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Monday, January 4, 2010

ब्लॉगर हलकान 'विद्रोही' का राष्ट्रकवि 'दिनकर' के नाम पत्र


@mishrashiv I'm reading: ब्लॉगर हलकान 'विद्रोही' का राष्ट्रकवि 'दिनकर' के नाम पत्रTweet this (ट्वीट करें)!

अब तक यह जग-जाहिर हो गया है कि मेरी ब्लागिंग में मौलिक कुछ भी नहीं. जो कुछ भी मौलिकता है वह दूसरों की है. इंटरव्यू, डायरी, न्यूजपेपर की रपट वगैरह-वगैरह, मैं कहीं से उड़ाकर, कहीं से चोरी कर लाता हूँ और छाप देता हूँ. आप लोगों में से कुछ लोगों को भी आदत पड़ गई है यही सबकुछ पढ़ने की. तो ठीक है. तो आपकी आदत को सम्मान देते हुए मैं एक चिट्ठी छाप रहा हूँ. हलकान 'विद्रोही' जी ने यह चिट्ठी राष्ट्रकवि 'दिनकर' के नाम लिखी थी. शायद उन्होंने कभी सोचा नहीं होगा कि चिट्ठी को वे अपने ब्लॉग पर छापेंगे उससे पहले मेरे हाथ लग जायेगी. अब लग गई तो लग गई. मैं छाप दे रहा हूँ. आप बांचिये.

........................................................


आदरणीय स्वर्गीय राष्ट्रकवि दिनकर जी,

आप आज जीवित रहते तो चरण स्पर्श लिख देता. नहीं हैं तो वह कैसे लिखूँ? चलिए, आप जहाँ भी हों, मेरा मतलब चाहे जहाँ, वहीँ से मेरा चरण स्पर्श स्वीकार कर लें. ना मत कहियेगा, मैं सबका चरण स्पर्श नहीं करता. इस तरह से देखेंगे तो मैं आपके ऊपर एक तरह का एहसान कर रहा हूँ. हे राष्ट्रकवि, आपके मन में विचार उठ रहे होंगे कि मैं कौन? जाहिर है, कभी आप मुझसे मिले नहीं तो पहचानेगे कैसे? तो आपकी दुविधा दूर करते हुए मैं अपना परिचय खुद दे देता हूँ. मैं हलकान 'विद्रोही', मशहूर हिंदी चिट्ठाकार.

अब अगर आप सोच रहे होंगे कि यह चिट्ठी मैं आपको क्यों लिख रहा हूँ तो मैं वह भी बता देता हूँ. हे राष्ट्रकवि, यह चिट्ठी मैं इसलिए लिख रहा हूँ ताकि आपके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रेषित कर सकूँ. हे राष्ट्रकवि, मैं आपके प्रति बहुत कृतज्ञ हूँ. मेरे ऊपर आपका एहसान दिन प्रति दिन बढ़ता ही जा रहा है. एहसान के मामले में आपने काव्य रचकर किसी के ऊपर उतना एहसान नहीं किया जितना मेरे ऊपर केवल दो पंक्तियाँ लिख कर कर दिया.

हे राष्ट्रकवि, आपके तमाम खंड-काव्य, दंड-काव्य वगैरह पढ़कर भी लोग उतना खुश नहीं हुए होंगे जितना मैं आपकी लिखी दो पंक्तियाँ पढ़कर हूँ. अब आप सोच रहे होंगे कि मैं कौन सी दो पंक्तियों की बात कर रहा हूँ? तो सुनिए. हे राष्ट्रकवि, मैं निम्नलिखित दो पंक्तियों की बात कर रहा हूँ;

समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध


हे कवि शिरोमणि, वैसे तो आपने तमाम पद्य, गद्य, खंड-काव्य वगैरह लिखे हैं लेकिन मुझे लगता है कि ये दो पंक्तियाँ लिखने के बाद आपको और कुछ लिखने की ज़रुरत ही नहीं थी. क्या ज़रुरत थी रश्मिरथी या उर्वशी लिखने की? अब कुरुक्षेत्र आपने पहले लिख दिया था तो मैं उसका नाम नहीं ले रहा. परन्तु इतना ज़रूर कहूँगा उपरोक्त दो पंक्तियाँ लिखने के बाद अगर आप और कुछ नहीं भी लिखते तो चलता. आप ज़रूर सोच रहे होंगे कि मैं यह सब क्यों लिख रहा हूँ तो हे कवि शिरोमणि, सुनिए;

