुविधा है कि जब चाहे रिपोर्टिंग को छोड़कर अपना ज्ञान और दर्शन ठेल दो. अब बताइए अगर मैं अखबार का संवाददाता होता तो ऐसा कर पाता? नहीं न.
खैर, आगे बढ़ते हैं. हाँ तो जब विशुद्ध विपक्ष ने भी मामले को गरमा दिया तो अपनी ईमेज बनाने के लिए सरकार इस बात पर राजी हो गई कि वह एक सर्वदलीय बैठक बुला देगी. उसमें सभी दलों को विश्वास में लेने की कोशिश के जायेगी. अगर ठीक उस दिन विश्वास की शार्ट सप्लाई नहीं हुई तो शायद इन दलों को सरकार सिश्वास में ले ले.
मीटिंग के दिन एक जगह सभी दलों के प्रतिनिधि इकठ्ठा हुए. मेज थी. मिनरल वाटर की बोतलें थीं. कुर्सी के आगे नेमप्लेट थीं. सब अपनी-अपनी नेम प्लेट के पीछे बैठ गए. कुछ लोगों ने दबे स्वर में प्रोटेस्ट भी किया कि नेमप्लेट अंग्रेजी में क्यों लिखी गईं हैं? प्रोटेस्ट वगैरह करके जब सब शांत हुए तो सरकार की तरफ से डिप्यूट किये गए मंत्री ने इन प्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए शुरू किया; "ऐज उई आल आर अभेयार, गभार्मेंट हैज रिसेंटोली डिस्कोभार्ड द फैक्ट दैट उइथ द हेल्प आफ डायोलाग..."
अभी वे इतना ही बोल पाए थे कि मीटिंग हाल में बत्ती गुल हो गई. अँधेरा हो गया. एक आवाज़ आई, " मानीय मंत्री महोय अंगेजी में मीटिंग शुरू करेंगे तो ऐसा ही होगा. अंगेजी निशानी है अँधेरे की."
उस आवाज़ को समर्थन देते हुए पास से ही एक और आवाज़ आई; "आप ठीक कहे हैं. ओही खातिर गई है बत्ती. दादा सरकार की बत्ती शुरुवे में गुल हो गया?"
ये आवाज़ सुनकर सब हँस पड़े. मंत्री महोदय को भी हँसना पड़ा.
अभी सब हँस ही रहे थे कि एक गंभीर आवाज़ आई; "पॉवर जनरेशन एंड डिस्ट्रीब्यूशन में रेफोर्म्स के लिए ग्रुप ऑफ़ मिनिस्टर बनाया होता तो कम से कम बिजली तो नहीं जाती."
"अरे त आप जब बोले थे कि कायद-ए-आजम सेकुलर हैं तब त बिजली नहीं गया था. तब त बिजली था औ तब भी त नहीं लौका आपको? दस महीना बाहर रहकर पाटी में आये हैं त बड़ा-बड़ा बात?"; फिर से आवाज़ आई.
इन आवाजों के बीच मंत्री महोदय ने सोचा कि मौज-मस्ती में विषयांतर न हो जाए. यही सोचते हुए वे बोले; "में आई हैव इयोर अटेंशोन...."
फिर से एक आवाज़ आई; "फेर ओही अंग्रेजी? पहला बार बोले तो बत्ती गुल हो गया. फेर ओही भाषा में शुरू करेंगे त अबकी बार हाल में आगे न लग जाए.."
"आच्छा ठीक है. हाम हिंदी में बोलता है. रेस्पेक्टेड डेलिगेट्स जैसा कि जानता है कि सोरकार ने पकिस्तान के साथ सोभी सोमस्सा को डायलाग..."
अभी उन्होंने अपनी हिंदी में संबोधन शुरू ही किया था कि एक तरफ से आवाज़ आई;"वाट यिज दिस सार? यानरेबल
मिनिस्टार यिज यिस्पिकिंग इन यिंदी? वी वांट टाल रेट यिट. आवर रिस्पेक्टेड डाक्टर कलैन्य्गार सार विल नाट याल्लो यिट. प्लीज यिस्पीक यिन यिन्ग्लिश."
फिर से झमेला. अंग्रेजी और हिंदी की लड़ाई में आखिर में अंग्रेजी जीत गई. मंत्री महोदय ने फिर से शुरू किया; "ऐज उई आर अभेयार, उई आर हीयार टू मेक सोम काइंड ऑफ़ कोंसेंसोस ऑन द डायोलाग डोस्सियोर हूविच उई उविल साब्मिट टू द पाकिस्तान फार देयार अप्रूभाल..."
अभी तक बिजली नहीं आई थी लेकिन देश के बड़े दिमागों का एक मिनट भी व्यर्थ न हो, इसलिए मीटिंग जारी थी.
