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Wednesday, June 26, 2013

भारतीय राजनीति का शेरकाल




नेताजी जी गठबंधन टूटने की ब्रेकिंग न्यूज दान में देते हुए पत्रकारों से बोले; "ऊ लोग त दवा देते मरने की, आ दुआ देते हैं जीने की।"

पत्रकार लोग उन्हें लगातार देखे जा रहे थे। शायद इस आशा के साथ की वे शेर की दूसरी लाइन भी बोलेंगे जो शायद "टीने की" या फिर "पीने की" पर आ रुके। खैर, ऐसा हुआ नहीं और पत्रकार लोग निराश हो गए। कईयों ने अपनी रपट में लिखा तो नहीं लेकिन मन ही मन जरूर सोचा होगा कि कैसा नेता है जो शेर भी पूरा नहीं करता? जो नेता पत्रकारों के सामने शेर पूरा नहीं कर सकता वह जनता को किया गया वादा कैसे निभाएगा? जो पत्रकारों का नहीं हुआ वह जनता का क्या होगा? अगर यही हाल रहा तो न ही पालिटिक्स मजबूत रहेगी और न ही सेकुलरिज्म। क्या होगा इस देश का? आखिर आज पॉलिटिक्स में शेर के अलावा बचा ही क्या है जिसे थाम के रक्खेगा ये नेता?

वैसे देखा जाय तो इसमें पत्रकारों की भी क्या गलती है? नेता कहीं भी जाता है तो शेर से लैस होकर जाता है। पार्लियामेंट में बजट पढ़ रहा है तो टैक्स का प्रपोजल देते हुए शेर दे मारता है। टैक्स रिबेट अबोलिस कर रहा है उसपर भी शेर बक डालता है। नया गठबंधन बना रहा होता है तो उसके जस्टिफिकेशन के सवाल को शेर मारकर धरासाई कर डालता है। किसी दूसरे नेता की प्रशंसा करना चाहता है तो उसपर शेर कुर्बान कर देता है। किसी नेता की बुराई करनी हो तब भी एक शेर पिला देता है। संसद में घोटाले की बात होती है तो उसका जवाब शेर से देता है। स्कैम पर शेर, कैम पर शेर।

उधर विपक्ष का नेता भी शेर का जवाब देने के लिए शेर ठोंक देता है। प्रेस कांफ्रेंस की शुरुआत शेर से करता है। प्रेस कांफ्रेंस के बीच में शेर भर देता है। प्रेस कांफ्रेंस का अंत शेर से कर देता है। पिछले कई वर्षों से शेर ही भारतीय नेताओं का कवच-कुंडल बना हुआ है।

कुल मिलकर कहा जा सकता है कि फिलहाल भारतीय राजनीति का शेरकाल चल रहा है।

कई बार सोचता हूँ कि मंत्री जी संसद में प्रश्नकाल के लिए तैयारी करते हुए अपने पीए से बोलते होंगे; "अरे भाई, आज संसद में सड़क घोटाले पर प्रश्न का जवाब देना है। आंकड़ों के साथ शेर वाले पेज रक्खे या नहीं?"

पीए बोलेगा; "सर, मैंने ग़ालिब के तीन शेर चुने थे। आप उन्हें देख लेते तो ठीक रहता। अगर आपको पसंद न हों तो फिर मीर के शेर चुनकर रख देता। मैं मीर का दीवान साथ ही लाया हूँ। कोई टेंशन की बात नहीं है, बस मुझे पंद्रह मिनट लगेंगे।"

पीए की बात सुनकर मंत्री जी कहेंगे; "अरे, ये मीर और ग़ालिब के शेर समझने में मुश्किल होती है। ऐसा शेर दो जो मुझे भी समझ में आये और विपक्षी सांसद को भी।"

पीए बोलेगा; "सर, फिर तो मेरा सुझाव है कि बशीर बद्र साहब के शेर इसके लिए उपयुक्त रहेंगे। उनका लिखा समझ में आ जाता है। अपने शेर सलाहकार राशिद साहब भी यही कह रहे थे।"

मंत्री जी हाँ कर देंगे और पीए नए शेर चुनने निकल जाएगा। यह हिदायत देते हुए कि; "सर, आप पिछले दो प्रश्नकाल के दौरान "मैं तो दरिया हूँ मुझे अपना हुनर मालूम है, जिस तरफ से चल पडूँगा रास्ता हो जायेगा" कह चुके है। इसलिए इसको इसबार मत कहियेगा क्योंकि अमर सिंह ये दो लाइनें इतनी बार बोल चुके हैं कि कुछ लोग समझते हैं कि ये उन्ही का शेर है।"

