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Wednesday, February 29, 2012

दुर्योधन की डायरी - पेज २९९३


@mishrashiv I'm reading: दुर्योधन की डायरी - पेज २९९३Tweet this (ट्वीट करें)!

फिर से बहस शुरू हो गई कि क्या क्रिकेट की वजह से हॉकी और बाकी के खेलों की दुर्गति हो रही है? हर एक-दो साल पर ऐसी बहस छेड़ी जाती है ताकि हमारी बहस प्रधान संस्कृति की रक्षा होती रहे. क्या कहा आपने? यह हमारी संस्कृति कैसे हुई? तो फिर मैं आपको बता देता हूँ कि हमारी संस्कृति में एक खेल दूसरे खेलों को हजारों साल से दबाता आया है. अगर यकीन नहीं आये तो युवराज दुर्योधन की डायरी का यह पेज बांचिये.

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फिर से वही बवाल खड़ा हो गया है. फिर से लोग़ इस बात पर हलकान हुए जा रहे हैं कि एक खेल के रूप में तीरंदाजी को जितनी प्राथमिकता मिल रही है उतनी न तो तलवारबाजी को मिल रही है और न ही कुश्ती को. गुप्तचर बता रहे थे कि मीडिया, प्रजा, बुद्धिजीवी, पत्रकार, कलाकार, तक आजकल इतने हलकान हैं कि उन्हें भूख भी देर से लग रही है. एक गुप्तचर तो मुझसे यह बताकर मेरे गले में पड़ा हार उतरवा ले गया कि मंहगाई के बवाल को भी भुलाकर पूरा हस्तिनापुर इसी एक मसले पर बहस किये जा रहा है. चाय-पान की दूकान से लेकर अखबारों के सम्पादकीय पृष्ठों तक में बस यही मसला छाया हुआ है. यह सब देखकर लगता है कि लोगों को बवाल खड़ा करने के लिए विषयों की कमी न तो पहले थी और न ही आज है. अपने अनुभवों से लिख सकता हूँ कि हस्तिनापुर में जब खड़े होने की बात आती है तो मार्ग में बैठा बैल और राजमहल में बैठा राजकुमार भी बवाल का मुकाबला नहीं कर सकता. मार्ग में बैठे बैल को खड़ा करने के लिए पुचकार से लेकर गुस्सा और डंडा तक दिखाना पड़ता है लेकिन बवाल ऐसे ही खड़ा हो जाता है. राजमहल में बैठे राजकुमार को उठाने के लिए कहीं किसी मामे या कहीं किसी जीजे को मशक्कत करनी पड़ती है लेकिन बवाल खड़ा कर देना चुटकी बजाने का काम हो गया है.

कोई भी कभी भी और कहीं भी बवाल खड़ा कर सकता है.

राजमहल के गुप्तचर से लेकर विशेषज्ञ तक इस बात पर खुश हैं कि बवाल खड़ा करने जैसे कर्म पर अब बुद्धिजीवियों, लेखकों, कवियों और गुरुओं का एकतरफ़ा अधिकार नहीं रहा. हालत यह हो गई है कि प्रजा के दो-चार चिरकुट भी किसी पत्रकार के साथ मिलकर बवाल खड़ा कर सकते हैं. अभी तीन-चार महीने पहले ही इनलोगों ने मंहगाई की समस्या पर बवाल खड़ा कर दिया था और अब इस तीरंदाजी को मिलने वाली प्राथमिकता पर. मुझे तो यहाँ तक लगता है कि ये लोग़ एक बवाल से जल्दी ही बोर भी हो जाते होंगे नहीं तो हर दो महीने पर नए मसलों पर बवाल कैसे खड़ा होता? पिछले कई वर्षों से खेलों में तीरंदाजी को मिलने वाली प्राथमिकता पर छुट-पुट बहस हो जाया करती थी और लोग़ बहस-धर्म का पालन करके चुप हो जाया करते थे. लेकिन पता नहीं क्यों इस बार मामला कुछ ज्यादा ही छाया हुआ है.

