आधा किलो की यह तुकबंदी मार्च २००९ में लिखी गई थी. कई राज्यों में लोकतंत्र का इम्तिहान यानि चुनाव एक बार फिर से होने को हैं. ऐसे में मुझे लगा कि री-ठेल कर देना बुरा नहीं होगा:-)
वोट निंद्य है शर्मराज, पर,
कहो नीति अब क्या हो
कैसे वोटर लुभे आज फिर
पाँव तले तकिया हो
कैसे मिले हमें शासन का
पेडा, लड्डू, बरफी
किस रस्ते पर चलकर लूटें
चाँदी और अशर्फी
क्या-क्या रच डालें कि;
जनता खुश हो जाए हमसे
दे दे वोट हमें ही ज्यादा
हम फिर नाचें जम के
अगर कहो तो सेकुलर बन, हम
फिर महान हो जाएँ
नहीं अगर जंचता ये रस्ता
राम नाम हम गायें
अगर कहो तो गाँधीगीरी कर
त्यागी कहलायें
शासन के बाहर ही बैठे
जमकर हलवा खाएं
तुम कह दो तो गठबंधन कर
दें जनता को धोखा
तरह तरह के स्वांग रचें हम
मारें पेटी खोखा
कल तक जो थे साथ, कहो तो
साथ छोड़ दें उनका
नहीं समर्थन मिले हमें तो
हाथ तोड़ दें उनका
तुम कह दो तो एक कमीशन
बैठाकर फंसवा दें
अगर कहो तो खड़े-खड़े ही
पुलिस भेज कसवा दें
नीति-वीति की बात करे जो
उसका मुंह कर काला
भरी सड़क पर उसे बजा दें
हो जाए घोटाला
बाहुबली की कमी नहीं
गर बोलो तो ले आयें
उन्हें टिकट दे खड़ा करें, और
नीतिवचन दोहरायें
दलितों की बातें करनी हो
गला फाड़ कर लेंगे
बात करेंगे चावल की, पर
उन्हें माड़ हम देंगे
तुम कह दो तो कर्ज माफ़ कर
हितचिन्तक बन जाएँ
मिले वोट तो भूलें उनको
उनपे ही तन जाएँ
गठबंधन का धर्म निभाकर
पॉँच साल टिक जाएँ
आज जिन्हें लें साथ, उन्ही को
ठेंगा कल दिखलायें
किसे बनाएं मुद्दा हम, बस
एक बार बतला दो
जो बोलोगे वही करेंगे
तुम तो बस जतला दो
अगर कहो तो बिजली को ही
फिर मुद्दा बनवा दें
अगर नहीं तो सड़कों पर ही
पानी हम फिरवा दें
शर्मराज जो भी बोलोगे
हम तो वही करेंगे
शासन में रह मजे करेंगे
अपना घर भर लेंगे
.......................................................
शर्मराज ने आँखें खोली, और
शांत-मुख लेकर
बोले; "सुन लो भ्रात आज तुम
चित्त, कान सब देकर"
जिस रस्ते पर चलकर चाहो
सत्ता सुख को पाना
उसे चुनो और बुन डालो तुम
पक्का ताना-बाना
सच तो यह है आज राजसुख
उतना इजी नहीं है
इसे प्राप्त करने के हेतु ही
हर दल आज बिजी है
विकट सत्य को समझो कि यह
गठबंधन का युग है
विचलित न हो लोग कहें गर
'शठ-बंधन' का युग है
शर्म छोड़ कर शठ बन जाओ
खोजो और शठों को
अगर ज़रुरत हो तो चुन लो
कुछ धार्मिक मठों को
राजनीति हो अलग धर्म से
गीत सदा यह गाकर
प्राप्त करो सत्ता सुख को
'शठ-बंधन' धर्म निभाकर
शर्म से होती है सत्ता-नीति को हानि
....................शर्महीनता ही सत्ता-नीति का आधार है
एक बार शर्म छोड़ बेशर्म बन जाओ
................... और फिर देखो कैसे बढ़ता बाज़ार है
ले लो ज्ञान मुझसे और कूद पडो दंगल में
....................सत्ता पाने के लिए जुगत हज़ार है
बात सुनो भ्रात मेरी ध्यान-कान देकर तुम
....................तुम्हें ज्ञान देने को शर्मराज तैयार है
सबसे पहले बाँट डालो देशवासियों को तुम
....................इसके पश्चात अपने वोटर को चुन लो
कर समापन यह चुनाव पानी में उतारो नाव
...................वोटर को लुभाने के तरीके भी सुन लो
कर डालो वादे और खा डालो कस्में तुम
...................इन सारे तरीकों को शांत-चित्त गुन लो