हाल यह है कि प्रधानमंत्री, मंत्री और सांसद ही नहीं, राजनीतिक दलों के प्रवक्ता भी जब-तब शेर ठेलते रहते हैं। कोई सी एम पार्टी अध्यक्ष से नाराज है या नहीं इसका जवाब शेर से देते हैं। सी एम के ऊपर अध्यक्ष का हाथ है या नहीं, इस सवाल का जवाब भी शेर में ही दिया जाता है। पार्टी के भीष्मपितामह कोप भवन में हैं या शरशैय्या पर, यह बताने के लिए शेर का इस्तेमाल किया जाता है। और सी एम को अमेरिकी वीजा की जरूरत है या नहीं यह बताने के लिए भी शेर ही ठोंका जाता है। मुझे तो लगता है की पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में कुछ इस तरह की बातें होती होंगी;

अध्यक्ष; "देखिये, उनको प्रवक्ता बनाने के आपके प्रस्ताव से मैं सहमत हूँ लेकिन मेरे लिए यह जानना जरूरी है कि उनका शायरी और गजलों का ज्ञान कैसा है?"

महासचिव; "अध्यक्ष जी, उनका शायरी और ग़ज़लों का ज्ञान कमाल का है। अभी हाल ही में एक टीवी पैनल डिस्कशन में उन्होंने विपक्षी प्रवक्ता को ऐसे-ऐसे शेर खींच कर मारे कि मैं भी हथप्रभ रह गया। यह सोचते हुए कि ये बिजनेसमैन होते हुए भी इतना टाइम कब निकाल पाए कि ऐसे-ऐसे शेर याद कर लिया? माने इनकी शेरो शायरी का टैलेंट देखकर एंकर की भी बोलती बंद हो गई थी।"

अध्यक्ष; "फिर तो ये कमाल के प्रवक्ता साबित होंगे। आखिर एक प्रवक्ता को और किस चीज का ज्ञान चाहिए? ग़ज़लों और शेरो का ज्ञान ही सबसे उत्तम ज्ञान है।"

अध्यक्ष जी उनको पार्टी प्रवक्ता बना देंगे।

हालात ऐसे हैं कि आनेवाले समय में पार्टियों की प्राइमरी मेम्बरशिप देते हुए पार्टी की सारी कवायद इसबात पर टिकी होगी कि मेंबर का कविताओं और ग़ज़लों का ज्ञान कैसा है? इस ज्ञान को जांचने परखने के लिए पार्टियाँ समय-समय पर ग़ज़ल ऑडिशन करवाएंगी। उसके लिए पार्टी के मेंबर दिनों तक ग़ज़लों और कविताओं की किताबें रटेंगे। हर मौके के लिए चुनचुन कर शेर नोट करेंगे और रात-रात भर उन्हें याद करेंगे ताकि पार्टी नेताओं को खुश किया जा सके। उधर नेता खुश हुआ और इधर मेंबर का प्रवक्ता बनना तय।

पार्टियाँ अपने-अपने कार्यालय में नए-नए शायर रिक्रूट करेंगी ताकि जिन सदस्यों को मीर, ग़ालिब, जौक वगैरह के शेर समझ में नहीं आते उन्हें उनका मतलब समझाया जा सके। मंत्री, सांसद और महासचिवों के लिए कम्पलसरी हो जायेगा कि सीनियोरिटी को ध्यान में रखते हुए वे जब भी कोट करें किसी बड़े शायर के शेर ही कोट करें। अगर भूल से भी वे कम मशहूर शायरों के शेर कहें तो उन्हें अगली कार्यकारिणी में वार्निंग दे दी जाएगी कि अगर वे दूसरी बार ऐसा करेंगे तो अप्रेजल के समय इसबात को ध्यान में रखते हुए उन्हें डिमोट भी किया जा सकता है। वहीँ अगर छोटा नेता बड़े शायरों के शेर कोट करेगा तो चाहे वे शेर उसकी समझ कें आये या न आये, उसके इस कृत्य को अप्रेजल के समय ध्यान में रखा जाएगा और अगर उसके ग्रहों का संयोग ठीक रहा तो उसे प्रमोशन भी दिया जायेगा।

अगर कोई प्रवक्ता या नेता प्रेस कांफ्रेंस में या टीवी पैनल डिस्कशन में शेर को गलत ढंग से पढ़ेगा तो पार्टी उपाध्यक्ष को अधिकार रहेगा की वह उस प्रवक्ता या नेता को मेमो इश्यू करे और उससे जबाब-तलब करे। बड़े मजेदार दृश्य दिखाई देंगे। जैसे;

उपाध्यक्ष; "ये क्या सुन रहा हूँ मैं? कल आपने प्रेस कांफ्रेंस में शेर पढ़ते हुए गलती कर दी?"

