टेप्स सार्वजनिक हो गए. कुछ लोगों ने संविधान के हवाले से बताया कि यह किसी इंडिविजुअल की प्राइवेसी पर हमला है. दूसरी तरफ से आवाज़ आई कि इंडिविजुअल अगर देश और उसकी जनता के बारे में बात करे तो वह पब्लिक हो जाता है. टेप्स से ही हमें पता चला कि जिन्हें हम पत्रकार समझते थे वे दरअसल कुछ और ही हैं. क्या हैं, यह सब अपने-अपने हिसाब से तय कर सकते है. जो लोग़ टेप्स में कविता पाठ करते सुने गए हैं वे सफाई दे रहे हैं. कुछ नहीं भी दे रहे.
हमारा काम है कि हम अपने ब्लॉग पत्रकार को भेजकर लोगों की प्रतिक्रिया जानें. यही कारण था कि हमारे ब्लॉग पत्रकार चंदू चौरसिया ज़ी ने लोगों से उनकी प्रतिक्रिया मांगी. आप बांचिये कि लोगों ने क्या कहा;
रॉबर्ट गिब्स, प्रेस सेक्रेटरी ह्वाईट हाउस : "वी आर ऑफ द ओपिनियन दैट इट टेक्स स्पेशल टैलेंट टू सेल समथिंग ऐट थ्री परसेंट ऑफ इट्स रीयल वैल्यू एंड इंडिया हैव डन वैरी वेल ऑन दैट काउंट. हाउ-एवर, वी स्टिल बिलीव दैट इन-स्पाईट ऑफ आल इट्स टैलेंट ऐज विजिबिल इन स्कैम्स, इंडिया हैज अ लॉन्ग वे टु गो टु क्लेम अ पर्मानेंट सीट इन यूनाईटेड नेशंस सिक्यूरिटी काउंसिल. वी ऑल्सो री-टरेट दैट आल दो इंडिया कुड मैनेज टु सेल इट्स नेशनल असेट्स ऐट थ्रो-अवे प्राइसेज, स्टिल पाकिस्तान इज आर नेचुरल अलाई व्हेन इट कम्स टु फाईट टेरोरिज्म. वी आर फार्मुलेटिंग अ न्यू टेरर पालिसी एंड सी इंडिया ऐज अ प्रोमिनेंट प्लेयर....."
अरिंदम चौधरी, डायरेक्टर आई आई पी एम : "राजा शुड हैव काऊँटेड हिज चिकेन्स...सॉरी स्पेकट्रंम्स बिफोर इट्स सेल. बट नाऊ दैट इट्स विजिबिल ही डिड नॉट, आई स्टिल होप दैट ही वुड थिंक बियोंड टूज़ी. मुझे ये लगता है कि अगर राजा एक प्रुडेंट मिनिस्टर की तरह काम करते तो उन्हें टूज़ी के लिए बिड करनेवालों को बीएसएनएल का एक-एक सेल फोन देना चाहिए था. तब झमेला केवल इस बात पर होता कि उसने बिडर्स को सेलफोन क्यों दिया? तब झमेला रेवेन्यू लॉस का न होकर.....बॉस, मैंने इंडिया में पहली बार हर एडमिशन पर एक लैपटॉप देना शुरू किया. वी आर पायनियर इन दिस फील्ड..."
राम बिलास पासवान ज़ी, दलित लीडर : "ई जो टेप आया है, उसको सुनने के बाद एक बार फिर से साबित हो गया कि जे देश में दलित, पिछड़ा, ओ बी सी, आदिवासी और माइनॉरिटी कमुनिटी का कहीं भी सुनवाई नहीं है. एतना टेप जो है रिलीज हुआ लेकिन एक में भी कोई दलित का आवाज़ नहीं है. ई जो है का दर्शाता है? सरकार जो है ऊ खाली पैसावाला सब के लिए......"