इसके साथ पैसे और शराब का कम्बीनेशन हो
...................इसपे भी वोटर न रीझे, गुंडे भेज धुन दो
मुद्दा हो निकास का या आर्थिक विकास का हो
..................उसके बारे में भूल से भी मत बोलना
दलों का जो दलदल है उसको पहले निहारो
..................कितना कीचड़ है उसमें इसको तुम तोलना
अपने दल के कीचड़ को बाकी से तुलना कर
..................कसकर कमर को अपनी सीटों को मोलना
बारगेनिंग का कर हिसाब अगले की पढ़ किताब
..................उतरकर दलदल में तुम धीरे-धीरे डोलना
चुनाव के मंचों पर तो साथ में दिखना, परन्तु
..................विपक्षी के साथ भी तुम रखना रिलेशन
जाने कौन काम आये चुनाव परिणाम बाद
..................असली सत्ता सुख का ये पहला कंडीशन
इसके साथ-साथ याद रखना पहले पाठ को तुम
..................जिससे मिले एंट्री का क्वालिफिकेशन
नारों और गानों की लिस्ट तैयार कर
..................सुबह-शाम करते रहना उनका रेंन्डीशन
धर्मनिरपेक्षता पर खतरे की बातें करो
..................जो भी तुम चाहोगे वही हो जायेगा
देश को बचाने का रच डालो स्वांग गर
..................राजधर्म कोसों दूर पीछे रह जायेगा
सत्ता में आने के बाद भत्ता हड़प डालो
..................जनता हलकान हो पर प्लान फल जायेगा
धरते पकड़ते रहो दल और नेताओं को बस
..................राज करो पांच साल, देश चल जायेगा
साथी दल को संग लेकर लड़ लो चुनाव किन्तु
..................कहीं-कहीं उन्ही संग 'फ्रेंडली' कंटेस्ट हो
ट्राई कर लंगी मार उनको गिरा डालो
..................अगर उस सीट पर भी उनका इंटेरेस्ट हो
इससे भी न काम बने दो-चार कैंडीडेट खोज
..................उनको खड़ा करने का इंतजाम परफेक्ट हो
भ्रात सारे घात सीख उतरो मैदान में तुम
..................मेरी तरफ से तुमको आल द बेस्ट हो
शर्मराज की बात सुनी और लेकर उनका ज्ञान
बेशर्मी पर उतर गए और शुरू हुआ अभियान
Monday, March 21, 2011
चुनाव गाथा
Saturday, March 19, 2011
दुर्योधन की डायरी - पेज २०१२
कल होली है. होनी भी चाहिए. इसी महीने में तो होती है. सावन में नागपंचमी होती है और उसके बाद छट. आगे बढें तो दुर्गापूजा और दिवाली. ऐसे में होली इसी महीने में आकर झमेला ख़त्म करे, यही सबके लिए अच्छा है. लेकिन जब भी होली आती है तो मुझे खुद के अभागे होने का ख्याल मन में आता है. ऐसा न कहूँ तो और क्या कहूँ? सबसे बड़ा भाई होने का सबसे बड़ा डिसएडवान्टेज ये है कि भौजाई की कमी खलती है. और ऐसी-वैसी नहीं, बहुत खलती है. बड़ा भाई होने का मतलब यह नहीं कि आदमी केवल बड़ा भाई होकर रहता है. बड़े भाई होने का मतलब यह भी होता है कि आदमी जन्मजात जेठ होकर रह जाता है. जेठ होना होली के मौके पर बहुत दुःख देता है.
एक तो जनम से जेठ थे ही ऊपर पांडवों को वनवास-ए-बामुसक्कत की सजा दे डाली. मामला वैसे ही निकला जैसे कोढ़ में खाज. ऐसा नहीं हुआ होता तो होली के मौके पर देवर बनने का एक चांस तो रहता. जैसा कि एक महान गीतकार ने लिखा है; 'गिले शिकवे भूल कर दोस्तों, दुश्मन भी गले मिल जाते हैं...' तो एक दिन दुश्मनी भूलकर द्रौपदी भाभी के साथ होली खेल आता. लेकिन इनलोगों को सजा देकर सब गुड गोबर कर डाला.