आपकी लिखी इन दो पंक्तियों की नींव पर ही मेरी ब्लागरी का मकान खड़ा हुआ है. हे राष्ट्रकवि, मैं ब्लॉगर कुछ अलग तरह का हूँ. आये दिन मैं अपने ब्लॉग पर बहस वगैरह करवाता रहता हूँ. मुझे याद है मैंने पहली बार अपने ब्लॉग पर बहस करवाई थी जिसका विषय था; ""ज्यादा मिठास किस में है? चीनी या गुड़ में?"

हे कवि शिरोमणि, मुझे आशा है कि आपको यह सुनकर आश्चर्य नहीं होगा कि महिला ब्लॉगर ने चीनी को मीठी बताया और पुरुष ब्लागरों ने गुड़ को. कुछ ब्लॉगर जो इस बहस को बेमानी और टुच्ची बहस मानकर चल रहे थे, उन्होंने तटस्थ रहने का संकल्प लिया. मुझे इन ब्लॉगर की बात ज़रा भी अच्छी नहीं लगी क्योंकि मैं चाहता था कि जैसे मैं गुड़ को ज्यादा मीठा मानकर चलता हूँ उसी तरह से ये 'तटस्थ' ब्लॉगर भी गुड़ को ही मीठा बताएं. मैं अपनी बात कैसे कहूँ यही सोच रहा था कि मेरे एक मित्र चिट्ठाकार ने आपकी इन दो पंक्तियों की और ध्यान दिलाया. मैंने ये दो पंक्तियाँ पढ़ी और उसे कमेन्ट में अपनी पोस्ट पर डाल दिया. तब से मैं आपकी इन दो पंक्तियों का भक्त बन गया हूँ.

हे कवि शिरोमणि, इन पंक्तियों का मुझपर यह असर हुआ कि मैंने सुबह-शाम इन पंक्तियों का इक्यावन बार पाठ शुरू किया. करीब दो महीने तक पाठ करने के बाद मुझे ये पंक्तियाँ याद हो गईं. आज हाल यह है कि मैं जहाँ-तहां इन पंक्तियों को टांक देता हूँ. मेरे कम्प्यूटर के की-बोर्ड से निकली इन पंक्तियों को पढ़कर मुझे लोग बुद्धिजीवी ब्लॉगर मानने लगे हैं. कह सकते हैं कि मेरी ब्लागरी आपकी इन दो पंक्तियों से निखरती चली गई.

हे कवि शिरोमणि, एक दिन मैंने एक प्रयोग किया. मैंने अपने घर के तराजू के एक पलड़े पर आपकी सारी कृतियाँ जैसे कुरुक्षेत्र, रश्मिरथी, परशुराम की प्रतीक्षा, उर्वशी, संस्कृत के चार अध्याय वगैरह-वगैरह रखा और दूसरे पर आपके द्वारा लिखी गई ये दो पंक्तियाँ. मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब मैंने देखा कि दो पंक्तियों वाला पलड़ा नीचे बैठ गया. उस दिन मुझे पता चला कि कितना वजन है आपकी इन दो पंक्तियों में. ऐसे में आपके द्वारा लिखा गया बाकी साहित्य मेरे किस काम का?

हे कवि शिरोमणि, पहले मैं पोस्ट लिखकर टिप्पणी में ये दो पंक्तियाँ लिखता था. कालांतर में यह बदलाव आया कि अब मैं हर पोस्ट के नीचे ये दो पंक्तियाँ पहले से ही टांक देता हूँ. इस मामले में कबीर से प्रभावित रहता हूँ यानि काल करे सो आजकर....से. आज हाल यह है कि अब ब्लॉगर लोग कानाफूसी करते हुए कहते हैं कि मेरी पोस्टों में यही दो पंक्तियाँ पढने लायक हैं और बाकी सब बकवास. उसके लिए मैं यही कहता हूँ कि हे प्रभु, इन्हें क्षमा करना क्योंकि ये नहीं जानते कि.......