अरनब गोस्वामी, मॉडर्न डे रिवोल्यूशनरी : "दोज वेरी पीपुल हू हैड थ्रीटेंड टू स्यू योर चैनल, आर रनिंग फॉर फोर हंड्रेड मीटर्स हरडेल्स...सॉरी सॉरी...इट ऐपीयर्स दैट आई सेड समथिंग इर्रिलिवेंट...यस, ह्वाट आई वांटेड टू से इज दैट आई एम वेरी डिस्अप्वाइंटेड ऐज नन ऑफ दीज टेप्स फीचर्स सुरेश कलमाडी....बट आई वुड लाइक टू अस्योर आल आर व्यूअर्स दैट योर चैनल विल लीव नो स्टोन अनटर्न्ड टिल इट गेट्स टू रूट ऑफ द कॉजेज ऐज टू ह्वाट ट्रांस्पायर्ड नॉन इनक्लूजन ऑफ कलमाडी....."
वॉरेन बफेट, इन्वेस्टर, कैश-होर्डर, फिलेनथ्रोपिस्ट एंड ऐन आलटाइम विनर : "दीज टूज़ी टेप्स ब्रिंग ऐन एंटाइरली न्यू बिजनेस ऐंड इन्वेस्टमेंट आप्च्यूनिटी इन द फील्ड ऑफ कन्वर्शेसन रिकार्डिंग क्विपमेंट्स इन इंडिया...लुकिंग ऐट द नंबर ऑफ स्कैम्स एंड लेवल ऑफ करप्शन, आई एम स्योर इंडिया विल प्रूव टू बी अ ह्यूज मार्केट फ़ॉर दीज इक्विपमेंट्स...अमेरिकन कंपनीज हैव अ ग्रेट आप्च्यूनिटी ऐंड दे शुड स्टार्ट मैन्यूफैक्चरिंग मोर एडवांस्ड इक्विपमेंट्स टू कैटर टू द फ्यूचर डिमांड्स ह्विच मे स्टार्ट पोरिंग इन वंस रिकार्डिंग्स टू प्रॉब थ्रीज़ी टेलिकॉम लाइसेंस....देन फोरज़ी..देन..."
बिनोद शर्मा, डी-फैक्टो स्पोक्सपरसन, कांग्रेस पार्टी एंड पार्ट-टाइम एडिटर हिन्दुस्तान टाइम्स : "जो भी टेप्स अभी तक सामने आये हैं, उनको सुनकर तो यही लगता है कि इन टेप्स की वजह से नरेन्द्र मोदी की ईमेज को गहरा झटका लगा है. कुल एक सौ चार टेप्स में नरेन्द्र मोदी का नाम एक बार भी सुनाई नहीं दिया. जो बीजेपी मोदी को नेशनल लीडर के तौर पर प्रोजेक्ट करना चाहती थी अब वह क्या करेगी? गुजरात दंगों का भूत मोदी का पीछा नहीं छोड़ेगा. मेरा ऐसा मानना है कि कल अगर इस बात पर नीतीश कुमार बीजेपी से अपना पीछा छुड़ा लें तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी. इन टेप्स ने मोदी को उनकी औकात बता दी है...."
शनि महाराज, पार्ट-टाइम ज्योतिषी ऐंड फुल-टाइम मनी लांडरिंग कंसल्टेंट : "जब टेप रिकार्ड किये गए तब शनि मंगल के गृह में बैठा था. और वृहस्पति के ऊपर चन्द्रमा का साया मंडरा रहा था. इसलिए लोगों का फोन टेप हो गया. मेरे पास इसका उपाय है. अगर काली सरसों के सात दाने और लालमिर्च के तीन दाने मिलाकर शनिवार के दिन उसे नमक के पानी में धोकर और उसके बाद उसको पीसकर उस लेप को सेलफोन पर लगा दिया जाय तो फिर बातचीत को कोई टेप नहीं कर सकेगा...."
बरखा दत्त, 'जनरलिस्ट' : "टेप्स से यह बात प्रूव होती है कि जर्नलिज्म बिलकुल आसान काम नहीं है. एक न्यूज के लिए एक जर्नलिस्ट को क्या-क्या नहीं करना पड़ता. यहाँ तक कि पीआर एजेंसी चलानेवाली के साथ फालतू की बकबक करनी पड़ती है. आई टेल यू चंदू, दिस इज नॉट ईजी."