वैसे फिर मन में बात आती है कि दुविधा तो वहाँ भी रहती. हो सकता है वहाँ भी होली नहीं खेल पाता क्योंकि भाभी को कन्फ्यूजन रहता कि मुझे देवर समझे या जेठ. आख़िर वे केवल युधिष्ठिर भइया की पत्नी नहीं हैं, नकुल और सहदेव की पत्नी भी वही हैं.
खुद से यही बात करके मन पर सतोष का छींटा मार लेता हूँ. संतोष के छीटों के साथ ऐसे समय में मदिरा भी थोड़ा हेल्प कर देती है.
वैसे एक बात से इन्कार नहीं कर सकता कि जबसे इनलोगों को वनवास का टिकट थमाया है, ये होली के मौके पर जरूर याद आ जाते हैं. लेकिन याद आने पर भी क्या किया जा सकता है? इसलिए होली खेलता भी हूँ तो कर्ण के साथ. उसके साथ होली खेलने में क्या मज़ा? बहुत बोरिंग होती है इस कर्ण की होली. चुटकी भर गुलाल भी गाल पर लगाते समय इतनी एहतियात बरतता है मानो किसी दुधमुंहे बच्चे को लगा रहा हो. न तो फाग सुनता है और न ही कवि सम्मलेन में कवियों की तथाकथित कवितायें. कविताओं पर कान न देने की बात तो समझ में आती है लेकिन फाग? फिर सोचता हूँ तो मुझे लगता है जैसे फाग भी उसे युद्धगीत जैसा लगता होगा. मदिरा की तो बात दूर ठंडाई में भंग तक मिलाने नहीं देता.
ऐसे मौकों पर उसके साथ रहकर तो यही लगता है कि हमारे करम फूट गए.
बोर आदमी है. बोर क्या महाबोर है. आता है और गुलाल लगाते हुए गले मिलकर चला जाता है. रुकने के लिए कहता हूँ तो एक ही बहाना बनाकर निकल लेता है - धनुष बाण साफ करना है और बाण चलाने की प्रैक्टिस करनी है. पता नहीं कब युद्ध शुरू हो जाए.
आकर चला जाता है तो मेरी होली दुशासन और जयद्रथ के साथ सिमट कर रह जाती है. राजमहल से बाहर निकल कर लोगों को होली खेलते हुए देखने की बड़ी इच्छा होती है लेकिन राजपुत्र होने का भी अपना डिसएडवांटेज है. लोगों के बीच में जाकर होली भी नहीं खेल सकता. न जाने कितने सालों से जितनी गिनी-चुनी बदमाशियां कर सकता हूँ, सब राजमहल में ही करनी पड़ती हैं. अब तो ये पुरानी बदमाशिया भी बोर करने लगी हैं. हाल यह हो चला है कि होली के अवसर पर खुद को बदमाश मानने में भी शर्म आने लगी है.
वही ठंडाई, वही नर्तकियां, वही ठंडाई का गिलास और वही दरबारी. कई बार संजय को फुसला कर इस बात पर राजी करने की कोशिश की कि वह हस्तिनापुर में खेली जानेवाली होली का लाईव टेलीकास्ट ही दिखा दे लेकिन वह तो पिताश्री को छोड़कर किसी की बात ही नहीं मानता. कहता है उसके चैनल पर होनेवाले हर टेलीकास्ट का एक्सक्लूसिव राईट्स पिताश्री के पास है. पिताश्री ने थोड़ी इज्ज़त क्या दी, सिर पर चढ़कर बैठ गया. मैं पूछता हूँ राजकुमारों की हसरतों और फरमाइशों का ख्याल दरबारी और सारथी नहीं रखेंगे तो कौन रखेगा? कई बार मन में आया कि इसके ऊपर यह आरोप लगा कर इसे डिशमिश करवा दूँ कि यह घोड़ों के लिए खरीदे जाने वाले भोजन की कालाबाजारी करता है लेकिन कर्ण द्वारा मना करने पर मन मारकर बैठ जाना पड़ा.
