सत्तर और अस्सी के दशक के सरकारी नारों को पढ़कर बड़े हुए। उस समय समझ कम थी। अब याद आता है तो बातें थोड़ी-थोड़ी समझ में आती हैं। ट्रक, बस, रेलवे स्टेशन और स्कूल की दीवारों पर लिखा गया नारा, 'अनुशासन ही देश को महान बनाता है' सबसे ज्यादा दिखाई देता था।
भविष्य में इतिहासकार जब इस नारे के बारे में खोज करेंगे तो इस निष्कर्ष पर पहुंचेंगे कि 'एक समय ऐसा भी आया था जब अचानक पूरे देश में अनुशासन की कमी पड़ गई थी। अब गेंहूँ की कमी होती तो अमेरिका से गेहूं का आयात कर लेते (सोवियत रूस के मना करने के बावजूद), जैसा कि पहले से होता आया था। लेकिन अनुशासन कोई गेहूं तो है नहीं।' इतिहासकार जब इस बात की खोज करेंगे कि अनुशासन की पुनर्स्थापना कैसे की गई तो शायद कुछ ऐसी रिपोर्ट आये:-
'सरकार' के माथे पर पसीने की बूँदें थीं। अब क्या किया जाय? इस तरह की समस्या पहले हुई होती तो पुराना रेकॉर्ड देखकर समाधान कर दिया जाता। चिंताग्रस्त प्रधानमंत्री ने नैतिकता और अनुशासन को बढावा देने वाली कैबिनेट कमिटी की मीटिंग बुलाई। चिंतित मंत्रियों के बीच एक 'इन्टेलीजेन्ट' अफसर भी था। सारी समस्या सुनने के बाद उसके मुँह से निकला "धत तेरी। बस, इतनी सी बात? ये लीजिये नारा"। उसके बाद उसने 'अनुशासन ही देश को महान बनाता है' नामक नारा दिया। साथ में उसने बताया; "इस नारे को जगह-जगह लिखवा दीजिए और फिर देखिए किस तरह से अनुशासन देश के लोगों में कूट-कूट कर भर जाएगा"।
मंत्रियों के चेहरे खिल गए। सभी ने एक दूसरे को बधाई दी। प्रधानमंत्री ने उस अफसर की भूरि-भूरि प्रशंसा की।एक मंत्री ने नारे के सफलता को लेकर कुछ शंका जाहिर की। उस मंत्री की शंका का समाधान अफसर ने तुरंत कुछ इस तरह किया। "आप चिन्ता ना करें, नारा पूरा काम करेगा। काबिल नारों को लिखने का अपना पारिवारिक रेकॉर्ड अच्छा है। मेरे पिताजी ने ही साम्प्रदायिकता की समस्या का समाधान 'हिंदु-मुस्लिम भाई-भाई' नामक नारा लिखकर किया था"।
इस अनुशासन वाले नारे ने अपना काम किया। लोगों में अनुशासन की पुनर्स्थापना हो गई। हम ऐसे निष्कर्ष पर इस लिए पहुंच सके क्योंकि नब्बे के दशक के बाद ये नारा लगभग लुप्त हो गया। ट्रकों पर नब्बे के दशक में इस नारे की जगह 'नाथ सकल सम्पदा तुम्हारी, मैं सेवक समेत सुत नारी' जैसे नारों ने ले ली। जहाँ तक रेलवे स्टेशन की बात है तो वहाँ इस नारे की जगह 'जहर खुरानों से सावधान' और 'संदिग्ध वस्तुओं को देखकर कृपया पुलिस को सूचित करें' जैसे नारों ने ले ली। ये अनुशासन वाला नारा कहीँ पर लिखा हुआ नहीं दिखा। दिखने का कोई प्रयोजन भी नहीं था। जब अनुशासन की पुनर्स्थापना हो गई तो नारे का कोई मतलब नहीं रहा।'
ये तो थी इतिहासकारों की वो रिपोर्ट जो आज से पच्चास साल बाद प्रकाशित होगी और इस रिपोर्ट पर शोध करके छात्र 'इतिहास के डाक्टर' बनेंगे। लेकिन नब्बे के दशक से इस नारे का सही उपयोग हमने शुरू किया।
