Show me an example

Friday, August 27, 2010

एक और अपील का जादू




बात उनदिनों की है जब गणतांत्रिक देश की जनता को समझ में नहीं आ रहा था कि वह किस बात पर परेशान हो? मंहगाई की बात पर परेशान होना शुरू करती तो भ्रष्टाचार से न परेशान होने की बात पर हीन भावना से ग्रस्त हो जाती. सड़क के गड्ढों की बात पर परेशान होना शुरू करती कि कामनवेल्थ गेम्स में पैसों की हेरा-फेरी पर परेशान न हो पाने की बात खलने लगती. कामनवेल्थ गेम्स में हुई पैसों की हेरा-फेरी से परेशान होने के लिए कमर कस रही होती कि कोई पूछ बैठता; "नक्सली समस्या पर परेशान नहीं हुए? उसका नंबर कब आएगा?"

जनता की इस परेशानी को ध्यान में रखते हुए किसी तत्कालीन न्यूज चैनल के नारा सर्जक ने नारा भी लिख दिया था; "किस पर हो परेशान किसको दे फेंक, जनता एक और समस्याएं अनेक".

हाँ, उनदिनों टीवी न्यूज चैनल्स की चांदी थी. न्यूज चैनल वाले एक समस्या पर पैनल डिस्कशन करते और दूसरी पर चले जाते. फ़ॉलो-अप के लिए समय देने की ज़रुरत नहीं पड़ती.

एक दिन जनता के रूप में जन्मे किसी गुनी ने बताया कि सारी समस्याओं का जन्म एक ही समस्या से हुआ है और वह है भ्रष्टाचार. मतलब यह कि अगर भ्रष्टाचार को रोक लिया जाय तो बाकी समस्याएं अपने आप ख़त्म हो जायेंगी.

बस फिर क्या था. जनता का एक प्रतिनिधिमंडल प्रधानमंत्री के पास पहुँचा. वहाँ लोगों ने देखा कि प्रधानमंत्री एक एक्सेल शीट और पेंसिल लिए बैठे थे. वे बार-बार अपनी आँख बंद कर कुछ बुदबुदाते हुए पेंसिल को घुमाते और एक खाने पर रख देते. पेंसिल कभी ८.९ प्रतिशत पर बैठती तो कभी ८.७५ पर. कभी ९ प्रतिशत पर बैठती तो ८.६५ प्रतिशत पर.

प्रतिनिधमंडल के लोग प्रधानमंत्री का यह कार्यक्रम बड़े ध्यान से देख रहे थे. उनमें से एक ने अपने पास खड़े आदमी से धीरे से कहा; "शायद कोई टोटका कर रहे हैं."

उसकी बात सुनकर प्रतिनिधिमंडल में से ही एक विद्वान् बोला; "टोटका नहीं है यह. यह अर्थशास्त्र है. प्रधानमंत्री जी अगले क्वार्टर के लिए जीडीपी का फिगर फाइनल कर रहे हैं."

अभी वे बात कर ही रहे थे कि प्रधानमंत्री ने कहा; "हैं जी? आपलोग किसी काम से आये हैं? बताइए मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ?"

जनता में से ही एक नेता टाइप दिखने वाला व्यक्ति भाषण देने वाले अंदाज़ में बोला; "प्रधानमंत्री महोदय हम आज देश के हालात अच्छे नहीं हैं. समस्याओं की भरमार हो गई है. एक तरफ मंहगाई की समस्या है तो दूसरी तरफ आतंकवाद की. एक तरफ बाढ़ की समस्या है तो दूसरी तरफ नक्सलवाद की. एक तरफ....."

अभी वह बोल ही रहा था कि प्रधानमंत्री उसे टोंकते हुए बोले; "आप प्वाइंट की बात करें. समस्याएं हैं यह मुझसे बेहतर कौन जान सकता है? आपको मुझसे क्या काम है वह बताइए."

प्रधानमंत्री की बात सुनकर उस नेता टाइप आदमी ने हडबडाते हुए कहा; "महोदय हमने अपने अध्ययन से यह पता लगाया है कि देश की सारी समस्याओं की जड़ भ्रष्टाचार है. आप भ्रष्टाचार को रोक दें तो देश सुधर जाएगा."

उसकी बात सुनाकर प्रधानमंत्री बोले; "मैं क्या-क्या करूं? देश को ९ प्रतिशत की ग्रोथ दूँ या भ्रष्टाचार रोकूँ? मैं अपना समय ऐसी फालतू बातों में खर्च करूँगा तो ग्रोथ का क्या होगा? वैसे भी आप ९ प्रतिशत की ग्रोथ रेट पर खुश होइए. भ्रष्टाचार की बात क्यों करते हैं?"

उनकी बात सुनकर जनता में से एक और विद्वान बोला; "महोदय, आज देश की हर समस्या की जड़ है भ्रष्टाचार. यह बात मैंने कल ही टीवी पर होनेवाले पैनल डिस्कशन में एक विद्वान् के मुँह से सुनी. अगर आप भ्रष्टाचार को रोक दें तो भारत एक बार फिर से सोने की चिड़िया हो जाएगा. आपके ही सरकार के मंत्रीगण भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे हैं. टेलिकॉम मिनिस्ट्री को ही ले लें...."

प्रधानमंत्री ने उसे बीच में टोकते हुए कहा; "देखिये, मंत्रियों के खिलाफ भ्रष्टाचार का कोई सबूत नहीं है. मैंने अपने मंत्रियों से खुद पूछा था कि क्या वे भ्रष्टाचार में लिप्त हैं? उन्होंने बताया कि वे भ्रष्टाचार में लिप्त नहीं हैं. वैसे अगर आपको लगता है कि भ्रष्टाचार के बार में मुझे कुछ करना चाहिए तो ठीक है. मैं आज शाम को ही राष्ट्र को संबोधित करूँगा और अपील कर दूंगा कि जो लोग भी भ्रष्टाचार में लिप्त हैं तो तुरंत उसका त्याग कर दें."