जल्द ही इसका कुछ करना पड़ेगा.
पिछले बरस दु:शासन भेष बदलकर लोगों की भीड़ में घुस गया था और अपने सेलफ़ोन के कैमरे से फोटो खींच लाया था. वही दो-चार फोटो देखने को मिली थी. इस साल तो यह भी होने से रहा. दुशासन बाहर जाने से भी डर रहा है. आज़ाद हिंद ढाबे पर इसने बीयरपान करके नशे में किसी लड़की को छेड़ा था और उसके आशिक ने इसकी धुलाई क्या की, अब वह अकेले तो क्या चार सिपाहियों के साथ भी बाहर निकलने से डरता है.
सुबह से ही बीयरपान में मस्त है. कहता है दो दिन बीयर पीकर गुज़ार देगा. अपने चमचों को भेजकर बालाजी वाइन शॉप से जबरदस्ती चार क्रेट बीयर उठावा लाया है. उधर जयद्रथ मोहिनी-अट्टम देखने में बिजी है. सुना है दो दिन तक इस बात पर अड़ा रहा कि उज्बेकिस्तान से आई नर्तकी को भारत-नाट्यम परफार्म करना ही पड़ेगा. काफी झमेले और बहस के बाद वह नर्तकी मोहिनी अट्टम करने पर राजी हुई.
ये ऐसे बिजी हैं तो मुझे अपना होली प्रोग्राम खुद ही बनना पड़ेगा. क्या किया जा सकता है? ऐसे ही दरबार में रहना पड़ेगा और हास्य कवि सम्मेलन में 'कवियों' के चुटकुले सुनकर होली मनानी पड़ेगी. ये लोग़ पिछले दस सालों से उन्ही बासी चुटकुलों की कविता बनाकर ठेलते रहे हैं. ऊपर से कहते हैं कि कविता सुना रहे हैं.
इतनी-इतनी मुद्रा देकर इन कवियों को बुलाया जाता है लेकिन इन्हें जरा भी शर्म नहीं. आने-जाने का किराया अलग. ऊपर से कहते हैं कि फर्स्ट क्लास का टिकट न देकर इन्हें डायरेक्ट मुद्रा ही दे दी जाय. दुशासन का एक गुप्तचर बता रहा था कि दो-तिहाई कवि फर्स्ट क्लास के टिकट का पैसा लेकर सेकंड क्लास से आते-जाते हैं. ऊपर से एक कवि तो इस बात पर अड़ गया कि उसके स्वागत के लिए उसे गेंदा के फूलों की माला न पहनाई जाय. वह चाहता है कि उसे केवल गुलाब के फूलों की माला पहनाई जाय. बेवकूफ को यह नहीं पता कि गुलाब के फूलों की माला बनाने में माली को कितनी तकलीफ होती है? कवियों को लाने के लिए दो घोड़ों के रथ भेजे गए थे. एक कवि अड़ गया. बोला जब तक उसके लिए चार घोड़ों का रथ नहीं जाएगा तबतक वह राजमहल में कविता सुनाने आएगा ही नहीं.
मुझे इस कवि के बारे में पता है. विद्यार्थियों के बीच चुटकुले सुनाकर इसने अपना बाज़ार गरम किया है.
वैसे कोई-कोई कवि गलती से एकाध बार कविता भी सुना बैठता है. परसों के कवि सम्मेलन में किसी कवि ने ये कविता सुनाई थी. मुझे अच्छी लगी. लिख देता हूँ. कवि का नाम तो याद नहीं क्योंकि मैं भंग के नशे में था लेकिन कविता यूं थी...
