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Thursday, March 10, 2011

स्कैम, एरर ऑफ जजमेंट, फुल रेस्पोंसिबिलिटी और मनी-ट्रेल - भाग २




......मॉरिशस के बारे में बात हो रही थी.

तो मैं कह रहा था कि मुंबई में बैठा उद्योगपति अगर यूपी स्थित अपनी कंपनी में पैसा लगाना चाहता है तो उसका पैसा मॉरिशस के रास्ते चलकर ही यूपी पहुँचता है. उद्योगपति यह नहीं चाहता कि मुंबई मेल वाया इलाहबाद पकड़े और पैसा दूसरे ही दिन यूपी में. ना, वह यह अफोर्ड नहीं कर सकता क्योंकि उसके सलाहकार ने उसे बता रखा है कि अपना ही रुपया अपनी कंपनी में लगाना भी चाहो तो सीधे-सीधे न लगाओ. पहले उसे मॉरिशस भेजो और वहाँ से उसकी एंट्री भारत में करवाओ. यह वैसी ही बात है जैसे कहीं-कहीं गावों में विवाह के बाद नई-नवेली दुल्हन को ससुराल वाले घर में कदम रखने से पहले किसी देवी के मंदिर या किसी पीपल के पेड़ की पूजा करवाने ले जाते हैं.

शायद भारत का ही पैसा भारत में ही प्रवेश करने से पहले मॉरिशस की तीर्थयात्रा कर आता है तो तन और मन से पवित्र हो जाता है.

गज़ब देश है यह मॉरिशस भी. मॉरिशस से मेरी और तमाम भारतीयों की पहली जान-पहचान वहाँ के भूतपूर्व प्रधानमंत्री शिवसागर रामगुलाम ने करवाई. मुझे याद है सत्तर के दशक के अंत में रेडियो पर अशोक बाजपेयी समाचार पढ़ते हुए हमें बताते थे कि; "आज दिल्ली में मॉरिशस के प्रधानमंत्री शिवसागर रामगुलाम से प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी से मुलाकात की और दोनों देशों के बीच समबन्धों को प्रगाढ़ किये जाने पर बल दिया."
पैसा यहां से घूम कर आता है!
रामगुलाम ज़ी की खासियत थी कि वे भारत के साथ सम्बन्ध मज़बूत करने के लिए जब-तब हमारी प्रधामंत्री से मुलाकात कर लेते थे. वे संबंधों के प्रगाढ़ किये जाने पर खूब बल देते थे. शायद उनके तब बल दिए जाने का ही असर है जो आज भारत और मॉरिशस के बीच संबंधों में दिखाई दे रहा है. रेडियो पर उनकी मुलाक़ात के बारे में सुनकर लगता था कि इस प्रधानमन्त्री के जीवन का उद्देश्य ही था कि वह यहाँ-वहाँ, जहाँ-तहाँ सबसे मुलाकात करता फिरे. वैसे बचपन के उनदिनों में रेडियो पर ऐसे समाचार सुनकर हमें गर्व की अनुभूति भी होती थी कि एक भारतीय विदेश में बसे एक देश का प्रधानमंत्री है. अस्सी के दशक में जब रामगुलाम ज़ी नहीं रहे तब अनिरुद्ध जगन्नाथ ज़ी ने हमारे और मॉरिशस के बीच के सम्बन्ध को और प्रगाढ़ कर डाला. यह वह समय था जब उनकी भारत यात्रा के बारे में हमें यज्ञदेव शर्मा और पंचदेव पाण्डेय से वाया आकाशवाणी सूचना मिलती थी.

