मंत्री जी सोच में डूबे थे. आप पूछ सकते हैं सोच में क्यों डूबे थे? खासकर तब, जब डूबने के लिए और बहुत कुछ है? तो मेरा कहना यह है कि आप सवाल बहुत करते हैं. पढ़ तो लीजिये कि उन्होंने सोच में डूबना क्यों पसंद किया? तो मैं बता रहा था कि मंत्री जी सोच में डूबे थे. मंत्री भी कौन विभाग के? मिनिस्ट्री ऑफ न्यू एंड री-न्यूएबिल एनर्जी यानि नवीन और नवीनीकरणीय उर्जा मंत्रालय. क्या कहा? नाम नहीं सुना कभी? अरे भइया वही मंत्रालय जो किसी भी चीज से उर्जा बना लेता है. सूरज की रौशनी को पेट्रोमैक्स और बल्ब की रौशनी में परिवर्तित कर डालता है. गोबर से गैस बना देता है. पोलीथीन से तेल बना देता है. यहाँ तक कि कूड़ा से सरकार भी बना सकता है.
तो मैं बता रहा था कि इसी मंत्रालय के मंत्री सोच में डूबे थे. सामने सचिव महोदय बैठे. ऑब्जेक्शन मत कीजिए सचिव के आगे महोदय लगाना ज़रूरी होता है. यही सरकारी नियम है. तो सामने सचिव महोदय बैठे थे. सोच में डूबकर जब मंत्री जी बोर हो गए तो सिर उठाकर बोले; "लगातार आठवां महीना है जब हम लोग़ टारगेट अचीव नहीं कर पाए. क्या हो रहा है? जब मैं मंत्री बना था तो मैंने मीडिया को बताया था कि मैं इस देश में ऊर्जा के नए-नए स्रोत स्थापित करूँगा लेकिन यहाँ हाल यह है कि गोबर गैस के टारगेट को भी हम अचीव नहीं कर पा रहे?"
सचिव जी के बोलने की बारी थी. वे बोले भी. उन्होंने कहा; "लेकिन सर, क्या किया जाय जब हमारे पास गोबर ही उपलब्ध नहीं है. एक जमाना था जब देश में गोबर पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध था. लेकिन आज गोबर की कमी पड़ गई है. गोबर मिलेगा तब तो गोबर-गैस बनेगी."
मंत्री जी बोले; "लेकिन गोबर न मिलने का कारण क्या है? अचानक देश में गोबर की कमी हो जाना तो ठीक नहीं है न. गेंहू, चावल, दाल, सब्जी वगैरह की कमी समझ में आती है लेकिन गोबर की कमी? अरे भाई, भारत तो गोबर के लिए ही जाता है."
सचिव जी बोले; "लेकिन सर, यह कहना कि भारत को गोबर के लिए जाना जाता है ठीक नहीं होगा. भारत तो और बातों के लिए भी जाना जाता है. हमें नहीं भूलना चाहिए कि भारत करप्शन के लिए जाना जाता है. भारत महात्मा के लिए जाना जाता है. भारत ...."
मंत्री जी बोले; "ठीक है-ठीक है. मैं समझ गया. लेकिन सवाल यह है कि गोबर की कमी कैसे हो गई?"
सचिव जी ने अपनी फ़ाइल से एक कागज़ निकालते हुए कहा; "सर, यह रिपोर्ट है. हमने एक्सपर्ट्स लगाकर स्टडी करवाया तो पता चला कि पिछले वर्षों में देश में गायें ज्यादा कटने लगी हैं. वे अब कटकर एक्सपोर्ट्स होने के काम आती हैं. शायद गोबर की कमी इसीलिए हो रही है."
मंत्री जी बोले; "लेकिन हमारे यहाँ भैंस भी तो पायी जाती हैं. वे भी तो गोबर करती होंगी."
सचिव जी को पता था कि मंत्री जी ऐसा सवाल कर सकते हैं. वे इस सवाल के लिए तैयार थे. उन्होंने बताया; "सर, भैंस गोबर तो करती हैं लेकिन देश के लोग़ उस गोबर से उपले बनना ज्यादा ज़रूरी समझते हैं. और फिर सर, परिवार बड़े-बड़े होते हैं. एक परिवार में एक ही भैंस है. कई बार तो ऐसा देखा गया है कि एक ही भैंस का गोबर परिवार में चार भागों में बट जाता है. चारों लोग़ उस गोबर से उपले बनाते हैं जो जलाने के काम आता है."