अँधेरे में एक आवाज़ उठी; "हाँ त सरकार सही सोचा है. बढ़िया डायलाग लिखने वाला सब को बुलाया जाय और उससे डायलाग लिखवाया जाय. हम अनुमोदन करते हैं ऊ आदमी का नाम जो फिलिम मुग़ल-ए-आजम का डायलाग लिखे रहे. का नाम था उनका...एक मिनट हम लिख के लाये हैं..नेता जी तनी अपना मोबाइलवा जलाइए..हाँ..अमानुल्ला खान..उनसे लिखवायें. ऊ बढ़िया लिखेंगे और पाकिस्तान का मामला है त उर्दू में डायलाग रहने से ही ठीक रहेगा ."
"आई नोट डाउन इयोर रेकोमेंडेशोन बाट आई थिंक ही में नॉट बी अलाइभ नाऊ. बाट आई अस्योर इयु दैट उई उविल चेक ह्वेदार...."; मंत्री जी ने नेता जी को आश्वासन दिया.
मंत्री जी का आश्वासन पूरा हुआ ही था कि एक आवाज़ आई; "वी हैव आब्जेक्शान सार. वी तिंक यिट विल बे बेटर यिफ डायलाग्स यार रीटेन यिन तमिल. आवर रिस्पेक्टेड डाकटार कलैन्यगार सार येज रीसेंटली डिमांडेड दैट तमिल बी मेड या नेशनल लैंग्वेज. ही विल बी वेरी हैपी यिफ डास्सियर टू बी सबमिटेड टू पाकिस्तान विल बी रिटेन यिन क्लासिकल तमिल..आवर रिस्पेक्टेड डाकटार कलैन्यगार सार आर्गेनाइज्ड यिन्टरनेशनल क्लासिकल तमिल कांफेरेंस टू टेल टू दा वाल्ड..."
एक आवाज़ और आई; "बस करो. बस करो. खुदे बोलते रहोगे कि औउर भी कोई बोलेगा? अरे डायलाग लिखायेगा त हिंदी में या उर्दू में. तमिल कौन समझेगा वहाँ?"
ये बात सुनकर पहले वाली आवाज़ फिर आई; "बट यिफ यू रिमेम्बर सार, वन ऑफ़ द डास्सियर सबमिटेड टू पकिस्तान यिन दा ट्वेंटी-सिक्स एलेवेन केस येज समथिंग रिटेन यिन मराठी..."
"अरे ऊ छोड़ो..ऊ त गलती था. एक ही गलती केतना बार करेगा सरकार?"; फिर से वही विरोध जताने वाली आवाज़ आई.
"दीस इज नाट दा स्टेज टू फाईट ईच-ओदर"; मंत्री जी ने सलाह दी.
अँधेरे में एक धीर-गंभीर आवाज़ उभरी; "हमारी पार्टी का ऐसा मानना है कि हमारे पार्टी माऊथपीस के जो सम्पादक हैं उनसे लिखवाया जाय..बढ़िया लिखते हैं. वे बढ़िया डायलाग लिखेंगे."
"अरे त आप भी त किताब लिखे हैं. किसको-किसको सेकुलर बताते फिरते हैं. आप किताब लिख सकते हैं त डायलाग भी लिख दीजिये. दस महीना बाद पार्टी में लौटे हैं और पार्टी भेज भी दिया मीटिंग में"; पूरी मीटिंग में डोमिनेंट आवाज़ फिर से उभरी.
अब बारी थी एक नई आवाज़ के उभरने की. उसने कहा; "अभी प्रकाश झा की फिल्म राजनीति हिट हुई है. हमारा कहना है कि उन्हें डायलाग लेखन की समझ है. उनसे डायलाग लिखवाया जाना चाहिए. हमारे नेता और मुख्यमंत्री भी इस पक्ष में हैं."
एक बार फिर से डोमिनेंट आवाज़ उभरी; "का कहे? प्रकाश झा? अरे नाम लेना था त किसी सेकुलर डायलाग राइटर का नाम नहीं मिला? ओइसे भी मिलेगा कैसे? आपके मुख्यमंत्री का फोटो किसके साथ अखबार में प्रकाशित हुआ ऊ त सब देखा ही है."
"हमारी पार्टी बिहार के किसी राइटर को डायलाग नहीं लिखने देगी. वईसे भी पकिस्तान की बात पर किसी भी बात का विरोध पहिले महाराष्ट्र से ही होगा"; एक नई आवाज उभरी.
"नै..नै..ई नहीं चलेगा. बिहार के लोगों का बिरोध बम्बई में त करता ही था तुम लोग, अब पाकिस्तान में भी करने लगा? आ सुनिए दादा, हम एक और नाम देते हैं. जाभेद अख्तर. सबसे बड़ा बात है कि आदमी सेकुलर है. उर्दू भी जानते ही होंगे. औउर ऊ अब त पार्लियामेंट में भी है"; डोमिनेंट आवाज़ ने फैसला जैसा कुछ सुनाते हुए कहा.
"बाट सार, वी रेकमेंड नेम ऑफ़ बासंती, दा प्येमस तमिल राइटर फॉर दिस काज"; पहले वाली आवाज़ ने एक बार फिर से ट्राई मारा.
"प्रकाश झा"
"जाभेद अख्तर"
"बासंती"
"सुनील गंगोपाध्याय"
सब अपना-अपना रेकमेंडेशन अँधेरे में ही दोहराते जा रहे थे.