अनुशासन शब्द का व्यावहारिक अर्थ हो सकता है 'खुद के ऊपर शासन करना' या एक तरह 'लगाम लगाना'। (व्यावहारिकता की बात केवल इस लिए कर रहा हूँ क्योंकि ये नारा केवल हिंदी के डाक्टरों' के लिए नहीं लिखा गया था)। लेकिन शार्टकट खोजने की हमारी सामाजिक परम्परा के तहत हमने इस शब्द का 'शार्ट अर्थ' भी निकाल लिया। हमने इस अर्थ, यानी 'खुद के ऊपर शासन करना' में से 'के ऊपर' निकाल दिया। 'शार्ट अर्थ' का सवाल जो था। उसके बाद जो अर्थ बचा, वो था 'खुद शासन करना'। और ऐसे अर्थ का प्रभाव हमारे सामने है।
हम सभी ने खुद शासन करना शुरू कर दिया। होना भी यही चाहिए। जब अपने अन्दर 'शासक' होने की क्षमता है, तो हम सरकार या फिर किसी और को अपने ऊपर शासन क्यों करने दें? अब हम रोज पूरी लगन से अपनी शासकीय कार्यवाई करते हैं। आलम ये है कि हम सड़क पर बीचों-बीच बसें खडी करवा लेते हैं। इशारा करने पर अगर बस नहीं रुके तो गालियों की बौछार से ड्राइवर को धो देते हैं। आख़िर शासक जो ठहरे। हमारे शासन का सबसे उच्चस्तरीय नज़ारा तब देखने को मिलता है जब कोई मोटरसाईकिल सवार सिग्नल लाल होने के बावजूद सांप की तरह चलकर फुटपाथ का सही उपयोग करते हुए आगे निकल जाता है।
कभी-कभी सामूहिक शासन का नज़ारा देखने को मिलता है। हम बरात लेकर निकलते हैं। पूरी की पूरी सड़क पर कब्जा कर लेते हैं और आधा घंटे में तय कर सकने वाली दूरी को तीन घंटे में तय करते हैं। ट्रैफिक जाम करने का मौका बसों और कारों को नहीं देते। वैसे भी क्यों दें, जब हमारे अन्दर इतनी क्षमता है कि हम खुद ही जाम कर सकते हैं।
सामूहिक शासन के तहत रही सही कसर हमारे धार्मिक शासक पूरी कर देते हैं। बीच सड़क पर दुर्गा पूजा से लेकर शनि पूजा तक का प्रायोजित कार्यक्रम पूरी लगन के साथ करते हैं। पूजा ख़त्म होने के बाद मूर्तियों का भसान और उसके बाद नाच-गाने का 'कल्चरल प्रोग्राम', सब कुछ सड़क पर ही होता है। हर महीने ऐसे लोगों को देखकर हम आश्वस्त हो जाते हैं कि देश में डेमोक्रेसी है।
हमारे इस कार्यवाई में पुलिस भी कुछ नहीं बोलती। बोलेगी भी क्यों? ट्रैफिक मैनेजमेंट का तरीका भी नारों के ऊपर टिका है। रोज आफिस जाते हुए पुलिस द्वारा बिछाए गए कम से कम बीस नारे देखता हूँ। ट्रैफिक के सिपाही को उसके बडे अफसर ने हिदायत दे रखी है कि कुछ करने की ज़रूरत नहीं है। हाँ, जनता को नारे दिखने चाहिए। बाक़ी तो जनता अनुशासित है ही।
मैं इस बात से पूरी तरह आश्वस्त हूँ कि 'पुलिस आफिसर आन् स्पेशल ड्यूटी' होते हैं जिनका काम केवल नारे लिखना है। नारे पढ़कर मैं कह सकता हूँ कि ये आफिसर अपना काम बडे मनोयोग के साथ करते हैं। रोज आफिस जाते हुए मेरी मुलाक़ात कोलकता पुलिस के एक साइनबोर्ड से होती है जिसपर लिखा हुआ है; 'लाइफ हैज नो स्पेयर, सो टेक वेरी गुड केयर'।
इस बोर्ड को सड़क के एक कोने में रखकर ट्रैफिक का सिपाही गप्पे हांक रहा होता है। उसे इस बात से शिक़ायत है कि पिछले मैच में मोहन बागान के स्ट्राईकर ने पास मिस कर दिया नहीं तो ईस्ट बंगाल मैच नहीं जीत पाता।
आशा है कि नारे लिखकर समस्याओं का समाधान खोजने की हमारी क्षमता भविष्य में और भी निखरेगी। नारे पुलिस के लिए भी काम करते रहेंगे। जरूरत भी है, क्योंकि आने वाले दिनों में भी ईस्ट बंगाल मोहन बगान को हराता रहेगा। हम अपने अनुशासन (या फिर शासन) में नए-नए प्रयोग करते रहेंगे।
Wednesday, September 29, 2010
नारा ही देश को महान बनाता है..