क्या फागुन की ऋतु आई है
डाली-डाली बौराई है
हर और सृष्टि मादकता की
कर रही फ्री में सप्लाई है
धरती पर नूतन वर्दी है
खामोश हो गई सर्दी है
कर दिया समर्पण भौरों ने
कलियों में गुंडागर्दी है
मनहूसी मटियामेट लगे
खच्चर भी अप टू डेट लगे
फागुन में काला कौवा भी
सीनियर एडवोकेट लगे
फागुन पर सब जग टिका लगे
सेविका परम प्रेमिका लगे
बागों में सजी-धजी कोयल
टीवी की उदघोषिका लगे
जय हो कविता कालिंदी की
जय रंग-बिरंगी बिंदी की
मेकप में वाह तितलियाँ भी
लगती कवियित्री हिन्दी की
पहने साड़ी वाह हरी-हरी
रस भरी रसों से भरी-भरी
नैनों से डाका डाल गई
बंदूक दाग गई धरी-धरी
हर और मची हा-हा, हू-हू
रंगों का भीषण मैच शुरू
साली की बालिंग पर देखो
जीजा जी हैं एल बी डब्ल्यू
भाभी के रन पक्के पक्के
हर ओवर में छ छ छक्के
कोई भी बाल न कैच हुआ
सब देवर जी हक्के-बक्के
गर्दिश में वही बेचारे हैं
बेशक जो बिना सहारे हैं
मुंह उनका ऐसा धुआं-धुआं
ज्यों अभी इलेक्शन हारे हैं
क्या फागुन की ऋतु आई है
मक्खी भी बटरफिलाई है
कह रहे गधे भी सुनो-सुनो
इंसान हमारा भाई है
नोट: युवराज तो भंग के नशे में थे इसलिए उन्हें कवि का नाम याद नहीं लेकिन आपको बता दूँ कि यह कविता प्रसिद्द कवि श्री डंडा लखनवी की है.
Friday, March 18, 2011
अमर सिंह का इंटरव्यू - न्यूक्लीयर डील री-विजिटेड
नोट: मैंने यह पोस्ट संसद में न्यूक्लीयर डील पर होने वाले (अ)विश्वास प्रस्ताव पर जुलाई २००८ में लिखा था. चूंकि न्यूक्लीयर डील पर एक बार फिर से बात हो रही है इसलिए सोचा कि इस पोस्ट की रि-ठेल कर दूँ. जिन्होंने नहीं पढ़ा होगा वे पढ़ लेंगे.
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अपने देश में दो तरह के नेता होते हैं. एक वे जो डिमांड में रहते हैं और दूसरे वे जो रिमांड में रहते हैं. जैसे अमर सिंह जी आजकल डिमांड में हैं. 'न्यू-क्लीयर डील' को पास कराने का बीड़ा उठाकर राष्ट्रहित में काम करने का जो साहस उन्होंने किया है वैसा बिरले ही कर पायेंगे. पिछले पन्द्रह दिनों से हर टीवी चैनल पर वही दिखाई दे रहे हैं. एक पत्रकार ने उनक इंटरव्यू लिया था लेकिन वो इंटरव्यू प्रसारित नहीं हो सका. प्रस्तुत है वही इंटरव्यू. टीवी पर नहीं प्रसारित हो सका तो क्या हुआ, ब्लॉग पर ही सही.
पत्रकार: "स्वागत है आपका अमर सिंह जी. हमारे कार्यक्रम में आपका बहुत-बहुत स्वागत है."
अमर सिंह: "देखिये, फालतू की बातों के लिए समय नहीं है हमारे पास. आप जल्दी से अपने सवाल पूछिए. हमें आधे घंटे बाद बीबीसी पर इंटरव्यू देना है. उसके बाद सीएनएन पर जाना है. उसके बाद हमें रेडियो अफ्रीका के लिए..."
पत्रकार: " नहीं-नहीं, ऐसा मत कहिये. ये तो हम तो औपचारिकता निभा रहे थे."
अमर सिंह: "आप पत्रकार भी क्या-क्या निभा जाते हैं. नेताओं से दोस्ती निभाने के लिए कहते हैं और ख़ुद केवल औपचारिकता निभाते हैं. खैर, कोई बात नहीं. आप सवाल दागिए."
पत्रकार: "सवाल दागना नहीं है. मैं तो सवाल पूछूंगा."
अमर सिंह: "वो तो देखिये ऐसे ही मुंह से निकल आया. जब से 'न्यू-क्लीयर' डील में उलझा हूँ, दागना, फोड़ना जैसे शब्द जबान पर आ ही जाते हैं. वैसे, आप सवाल पूछिए."
पत्रकार: "मेरा सवाल आपसे यह है कि आपने कैसे फ़ैसला किया कि न्यूक्लीयर डील राष्ट्रहित में है?"
अमर सिंह: "आप किस तरह के पत्रकार हैं? आपको पता नहीं है कि हमने सबसे पहले न्यूक्लीयर डील को लेकर डाऊट किया, तब जाकर जान पाये कि ये डील राष्ट्रहित में है."
