(सं)वैधानिक अपील: ब्लॉगर मित्रों से अनुरोध है कि इस अगड़म-बगडम पोस्ट को केवल मनोरंजन की दृष्टि से देखें।
इसी साल (२००७ में) भारत में पहली बार किसी राजनैतिक पार्टी ने अपना हिन्दी ब्लॉग शुरू किया।

ब्लॉग समाज के बढ़ते प्रभाव ने जहाँ राजनैतिक दलों को अपने ख़ुद के चिट्ठे बनाने के लिए विवश किया वहीँ सन २००८ के संभावित मध्यावधि चुनावों को देखते हुए हिन्दी चिट्ठाकारों के लिए तरह-तरह के प्रस्ताव और प्रलोभन भी दिए गए। कांग्रेस पार्टी ने अपने चुनाव घोषणापत्र में इस बात की घोषणा की; 'अगर पार्टी सत्ता में आती है तो एनसीईआरटी की किताबों में हिन्दी चिट्ठाकारों द्वारा लिखे गए निबन्धों को प्राथमिकता दी जायेगी.’ बाद में पार्टी के मानव संसाधन विकास समिति ने हिन्दी चिट्ठाकारों द्वारा लिखे गए निबन्धों को पाठ्यपुस्तकों में शामिल करने के लिए सत्ताईस प्रतिशत आरक्षण देने का प्रस्ताव रखा. हालांकि कांग्रेस पार्टी को ये प्रस्ताव मंजूर था, वामपंथियों ने ऐसे किसी प्रस्ताव का विरोध किया. कुछ इतिहासकारों का मानना है कि 'वामपंथी पार्टियां इस बात से डरी हुई थी कि नन्दीग्राम और सिंगुर पर लिखे गए निबंध अगर पाठ्यपुस्तकों में शामिल कर लिए गए तो उन्हें समस्या हो सकती है'. कांग्रेस पार्टी ने इसका समर्थन करते हुए सन २००९ से पाठ्यपुस्तकों में चिट्ठाकारों द्वारा लिखे गए निबन्धों को शामिल करने के लिए संसद में एक प्रस्ताव रखा. बाद में इस प्रस्ताव का विरोध करते हुए कुछ नेताओं ने चिट्ठाकारों के क्रीमी लेयर को आरक्षण का लाभ न देने को लेकर विवाद शुरू कर दिया. इस विवाद के समाधान के लिए सरकार ने एक समिति बनाई जिसकी रिपोर्ट आजतक …(आगे का पन्ना गायब है)
इसी साल के मध्य में हिन्दी चिट्ठाकारिता के स्तम्भ श्री प्रमोद सिंह "अजदक" जी ने अपनी बहुचर्चित चीन यात्रा की। उन्होंने अपनी इस यात्रा पर कुल मिलकर २७५ पोस्ट लिखी और पूरी यात्रा का वर्णन विस्तारपूर्वक अपने चिट्ठे पर किया. कुछ इतिहासकारों का मानना है कि प्रमोद सिंह जी ने अपनी इस यात्रा का पूरा व्यौरा चिट्ठाकारों के साथ नहीं बाँटा. ऐसे इतिहासकारों का मानना है कि अपनी इस यात्रा के दौरान श्री सिंह ने क़रीब पचीस हज़ार चीनी नागरिकों को हिन्दी चिट्ठाकारिता के गुर सिखाये. ये बात तब सामने आई, जब इन चीनी नागरिकों ने साल २००८ के मार्च महीने में अपने हिन्दी चिट्ठों का पंजीकरण के साथ-साथ प्रकाशन भी शुरू किया. श्री सिंह के इस योगदान की सराहना करते हुए चीन की सरकार ने उन्हें 'निशान-ए-चीन' के खिताब से सम्मानित किया. सन २०२० में चीन की स्कूली पाठ्यपुस्तको में श्री सिंह के ऊपर एक पूरा अध्याय शामिल कर लिया गया. इतिहासकारों का मानना है कि ऐसा करके चीन सरकार ने भारत के उस एहसान का बदला चुका दिया जिसके तहत भारतीय स्कूली पाठ्यपुस्तकों में ह्वेनसांग और उनकी भारत यात्रा के बारे में पूरा एक अध्याय था. कुछ विद्वान् यह भी मानते हैं कि श्री सिंह ने हु जिंताओ के उस अनुरोध को ठुकरा दिया जिसमें उन्हें चीन की नागरिकता….(आगे का पन्ना गायब है)