प्रवक्ता; "वो क्या था कि गलती हो गई।"

उपाध्यक्ष; "इस तरह की गलती की अपेक्षा आपसे नहीं थी मुझे। आपको पता है कि पूरा मीडिया हंसी उड़ा रहा है। आपकी भी और पार्टी की भी।"

प्रवक्ता; "दरअसल वो शेर पढने से पहले पत्रकार ने कोल स्कैम की बाबत सवाल पूछा और उसमें कानूनमंत्री को दोषी साबित करने की कोशिश की, इसलिए मुझे गुस्सा आ गया। आप तो जानते ही हैं कि विज्ञान ने भी साबित कर दिया है कि गुस्से में मनुष्य का दिमागी संतुलन खराब हो जाता है। इसलिए मैं शेर पढ़ते हुए गलती कर बैठा।"

उपाध्यक्ष; "देखिये बहाने मत बनाइये। शेर कहना एक कला है। जब मैं कला की बात कर रहा हूँ तो आप विज्ञान की बातें कर के मुझे बहकाने की कोशिश न करें।"

प्रवक्ता; "मैं आपके सामने ऐसी धृष्टता कदापि नहीं कर सकता।"

उपाध्यक्ष; "पहले तो आप ऐसे शब्द न बोलें जो मुझे समझ में न आयें। और सबकुछ छोड़कर पहले मुझे धृष्टता और कदापि का मतलब समझाइये। वैसे आपसे गलती क्या हुई थी?"

प्रवक्ता; "वो दरअसल हुआ ऐसा कि माना कि तेरी दीद के काबिल नहीं हूँ मैं की जगह मैं माना कि तेरी ईद के काबिल नहीं हूँ मैं पढ़ गया।"

उपाध्यक्ष; "अरे तो यह तो छोटी से गलती थी। इसको आप संभाल नहीं पाए?"

प्रवक्ता; "मैंने कोशिश की थी कि ईद की बात करके इसे सेकुलरता का मोड़ दे दूँ लेकिन आप तो जानते ही हैं कि कई पत्रकार आजकल विरोधी पार्टी की तरफ से भी काम करने लगे हैं।"

उपाध्यक्ष प्रवक्ता को मेमो इश्यूं कर देगा जिसमें लिखा होगा; "आप मुझे एक सप्ताह के अन्दर जवाब दें कि प्रेस कांफ्रेंस में शेर को गलत ढंग से बोलने के लिए आपको सस्पेंड क्यों न किया जाय? जबतक आप जवाब नहीं देते, आपकी जगह माखनलाल जी पार्टी प्रवक्ता का काम करेंगे।"

कुल मिलाकर पूरी भारतीय राजनीति शेर-ओ-शायरी प्रधान होगी।

मोहल्ले के वे शायर जिन्हें मुशायरों में कोई नहीं सुनता और जिनके माँ-बाप उन्हें उठते-बैठते शायर बनने के नुकशान गिनाते रहते हैं वे राजनीतिक पार्टियों द्वारा रिक्रूट कर लिए जायेंगे। जाहिल जौनपुरी, नवाब आसनशोला और कट्टा कानपुरी को रोजगार मिल जाएगा। उन्हें सफल होने के लिए मोहल्ले के लोकल मुशायरों का मुंह नहीं ताकना पड़ेगा। अमेरिकी प्रेसिडेंशियल एलेक्शन में होने वाले डिबेट की तर्ज पर राजनीतिक पार्टियाँ शेर डिबेट करवाएंगी। पूरा भारत तुकबंदी की गिरफ्त में आ जायेगा।

लोकतंत्र को मजबूत करने का एक और रास्ता मिल जाएगा।

इस मौके पर आपको कट्टा कानपुरी के एक शेर के साथ छोड़ जाता हूँ। वे लिखते हैं;