पत्रकार: "अच्छा, अच्छा. हाँ, वो मैंने पढ़ा था. आपके डाऊट के बारे में. वैसे एक बात ये बताईये, आपके वामपंथी साथियों ने न्यूक्लीयर डील को राष्ट्रहित में क्यों नहीं माना?"
अमर सिंह: "डाऊट नहीं किया न. डाऊट किया होता तो उन्हें भी पता चलता कि ये डील राष्ट्रहित में है."
पत्रकार: "लेकिन उनके डाऊट नहीं करने के पीछे क्या कारण हो सकता है? मतलब, आपको क्या लगता है?"
अमर सिंह: "मैंने पूछा था. मैंने कामरेड करात से पूछा था. मैंने पूछा कि 'आपने डाऊट क्यों नहीं किया?' वे बोले 'हम तो साढ़े चार साल से डाऊट कर के राष्ट्रहित में काफी कुछ कर चुके हैं. अब आपको मौका देते हैं कि न्यूक्लीयर डील पर डाऊट करके आप भी राष्ट्रहित में कुछ कीजिये."
पत्रकार: "ओह, तो ये बात है. लेकिन आपने समझाया नहीं कि आपदोनों मिलकर भी तो राष्ट्रहित में कुछ कर सकते हैं?"
अमर सिंह: "हमने तो कहा था. हमने कहा कि आधा डाऊट हम कर लेते हैं, आधा आपलोग कर लीजिये. हम अपने डाऊट का समाधान डॉक्टर कलाम से करवा लेंगे. आपलोगों को डॉक्टर कलाम पसंद नहीं हैं तो आप ऐसा कीजिये कि अपने डाऊट का समाधान किसी चीन के वैज्ञानिक से करवा लीजियेगा."
पत्रकार: "क्या जवाब था उनका?"
अमर सिंह: "कुछ साफ़ नहीं पता चला. वे कुछ बुदबुदा रहे थे. मुझे लगा जैसे कह रहे थे 'चीन के कारण ही तो सारा झमेला है.'"
पत्रकार: "वैसे आप ये बताईये कि डॉक्टर कलाम से मिलने के बाद आपके सारे डाऊट क्लीयर हो गए?"
अमर सिंह: "बहुत अच्छी तरह से. उनसे मैंने और राम गोपाल यादव जी ने इतनी शिक्षा ले ली है कि हम दोनों न्यू-क्लीयरोलोजी में मास्टर बन गए हैं. अब तो हम भारत ही नहीं बल्कि ईरान, पाकिस्तान, उत्तरी कोरिया जैसे देशों का न्यूक्लीयर डील पास करवा सकते हैं."
पत्रकार: "माफ़ कीजियेगा, लेकिन न्यू-क्लीयरोलोजी नहीं बल्कि उस विषय को न्यूक्लीयर फिजिक्स कहते हैं."
अमर सिंह: "हा हा हा हा. वैसे आपकी गलती नहीं है. मैं साइंस की नहीं बल्कि आर्ट की बात कर रहा था. न्यू-क्लीयरोलोजी का मतलब वो कला जिसमें न्यू-क्लीयर डील पास कराने की पढाई होती है."
पत्रकार: "अच्छा, अब जरा इस डील से उपजी राजनैतिक परिस्थितियों पर बात हो जाए. अफवाह है कि आपने केन्द्र सरकार को इस मुद्दे पर समर्थन इस शर्त के साथ दिया है कि वो मायावती जी के ख़िलाफ़ सीबीआई से कार्यवाई करने को कहे. क्या यह सच है?"
अमर सिंह: "यह बात बिल्कुल ग़लत है. देखिये सुश्री मायावती के ख़िलाफ़ सीबीआई के पास सुबूत तो पिछले तीन सालों से थे. लेकिन सीबीआई के लिए काम करने वाले पंडितों और ज्योतिषियों ने सीबीआई को सुबूत अदालत में दाखिल करने से रोक रखा था. पंडितों ने कहा था कि अगर ये सुबूत साल २००८ के जुलाई महीने में अदालत को दिए जाय, तो ये सीबीआई के लिए शुभ होगा. पंडित लोग तो मनुवादी हैं न. वे तो शुरू से मायावती जी के पीछे पड़े हैं."