साल के मध्य में एक ऐसी घटना घटी, जिसने हजारों साल की हिंदू संस्कृति की मान्यताओं पर एक प्रश्नचिन्ह लगा दिया. मई महीने में प्रसिद्ध 'चिप्पीकार' और विचारक श्री अभय तिवारी के 'हम सब गंगू हैं' शीर्षक से प्रकाशित निबंध ने सालों से प्रतिष्ठित सांस्कृतिक मान्यताओं पर नए सिरे से बहस का दरवाजा खोल दिया. इस निबंध ने न केवल सांस्कृतिक बल्कि संवैधानिक संकट भी पैदा कर दिया. उनके निबंध को साल २००८ से एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकों में शामिल करने को लेकर बवाल खडा हो गया. तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री श्री अर्जुन सिंह जहाँ इस निबंध को पाठ्यपुस्तकों में शामिल करने के पक्ष में थे, वहीँ हिंदू वादी संगठनों ने इसका जमकर विरोध किया. इन संगठनों का मानना था कि इस निबंध के निष्कर्ष को मान्यता देने से पूरे हिंदू समाज पर घोर संकट आ जायेगा. इन संगठनों ने एक श्वेतपत्र जारी करते हुए बताया; 'कल्पना कीजिये कि ऐसे निबंध को मान्यता देने का नतीजा क्या होगा. हमारे द्वारा दिया गया नारा; 'गर्व से कहो हम हिंदू हैं' का मतलब पूरी तरह से बदल जायेगा. कुछ संस्थान, जैसे 'विश्व हिंदू परिषद्' और उनके द्वारा किए गए सम्मेलनों को लोग मजाक की दृष्टि से देखेंगे. अगर ऐसा होता है तो बनारस हिंदू युनिवर्सिटी का नाम बदलकर क्या रखा जायेगा'. इस निबंध को लेकर विवाद इतना बढ़ गया कि श्री अभय तिवारी के निवास स्थान पर कई दिनों तक इन संगठनों ने प्रदर्शन किया. इन हिंदू धार्मिक संगठनों के साथ साथ अखिल भारतीय मुहावरा बचाओ समिति ने भी इस निबंध से निकलने वाले आशय का विरोध किया. समिति का कहना था कि अगर ऐसा हुआ तो 'कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली' नामक मुहावरे पर संकट आ जायेगा और मुहावरा इतिहास से मिट जायेगा. जहाँ सरकार को बाहर से समर्थन वाले वामपंथी इस निबंध को पाठ्यपुस्तकों में रखने के पक्ष में थे, वहीँ धार्मिक संगठनो…..(आगे का पन्ना गायब है)
आगे भी जारी है....
ऐसा कैसे हो सकता है कि श्री प्रमोद सिंह जी को चीन नागरिकता न दे. मेरा तो आकलन है कि चीन ने उन्हे निशाने-चीन या एसोशियेट नागरिकता - दोनो में से एक चुनने का विकल्प दिया था. अज़दक जी ने निशाने-चीन को चुना.
ReplyDeleteजमाये रहिये।
ReplyDeleteमस्त!!
ReplyDeleteगज़ब तो आप लिखते ही हो पर इस बार ऐसी कौन सी बूटी खा लिए हैं जो कल्पनालोक की ऐसी बढ़िया सैर न केवल खुद कर रहे हैं बल्कि हमें भी करवा रहे हैं!!
बड़ा धांसू इतिहास लिख रहे हैं। प्रमोद सिंह जी को निशाने-चीन दिला ही दो। चाहे कुछ पन्ने खोजने ही पड़ें।
ReplyDeleteबाकी सब तो दीपांजली ने कह दिया है. सिर्फ ब्लाग अड्डा जाने की सलाह मैं नहीं दूंगा. अच्छी लेखनी है.
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