श्री राकेश झुनझुनवाला, इन्वेन्टर ऑफ ट्विटर एंड ओनर ऑफ द बिलियन डॉलर रवींद्र जडेजा फैन्स क्लब : "मुझे लगता है कि अभी तक पूरे टेप्स सामने नहीं आये हैं. सरकार कुछ छिपा रही है. मैंने बहुत खोज की लेकिन मुझे वो टेप नहीं मिला जिसमें अजित अगरकर ने टी-ट्वेंटी वर्ल्डकप से पहले रवींद्र जडेजा को क्रिकेट की कोचिंग दी है. यहाँ तक कि वह टेप भी नहीं मिला जिसमें उदय चोपड़ा और हरमन बवेजा एक कान्फरेन्स लाइन पर डीनो मोरिया को एक्टिंग लेशंस दे रहे हैं. आई टेल यू, देयर आर मोर टू दीज टेप्स देन ह्वाट हैज बीन इन पब्लिक डोमेन सो फार....."
श्री भूरेलाल, डी एस पी, तेजपुर बिहार : "ई तो स्साला होना ही था."
हलकान 'विद्रोही', ग्रेटेस्ट हिंदी ब्लॉगर : "आज समय आ गया है कि देश से भ्रष्टाचार को उखाड़ कर फेंक दिया जाय. यह देश पूरी तरह से देशद्रोहियों के हाथ में चला गया है जो गरीब जनता के हिस्से की रोटी भी खा रहे हैं. आज ज़रुरत है कि हम रोज पोस्ट और कमेन्ट लिखकर इन देशद्रोहियों का असली चेहरा सबसे सामने लायें. अब समाज को एक ही चीज दिशा दे सकती है और वह हिंदी ब्लागिंग. आज मैं पूरे हिंदी ब्लॉग समाज से यह आह्वान करता हूँ कि इतनी पोस्ट लिखी जाए कि बस पोस्ट की गूँज सुनाई दे और भ्रष्टाचार इस देश को छोड़कर हमेशा के लिए चला जाय.
भारतमाता की जय!
दीपांकर गुप्ता, समाजशास्त्री : "आज समय आ गया है कि हम इन टेप्स को सोसियो-पोलिटिकल-एकॉनोमिकल ऐंगेल से देखें. जितने भी टेप्स बाहर आये हैं उनमें से एक को भी सुनकर नहीं लगता कि हमारा समाज अभी भी पूरी तरह से इन्क्लूसिव ग्रोथ वाला समाज बन सका है. इन टेप्स में 'वीकर सेक्शन ऑफ द सोसाइटी' का रिप्रजेंटेशन नहीं है. हालाँकि प्रजेंट डे गवर्नमेंट ने काफी कोशिश की है जिससे इन्क्ल्यूसिव ग्रोथ को बढ़ावा दिया है जैसे नरेगा और लोन माफी कार्यक्रम चलाकर इस सरकार ने यह इन्स्योर किया कि पैसे का डिस्ट्रीब्यूशन कहीं न कहीं एमपी और एमएलए के अलावा रुरल लेवल पर ठेकेदारों तक भी पहुंचे. इसके अलावा सरकार ने और भी बहुत कुछ किया है लेकिन वह काफी नहीं है. इन्क्ल्यूसिव ग्रोथ का जो आईडिया है उसे और आगे ले जाने की ज़रुरत है. मेरा ऐसा माना है कि......"
जगन मोहन रेड्डी, राइजिंग सन एंड वाईजिंग पोलिटिसियन : "देयर वेयर येस्पेक्कुलेसन दैट याफ्टर दीज टेप्स यार आउट, अई वुड नॉट रिजाइन. आई हैव प्रूव्ड येवेरीबडी रॉंग येंड जस्ट रिजइन्ड ."
चंदू ज़ी ने तो और लोगों के बयान इकट्ठे किये थे लेकिन टाइप करते-करते हाथ दुःख रहे हैं. आप इतना बांचिये. जैसे सरकार ने और भी टेप्स को सार्वजनिक करने का वादा किया है वैसे ही मैं भी बाकी के बयान बाद में छाप दूंगा.
अगर पब्लिक डिमांड हुई तो.