मंत्री जी बोले; "और बैल? बैल भी तो गोबर करते होंगे? क्या बैलों ने गोबर करना छोड़ दिया है?"
सचिव जी इस अप्रत्याशित सवाल के लिए तैयार नहीं थे. कुछ क्षणों के लिए खुद को संभाला और बोले; "सर, देखा जाय तो बैल और करते ही क्या हैं? बैल गोबर ही तो करते हैं. लेकिन सर बैलों की संख्या भी तो घट गई है. वैसे सर, यहाँ एक समस्या और भी है कि भैंस तो एक जगह बंधी रहती है लेकिन बैल इधर-उधर आता-जाता रहता है. वह घूम-घूम कर गोबर करता है. ऐसे में लोग उसका पूरा गोबर इकठ्ठा नहीं कर पाते."
मंत्री जी भी शायद सोच में और डूब जाने के लिए तैयार नहीं थे. लिहाजा उन्होंने अपनी म्यान से एक और सवाल निकाला. बोले; "लेकिन बैल क्यों कम हो गए? क्या उन्हें अब भारतवर्ष पसंद नहीं आता?"
सचिव जी ने भी अपनी म्यान से जवाब निकाला. बोले; "सर, देखा जाय तो बैलों को हमेशा से ही भारतवर्ष पसंद रहा है. यहाँ समस्या यह है कि अब भारतवर्ष को बैल रास नहीं आते."
मंत्री जी ने पूछा; "क्यों? ऐसा क्यों? अगर भारतवर्ष को बैल रास नहीं आते तो फिर बैलों की जगह किसने ली?"
सचिव जी को पता था कि मंत्री जी यह ज़रूर पूछेंगे. वे बोले; "सर, अब बैलों की जगह ट्रैक्टर ने ले ली है."
मंत्री जी के लिए यह सूचना नई टाइप लगी. बोले; "क्या बात करते हैं आप? जो काम बैल कर सकता है क्या वे सारे काम ट्रैक्टर करने लगे हैं?"
सचिव जी बोले; "ट्रैक्टर लगभग सारे काम कर सकता है, बस गोबर नहीं कर सकता. वैसे सर, क्या ऐसा नहीं हो सकता कि अपने मंत्रालय के टारगेट अचीव करने के लिए हम वाणिज्य मंत्रालय से कहें कि गायें कम काटी जायें. गायों को काटकर उन्हें एक्सपोर्ट्स करने का नया लाइसेंस न दिया जाय?"
मंत्री जी बोले; "लेकिन ऐसा करने से तो लफड़ा हो जाएगा. क्लैश ऑफ इंटरेस्ट की बात उभर कर सामने आ जायेगी. अभी तक हमारी मिनिस्ट्री इस झमेले से दूर थी लेकिन वह भी इसमें पड़ जायेगी तो मीडिया वालों को एक और बहाना मिल जाएगा हमारी सरकार के खिलाफ लिखने का. वैसे क्या ऐसी कोई तकनीक नहीं है जिससे गोबर मैन्यूफैक्चर किया जा सके?"
सचिव जी इस सवाल के लिए तैयार नहीं थे. उनके मन में एक बार तो आया कि कह दें कि; "सर देखा जाय तो हम और कर ही क्या रहे हैं? सब मिलकर गोबर मैन्यूफैक्चरिंग ही तो कर रहे हैं." फिर उन्हें लगा कि यह कहना ठीक नहीं होगा. लिहाजा उन्होंने मंत्री जी से कहा; "सर, अगर केवल इसलिए गोबर मैन्यूफैक्चर करना है कि उसकी गैस बनाई जाय तो फिर हम किसी समुद्र में सीधा-सीधा गैस ही खोज लें."
उनकी बात से मंत्री जी प्रभावित नहीं हुए. बोले; "लेट अस स्टिक टू आर प्रॉब्लम. समुद्र में गैस खोजना तो पेट्रोलियम मिनिस्ट्री का काम है. हमें गोबर गैस के बारे में सोचना है. आप केवल यह बताएं कि गोबर मैन्यूफैक्चर करने की कोई तकनीक है या नहीं?"
सचिव जी बोले; "सर, किस चीज को मैन्यूफैक्चर नहीं किया जा सकता? और खासकर सरकार तो कुछ भी मैन्यूफैक्चर कर सकती है."