जो चाहो कर बैठो स्कैम या घोटाला
क्यों डरना जब साथ है ये शेर-ओ-शायरी।

--कट्टा कानपुरी

Monday, June 17, 2013

नितीश कुमार जी की ट्विटर टाइमलाइन - Nitish Kumar's Twitter Timeline




नितीश कुमार जी अपनी पार्टी लेकर एन डी ए से कूच कर गए। कल शाम से ही लोग विश्लेषण किये जा रहे हैं। ऐसे में अगर नितीश बाबू की ट्विटर टाइमलाइन पर क्या बमचक मची है, वह आप बांचिये:

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नोट: और भी लोगों की ट्विटर टाइमलाइन बांच सकते हैं।

ममता बनर्जी की ट्विटर टाइमलाइन।

राष्ट्रपति चुनाव बमचक पर एक ट्विटर टाइमलाइन।

अरविन्द केजरीवाल की ट्विटर टाइमलाइन।

राहुल गांधी जी की पहली ट्विटर टाइमलाइन

Friday, April 26, 2013

फ़िल्मी प्रेम-प्रसंग में दिल ..




तमाम चीजें समाज का दर्पण होती हैं। किस काल में कौन सी चीज समाज का दर्पण हो, यह उस काल के समाज पर निर्भर करता है। प्राइमरी या मिडिल स्कूल के विद्यार्थी के लिए पहले साहित्य समाज का दर्पण होता था। अब नहीं है। साहित्यकार, आलोचक और प्रकाशक की तिकड़ी की भूमिका ने रहने नहीं दिया। कालांतर में समाज को और लोगों ने दर्पण दिया। एक तरफ सिनेमा वालों ने दिया तो दूसरी तरफ राजनीति वालों ने भी अपनी औकात के अनुसार समाज को दर्पण प्रदान किया। आगे चलकर क्रिकेट वालों ने भी इस दर्पण दान में अपनी भूमिका निभाई। उनके बाद तमाम माध्यम भी पीछे नहीं रहे।

पिछले कुछ वर्षों से अब यह काम हिंदी सिनेमा के गानों ने वापस अपने हाथ में ले लिया है। वे हर एक-दो महीनों में समाज को दर्पण थमाते रहते हैं। समाज इन गानों में अपनी छवि देखकर मस्त रहता है। आज से साठ-सत्तर वर्ष बाद अगर कोई शोध करने वाला इस विषय पर शोध करेगा तो बड़ी तन्मयता के साथ हमारे काल के गानों को आगे रखकर सिद्ध कर देगा कि इस काल का समाज कैसा था।

प्रेम में दिल के महत्व जैसे विषय पर काम करने वाले शोधार्थी के पास गानों की कमी कभी नहीं रहेगी।

जैसे नब्बे के दशक के गाने; "धीरे-धीरे आप मेरे दिल के मेहमां हो गए, पहले जान, फिर जान-ए-जान, फिर जान-ए-जाना हो गए" की चीर-फाड़ करते हुए लिखेगा; "इस गीत के बोल से साबित होता है कि इस काल का नायक अपनी नायिका को एकदम से दिल का मेहमां नहीं बनने देता था। वह इस काम को धीरे-धीरे करने में विश्वास रखता था। वह नायिका को पहले जान बनाता था, फिर जान-ए-जान और अंतिम स्टेप में ही जान-ए-जाना बनने देता था। इस काल का नायक 'लउ' एट फर्स्ट साईट में विश्वास नहीं रखता था। इस गीत से यह प्रमाण भी मिलता है कि प्रेम के तमाम चरणों में नायिका के लिए जान-ए-जाना सबसे महत्वपूर्ण पदवी होती थी। कुछ समाजशास्त्रियों का ऐसा मानना है कि इस काल का नायक चूंकि ज्यादातर नौकरीशुदा होता था इसलिए वह कंपनियों के एच आर डिपार्टमेंट द्वारा प्रतिपादित तरक्की के सिद्धांतों में विश्वास रखता था। कुछ एच आर एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर इस गाने के बोल को एक नौकरीशुदा इंसान के नौकरी में लगने से लेकर उसके प्रमोशन से तुलना की जाय तो जान की तुलना अप्वाइंटमेंट, जान-ए-जान होने की तुलना नौकरी के परमानेंट होने और जान-ए-जाना होने की तुलना असिस्टेंट मैनेजर बनने से की जा सकती है।