उनकी बात सुनकर एक व्यक्ति बोला; "लेकिन सर, सरकार को कुछ कार्यवाई भी करनी चाहिए. छापे वगैरह मारने चाहिए. केवल अपील से क्या होनेवाला है?"

उसकी बात सुनकर प्रधानमंत्री बोले; " आपलोगों को अपील की ताकत का अंदाजा नहीं है. यह महात्मा गाँधी का देश है. जयप्रकाश नारायण का देश है. विनोबा भावे का देश है. यहाँ अपील से सबकुछ हो जाता है. अपील पर मुझे पूरा विश्वास है. मैंने कल ही कश्मीर में पत्थर फेंकने वालों से अपील की कि वे पत्थर फेंकना बंद कर दें. अभी हाल ही में मैंने नक्सली 'भाइयों' से अपील की कि वे हिंसा छोड़कर राष्ट्र की मुख्यधारा में लौट आयें."

"लेकिन सर...?" एक व्यक्ति फिर बोला.

"देखिये, मैं और कुछ नहीं कहूँगा. आप जाइए. मैं आज शाम को ही देश के तथाकथित भ्रष्टाचारियों से अपील कर दूंगा"; प्रधानमंत्री ने यह कहकर उन्हें विदा कर दिया.

शाम को राष्ट्र को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने भ्रष्टाचारियों से अपील कर दी. बोले; "लोग चाहे जो भी कहें परन्तु मुझे विश्वास नहीं होता कि हमारे देश में भ्रष्टाचार फैला है. विश्वास इसलिए नहीं होता क्योंकि देश में फैले भ्रष्टाचार का सबूत नहीं है. लेकिन फिर भी अगर कोई मंत्री, अफसर, दरोगा, क्लर्क वगैरह-वगैरह भ्रष्टाचार में लिप्त हो तो मैं उससे अपील करूँगा कि वह तुरंत उसे त्याग दे और सामान्य व्यवहार करें. ऐसा करने से देश की तरक्की होगी और हमारा देश फिर से महान हो जाएगा. यहाँ तक कि हम डबल डिजिट ग्रोथ भी अचीव कर सकते हैं."

दूसरे दिन पूरे देश में क्रान्ति हो गई. देश के हर शहर, हर जिले, हर ताल्लुके में लोगों ने भ्रष्टाचार त्याग दिया. मंत्री, अफसर, पुलिस, दरोगा, क्लर्क, चपरासी वगैरह वगैरह ने भ्रष्टाचार का त्याग कर दिया. हर महकमे में काम करने वालों ने घूस लेना बंद कर दिया. महानगर पालिका के सफाई इंस्पेक्टर से लेकर क्लर्क तक, सभी ने फैसला किया कि अब से वे घूस नहीं लेंगे. अब पी डब्ल्यू डी डिपार्टमेंट में भी घूस को घुसने की अनुमति नहीं थी. पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम के इंस्पेक्टर ने घूस लेने से मना करना शुरू कर दिया और राशन दूकान वालों को फाइन करना शुरू कर दिया. मिलावट की जांच करने वाले इंस्पेक्टर ने मिठाई की दूकानों से गिफ्ट में मिठाई लेना बंद कर दिया. ट्रैफिक कांस्टेबल ने अब पचास की पत्ती न लेकर रसीद काटना शुरू कर दिया. म्यूनिसिपल कारपोरेशन के क्लर्क ने जन्म प्रमाणपत्र अब बिना सौ रूपये लिए देना शुरू कर दिया.

देश में हाहाकार मच गया. एक तरफ जहाँ कुछ लोग खुश थे वहीँ दूसरी तरफ कुछ लोगों को यह शिकायत थी कि जब प्रधानमंत्री को यह मालूम था कि उनकी एक अपील से ऐसा जादू हो सकता था तो उन्होंने यही अपील पहले क्यों नहीं की? ऐसे लोगों को देखकर यही लगा कि कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनके सामने अगर सरकार अपना कलेजा निकालकर भी रख देगी तो भी उन्हें संतुष्टि नहीं होगी.

सरकारी महकमों में जगह-जगह नारों की तख्तियां लटक रही थीं जिनपर सरकारी कर्मचारियों ने लिखकर बता दिया था कि वे अब घूस नहीं लेंगे. म्यूनिसिपल कारपोरेशन के हर डिपार्टमेंट में कोई न कोई नारा लटक रहा था. जैसे जन्म-मृत्यु पंजीकरण विभाग की दीवार पर नारा लटक रहा था जिसमें लिखा था; "दिन भर में घूस के लिए अब नहीं कोई सत्र, बिना घूस के ही लीजिये जन्म-मृत्यु प्रमाणपत्र".

पी डब्लू डी में सड़कों के टेंडर जिस विभाग में खुलते थे वहाँ दीवार पर नारा लटक रहा था; "पूरे देश में होगी अब सड़क ही सड़क, अब हम नहीं सहेंगे घूस की तड़क-भड़क."

कुल मिलाकर कहा जा सकता था कि सरकार के सभी विभागों के कर्मचारियों ने अपनी भावनाओं को नारों में कैद करके लटका दिया था.