हे राष्ट्रकवि, मैंने हिसाब करके देखा है कि पिछले दो महीने तेरह दिन से हिंदी ब्लागरी के तमाम लोग और मेरे कुछ मित्र मुझे बुद्धिजीवी ब्लॉगर मानने लगे हैं. ब्लागिंग के बाय-प्रोडक्ट के रूप में मैंने अपने लिए कुछ लक्ष्य बनाकर रखा है जिसमें प्रमुख है कि मैं एक दिन अखिल भारतीय हिंदी चिट्ठाकार महासभा का अध्यक्ष बन जाऊं. हे कविवर, जिस दिन मैं अध्यक्ष बन गया उसी दिन मैं भारत सरकार से यह मांग करूंगा कि आपकी इन दो पंक्तियों के लिए सरकार आपको भारत रत्न से नवाजे. साहित्य अकादमी और ज्ञानपीठ पुरस्कार आपको पहले भी मिले होंगे लेकिन केवल इन पंक्तियों के लिए एक बार फिर से मरणोपरांत आपको साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा जाए. और जिस दिन ऐसा हो गया, मैं समझ लूंगा कि मेरे ऊपर आपका एहसान उतर गया.

हे कवि शिरोमणि, कई बार मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि आप भविष्यद्रष्टा थे और आपको पता था कि एक दिन हिंदी ब्लागिंग और हिंदी ब्लॉगर इस देश में धूम मचाएंगे. समाज को दिशा देने का काम हिंदी ब्लागरी में होने वाली बहस ही करेगी. शायद इसीलिए आपने ये दो पंक्तियाँ लिखी ताकि हिंदी ब्लागिंग में होने वाली बहस चलती रहे. हे राष्ट्रकवि, मैं किन शब्दों में आपको धन्यवाद कहूँ?

और मैं क्या लिखूँ? वैसे तो लिखने के लिए और आभार प्रकट करने के लिए और भी बहुत कुछ है, लेकिन अब मेरे पास समय नहीं है और कुछ लिखने का. मुझे आज ही अपने ब्लॉग पर बहस चलाना है. विषय है; "आम मीठा होता है या इमली?" इसलिए मैं अपना पत्र यहीं समाप्त करता हूँ और आपको एक बार फिर से इन पंक्तियों को लिखने के लिए धन्यवाद प्रेषित करता हूँ.

आपका
ब्लॉगर हलकान 'विद्रोही'

32 comments:

Arvind Mishra said...

अरे मिश्र जी आप भी बौद्धिक ब्लॉगर हैं भाई काहें हलकान हो रहे हैं !

कुश said...

लग गयी पोस्ट जहाँ लगानी थी... :)

PD said...

हलकान जी को समर्पित एक कमेंट ब्लौगर बलवान जी द्वारा -

बड़े भाई, आप हलकान क्यों हो रहे हैं.. मुझे दिनकर जी कि बात पढ़कर एक कथा याद हो आयी, "अंगद कूद वाली".. अयोध्या वापस लौटने के बाद राम जी अपने समस्त भाईयों और वानर सेना को लेकर अपने ससुराल पहूंचे.. वहां पहूंच कर लक्षमण जी को सबसे अधिक भय यह था की चाहे हों कुछ भी, मगर हैं तो यह सब बंदर ही, कहीं इज्जत कि मिट्टी पलीद ना कर दें.. सो उन्होंने स्पष्ट रूप से यह कह रखा था कि मैं जैसा-जैसा करूं तुम लोग भी वैसा-वैसा ही करना, कुल मिलाकर मेरे इशारे का इंतजार करना.. अब भोजन का समय भी आ गया.. ढ़ेर सारे भोज्य पदार्थ देख कर सभी बंदर कुलबुलाने लगे, मगर किसी की हिम्मत नहीं जो लक्षमण जी कि बात को काट कर खाने पर टूट पड़ें सो करने लगे इंतजार.. लक्षमण जी ने नींबू उठाया, सभी बंदर बड़े गौर से उन्हें देखने लगे.. लक्षमण जी ने जैसे ही नींबू दबाया वैसे ही वैसे ही उसका एक बीज उछलकर दूर जा गिरा.. सभी बंदर समझे कि लक्षमण जी का इशारा मिल गया है और उन्हें भी वैसे ही कूदना है.. बस लगे कूद मचाने.. एक बंदर 5 फीट कूदा.. दूसरा 10 फीट.. अबकी अंगद को जोश आ गया और कूद दमलगाकर और महल का छप्पड़ ही ले उड़े..