मंत्री महोदय को लगा कि अँधेरे में पता भी नहीं चल रहा है कि केवल गले काम कर रहे हैं या फिर और भी अंग? कहीं ऐसा तो नहीं कि हाथ-पैर भी काम करने पर उतर आयें. उन्हें लगा कि मीटिंग अगर ख़त्म न की गई तो कोई अनहोनी हो सकती है. यही सोचते हुए वे बोले; "ओके..ओके..भाट आई हैभ कोंक्लूडेड ईज, दैट उई हैभ नाट एराइव्ड ऐट एनी कोंसेंसोस.... आई उविल आस्क आनरेबल प्राइम मिनिस्टर टू फार्म आ ग्रूप आ मिनिस्टोर हुविच उविल कोऑर्डिनेट बिटभीन गभार्मेंट ऐंड दा अपोजीशोन"
मीटिंग ख़त्म हुई. अब सरकार को-ओर्डिनेशन बनाने के लिए डायलाग राइटर ढूढ़ रही है.
Wednesday, June 30, 2010
डायलाग इज द ओनली वे फॉरवर्ड - पार्ट २
Monday, June 28, 2010
डायलाग इज द ओनली वे फॉरवर्ड - पार्ट 1
पूरा देश साँसे थाम कर बैठा था. भारत और पकिस्तान के विदेश सचिव वार्ता कर रहे थे. पिछला रिकॉर्ड बताता है कि जब भी पाकिस्तान के साथ अपने देश की वार्ता होती, देश के लोगों की सांसें थम जाती थीं. उसी परंपरा और संस्कृति का निर्वाह आज भी हो रहा था. लोग गुटों में बैठे थे और गुटों में ही खड़े थे. गुटों की ये सक्रियता आभास दिला रही थी कि गुटबाजी ही भारत को एक एक्टिव देश का दर्जा दिलवाती है. टीवी चैनल के संवाददाता वार्ता स्थल के बाहर अपनी हार्ट-बीट थामने की एक्टिंग करते हुए क्यूट जैसे कुछ लग रहे थे. कैमरे क्लिक होने के लिए बेताब थे. टीवी न्यूज चैनल के स्टूडियो में बैठे पैनेलिस्ट कयास लगा रहे थे.
नुक्कड़ों पर गुट चर्चारत थे. कुछ गुटों को देखकर डर लग रहा था कि कहीं ये लोग उसी जगह खड़े-खड़े अपनी पॉलिटिकल पार्टी न लॉन्च कर डालें. चाय की बिक्री बढ़ गई थी. बाज़ारों में पान की कमी हो गई थी. लोगों को खाने-पीने की सुध नहीं थी. टेंशनग्रस्त देश यही सोच रहा था कि क्या होगा आज? वार्ता ख़त्म होने के बाद सुनने को क्या मिलेगा? कुछ लोगों को वार्ता करने वालों पर पता नहीं किन कारणों से विश्वास तो नहीं लेकिन विश्वास जैसा कुछ था. ये लोग यह सोचते हुए डर रहे थे; "ऐसा तो नहीं कि पकिस्तान के साथ हमारी समस्याएं आज ही सॉल्व हो जायेंगी?" फिर उन्ही मन में सांत्वना के स्वर उभरते; "नहीं-नहीं ऐसा नहीं हो सकता."
सांत्वना के ये स्वर सही थे. जिन दिलों से ये स्वर निकल रहे थे उनके मालिकों को अपने देश के नेताओं पर पूरा भरोसा था. उन्हें पता था कि जवाहरलाल से लेकर देवीलाल तक, सभी ने जबानी जमाखर्च तो बहुत किया था लेकिन किसी ने आजतक पकिस्तान के साथ एक भी समस्या नहीं सुलझाया था. ऐसे में समस्या न सुलझा पाने की हमारी संस्कृति की रक्षा करने का काम वर्तमान पीढ़ी के जिम्मे है और हमारे नेता देशवासियों के इस विश्वास की रक्षा कर के छोड़ेंगे.
इन स्वरों को थोड़ा-बहुत बल इस सिद्धांत से भी मिल रहा था कि हर देश का अपने पड़ोसी देश के साथ कुछ न कुछ लफड़ा रहना ही चाहिए. लफड़ा नहीं रहे तो लगता ही नहीं कि देश जिन्दा है. लफड़े ही देश के जिंदा रहने का सुबूत होते हैं.
इन्ही सोच-विचार की लहरों में दिन डूबा जा रहा था. अचानक शाम को कॉन्फरेंस रूम का दरवाजा खुला. दरवाज़ा खुलने के बाद जो हरकतें हुई उन्हें देखकर लगा कि कुछ दरवाजे कितने महत्वपूर्ण होते हैं. खैर, दरवाजा खुला और अन्दर से दोनों देशों के विदेश सचिव निकले. भारतीय विदेश सचिव मुस्कुराते हुए आगे बढीं. संवाददाताओं ने उन्हें घेर लिया. इन संवाददाताओं को देख कर लगा जैसे उन्हें पूरा विश्वास था कि आज विदेश सचिव कुछ ऐसा कहने वाली थीं जो भारत और पकिस्तान के पंगात्मक इतिहास में किसी प्रधानमंत्री, विदेश मंत्री या विदेश सचिव ने नहीं कहा था.