सम्बन्ध आगे बढ़े तो १९८९ में मेरे और मॉरिशस के बीच दूरी तब और कम हो गई जब मैंने श्री अमिताभ बच्चन की 'फिलिम' अग्निपथ देखी. बड़ी धाँसू एंट्री मारी थी बच्चन ज़ी ने डैनी बाबू के अड्डे पर. जिसने भी अग्निपथ देखी होगी उन्हें याद होगा कि बच्चन ज़ी कैसे समुन्दर के अन्दर से बच्चन इस्टाइल में अपना सिर हिलाते हुए निकले थे और उन्हें देखकर डैनी ज़ी ने अपनी ओवरएक्टिंग का एक और नमूना फट से पेश कर दिया था. अपने छिछले समुन्दर और नारियल के पेड़ों के कारण मॉरिशस बड़ा सुन्दर और सुशील दिखाई दिया था. बच्चन ज़ी की फिल्म 'अग्निपथ' मॉरिशस के साथ हमारे फ़िल्मी सम्बन्ध की शुरुआत भर थी. आगे चलकर उन्ही की एक और फिल्म 'हम' ने इन संबंधों को और प्रगाढ़ कर डाला. क्या कहा? याद नहीं है? अरे जरा सा दिमाग पर जोर डालेंगे तो याद आ जाएगा कि कैसे गोविंदा और शिल्पा शिरोडकर अपने घर से बाइक पर निकलते हैं और सीधा मॉरिशस पहुंचकर वहाँ एयरपोर्ट पर खड़े एयर मॉरिशस के एक जहाज के पंखें पर नाचते हुए एक दूसरे को बताते हैं कि; "सनम मेरे सनम, कसम तेरी कसम, मुझे आजकल नींद आती है कम...."

पूरे ढाई किलो शुद्ध तुकबंदी वाला गाना.

अभी दो-ढाई साल पहले मैं एक भोजपुरी फिल्म देख रहा था....

क्षमा कीजिये मैं विषय से भटक गया. एक ब्लॉगर की यही समस्या है. उसे टोकने वाला कोई नहीं रहता है लिहाजा वह भटक कर किसी भी राह पर चला जाता है. और जब उसे होश आता है तो पता चलता है कि आधी पोस्ट में वह निरर्थक बातें लीप चुका है. ऊपर से इतनी निरर्थक बातें लिखने बाद उसके मन में लालच भी आ जाता है कि अब इसे मिटायेंगे तो पोस्ट को हरी-भरी करने के लिए फिर से कुछ और निरर्थक लिखना पड़ेगा. ऐसे में जाने दो जो लिखा गया वो लिखा गया. इसे मिटाने की ज़रुरत नहीं. जो कुछ भी है पड़ा रहेगा एक कोने में. क्या लेगा हमारा?

तो मैं भारत में लाये जाने वाले कैपिटल की बात कर रहा है. बड़ी विकट अफरा-तफरी है इन पैसों की वजह से. ऐसी लोक-कथा है कि किसी पूर्व वित्तमंत्री ने अपनी बहू के सुझाव पर (भारतीय राजनीति और उसकी नीति निर्धारण में बहुओं का बोलबाला पहले से रहा है) भारत और मॉरिशस के बीच कुछ ऐसे कागजी सम्बन्ध स्थापित किये कि पूछिए ही मत. उस कागजी समबन्ध के बाद भारत में मॉरिशस के रास्ते पैसा ही पैसा. हर क्षेत्र में पैसा. हर जगह पैसा. हर उद्योग में पैसा. हर राज्य में पैसा. और हर पैसे के केंद्र में मॉरिशस. एफ डी आई का पैसा मॉरिशस के रास्ते आ रहा है तो एफ आई आई का पैसा भी उसी रास्ते से आ रहा है. हाल यह है कि पिछले कई वर्षों में मॉरिशस से चले पैसे की लहरें भारतीय शेयर बाज़ारों के तटों से आकर ऐसे टकरा रही हैं कि कभी-कभी सुनामी आने का खतरा हो जाता है.

जिस तरह के खुलासे हो रहे हैं और जिस तरह से कुछ बातें सामने आ रही है उन्हें देखकर कभी-कभी लगता है कि हमारे उद्योगपतियों के फैसले न केवल उनके अर्थ सलाहकारों के सुझावों पर निर्भर करते हैं बल्कि उनके पंडितों और गुरुओं पर भी निर्भर करते हैं. पता नहीं मुझे क्यों लगता है कि हर उद्योगपति का पंडित या गुरु उसे उपदेश देते हुए कहता होगा कि; "हे जजमान, भगवदगीता में श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि हे पार्थ कलियुग में भारतवर्ष में पैसा अगर मॉरिशस के रास्ते आएगा तो वह पवित्र पैसा होगा. जिस तरह से तीर्थराज प्रयाग में स्थित संगम में स्नान करने के बाद मनुष्य पवित्र हो जाता है वैसे ही मॉरिशस में स्थित गंगा तलाव की महिमा यह होगी कि वह मॉरिशस में आये हर पैसे को शुद्ध और पवित्र कर देगा....."