टीवी वाले हर शहर के सरकारी विभागों में होनेवाली चहल-पहल का लाइव कवरेज दिखा रहे थे. दिखाना बनता भी था. जब घूस का लेन-देन कार्यक्रम बंद हो ही चुका था तो छुपाने के लिए कुछ नहीं था. विदेशों के पत्रकार देश में होनेवाली इस क्रान्ति के बारे रपट ठेले जा रहे थे. ट्रांसपरेंसी इंटर्नेशनल के पदाधिकारी दंग थे. उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि एक अपील से ऐसा कुछ हो सकता है. कई विदेशी विश्वविद्यालयों ने अपने छात्रों को "गणतंत्र में भ्रष्टाचार की रोक-थाम" पर शोध और केस स्टडी के लिए यहाँ भेजना शुरू कर दिया.

सरकार के हर महकमे के कर्मचारी सड़कों पर नारे लगा रहे थे. जगह-जगह सम्मलेन हो रहे थे. वे नारे लगा रहे थे कि देश में होगा शिष्टाचार, नहीं बचेगा भ्रष्टाचार....वगैरह-वगैरह. वे चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे थे कि हम अब घूस नहीं लेंगे...नहीं लेंगे-नहीं लेंगे.

बिना घूस के चलते हुए गणतंत्र को अभी बीस-पच्चीस दिन हुए थे कि अचानक पता चला कि सभी महकमों में जनता और सरकारी कर्मचारियों के बीच तू-तू मैं-मैं होना शुरू हो गया. एक-दो दिन तो मामला केवल कह-सुनी तक अटका रहा लेकिन तीसरे दिन जब सरकारी कर्मचारी घूस और भ्रष्टाचार विरोधी नारे लगाते हुए सड़कों पर जा रहे थे तो जनता और उनके बीच मार-पीट हो गई.

जनता इस बात पर अड़ी थी कि सरकारी कर्मचारियों को घूस लेना ही पड़ेगा वहीँ महकमों के कर्मचारी इस बात अड़े थे कि चाहे जो हो जाए वे घूस नहीं लेंगे. वे जनता से कह रहे थे; "तुम्ही लोगों ने तो कहा कि हम घूस न लें और अब जब हम नहीं ले रहे हैं तो क्यों परेशान हो रहे हो?"

जनता में से भी कुछ लोगों ने सड़क पर नारे लगाने शुरू कर दिया. वे चिल्ला रहे थे; "घूस न लेने का यह निर्णय नहीं सहेंगे-नहीं सहेंगे..."

नारेबाजी हो ही रही थी कि दोनों तरफ के अति उत्साही तत्वों ने एक-दूसरे के ऊपर हमला कर दिया. टीवी वाले, रेडिओ वाले, देसी पत्रकार, विदेशी पत्रकार सब दंग थे कि यह क्या हो रहा है? किसी को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था कि एक गणतंत्र की जनता इस बात पर अड़ी है कि भ्रष्टाचार करने वालों को सुधरने नहीं देंगे. मार-पीट इतनी बढ़ गई कि शहरों में कर्फ्यू लग गया.

दूसरे दिन जनता का एक प्रतिनिधिमंडल प्रधानमंत्री से मिला. जनता ने प्रधानमंत्री से रिक्वेस्ट किया कि वे अपनी अपील वापस ले लें. जब प्रधानमंत्री ने कारण जानना चाहा तो प्रतिनिधिमंडल के नेता ने कहा; "सर, आपने अपील क्या की हमारी जान की तो आफत आ गई. घूस न लेने के कारण सभी महकमों में इतना नियमपूर्वक काम हो रहा है कि हम नियम के सामने टिक नहीं पा रहे. सड़कें नहीं बन रही हैं क्योंकि सड़कों के लिए निकलनेवाले टेंडर की शर्तें कोई भी ठेकेदार पूरी नहीं कर पा रहा. फ़ूड इंस्पेक्टर ने घूस लेना बंद कर दिया है इसलिए मिठाई दूकानदारों की शामत आ गई है. अब वे न तो बासी मिठाइयाँ बेंच पा रहे हैं और न ही नकली मावा यूज कर पा रहे हैं. इनकम टैक्स अफसर नियम के हिसाब से चल रहा है तो जनता के लोग टैक्स की चोरी नहीं कर पा रहे हैं. सेल्स टैक्स वाले नियम पालन के लिए जगह-जगह छापे मार रहे हैं. ऐसे में तो जनता का जीना ही मुश्किल हो जाएगा. और तो और न जाने कितनी गाड़ियाँ मोटर वेहिकिल वालों ने जब्त कर ली हैं. ट्रैफिक पुलिस वाला......"

"बस-बस. मैं समझ गया. मुझे नहीं पता था कि मेरी एक अपील की वजह से इतना बड़ा बवाल हो जाएगा"; प्रधानमंत्री ने उनसे कहा.

नेता बोला; "सर, हमने भ्रष्टाचार को रोकने के लिए आपसे जो रिक्वेस्ट किया उसके लिए हम आपसे क्षमा मांगते हैं. आप कुछ कीजिये जिससे स्थिति पहले जैसे हो जाए और देश एक बार फिर से प्रगति की राह पर चल निकले."

प्रधानमंत्री ने उन्हें आश्वासन दिया कि वे जल्द ही स्थिति पहले जैसी कर देंगे.

दूसरे दिन उन्होंने देशवासियों से अपील करते हुए कहा; "मैंने आप सब से सामान्य व्यवहार करने की अपील की थी. घूस न लेना कोई सामान्य व्यवहार थोड़ी न है. मैं आपसब से अपील करता हूँ कि आप सब पहले जैसे हो जाएँ और देश को प्रगति की राह पर आगे ले जाएँ."

दूसरे दिन फिर सब पहले जैसा हो गया और देश प्रगति की राह पर दौड़ने लगा...

नोट: यह लेख परसाई जी के लेख एक अपील का जादू का नया संस्करण हैं. लेख के 'आइडिये'की मौलिकता पर मेरा कोई दावा नहीं है. परसाई जी का लेख पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक कर सकते हैं.

