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Wednesday, April 9, 2008

दुर्योधन की डायरी - पेज २८८९ और पेज २८९०




दुर्योधन की डायरी - पेज २८८९

कल शाम को पार्टी में पता चला कि मंहगाई बढ़ गई है. अब ऐसी बातें अगर पार्टी में सुनने को मिलें तो बीयर का स्वाद ख़राब होगा ही. मुंह का स्वाद तो ऐसा ख़राब हुआ कि कबाब से भी नहीं सुधरा. हुआ ये कि पार्टी में खाना बनाने के लिए जिस कैटरर को बुलाया गया था उसने पार्टीबाज मेहमानों के खाने का दाम प्रति प्लेट बढ़ा दिया. अब बढ़ा दिया तो बढ़ा दिया. हमें क्या फरक पड़ता है? लेकिन दु:शासन ने नादानी कर दी. उसने उस कैटरर से झगड़ा कर लिया. वैसे कैटरर की भी क्या गलती है? बेचारा मंहगाई की मार कितनी सहेगा?

खैर, मैंने दु:शासन को समझाया. तब जाकर मामला शांत हुआ. उसे अलग तरीके से समझाना पडा. अब है तो नादान ही. एक बार भी उसने नहीं सोचा कि अगर ये बात बाहर चली गई कि हम राजघराने के लोग भी मंहगाई से पीड़ित हैं तो कितनी बेइज्जती होगी.

मामाश्री से मंहगाई का कारण पूछा तो पता चला कि स्वर्णमुद्रा की कीमत कम हो गई है. लेकिन यहाँ थोड़ा कन्फ्यूजन है. जहाँ एक तरफ़ तो स्वर्ण की कीमतें बढ़ गई हैं वहीं दूसरी तरफ़ मुद्रा की कीमत घट गई है. मामला कुछ समझ में नहीं आ रहा.

वैसे मेरी समझ में क्या आएगा जब अर्थशास्त्रियों की समझ से बाहर है. इतनी-इतनी तनख्वाह मिलती है इन अर्थशास्त्रियों को. लेकिन ये अपना काम ठीक से नहीं कर सकते. ये अर्थव्यवस्था के बारे में जो भी बोलते हैं, उसका उलटा होता है. इससे अच्छा होता कि मौसम वैज्ञानिकों के हाथ में ही अर्थव्यवस्था दे दी जाती. मौसम विज्ञानी भी मौसम के बारे में जो कुछ भी बोलते हैं, वो भी कभी नहीं होता. सोचता हूँ कुछ दिनों के लिए अर्थशास्त्रियों को मौसम विभाग में और मौसम वैज्ञानिकों को अर्थ विभाग में शिफ्ट कर दूँ. आख़िर बात तो एक ही है.

खैर, अगले साल विदुर चचा से कहकर ऐसा ही करवा दूँगा. कल अर्थशास्त्रियों की बैठक है. देखता हूँ क्या होता है.

दुर्योधन की डायरी - पेज २८९०

अभी-अभी अर्थशास्त्रियों की बैठक से आया हूँ. मंहगाई की समस्या तो वाकई बहुत बड़ी समस्या का रूप ले चुकी है. लेकिन इससे भी बड़ी समस्या है अर्थशास्त्रियों को समझना. जितने अर्थशास्त्री आए थे सब मंहगाई का अलग-अलग कारण बता रहे थे. कुछ कह रहे थे कि ब्याज दरों के कम होने से ऐसा हो रहा है क्योंकि प्रजा के हाथ में बहुत ज्यादा पैसा आ गया है और वे मनमाने ढंग से चीजों के दाम दे रहे हैं. कुछ का कहना है कि ये समस्या केवल हस्तिनापुर की समस्या नहीं है. पड़ोसी राज्यों में भी ये समस्या है. कुछ कह रहे थे कि पड़ोसी राज्यों में तो क्या सारे ब्रह्माण्ड में यही समस्या है.

एक अर्थशास्त्री तो यहाँ तक कह रहा था कि केशव ने भी आजकल दूध का सेवन बंद कर दिया है क्योंकि दूध बहुत मंहगा हो गया है. कुछ का कहना था कि भगवान शिव ने भी आजकल फल खाना कम कर दिया है. पहले जब भगवान् शिव को चीजें मंहगी लगती थीं तो वे बीजिंग से सस्ती चीजें इंपोर्ट कर लेते थे लेकिन अब वहां भी चीजें सस्ती नहीं रही. लिहाजा भगवान शिव ने भी आजकल बीजिंग से चीजें मगनी बंद कर दी हैं.

