पुरस्कार अगर विवादास्पद न हों तो उनका महत्व घट जाता है. जिन पुरस्कारों पर विवाद न हो, ऐसे पुरस्कारों को लेने से लोग कतराने लगे हैं. कोई संस्था अगर पुरस्कार देना चाहे तो उसे पहले यह स्योर करना पड़ेगा कि पुरस्कार की वजह से विवाद पैदा होंगे ही. अगर पुरस्कार देने वाले ऐसा करने में सक्षम नहीं हैं तो ऐसे पुरस्कारों को कोई हाथ नहीं लगाएगा.
परन्तु क्या ऐसी स्थिति हाल में बनी है? उत्तर है; "नहीं. ऐसा पांच हज़ार वर्षों से होता आया है."
क्या कहा आपने? विश्वास नहीं होता?
तो फिर हाथ कंगन को आरसी क्या...........? युवराज दुर्योधन की डायरी का यह पेज पढ़िए.
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फिर से वही किचकिच. फिर से वही झमेला. हर साल इस मौसम में एक न एक झमेला होता ही है. एक बार फिर से महाराज भरत पुरस्कारों पर विवाद हो गया. फिर से बयानबाजी. फिर से थू-थू. इस मौसम में हर साल अखबारों और टीवी न्यूज़ चैनलों को और कोई काम नहीं रहता. यह मौसम केवल भरत पुरस्कारों से उत्पन्न हुए विवादों के लिए रिजर्व रख छोड़ा है इन मीडिया वालों ने.
पिछले साल एक जन-नायक को भरत श्री से सम्मानित कर दिया गया था. बाद में पता चला कि वह तो हस्तिनापुर का नागरिक ही नहीं है. खोजबीन करने पर पता चला कि वह तो म्लेच्छ है. आर्यों के बीच में एक म्लेच्छ?
राजभवन की बड़ी छीछालेदर की थी इन मीडिया वालों ने. मीडिया वालों ने पूरे दो महीने मामले को गरमाए रखा. बाद में पता चला कि इस तथाकथित जननायक को जयद्रथ की वजह से 'भरत श्री' मिला था. पूछने पर जयद्रथ ने बताया कि एक बार इस आदमी ने आखेट के दौरान जयद्रथ के लिए नाच-गाने और मदिरा का प्रबंध किया था इसलिए जयद्रथ ने उसे जन-नायक बताकर 'भरत श्री' सम्मान दिलवा दिया था.
मैं कहता हूँ दिलवा दिया तो दिलवा दिया. इसमें क्या हाय-तौबा मचाना? एक ठो मानपत्र और शाल देने को लेकर इतना बड़ा झमेला खड़ा करना कहाँ की पत्रकारिता है?
इस साल एक बार फिर से वही झमेला. मामाश्री ने गंधार के एक व्यापारी को 'भरत भूषण' क्या दिलवा दिया पांडव और मीडिया वाले पीछे ही पड़ गए. कहते हैं इस व्यापारी के ऊपर हस्तिनापुर में कोर्ट केस चल रहा है फिर भी इसे भरत भूषण जैसे पुरस्कार से सम्मानित कर दिया गया. मैं कहता हूँ कोर्ट केस ही तो चल रहा है. व्यापारी को सजा तो नहीं हुई है न. ऐसे में उसे पुरस्कार क्यों न दिए जाएँ? व्यापारी भी कुछ गलत नहीं कह रहा. बता रहा था कि वह हमेशा उज्बेकिस्तान में हस्तिनापुर के इंटरेस्ट की बात करता है. पांडवों का कहना है कि यह व्यापारी पूरी तरह से दलाल है. मैं कहता हूँ पुरस्कार ही तो दिया है. थोड़े न हस्तिनापुर उठाकर इस व्यापारी को दे दिया गया है.
हर तरफ से राजमहल पर अटैक हो रहा है. मीडिया की तरफ से. पांडवों की तरफ से. बुद्धिजीवियों की तरफ से.
कई बुद्धिजीवी इस बात से नाराज़ हैं कि पिताश्री के केशसज्जा करने वाले को 'भरत श्री' से सम्मानित कर दिया गया. साथ ही पिताश्री के उदररोग की चिकित्सा करने वाले चिकित्सक को 'भरत भूषण' से नवाज़ा गया. मैं पूछता हूँ इसमें बुराई ही क्या है? पुरस्कार क्या पिताश्री से बड़े हैं?
कई लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि माताश्री की आँखों के लिए पट्टी की सिलाई करने वाले दरजी को कैसे 'भरत श्री' से नवाजा जा सकता है? एक पत्रकार ने अपने चैनल पर यह मुद्दा उठा रखा है कि दुशासन जिस पान दूकान पर पान खाता है उसके मालिक को व्यापार के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान के लिए 'भरत श्री' से सम्मानित कर दिया गया है और अपने नृत्य से जयद्रथ का मनोरंजन करने वाली नर्तकी को कला में उसके योगदान के लिए 'भरत श्री' प्रदान कर दिया गया है.