विदेश सचिव ने संवाददाताओं के इस विश्वास को थाम लिया और कहा; "विद टूडेज मीटिंग, वी हैव अराइव्ड ऐट द कान्क्लूजन दैट डायलाग इज द ओनली वे फॉरवर्ड."
उनकी बात सुनकर वहाँ उपस्थिति लोगों की बांछें खिल गईं. सब हतप्रभ होकर एक-दूसरे को देखने लगे. लोगों को देखकर लग रहा था जैसे उन्हें विश्वास हो चला था कि विदेश सचिव द्वारा कही गई डायलाग वाली बात बहुत गहरी थी और अब भारत और पकिस्तान के बीच समस्याओं का सुलझना निश्चित है. कुछ लोगों ने इस विदेश सचिव की सराहना करते हुए पुराने विदेश सचिवों की आलोचना कर डाली. यह कहते हुए कि; "इतनी-इतनी सैलेरी लेते थे वे लोग, कहने को बढ़िया दिमाग रखते थे लेकिन उनके दिमाग में कभी यह बात नहीं आई कि; "डायलाग इज द ओनली वे फॉरवर्ड."
लानत है.
विदेश सचिव द्वारा बोले गए 'बयानीय सेंटेंस'को सुनकर मन में भाव आ रहे थे जैसे देश के एक सौ बीस करोड़ लोग डायलाग बोलते हुए पाकिस्तान की तरफ बढ़ते जा रहे थे और उनके रास्ते की तमाम मुश्किलें अपने आप हटती जा रही थीं.
बधाइयाँ दी जा रही थीं. बधाइयाँ ली जा रही थीं. विदेशी टीवी चैनलों के रिपोर्टर्स भी खुश थे, खासकर अमेरिकी रिपोर्टर्स, जिन्हें यह लगता है कि भारत और पकिस्तान के बीच अगर मारपीट न हो सके तो कम से कम बातचीत या वैसा ही कुछ होते रहना चाहिए. वे अपने-अपने चैनलों के लिए अपनी रिपोर्ट रिकॉर्ड करवा रहे थे. चारों दिशायें मुस्कुराहटों से भरी हुई थीं. भारतीय दल खुश था तो पाकिस्तानी दल महाखुश.
शाम को सरकार ने इस डायलाग वाली बात के बारे में बताया कि यह इक्कीसवीं सदी का सबसे बड़ा रहस्योद्घाटन है और इस रहस्य के साथ ही पाकिस्तानी पंगों का अंत तय है. प्रधानमन्त्री खुश थे. विदेश मंत्री तो बहुत खुश थे. कूटनीति की सफलता ने सबके चेहरे चमका दिए थे. रूलिंग पार्टी के प्रवक्ता से लेकर उठभैये और छुटभैये नेता तक माइक्रोफोन के सामने बाईट देने में बिजी थे. प्रस्ताव पारित करके लड्डू वितरण समारोह का आयोजन किया गया. तमाम पत्रकार इस बात से चकित थे कि एक रहस्योद्घाटन कितना महत्वपूर्ण हो सकता है.
विदेश सचिव की डायलाग वाली बात पर पूरा देश ही कयास लगा रहा था. सब अपने-अपने अंदाज़ में बातें कर रहे थे. सरकार किसे चुनेगी डायलाग लिखने के लिए? क्या किसी पुरानी फिल्म के डायलाग राइटर को लाया जाएगा? कहीं ऐसा तो नहीं कि पकिस्तान के साथ समस्याएं सुलझाने के लिए सलीम-जावेद एक बार फिर से जोड़ी बना लेंगे? कोई कह रहा था कि कादर खान जी से लिखवाना चाहिए. कोई बोला कि अब के ज़माने में कादर खान जी के डायलाग नहीं चलेंगे. अब जमाना बदल गया है. अब किसी नए राइटर को ट्राई किया जाएगा. किसी ने सुझाव दिया कि पाकिस्तान की बात है लिहाज़ा डायलाग उस राइटर से लिखवाना चाहिए जिसने सनी देओल की फिल्म में एक डायलाग लिखा था कि "दूध मांगोगे तो खीर देंगे, कश्मीर मांगोगे तो चीर देंगे." किसी ने कहा धत्त, उससे लिखवाओ जिसने ग़दर एक प्रेम कथा का डायलाग लिखा था. कोई बोला हो सकता है सरकार किसी पत्रकार को हायर कर ले.
टीवी चैनलों ने सात-आठ नामों को दिखाकर एस एम एस वोटिंग करवाना शुरू कर दिया था.