सचिव जी की बात सुनकर मंत्री जी ने सरकार के टैलेंट की मन ही मन सराहना की. फिर सोचनीय मुद्रा बनाते हुए बोले; "वैसे सुना है कि गुड़ से भी गोबर बनाया जाता है. तो क्यों न हम उस तकनीक का इस्तेमाल करें?"
सचिव जी को लगा कि दो मिनट के लिए मंत्री जी की इजाजत लेकर बाहर जायें और हँस लें. फिर उन्हें लगा कि यह संभव नहीं है. वे बोले; "सर, अभी तक तो हम ज्यादातर गुड़ गोबर कर चुके हैं. अब तो गुड़ भी ज्यादा नहीं बचा."
मंत्री जी बोले; "वैसे गोबर मैन्यूफैक्चरिंग की कोई तकनीक है तो उसके बारे में बाद में सोचते हैं. पहले एक बार ट्राई किया जाय और जानवरों की संख्या बढ़ाकर पर्याप्त मात्रा में गोबर उपलब्ध करवाया जाय."
सचिव जी बोले; "लेकिन सर, यह कैसे होगा?"
मंत्री जी के पास शायद पहले से ही कोई प्लान था. बोले; "हम एक योजना की घोषणा करते हैं. योजना का नाम होगा "@#!%&८? राष्ट्रीय गोबर मिशन". एक बार योजना का उद्घाटन हो गया तो फिर अगले बजट में वित्तमंत्री को कहकर इस योजना के लिए करीब पाँच हज़ार करोड़ रुपया निकलवा लूंगा. आप बस योजना के लॉन्च करने के प्लान की घोषणा कीजिये."
सचिव जी ने सोचा कि मंत्री के पास कोई योजना है इसलिए ठीक यही होगा कि उन्ही से पूरी जानकारी ले ली जाय. वे बोले; "सर, आपने जिस तरह से योजना की बात की, उससे लगा कि आपके पास पूरा प्लान है. जब पूरा प्लान है ही तो वो मुझे बता ही दीजिये."
मंत्री जी को सचिव जी की बिना लाग-लपेट वाली बात खूब पसंद आयी. बोले; "तो फिर सुनो. योजना के पहले चरण में हम अपने मंत्रालय से एक सौ साठ करोड़ रुपया देंगे. उसके बाद चार महीने बाद बजट आने वाला है. उस बजट में पाँच
हज़ार करोड़ रुपया निकलवा लेंगे. काम आगे बढ़ेगा. अगले साल के अंत तक मीडिया में रिपोर्ट प्लांट करवाना है कि देश में अचानक गोबर की कमी हो गई है और यह योजना आगे नहीं बढ़ पाएगी. एक बार मीडिया में बात उठ गई और टीवी पर दस-पाँच पैनल डिस्कशन हो गए तो फिर इस गोबर योजना में एफ डी आई की इजाजत ले लेंगे. तुम तो जानते ही हो कि किसी भी उद्योग में एक बार एफ डी आई की ज़रुरत की बात हो जाती है तो उस उद्योग को लोग़ गंभीरता से लेने लगते हैं. ऐसे में आज यह देश के हित में है कि @#!%&८? राष्ट्रीय गोबर मिशन जल्द से जल्द शुरू किया जाय. बस अब काम शुरू करो और इस मिशन के पूरा होने के लिए अपनी जान लड़ा दो. तीन-चार दिन में एक सेमिनार में मुझे इस मिशन की घोषणा.....................
सचिव जी बड़ी तन्मयता से मंत्री जी को सुने जा रहे थे...
Tuesday, November 22, 2011
@#!%&८? राष्ट्रीय गोबर मिशन
Saturday, October 22, 2011
युग-युग में रा-वन
त्रेता युग
जामवंत जी ने हनुमान जी को याद दिलाया कि वे उड़ सकते हैं. बड़े-बुजुर्ग हमेशा से परोपकारी रहे हैं. उन्हें तो बस परोपकार करने का मौका चाहिए. वे कभी पीछे नहीं हटेंगे. दरअसल एक उम्र पर पहुंचकर उन्हें इसके अलावा कुछ और करना न तो आता है और न ही भाता है. जामवंत जी भी इसके अपवाद नहीं थे. हनुमान जी ने जामवंत जी को थैंक्स कहा और श्रीलंका की उड़ान भर ली. बैकग्राऊंड से रवींद्र जैन अपनी सुरीली आवाज़ में गाये जा रहे हैं; "राममन्त्र के पंख लगाकर हनुमत भरे उड़ान...हनुमत भरे उड़ान."