Sunday, September 26, 2010
आप देख रहे हैं हमारा विशेष कार्यक्रम, "टूट गई खाट, लग गई वाट"
ब्लॉग चलाने में तमाम दिक्कतें आती हैं. कुछ भी हुआ नहीं कि पंद्रह मिनट बैठे और उसपर एक पोस्ट ठेल दिया. कल रात को पता चला कि कामनवेल्थ गेम्स विलेज में एक एथलीट की खाट टूट गई. अजीब चीज है ये खाट भी. जहाँ रहेगी, कुछ न कुछ करवा कर छोड़ेगी. उधर कामनवेल्थ गेम्स की खड़ी है और इधर एथलीट की टूट गई. अब कल रात को जैसे ही पता चला कि एथलीट की खाट टूट गई, उसी समय मेरे एक मित्र ने मुझसे कहा कि आप अपने ब्लॉग पत्रकार चंदू चौरसिया को भेजकर इस एथलीट का इंटरव्यू लीजिये. आखिर खाट का तो इंटरव्यू ले नहीं सकते, कम से कम एथलीट अखिल कुमार का इंटरव्यू लीजिये. मैंने उन्हें बताया कि आज रविवार होने की वजह से चंदू चौरसिया ज़ी छुट्टी पर रहेंगे. ऐसे में अखिल कुमार ज़ी का इंटरव्यू लेने मुझे खुद दिल्ली जाना पड़ेगा.
आज सुबह दिल्ली जाने की तैयारी कर रह था कि टीवी पर 'राज तक ' चैनल पर अखिल कुमार ज़ी का इंटरव्यू दिखाया जा रह था. मुझे लगा कि बावला ज़ी जब अपने चैनल पर अखिल कुमार ज़ी का इंटरव्यू दिखा ही रहे हैं तो मुझे क्या ज़रुरत है दिल्ली जाकर अखिल कुमार का इंटरव्यू लेने की? भाई मैं ब्लॉग चलाता हूँ वे चैनल चलाते हैं लेकिन सवाल तो एक ही होंगे न. उनके संवाददाता सवाल पूछ रहे हैं. उसके बाद मैं भी वही सारे सवाल पूछकर अखिल कुमार ज़ी को क्यों बोर करूं?
मेरे मन में आया कि राजतक चैनल पर अखिल कुमार का जो इंटरव्यू हुआ उसी को आपलोगों तक पहुँचा देता हूँ. आप बांचिये कि चैनल ने क्या दिखाया.
राजतक न्यूज चैनल का स्टूडियो. सुबह के करीब ८:५८ मिनट होने वाले हैं. राजतक वालों ने पिछले १२ घंटों में न्यूज दिखा-दिखा कर इस बात को साबित कर दिया है कि मुक्केबाज अखिल कुमार की खाट टूटने की घटना भारतीय इतिहास की इस सदी की दूसरी सबसे महत्वपूर्ण घटना है. पहली गाँव पीपली के नत्था दास की आत्महत्या थी. चैनल वालों ने तमाम लोगों को इस महत्वपूर्ण घटना पर प्रतिक्रिया व्यक्त करने एक लिए अपने स्टूडियो बुला रखा है. यह एक विशेष कार्यक्रम है जिसका शीर्षक है "टूट गई खाट, लग गई वाट".
चूंकि यह पीपली गाँव के नत्था दास की आत्महत्या के मामले के बाद दूसरी सबसे महत्वपूर्ण घटना है इसलिए स्टूडियो में फिल्म के प्रोड्यूसर आमिर खान आये हैं. यह खेलों का मामला है इसलिए फॉर्मर क्रिकेटर नवजोत सिंह सिद्धू हैं. यह मामला खाट से जुडा हुआ है इसलिए दिल्ली के बाहरी इलाके नजफगढ़ से झिंगुरी लोहार को स्टूडियो में बैठाया गया है. एक मुक्केबाज के बैठने की वजह से खाट टूटी थी इसलिए एक बॉक्सर को भी स्टूडियो में बुलाया गया है. और दिल्ली कामनवेल्थ गेम्स के रास्ते में शुरू से ही तमाम अड़चने आ रही हैं इसलिए ग्रहों के चक्कर वगैरह की बात करने के लिए ज्योतिषाचार्य नंदू प्रकाश महाराज को बुलाया गया था.
कार्यक्रम का संचालन राजतक चैनल के स्पोर्ट्स एडिटर सुशांत कर रहे हैं. उधर गेम्स विलेज में चैनल के संवाददाता रंदीप सोनवलकर मौजूद थे. इधर स्टूडियो से सुशांत ने शुरुआत करते हुए आवाज़ लगाई; "ज़ी हाँ, टूट गई खाट. लग गई वाट. जैसा कि आप ब्रेकिंग न्यूज में ब्रोकेन खाट के बारे में देख रहे हैं. क्यों टूटी खाट? कौन है जिम्मेदार इस टूटी खाट के लिए? आइये आपको लिए चलते हैं गेम्स विलेज जहाँ हमारे संवाददाता रंदीप सोनवलकर मौजूद है. रंदीप क्या है ये मामला? कैसे टूटी ये खाट? कौन जिम्मेदार है इस खाट को तोड़ने के लिए?"
उधर से आवाज़ आई; "ज़ी हाँ सुशांत. जैसा कि आप देख रहे हैं यह खाट टूट चुकी है. हम आपको दिखाने कि कोशिश कर रहे हैं... अगर हमारा कैमरा यहाँ से तस्वीर ले ..हाँ, अब आप देख सकते हैं कि खाट टूट गई है. कहीं न कहीं यह लापरवाही का नतीजा है सुशांत. एक बार फिर से देश को छला गया है."
