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Monday, November 1, 2010

दुर्योधन की डायरी - पेज २९६२


@mishrashiv I'm reading: दुर्योधन की डायरी - पेज २९६२Tweet this (ट्वीट करें)!

जब से स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स और हॉस्टल तोड़कर अपनी प्रतिमा लगवाई है, उसका फायदा दिखाई दे रहा है.

पिछले सप्ताह मामाश्री के सुझाव पर दो दिन की पदयात्रा पर निकल गया था. प्रजा के बीच जाकर लगा जैसे ईमेज कुछ ठीक हो रही है. लेकिन मुझे बहुत फूंक-फूंक कर कदम रखने की जरूरत है. मामाश्री कह रहे थे मुझे सबसे ज्यादा जरूरत इस बात पर ध्यान देने की है कि संवाददाता सम्मेलनों में मुंह से कुछ उलटा-पुल्टा न निकल आए.

पिछले महीने एक सभा में भाषण देते-देते जोश में गलती कर बैठा. कुछ पुरानी परियोजनाएं जो महाराज भरत के जमाने से चल रही हैं, उन्हें पिताश्री के द्वारा शुरू की गई परियोजनाएं बताने की गलती कर बैठा. अखबारों के सम्पादकों ने इस बात पर मेरी बहुत खिल्ली उडाई थी.

मामाश्री की कृपा से हस्तिनापुर का युवा वर्ग मुझमे अपना भविष्य देखने लगा हैं. हुआ ऐसा कि पदयात्रा के दौरान मामाश्री ने अपने 'लड़कों' की एक टोली अचानक भेज दी. एक गाँव में मेरे पहुँचने से पहले ही उनके लड़के पहुँच चुके थे. और मेरे पंहुचने के साथ-साथ इन लोगों ने नारा लगना शुरू कर दिया;

जब तक सूरज चाँद रहेगा, सुयोधन तेरा नाम रहेगा

सुयोधन तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं

हस्तिनापुर का राजा कैसा हो, सुयोधन के जैसा हो

नारे लगाते इन लड़कों को देखकर प्रजा के बीच से भी कुछ नौजवान आगे आए और उन्होंने भी नारे लगाने में मामाश्री द्वारा भेजे गए लड़कों का हाथ बटाया. बड़ी सुखद अनुभूति थी. वैसे संघर्ष करने की बात वाले नारे पर मुझे एक बार के लिए हंसी आ गई थी. मेरे मन में आया कि मैं ठहरा राजकुमार. मुझे किससे संघर्ष करने की जरूरत पड़ गई भला? फिर मामाश्री की बात याद आई.

एक बार राजनीति का पाठ पढ़ाते हुए उन्होंने कहा था; "एक बात हमेशा याद रखना वत्स दुर्योधन, राजनीति में सफल होना है तो नारों का सहारा कभी न छोड़ना. नारों का कोई मतलब निकले या न निकले. नारों में मतलब ढूढना बेवकूफ राजनीतिज्ञ की निशानी होती है."

कुछ नौजवानों से वार्तालाप करके पता चला कि वे हस्तिनापुर में नेतृत्व परिवर्तन चाहते हैं. कहते हैं राज-काज देखने वाले लोग बूढ़े हो गए हैं. वैसे ज्यादातर नौजवान यही मानते हैं कि राज-काज देखने वाले लोग, जैसे पितामह, विदुर चाचा, गुरु द्रोण वगैरह बहुत सक्षम हैं. मुझे ऐसे नौजवान अच्छे नहीं लगे.

जब मैंने ये बात मामाश्री को बताई तो उन्होंने बड़ा अच्छा सुझाव दिया. उन्होंने बताया कि मैं अपने गुप्तचरों द्वारा ये व्हिस्पर कैपेन चला दूँ कि पितामह आजकल बीमार रहते हैं. बैठे-बैठे सो जाते हैं. मामाश्री ने तो यहाँ तक कहा कि इस बात को भी फैला देना चाहिए कि विदुर चाचा पिछले महीने पन्द्रह दिन के लिए अस्पताल में भर्ती थे और उन दिनों राज-काज का सारा काम मैं देखता था. मैंने फैसला कर लिया है, मामाश्री के सुझावों का तुरंत पालन करूंगा.

मामाश्री ने एक सुझाव और दिया है. कह रहे थे कि कुछ छंटे हुए नौजवानों का एक प्रतिनिधिमंडल लेकर विदुर चाचा से मिलूं और पूरे हस्तिनापुर के नौजवानों के कल्याण के लिए कुछ योजनायें चलाने का सुझाव दूँ. ऐसे में नौजवानों के बीच मेरी छवि और अच्छी होगी. नौजवानों को लगेगा कि मैं उनके बारे में सोचता हूँ.

मुझे मामाश्री के इस प्लान पर शक हो रहा था. मुझे डर था कि कहीं ऐसा न हो कि विदुर चाचा मेरी मांग ठुकरा दें. बाद में मैंने माताश्री से इस योजना के बारे में बात की तो उन्होंने आश्वासन दिया कि वे विदुर चाचा को समझा देंगी.

प्लान ये है कि जब मैं प्रतिनिधिमंडल लेकर विदुर चाचा से मिलूंगा तो वे पत्रकारों के सामने ही मेरे प्लान की बहुत सराहना करेंगे और मेरा प्लान तुरंत मानते हुए नौजवानों के लिए सुझाई गई परियोजाओं के लिए धन मुहैया कराने का वादा कर देंगे.