Monday, August 23, 2010

The Rozabal Line (द रोज़ाबल लाइन)




किताब पढ़ना शुरू ही किया था और मैंने आश्विन से पूछा; "आश्विन, आपको नहीं लगता कि एक कश्मीरी के लिए राशिद-बिन-इशार थोड़ा कम कश्मीरी नाम है?"

मेरी बात पर उन्होंने हँस कर कहा; "मैं मानता हूँ लेकिन क्या तुमने पूरी किताब पढ़ी? पूरी पढ़ोगे तो पता चलेगा कि हर नाम के पीछे एक कारण है."

मैंने उनसे कहा; "मुझे पूरी किताब पढ़े बिना यह स्ट्युपिड सवाल नहीं पूछना चाहिए था."

मेरी इस बात पर उन्होंने कहा; "कोई सवाल स्ट्युपिड नहीं होता."

शायद उनके कहने का मतलब था सवाल स्ट्युपिड नहीं होता हाँ, आदमी होता है.

खैर, उसके बाद मैंने किताब पढ़ी. मेरे साथ ऐसा पहली बार हुआ कि किसी फिक्शन को पढ़ते हुए मैं जैसे-जैसे आगे बढ़ता मुझे लगता कि किताब में जो कुछ लिखा हुआ है वह अगले एक-दो साल में होकर रहेगा. अगले एक-दो साल की बात इसलिए क्योंकि किताब की कहानी का समय साल २०१२ है और जहाँ तक उसमें लिखी गई बातों के सच होने की बात है तो वह इसलिए कि अश्विन सांघी की स्टोरी टेलिंग ही ऐसी है.

अब मैं आपको किताब का नाम बताता हूँ. किताब का नाम है The Rozabal Line (द रोज़ाबल लाइन) और इसके लेखक हैं अश्विन सांघी. मैंने डैन ब्राउन की प्रसिद्द किताब The Da Vinci Code (द डा विंची कोड) तो नहीं पढ़ी लेकिन जिनलोगों ने दोनों किताबें पढ़ी हैं उनमें से बहुत से लोगों का कहना है कि अश्विन सांघी की यह किताब डैन ब्राऊन की किताब से ज्यादा पेंचीदा और डरावनी है.

और हो भी क्यों न? जरा सोचिये. पाँच हज़ार सालों के इतिहास को तथ्यपरक तरीके से रखना और उसके साथ एक ऐसी कहानी को जोड़ देना जिसे पढ़कर पाठक को लगे कि जिस फिक्शन को किताब में नैरेट किया गया है वह किसी भी ऐंगेल से फिक्शन नहीं है. अगर पाठक को यह लगने लगे कि अगले दो साल में वह सबकुछ सच होनेवाला है जो उपन्यास में लिखा गया है तो यह लेखक और उसकी स्टोरी टेलिंग की सफलता है.

उपन्यास है ईशा मसीह के बारे में.

ईशा मसीह के बारे में हम जितना जानते हैं क्या वह पूरा है? किताब न केवल यह सवाल उठाती है बल्कि तथ्यों को आगे रखते हुए यह बताती भी है कि ईशा के बारे में हम जितना जानते हैं, या कह सकते हैं जितना बताया गया है वह पूरा नहीं है. ईशा की मृत्यु सूली पर नहीं हुई थी यह तो हम सभी जानते हैं लेकिन उनका फिर से जिन्दा हो जाना उस धार्मिक कथा का हिस्सा है जिसे सुनाकर ईशा मसीह को भगवान साबित किया गया है.

लेकिन क्या कहानी यहीं तक है?

शायद नहीं. यह किताब हमें आगे की कहानी बताती है. ऐसा नहीं है कि ईशा के बारे में आगे की कहानी सुनाने वाली यह अकेली किताब है. तमाम और किताबें लिखी गई हैं. हाँ, उन किताबों और इस किताब के बीच अंतर है. जहाँ और किताबें केवल इतिहास के परिप्रेक्ष्य में लिखी गई हैं वहीँ अश्विन की यह किताब इतिहास के साथ एक फिक्शन को बड़े करीने से जोड़ देती है. कितने लोगों को पता है कि सूली पर चढ़ने और वहाँ से बचने के बाद ईशा मसीह भारत आ गए थे? भारत आने के बाद वे कश्मीर में रहे? कश्मीर में ही उन्होंने अपना बाकी जीवन बिताया और वहीँ उनकी मृत्यु भी हुई? कश्मीर के श्रीनगर में उनकी समाधि है? रोज़ाबल उसी समाधि को कहते हैं?

मुझे तो नहीं पता था. यह अलग बात है कि इसके ऊपर तमाम लेखकों और विद्वानों ने शोधपूर्ण तरीके से किताबें लिखी हैं. न जाने ऐसी कितनी किताबों और घटनाओं का जिक्र करते हुए आश्विन ने अपना यह उपन्यास लिखा है. वह भी अद्भुत तरीके से.