सभी को यह शिकायत है अन्य खेलों के मुकाबले में तीरंदाजी को बहुत ज्यादा तवज्जो मिल रही है. न सिर्फ विशेषज्ञों, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों का बल्कि प्रजा का भी मानना है कि तीरंदाजी की वजह से बाकी के खेल जैसे तलवारबाजी, भाला-फेंक, ऊंची कूद, लम्बी कूद, लंगड़ी, लबेद, ढेला-फेंक, कुश्ती वगैरह बैकसीट पर चले गए हैं. कोई न तो ऐसे खेल खेलना चाहता है और न ही इनके बारे में बात करता है. लोगों को इस बात की शिकायत भी है कि हस्तिनापुर की मीडिया भी केवल तीरंदाजी को ही तवज्जो दिए जा रही है.

कई बार तो मन में आया कि ऐसी बहस को रोकने का जो फूलप्रूफ तरीका है उसको लगाकर इस बहस पर विराम डलवा दूँ. मन में आया कि चचा विदुर से कहकर गुरु द्रोण, कृपाचार्य और पितामह वाली एक थ्री मेम्बर कमिटी का गठन करवा दिया जाय जो यह पता लगाए कि क्या सच में तीरंदाजी को बाकी खेलों के मुकाबले ज्यादा तवज्जो मिल रही है? अगर ऐसा है तो क्यों है, कब से है और कैसे इसे दूर किया जा सकता है? वह तो भला हो मामाश्री का जिन्होंने मेरे मन में उपजे इस विचार को अपनी आज्ञा का बाण चलाकर धरासायी कर दिया.

मामाश्री का कहना था कि ऐसा करने की ज़रुरत नहीं है. कमिटी बैठाने से प्रजा शांत हो जायेगी और फिर से महंगाई का मसला लेकर आवाज़ उठाना शुरू कर देगी. ऊपर से एक बार कमिटी के गठन की सूचना प्रजा तक पहुंची तो फिर वह कमिटी के रिपोर्ट की प्रतीक्षा करने लगेगी. और फिर प्रजा का क्या भरोसा? कहीं द्रौपदी के गुप्तचरों ने भड़का दिया तो फिर रिपोर्ट न आने पर जुलूस से लेकर नारेबाजी तक कर सकती है. ऊपर से आजकल कमिटी की रिपोर्ट चचा विदुर के पास जाने से पहले ही लीक भी होने लगी हैं. हमेशा इस बात का खतरा रहता है कि कहीं किसी अखबार का सम्पादक कमीशन रिपोर्ट को लीक करवाने का प्लान बना रहा होगा. मामाश्री के सुझाव पर इच्छा हुई कि फट से नारा लगा दूँ कि; "जब तक सूरज चाँद रहेगा, मामा तेरा नाम रहेगा" लेकिन कर्ण वहीँ बैठा था इसलिए नारा नहीं लगा सका.

ऐसा सीरियस मित्र मिला है कि इसके सामने बचकानी हरकतें भी नहीं कर सकता.

एक दिन मैंने मामाश्री से पूछा था कि तीरंदाजी ने बाकी खेलों को पीछे छोड़ दिया है तो इसका क्या कारण हो सकता है? बिफर पड़े. बोले कि मैं युवराज हूँ मुझे ऐसी चिरकुट बातों के बारे में नहीं सोचना चाहिए. अगर मैं ऐसी बातों पर अपना समय देने लगा तो फिर पांडवों के खिलाफ साजिश कौन करेगा? उन्हें सताने क प्लान कौन बनाएगा? अगर मैं ऐसी बातों के बारे में सोचने लगा तो फिर बन चुका युवराज. उन्होंने बात को आगे बढ़ने ही नहीं दिया. यह बोलकर कमरे से निकल
गए कि इस तरह के प्रश्न एक युवराज को शोभा नहीं देते. युवराज अगर खेलों के बारे में चिंतित होने लगे तो फिर लड़ाई-झगड़ा, राज-हड़प, साजिश-वाजिश के बारे में कौन सोचेगा?

लेकिन मन ही तो है. जो सवाल मन में आया तो जाने क नाम ही नहीं ले रहा था. शाम को तीन पत्ते खेलने समय भी यह बात मन से नहीं गई. विचार किया. फिर काफी विचार किया. और किया. करता गया. जितना सोचता, बार-बार आँखों के सामने धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाये मछली की आँख पर निशाना साधे अर्जुन दिखाई दे रहा था.