मीटिंग तो क्या थी, सारे अर्थशास्त्री हंसने का उपक्रम कर रहे थे.

एक अर्थशास्त्री, जिसका चश्मा बहुत मोटे ग्लास का था, और जिसे देखने से लग रहा था कि उसने काफ़ी अध्ययन किया है, उसने बताया कि समस्या और कहीं है. चूंकि उसकी बातें ज्यादा नहीं सुनी जाती इसलिए उसकी बात पर किसी ने कुछ ख़ास ध्यान नहीं दिया. लेकिन मुझे लगा कि शायद इसके पास कोई ठोस कारण है, सो मैंने उससे पूछ लिया कि असली समस्या क्या है?

उसने बताया कि खाने के समान सही समय पर सही जगह नहीं पहुँच रहे हैं. सड़कों की हालत ठीक नहीं है. जो ट्रक खाने का समान लेकर अपने गंतव्य स्थल पर दो दिन में पहुंचता था उसी ट्रक को अब चार दिन लग रहे हैं. उसका कहना था कि बुनियादी सेवाओं को सुधारने के लिए राजमहल ने कुछ नहीं किया.

कुछ अर्थशास्त्रियों का अनुमान था कि अनाज और खाने के सामानों की भारी मात्रा में जमाखोरी हुई है. अब जमाखोरों के ख़िलाफ़ कार्यवाई भी तो नहीं कर सकते. मेरे ही कहने पर दु:शासन और जयद्रथ ने इन जमाखोर व्यापारियों से काफी मात्रा में पैसा वसूल कर रखा है. अब ऐसे में जमाखोर व्यापारियों के ख़िलाफ़ कार्यवाई करना तो ठीक नहीं होगा. उधर मंहगाई की मार से परेशान जनता रो रही है.

वैसे हमें मालूम है कि कुछ नहीं किया जा सकता लेकिन जनता को दिखाना तो पड़ेगा ही कि हम मंहगाई रोकने के लिए सबकुछ कर रहे हैं.

इसलिए मैंने तीन कदम उठाने का फैसला किया है.पहला, व्याज दरों में बढोतरी कर दी जायेगी. दूसरा प्रजा को सस्ते अनाज उपलब्ध कराने के तरीकों की खोज के बारे में सुझाव देने के लिए एक कमिटी का गठन किया जायेगा. तीसरा; कुछ जमाखोर व्यापारियों पर छापे की नौटंकी खेलनी पड़ेगी. छापे मारने का काम सबसे अंत में होगा. और तब तक नहीं होगा, जब तक इन व्यापारियों के पास ख़बर नहीं पहुँच जाती कि उनके गोदामों पर छापा पड़ने वाला है.

देखते हैं, मंहगाई रोकने के हमारे 'प्रयासों' का क्या होता है.

Friday, April 4, 2008

मार्च का महीना




मार्च आया और चला गया. जब तक नहीं आता, तब तक उसका इंतजार करते हैं. और जब आ जाता है तो न जाने कितने लोगों के ऊपर 'प्रेशर' डाल जाता है. कुछ लोग तो इसके जाने से निराश हो लेते हैं. ऐसे लोग मार्च के सहारे आफिस के अलावा बाकी और कोई काम नहीं करते.

रिश्तेदार बुला लें तो जवाब देते हैं; "अभी नहीं. मार्च तक तो बात ही मत करो." कोई रिश्तेदार इनके घर पर आना चाहे तो वहाँ भी वही बात; "न न बस यही मार्च जाने दीजिये उसके बाद आईयेगा." ऐसे कहेंगे जैसे मार्च ने आकर घर में डेरा डाल रखा है इसलिए और किसी रिश्तेदार के बैठने तक की जगह नहीं है.

पत्नी कहेगी; "सुनो, माँ आना चाहती थी" तो जवाब मिलेगा; "अरे समझाओ न उनको. यही मार्च जाने दो उसके बाद आने के लिए बोलो." एक तारीख से ही कहना शुरू हो जाता है; "नहीं-नहीं, अभी मार्च तक तो कोई बात ही मत करो. जो कुछ भी है, मार्च के बाद देखेंगे. अभी मार्च तक बहुत प्रेशर है."