मैं कहता हूँ राजमहल का पुरस्कार है तो राजमहल की चमचागीरी करने वालों को नहीं मिलेगा तो क्या पांडवों की चमचागीरी करने वालों को मिलेगा? आखिर किसी न किसी को तो पुरस्कार देना ही है. इन्हें मिल गया तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ा?
और फिर ऐसा क्या पहली बार हुआ है? काका श्री पांडु ने भी तो उस चिकित्सक को 'भरत भूषण' से सम्मानित किया था जिसने उनके पाँव के छालों की चिकित्सा की थी.
हर साल वही-वही बातें. वही-वही पैनल डिस्कशन. फिर से वही मांगें कि इन पुरस्कारों के लिए चयन का नया सिद्धांत बनाया जाय. नए लोगों को कमिटी में रखा जाय. मैं कहता हूँ क्या करेंगे नए लोग कमिटी में आकर? वे अपनी राय ही तो दे सकते हैं. आखिर में पुरस्कृत लोगों की लिस्ट को मेरे हाथ के नीचे से ही तो गुजरना है. मैं जो चाहूँगा आखिर होना तो वही है. लेकिन ये बुद्धिजीवी, पत्रकार वगैरह कुछ समझते ही नहीं. सिस्टम को ठीक करने की डिमांड का नाटक करते रहते हैं.
एक तरह से देखा जाय तो ठीक ही है. ऐसे पैनल डिस्कशन से यह भ्रम बना रहता है कि हस्तिनापुर में सिस्टम को ठीक करने के बारे में सोचा जा रहा है. बातें की जा रही हैं तो एक दिन सिस्टम में बदलाव भी आएगा. एक टीवी चैनल ने तो पैनल डिस्कशन के लिए मुझे भी इनवाईट किया है. मैंने तो सोच लिया है कि टीवी पर सिस्टम में बदलाव की बातें बोलकर विवादों को एक साल के लिए शांत कर दूंगा. उसके बाद भी अगर मामला गरमाया रहा तो पितामह की अध्यक्षता में एक कमीशन का गठन करवा देना श्रेयस्कर रहेगा. एक बार कमीशन गठित हो गया तो फिर दस साल तो ऐसे ही खिंच जायेंगे.
वैसे भी पुरस्कार हैं तो विवाद है. विवाद न हो तो पुरस्कार दो कौड़ी का.
Thursday, January 28, 2010
दुर्योधन की डायरी - पेज १४०८
@mishrashiv I'm reading: दुर्योधन की डायरी - पेज १४०८Tweet this (ट्वीट करें)!
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दुर्योधन की डायरी
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19 comments:
अपने नृत्य से जयद्रथ का मनोरंजन करने वाली नर्तकी को कला में उसके योगदान के लिए 'भरत श्री' प्रदान कर दिया गया है.
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चित्र? बिना इस नर्तकी का चित्र लगाये यह ब्लॉग पोस्ट अधूरी है।
कितनी बार बताया कि चित्र वित्र ठेलना सीखो। सीखते ही नहीं! :-)
मुझे ये डायरी भी विवादास्पद लगती है. राजमहल से जुडी कुछ विवादास्पद घटनाये दुर्योधनजी बीच में ही खा जाते हैं. जैसे राजमहल के जमादार को मरणोपरांत पुरस्कार दिया जाना था पर ऐनवक्त पर उसका नाम हटाकर वहां झाड़ू लगाने वाली रामकटोरी का नाम पुरस्कार की सूचि में शामिल कर दिया गया था. ये किसकी सेटिंग थी आज तक इस पर कयास लगाये जा रहे हैं. लिखते समय ट्रांसपेरेंसी नहीं बरती गयी.
कीर्तिशजी ट्रांसपेरेंसी तो उतनी ही आएगी न जितनी दूर्योधन चाहेगा. बताया जाता है झाडूवाली ने कुछ सेवाएं दी थी. ऐसे कर्मठ लोगों का सम्मान होना ही चाहिए. साथ ही जितने लोगों का चयन हुआ है वह सब उचीत ही लग रहा है. विवाद तो पुरस्कार की पोप्युलारिटी दर्शाते है. हमने सॉरी दूर्योधन ने पुरस्कारों को उस स्तर तक पहुँचा दिया है कि अब हर कोई इसे पा सकता है, इसे पाने का सपना देख सकता है. इसे ही कहते है आम आदमी के लिए सोचना. पाण्डव समझते नहीं कहते है आम आदमी को रोटी चाहिए जबकि हम उसे पुरस्कार दे रहे है. मामुली बात है क्या?
वो ज्ञानजी की बात पर ध्यान दे कर नृतकी की फोटो.....हो जाती तो....
क्यों न डायरी की खोज के लिये आपको ही सम्मानित करा दिया जाये :)
लोग हर बात पर कहते हैं,समय बदल गया...देखो तो,यहाँ तो पांच हज़ार वर्ष में भी समय नहीं बदला....सबकुछ वैसे का वैसा है....
हेंस प्रूवड ... कर ही दिया तुमने....लाजवाब !!!
100 Number...
फोटो.....हो जाती तो....