यहां तक की कथा मैंने "अनामदास का पोथा" में पढ़ रखा था.. अब आगे का हाल मैं आपको लक्षमण जी की डायरी से सुनाता हूं..

"हद्द हैं ये बंदर सब भी.. मैंने राम भैया को कितना मना किया था कि इन्हें वहीं कहीं लंका के पास बसा आते हैं मगर वे माने ही नहीं.. ठीक है, अगर इन्हें अयोध्या लेकर आ भी गये तो क्या इन्हें लेकर जनकपुर भी आना जरूरी था क्या.. खैर भैया बोल दिये तब फिर उनकी बात कैसे काट सकता हूं? आज लंच के समय तो गजब ही हो गया.. पता नहीं क्यों अचानक से सभी बंदर उछल-कूद मचाने लग गये थे.. वो तो कारण बाद में पता चला जब हनुमान ने मुझे बताया कि आपके नींबू के बीज को उछलता देख कर सभी बंदर उछलने लगे थे.. बाद में मैंने हनुमान से पूछा कि तुम क्यों नहीं उछले, तो उनका उत्तर था कि "मैं तठस्थ था, क्योंकि मैं तो राम जी का भक्त हूं.. उनके इशारे पर ही मैं कूदूंगा, किसी और के इशारे पर नहीं..""

लक्षमण जी की डायरी के पन्ने फिर कभी.. :)

PD said...

डिस्क्लेमर पिछले कमेंट पर - थोड़ी सी गलती हो गई, लक्ष्मण जी के बदले लक्षमण जी लिख गया.. उसके लिये पहले ही क्षमा मांग लेता हूं.. मेरा आशय किसी को मानसिक रूप से तकलीफ पहूंचाना नहीं था.. उसे बस एक टाईपो एरर माना जाये.. :)

महेन्द्र मिश्र said...

मै अरविन्द जी की टीप से सहमत हूँ ... बढ़िया पोस्ट...आभार.

रचना said...

लग गयी पोस्ट जहाँ लगानी थी... :)पर बुद्धिजीवी हैं सो पचा गए

संजय बेंगाणी said...

चुंकी यह पोस्ट भी आपकी मौलिक रचना नहीं है इस लिए आपको कतई नहीं कहेंगे कि आनन्द लेकर पढ़ा, पूरे चटकारे लेकर पढ़ा. फिर मुस्कुरा दिये.यह हलकानजी से कहेंगे. ये महाशय भी कमाल का लिखते है, कभी कभी.

पोस्ट कहाँ कहाँ लगी यह सिक्रेट तो भाई कुश जाने या किसने पचाई यह रचना जी जाने. हम तो हजम कर दुबारा पढ़ने की सोच रहे हैं.

दिनकरजी की यह पंक्तियाँ ज्यादा से ज्यादा लोगों को विवाद में घसीटने के प्रयोग में ली जाती है या फिर जो विवाद से दूर रहे उन पर लानते भेजने के लिए :)

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

दिनकर जी की इन पंक्तियों पर कॉपीराइट किसका है - दिनकर जी का या हलकान जी का?

जरा जल्दी बताइये। हमें इनका प्रयोग करना है।

Udan Tashtari said...

दिनकर जी ने जाने क्या सोच कर यह पंक्तियाँ लिखी थीं जबकि हमारी उनसे कभी व्यक्तिगत मुठभेड़ भी नहीं हुई..फिर भी.

अगर पहले से पता चल जाता कि हलकान भाई ऐसी चिट्ठी लिखने जा रहे हैं, तो हम भी चरण स्पर्शा तो भिजवा ही देते.