उधर हनुमान जी अपने दोनों पाँव ठीक वैसे ही ऊपर-नीचे करते उड़े जा रहे हैं जैसे पलंग पर पेट के बल लेटा डेढ़ साल का बच्चा अपने पाँव ऊपर-नीचे करता है. देखकर कोई भी बता सकता है कि वे इस समय ज्यादा ऊपर नहीं उड़ रहे हैं क्योंकि मौसम सुहाना है. बादल ऊंचाई पर हैं. रास्ता साफ़ है. दूर-दूर तक सबकुछ दिखाई दे रहा है. लिहाज़ा सामने से आते किसी राक्षस या वायुयान से टकराने की सम्भावना नगण्य है. सूर्य भगवान का पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम स्ट्रॉंग है इसलिए वे अपनी रोशनी पूरे संसार को बांटे जा रहे हैं. हिंद महासागर नीचे अविरल बहता जा रहा है.
हनुमान जी एकाग्र-चित्त उड़े जा रहे है. ठीक वैसे ही जैसे राहुल द्रविड़ पिच पर एकाग्र-चित्त होकर ऑफ स्टंप से बाहर जानेवाली गेंदों को बिना किसी छेड़-छाड़ के छोड़ दिया करते हैं. देखकर ही लग रहा है कि उन्हें उड़ने में बहुत मज़ा आ रहा है. वे किसी बच्चे की सी मुखमुद्रा लिए आनंदित दिखाई दे रहे हैं. अचानक देखते क्या हैं कि समुद्र में से सामने एक विशालकाय महिला उभरी. उसने बड़ा वीभत्स मेक-अप किया है. बड़े-बड़े बाल, माथे पर बहुत बड़ी बिंदी, मुँह के दोनों कोनों पर बड़े-बड़े तिरछे दांत और बड़ी गाढ़ी होठ-लाली से लैस यह महिला हनुमान जी के रास्ते में मुँह बाए खड़ी हो गई. उसे देख हनुमान जी ने खुद को उसके मुँह के आगे हवा में ही पार्क कर लिया. वह महिला जोर-जोर से हा हा हा करके हँसी. उसकी हँसी उसके मेक-अप से मेल खा रही है.
हनुमान जी ने उसे प्रश्नवाचक मुद्रा में देखा. उस महिला को लगा कि अब समय आ गया है कि वह अपना परिचय दे. उसने कहा; "मैं सुरसा हूँ. हा हा हा हा हा."
उसकी हँसी सुनकर कोई भी कह सकता है कि शायद उसे सुरसा होने पर बड़ा गर्व है. वैसे यह भी कह सकता है कि जैसे हनुमान जी उड़ना एन्जॉय करते हैं वैसे ही सुरसा हँसना एन्जॉय करती है. उसकी हँसी सुनकर हनुमान जी ने कहा; "वह तो ठीक है लेकिन आप इतना हँस क्यों रही हैं?"
सुरसा बोली; "हँसी ही मेरी पहचान है. मैं जब तक नहीं हँसती लोग़ मुझे राक्षसी समझते ही नहीं. अब तुम्ही सोचो कि अगर मैं हँसना बंद कर दूँ तो कौन मुझे सीरियसली लेगा?"
उसकी बात शायद हनुमान जी की समझ में आ गई इसीलिए उन्होंने उसकी हँसी की बाबत और कोई सवाल नहीं किया. आगे बोले; "लेकिन मुझसे क्या चाहती हो?"
वो बोली; "आज देवताओं ने तुम्हें मेरा आहार बनाकर भेजा है. आशा है मेरी बात तुम्हारी समझ में आ गई होगी. नहीं आई हो तो फिर मैं काव्य में सुनाऊं कि; आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा..."
उसकी बात सुनकर हनुमान जी डर गए. उन्होंने सोचा जल्दी से हाँ कर दें नहीं तो कहीं ऐसा न हो कि यह अपनी बात काव्य में सुनाना शुरू करे तो साथ में आगे-पीछे की दस-पंद्रह चौपाई और सुना दे. आखिर उन्हें भी पता है कि कविता सुनाने वाला अगर सुनाने के मोड में आ जाए तो फिर सामनेवाले के ऊपर विपत्ति का पहाड़ टूट पड़ता है.