इस गीत की अपनी चीर-फाड़ को सही ठहराने के लिए वह उसी काल के गीत; "आँखों में बसे हो तुम, तुम्हें दिल में बसा लूंगा ...." का भी सहारा ले सकता है। वह आगे लिख सकता है; "इस गीत से इसे गाने वाले नायक के भी नौकरीशुदा होने के प्रमाण मिलते हैं। इस गीत में नायक अपनी नायिका को सूचना देते हुए बता रहा है कि नायिका फिलहाल आँखों में ही बसी है और दिल में बसने के लिए उसका प्रमोशन होना ज़रूरी है। वह कहना चाहता है कि नायिका एकदम से दिल में नहीं बस सकती। कि नायक की एच आर पॉलिसी के अनुसार नायिका का आँखों में बसी है याने उसे अभी केवल अप्वाइंटमेंट लेटर मिला है और कुछ महीनों बाद जब उसका अप्रेजल होगा और तब अगर नायक संतुष्ट हुआ तभी वह नायिका को दिल में बसने देगा।"

नायक और नायिका के गुणों में अंतर बताते समय शोधार्थी यह भी साबित कर सकता है कि नायिका चूंकि नौकरीशुदा कम ही होती थी इसलिए वह नायक फट से दिल में बसा लेती थी। अपनी इस थ्योरी के समर्थन में वह "दिल में तुझे बसा के, कर लूंगी मैं बंद आँखें ..." जैसे गीत का सहारा ले सकता है। वह यह साबित कर सकता है कि नायक ज्यादातर प्रेम में घुटे हुए रहते थे लिहाजा जहाँ नायिका अपने नायक को फट से दिल में बसाकर आँखें बंद कर लेती थी, वहीँ नायक पहले नायिका को आँखों में बसाता था और पूरी तरह से देखने परखने के बाद ही दिल में बसने देता था। "पल-पल दिल के पास तुम रहती हो" नामक गाने के बोल से साबित कर सकता है कि दिल में बसने से पहले नायक अपनी नायिका को दिल के पास बसाता था। नायक का यह स्वभाव उनदिनों उसके प्रेम में सावधानी बरतने की बात को पुख्ता करता है। इससे यह साबित होता है कि नायक लोग प्रेम में सावधानी रखते थे।

प्रेम में लिप्त नायक के जीवन में दिल का क्या महत्व रहता था इसबात पर प्रकाश डालते हुए शोधार्थी लिख सकता है; "प्रेम में गिरे नायक के दिल में झरोखा भी रहता था जिसमें वह यदाकदा नायिका को बिठाता था। प्रसिद्द गीत दिल के झरोखे में तुझको बिठाकर यादों को तेरी मैं दुल्हन बनाकर रखूँगा मैं दिल के पास ....गीत से यह प्रमाण मिलता है कि प्रेम में असफल नायक जब सत्य से समझौता कर लेता था तब वह नायिका को अपने दिल से निकाल कर दिल के झरोखे में बिठा देता था और नायिका को दुल्हन न बना पाने की स्थिति में उसकी यादों को ही दुल्हन बनाकर संतुष्ट हो लेता था। संतोषगति प्राप्त नायक के पास और कोई चारा नहीं होता था इसलिए वह नायिका को सूचना देते हुए बताता था कि नायिका को उदास होने की ज़रुरत नहीं है क्योंकि वह दुल्हन न बन सकी तो क्या हुआ, उसकी यादें तो नायक की दुल्हन बन ही सकती हैं।"

प्रेम में दिल के महत्व को समझाते हुए शोधार्थी लिख सकता है कि ; "दिल का हाल सुने दिलवाला ..." नामक गीत से इसबात का प्रमाण मिलता है कि उनदिनों हर दिल का कोई न कोई हाल होता था जिसको कोई दिलवाला ही सुनता था। अगर कोई किसी के दिल का हाल नहीं सुनता तो यह साबित हो जाता था कि हाल सुनाने वाले के पास तो दिल है लेकिन उसे न सुनने वाले के पास दिल नहीं है। वह आगे लिख सकता है; "हालांकि, इसबात का रिकॉर्ड नहीं मिलता कि बिना दिलवाले जिन्दा कैसे रहते थे? किसी वैज्ञानिक ने इसबात पर रिसर्च नहीं किया कि दिल का हाल न सुनने वाले दिलहीन इंसानों के शरीर में खून की आवाजाही कैसे होती थी?"