अब मॉरिशस की गिनती विश्व के अन्यतम टैक्स-हेवेन में होने लगी है और उसे यह दर्जा दिलवाने का काम इतना महत्वपूर्ण है कि आनेवाले समय में भारत को अपनी इस उपलब्धि को आगे रखकर सयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद् में परमानेंट सीट की दावेदारी प्रस्तुत करनी चाहिए. मामूली उपलब्धि नहीं है यह. मैं तो कहता हूँ कि इसके बल पर तो भारत खुद को पूरे विश्व के मुखिया के तौर पर प्रोजेक्ट कर सकता है. नौ प्रतिशत विकास दर (दर लिखने गए तो जो शब्द पहले आया वह 'डर' था) एक एडिशनल क्वालिफिकेशन के तौर पर अपने साथ तो है ही.

इस उपलब्धि की वजह से परिवर्तन दिखाई भी दे रहा है. मैं तो स्कूलों के मास्टर ज़ी लोगों से अनुरोध करूँगा कि अब छात्रों को निबंध के लिए जो नए विषय दिए जायें उनमे भारतीय अर्थव्यवस्था में मॉरिशस का महत्व नामक विषय अवश्य दिया जाय. ऐसा करने से छात्र आधे तैयार होकर निकल सकेंगे. मॉरिशस सरकार को यह प्रयास करने चाहिए कि जिस तरह भारतवर्ष में मॉरिशस से आनेवाले पैसों के बारे में कोई पूछताछ नहीं होती उसी तरह से मॉरिशस से आनेवाले नागरिकों के बारे में कोई पूछताछ न की जाय. इससे दोनों देशों के बीच समबन्ध प्रगाढ़ तो होंगे ही, एक नई वैश्विक व्यवस्था पनप सकेगी. कितने दिनों तक शोध करने वाले हमारे छात्र अर्थशास्त्र के पुराने सिद्धांतों पर पी एचडी लेते रहेंगे? नए विषय के तौर पर इन छात्रों को "इमपौर्टेंस ऑफ मॉरिशस इन इंडियन इकॉनोमी" नामक विषय पर शोधपत्र लिखकर पी एचडी की डिग्री लेनी चाहिए. देसी विश्वविद्यालयों को चाहिए कि अर्थशास्त्र के विद्यार्थियों के लिए इस विषय को आवश्यक कर दें. इससे देश की विकास दर के करीब दो प्रतिशत और बढ़ जाने की सम्भावना प्रबल हो जायेगी. हमारे जो नेता इस विषय पर पहले ही शोध ग्रंथ लिख चुके हैं उन्हें चाहिए कि वे नए आनेवाले नेताओं को अपने शोध ग्रंथ की न सिर्फ प्रतियाँ बातें बल्कि उन्हें अपनी तरफ से भी कुछ जोड़ देने के लिए प्रेरित करें. हमारी जांच एजेंसियों को चाहिए कि वे अपने अफसरों को मॉरिशस के बारे में अलग से ट्रेनिंग दें ताकि आनेवाले समय में उन्हें आर्थिक घपलों की जांच में कोई दिक्कत नहीं हो. हमारे प्रधानमंत्री को चाहिए कि वे................

