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Friday, August 3, 2012

दुर्योधन की डायरी - पेज १२१८


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कल सुबह युवराज दुर्योधन की डायरी का यह पेज मिला जिसमें उन्होंने राजमहल में मनाये जानेवाले राखी के त्यौहार के बारे में लिखा है. आज टाइप करके पब्लिश कर रहा हूँ. बांचिये.

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आज राजमहल में राखी का त्यौहार मनाया गया. सावन की पूर्णिमा आने ही वाली है, इस बात की सूचना सबसे पहले राजमहल के सर्वेंट क्वार्टर्स से मिलती है. पिछले हफ्ते से ही सारथियों और चारणों के घरों से टेपरेकॉडर्स पर राखी वाले गाने बजने शुरू हो गए थे. एक से बढ़कर एक गाने जिन्हें सुनकर राजमहल के राजकुमार मन ही मन खुश तो होते हैं लेकिन अपनी ख़ुशी का इजहार सार्वजानिक तौर पर नहीं करते. मुझे वह गाना बहुत पसंद है जिसमें बहन भाई को त्यौहार का भावार्थ समझाते हुए कहती है कि जिसे वह रेशम का तार समझ रहा है असल में वह बहन का प्यार है. यह गाना शायद किसी फ़िल्मी गीतकार ने लिखा है. गाने के बोल हैं; "इसे समझो न रेशम का तार भइया, ये है बहना का प्यार भइया..." या फिर "ये है राखी का प्यार भइया..." ऐसा ही कुछ है.

गाने के बोल मुझे पूरी तरह से याद हैं लेकिन लिख दूंगा तो लोग़ मुझे डाउन मार्केट युवराज समझेंगे और मुझे हे दृष्टि से देखेंगे. राजमहल के अलिखित नियम के अनुसार एक युवराज डाउन मार्केट भले ही हो लेकिन दीखना नहीं चाहिए.

इन फ़िल्मी गानों के अलावा राखी के त्यौहार का पता करीब पंद्रह दिन से बाज़ार में सजी राखी की सीजनल दूकानों से मिलती है. ये दुकानें अपने साज श्रृंगार से हमें सूचना देती हैं कि त्यौहार आनेवाला है. वैसे तो हर वर्ष हस्तिनापुर के सबसे बड़े सभागार को किराए पर लेकर तमाम व्यापारी एक राखी फेयर का आयोजन करते हैं लेकिन फुटकर दुकानों का रहना भी आवश्यक है. ये दुकानें न रहें तो प्रजा कहाँ से राखी खरीदेगी? आखिर राखी फेयर में बिकनेवाली राखियाँ सब खरीद भी तो नहीं सकते.

हर वर्ष दुशाला करीब सवा सौ राखियों का ढेर इसी फेयर से ले आती है. बाज़ार में सजी दुकानें भी देखने में बुरी नहीं लगती. दुकानें चाहे जैसी हों, राखियों की चमक इन दूकानों को चमकाए रखती है. राखी की दुकानें मुझे होली की याद दिलाती हैं. राखी के अलावा होली ही ऐसा त्यौहार है जो सीजनल दुकानें खोलने की सुविधा देता है और रंग और गुलाल के कारण उन दिनों भी चिरकुट से चिरकुट दूकान सुन्दर लगती है.

माताश्री ने मामाश्री को राखी बांधी. ये अच्छा है कि मामाश्री वर्षों से यहीं जमे हुए हैं और माताश्री को हज़ारों मील जाकर उन्हें राखी नहीं बांधनी पड़ती. कई बार यह बात मन में आती है कि मामाश्री का हस्तिनापुर में रहने का केवल यही एक फायदा है बाकी तो सब नुकशान ही नुकशान है. माताश्री द्वारा राखी बाँधने पर मामाश्री जो स्वर्ण मुद्राएं सगुन में देते हैं वह भी इसी राजमहल की होती हैं. जितनी मुद्राएं मामाश्री गंधार से बांधकर माइग्रेशन के समय ले आये थे, वे सारी तो न जानें कितने वर्षों पहले ही ख़तम हो गईं. हाल यह है कि त्योहारों पर वे बलराम हलवाई की दूकान से जो लड्डू मंगवाते है, उसके लिए भी मुद्राएं मुझे ही देनी पड़ती हैं.

कई बार मैंने सलाह दी कि किसी चारण को गांधार भेजकर नानाश्री से स्वर्ण मुद्राएं मंगवा लें तो बहाना बना देते हैं. यह कहते हुए मना कर देते हैं कि हस्तिनापुर से गांधार तक का रास्ता बहुत बड़ा और खतरनाक है. पता चला कि कोई चारण उधर से स्वर्ण मुद्राएं लादकर चला और खाइबर पास तक आते-आते लुटेरों ने मुद्राएं लूट लीं. आगे बोले कि खाइबर पास के आगे तो रास्ता और भी खतरनाक है. स्वात घाटी तो संसार के सबसे भयंकर लुटेरों से भरी पड़ी है. मैंने तो यह भी कहा कि नानाश्री मुद्राओं की रक्षा के लिए पूरी सेना भी तो भेज सकते हैं लेकिन मामाश्री ने एक और तर्क देकर मामले को वही रफा-दफा कर दिया. तर्क या कुतर्क देना तो कोई इनसे सीखे. वैसे भी कोई क्यों सीखेगा? मामाश्री मेरे हैं और मैं उनके साथ रहता हूँ तो मैं सीखूँगा न.