एक प्रश्न कि ; "जीवन में दिल ज्यादा महत्वपूर्ण है या जान?" पर शोधार्थी लिख सकता है; "तमाम गीतों की चीरफाड़ करने पर यह पता चला है कि प्रेम-प्रसंग में जान दिल से ज्यादा महत्वपूर्ण होती है। फिल्म उमराव जान के गीत 'दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिये ..' से यह बात साबित हो जाती है कि उनदिनों जान की कीमत दिल से ज्यादा होती थी। हाँ, यह मानना पड़ेगा कि हालाँकि जान दिल से कीमती होती थी लेकिन प्रेम में पागल नायिका वह भी देने के लिए तैयार रहती थी और उसके के लिए भी उसकी बहुत छोटी सी शर्त रहती थी। शर्त यह कि नायक बस एक बार उसका कहा मान ले तो उसे जान देने में कोई गुरेज़ नहीं है। इससे इस बात के प्रमाण भी मिलते हैं कि नायक लोग नायिकाओं की बड़ी मुश्किल से मानते थे। नब्बे के दशक के एक और गीत 'दिल क्या चीज़ है जानम अपनी जान तेरे नाम करता है ..' से भी यह बात साबित होती है कि प्रेम में लिप्त नायक जान के आगे दिल को कुछ नहीं समझता था और अपनी जान नायिका के नाम करने के लिए तत्पर रहता था। एक और गीत दिल, नज़र, जिगर क्या है, मैं तो तेरे लिए जान भी दे दूँ ...गीत से यह साबित होता है कि जान केवल दिल से ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं थी बल्कि नज़र और जिगर से भी ज्यादा महत्वपूर्ण होती थी और श्रेष्ठ प्रेम में जान देने को भी सबसे ऊंचा दर्ज दिया गया है।

नब्बे के दशक के ही एक और गीत 'मुझे नींद न आये मुझे चैन न आये, कोई जाए जरा ढूंढ के लाये न जाने कहाँ दिल खो गया , न जाने कहाँ दिल खो गया ..' को आगे रखकर शोधार्थी लिख सकता है; "इस गीत से नायक-नायिका के यदाकदा दिल खोने का प्रमाण मिलता है। साथ ही यह भी पता चलता है कि दिल खोने के बाद ये लोग पुलिस में रपट लिखाने की बजाय गाना गाते थे। इससे यह साबित हो जाता है कि भारतीय नायक या नायिका को जब नींद नहीं आती थी तो उन्हें फट से पता चल जाता था कि यह इनसोम्निया की समस्या नहीं है बल्कि ऐसा दिल खोने के कारण हुआ है। नीद या चैन न आने के बावजूद वे कभी डॉक्टर के पास नहीं जाते थे। उन्हें विश्वास रहता था कि दिल खो जाने की वजह से उपजी ऐसी स्थित में न तो डॉक्टर के पास जाने की जरूरत है न पुलिस के पास जाने की। इस समस्या को गाना गाकर सॉल्व किया जा सकता है क्योंकि गाने में ' कोई जाए जरा ढूंढ के लाये ' कहने से कोई न कोई दिल ढूंढ कर ला देगा और नींद न आने की समस्या सुलझ जायेगी।"

प्रेम-प्रसंग में दिल के महत्व की और जांच-पड़ताल करके शोधार्थी लिख सकता है; "शोध से हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि उनदिनों दिल दिए और लिए तो जाते ही थे, वे तोड़े भी जाते थे। एक प्रसिद्द गीत 'दिल के टुकड़े-टुकड़े करके मुस्कुराते चल दिए ...' से हम इस निष्कर्ष पर पहुँच सके। यह बात अलग है कि किसी ने इस बात पर कोई शोध नहीं किया कि दिल टूटने के बाद कैसी आवाज़ सुनाई देती थी? कई गीतों से ऐसे प्रमाण मिलते हैं कि अक्सर दिल टूटने का इलज़ाम नायिका के ऊपर मढ़ दिया जाता था लेकिन कुछ ऐसे केस भी हुए जब नायक ने खुद ही अपना दिल तोड़ लिया हो। जैसे एक गीत 'जिस दिल में बसा था प्यार तेरा उस दिल को कभी का तोड़ दिया ...' से यह पता चलता है कि कभी-कभी नायक खुद ही अपना दिल तोड़ लिया करता था। वैसे टूटने के बाद दिल के टुकड़े कैसे दिखाई देते थे इसबात पर कहीं कोई दस्तावेज़ नहीं मिलता। 'दिल ऐसा किसी ने मेरा तोड़ा बरबादी की तरफ ....' नामक गीत से यह प्रमाण मिलता है कि दिल टूट जाने के बाद आबादी की तरफ चलते रहने वाले नायक बर्बादी की तरफ मुड़ जाता था और अपना सत्यानाश कर लेता था।"