फिर मन में यह आया कि ऐसा क्यों न हो? तीरंदाजी में जो ग्लैमर है वह किसी और खेल में कहाँ है? धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाए योद्धा को तो जाने ही दीजिये ऐसा करते हुए मनुष्य भी बड़ा स्मार्ट लगता है. कोई योद्धा प्रत्यंचा न भी चढ़ाए और अपना धनुष-बाण लिए कहीं बैठे-बैठे अगर उसे निहारता भी है तो भी बड़ा क्यूट लगता है. जैसे हाथ का कमंडल और सिर पर कच्चे-पक्के केश का जूड़ा टुटपुन्जिये ऋषि को भी महान बना देता है वैसे ही धनुष-बाण किसी भी आदमी को योद्धा या राजकुमार के रूप में प्रस्तुत कर सकता है.

धनुष-बाण से लैश कोई राजकुमार जब राजमहल से निकलता है तो देखते ही बनता है. कई बार तो मैं खुद जब कंधे पर धनुष और तरकश टाँगे चलता हूँ तो मन में एक ही विचार आता है कि मुझे देखकर इस समय देवतागण न सिर्फ प्रसन्न हो रहे होंगे बल्कि पुष्पवर्षा भी कर रहे होंगे. यह बात और है कि आजतक कोई भी पुष्प मुझसे आकर नहीं टकराया. मेरी बड़ी तमन्ना है कि एक बार देवताओं द्वारा बरसाया गया पुष्प आकर मुझसे टकराए. सिर पर गिरकर घायल भी कर जाएगा तो भी कोई गम नहीं.

यह ऐसा अस्त्र है जो किसी भी राजकुमार के व्यक्तित्व में चार-चाँद लगा देता है. इधर राजकुमार ने कंधे पर धनुष टांगा नहीं कि उधर उसकी चाल में अंकड़ अपने आप आ जाती है. कई बार तो मैंने खुद महसूस किया है कि दुशासन की चाल में आई अकड़ उसके कंधे पर रखे धनुष-बाण का नतीजा है. जब भी वह धनुष-बाण लिए चलता है तब द्रौपदी की साड़ी न उतार पाने की वजह से उसके मन में पैदा हुआ डिप्रेशन भी फट से गायब हो जाता है.

दूसरी बात यह है कि धनुष-बाण हर तरह के साज-सज्जा के साथ फबता है. किसी दिन राजकुमार अगर मुकुट, आभूषण, माला, केश-सज्जा, मेक-अप वगैरह न भी करे और केवल श्वेत वस्त्र पहने सन्यासी के वेश में भी निकले तो भी ग्लैमरस दिक्खेगा बस शर्त यह है कि वह कंधे पर धनुष-बाण रख ले. कंधे पर रक्खा धनुष-बाण लप्पू से लप्पू राजकुमार को भी फोटोजेनिक बना देता है. वहीँ शरीर पर लपेटी गई धोतिका के साथ अगर राजकुमार तलवार या गदा लेकर चले तो कोई भी उसे राजकुमार मानने के लिए राजी नहीं होगा. सबको यही लगेगा कि कोई गरीब ब्रह्मण किसी राजकुमार की गदा और तलवार चुराकर लिए जा रहा है. ऊपर से धोतिका लपेटे राजकुमार अगर भाला लेकर चले तो लगेगा कि कोई ऐसा सैनिक है जिसे दो-चार दिन पहले ही सेना में भर्ती किया गया है और उसकी पोशाक अभी तक सिलाई होकर नहीं आई है.