Tuesday, November 30, 2010
टेप-टेप में
Friday, November 26, 2010
टेपहरण काण्ड
उन दिनों फी कैसेट चालीस रूपये खर्च करने वाला कैसेट स्वामी इन गानों को इतना बजाता कि लोगों के मन में संदेह पैदा होने लगता कि इन गानों का कॉपीराइट्स इसी महापुरुष के पास है और अगले घंटे से ही यह पूरे मोहल्ले से पेटेंट फी की वसूली शुरू कर देगा. ये गाने इतना बजते कि कैसेट करीब साढ़े सत्रह दिन के भित्तर ही शहीद हो जाता और उनका स्वामी बड़े दुःख के साथ अलविदा दोस्त कहते हुए उन्हें आते-जाते खूबसूरत आवारा सड़कों पर फेंक आता. लेकिन कैसेट स्वामी के इस कर्म से कैसेट की मौत नहीं होती थी. दरअसल कैसेट थ्रो नामक जिस खेल में वह बिना किसी गोल्ड मेडल की आकांक्षा के उत्कृष्ट प्रदर्शन करता, उसी खेल से कैसेट को एक नया जीवन मिल जाता था और नया जीवन पाकर कैसेट यह कहते हुए धन्य हो लेता था कि बड़े भाग कैसेट तन पावा.
अपने नए जीवन के पहले चरण में ये वह कैसेट मोहल्ले के किसी कैसेट-प्रेमी बच्चे के हाथों में अठखेलियाँ करते नहीं थकता था. बच्चा उस कैसेट को हाथ में लेता और एक आँख बंद करके दूसरी से उसके आर-पार देखने की कोशिश करता. जब कुछ दिखाई न देने के कारण बोर हो जाता तो बड़े प्यार से उँगलियों के समूह से तर्जनी नामक उंगली का सेलेक्शन कर उसे कैसेट की चकरी में घुसेड़ देता और उसे इस तरह से घुमाता जैसे महाभारत सीरियल में श्रीकृष्ण बने नितीश भारद्वाज तथाकथित सुदर्शन चक्र घुमाया करते थे.
कुछ बच्चे तो इस कला में इतने माहिर होते थे कि अगर एशियन गेम्स में इस प्रतियोगिता को शामिल कर लिया जाता तो नोवी कपाडिया को इस बात की चिंता न सताती कि गोल्ड मेडल्स की टैली को दो अंकों में पंहुचाने के लिए किस प्रतियोगिता पर डिपेंड किया जाय. शर्त लगाकर कह सकता हूँ कि नाइन आउट ऑफ टेन बार गोल्ड मेडल भारत की झोली में होता और भारत की गोल्ड मेडल टैली डबल डिजिट में पहुँच जाती.
अपना नया सुदर्शन चक्र घुमाकर भगवान, (मेरी बात पर नाराज़ मत होइएगा, बच्चे भगवान का रूप होते हैं.इधर आप नाराज़ हुए और उधर आपको पाप लगा), जब बोर हो जाता तब वह कैसेट को आधे में चीर डालता और उसके भीतर के टेप को खींच डालता. बच्चे का यह कर्म कुछ समय के लिए उसे दुशासन के रूप में प्रस्तुत करता. अंतर केवल इतना रहता कि अटेंडेंस रजिस्टर में सुदर्शनचक्र धारी भगवान श्रीकृष्ण के नाम के आगे कैपिटल ए लिखा रहता. इसका परिणाम यह होता कि अगल-बगल खड़े लोग़ इस टेप-हरण काण्ड का जम कर लुफ्त उठाते. बाद में टेप को उड़ाया जाता. फैलाया जाता. लपेटा जाता. टांगा जाता. कहीं बांधकर लाँघा जाता. बच्चों के ये कर्म उन्हें और साथ में खड़े तमाम लोगों को अद्भुत आनंद वाले रोलरकोस्टर राइड्स पर ले जाते. उन्हें लगता कि टेप हरण में ही जीवन का लुत्फ़ छिपा हुआ है. कुछ दिनों बाद जब वे बोर हो जाते तो नए कैसेट की तलाश में निकल पड़ते. मोहल्ले में कैसेटों की कमी भी नहीं थी. लगभग हर दिन किसी न किसी घिसे-पिटे कैसेट को नया जीवन मिल ही जाता.