उधर लड्डू बँटे. मीटिंग्स हुईं. लोग जमा हुए. कहीं-कहीं लोग जमे भी. देश-विदेश के टीवी चैनलों ने भारतीय सरकार की सराहना की. अमेरिकी राष्ट्रपति ने राहत की सांस लेने की एक्टिंग की. उन्होंने हमारे प्रधानमंत्री को बधाई दी. हमारे प्रधानमन्त्री ने फट से बधाई लेकर उसे अपनी उस एक्सक्लूसिव आलमारी के हवाले किया जिसमें वे अमेरिकी राष्ट्रपति की बधाइयाँ और सन्देश बड़े करीने से सजाते थे.
जब अमेरिकी राष्ट्रपति के सन्देश आलमारी के हवाले हो गए और इनिशियल सेलिब्रेशन की धूल-धक्कड़ सेटल हुई तो विदेश सचिव ने एक राज खोला. डिप्लोमेसी की यही विशेषता है कि सबकुछ एक बार में सामने नहीं आता. वैसे भी बातें रह-रह कर सामने आयें तो डिप्लोमेसी में दिलचस्पी बनी रहती है. इसी दिलचस्पी को बरकरार रखते हुए विदेश सचिव ने बताया कि यह डायलाग वाली बात पर पाकिस्तान की तरफ से एक रायडर लगा दिया गया है.
जब विदेश सचिव से इस रायडर के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा; "पाकिस्तान चाहता है कि भारत पहले डायलाग के कम से कम दस डोस्सियर बनाकर पकिस्तान को दे जिससे उसके डोस्सियर एक्सपर्ट उसे जांच सकें. वे जब डायलाग को जांचकर उसे अप्रूव कर देंगे तब अगला स्टेप लिया जाएगा."
विदेश सचिव की बात सुनकर प्रधानमन्त्री मुस्कुरा दिए. पीए ने धीरे से पूछा; "सर आपकी मुस्कराहट देखकर लगता है जैसे आपको कुछ याद आ गया."
अपने पीए की बात सुनकर प्रधानमंत्री बोले; "हाँ. दरअसल मुझे अचानक एक लाइन याद आ गई कि; म्यूचुअल-फंड इन्वेस्टमेंट्स आर सब्जेक्ट टू मार्केट रिस्क. प्लीज रीड द ऑफर डाक्यूमेंट केयरफुली बिफोर इन्वेस्टिंग."
उसके बाद दोनों ने एक दूसरे को देखा और दोनों मुस्कुरा दिए.
खैर, उसके बाद प्रधानमंत्री विदेश सचिव से मुखातिब होते हुए बोले; "तो इसमें कौन सी बड़ी बात है? डायलाग का डोस्सियर ही तो बनवाना है. पहले की बात होती तो कोई चिंता भी थी लेकिन अब बिलकुल चिंता नहीं है. अब तो हमारे पास ग्रुप ऑफ़ मिनिस्टर्स का फंडा भी है. एक काम करता हूँ. मैं एक ग्रुप ऑफ़ मिनिस्टर्स बना देता हूँ जो मीटिंग्स करके बताएगा कि किस राइटर से डायलाग लिखवाना है? अपने यहाँ डायलाग लिखने वालों की कमी थोड़ी है. देश के ट्वेंटी परसेंट लोग कई सालों से डायलाग बोल रहे हैं और बाकी सुन रहे हैं. कहिये तो पूरा देश ही डायलाग से ही चल रहा है. आप बिलकुल निश्चिन्त रहें. हम डायलाग के ऐसे-ऐसे डोस्सियर देंगे कि वहाँ के डोस्सियर एक्सपर्ट उसे रिजेक्ट नहीं कर पायेंगे. मुझे अपने ग्रुप ऑफ़ मिनिस्टर्स पर पूरा भरोसा है."
दूसरे दिन लोकसभा में प्रधानमंत्री ने सदन को जानकारी देते हुए कहा; "हमें यह बताते हुए ख़ुशी हो रही है कि पाकिस्तान के साथ हमारी समस्याएं अब ख़त्म हो जायेंगी. हमें पता चल गया है कि डायलाग का सहारा लेकर सबकुछ ठीक किया जा सकता है. मैंने आज आफिस पहुँचते ही एक ग्रुप ऑफ़ मिनिस्टर्स बना दिया है जो उन राइटर्स का सेलेक्शन करेगा जो डायलाग लिखेंगे और साथ ही उन एक्टरों का भी सेलेक्शन करेगा जो लिखे गए डायलाग की डेलिवरी करेंगे."
प्रधानमंत्री की बात सुनकर विपक्ष और साथी दल वाले भड़क गए. शोर जब थमा तो पता चला कि बाकी के दल चाहते हैं कि चूंकि यह विदेश नीति का मामला है इसलिए बाकी दलों को विश्वास में लेना ज़रूरी है. वैसे भी कई महीने हो गए थे सरकार ने सभी दलों को विश्वास में नहीं लिया था. पिछली बार सरकार ने सांसदों की सैलेरी बढ़ाने के मामले में सभी दलों को विश्वास में लिया था. लेकिन उस बात को करीब सात महीने बीत गए थे. ऐसे में बाकी दलों की यह बात जायज भी लगी.