मस्त लिखा है. आनन्द आया.


--


’सकारात्मक सोच के साथ हिन्दी एवं हिन्दी चिट्ठाकारी के प्रचार एवं प्रसार में योगदान दें.’

-त्रुटियों की तरफ ध्यान दिलाना जरुरी है किन्तु प्रोत्साहन उससे भी अधिक जरुरी है.

नोबल पुरुस्कार विजेता एन्टोने फ्रान्स का कहना था कि '९०% सीख प्रोत्साहान देता है.'

कृपया सह-चिट्ठाकारों को प्रोत्साहित करने में न हिचकिचायें.

-सादर,
समीर लाल ’समीर’

रंजना said...

बड़ा ही कठिन लग रहा है इस पर कुछ भी टिपण्णी करना....

हलकान जी की श्रद्धा और सोच ने तो अभिभूत कर दिया...वैसे ये दो पंक्तियाँ सचमुच ही ऐसी हैं की प्रत्येक तथस्थ की ऐसी की तैसी कर दे....

अभिषेक ओझा said...

हकलानजी तो अन्दर की बात निकाल लाये. ये कॉपीराईट वाला मामला कलार कीजिये जरा, कहीं कॉपी पेस्ट कर दिया और कोई आ ना जाए हडकाते हुए !

अनूप शुक्ल said...

इस मामले में हम पर्याप्त चिंतन कर चुके हैं। हलकान विद्रोही जी को हमारा लिखा लेखजो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनके भी अपराध… पढ़वाइयेगा उनकी सब चिंतायें दूर हो जायेंगीं।

बाकी ये कविता पंक्तियां कालजयी टाइप की हैं। कालजयी होने के नाते ये पंक्तियां जैसी मर्जी वैसा अर्थ निकाले जाने के लिये अभिशप्त हैं। दो चार मतलब देखिये हम निकाले देते हैं दो चार तरह के लोगों के लिये।

किसी बालिका को छेड़ता हुये बालक इस छेड़न कृत्य में शरीक न होने वाले शरीफ़ टाइप बालकों पर लानत भेजते हुये कह सकता है:
जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनके भी अपराध… बालिका भी अपनी मर्जी के अनुसार उसको बचाने में अलाली करने वालों को धिक्कारते हुये कह सकती है जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनके भी अपराध…

इसी कथा में बात आगे बढ़ने पर बालक पक्ष अगर पकड़ा जाता है और उसकी तुड़ैया क्रिया संपन्न होने लगती है तो तुड़ैया कर्म में सहयोग न करने वाले के लिये तुड़ैया करने वाले स्वय्ंसेवक कह सकते हैं जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनके भी अपराध… पिटता हुआ बालक अगर चाहे तो उसके बचाने में अपनी जान हलकान न करने वालों को कोसते हुये कह सकता है जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनके भी अपराध…

आयाम और भी हैं जी। घपला करने वाला किसी सीधे ईमानदार को धिक्कारते हुये कह सकता है जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनके भी अपराध… पकड़े जाने पर उसी घपलची को बचाने के प्रयास से उदासीन को उस घपला करने वाले की आह सुनाई दे सकती है जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनके भी अपराध…

ब्लागिंग में जिस तरह इस तटस्थ बम का हाल के दिनों में बेहाल होकर प्रयोग हुआ उसके बारे में आपको क्या बतायें? आप तो खुदै तथस्थता मर्मज्ञ हैं। दिनकरजी के भीषण प्रशंसक जो ठहरे।

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

अपराधी हूं क्योकि तटस्थ हूं .

arun arora said...

बहस शेष है , तटस्थ रहेगा इस में जो भी ब्लोगर
समय लगेगा,पर यही भरेगी अपराधो उसकी गागर
:) नव वर्ष की सभी ब्लोगरो को तटस्थ शुभकामनाये

मनोज कुमार said...