हस्तिनापुर में उनके रहने का कम से कम यह फायदा तो हो कि उनके तमाम तर्क-कुतर्क केवल मैं सीखूँ.

दुशाला ने हम भाइयों को राखी बांधी. पूरे वर्ष में यही एक दिन होता है राखी बंधवाते हुए दुशाला के प्यार को देखकर मन में आता है कि सारे छल-कपट, क्रूरता, लड़ाई, झगड़े, राजपाट, वगैरह छोड़-छाड़ कर हम भाई, माताश्री, पिताश्री शांति से रहें. जीवन में परिवार के साथ शांति से रहने से अच्छा कुछ नहीं है. राखी वाले दिन अपने भाइयों के लिए उसके मन में प्यार को देखकर हम भाइयों के मन से सारे छल-कपट कुछ क्षण के लिए ख़तम हो जाते हैं.

मुझे याद है, एक बार मैंने यह सुझाव मामाश्री को दिया. मैंने कहा कि पांडवों के साथ लड़ाई-झगड़े से अच्छा है कि हमसब शांति से रहें तो वे भड़क गए. बोले एक राजकुमार के ऐसी बातें शोभा नहीं देतीं. बोले; "एक बात सदैव याद रखना भांजे, अपने उद्देश्य से भटकना मृत होने के समान है." जोश में आ गए और लगभग चिल्लाते हुए कहने लगे; "एक बात कभी मत भूलना भांजे, वर्षों से शेर की सवारी करने वाला युवराज जिस दिन शेर से उतरा, शेर उसे खा जाएगा."

उनके इस सदुपदेश पर कोई भांजा अपने मामाश्री क्या कह सकेगा? मैं चुप हो गया.

दुशाला ने आज राजमहल में राखी बाँधने का बढ़िया उत्सव आयोजित कर रखा था. गाने-बजाने का प्रोग्राम भी था. उसने कल शाम को ही हमें निर्देश दे रखा था कि मैं और बाकी के सारे भाई उसे राजमहल में एक ही जगह इकट्ठे मिलने चाहिए. ऐसा न हो कि कोई कहीं आखेट के लिए जंगलों में चला जाए और कोई बीयरपान करने. उसने तो सारथियों तक को कह रखा था कि अगर कोई भाई बाहर जाने का प्रोग्राम बनाये तो सारथी सबसे पहले उसे सूचित करें. कल शाम को उसने कहा; "भ्राताश्री, आचार्य बिंदु प्रकाश ने आदेश दिया है कि इस वर्ष वृषभ राशि वाले भाइयों को राखी बाँधने का शुभ मुहूर्त सुबह के दस बजे निकला है. इसलिए मैं चाहती हूँ कि आपसब राजमहल में ही रहें."

अजीब बात है. अब ये ज्योतिषी राशि के हिसाब से भी राखी बाँधने का मुहूर्त बताने लगे हैं. इन ज्योतिषियों के धंधे भी अजीब हैं.

खैर, हमसब ने राखी बंधवाई. राजकवि किसी कवि सम्मलेन में भाग लेने काशी गए हुए थे तो उसने उप-राजकवि से ही राखी गीत लिखवा लिया था. उप-राजकवि को भी क्या कहूँ? उन्होंने राखी-गीत में भी उन्ही शब्दों का प्रयोग किया जिनका प्रयोग वे वीर-रस की कविताओं में करते रहे हैं. मामाश्री की चापलूसी करके ये उप-राजकवि बने हैं लेकिन मैं कहता हूँ कि अयोग्य होने के बावजूद अगर सिफारिश करके एकबार आप कोई पदवी हथिया लेते हैं तो कोशिश करके अपने अंदर थोड़ा तो इम्प्रूवमेंट ले आयें लेकिन इन्हें कहाँ इस बात की समझ है? खैर, दुशाला ने अपनी सहेलियों के साथ उनका लिखा हुआ गीत गाया और उसके बाद राखी बांधी.