वे झट से बोले; "नहीं-नहीं मैं समझ गया. लेकिन हे माता अभी तो मैं भगवान श्री राम के कार्य हेतु श्रीलंका जा रहा हूँ. इसलिए आप मुझे छोड़ दें. मुझे बहुत बड़ा कार्य करना है. माता सीता की खोज करनी है. हे माता आप समझ गईं या काव्य में बताऊँ कि; "राम काजु करि फिरि मैं आवौं...."
हनुमान जी की बात सुनकर अब डरने की बारी सुरसा जी की थी. वे बोलीं; "समझ गई मैं. तुम्हारी बात पूरी तरह से मेरी समझ में आ गई."
अभी वे बात कर ही रहे थे कि आस-पास बकरी की सी आवाज़ सुनाई दी. हनुमान जी और सुरसा दोनों को बड़ा आश्चर्य हुआ कि समुद्र के ऊपर इस समय बकरी कहाँ से आ सकती है? वे इस आवाज़ के बारे में अभी सोच ही रहे थे कि उन्होंने देखा कि उनके सामने सूट-बूट पहने, छोटी सी चोटी बांधे एक मनुष्य खड़ा हुआ है.
उसने हनुमान जी को प्रणाम किया और बोला; "हे बजरंगबली, आप तो श्रीलंका जा रहे हैं. मैं यह बताने आया था कि मेरी फिल्म रा-वन कोलम्बो के सैवोय थियेटर में रिलीज होनेवाली है. आप से रिक्वेस्ट है कि आप वह फिल्म ज़रूर देखें."
इस मनुष्य को देखकर शायद हनुमान जी पहचान गए. बोले; "अरे तुम तो वही हो न जो परसों किष्किन्धा के आस-पास के इलाके में अपनी फिल्म का प्रचार करने वाये थे? महाराज सुग्रीव की सेना के कई बानर उसदिन अपना कर्त्तव्य भुलाकर तुम्हारा नाच-गाना देखने चले गए थे?"
उनकी बात सुनकर वह मनुष्य बोला; "हाँ, भगवन मैं वही हूँ. दरअसल मैं अपनी मूवी का प्रचार करने आपके इलाके में गया था. मेरा आपसे अनुरोध है कि आप मेरी मूवी ज़रूर देखें."
इस बार हनुमान जी बिदक गए. बोले; "तुमने पिछले वर्षा ऋतु से ही परेशान करके रख दिया है. जहाँ दृष्टि जाती है बस तुम्ही दिखाई देते हो. चित्रकूट हो या किष्किन्धा, अयोध्या हो या जनकपुर सब जगह तुम्ही दिखाई दे रहे हो. पागल कर दिया है तुमने सबको."
"लेकिन प्रभु, मेरी बात तो सुनिए. इस मूवी में रजनीकांत भी हैं. मैंने विदेशी गायक से इसमें गाना गवाया है. आप ज़रूर देखिएगा यह मूवी. आपको अच्छा लगेगा"; वह मनुष्य गिडगिडाने लगा.
उसकी बातें हनुमान जी को विरक्त कर रही थीं. बहुत नाराज़ होते हुए बोले; "हे माता, इस मनुष्य ने पूरी पृथ्वी पर हाहाकार मचा कर रखा है. मैं इसकी मूवी देखूँ उससे अच्छा तो यह होगा कि आप मुझे अपना आहार बना लें. माता सीता की खोज अंगद कर लेंगे."
कट टू द्वापर युग.
महाभारत की लड़ाई चल रही है.
महाराज धृतराष्ट्र के सारथी संजय उन्हें युद्ध के मैदान से आँखों देखा हाल बता रहे हैं. अचानक देखते क्या हैं कि उनकी स्क्रीन पर महाभारत की लड़ाई दिखनी बंद हो गई. सामने सूट-बूट में लैस एक मनुष्य नृत्य करते हुए गाने लागा; छम्मक छल्लो...चम्मक छल्लो..."
संजय की समझ में नहीं आ रहा कि यह कौन है? अभी वे कुछ सोच पाते कि आवाज़ आई; "महाराज धृतराष्ट्र की जय हो. महराज आज दिन भर युद्ध की रनिंग कमेंट्री सुनकर जब आप थक जायें तो आज रात्रिकालीन शो में मेरी मूवी रा-वन देखना न भूलें. बहुत बढ़िया मूवी है. बहुत पैसा खर्च करके मैंने यह मूवी बनाई है. आप आनंद से सरा-बोर हो जायेंगे."