मुझे आज ही अपने ब्लॉग पर बहस चलाना है. विषय है; "आम मीठा होता है या इमली?" बहस का यह विषय अच्छा लगा।
दिलबहार कंपनी का यम्मी डायजेस्टिव्स लाया हूं ... खाने के बाद खाने के लिए। इसका नाम है .. इमली लड्डू। बड़ा मीठा है। आम से ज़्यादा। अगर विश्वास न हो तो खा के देखिए। इन ऐण्ड आउट में मिलता है। खाने के बाद पक्का बोलिएगा आम के आम इमली के नाम .. न-न..दाम..न-न गुठली ... पता नहीं ई पोस्ट औऱ टिप्पणियां पढ़ के माथा कामे नहीं कर रहा है।

Mired Mirage said...

सदा की तरह गजब लिखा है। कभी कभी जब तटस्थ बैठे परेशानी होने लगती है तो दिनकर जी की जय कह ये पंक्तियाँ याद करने की कोशिश कर जरा से अपने पैर बहस के सागर में डुबाने से परहेज नहीं करती।
घुघूती बासूती

Arvind Mishra said...

समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याध!
अब लगे हाथ दिनकर स्पेशलिष्ट पहली वाली लाईन का मतलब भी बता दें ....
तो शागिर्दगी कर लूँगा नहीं तो ...अब खुदैं फैसला कर लें अपने बारे में अब कुंजी वुन्जी मत देखियेगा भाई लोग.... यह ब्रीच आफ ट्रस्ट नहीं ब्लाग्वर्ल्ड में ....
नीचे क सरल लाईन क व्याख्याकार और भाष्यकार कौनो कम नहीं हैं ,यानी बहुत हैं
मगर असली तेजाबी परीक्षा त ई लाईन में है -
समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याध!

गौतम राजरिशी said...

इस पोस्ट का बकायदा कानपुर से फोन पर पाठन हुआ है।...तो हम खिंचे चले आये। अभी-अभी तो आपको मेलयाये थे। आप का सोचे कि दू गो संकल्प ले लिये हम अपने ब्लौग पर तो आपका पीछा छोड़ देंगे...्हें हें हें!!!

तटस्थता की भी अपनी महत्ता होती है। देखिये ना कितने-कितने महान लोग हैं बैठे तटस्थ हुए...हम भी कम महान थोड़ी ना है।

cmpershad said...

हम उस देश के वासी हैं जिस देश में टस्तता रहती है। भारत की सदा यह नीति रही कि वह गुटनिरपेक्ष रह कर गुटखा खाए और सदा मुंह बंद रखे :)

डिस्क्लेमर : गुटखा खाने पर व्याधि के हम ज़िम्मेदार नहीं :)

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

पढ़ा, और न चाहते हुए भी तटस्थ हो गया। क्या हो गया है मुझे...???

anitakumar said...

:)सुन भाई सुन तट्स्था में बड़े बड़े गुण लाख पते कि एक बात है क्युं न आजमा ले

मस्त लिखा है

परमजीत बाली said...

बहुत बढ़िया पोस्ट लिखी है।बधाई। तटस्थ भाव से कह रहे हैं जी:))

विवेक सिंह said...

आपकी चिट्ठी चोरी एकदम मौलिक है ।

डा० अमर कुमार said...

.
ब्लॉगर हलाकान पर आपकी हलाकान पोस्ट मस्त मस्त है ।
तटस्थ भाई साहब के कोपभाजन से बचने के लिये टिप्पणी चेंप रहा हूँ ।
कहीं आप भी टिप्पणी डिलीट का शोशा....
नहीं नहीं, वैसी कोई बात नहीं !
यूँ ही पूछ लिया !

नीरज गोस्वामी said...