"रंदीप आप की किसी से बात हुई है इस घटना पर? मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का क्या कहना है इस टूटी खाट के बारे में?"; सुशांत ने सवाल दागा.
"सुशांत मैंने कल रात से ही मुख्यमंत्री से बात करने की कोशिश की है लेकिन उन्होंने खाट के ऊपर बात करने से मना कर दिया. उनका स्टाफ कहता है कि मुख्यमंत्री इस समय मीटिंग में हैं. हाँ, हमारे साथ इस समय अखिल कुमार हैं जिनकी खाट टूट गई थी. आइये उनसे पूछते हैं"; यह कहते हुए रंदीप अखिल कुमार से मुखातिब हुए.
अखिल से मुखातिब होते हुए उन्होंने कहना शुरू किया; "अखिल ज़ी ये बताइए कि..."
अभी उन्होंने यह बोलना शुरू ही किया था कि अखिल कुमार ने उन्हें रोकते हुए कहा; "एक मिनट-एक मिनट. पहले मैं कुछ कहना चाहता हूँ. वह ये है कि खबरदार अगर यह सवाल पूछा कि खाट टूटने के बाद आपको कैसा लग रहा है. अगर ऐसा सवाल पूछा तो मैं फोड़ डालूँगा. बता दे रहा हूँ. मैं बॉक्सर हूँ. ऊपर से कल रात से ही फ्रसट्रेटेड भी हूँ."
अखिल कुमार की बात सुनकर रंदीप बोले; "मैं यह सवाल पूछने ही वाला था. अच्छा हुआ आपने मुझे बता दिया नहीं तो मेरा जबड़ा टूट जाता. चलिए मैं आपसे यह सवाल नहीं पूछता. मैं आपसे यह पूछता हूँ कि आप पूरी घटना के बारे में बताइए. क्या हुआ कल?"
अखिल कुमार बोले; "बस, हमलोग आये. हम मुक्केबाजों को जो रूम मिला है उसमें घुसे और मैं आराम करने के लिए जैसे ही खाट पर बैठा कि वह टूट गई."
"तो आपको कैसे यह लगा कि खाट टूट चुकी है?"; रंदीप ने पूछा.
उसका सवाल सुनकर अखिल कुमार भड़क गए. वे बोले; "अरे बता तो रह हूँ कि मैं उसपर बैठा और वह टूट गई. मैं खाट की प्लाई के साथ फर्श पर गिर गया."
तभी स्टूडियो में बैठे आमिर खान ने सुशांत को इशारा किया कि वे अखिल कुमार से सवाल पूछना चाहते हैं. सुशांत ने रंदीप से कहा कि आमिर खान सवाल करना चाहते हैं. रंदीप ने आमिर के सवाल को सुना और अखिल कुमार के सामने वही सवाल दोहरा दिया. बोले; "अखिल ज़ी, इस समय हमारे स्टूडियो में आमिर खान बैठे हैं. वे आपसे सवाल करना चाहते हैं कि जब आप खाट पर बैठे तो क्या आप सीधा नाइंटी डिग्री पर बैठे या फिर अस्सी डिग्री पर."
सवाल सुनकर अखिल कुमार थोड़े चिढ़ गए. बोले; "वैसे तो में आमिर खान ज़ी का फैन हूँ लेकिन इतना कहना चाहता हूँ कि वे परफेक्शन के पीछे इतने क्यों पड़े रहते हैं? कोई खाट पर बैठते समय यह थोड़े न देखेगा कि कितने डिग्री पर बैठ रहा है."
उनकी बात सुनकर आमिर खान मुस्कुरा दिए. बोले; "मैं केवल यह देखना चाहता था कि जब अखिल कुमार खाट पर बैठे होंगे तो उसपर कितना भार पड़ा होगा. खैर, जाने दीजिये. उन्होंने बैठते समय एंगल नहीं मापा होगा."
तभी सुशांत ने बीच में बात शुरू की. बोले; "रंदीप, अखिल ज़ी से पूछिए कि कामनवेल्थ गेम्स वालों ने यह अफवाह फैला रखी है कि शायद अखिल कुमार का वजन कुछ बढ़ गया है. ओर्गेनाइजिन्ग कमिटी का कहना है कि वह खाट अखिल कुमार के लिए सपेसिअली बनवाई गई थी. यह सोचते हुए कि अखिल कुमार ५६ केजी वर्ग के बॉक्सर हैं. तो कहीं ऐसा तो नहीं कि अखिल कुमार का वजन कुछ बढ़ गया है? मेरा मतलब दो-ढाई सौ ग्राम उनका वजन बढ़ गया हो. ऐसा भी तो हो सकता है."