Tuesday, March 8, 2011

स्कैम, एरर ऑफ जजमेंट, फुल रेस्पोंसिबिलिटी और मनी-ट्रेल - भाग १




किसी भी काल में देशवासियों के शब्दकोष में जुड़ने वाले शब्द कुछ हद तक उस रास्ते का सूचक होते हैं जिसपर देश चल रहा है. पिछले आठ-दस महीने को ही ले लीजिये, टू-ज़ी, स्कैम, सी बी आई, जे पी सी, टैपिंग, रिस्पोंसिबिलिटी, सुप्रीमकोर्ट, एरर ऑफ जजमेंट, सी वी सी, सी डब्ल्यू ज़ी, बेल अप्लिकेशन, फिक्शर्स, मॉरिशस, मनी-ट्रेल और ऐसे ही न जाने कितने शब्द हैं जो देशवासियों के न सिर्फ शब्दकोष में जगह पाकर इतरा रहे हैं बल्कि उनके जेहन में रच-बस गए हैं. जो अभी तक रचे-बसे नहीं हैं वे अपना नंबर आने का इंतजार करते हुए हमारे कर्णधारों से पूछ रहे हैं; "मेरा नंबर कब आएगा?"

ये शब्द कुछ हद तक उस रास्ते के बारे में बता भी रहे हैं जिसपर देश चल रहा है.

वैसे ये शब्द लोगों के जेहन में केवल धंसे नहीं हैं, अब तो धीरे-धीरे इन्हें बोल-चाल में इस्तेमाल भी किया जाने लगा है. हाल यह है कि अगर घर का खाना बनाने वाला महराज सब्जी के पैसों में से अपने लिए बीड़ी का बण्डल खरीद लेता है तो घर का राजा बेटा चिंटू अपने पापा से कहता है; "पापा, मुझे तो लगता है कि रामू महराज ने सब्जी के पैसे में कोई स्कैम ज़रूर किया है. आप सुप्रीमकोर्ट (यानि चिंटू ज़ी की मम्मी) से कहिये न कि वे इस मामले में इंटरफीयर करें नहीं तो रामू महराज कल को और बड़ा स्कैम करेगा."

चुन्नू गली में क्रिकेट खेलते-खेलते अगर फ्रोन्ट-फुट की बजाय बैकफुट पर शॉट खेलकर एल बी डब्ल्यू आउट हो रहा है तो पैवेलियन में वापस आकर कह रहा है; "एरर ऑफ जजमेंट हो गया. मुझे बैकफुट पर नहीं खेलना चाहिए था."

उसी मैच में अगर टीम हार जा रही है तो टीम का कैप्टेन पूरी गली के सामने इस हार की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेते हुए तपाक से यह कहकर अपना पल्ला झाड़ ले रहा है कि; "आई टेक फुल रिस्पोंसिबिलिटी फॉर दिस लॉस."

इतना कह देने भर से लोग़ उसकी वाह-वाही कर डाल रहे हैं और उसे कैपटेंसी से रिजाइन करने की जरूरत ही नहीं पड़ रही है. उसका वाइस कैप्टेन जिसने अभी तक कैप्टेन बनने के सपने संजो रखे थे, उसे समझ में नहीं आ रहा कि अब वह क्या करे? वाइस कैप्टेन यह सोचते हुए मुँह लटका ले रहा है कि; "इसने तो जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली, अब तो इसके रेजिग्नेशन की डिमांड टीम करेगी ही नहीं. अब तो इस हार की जांच के लिए जे पी सी की डिमांड भी नहीं की जा सकती."

अचानक घपलों में इस्तेमाल होनेवाले शब्द इतने महत्वपूर्ण हो गए हैं कि समझ नहीं आता कि यही शब्द इतने दिन तक कहाँ थे? अभी कल की बात है. मैं अपनी पार्ट टाइम ड्यूटी पर था यानि अपने एक मित्र के कोलैबोरेशन में देश के हालात पर चिंता व्यक्त कर रहा था. चिंता व्यक्त करते हुए मैंने उनसे कहा; "एक बात समझ में नहीं आती कि इन शब्दों ने इतने दिन तक हमारे जीवन में प्रवेश क्यों नहीं किया? क्या हम इतने गए गुजरे थे कि ये शब्द हमें इस लायक नहीं समझते थे? क्या दोष था हमारा? मैं पूछता हूँ क्या स्कैम पहले नहीं हुए थे? हमारे पास बोफोर्स था. हमारे पास सुखराम थे. हमारे पास हर्षद मेहता, केतन पारेख और ओत्तोवियो क्वात्रोकी थे. हमारे पास यू टी आई था. हमारे पास यूरिया, नरसिम्हा राव, सिबू सोरेन, साइमन मरांडी और लखूभाई पाठक थे. और तो और हमारे पास जैन ज़ी की डायरी थी. ऐसे में इस सुप्रीम कोर्ट ने पहले क्यों नहीं किया कुछ? इन शब्दों ने देशवासियों को पहले परेशान क्यों नहीं किया? क्यों नहीं ये शब्द तभी जेहन में घर बना सके?"