कल्पना कीजिये कि आप एक कहानी पढ़ रहे हैं जिसका समय साल २०१२ है. आप पढ़ रहे हैं उस समय में होनेवाली एक साजिश के बारे में और अचानक लेखक आपको ईशा पूर्व ७६५ ईसवी में ले जाता है. सोचिये कि एक कहानी साल २०१२ में अमेरिका के एक नगर में चल रही हो और अचानक लेखक आपको ईशा पूर्व ३१२७ में भारत के मथुरा में ले जाता है और बताता है कृष्ण का जन्म ईशा पूर्व ३१२७ में १३-१४ जुलाई को हुआ था. एक कालखंड से दूसरे में पहुँच जाने को अगर हम सफ़र मान लें तो हर सफ़र की दूरी तय करते हुए आप कन्विंश होते रहेंगे कि अगर तीन हज़ार वर्ष पहले नहीं जाते तो साल २०१२ में जो कहानी चल रही है उसे ठीक से समझ ही न पाते. जरा सोचिये कि लेखक साल २०१२ में होने वाली एक आतंकवादी साजिश को नैरेट कर रहा है और उसी समय वह आपको ईशा के साल २९ में ले जाता है. क्यों? केवल इसलिए नहीं कि इतिहास खुद को दोहराता है बल्कि इसलिए भी कि आज की कहानी लगभग दो हज़ार साल पहले की कहानी से जुडी हुई है.

कहानी आज की दुनियाँ के बारे में है. एक आम इंसान होने के नाते और अपने जीवन की तमाम मुश्किलों में उलझे रहने के कारण हमें यह सोचने का समय नहीं मिलता कि हम जिस दुनियाँ में रहते हैं उसे कौन कण्ट्रोल कर रहा है? उस दुनियाँ पर अपरोक्ष रूप से राज करने के लिए कौन से लोग और संस्थाएं सक्रिय हैं? सोवियत संघ के विघटन के बाद 'न्यू वर्ल्ड ऑर्डर' क्या वैसा ही है जैसा दिखाई देता है? शायद नहीं.

उपन्यास में एक तरफ है अमरीकियों द्वारा बनाई गई एक संस्था इल्यूमिनाटी है जिसमें दुनियाँ भर में तमाम क्षेत्रों के, जैसे राजनीति, उद्योग, विज्ञान, स्पोर्ट्स के लोग हैं जो दुनियाँ पर राज करना चाहते हैं और दूसरी तरफ वेटिकेन का एक सीक्रेट कल्ट है जो दुनियाँ भर में न केवल ईसाई धर्म का प्रचार करना चाहता है बल्कि बाइबिल में लिखी गई बातों को सच साबित करने पर तुला है. एक तरफ इल्यूमिनाटी आतंकवादियों को इसलिए सपोर्ट करता है जिससे तमाम और शक्तियों को कंट्रोल किया जा सके वहीँ ईसाई धर्म का प्रसार करने वाले आतंकवादियों को इसलिए सपोर्ट करते हैं जिससे बाइबिल में की गई भविष्यवाणियों को सच साबित किया जा सके.

माडर्न डे वर्ल्ड ऑर्डर कितना पेंचीदा है इस बात का अनुमान इससे लगाइए कि जिन लोगों के बारे में हम यह समझते हैं कि वे चर्च और वेटिकेन को सपोर्ट करते ही होंगे वही लोग आतंकवादियों को इसलिए सपोर्ट करते हैं ताकि वेटिकेन को कंट्रोल में रखा जा सके.

धर्म के प्रचार और प्रसार के लिए रोमन कैथोलिक्स द्वारा किये गए अत्याचार से इतिहास भरा पड़ा है. ईसाई धर्म के प्रचारकों ने बाहर से आकर न केवल हिन्दुओं और मुसलमानों के ग्रन्थ नष्ट किये, मंदिर और मस्जिद को तोड़ा बल्कि कपड़े और परिधान तक को बदल डाला. जिन लोगों ने विरोध किया उन्हें ख़त्म कर दिया गया. परन्तु धर्म के प्रचार/प्रसार के लिए उनदिनों किये गए किये अत्याचार ही सबसे घिनौने कृत्य थे? शायद नहीं.

धर्म के प्रचार/प्रसार में अत्याचार की शायद कोई लिमिट नहीं है.

उपन्यास की कहानी में तेरह लोगों का एक ग्रुप जो लश्कर-ए-तैयबा का ही एक ब्रांच है और जिसे लश्कर-ए-तलाश्तार के नाम से जाना जाता है वह वर्ष २०१२ के हर महीने में बड़ी आतंकवादी घटना को अंजाम देता है जो देखने से बाइबिल में की गई भविष्यवाणियों से मिलता है. लेकिन इन बड़ी आतंकवादी घटनाओं से भी बड़ी एक घटना होनेवाली है जिसके बारे में वेटिकेन के एक कार्डिनल को पता है. कार्डिनल वैलेरियो खुद वहाँ के एक सीक्रेट कल्ट का हेड है और वह आतंकवादियों को इसलिए सपोर्ट कर रहा है कि वे जो तबाही मचानेवाले हैं वह बाइबिल में की गई भविष्यवाणी से मिलती है. वहीँ दुनियाँ में और भी लोग हैं जिन्हें लश्कर-ए-तलाश्तार के लीडर की तलाश है.

उपन्यास पढ़ते-पढ़ते माडर्न डे वर्ल्ड ऑर्डर को समझा जा सकता है. आये दिन हम सुनते रहते हैं कि धार्मिक संस्थाएं तमाम देशों में पैसे के बल पर क्या-क्या करती रहती हैं. यहाँ तक की कई देशों की मीडिया से लेकर सामाजिक अनुष्ठानों पर भी अपरोक्ष रूप से उनका राज है. उपन्यास में ये सारी बातें बहुत अच्छी तरह से उभर कर आती हैं. पाँच महाद्वीपों में फैली कहानी, करीब पाँच हज़ार वर्षों का इतिहास लिए हुए. उपन्यास माडर्न डे वर्ल्ड ऑर्डर के सभी खिलाड़ियों के रोल को अद्भुत ढंग से सामने रखता है. कहानी में ओसामा बिन लादेन है तो अब्दुल कादिर खान भी हैं, अमेरिका के राष्ट्रपति हैं तो उत्तरी कोरिया का न्यूक्लीयर प्रोग्राम भी है, रूस के सीक्रेट सर्विस का एजेंट है तो इसराइल वाले भी हैं.