पत्रकार: "अच्छा, अच्छा. तो ये बात है. लेकिन अमर सिंह जी, आपको नहीं लगता कि अब आप उसी सरकार को समर्थन दे रहे हैं, जिस सरकार से आप लड़े."
अमर सिंह: "देखिये, हमारा ऐसा मानना है कि राजनीति में लड़ाई नहीं होती है. विरोध करना एक बात है और फिर उन्ही विरोधियों के साथ मिल जाना सर्वथा दूसरी. हम पहले विरोध करते हैं. जब देखते हैं कि विरोध से कुछ नहीं होनेवाला तो हम मिल जाते हैं. अभी हम और कांग्रेस मायावती जी के विरोध में हैं. लेकिन कल को मायावती जी केन्द्र में आ जायेंगी तो हम साथ भी हो सकते हैं."
पत्रकार: "लेकिन आप उनलोगों के साथ कैसे रह सकते हैं जिनसे आप झगड़ चुके हैं? आपने ख़ुद एक बार लालू जी को भांड कह दिया था."
अमर सिंह: "देखिये इस मामले में मुझे यही कहना है कि आई हैव बीन मिसकोटेड. भांड शब्द का मतलब यहाँ कुछ और ही था. देखिये मैं कलकत्ते में पला बढ़ा हूँ. और कलकत्ते में कुल्हड़ को भांड कहा जाता है. मैंने तो केवल ये कहा था कि लालू जी कितने प्यारे हैं. बिल्कुल कुल्हड़ की तरह. और दूसरी बात ये कि कुल्हड़ मिटटी से बनता है और लालू जी मिट्टी से जुड़े नेता हैं. मैंने तो उनकी तारीफ़ की थी."
पत्रकार: "तो आपको क्या लगता है, आप संसद में सरकार का बहुमत साबित कर पायेंगे?"
अमर सिंह: "बिल्कुल, पूरी तरह से. हमारे साथ ३०० सांसद हैं."
पत्रकार: "लेकिन अफवाह है कि सांसद खरीदे जा रहे हैं. कल बर्धन साहब ने कहा कि पच्चीस करोड़ में एक बिक रहा है."
अमर सिंह: "मैं इस पर कुछ कमेन्ट नहीं करना चाहता. बर्धन साहब का तो कोई सांसद बिका नहीं है. उन्हें कैसे पता क्या रेट चल रहा है."
पत्रकार: "अच्छा ये बताईये कि ये बात कहाँ तक जायज है कि आप अपने उद्योगपति मित्रों का एजेंडा राजनीति में ले आयें?"
अमर सिंह: "देखिये मैंने माननीय प्रधानमंत्री के सामने कुछ मांगे रखी हैं. लेकिन ये सभी मांगे राष्ट्रहित में हैं. हाँ, अब इन मांगों से अगर हमारे मित्रों का भला हो जाए, तो वो तो संयोग की बात है. हमारे मित्रो के लिए इस तरह का फायदा केवल एक बायप्रोडक्ट है. ठीक वैसे ही जैसे हम साम्प्रदायिकता की समस्या को दूर करने के लिए कांग्रेस के साथ आए हैं. अब ऐसे में अगर न्यूक्लीयर डील पास हो जाए, तो वो महज एक संयोग समझा जाय."
पत्रकार: "वैसे आपने प्रधानमंत्री से अम्बानी भाईयों के झगडे को सुलझाने की बात कही. क्या यह सच है?"
अमर सिंह: "हाँ. यह बात सच है. मैंने प्रधानमंत्री से कहा है कि दोनों भाईयों का झगडा अगर सुलझ जाता है तो वो राष्ट्रहित में होगा."
पत्रकार: "मतलब ये कि दोनों भाईयों का हित ही असली राष्ट्रहित है."
ये सवाल सुनकर अमर सिंह जी कुछ बुदबुदाए. लगा जैसे कह रहे थे, ' दोनों का झगडा सुलझ जाए तो मैं दोनों के नज़दीक रहूँगा. असल में तो मेरा हित होगा. मेरा हित मतलब राष्ट्रहित है.'
उनकी बुदबुदाहट बंद होने के बाद पत्रकार भी कुछ बुदबुदाया. मानो कहा रहा हो; 'हम बेशर्मी के स्वर्णकाल में जी रहे हैं.'