मित्र शायद एक साथ इतने सवालों के लिए तैयार नहीं थे. अचानक सवालों की झड़ी लगी तो सकपका गए. स्थिर हुए तो चेहरे पर दार्शनिक भाव लाते हुए बोले; "हर चीज का अपना समय होता है. जो-जो जब-जब होना है सो-सो तब-तब होता है."

उनकी बात सुनकर मुझे यह मानने में जरा भी संकोच नहीं हुआ कि विदुर या चाणक्य की नीति में यह लिखा हो या नहीं लेकिन यह हमारी संस्कृति और इतिहास में पक्के तौर पर दिखाई देता है कि जब कोई जवाब न सूझे तो आदमी को फट से दार्शनिकता नामक तिनके को थाम लेना चाहिए. तिनका डूबा देगा इस बात की चिंता बिलकुल नहीं करनी चाहिए.

इन शब्दों पर आगे बात चली तो मनी-ट्रेल नामक शब्द पर आकर रुकी. इन घपलों में जांच के दौरान मनी-ट्रेल के बारे में खूब चर्चा हो रही है. मनी-ट्रेल से मतलब रुपया जिस रास्ते गया या जिस रास्ते से आया. वैसे मैं आपको यह बताता चलूं कि मनी-ट्रेल सुनने से पता नहीं क्यों मुझे वे हवाई जहाज याद आ जाते हैं जो अपने पीछे धुआं छोड़ते जाते हैं. जब मैं छोटा था और गाँव में रहता था तो गाँव के आसमान में गुजरते हुए ऐसे हवाई जहाज को देखकर हम दोस्त कहते; "अरे देखो रॉकेट छूटा है."

आज जब भी मनी-ट्रेल नामक शब्द सुनता हूँ तो गाँव, बचपन और अपनी बेवकूफियां तो याद आती ही हैं वे हवाई जहाज भी खूब याद आ रहे हैं.

मनी-ट्रेल की कहानी भी बड़ी धाँसू निकलती है. एक दिन अखबारों से पता चला (यह उनलोगों को इम्प्रेश करने के लिए लिखा गया है जिन्हें यह शक है कि मैं अखबार नहीं पढ़ता) कि जिन कंपनियों को टू ज़ी स्पेक्ट्रम अलॉट हुआ उनमें से कुछ कंपनियों में मॉरिशस के रास्ते पैसा आया था. दूसरे दिन पता चला कि राजा बाबू को जो घूस मिला वह घूस उन्होंने मॉरिशस के रास्ते बाहर के देशों जैसे मलेशिया और मैडगासकर में इन्वेस्ट किया. पढ़कर लगा कि ऐसा भी क्या है कि देश में पैसा आये तो मॉरिशस के रास्ते और देश से पैसा जाए वो भी मॉरिशस के रास्ते?

मुझे तो यह लगता है कि जिन्हें अपने भूगोल के ज्ञान पर नाज़ है वे अगर यह पढ़ लें तो अपने ज्ञान पर शंकित होते हुए सिर खुजलाने लगेंगे. यह सोचते हुए कि अब भारतवर्ष तक आने-जाने वाला हर रास्ता क्या केवल और केवल मॉरिशस से होकर गुजरता है? और कोई रूट नहीं जिसे फॉलो करके भारत पहुँचा जा सके?