वही दूसरी तरफ इतिहास भी है. बारहवीं शताब्दी में मुसलमान योद्धा सलादीन है तो उसके कब्ज़े से येरुसलम को निकालने के लिए ईसाइयों द्वारा भेजा गया 'रिचर्ड, द लायनहार्ट' भी है. एक तरफ पाइथागोरस के प्रमेय के बारे में जिक्र है तो दूसरी तरफ उस भारतीय ऋषि का भी जिक्र है जिसने पाइथागोरस से पहले ही वह सिद्धांत दिया था. नास्त्रेदमस का जिक्र है तो माया सभ्यता का भी जिक्र है जिसके अनुसार साल २०१२ में दुनियाँ ख़त्म होनेवाली है. प्राचीन नागा राजाओं का जिक्र है तो दूसरी इस बात का जिक्र भी है कि ये नागा राजा और उनसे जुडी हुई बातें प्राचीन अमेरिकी कल्चर का भी हिस्सा थीं. मिडिल-ईस्ट में आज से तीन हज़ार वर्ष पहले कुछ अनुष्ठानों का जिक्र है जो हिंदु धर्म के अनुष्ठानों से मिलता-जुलता है. बौद्ध धर्म का और ईसाई धर्म में बौद्ध धर्म की तमाम पद्धतियों की बातें हैं.

पढ़ते हुए हम इस बात पर सोचने लगेंगे कि यशोदा, यशोधरा और यीशु जैसे ऐतिहासिक चरित्रों के नाम में समानता क्या महज एक संयोग है? ईशा मसीह के ऊपर बौद्ध धर्म का कितना प्रभाव था? मगध से मेरी मगद-लेन का कोई सम्बन्ध है? सेंट साराह जिन्हें साराह-ला-काली भी कहा जाता है, उनका सरस्वती, लक्ष्मी और काली से कोई सम्बन्ध है क्या? ईसाईयत में जिस स्टार को माना जाता है उसका हिंदु धर्म के स्वास्तिक से कोई सम्बन्ध है क्या?

किताब ऐसे ही न जाने कितने सवाल खड़ा करती है. जवाब भी देने की कोशिश करती है. लेकिन किताब का सबसे बड़ा आकर्षण है उसमें वर्णित फिक्शन. जबरदस्त तरीके का 'पाट-बायलर' है. एक पाठक के तौर मुझे तो यही समझ में आया. मैंने किताब की समीक्षा नहीं की है. मेरा लिटरेरी सेन्स वैसा नहीं है कि मैं इतनी बड़ी किताब की समीक्षा कर सकूँ. हाँ, एक पाठक की हैसियत से मुझे जो समझ में आया वह मैंने लिखा. समीक्षा का काम प्रोफेशनल क्रिटिक करते हैं.

कोई ज़रूरी नहीं कि मैं किताब के बारे में कुछ लिखूँ ही लेकिन पढ़कर मुझे इतनी प्रसन्नता हुई कि मैंने सोचा कि इसपर एक पोस्ट लिखी जाय. हाँ, यह बात मन में अवश्य आई कि तथाकथित हिंदी-पट्टी में विद्वान् तो बहुत बड़े-बड़े हैं जो इतिहास, भूगोल और यहाँ तक कि भाषा के बारे में हज़ार पृष्ठ रंग देते हैं लेकिन क्या आधुनिक दुनियाँ के बारे में इस तरह की किताब लिख सकते हैं?

अश्विन सांघी ने पहली बार यह किताब सन २००७ में शान हैगिंस के नाम से लिखी थी और एक अमेरिकी पब्लिशर ने पब्लिश की थी. बाद में वेस्टलैंड-टाटा ने २००८ में किताब को अश्विन संघी के नाम से पब्लिश की.अश्विन उद्योगपति हैं और येल यूनिवर्सिटी में पढ़े हैं. अश्विन सांघी और किताब के बारे में आप उनके ब्लॉग पर जाकर पढ़ सकते हैं.

Saturday, August 14, 2010

दुर्योधन की डायरी - पेज ११८८




बड़ा हंगामा मचा हुआ है. रोज टीवी चैनल पर कामनवेल्थ गेम्स के आयोजन के बारे में नए-नए खुलासे हो रहे हैं. कहीं स्टेडियम की छत टूट जा रही है तो कहीं स्टेडियम में बाथरूम नहीं है. कहीं टायलेट पेपर ४००० रूपये प्रति रोल के हिसाब से खरीदा गया है तो कहीं ट्रेडमिल का किराया ९ लाख रूपये है. कहीं कुर्सी का किराया ८००० रूपये है तो कहीं थाली का किराया साढ़े तीन हज़ार. भ्रष्टाचार का मुद्दा अलग और समय पर तैयारी न हो पाने की आशंका का मुद्दा अलग. सब अपनी-अपनी औकात के हिसाब से आरोप लगा रहे हैं. लोग अपनी-अपनी औकात के हिसाब से उसी आरोप का खंडन कर डाल रहे हैं.

अब मुझे समझ में नहीं आता कि इतनी हाय-तौबा क्यों? क्या यह आज से हो रहा है? युवराज दुर्योधन की डायरी के पेज ९०३ के हवाले से मैंने बताया था कि भारतीय ओलिम्पिक संघ के अध्यक्ष्य पद पर हमारे कलमाडी साहब का अप्वाइंटमेंट युवराज के पिताश्री यानि महाराज धृतराष्ट्र ने किया था. कलमाडी साहब द्वापर युग में भी अपने कारनामे दिखा चुके हैं. उन्होंने तब जो संस्कृति शुरू की थी वह आज तक चल रही है. उस संस्कृति की रक्षा के लिए वे जी-जान लगा देते हैं.