कभी विपक्ष में और कभी पक्ष में रहने वाले एक नेता जी बोले; "भाट इज दिस? ऐसा नै चलेगा. हम नाराज हूँ. सरकार का ड्यूटी है कि ऊ जेतना सेकुलर दल है ऊ सबको विशबास में ले.... आल दी सेकुलर पार्टी...का समझा? आ हम क्लीयर कर दें कि ई मुद्दा पर पर हम आ नेताजी साथ-साथ हैं. टूगेदर...कह सकता है सब कि ई मुद्दा पर हम विपक्ष में हैं...एतना इम्पार्टेंट फैसला बिना सब सेकुलर पार्टी से बात किये लिया कैसे सरकार ने? हमर डिमांड है कि इसके लिए 'सर्भदलीय' बैठक बुलाई जाय...आल पार्टी मीटिंग..तब जाके फैसला फाइनल होगा."
शोर मच गया. हंगामा हो गया. वाक आउट हो गया. अध्यक्ष ने लोकसभा की कार्यवाई स्थगित कर दी. विपक्ष ने जहाँ इसे लोकतंत्र की हत्या बताया वहीँ सरकार ने इसे लोकतंत्र को मजबूती प्रदान करने वाला कदम बताया. एक ही मुद्दे पर लोकतंत्र के ट्रीटमेंट को लेकर सरकार और विपक्ष एक्सट्रीम पर थे. यह देखकर एक बार फिर से लगा कि देश में केवल और केवल लोकतंत्र है, लोकतंत्र के अलावा कुछ नहीं है.
मीडिया में भी लोकतंत्र छाया रहा. जहाँ इस मुद्दे पर मीडिया का एक ग्रुप सरकार के पक्ष में था वहीँ दूसरा ग्रुप विपक्ष के पक्ष में था. दूसरा ग्रुप चाहता तो सरकार के विपक्ष में भी हो सकता था लेकिन पता नहीं क्यों उसे इस मुद्दे पर विपक्ष के पक्ष में होना ज्यादा उचित लगा. खैर, दोनों तरफ के लोग अपने-अपने स्टैंड पर डटे रहे.
नेता जी से पत्रकार ने सवाल किया कि; "कट-मोशन में तो आप सरकार के साथ थे. आज उसके विरुद्ध क्यों हैं?"
उन्होंने जवाब दिया; "ढेर दिन हो गया था जे हम सरकार का विरोध नहीं किये थे. पब्लिक सब सोच रहा था कि कहीं हम सरकार के साथ त नहीं हो गए? दू महीना हो गया था आ हमलोग को विरोध करने का कोई मुद्दा नहीं मिल रहा था एही बास्ते हम विदेश नीति का बात पर सरकार के विरोध में चले गए."
...जारी...
Wednesday, June 23, 2010
सांस्कृतिक फ़ुटबाल.
फ़ुटबाल वर्ल्ड कप चल रहा है. चल क्या उछल रहा है. मजे लिए जा रहे हैं. पिछले कई दिनों से जानबूझ कर मैं ऐसी जगह नहीं जाता जहाँ दो-चार लोग बैठे हों. डर लगा रहता है कि कहीं कोई फ़ुटबाल के बारे में न पूछ ले. कारण यह है कि हम रविन्द्र जडेजा की बैटिंग ज्यादा इंज्वाय करते हैं. वही जडेजा जिन्होंने पिछली कई पारियों में शून्य पर आउट होकर शून्य को अमर कर दिया है. वैसे भी उस वर्ल्ड कप में कैसे मन लगेगा जहाँ अपने देश की टीम गई ही नहीं. ऐसे में अगर हम अपने शहर वालों की तरह फ़ुटबाल के मजे लेना चाहें तो हमें अर्जेंटीना को समर्थन देना पड़ेगा क्योंकि चे का जन्म उस धरती पर हुआ था और मैराडोना भी वही के हैं, या फिर ब्राजील को, क्योंकि वहाँ के सबसे महान खिलाड़ी पेले कोलकाता में खेल चुके हैं.
हमारे शहर के लोगों के हिसाब से वर्ल्डकप में दो ही टीमें खेलती हैं. अर्जेंटीना और ब्राजील.
ज्यादातर दफ्तर पूरे दिन अलसाई आँखों से भरे हुए हैं. अंग्रेजी न्यूज चैनलों के स्टूडियो में एक्सपर्ट लोग लगे हुए हैं. किसी न किसी टीम की जर्सी पहने हुए ये एक्सपर्ट रोज सुबह टीवी चैनल के स्टूडियो में कैरमबोर्ड जैसी तख्ती पर काठ के छोटे-छोटे खिलाड़ियों को इधर से उधर घुमाकर बताते हैं कि फलाना टीम आज इधर से अटैक करेगी. सामने वाली टीम के डिफेंडर्स बायें से उस अटैक का जवाब देंगे और जो टीम अटैक करेगी वह उस जवाब का तोड़ फलाना तरीके से निकालेगी और मैच जीत जायेगी. फलाना प्लेयर सबसे इम्पार्टेंट है. आज अगर वह खेल गया तो फिर उसकी टीम लास्ट सिक्सटीन में पहुँच जायेगी. एक्सपर्ट की ऐसी बातें मुझे युवराज सिंह की याद दिला देती हैं. लगता है जैसे एक्सपर्ट कह रहा है कि युवराज सिंह बहुत टैलेंटेड खिलाड़ी हैं और अगर वे आज चल गए तो भारत मैच जीत जाएगा.