अचानक भारत की अर्थव्यवस्था में मॉरिशस का महत्व इस तरह से बढ़ गया है जितना अमेरिका और चीन का भी नहीं है. हालात यहाँ तक पहुँच गए हैं कि मुंबई में बैठे उद्योगपति को अगर उत्तर प्रदेश में अपनी कंपनी में पैसा डालना है तो वह बन्दा भी मॉरिशस के रास्ते ही पैसे को यूपी तक पहुंचाता है. वह यह करने के लिए राजी नहीं है कि मुंबई से मुंबई मेल वाया इलाहाबाद पकड़ी और दूसरे ही दिन पैसा यूपी में. ना? वह ऐसा नहीं कर सकता क्योंकि........

(जारी रहेगा)

Wednesday, March 2, 2011

हम मार्च मना रहे हैं




मार्च आ ही गया. आता कैसे नहीं? इतने लोग़ मार्च का इंतज़ार करते हैं कि उसे आना ही पड़ता है. खुशहाली न आये तो क्या मार्च भी नहीं आएगा? पूरे साल में हमारे लिए इससे ज्यादा महत्वपूर्ण कोई और महीना भी तो नहीं. बहुत कम लोग़ होते हैं जिनके लिए साल के सारे महीने एक जैसे होते हैं. जैसे विजय माल्या ज़ी. उनके द्वारा छपवाया जाने वाला कैलेण्डर साल के हर महीने को उनके लिए महत्वपूर्ण बना देता है. बाकी लोगों के लिए सबसे महत्वपूर्ण मार्च ही है.

बड़ा इंतजार करते हैं लोग़ तब जाकर मार्च आता है. वैसे यही लोग़ जहाँ एक तरफ इंतजार करते हैं वहीँ दूसरी तरफ इस बात से भी हलकान हुए रहते हैं कि मार्च आने से प्रेशर बढ़ गया है. मार्च में ऐसे लोगों को देखकर लगता है जैसे इन्होने पूरे साल काम ही नहीं किया. वैसे कुछ लोगों को मार्च का फायदा भी रहता है. ये ऐसे लोग होते हैं जो मार्च के सहारे आफिस के अलावा बाकी और कोई काम नहीं करते. इनके लिए मार्च का महीना संजीवनी की तरह होता है.

ऐसे लोगों को अगर रिश्तेदार बुला लें तो ये जवाब देते हैं; "अभी नहीं. मार्च तक तो बात ही मत कीजिये. आफिस में बहुत प्रेशर है. मार्च ख़तम हो जाए तो आते हैं आपके घर." कोई रिश्तेदार इनके घर पर आना चाहे तो वहाँ भी वही बात; "हैं हैं..आप आयेंगे भी तो संध्या और बच्चे तो मिलेंगे घर में हम नहीं मिल पायेंगे. इसलिए बस यही मार्च जाने दीजिये उसके बाद आईयेगा."

ऐसे कहेंगे जैसे मार्च ने आकर घर में डेरा डाल रखा है और इनके घर आनेवाले रिश्तेदार के बैठने तक की जगह नहीं है.

पत्नी कहेगी; "सुनो, माँ आना चाहती थी" तो जवाब मिलेगा; "क्या करती हो? अरे समझाओ अपनी माँ को. यही मार्च जाने दो उसके बाद आने के लिए बोलो."

ये लोग़ एक तारीख से ही कहना शुरू कर देते हैं; "नहीं-नहीं, अभी मार्च तक तो कोई बात ही मत करो. जो कुछ भी है, मार्च के बाद देखेंगे. अभी मार्च तक बहुत प्रेशर है."

मंहगाई का प्रेशर, बच्चों की पढ़ाई का प्रेशर, दोस्तों द्वारा खिंचाई का प्रेशर वगैरह उतने विकट नहीं होते जितना मार्च का प्रेशर होता है.

ऐसा नहीं है कि पहले वर्ष के महीने परेशान नहीं करते थे. पहले भी करते थे. लेकिन तब हमपर ग्लोबलाईजेशन का असर नहीं था. लिहाजा तब हिन्दी महीने परेशान करते थे. सिनेमा के गाने याद कीजिये, पता चलेगा कि हीरो-हीरोइन हिन्दी महीने में परेशान रहते थे. इनलोगों को पहले सावन बहुत परेशान करता था. लगभग हर फ़िल्म में एक गाना होता था जिसमें सावन का जिक्र होता था.