यह बात अलग थी कि कुछ टैलेंटेड बच्चे यह सोचते हुए समाज को गाली देते थे कि सभी कैसेट ही फेंकते हैं. स्साला कभी कोई टेप रेकॉर्डर नहीं फेंकता.
धत्त तेरे की. मैंने सोचा था कि आज बहुत दिनों बाद चर्चा में चल रहे टेप्स के बारे में कुछ लिखूंगा और शुरू किया तो घिसे-पिटे कैसेट के बारे में लिख दिया. खैर, अब लिख दिया है तो पब्लिश कर ही देता हूँ. टेप्स के बारे में फिर कभी लिखूँगा.
Friday, November 12, 2010
सिंथेटिक प्रगति
दिवाली आई और चली गई. साल भर जिस त्यौहार का इंतज़ार रहता है उसके आने में तो देर लगती है लेकिन जाने में बिलकुल नहीं. अब दिवाली के चले जाने से हम वैसे ही हलकान हैं जैसे कुछ लोग इस बात से हलकान हुए जा रहे हैं कि श्री बराक ओबामा ने मुंबई में भाषण तो झाड़ा लेकिन वे अपने भाषण में पाकिस्तान नामक शब्द डलवाना भूल गए. यह तो वैसा ही हो गया कि सब्जी तो बहुत बढ़िया बनी बस समस्या एक रह गई कि मास्टर शेफ अमेरिका नमक डालना भूल गए.
ओह, दिवाली की बात हो रही थी और कहाँ हम फिसल कर ओबामा पर जा पहुंचे.
हाँ तो मैं कह रहा था कि दिवाली आई और चली गई. दीये जले. लक्ष्मी और गणेश ज़ी का पूजन हुआ. एस एम एस लेन-देन का कार्यक्रम हुआ. इनोवेटिव एस एम एस लिखने के कीर्तिमान स्थापित हुए. जो नहीं हो सका वह था मिठाई भक्षण कार्यक्रम. मिठाई भक्षण की बात पर हम इस बार निरीह साबित हुए. कारण था, मिठाई टेस्ट करने के लिए हम घर में प्रयोगशाला नहीं बना सके. मिठाई की दूकान के आस-पास हमें परखनली और टिंक्चर आयोडीन की दूकान नहीं मिली लिहाजा हम ये चीजें नहीं ला सके. ऐसे में मिठाई परीक्षण नहीं हो सका. अब चूंकि सरकार हमको बार-बार बता रही थी कि जागो ग्राहक जागो और मिठाई टेस्ट करके खाओ, हमें बिना परीक्षण वाली मिठाई खाने में शर्म महसूस हुई. नतीजा यह हुआ कि हमने मिठाई नहीं खाई.
इससे पहले कि आप पूछें कि परखनली क्या लफड़ा है, हम आपको बता देते हैं कि परखनली भारतवर्ष में टेस्ट-ट्यूब के नाम से विख्यात हैं.
प्रगति में लिप्त देश के पास तमाम बातों के लिए आप्शन कम हो जाते हैं और वह निरीह हो जाता है. अब देखिये न, हम जब केवल चार प्रतिशत से ग्रो कर रहे थे तब जमकर मिठाई खाते थे. बाद में पता चला कि भारतवर्ष की कुंडली में प्रगति लिखी हुई है. अब जिसकी कुंडली में प्रगति लिखी हुई है उसे प्रगति करने से कौन रोक सकता है? ऐसे में प्रगति योग का असर यह हुआ कि हम नौ-दस परतिशत से ग्रो करने लगे. अब इतनी तेजी से ग्रो करेंगे तो सबकुछ अद्भुत ही होगा न.
और सबकुछ अद्भुत ही हो रहा है.
एक ज़माना था जब सिंथेटिक शब्द की बात होती थी तो उसके साथ केवल एक शब्द जुडा होता था और वह था साड़ी. लगता था जैसे सिंथेटिक शब्द साड़ी शब्द के साथ फेविकोल लगाकर चिपका हुआ था. बाद में हम प्रगति के ऐसे शिकार हुए कि हमने तमाम और चीजों से सिंथेटिक को जोड़ डाला जिनमें सिंथेटिक मावा, सिंथेटिक मैदा, सिंथेटिक दूध, सिंथेटिक दही. अब तो कई बार तो लोग़ सिंथेटिक शुभकामनाओं के साथ बरामद होते हैं.