टैलेंटेड खिलाड़ी की बात पर पता नहीं क्यों मुझे हमेशा ही लगता है कि क्रिकेट और फ़ुटबाल में कोई बहुत ज्यादा अंतर नहीं है.
खैर, बात कर रहा था एक्सपर्ट टाइप लोगों की. मैंने अभी तक देखा है कि अंग्रेजी न्यूज चैनल के स्टूडियो में ये एक्सपर्ट लोग जो भी बोलते हैं, ज्यादातर वैसा होता नहीं है. और जब वैसा नहीं होता है तो मुझे लगता है कि इनलोगों को न्यूज चैनल ने पैसा-वैसा देकर बुलाया होगा. क्या ज़रुरत है पैसे देने की? इनकी जगह मौसम विभाग वालों को बुला लेते. वे भी इतने ही एफिसियेंट हैं. फ़ुटबाल वर्ल्डकप के मैचों के बारे में इन एक्सपर्ट लोगों के एक्सपर्ट कमेन्ट जितने नकारा साबित हो रहे हैं उतने ही नाकारा उन मौसम विभाग वालों के भी साबित होते. ऊपर से मौसम विभाग वाले फ़ुटबाल के बारे में बोलने के लिए तड से तैयार हो जाते. पैसे कम लेते सो अलग.
मेरी तरह ही मेरा एक मित्र अंग्रेजी न्यूज चैनल के स्टूडियो में हो रहे फ़ुटबाल कार्यक्रमों को देखकर त्रस्त लगा. अब चूंकि हम भारतीयों का काम सांत्वना लेन-देन से चल जाता है इसलिए मैंने उससे कहा; "अरे यार गनीमत है कि अपने अंग्रेजी न्यूज चैनल फ़ुटबाल वर्ल्डकप के बारे में आधे घंटे का प्रोग्राम तो दिखा रहे हैं, अपने हिंदी न्यूज चैनलों को सलमान खान और ज़रीन खान के तथाकथित प्रेम सम्बन्ध से ही फुर्सत नहीं है."
वैसे मैं बता दूँ कि मित्र को सांत्वना देने के लिए कही गई बात केवल उस क्षण के लिए जायज थी. मेरा हमेशा से ऐसा मानना रहा है कि अपने हिंदी न्यूज चैनल फ़ुटबाल के बारे में कुछ नहीं दिखा सकते. कोई प्रोग्राम नहीं बना सकते. कारण मेरा वह पक्का विश्वास है जिसके तहत इंडिया टीवी और आजतक जैसे चैनलों के लिए ई पी एल (इंग्लिश प्रीमियर लीग) यूरोप का सबसे बढ़िया बाइक ब्रांड है और ला-लीगा (स्पेन का फ़ुटबाल लीग) सबसे बढ़िया आईसक्रीम ब्रांड. कोई हिंदी न्यूज चैनल फ़ुटबाल वर्ल्ड कप के बारे में बात भी करेगा तो उसे फ़ुटबाल वर्ल्ड कप न कहकर फ़ुटबाल का महाकुम्भ पुकारेगा और उस वर्ल्डकप का भारतीयकरण कर डालेगा जिसमें हमारी टीम के खेलने के चांस शायद अगले पचास सालों में न के बराबर हैं.
लेकिन मेरी बात मेरे शहर के लोगों की बात नहीं है. मेरे शहर के लोग फ़ुटबाल के पीछे पागल हैं. आज भी मोहन बागन और ईस्टबंगाल का मैच न सिर्फ देखने जाते हैं बल्कि मारपीट भी करते हैं. कहते हैं फ़ुटबाल में मारपीट बहुत ज़रूरी है. अगर मारपीट न हो तो फ़ुटबाल मैच दो कौड़ी का. हमारे शहर के लोग कोलकाता को ही फ़ुटबाल का 'मेक्का' कहते हैं. वर्ल्ड चैम्पियन इटली हो या ब्राजील, फ्रांस या अर्जेंटीना, लेकिन हमारा ऐसा मानना है कि फ़ुटबाल का जन्म कोलकाता ही में हुआ है और दुनियाँ का सबसे बढ़िया फ़ुटबाल या तो मोहनबागान वाले खेलते हैं या फिर ईस्टबंगाल वाले.ये बात अलग है कि अगर आप इन क्लबों के ग्राऊँड्स में लगी बेंचों पर बैठ जायेंगे तो बेंच नीचे टूट पड़ेगी.
हमारे यहाँ हर वर्ल्डकप के मौके पर दीवारों पर जो कलाकारी होती है उसे देखकर लगता है जैसे मेसी, काका, रूनी और ड्रोग्बा को पकड़कर किसी ने दीवार पर कैद कर दिया है. सभी अपने-अपने पाँव उठाये हुए. जैसे कह रहे हों; "फ़ुटबाल, माय फूट."