उनका सवाल सुनकर अखिल कुमार बिदक गए. बोले; "मेरा वजन जरा भी नहीं बढ़ा है. यह जो है सरासर गलत इल्जाम है. सच तो यह है कि खाट प्लाईवूड की थी ही नहीं. जैसे टूटी उसे देखते हुए लगा कि मोटे कागज़ की बनी थी."
उनकी बात सुनकर सब एक साथ हँस पड़े. सुशांत बोले; "यहाँ मैं झिंगुरी ज़ी को लाना चाहूँगा और उनसे पूछूंगा कि क्या ऐसा हो सकता है कि खाट बनाने के लिए क्या मोटे कागजों का इस्तेमाल किया जा सकता है. क्या प्लाईवूड की जगह मोटे कागज़ लगाये जा सकते हैं?"
उनकी बात सुनकर झिंगुरी ज़ी बोले; " हा हा हा. क्यों नहीं? आप पैसा खर्च नहीं करना चाहते तो किसी भी चीज से बेड तैयार हो जाएगा."
"लेकिन पैसा न खर्च करना चाहते हैं से क्या मतलब? कामनवेल्थ गेम्स के लिए इतना पैसा खर्च हुआ. मैं यहाँ सिद्धू ज़ी से पूछूँगा कि उन्हें क्या लगता है? क्या कलमाडी को उनके पद से हटाया नहीं जा सकता?"; सुशांत ने इस बार सिद्धू ज़ी से पूछ लिया.
सुशांत की तो जैसे शामत आ गई. सिद्धू ज़ी बोले; "देख सुन ले गुरु, उबले अंडे से कभी ऑमलेट नहीं बनाया जा सकता. दिल्ली में राजपथ से कुल्फी के ठेले उठवाये जा सकते हैं लेकिन इंडिया गेट नहीं उठावाया जा सकता. किसी सियासत वाले बन्दे से कभी रिजाइन नहीं करवाया जा सकता और जिन्हें चश्का हो सिर्फ चूरन चाटने का, उन्हें शहद नहीं चटाया जा सकता."
अब सुशांत की समझ में नहीं आ रहा था कि वे क्या करें? अकबका कर वे आचार्य चंदू प्रकाश को बीच में लाये. बोले; "आपको क्या लगता है आचार्य ज़ी? यह कामनवेल्थ गेम्स में इतनी दिक्कतें क्यों आ रही हैं?
आचार्य ज़ी बोले; "सुशांत ज़ी आप अखिल कुमार ज़ी से यह पूछिए कि खाट किस दिशा से किस दिशा में रखी हुई थी? क्या वह उत्तर से दक्खिन दिशा की तरफ थी?"
जब उन्हें यह पता लगा कि खाट उत्तर से दक्खिन नहीं बल्कि पूरब से पश्चिम दिशा की ओर रखी गई थी तब उन्होंने कहना शुरू किया; "सुशांत ज़ी यही समस्या है. दरअसल गेम्स विलेज में चीजें वास्तु के अनुसार नहीं रखी हैं. अखिल कुमार ज़ी ने खाट पर बैठने का जो समय बताया उस समय चंद्रमा राहु के घर में प्रवेश कर चुका था. मंगल और शनि की टक्कर बुध की अनुपस्थिति में हो रही थी और यही कारण है की उस समय चीजें कमज़ोर हो जाती हैं और उनके टूटने का भय रहता है......कामनवेल्थ गेम्स के बारे में मैंने मार्च २००७ में ही भविष्यवाणी कर दी थी कि गेम्स के ऊपर काला साया मंडरा रहा है. आपको अगर याद हो तो जब ये गेम्स भारत को मिले थे उनदिनों अटल ज़ी प्रधानमंत्री थे और बहुत कम लोगों को पता होगा कि अटल ज़ी का वृहस्पति हमेशा से कमज़ोर रहा है....जहाँ तक कलमाडी के शनि की बात है तो वह...."
अभी वे बोल ही रहे थे कि अचानक उधर से रंदीप ज़ी ने बोलना शुरू किया कि; "सुशांत अभी-अभी प्राप्त जानकारी के अनुसार एक अफ्रीकी एथलीट के कमरे में सांप घुस आया है. मैं वहां जाकर उस खबर को लाइव दिखाता हूँ..."
उधर रंदीप ने कनेक्शन काटा और इधर सुशांत ज़ी ने प्रोग्राम ही ख़त्म कर दिया. जिस फोर्मेर बॉक्सर को बुलाया गया था वह गरम हो गया. बोला; "हमसे सवाल ही नहीं पूछना था तो हमें बुलाया क्यों? आपलोग इतने लोगों को बुला लेते हैं और उन्हें बोलने का मौका नहीं देते. मुझे यह बात याद रहेगी....मैं आइन्दा आपके प्रोग्राम में कभी नहीं......"