उसकी आवाज़ सुनकर धृतराष्ट्र को लगा कि यह कौन है जो उनका मज़ाक उड़ा रहा है. आखिर जो व्यक्ति अँधा हो वह मूवी कैसे देखेगा? वे नाराज़ होते हुए बोले; "संजय यह कौन धृष्ट है जो मेरी हँसी उड़ा रहा है?"
संजय बोले; "महाराज यह एक चलचित्र अभिनेता है जो अपनी मूवी का विज्ञापन करते नहीं थक रहा. इसने पूरी पृथ्वी पर सबको परेशान करके रख दिया है. यह चाहता है कि आप इसकी मूवी देखें."
महाराज धृतराष्ट्र को बहुत गुस्सा आया. बोले; "क्या इसे यह नहीं मालूम कि मैं देख नहीं सकता?"
संजय अभी कुछ बोलते कि वह अभिनेता बोला; "महाराज आप केवल बैठे रहिये. संजय जी पूरी मूवी का वर्णन आपके सामने रखते जायेंगे. आप उसे फील करते रहिएगा. और हाँ, छम्मक छल्लो को अच्छी तरह से फील करियेगा. अब मैं जा रहा हूँ. मुझे पांडवों के शिविर में भी अपनी मूवी का विज्ञापन करना है."
इतना कहकर संजय की स्क्रीन से वह गायब हो गया. महाराज रात्रिकालीन शो का इंतजार करने लगे.
Saturday, October 8, 2011
चंदू'ज एक्सक्लूसिव चैट विद पैरिस हिल्टन...

पैरिस हिल्टन भारत आईं. वैसे अब यह नॉर्मल बात हो गई है. कोई न कोई भारत आता ही रहता है. पैरिस नहीं आती तो ब्रिटनी आ जाती. ब्रिटनी नहीं आती तो अंजेलिना जोली आ जाती. अपने यहाँ आनेवालों की कमी नहीं है. पिछले साल इन्ही दिनों सुश्री पामेला एन्डरसन आई थीं. अभी हाल ही में शोएब अख्तर अपना किताबी मंजन बेंचने आये थे. उसके लिए उन्होंने सचिन को बिना कुछ दिए अपना ब्रांड अम्बेसेडर बना लिया. पैरिस भी आईं थीं कुछ बेंचने ही. पता चला बैग बेचने आई थीं.
मेरे कहने का मतलब यह था कि अब हम ऐसे कंज्यूमर देश हो चुके हैं कि आनेवाले लोगों की कमी नहीं है.
कई लोगों ने मुझसे कहा कि चंदू को भेजकर पैरिस हिल्टन का इंटरव्यू लूँ. अब मैं ठहरा ब्लॉगर. अगर अपने पाठकों के आदेश का पालन न करूं तो ब्लॉगर-धर्म का निर्वाह कैसे करूँगा? मैंने चंदू को मुंबई भेज तो दिया लेकिन इंटरव्यू लेकर आने में उसने काफी समय लगा दिया. वैसे तो उसने बताया कि वह मुंबई भ्रमण कर रहा था इसलिए देर हो गई लेकिन सूत्रों ने बताया कि उसने फिल्म निर्माताओं से मुलाक़ात की है. शायद फ़िल्मी लेखक बनने का प्लान है उसका.
खैर, पेश है चंदू इन एक्सक्लूसिव चैट विद पैरिस हिल्टन.
चंदू: पेरिश जी नमस्कार.
पैरिस हिल्टन: चंदू जी, पेरिश मत कहो न. पेरिश का मतलब कुछ और ही होता है. पेरिश कहने से लगता है जैसे में...
चंदू: (सकपकाते हुए) सॉरी सॉरी मैडम. मैं समझ गया. मुझको याद आ गया कि डिक्शनरी में पेरिश का मतलब सड़ जाना होता है. माफ़ कीजियेगा.
पैरिस हिल्टन: कोई बात नहीं.
चंदू: सबसे पहले तो ये बताइए मैडम कि इंडिया आकर कैसा लग रहा है?
पैरिस हिल्टन: चंदू जी, आप तो ब्लॉग पत्रकार हैं. आप तो कभी टीवी पत्रकार नहीं रहे. फिर भी आप "आपको कैसा लग रहा है" टाइप सवाल कर रहे हैं?