दुर्योधन की डायरी अद्भुत है। हर समय की कथा इसमें मिल जाती है! बस समय डालो और समसामायिक किस्सा निकल आया! सुन्दर! क्या इसे नीलामी में लगायेंगे?
@अनूप जी
"क्या इसे नीलामी में लगायेंगे?"
अब दुर्योधन इस डायरी पर अपना क्लेम रखता तो नीलामी के बारे में सोचा जा सकता था. भले ही डायरी दुर्योधन की है लेकिन अब तो पूरी तरह से मेरे हाथ में है. आप भले ही इसे डायरी स्कवैटिंग कह लें लेकिन मुझे नीलामी के बारे में सोचने की ज़रुरत नहीं है....:-)
डायरी स्कवैटिंग !!! aap log yae sahii nahin kar rahey haen !!!! yae bhartiyae sanskriti aur sabhyataa nahin haen !!! aur blog parivaar mae paarivaarik daaiiri par sab kaa adhikaar haen !!! ghar tak ghis kar nikaal laatey haen log sab jaankari
इस रचना का सहज हास्य मन को गुदगुदा देता है। आपके पास हास्य चित्रण की कला है। बधाई स्वीकारें।
"मैं कहता हूँ राजमहल का पुरस्कार है तो राजमहल की चमचागीरी करने वालों को नहीं मिलेगा तो क्या पांडवों की चमचागीरी करने वालों को मिलेगा?" ये हुई ना बात.
और दुशासन जिस पान दूकान पर पान खाता है... वाह जी वाह !
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हा हा हा हा, हो हो हो हो,
मैं, यानी कौरवराज दुर्योधन ने सोच लिया है कि टीवी पर सिस्टम में बदलाव की बातें बोलकर विवादों को एक साल के लिए शांत कर दूंगा. उसके बाद भी अगर मामला गरमाया रहा तो पितामह की अध्यक्षता में एक कमीशन का गठन करवा देना श्रेयस्कर रहेगा। सोच रहा हूँ कि, मेरा यह डायरी लेखक भी मेरे मनोभावों को जस का तस टीप देता है अत: अगले साल 'भरत भूषण' इसे भी दे ही डालूँ।
भरत पुरस्कारों पर इतना ’भरत नट्यम’ तब भी होता था? तब तो ठीक है. प्राचीन परम्पराएं अभी जीवित हैं.
"विवाद न हो तो पुरस्कार दो कौड़ी का"
अहहहहः...आप ये ब्रम्ह वाक्य लिख कर अमर हो गए हैं...कितनी सच्ची बात कही है आपने...वाह...विवाद और पुरूस्कार का चोली दामन का साथ है...अब देखिये छबीस जनवरी को हुए गोस्वामी मेमोरियल क्रिकेट टूर्नामेंट में हमने सर्व श्रेष्ठ बैट्समैन का अवार्ड उसे दिया जो खेला ही नहीं...लेकिन हमने दिया उसे...खूब विवाद हुआ...हुआ करे...जिसे दिया उसने ही पवेलियन में बैठ कर चिल्ला चिल्ला कर खेल रहे बैट्समैन को बताया की लैग में मारो, ...अब आफ में मारो...अब डिफेंस करो...अब आगे बढ़ जाओ...अब चौका जड़ दो...अब छक्का मारो...और मजे की बात देखिये खेलने वाले बैट्समैन ने वैसा ही किया और मैच जिता दिया...अब अगर पवैलियन में बैठा व्यक्ति नहीं बताता तो बैट्समैन उस तरह खेल पाता जैसा वो खेला...तो ईनाम का हकदार कौन हुआ...पवैलियन में बैठा व्यक्ति ही ना...हमने सही उसे पुरुस्कृत किया लेकिन विवाद हो गया...खेलने वाले बैट्समैन ने पवैलियन वाले की गुस्से में पिटाई कर दी...कुल जमा इस बात का निष्कर्ष ये रहा की लोग खेलने वाले को भूल गए और पिटाई विवाद की बात याद रख घर आ गए...ये किस्सा अब साल भर तक चलेगा...
आप बहुत शाश्वत बात लिख दिए हैं...दुर्योधन गो लोक वासी हो गए हैं वर्ना हम उनकी पीठ जरूर हस्तिनापुर जा कर ठोक के आते...अब वो नहीं हैं तो आपकी पीठ ठोक देते हैं...अभी आभासी ठोकते हैं बात में मिलने पर व्यक्तिगत रूप से भी ठोकेंगे.( पीठ)
नीरज
यह व्यंग्य का असर है कि टिप्पणियाँ भी रसीली बन पड़ी है. :)
रोचक कटाक्ष।
YOUR WORK IS REAL SOCIAL WORK BY BLOG.I REQUEST HERE BY TO ALL GOVERNMENT MINISTER FOR READ YOUR BLOG.
THANKING YOU
YOUR JAI KUMAR JHA
आज ही पढ़ा भारत पुरस्कार के बारे में भी ...
गज़ब डायरी है ....पोल खोलू ...!
Very nice hilarious yet thoughtful
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