मामाश्री ने और भी होमवर्क दे दिया है. कह रहे थे कि अगले सप्ताह से मुझे न केवल प्रजा के बीच जाना पड़ेगा अपितु सार्वजनिक तांगों, इक्कों और बैलगाड़ियों पर जनता के साथ यात्रा करनी पड़ेगी. ऐसा करने से जनता के बीच में मेरी ईमेज और पुख्ता होगी. कह रहे थे कि कल शाम को ही मैं संवाददाता सम्मलेन बुलाऊं और उसमें पत्रकारों को बताऊँ कि मैं अगले सप्ताह से कॉमन सवारियों पर यात्रा करूँगा जिससे आम आदमी की पीड़ा को समझ सकूँ. वैसे तो यह अपने आप में बड़ा पीड़ादायक काम है लेकिन मैं इसलिए तैयार हो गया क्योंकि मामाश्री ने मुझे अश्योर किया कि इन सार्वजनिक सवारियों के पीछे खाली पालकी और मेरा रथ चलेगा ताकि जहाँ भी मैं जनता के लोगों के बीच बैठने से बोर हो जाऊं तो फट से अपने रथ पर या फिर पालकी पर चढ़ जाऊं.

मामाश्री पर मुझे पूरा भरोसा है. वे मेरी ईमेज बनाकर ही दम लेंगे.

अब मैं सोने जा रहा हूँ. कल सुबह-सुबह ऋषि पराशर के आश्रम में उनके शिष्यों के सामने मुझे भाषण देना है. उनके कुछ शिष्य मुझसे राज-काज में मेरे रोल पर चर्चा करना चाहते हैं. इस चर्चा के लिए शिष्यों के चयन का काम पूरा हो चुका है. मामाश्री ने उन्हें प्रश्न लिख कर पहले ही दे दिय है जिससे वे छात्र सही तरीके से अपना प्रश्न दाग सकें.

नोट: यह एक पुरानी पोस्ट है.

12 comments:

  1. एक खरी खरी सुनाय देते है दूर्योधन भौंदू नहीं था. हाँ, अगर वर्तमान में किसी से सुसंगतता ढूंढ रहा हूँ तो मेरी गलती भी हो सकती है. :) बहुत ही निर्दोष व्यंग्य है.

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  2. `लेकिन मुझे बहुत फूंक-फूंक कर कदम रखने की जरूरत है'

    हां, दुबारा द्रौपदी न हंस पडे :)

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  3. दुख तो यही है कि दुर्योधन की हर चाल सफल होती जा रही है।

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  4. युवराज ही नहीं युवराज को महाराज बनाने वाले भी पूरा फूंक फूंक कर कदम रख रहे हैं...
    सारे फूंक को ऐसे एकजुट कर शक्तिशाली बना लिया जा रहा है कि ताजपोशी के समय चाहे कितनी भी बड़ी विघ्न क्यों न आ जाये,जोरदार फूंक से सब बाधाओं को उड़ा कर दूर कर दिया जायेगा...

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  5. नोट: ऐसी पोस्ट कभी पुरानी नहीं होती...जब पढ़ो नयी लगती है...

    नीरज

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  6. सुयोधन के मीडिया सलाहकारों ने पहले ही हस्तिनापुर के सभी दूरदर्शी पत्रकारों, अखबारचियों को बुलाकर एक शानदार दावत दी और रिहायशी कालोनी में एक-एक प्लाट की एडवांस बुकिंग भी करा दी. और अगले दिन से ही सुयोधन के शर्मदान सारी श्रमदान इत्यादि के फोटो चमकने लगे.. यह अंश आपने क्यों छोड़ दिया...

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  7. नीरजजी पहले ही कह गए. फूटनोट सुधार कर दीजिये: यह एक क्लासिक पोस्ट है. आपकी सभी पोस्टों के बीच में इस डायरी के पन्ने आते रहने चाहिए.

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  8. मामाश्री की परिपक्वता पर उंगली कोई नहीं उठा सकता, लेकिन उम्र निकलती जा रही है सुयोधन की, उस पहलू पर ध्यान क्यों नहीं देते मामाश्री?
    पोस्ट बेशक पुरानी है, कालजयी है। आज भी इससे प्रेरणा ले सकते हैं नये राजवंश। वैसे भी It is from history, we learn that we do not learn from hishtory.
    दुर्योअधन की इस डायरी को राष्ट्र-पुस्तिका का खिताब मिलना चाहिये जी।

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  9. नोट: ऐसी पोस्ट कभी पुरानी नहीं होती...जब पढ़ो नयी लगती है...bilkul sahi baat.......

    pranam.

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  10. पुरानी शराब सा नशा दिया पुरानी पोस्ट में.. आज की पंच लाइन है..

    नारों में मतलब ढूढना बेवकूफ राजनीतिज्ञ की निशानी होती है.

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  11. hmm.....तो दुर्योधन जी इतने सारे गाबिड़गिल्ला पाले बैठे हैं :)

    बढ़िया ।

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टिप्पणी के लिये अग्रिम धन्यवाद। --- शिवकुमार मिश्र-ज्ञानदत्त पाण्डेय