जैसे की मैंने बताया था मैं अपने एम् डी. के साथ था जब आपने अपनी ब्लॉग पोस्ट की सूचना मुझे एस एम् एस द्वारा दी...अब चूँकि एस एम् एस, एम्.डी. के सामने आया था तो ये पूछना उनका फ़र्ज़ था की किसका है...मैंने आपका नाम बताये बिना कहा
"सर एक ब्लोगर का है और अपनी पोस्ट पढने का आग्रह कर रहा है..
." तो पढ़ लो..." पढ़े लिखे नहीं हो क्या...हा हा हा हा..."
" जी वो तो हूँ लेकिन आपको भी पढने का आग्रह किया है..."
" मुझे ? मुझे क्यूँ?...
" ऐसे ही सर दुनिया को ये दिखाने के लिए की देखो मेरी पोस्ट को कितने महान इंसान भी पढ़ते हैं..." चीप पब्लिसिटी सर..."
"लेकिन हम तो पढ़ते नहीं...आपको तो मालूम है सिर्फ सुनते ही हैं...सुनते भी कहाँ हैं सिर्फ सुनाते हैं...हा हा हा हा हा "
"जी सर जी सर...लेकिन ब्लोगर समझता है की आप पढ़ते हैं...."
"पढ़ते तो क्या एम्.डी. होते? पूछिए उस से ?"
"बहुत आग्रह किया है ब्लोगर ने सर आपको...अगर आप पढ़ नहीं सकते तो मैं सुना देता हूँ आपको...सुन लीजिये बिचारे का मन रह जायेगा..."
"ठीक है सुनाओ...लेकिन जल्दी...मेरे पास समय नहीं है..."
"जी जी सर"
हम आपकी पोस्ट पूरा पढ़ कर सुना दिए...वो मुंह खोल के ऐसे सुनते रहे जैसे हम टिम्बक टूऊं देश की भाषा बोल रहे हों...जब हम पूरा पोस्ट पढ़ के सुना दिए तो उन्होंने जम्हाई लेते हुए पूछा....
" ये दिनकर कौन है?"

नीरज

श्रद्धा जैन said...

hahaha neraaj ji ki tiippani bhi kamaal hai
baad mein jamhaayi lekar poocha ki ye dinkar koun hai hahaha

Shiv ji bahut achcha laga padhna aur sab logon ka tatasth hona
bahas jab shuru ho jaaye ki aam meetha hota hai yaa imli mujhe bhi batayiyega

तनु श्री said...

"आप आज जीवित रहते तो चरण स्पर्श लिख देता. नहीं हैं तो वह कैसे लिखूँ? चलिए, आप जहाँ भी हों, मेरा मतलब चाहे जहाँ, वहीँ से मेरा चरण स्पर्श स्वीकार कर लें. ना मत कहियेगा, मैं सबका चरण स्पर्श नहीं करता. इस तरह से देखेंगे तो मैं आपके ऊपर एक तरह का एहसान कर रहा हूँ. हे राष्ट्रकवि, आपके मन में विचार उठ रहे होंगे कि मैं कौन? जाहिर है, कभी आप मुझसे मिले नहीं तो पहचानेगे कैसे? तो आपकी दुविधा दूर करते हुए मैं अपना परिचय खुद दे देता हूँ. मैं हलकान 'विद्रोही', मशहूर हिंदी चिट्ठाकार. "
यह किस तरह का लेखन है ,इतना दंभ ,अभिमान .आप एक वरिष्ठ व्यक्ति हैं ,आपको शोभा नहीं देता की इस तरह के शब्द -बाण एक राष्ट्र-कवि पर चलायें औरवह भी जब आप उनके समग्र का ज्ञाता होनें का दंभ भर रहें हों.
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आशा है आप मुझ नाचीज के कथन को अन्यथा नहीं लेंगे क्योंकि क्षमा बडन को चाहिए ...........?
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पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

शिव जी, लगे हाथ ये भी बता देते कि मौका देखकर पाला बदल जाने वालों के लिए भी दिनकर जी कुछ पंक्तियाँ लिख गए हैं क्या ?
:)

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

सही बात यही है कि जो भी तटस्थ रह गया उसने अपने साथ द्रोह किया है. तटस्थता अपनी कमजोरी छुपाने का बहाना मात्र है.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

सही बात यही है कि जो भी तटस्थ रह गया उसने अपने साथ द्रोह किया है. तटस्थता अपनी कमजोरी छुपाने का बहाना मात्र है.

Mrs. Asha Joglekar said...

राष्ट्रकवि ने तो अपने पांव हटा लिये होंगे या जुराबों में छिपा लिया होंगे ।

सतीश पंचम said...

बढिया है। आज कई पोस्टें फुरसत से पढ रहा हूं। मजेदार।