वो बोलता जा रह था और इधर सुशांत ने पर्दा गिराते हुए कहा; "तो ये था हमारा विशेष कार्यक्रम टू गई खाट, लग गई वाट. आगे की खबरें देखने के लिए देखते रहिये राजतक."
Wednesday, September 22, 2010
"..अमेरिका पकिस्तान को एंटी नो-बॉल मिसाइल दे."
करीब पंद्रह दिन हो गए जब इंग्लैंड के एक बुकी मज़हर मजीद ने एक अखबार के साथ मिलकर पाकिस्तान के तीन निर्दोष खिलाड़ियों को फिक्सिंग में फँसा दिया. ये खिलाड़ी निर्दोष हैं बेचारे. साथ ही टैलेंटेड भी हैं. निर्दोष और टैलेंटता के अद्भुत संगम वाले इन तीन खिलाड़ियों में से दो ने नो-बॉल फेंकी थी और एक ने फिंकवाई.
आप पूछ सकते हैं कि पुरानी घटना पर मैं आज क्यों लिख रहा हूँ? तो मैं आपको बता दूँ कि पाकिस्तानी खिलाड़ियों ने इंग्लैंड में नो-बॉल फिक्स किया. जिस अखबार ने बेचारे निर्दोष खिलाड़ियों को फंसाया वह इंग्लैंड का था. ऐसे में यह एक ग्लोबल घटना हुई कि नहीं?
तो ग्लोबेलाइजेशन के इस युग में ग्लोबल घटना पर लोकल बात करना जायज है क्या? नहीं न? इसीलिए मैंने अपने ब्लॉग पत्रकार चंदू चौरसिया को दुनियाँ भर में भेजकर लोगों की प्रतिक्रिया लेनी चाही. आप बांचिये कि लोगों ने क्या कहा?
हिलेरी क्लिंटन, यूएस सेक्रेटरी ऑफ स्टेट्स : "वी री-टरेट आर पोजीशन दैट इंडिया इज ऐन एमर्जिंग इकॉनोमिक सुपरपॉवर इन साउथ एशिया. वी वुड आल्सो लाइक टू स्टेट दैट पाकिस्तान इज आर नेचुरल-अलाई ह्वेन इट कम्स टू एलिमिनेटिंग दिस मेनेस ऑफ नो-बॉल नॉट ओनली फ्रॉम एशिया बट शुड आई से, फ्रॉम होल वर्ल्ड ...वी विल वर्क क्लोजली विद पकिस्तान टू डिस्मैन्टेल द फोर्सेस बिहाइंड बाउलिंग नो-बॉल. दिस सॉर्ट ऑफ एक्टिविटीज...वी अवेट अ रिपोर्ट फ्रॉम आर नेटो अलाई, यूनाइटेड किंगडम टू लुक इन टू ह्वाट ट्रान्स्पायर्ड फॉर दीज यंग नो-बॉल बॉलर्स..."
आसिफ अली ज़रदारी, टेन परसेंट प्रेसिडेंट, इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ पाकिस्तान: "ओ ज़ी ये कोई बहुत बड़ी बात नहीं है. ये लड़के टैलेंटेड हैं इसलिए नो-बॉल कर दिया. और मैं आपसे पूछता हूँ कि कितनी परसेंट नो-बॉल फेंकी है बच्चे ने? अब छ बॉल का एक ओवर होता है. उसमें से एक नो-बॉल फेंक ही दे तो करीब १६ पारसेंट होती है नो-बॉल....मैं आपकी बात मानता हूँ कि बच्चों को नो-बॉल का पारसेंट कम कर के करीब दस तक लाना चाहिए. मतलब ये कि हर दास बॉल में एक नो-बॉल चलेगा. मैं खुद भी इस बात को मानता हूँ कि कोई भी काम दस पारसेंट तक ठीक है..."
एजाज बट, प्रेसिडेंट, पकिस्तान क्रिकेट बोर्ड एंड चीफ कांस्पीरेसी थेओरिस्ट, एजाज बट स्कूल ऑफ क्रिकेट मैनेजमेंट : "ये ज़ी, हमारे बच्चों को फंसाया गया है. नो-बॉल फिक्सिंग सरासर झूटी बात है. ये पाकिस्तान के खिलाफ साजिश है. कल ही एक बुकी ने मुझे बताया कि दारसल अम्पायर ने क्रीज की सामने वाली लाइन को पीछे खिसका दिया था इसलिए नो-बॉल हो गया. क्रीज की सामने वाली लाइन को पीछे खिसकाने में अम्पायर के साथ इंग्लैंड के खिलाड़ी भी इन्वोल्व हैं. इस काम के लिए अम्पायर को डेढ़ लाख पाउंड पेमेंट किया गया है. आई सी सी के पास कोई सुबूत नहीं है कि हमारे बच्चे फिक्सिंग में इन्वोल्व हैं. वहीँ मेरे बुकी के पास सुबूत है कि अम्पायर ने क्रीज -लाइन को पीछे खिसका दिया था...."