हमारे शहर के लोकल चैनलों पर बोलनेवाला फ़ुटबाल एक्सपर्ट खेल और उसकी स्ट्रेटेजी की बारीकियों को छोड़कर बाकी सारे चीजों के बारे में बोलता है. असल में हमारे शहर का फ़ुटबाल एक्सपर्ट आत्मा से दर्शनशास्त्री और व्यवहार से बुद्धिजीवी होता है. अभी दो दिन पहले की बात है लोकल टीवी चैनल पर चल रहे एक प्रोग्राम में एक एक्सपर्ट मैराडोना के बारे में बात करते हुए हर वह बात बोला जिसका फ़ुटबाल से सम्बन्ध न के बराबर है. जैसे मैराडोना जब नैपोली के लिए खेलते थे तो उन्होंने फला तारीख को वहाँ के मैनेजर से क्या कहा? कैसे उन्हें नैपोली के समाज और वहाँ के बेरोजगार युवकों के बारे में चिंता थी? और यह कि मैराडोना इसलिए महान हैं कि उन्होंने जार्ज बुश को गरिया दिया था और पेले आजतक बुश को गरिया नहीं पाए.
अलग तरीके का फ़ुटबाल प्रेम है हमारे शहर का. आप आइये. पायेंगे कि मिठाई की दूकान पर मिठाइयाँ कहीं फ़ुटबाल के आकार की हैं तो कहीं वर्ल्डकप के आकार की. लगता है जैसे हम यह साबित करना चाह रहे हों कि; "अरे ओछे हैं वे लोग जो वर्ल्डकप जीतना चाहते हैं. हम तो वर्ल्ड कप खाकर संतुष्ट हो लेंगे."
नई-नई मिठाइयाँ बन रही हैं और किसी का नाम मेसी रख दिया गया है तो किसी का काका. लोग मेसी और काका को घर लिए जा रहे हैं. फ्रीज में रख रहे हैं और मैच देखते हुए उन्हें खा ले रहे हैं. खाने के साथ-साथ फ़ुटबाल प्रेम दिखाकर हाथ झाड़ लिया.
हमारी फुटबाली कला का असली नमूना मिठाइयों और चित्रकलाओं में दिखाई दे रहा है. विश्व फ़ुटबाल के लिए यह हमारा सांस्कृतिक योगदान है. ऐसे में कह सकते हैं कि फ़ुटबाल संस्कृति में जितनी भी संस्कृति है, सब हमारी ही देन है.
हमारे मोहल्ले के एंट्रेंस पर दो बड़े-बड़े कटआउट लगाये गए हैं. एक तरफ काका और दूसरी तरफ मेसी. फोटो में दोनों टांग उठाकर तैयार हैं. जब गाड़ी उन कटआउट के सामने से गुजरती है तो डर लगा रहता है कि कहीं ये लोग अपनी टांग न चला दें. इतने बड़े कटआउट कि अगर करूणानिधि देख लें तो अपने पुत्र स्टालिन को तुरंत बुलाकर दो तमाचे रसीद कर देंगे. यह कहते हुए कि; "अन्ना नगर में जो चालीस कटआउट कल लगवाए वे इतने बड़े क्यों नहीं बनवाये?"
हमारे शहर के बप्पी लाहिड़ी जी ने एक बार फिर से फ़ुटबाल वर्ल्डकप के मौके पर अपना 'म्यूजीक' विडियो बनाया है. बनाया तो बनाया उसे रिलीज भी करवा दिया है. गाने के बोल हैं; "बोले बोले बोले बोले..फुटबोल फुटबोल फुटबोल..फुटबोल ईज आवर लाइफ..." साथ ही बप्पी दा ने वह फ़ुटबाल भी खरीद लिया है जिसपर दुनियाँ के तमाम बड़े खिलाड़ियों का आटोग्राफ है. टीवी पर देखकर लगा कि बप्पी दा को थैंक्स बोल डालू. यह कहते हुए कि; "आपसे ही फ़ुटबाल है."
असली भारतीय फ़ुटबाल दीवारों, मिठाइयों और 'म्यूजीक' विडियो में कैद होकर विश्व फ़ुटबाल को हमारे योगदान की गाथा सुना रहा है. प्रियरंजन दाशमुंशी ने जब से होश संभाला, भारतीय फ़ुटबाल की देख-रेख की. अब वे नहीं हैं. अब पता नहीं कौन देख-रेख कर रहा है. हाँ, मुझे हमेशा यह भय सताए रहता है कि सत्तासी वर्षीय के करूणानिधि कल से इंडियन फ़ुटबाल फेडरेशन को संभालने न लग जाएँ.
अब चूंकि हम सांत्वना के लेन-देन से खुश हो लेते हैं तो मैं आपको एक सांत्वना देता हूँ और कहता हूँ; "फ़ुटबाल वह नहीं जो वर्ल्डकप में खेला जा रहा है. असली फ़ुटबाल वह है जो हम खेलते हैं. सांस्कृतिक फ़ुटबाल. और यही विश्व फ़ुटबाल को हमारी देन है."