कलियुग में हम उनके कारनामों से रु-बरू तो होते ही रहते हैं आज मैं आपको बताता हूँ कि इन्होने द्वापर युग में क्या-क्या गुल खिलाये थे. क्या कहा आपने? आपको यकीन नहीं हो रहा है? मुझे मालूम था कि मेरी बात का यकीन नहीं होगा आपको. इसीलिए मैं दुर्योधन की डायरी का पेज ११८८ टाइप करके पब्लिश कर रहा हूँ. आपको ब्लॉगर पर विश्वास नहीं हो कोई बात नहीं लेकिन युवराज पर तो विश्वास करेंगे न? करेंगे क्यों नहीं? युवराज के ऊपर पूरा देश विश्वास करने के लिए तैयार है:-)
.....................................................................................


वही चिक-चिक, वही आरोप-प्रत्यारोप. वही भ्रष्टाचार के खुलासे. पता नहीं वह दिन कब आएगा जब राज-काज बिना भ्रष्टाचार के आरोपों के चलेगा? मैं कहता हूँ भ्रष्टाचार करो लेकिन ऐसा करो कि कोई आरोप न लगा पाए. ज़रुरत हो तो दो-चार विद्यालय खोलवा दूँ. यह शिक्षा देने के लिए कि भ्रष्टाचार करके उसकी चर्चा कैसे रोकी जाय?

अब क्या कहूँ इस कलमाडी को? पिताश्री और मामाश्री ने इसे कुल तेरह एक्टेंशन दिए परन्तु यह आजतक कोई काम ठीक से नहीं कर सका. गुरु द्रोण, चचा विदुर और पितामह तो इसे फिर से भारतीय ओलिम्पिक संघ का अध्यक्ष बनाने के खिलाफ थे ही, अब तो अश्वथामा तक इसके खिलाफ हो गया है. और हो भी क्यों न? बेचारा सात वर्षों से तीरंदाजी संघ का अध्यक्ष है. अब इतने समय तक एक खेल संघ के अध्यक्ष होने के नाते उसका भी तो कुछ हक़ बनता है. उसे भी तो मौका मिलना चाहिए था ओलिम्पिक संघ की अध्यक्षता का.

मामाश्री कुछ समझते ही नहीं और न ही पिताश्री. माडर्न पोलिटिकल बिहैवियर की समझ कब आएगी इन्हें?

पाँच वर्ष पहले कलमाडी की अध्यक्षता में बनी कमिटी ने हस्तिनापुर में राज्य-कुल खेल करवाने का ठेका लिया था. अब जाकर पता चल रहा है कि उसने राज्य-कुल खेलों को हस्तिनापुर लाने के लिए काशी, कैकेय, मगध और मत्स्य राज्यों के प्रतिनिधियों को घूस में स्वर्ण मुद्राएं बाटीं. मुझे याद है, जब चार वर्ष पहले दुशासन ने इससे खर्च का हिसाब माँगा तो इसने उल्टा-पुल्टा खर्च बताया था. ये तो अगर गुडगाँव टाइम्स के स्पेशल करेस्पांडेंट की स्टोरी न आती तो इसके बारे में भी पता नहीं चलता. ऊपर से इतना इन-एफिसियेंट है कि कुछ कर भी नहीं सका. मैं कहता हूँ किसी अखबार वाले के हाथ अगर कोई खबर लग ही गई तो खिला-पिला कर उसे सेट कर लेना चाहिए. पता नहीं कब सीखेगा ये? अगर ये ऐसा ही रहा तो अगले वर्ष अश्वथामा को ओलिम्पिक संघ का अध्यक्ष बनाना पड़ेगा.

और फिर खेल ले आये तो समय पर तैयारी तो करनी चाहिए थी. मुझे क्या मालूम नहीं है कि उल्टा-पुल्टा खर्च दिखाता है? मुझे सब पता है. मैं कहता हूँ भ्रष्टाचार करो, पैसा मारो, सब कुछ करो लेकिन समय पर तैयारी तो करो. केवल भ्रष्टाचार के आरोप हो तो राजमहल झेल भी ले लेकिन निकम्मेपन के आरोप को कैसे संभालें? पिछले एक वर्ष से हर महीने वादा करता आ रहा है कि अगले महीने तक तैयारी पूरी हो जायेगी अब केवल पंद्रह दिन रह गए हैं तो पता चल रहा है कि स्टेडियम नहीं बने. प्रतियोगियों के रहने की व्यवस्था नहीं हुई है. कहीं स्टेडियम बने भी हैं तो आधे-अधूरे.

रोज इसकी बर्खास्तगी की मांग उठती है. कभी जनता के प्रतिनिधियों से तो कभी अखबारों के संपादकों से. अब तो मुझे ये बड़ा बेचारा लगने लगा है. फंस गया है. वैसे भी ठीक है कि अखबार वाले और हस्तिनापुर वासी कलमाडी के पीछे पड़े हैं. इनलोगों की निगाह कलमाडी से हटकर और लोगों के ऊपर नहीं जाए, वही राजमहल और हमारे लिए ठीक है. आखिर जनता को क्या पता कि असली भ्रष्टाचार किसने किया है? सबसे ज्यादा पैसा किसने कमाया? एक-दो पत्रकार जनता का ध्यान कलमाडी के ऊपर से हटाने के लिए काम कर रहे थे. वो तो मैंने उन्हें साध लिया नहीं तो झमेला हो जाता.