रहमान मलिक, इन्टेरियर मिनिस्टर एंड चीफ एविडेंस सीकर, इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ पकिस्तान: "हामने जांच की है और मैं आपको गारंटी से बता सकता हूँ कि न्यूज़ ऑफ ड वर्ल्ड के एविडेंस काफी नहीं हैं. हामने पता लगाया है कि ये पाकिस्तान टीम के खिलाफ साजिश है और इसमें हिन्दस्तान का रा ही सही लेकिन हाथ ज़रूर है. हिन्दस्तान जब पकिस्तान को बॉल में नहीं फँसा ससका तो फिर साजिश करके नो-बॉल में फंसाने की कोशिश कर रहा है. हामने चार और डोस्सियर मांगे हैं इंग्लैंड से....."
मुल्लाह ओमर, स्पिरिचुअल लीडर, तालिबान स्कूल ऑफ स्पिरिचुअलिटी: "आल्लाह ने हमें एक और तरीका दे दिया दिया है अमेरिकियों से लड़ने का. पहले जब हम ख़ुदा के सिपाही कहीं बॉल-बम रखने जाते थे तो 'स्क्यूरिटी' की वजह से पकड़ लिए जाते थे. अब पाकिस्तानी साइंस-दानों की मदद से हम नो-बॉल बम बनायेंगे. हमारे साइंस-दान और पाकिस्तानी साइंस-दान मिलकर काम कर रहे हैं और ख़ुदा के करम से हम जल्द ही नो-बॉल बम बना लेंगे. नो-बॉल बम का फायदा ये होगा कि वो दिक्खेगा ही नहीं. फिर हमें अमरीकी 'स्क्यूरिटी' वाले कैसे पकड़ेंगे...."
शाह महमूद कुरैशी, फ़ारेन मिनिस्टर एंड एड रिजेक्टर, इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ पकिस्तान: "हम इंडिया से कहेंगे कि हम उनके साथ मिलकर इस नो-बॉल को ख़त्म करना चाहते हैं. हम ये भी कहेंगे कि इंडिया हमारे साथ नो-बॉल पर इंटेलिजेंस शेयर करे.....हाल ही में अपने वाशिंगटन 'टूर' में मैंने प्रेसिडेंट ओबामा से डिमांड की है कि अमेरिका पकिस्तान को एंटी नो-बॉल मिसाइल दे जिससे हम नो-बॉल को कंट्रोल कर सकें...हमारी कोशिश रहेगी कि नो-बॉल को अफगानिस्तान में फैलने से रोका जाय लेकिन उसके लिए हमारी फ़ौज का नॉर्थ-वेस्टर्न बोर्डर पर रहना जुरुरी है...."
श्री मनमोहन सिंह, ऑनेस्टी पर्सानफाइड एंड लोंगेस्ट सर्विंग ऑनेस्ट प्राइम मिनिस्टर ऑफ इंडिया : "ये नो-बॉल की प्रॉब्लम कोई प्रॉब्लम नहीं है. पकिस्तान को चाहिए कि नो-बॉल से हटकर अपनी इकोनोमी के बारे में कुछ करे. केवल चार परसेंट ग्रोथ है पकिस्तान की. उन्हें कोशिश करनी चाहिए कि वे कम से कम टू थाऊजैंड एलेवेन से नौ परसेंट ग्रोथ रेट ले आयें. और नो-बॉल की प्रॉब्लम सॉल्व करने के लिए तो ज़ी क्रिकेटिकल विल चाहिए....क्रिटिकल नहीं क्रिटिकल नहीं...मैंने कहा क्रिकेटिकल...क्रिकेटिकल...जैसे पोलिटिकल वैसे ही क्रिकेटिकल..हैं ज़ी? और फिर वे एक ज़ीओएम भी तो बना सकते हैं...ज़ीओएम से कोई भी प्रॉब्लम सॉल्व हो सकती है...."
दलेर मेहँदी, फार्मर सिंगर एंड प्रजेंट डे रिअलिटी शो जज: "मैं तो मोहम्मद आमिर से यही कहूँगा ज़ी कि पुत्तर तुझे रब्ब ने, उस मालिक ने, उस ख़ुदा ने टैलेंट दिया है नो-बॉल फेंकने का. तू तो पुत्तर ऐसे ही नो-बॉल फेंकता रह. रब राखां पुत्तर...चक दे फट्टे.."