चंदू: वो क्या है मैडम कि यह सवाल भारतीय जर्नलिस्ट का शास्वत सवाल है. अगर यह पूछा न जाय तो इंटरव्यू की तो जाने दें, बाईट भी नहीं पूरी होती. वैसे मैडम जी, हम बहुत खुश हुए कि आपको हमारे बारे में इतना पता है. हम इमोशनल टाइप हो गए यह जानकर कि आपको हमारे बारे में भी पता है.
पैरिस हिल्टन: अरे चंदू जी, हमें पता नहीं रहेगा आपके बारे में? हम सब कुछ जांच-परख कर इंटरव्यू के लिए राजी होते हैं. अब आप यही देख लें कि एक अंग्रेजी ब्लॉग से रिक्वेस्ट आई थी कि हम उन्हें भी इंटरव्यू दें लेकिन हमने मना कर दिया. हमारे एजेंट ने बताया कि उस ब्लॉगर ने अपने ब्लॉग पर हमारे ऊपर पोस्ट लिखी है लेकिन फोटो लगाई है बिनोद काम्बली की. अब आप ही बताइए, यह ठीक है क्या? हमारे अमेरिका में लोग़ सुनेंगे तो क्या कहेंगे? और आपके बारे में कौन नहीं जानता? आपने हमारे प्रेसिडेंट का इंटरव्यू लिया था. ...वैसे अब मैं आपके सवाल का जवाब देती हूँ. इंडिया आकर मुझे बहुत अच्छा लग रहा है.
चंदू: यह अच्छी बात है मैडम. इंडिया आकर बाहरवालों को अब अच्छा ही लगता है. पहले की बात और थी जब बाहर वालों को इंडिया आने पर खराब के साथ-साथ कभी-कभी पत्थर तक लग जाता था.
पैरिस हिल्टन: अरे नहीं, हमें तो बहुत अच्छा लगा.
चंदू: वैसे इंडिया आने से पहले आपने क्या-क्या तैयारी की?
पैरिस हिल्टन: बहुत तैयारी की. बिना तैयारी के मैं कहीं नहीं जाती. दो दिन तो मैंने दोनों हाथ जोड़कर नमास्टे बोलने की प्रैक्टिस की. फिर दो दिन मैंने दो लाइन; "इंडिया इज अ ग्रेट नेशन.....वेस्ट ओ सो मच टू इंडिया" जैसे सेंटेंस याद किये. मेरे एजेंट ने तो कहा कि मैं गूगल करके महात्मा गांधी के बारे में भी जान लूं लेकिन उसदिन पार्टी में देर हो जाने के कारण मैं उसकी बात भूल गई.
चंदू: आप तो सचमुच बहुत तैयारी से आई हैं. वैसे मेरे मन में एक सवाल है पेरिश जी. आप असल में क्या हैं?
पैरिस हिल्टन: चंदू जी, पेरिश मत कहो न. पेरिश सुनने से लगता है...
चंदू: सॉरी सॉरी मैडम, मैं फिर से भूल गया. वैसे मेरा सवाल यह था कि आप क्या हैं? मॉडल हैं, टीवी एक्टर हैं, सिनेमा एक्टर हैं, होटल मालकिन हैं....आप हैं क्या? हम आपको क्या समझें?
पैरिस हिल्टन: गुड क्वेश्चन चंदू जी. वैसे ये बताइए कि आप मुझे समझना क्यों चाहते हैं?
चंदू: (सकपकाते हुए) वो अब मैं कैसे बताऊँ आपको? मेरा मतलब यह था हम क्या मानें कि आप क्या हैं?
पैरिस हिल्टन: यह तो बड़ा कठिन सवाल कर दिया आपने. आजतक हमें भी नहीं पता चला कि मैं क्या हूँ. दरअसल में खुद को खोज रही हूँ. इसीलिए मैं हमेशा बदलती रहती हूँ. अब किसे पता कि कौन से किरदार में खुद को खोज लूँ? इसीलिए मैं कभी ये बनती रहती हूँ तो कभी वो. आप समझ रहे हैं न? वैसे भी आप तो फिलास्फी और योगा के देश के हैं तो आशा है कि आपको मेरी बात समझ में आ गई होगी.
चंदू: हाँ-हाँ समझ में आ गई. आपकी बात समझ में आ गई. वैसे ये बताएं कि आप इस बार इंडिया क्यों आई हैं?
पैरिस हिल्टन: मैं बैग बेचने आई हूँ. मैंने एक बैग लॉन्च किया तो सोचा कि इसे इंडिया में बेंचा जाय.
चंदू: लेकिन आपको क्यों लगा कि इंडिया में आपका बैग बिक जाएगा?