"दिल केवल टूटते ही नहीं थे, वे गाने भी गाते थे। 'हर दिल जो प्यार करेगा, वो गाना गायेगा ..' जैसे गीत से इसबात का पता चलता है कि केवल नायक प्यार नहीं करता था। किसी-किसी केस में दिल भी प्यार कर बैठता था और हर वो दिल जो प्यार कर बैठता था वह गाना भी गाता था। यह बात अलग है कि दिल के गाये गाने कैसे होते थे इस बात की कहीं चर्चा नहीं हुई है। इतिहास में कहीं इस बात का उल्लेख नहीं है कि मोहम्मद रफ़ी, लता मंगेशकर वगैरह अच्छा गाते थे या फिर दिल। वैसे कुछ फ़िल्मी इतिहास्यकारों का मानना है कि वैसे तो उन्होंने दिल को गाते हुए कभी नहीं सुना लेकिन उन्हें पूरा विश्वास है कि साबुत दिल की तो छोडें, टूटा हुआ दिल भी किसी अनु मालिक, शब्बीर कुमार, मोहम्मद अज़ीज़ या कुमार सानू से अच्छा गाता होगा। इतिहास्यकारों के इस निष्कर्ष पर पहुँचने से ऐसे गायकों के गायिकी के स्टार की बात भी सामने आती हैं। उनदिनों दिल गा सकता था या उससे आवाज़ आती थी, इसबात का प्रमाण 'दिल की आवाज़ भी सुन, मेरे फ़साने पे न जा ...' नामक गीत से मिलता है। नायक नायिका से नायिका नायक से अक्सर रिक्वेस्ट करते थे कि दोनों अपने माँ-बाप की बात सुनने की बजाय दिल की आवाज़ सुने तो प्रेम की वैतरणी पार करने में आसानी रहेगी।"

जहाँ दिल के गाने की बात साबित होती है वहीँ दिल के शायर होने की बात का भी पता चलता है। दिल आज शायर है, गम आज नगमा है ..गीत से पता चलता है कि दिल के अन्दर गाने का तो टैलेंट होता ही है, वह चाहे तो शायरी भी कर सकता है और गम को नगमों में परिवर्तित कर प्रेम में अपना योगदान दे सकता है।

कहीं-कहीं दिल के मंदिर होने की बात भी सामने आती हैं। जैसे 'दिल एक मंदिर है, प्यार की इसमें होती है पूजा, ये प्रीतम का घर है ...' गीत से ऐसा प्रतीत होता है कि नायिका का दिल के मंदिर होने में प्रगाढ़ विश्वास है। इसके पहले कि किसी के मन में यह प्रश्न उठे कि; अगर दिल मंदिर है तो उसमें कौन से भगवान् विराजमान हैं?; नायिका खुद ही गीत के आगे की पंक्तियों के माध्यम से इस बात का खुलासा कर देती है कि इस मंदिर में प्यार की पूजा होती है। दिल रुपी मंदिर अन्य मंदिरों से इस मामले में अलग है कि प्यार की पूजा में फूल, दीपक, घी, अगरबत्ती वगैरह के प्रयोग की ज़रुरत नहीं पड़ती। कुछ इतिहास्यकारों ने प्रीतम की पूजा की बात करके यह साबित करने की कोशिश की थी कि नायिका इस गीत के माध्यम से संगीतकार प्रीतम की पूजा करने की बात कर रही है लेकिन इस थ्योरी को यह प्रमाण देकर मार गिराया गया कि संगीतकार प्रीतम का जन्म उस समय नहीं हुआ था जब नायिका ने यह गीत गाय था।

दिल केवल टूटते नहीं थे। कुछ गीतों से पता चलता है कि दिल कहीं भी आ जा सकते थे। जैसे ऐ मेरे दिल कहीं और चल ...गीत से पता चलता है कि नायक जब कभी भी किसी एक जगह से बोर-सोर हो जाता था तो दिल को सजेस्ट करता था कि वह कहीं और चले। वह कहीं और चलेगा तभी नायक को भी उसके साथ नई जगह जाने का मौका मिलेगा और उसकी बोरियत दूर हो सकेगी। इस गीत में नायक दिल को उकसाते हुए उससे कहता है कि वह न सिर्फ कहीं और चले बल्कि कोई नया घर भी ढूंढ ले। कुछ इतिहास्यकारों का मानना है कि शायद नायक वन रूम किचेन में रहकर बोरियतगति को प्राप्त हो गया था और उससे निकलने का यही तरीका था कि वह दिल को उकसाए ताकि वह न सिर्फ खुद कोई नया घर ढूंढें बल्कि नायक को भी उपलब्ध करवाए। वैसे इतिहास्यकारों का एक ग्रुप यह भी मानता है कि नायक ऐसा करके दिल की मदद कर रहा था क्योंकि उसने अपने लिए गम की दुनियां का चुनाव तो कर लिया था लेकिन कालांतर में गम की उसी दुनियां से उसका दिल भर गया था। कुछ वैज्ञानिक ऐसा मानते हैं कि भरा हुआ दिल भारी होता है लिहाज भारी दिल के कहीं और जाने की बात वैज्ञानिक दृष्टिकोण से तर्कसंगत नहीं जान पड़ती।