दरअसल तब का ज़माना ग्लोबलाईजेशन वाला नहीं था. लिहाजा हीरोइन हिन्दी महीने में परेशान रहती थी और उसी के सहारे बढ़िया संगीतमय गाने बहुत मीठी आवाज़ में गाती थी. बरसात के मौसम में हीरोइन पानी में भीगते हुए सावन के सहारे कोई गीत गाती या फिर बसंत ऋतु में फागुन के सहारे. लेकिन आज के हीरो-हीरोइन चूंकि हिंदी महीनों को भाव नहीं देते इसलिए अब दोनों ज्यादातर मार्च महीने में परेशान रहते हैं.

याद कीजिये सावन में हीरोइन का वह गीत; "तेरी दो टकिया की नौकरी और मेरा लाखों का सावन जाए."

अब इस तरह का गाना सुनाई देता है कहीं? ना. अब हीरो की सैलरी बढ़ गई है. अब उसको लाखों रुपये सैलरी मिलती है. अब हाल यह है कि नौकरी लाखों की हो गई है और सावन दो टके का भी नहीं रहा. आज बड़ी से बड़ी हीरोइन के बस की बात नहीं कि वह गाना गा दे कि; "तेरी दो टकिया की नौकरी मेरा लाखों का सावन जाय ".

एक बार ट्राई करके देख ले. एक बार भी ऐसा गाना गा दे तो हीरो ज्वालामुखी की तरह फट पडेगा; "क्या दो टकिया? दो टकिया की नौकरी होती तो खाने के लाले पड़ जाते. आटा का भाव देखा है? खाने के तेल और दाल का भाव पता है कुछ? प्याज तीस रूपये किलो बिक रही है. वैसे भी तुमको कैसे पता रहेगा? शापिंग मॉल में जींस और टी शर्ट खरीदने से फुरसत मिले तब तो आटा और दाल का भाव पता चले. और सुनो, दो टकिया की नौकरी होती तो ये मलेशिया और पट्टाया की छुट्टियाँ कहाँ से आती?"

अब इस तरह की बातों से डर कर कौन हीरोइन ऐसा गाना गाएगी? उल्टा अब ख़ुद हीरोइन कहती फिरती है; "ह्वाट अ टेरीबल मंथ, दिस सावन इज..वन कांट इवेन ड्रेस प्रोपेर्ली...वही कचरा वही बरसात..बाहर निकलना भी मुश्किल रहता है."

अब तो हालत ये है कि हीरो आफिस से रात को एक बजे घर पहुंचता है तो हीरोइन पड़ोसन को सुनाती है; "क्या बतायें. कल तो ये रात के एक बजे घर आए. मार्च चल रहा है न."

सुनकर लगता है जैसे मार्च महीने में पूरे तीस दिन बॉस का आफिस में काम ही नहीं है और मार्च ही बॉस बन बैठा है. हाथ पकड़कर उसने हीरो को यह कहते हुए बैठा रखा है कि ; "खबरदार एक बजे से पहले कुर्सी से उठे तो."

हीरो की भी चांदी है. आफिस में बैठे-बैठे काम करे या ट्वीट करे, किसे पता? लेकिन चाहे जो भी करे उसे मार्च का अन-कंडीशनल सपोर्ट है. सुबह के तीन बजे भी घर पहुंचेगा तो मार्च है रक्षा करने के लिए. कार्पोरेट वर्ल्ड में सारे पाप और पुण्य यही मार्च करवाता है.

मार्च महीने में घर से निकल जायें तो यही लगता है कि पूरा भारत मार्च मना रहा है. रिक्शेवाला जल्दी में रहता है. बसवाला जल्दी में रहता है. टैक्सीवाला तक जल्दी में रहता है. सभी तेज चलाते हैं. सभी भागे जाते हैं. हिम्मत नहीं होती कि उनसे कह दें कि भाई साहब आहिस्ता चलिए, हमें घर तक पहुंचना है. मन में बात आये तो भी यह डर रहता है कि ये लोग़ पलटकर यह न कह दें; "आपको मालूम नहीं, मार्च महीना चल रहा है. सबकुछ तेजी से होना चाहिए. आप आफिस में काम नहीं करते क्या?"