वैसे भी तीरंदाजी की एक सबसे बढ़िया बात यह है कि छोटा-मोटा योद्धा भी महीने-दो महीने की प्रैक्टिस कर ले तो वह भी धनुर्धारी बन सकता है. आखिर दूर से ही तो बाण छोड़ना है. लगा तो लगा और नहीं लगा तो दूसरा बाण है. उसे चला लेगा. अब यह कोई गदा या तलवार तो है नहीं कि आमने-सामने युद्ध करना पड़ेगा और अगर वार चूक गया तो कर्म के अनुसार स्वर्ग या नरक की यात्रा करनी पड़ जायेगी. धनुष-बाण चलाना सबको सरल लगता है. उसके आगे भी देखा जाय तो फिर सभी अपने कर्मों से तीरंदाजी को ही प्रमोट करते रहे हैं. गुरु द्रोण को ही ले लो. अर्जुन की ऐसी ईमेज बना दी है इन्होने कि छोटे-छोटे बच्चे अर्जुन ही बनना चाहते हैं. कोई भीम नहीं बनना चाहता. यहाँ तक कि एकलव्य के मन में गुरु द्रोण की चेलाई का ख़याल आया तो उसने भी उनकी प्रतिमा बनाने के बाद हाथ में धनुष-बाण ही उठाया. पाठशाला में प्रतियोगिता हुई तो वह भी चिड़िया की आँख में बाण मारने की. द्रौपदी के स्वयंवर में भी प्रतियोगिता हुई तो वहाँ भी मछली की आँख को बाण से बेध देने की ही प्रतियोगिता हुई. यहाँ तक कि एकलव्य को भी जब परफॉर्म करने का मौका मिला तो उसने भी स्वान के मुँह की सिलाई तलवार से नहीं बल्कि बाणों से ही की.

पता नहीं हम कबतक संस्कृति को ढोते रहेंगे. मुझे तो लगता है कि हमारा धनुष-बाण प्रेम श्री राम के जमाने से शुरू हुआ जब सीता जी के स्वयंवर में भी कुछ उठाने की बात आई तो वहाँ भी धनुष को प्राथमिकता दी गई. मैं कहता हूँ वहाँ क्यों नहीं कोई गदा या तलवार रखी गई? अगर ऐसा हुआ होता तो शायद आज हस्तिनापुर में और भी खेलों को महत्वपूर्ण माना जाता. केवल तीरंदाजी पर ही जाकर सबकुछ ख़तम नहीं होता.

11 comments:

  1. जी, ये तो बिल्कुल उचित लिखा है कौरवशिरोमणि की डायरी में. भविष्य की कहानी सा लगता है.

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  2. "अगर वार चूक गया तो कर्म के अनुसार स्वर्ग या नरक की यात्रा करनी पड़ जायेगी." sahi hai.... :)

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  3. सुपर्ब जी सुपर्ब....तालियाँ ही तालियाँ...

    ऐसा सुगठित व्यंग्य...ओह !!!

    अभूतपूर्व...

    आगे बुझाइये नहीं रहा कि का कहें...

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  4. लग तो ऐसा रहा है जैसे कि भविष्य बांचा हो श्रीमान ने.

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  5. आपकी इस शानदार कमेंट्री के कायल हैं हम.... खेल, खिलाडी तो बहुत हैं और अपनी-अपनी जगह हैं, पर आपके जैसा अदभुत और अनुभवी विश्लेषक बहुत कम हैं... सबसे अच्छी और सच्ची पंक्ति मुझे ये लगी- "कोई भी कभी भी और कहीं भी बवाल खड़ा कर सकता है." :-)

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  6. राजकुमार के मन की अन्तर्कथा और अन्तर्गत व्यथा...

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  7. क्या बात है शिव जी आपका एक पोस्ट सुबह पढ़ ले कोई तो प्रातः भ्रमण के अलावा ही सारा दिन तरोताजा और प्रफ्फुलित रह सकता है

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  8. क्या तर्क है गुरुदेव! मन तो कर रहा है अभी बाज़ार से जाकर तीर-कमान ले आयें. बिना कुछ किये कुछ बनने की इच्छा पूरी हो जाएगी.
    कभी यदि भारतीय पुराण में तीरंदाजी के महत्व पर चर्चा हुई तब आपका ये पूरा विश्लेषण हर प्रकार के प्रशन का उत्तर देगा.
    ऐसा ज्ञान काफी दिनों बाद मिला है.
    दिमाग एक्टिवेट करने के लिए धन्यवाद!

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  9. क्या तीर चलाया है! बाउण्ड्री के पार! बोले तो सिक्सर!

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  10. धनुष-बाण से लैश कोई राजकुमार जब राजमहल से निकलता है तो देखते ही बनता है. कई बार तो मैं खुद जब कंधे पर धनुष और.....................
    सुंदर प्रस्तुति , स:परिवार होली की हार्दिक शुभकानाएं.......

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टिप्पणी के लिये अग्रिम धन्यवाद। --- शिवकुमार मिश्र-ज्ञानदत्त पाण्डेय