बाकी सब तो ठीक था लेकिन हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी उसे वही दिक्कत हुई. हर वर्ष राखी बांधते समय वह आधा लड्डू तो भाइयों को खिलाती है और बाकी का आधा खुद खाती है. आधे के हिसाब से हर वर्ष बेचारी को घंटे दो घंटे के अंदर ही पचास लड्डू खाने पड़ते हैं. देखकर तकलीफ होती है लेकिन कुछ किया भी तो नहीं जा सकता. ऊपर से इसबार बलराम हलवाई ने लड्डू बनाने के लिए जिस घी का इस्तेमाल किया वह मुझे थोड़ा घटिया लगा. एक तरफ तो यह बढ़िया घी का इस्तेमाल नहीं करता दूसरी तरफ हम भाइयों से कहता है कि राखी के दिन लड्डू खाते हुए हम सौ भाई अगर फोटो खिंचवा लें तो वह उन फोटो की होर्डिंग्स बनवाकर अपना विज्ञापन कर लेगा. लो कर लो बात. यह केवल लड्डू खिलाकर हम भाइयों से विज्ञापन करवाना चाहता है. इससे हमें क्या फायदा होगा? सारा फायदा तो इसका होगा. यह हमें बेवकूफ समझता है.

अरे अगर हमें फोटो खिंचवाना ही होगा तो हम प्रजा के बीच जाकर किसी आम आदमी के घर भोजन करते हुए फोटो खिंचवायेंगे और उसकी होर्डिंग लगवाएंगे कि इसके लिए विज्ञापन करेंगे?

खैर, त्यौहार बड़े मजे से मनाया गया. मैंने दुशाला को परफ्यूम भेंट किया. दुशासन ने उसके लिए अवंती से साड़ियाँ मंगवा रखी थीं. उसने उसे उपहार में साड़ियाँ दी. यह अलग बात है कि उसे ज्यादातर साड़ियों का रंग पसंद नहीं आया. दुशासन ने तुरंत अपने गुप्तचरों को आदेश दिया कि अगली बार जब अवंती से साड़ियों का व्यापारी हस्तिनापुर पधारे तो उसको किडनैप करके उसके पास जितनी भी साड़ियाँ हो, उसे दुशाला के सामने लाया जाय. बहन को जो साड़ियाँ पसंद आएँगी, वह उन्हें रख लेगी. आज उपहार के रूप में जो साड़ियाँ उसे पसंद नहीं आयीं, उस बात के लिए अवंती के साड़ी व्यापारी को दण्डित करने का एक ही तरीका है और वह ये है कि उसे साड़ियों की कीमत न दी जाय.

अब सोने जाता हूँ. कल सुबह जल्दी उठना है. मामाश्री ने आदेश दिया है कि कल हमसब को मिलकर लाक्षागृह में पांडवों को जलाकर मार देने के प्रोग्राम को अंतिम रूप देना है.

13 comments:

  1. हर स्थान पर बस देश की स्वर्णमुद्रायें खप रही हैं।

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  2. कभी कभी संदेह होता है कि आपने कंही दुर्योधन की डायरी फोटोकॉपी करके दिग्विजय सिंह जी को तो नहीं दे दी है. वे बिलकुल मामाश्री के जैसी हरकतें कर रहे हैं.

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  3. अंत बड़ा ज्वनशील है. :)

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  4. "राजमहल के अलिखित नियम के अनुसार एक युवराज डाउन मार्केट हो भले ही लेकिन दीखना नहीं चाहिए." बिलकुल सही ..युवराज दूरदरसी है ..आज का बाज़ार कुछ ऐसा ही है ..:)

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  5. राखी बंधवाते हुए दुशाला के प्यार को देखकर मन में आता है कि सारे छल-कपट, क्रूरता, लड़ाई, झगड़े, राजपाट, वगैरह छोड़-छाड़ कर हम भाई, माताश्री, पिताश्री केवल शांति से रहें. जीवन में परिवार के साथ शांति से रहने से अच्छा कुछ नहीं है.

    वारी जाऊँ दुर्योधन भैया आज सूरज किधर से निकला है ?

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  6. राखी का त्योहार कुछ क्षण के लिए ही मन से दुर्भावना समाप्त करता है , महाभारत युग से अब तक भी यही सही है .
    दुर्योधन शांति चाहता भी तो मामा को यह मंजूर नहीं था . कुटिल पारिवारिक सदस्य परिवार को एक जुट होने नहीं दे सकते , हस्तिनापुर या भारतवर्ष , बात एक ही है !

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  7. ये मामा भी अजीब होते हैं। रोचक पोस्ट।

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  8. बहुत सुंदर हास्य व्यंग, राखी का एक नया लुत्फ़.

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  9. अरे अगर हमें फोटो खिंचवाना ही होगा तो हम प्रजा के बीच जाकर किसी आम आदमी के घर भोजन करते हुए फोटो खिंचवायेंगे और उसकी होर्डिंग लगवाएंगे कि इसके लिए विज्ञापन करेंगे?

    कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना...राखी की आड़ में माने, क्या लिख दिए हैं आप...वाह...गज़ब...

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  10. बड़ा शानदार मना राखी का त्यौहार!

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  11. maine aaj pehli baar aapke posts read kiye...sach me maza aa gya aapki lekhni ki prashansa kiye bina nahi reh sakta aur aapko saadhuwad

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टिप्पणी के लिये अग्रिम धन्यवाद। --- शिवकुमार मिश्र-ज्ञानदत्त पाण्डेय