टूटने और आने-जाने के अलावा दिल जलते भी थे। नायक द्वारा गाये गीत; 'दिल जलता है तो जलने दो ...' से यह बात सामने आती है कि नायक को इस बात से कोई गुरेज नहीं होता था कि उसका दिल जल रहा है? उसे इस बात की चिंता नहीं थी कि अगर अगर दिल जलने लगा तो हो सकता है आग उसके कुर्ते में भी लग जायेगी और कहीं उसको बीच बाज़ार सबसे सामने कुर्ता उतार फेंकना न पड़ जाए। कुछ इतिहास्यकारों ने इस गीत के बारे में अनुमान लगते हुए लिखा है कि शायद नायक के मित्र ने उसके दिल को जलते हुए देखा होगा और जब उसने बताया कि नायक का दिल जल रहा है तो बिंदास नायक ने उसको दो टूक कह दिया कि दिल जलता है तो जलने दो। ऐसे नायक को कालांतर में लोगों ने दिलजला कहकर पुकारना शुरू किया। इस गीत से प्रेरित होकर तमाम नायक खुद को दिलजले कहलाना पसंद करने लगे थे।

दिल में किसी के लिए प्यार-स्यार तो रहने की बात आम थी लेकिन आश्चर्य की बात यह कि कभी-कभी नायक के दिल में भंवरा भी रहता था। जैसे गीत 'दिल का भंवर करे पुकार, प्यार का राग सुनो, प्यार का राग सुनो रे ...' से प्रमाण मिलता है कि नायक के दिल में भंवरा रहता था और वह केवल प्यार का राग गाता था। उसे मालकौस, भीमपलासी, मल्हार वगैरह गाने में जरा भी दिलचस्पी नहीं थी। दिल में रहने वाला भंवर जब भी गाता प्यार का राग ही गाता था और नायक नायिका से कहता था कि वह प्यार का राग ही सुने और बाकी के रागों को अनसुना कर दे।

हो सकता है शोधार्थी आखिर में अपना शोधपत्र यह लिखते हुए खत्म करे कि ; "कालांतर में परिवर्तन ऐसा हुआ कि पहले के दिनों में दिल में रहने वाले नायक-नायिका को बाद में दिल में जगह नहीं मिल पाती थी। यही कारण है कि बाद के दिनों में नायिका ने इस बात से समझौता कर लिया कि नायक के दिल में जगह की कमी है। ऐसी स्थिति में उसे लगा कि चूंकि अन्दर बसना ईजी नहीं रहा इसलिए अगर नायक मुझे दिल में बसाने की जगह मेरी फोटो ही अपने सीने से लगा ले तो भी बहुत बड़ी बात होगी। ऐसे में उसने गाना शुरू किया; 'मेरे फोटो को सीने से यार चिपका ले सैयां फेविकोल से ....मैं तो कब से हूँ रेडी-तैयार पटा ले सैयां मिस्ड काल से ..." इस गीत से यह साबित होता है कि पहले नायक के दिल में बसने वाली और अपने दिल को मंदिर माननेवाली नायिका अब दिल कॉन्सस होने के बाजे ब्रांड कॉन्सस हो चुकी थी। वह अब इस बात से ही संतोष कर लेती थी कि नायक उसे दिल में बसाने की बजाय उसके फोटो को ही सीने से चिपका ले तो भी बहुत बड़ी बात होगी। हाँ, वह ब्रांड कॉन्सस ऐसी है कि किसी भी लोकल अढ़ेसिव ब्रांड से अपनी फोटो नहीं चिपकने देगी बल्कि यह साफ़ बता देना चाहती है कि अढ़ेसिव की बात पर केवल फेविकॉल ही .............................................................