अमिताभ बच्चन, एक्टर, मॉडल, ट्वीटर, ब्लॉगर एंड अ फादर-इन-ला : "अब देखिये मैं तो एक कलाकार हूँ. मैं इसके बारे में क्या कहूँ? वैसे अगर कुछ कहना ही है तो मैं कहूँगा कि भाई साहब, माना कि आपकी टीम प्रचंड है लेकिन नो-बॉल फेंकने की वजह से खंड-खंड है....आईं? लगी..लगी मिर्ची लगी. और फिर देखिये आप क्रिकेटर हैं. आप बालिंग कीजिये, अपना पारिश्रमिक लीजिये और घर जाइए. नो-बॉल फेंककर क्या मिलेगा आपको? कुछ एक्स्ट्रा पाऊंड? पूज्यनीय बाबूजी कहा करते थे कि जो एक बार नो-बॉल फेंककर अपनी गलती न दोहराए वही असली खिलाड़ी है.....मैंने इस नो-बॉल वाली घटना पर कल ही मधुशाला में एक रुबाई जोड़ी है...हाँ, सुनिए
बालिंग पथ पर बालिंग करने चलता है बालर आला
जोर से दौड़े या फिर धीरे दुविधा में है मतवाला
कोच बताते राहें कितनी पर मैं यह बतलाता हूँ
धीरज के संग कदम धरो तो फेंकोगे फिर नो-बॉला
बाबा रामदेव, ब्रीदिंग एक्सपर्ट, आंटरप्रेनर एंड पोलिटिसियन-इन-मेकिंग: "हे हे हे. लोग पाकिस्तान से फोन करके पूछते हैं बाबा जी, ये अपने नौजवान क्रिकेटर इतना नो-बॉल क्यों फेंक रहे हैं. मैं कहता हूँ ये नो-बॉल फेंके जाने का कारण है कि एम् एन सी का आटा. पकिस्तान लीवर जो आटा पकिस्तान में बेंच रहा है उसको खाकर ही बालर नो-बॉल फेंक रहे हैं. एम् एन सी कम्पनियाँ पाकिस्तान में करीब एक लाख करोड़ का आटा और तेल बेंचती हैं. अब कोई क्रिकेटर इन कंपनियों का आटा और तेल खायेगा तो वह जो है नो-बॉल तो फेंकेगा ही. यह बात हमारे राष्ट्र के लिए एक सन्देश है कि एम एन सी के बनाये खाद्य पदार्थों को अगर न रोका गया तो हमारा भी एक-एक क्रिकेटर नो-बॉल फेंकने लगेगा. यह जो है वह पूरे राष्ट्र के लिए बहुत ही खराब होगा. इसीलिए पतंजलि योगपीठ ने चावल, बाजरा, गेंहू और जौ को मिलाकर एक आटा बनाया है जिसकी रोटी खाने से बोलर कभी भी नो-बॉल नहीं फेंकेगा. हम तो राष्ट्र निर्माण करते हैं. उसके लिए हम कटिबद्ध हैं. आज ज़रुरत है......."
चन्दन सिंह हाठी, मैनेजर गंगोत्री यन्त्र प्रतिष्ठान: "क्या आप अपने बालिंग रन-अप से परेशान हैं? क्या आप इन-स्विंगर करते हैं और वो आउट-स्विंगर हो जाता है? क्या आप जब भी नो-बॉल फेंकना चाहते है तब नहीं फेंक पाते? क्या आपकी एल बी डब्ल्यू की अपील पर अम्पायर बैट्समैन को आउट दे देता है? क्या आप विश्व के सबसे बड़े नो-बॉलर बनना चाहते हैं? क्या नो-बॉल फिक्स करने की वजह से आप बार-बार पकड़े जाते हैं? तो पहली बार गंगोत्री यन्त्र प्रतिष्ठान लाया है नो-बॉल सुरक्षा रुद्राक्ष. यह पहनने के बाद आप जब भी चाहें नो-बॉल फेंक सकते है और पकड़े भी नहीं जायेंगे. हमारा दावा है ...."
प्रणब मुख़र्जी, फिनांस मिनिस्टर एंड पोलिटिकल मैनेजर, यूनाइटेड प्रोग्रेसिव अलायंस : "दीस ईभेंट हुविच हैपेण्ड ईन इंग्लैंड शूड नाट हैभ हैपेण्ड...उई फार्मली बिलीभ दैट पकिस्तान शूड ट्राई एंड ब्रिंग डाउन दा नो-बाल बोल्ड टू आंडर एट पारसेंट...आल्दो उई आर कोंसोटेंटोली मोनिटोरिंग दा सिचुयेशान एमार्जिंग फ्रॉम...."
यह था हमारे ब्लॉग-पत्रकार चंदू चौरसिया की विश्व के तमाम बड़े नेताओं और लोगों से नो-बॉल फिक्सिंग पर बातचीत. चंदू चौरसिया का अगला असाइंमेंट है कि वे युवा-नेता, युवराज, भावी प्रधानमंत्री श्री राहुल गाँधी का इंटरव्यू लेंगे. हम जल्द ही वह इंटरव्यू अपने ब्लॉग पर प्रकाशित करेंगे. तब तक हम आपसे विदा लेते हैं.