दुशासन और जयद्रथ को क्या पता कि उनके चलते मुझे कितनी असुविधा होती है. ये तो अपना दुष्कर्म करके निकल जाते है बीयर पीने. असली झमेला तो मुझे ठीक करना पड़ता है न.पत्रकारों से लेकर बाकी लोगों को तो मुझे साधना पड़ता है. दुशासन को ही ले लो. जिस दूकान पर पान खाता है और जिसको इसने भरत श्री पुरस्कार दिलवा दिया था उसी पनवाड़ी को इसने राज्य-कुल खेलों में आनेवालों प्रतियोगियों के लिए भोजन सप्लाई करने का ठेका दिलवा दिया. मैं कहता हूँ सब ठीक है. आखिर कौन नहीं अपने चमचों के लिए कुछ करता है, लेकिन इस तरह से? एक खिलाड़ी के एक दिन के भोजन का खर्च आठ हज़ार स्वर्ण मुद्राएं? एक पान का खर्च एक हज़ार इक्यावन स्वर्ण मुद्राएं? ऐसा कहीं कोई करता है क्या? अरे खिलाड़ी सामान्य भोजन करेंगे या सोना खायेंगे? ये पनवाड़ी पान में बाकी के मसालों के साथ संजीवनी बूटी डालेगा क्या?

किसी कांट्रेक्ट से प्रोफिट मार्जिन की कोई लिमिट होती है कि नहीं?

जो नर्तकी अपने नृत्य से दुशासन का मनोरंजन करती है उसी को उसने राज्य-कुल खेलों के उद्घाटन समारोह में नृत्य के लिए बीस करोड़ स्वर्ण मुद्राएं देने के लिए हामी भर दी है. मैं पूछता हूँ यह ठीक है क्या? अगर किसी अखबार वाले को यह बात पता चल गई तो क्या होगा? मुझे उसको खिला-पिला कर चुप करना पड़ेगा. दुशासन और जयद्रथ का यह हाल है और उधर विकर्ण इन सब से आगे निकल गया है. खेलों के उपकरण वगैरह की खरीद का ठेका अपने मित्र मंडली को दे दिया है. कल कलमाडी खुद बता रहा था कि विकर्ण के ही कहने पर उसके मित्र ने प्रति धनुष आठ हज़ार स्वर्ण मुद्राएं चार्ज किया है. एक बाण की कीमत सोलह सौ स्वर्ण मुद्राएं हैं. एक लोहार जिसका पूरे वर्ष का टर्नओवर मुश्किल से तीन हज़ार स्वर्ण मुद्राएं हैं उसी को इनलोगों ने केवल भाला और तलवार की सप्लाई के लिए तीन करोड़ का ठेका दे दिया है.

चचा विदुर शिकायत कर रहे थे कि विकर्ण ने बैठने के लिए कुर्सी का ठेका एक ट्रेडर को इसलिए दिया है कि उसकी पुत्री के साथ उसका चक्कर चल रहा है. क्या कर रहे हैं ये लोग? मेरे भाई और जमाई की बात तो जाने दो, मेरी बहन भी कुछ कम नहीं है. अपनी सहेलियों को और उनके रिश्तेदारों को खुद उसने करीब आठ सौ करोड़ स्वर्ण मुद्राओं का कांट्रेक्ट दिया है. मैंने पूछ लिया तो बोली कि मुझे चिंता करने की ज़रुरत नहीं है, चालीस परसेंट तो वापस आ ही जाएगा.

एक बात माननी पड़ेगी. दुशाला भी अब राजमहल के लगभग सारे हथकंडे सीख चुकी है. मैं तो उसकी इफिसिएंसी देखकर बहुत खुश हूँ. कम से कम दुशासन और जयद्रथ से एफिसियेंट है जो खेल की तैयारियों का खुद जायजा लेने की एक्टिंग करती रहती है. पत्रकारों के साथ घूमती है और कुछ नहीं तो कम से उन्हें हर दूसरे दिन वादा तो कर डालती है कि बस अब तैयारी हो ही जायेगी. ये दुशासन और जयद्रथ तो केवल बीयर-पान करने, नृत्य देखने और पान खाने में अपना समय गुजारते हैं.

जो कुछ भी हो, अब कलमाडी को हटाने का दबाव बढ़ता जा रहा है. कल मामाश्री से कहा तो बोले कि; "तुम चिंता बहुत करते हो भांजे. सबकुछ मैनेज हो जाएगा. कलमाडी भी रहेगा और खेल भी होंगे."

आज मुझे समझ में आया कि उन्होंने कल क्यों कहा ऐसा? आज सुबह आये तो मदिरा पान करते हुए बोले; "चिंता की बात नहीं है प्रिय भांजे दुर्योधन. आज ही एक प्रेस कांफेरेंस कर डालो और हस्तिनापुर वासियों को बता दो कि राजमहल जल्द ही पितामह की अध्यक्षता में एक तीन सदस्यों वाली जाँच समिति अप्वाइंट करेगा जिसमें कृपाचार्य और गुरु द्रोण भी होंगे."

आगे बोले; "प्रेस कांफेरेंस करने से पहले दस-बीस पत्रकारों की एक प्राइवेट मीटिंग बुलाओ और उन्हें कुछ ईनाम वगैरह देकर यह बात फैला दो कि पितामह और कृपाचार्य जैसे ईमानदार लोग जांच करेंगे तो सबकुछ निकल कर बाहर आएगा ही आएगा."

खैर, कल सुबह ही पत्रकारों की एक प्राइवेट मीटिंग बुलाता हूँ. और शाम को प्रेस कांफेरेंस करता हूँ. मामाश्री आजतक तो फेल नहीं हुए तो इस बार भी फेल नहीं होंगे. मुझे पूरा विश्वास है कि जांच समिति और हर स्तर पर की जानेवाली बेशर्मी हमें इस मुश्किल से भी निकाल देगी.