पैरिस हिल्टन: वो अभी हाल ही में आपके फिनांस मिनिस्टर हमारे देश में थे. उन्होंने वहाँ बताया कि इंडिया एट प्वाइंट फाइव परसेंट से ग्रो करेगा. उनकी बात हमारे एजेंट ने कहीं सुन ली और हमसे बोला कि अगर ऐसा है तो सारा रुपया तो इंडिया में होगा. और अगर सारा रुपया इंडिया में होगा तो उसे रखने के लिए बैग की सबसे ज्यादा ज़रुरत इंडिया के लोगों को होगी. ऐसे में इंडिया मेरे बैग के लिए सबसे बड़ा मार्केट है.
चंदू: बहुत बढ़िया. और आप यहाँ आई हैं तो किस-किस से मिलना चाहेंगी आप?
पैरिस हिल्टन: मैं राखी सावंत से मिलना चाहूँगी. मैंने उनके बारे में बहुत सुना है. हमारे देश में मुझे लोग़ यूएस का राखी सावंत कहते हैं तो मैंने सोचा कि इस महान हस्ती से मिलना चाहिए मुझे. और मिलने की बात है तो मेरे पास सिमी गरेवाल के शो पर जाने की ऑफर आई थी लेकिन मेरे एजेंट ने जाने से मना कर दिया. मैंने सुना है कि उनके शो पर चाहे हमारे प्रेसिडेंट ओबामा भी चले जायें तो भी लोग़ सिमी गरेवाल को ही देखेंगे. अब आप ही बताएं कि ऐसे शो पर जाने का क्या फायदा?
चंदू: आपने बिलकुल सही कहा मैडम. एक बार क्या हुआ कि एक बहुत बड़ा टीवी पत्रकार, मैं नाम नहीं लेना चाहूँगा, वह सिमी गरेवाल के शो पर गया और वापस आकर मुँह लटका कर बैठ गया. तीन दिन तक घर से नहीं निकला. बाद में लोगों ने पूछ तो उसने बताया कि सिमी के शो पर लोग़ उसे नहीं बल्कि सिमी गरेवाल को देख रहे थे. आपने बिलकुल ठीक किया. वैसे एक सवाल यह था मैडम कि सुना कि आपने एक भिखारी को सौ डॉलर दिए? क्या यह सच है?
पैरिस हिल्टन: हाँ यह सच है.
चंदू: आपने भिखारी के साथ फोटो भी खिंचाया या नहीं?
पैरिस हिल्टन: चंदू जी, आपतो जानते ही हैं. मैंने उसके साथ फोटो खिंचाने के लिए ही तो उसे पैसे दिए. हमें हमारी फोटो बहुत प्यारी लगती हैं. और मैं अपने फोटो के लिए कुछ भी कर सकती हूँ.
चंदू: वैसे मैडम एक सवाल था. सुना है आप कन्वर्ट हो गई हैं और आपने इस्लाम धर्म क़ुबूल कर लिया है?
पैरिस हिल्टन: क़ुबूल तो हम कुछ नहीं करते चंदू जी. हाँ, कन्वर्ट हो सकते हैं. हे हे हे ....आप समझ रहे हैं न.
चंदू: हाँ-हाँ, मैडम मैं समझ गया. वैसे आख़िरी सवाल यह था कि आपन अगली बार कब आएँगी इंडिया? और क्या बेचने आएँगी?
पैरिस हिल्टन: हे हे हे..चंदू जी आप तो जानते ही हैं. हम अमेरिका वाले हैं. ऐसे में बेचने के लिए हमारे पास बहुत कुछ है. जब इच्छा हुई कुछ न कुछ बेंचने वापस आ जायेंगे.
चंदू: अगली बार आएँगी तो मैं मिलूंगा मैडम आपसे. फिर से ज़रूर इंटरव्यू दीजियेगा.
पैरिस हिल्टन: अरे चंदू जी, ज़रूर. आपके लिए तो मेरी...
चंदू: मेरी क्या? मेरी क्या मैडम? आपके लिए मेरी क्या?
पैरिस हिल्टन: अरे अरे...मेरा मतलब यह था कि आपके लिए मेरी इंटरव्यू भी हाज़िर है.
चंदू: मेरी इंटरव्यू नहीं मैडम, मेरा इंटरव्यू. ओके मैडम आपको धन्यवाद.
पैरिस हिल्टन: ओके धान्यवाद. नमास्टे.