रास्ते में लोगों की बातें सुनिए. आते-जाते कोई न कोई यह कहते हुए सुनाई देगा ही कि; "बड़ी प्रॉब्लम है. उधर चुन्नू की परीक्षा चल रही है लेकिन मार्च के कारण उसको भी टाइम नहीं दे पा रहे हैं.' या फिर; "अब बस बीस दिन का खेला है उसके बाद अप्रैल से थोड़ा आराम मिलेगा."

लोग़ आफिस में टारगेट बना रहे हैं. टारगेट अचीव कर रहे हैं. जो टारगेट अचीव नहीं कर रहे हैं वे मीटिंग कर रहे हैं. मीटिंग करके यह तय कर रहे हैं कि कल फिर से मीटिंग करेंगे. जो मीटिंग नहीं कर पा रहे हैं वे काम कर ले रहे हैं. जो काम भी नहीं कर पा रहे हैं वे सोच रहे हैं. जो सोच नहीं रहे हैं वे सोचने की एक्टिंग कर रहे हैं. हर कोई व्यस्त है. हर कोई पस्त है. हर कोई मार्च मना रहा है और मार्च भी बेचारा है कि मन रहा है.

लोग़ टैक्स प्लानिंग कर रहे हैं. जो टैक्स प्लानिंग नहीं कर रहे हैं वे उसे करने के बारे में विचार कर रहे हैं. जो विचार नहीं कर रहे हैं वे प्रचार कर रहे हैं. बिल बनाये जा रहे हैं. बिल कैंसल किये जा रहे हैं. एडवांस टैक्स कैलकुलेट किये जा रहे हैं. फिर कैलकुलेशन ध्वस्त किये जा रहे हैं. फिर से कैलकुलेट किये जा रहे हैं. सरकारी विभाग के अफसर अपने विभाग के बजट को खर्च करने के लिए हलकान हुए जा रहे हैं. टेंडर फ़ाइनल किये जा रहे हैं. टेंडर कैंसल किये जा रहे हैं.

उधर इनकम टैक्स के रिटर्न बन रहे हैं तो इधर फ़ाइल हो रहे हैं. रिटर्न बनाने बैठ रहे हैं तो पता चल रहा है कि बैंक स्टेटमेंट गायब हैं. चिट्ठी लिखी जा रही हैं. चिट्ठी पढ़ी जा रही है. आते-जाते सड़कों पर टाइपराइटर चलाने वाले खट-पिट किये जा रहे हैं. कहीं बैलेंस शीट बन रही हैं तो कहीं रिटर्न बन रहा है.

अद्भुत गति से काम हो रहा है. इतना काम अगर साल के हर महीने में हो हम सारी दुनियाँ की प्रोडकटिविटी की बैंड बजाकर रख दें. चीन वाले रेस छोड़कर भाग जायें और अमेरिका वाले वाकओवर दे दें. लेकिन ऐसा नहीं हो सकता क्योंकि मार्च के बाद अप्रैल आ जाता है और हमें निकम्मा बना जाता है.

हमारे देश में निकम्मेपन के लिए साल के ग्यारह महीने जिम्मेदार हैं. यह एक मौलिक रिसर्च है जिसके लिए अगर मुझे नोबल मिल भी जाएगा तो मैं लेने से मना नहीं करूँगा.

वैसे मार्च आया है तो जाएगा भी. परमानेंटली रहने के लिए कौन आया है इस धरती पर? उसके चले जाने के बाद कुछ लोग़ निराश भी हो जायेंगे. जो लोग निराश होंगे वे इसलिए निराश होंगे कि मार्च का नाम लेकर देर रात तक घर से बाहर नहीं रह सकेंगे. लेकिन उन्हें ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं. समय देखते देखते कट जाता है. मार्च अगले मार्च में फिर आएगा.