बस अब केवल सिंथेटिक प्रगति का हल्ला होना बाकी है.
जब मैं छोटा था तब मिठाई में इस्तेमाल होनेवाले मावे और खोये में आलू की मिलावट होती थी. दूध में मूंगफली की. प्रगति के साथ-साथ इक्वेशन चेंज हो गया. अब मावे में सफ़ेद पेंट और टॉयलेट पेपर की मिलावट होती है और दूध में यूरिया की. टॉयलेट पेपर वाली जानकारी मेरे लिए ताज़ा है और परसों ही एक टीवी चैनल ने दी है. पत्रकार बता रहा था कि टॉयलेट पेपर मिलाने से मावा असली लगता है. इस जानकारी के बाद मुझे लगा कि पिछले चार-पाँच महीनों में देश में टॉयलेट पेपर को अभूतपूर्व इज्ज़त मिली है. ऐसी इज्ज़त जो इस पेपर को शायद ही किसी और देश में मिले.
एक मित्र से बात हो रही थी. मैंने कहा; "ये भी कोई बात है? हम मिठाई खरीदने बाज़ार जायें तो साथ में टेस्ट-ट्यूब और केमिकल भी ले आयें ताकि उसे टेस्ट कर सकें?"
मित्र बोले; "अरे ये सब ढकोसला है. मुझे तो लगता है किसी मंत्री के दूर के रिश्तेदार जैसे सास-ससुर या फिर साले-सालियों ने टेस्ट-ट्यूब और मिठाई टेस्टिंग केमिकल्स का धंधा कर लिया है. इसीलिए सरकार ने इतना बड़ा विज्ञापन अभियान चला रखा है."
आगे बोले; "और मैं पूछता हूँ कि क्या गारंटी है कि जिस केमिकल से टेस्ट होना है वह मिलावटी नहीं होगा? उसे टेस्ट करने के लिए क्या एक और चीज खरीदनी पड़ेगी?"
मेरे पास कोई जवाब नहीं था.
आज बैठे-बैठे सोच रहा था कि आनेवाले दिनों में क्या-क्या दिखाई पड़ेगा? मुझे लगा कि हो सकता है पेंट बनानेवाली कोई कंपनी इस बात का प्रचार करे कि प्रसिद्द मिठाई निर्माता अपनी मिठाइयों में हमारी कंपनी के पेंट का इस्तेमाल करते हैं. मिठाई बनानेवाले सेठ ज़ी इस विज्ञापन के लिए मॉडलिंग करेंगे. कोई फर्टीलाइजर कंपनी अपने विज्ञापन में इस बात को बड़े गर्व के साथ प्रचारित करेगी कि दूध बेचने वाली फलाने कंपनी दूध सफ़ेद बनाने के लिए हमारी कंपनी के यूरिया का इस्तेमाल करती है. टॉयलेट पेपर बनानेवाली कंपनी बड़े ताम-झाम के साथ विज्ञापन बनाये कि; "ज़ी हाँ, बहनों और भाइयों, कॉमनवेल्थ गेम्स में अपार सफलता के बाद अब हमारी कंपनी के टॉयलेट पेपर का इस्तेमाल प्रसिद्द मिठाई निर्माता सखाराम सूरजमल अपनी मिठाई के मावे में करते हैं.....
नकली मावे की फैक्टरी में छापा मारने वाले फ़ूड इंस्पेक्टर टीवी चैनल वालों को लेकर जाते हैं ताकि उनकी सफलता से भारतवर्ष में फ़ूड इंस्पेक्शन का इतिहास लिखा जा सके. कल कहीं ऐसा न हो कि मिठाई टेस्ट करने के लिए केमिकल्स बनानेवाली कम्पनियाँ डिमांड पूरा करने के लिए नकली केमिकल्स बनना शुरू कर दें और इन्ही इंस्पेक्टर ज़ी लोगों को उनकी फैक्टरी पर छापा मारना पड़े.......
नोट: मेरी यह पोस्ट पहले न्यूज दैट मैटर्स नॉट पर प्रकाशित हो चुकी है.