एक ज़माना था जब जब इंसान दूसरे इंसान को परेशान करता था. 'प्रेशर' देता था. कभी-कभी सरकार, पुलिस और गुंडे भी परेशां करते थे. लेकिन अब ज़माना वैसा नहीं रहा. अब तो महीना परेशान करता है और 'प्रेशर' देता है.

ऐसा नहीं है कि पहले महीने परेशान नहीं करते थे. पहले भी करते थे. लेकिन तब हम पर ग्लोबलाईजेशन का असर नहीं था. लिहाजा तब हिन्दी महीने परेशान करते थे. सिनेमा के गाने याद कीजिये, पता चलेगा कि नायक और नायिका किसी न किसी हिन्दी महीने से परेशान रहते थे.

खासकर सावन बहुत परेशान करता था. लगभग हर फ़िल्म में एक गाना जरूर होता था जिसमें सावन का जिक्र होता था. वो ज़माना ग्लोबलाईजेशन का नहीं था. लिहाजा नायिका हिन्दी महीने में परेशान रहती थी. जैसे सावन में या फिर फागुन में. लेकिन अब सबकुछ कारपोरेट स्तर पर होता है. नायक और नायिका, दोनों मार्च महीने में परेशान रहते हैं.

पहले सावन में नायिका गाती थी; "तेरी दो टकिया की नौकरी और मेरा लाखों का सावन जाए."

अब नहीं गाती. अब सैलरी बढ़ गई है. नायक को लाखों रुपये सैलरी मिलती है. अब नौकरी लाखों की हो गई है और सावन दो टके का भी नहीं रहा. अब नायिका ये नहीं कह सकती कि; "तेरी दो टकिया की नौकरी......".

अब अगर ऐसा गाना गा दे तो नायक तो फट पडेगा; "क्या दो टकिया? दो टकिया की नौकरी होती तो खाने के लाले पड़ जाते. आटा का भाव देखा है? खाने के तेल और दाल का भाव पता है कुछ? कैसे पता रहेगा, शापिंग मॉल में जींस और टी शर्ट खरीदने से फुरसत मिले तब तो आटा और दाल का भाव पता चले. और ये मलेशिया की छुट्टियाँ कहाँ से आती?"

अब इस तरह के शब्दों से डर कर कौन नायिका गाना गाएगी? और वैसे भी अब तो ख़ुद नायिका ही कहती फिरती है; "ह्वाट अ टेरीबल मंथ, दिस सावन इज..वन कांट इवेन ड्रेस प्रोपेर्ली...वही कचरा वही बरसात..बाहर निकलना भी मुश्किल रहता है."

अब तो हालत ये है कि नायक आफिस से रात को एक बजे घर पहुंचता है. नायिका पड़ोसन को सुनाती है; "क्या बतायें. कल तो ये रात के एक बजे घर आए. मार्च चल रहा है न."

लीजिये, लगता है जैसे मार्च महीने में पूरे तीस दिन बॉस का आफिस में काम ही नहीं है. मार्च ही बॉस बना बैठा है. नायक का हाथ पकड़ कर रखता है कि; "खबरदार एक बजे से पहले कुर्सी से उठे तो."

नायक की भी चांदी है. आफिस में बैठे-बैठे काम करे या फिर इंटरनेट सर्फ़ करे, किसे पता? लेकिन मार्च का सहारा है. सुबह के तीन बजे भी घर पहुंचेगा तो मार्च है रक्षा करने के लिए. कार्पोरेट वर्ल्ड में सारे पाप और पुण्य यही मार्च करवाता है.

रविवार को सब्जी लेने के लिए घर से निकला. रिक्शे पर बैठा तो रिक्शावाला बहुत तेजी से चलाने लगा. हिम्मत नहीं हुई कि उसे आहिस्ते चलाने के लिए कहूं. एक बार सोचा कि उसे रिक्शा धीरे-धीरे चलाने के लिए कहूं. फिर मन में बात आई कि कहीं कह न दे; "आपको मालूम नहीं, मार्च महीना चल रहा है. सबकुछ तेजी से होना चाहिए. आप आफिस में काम नहीं करते क्या?"

मेरे मित्र हैं. चार्टर्ड एकाउंटेंट हैं. मार्च महीने के आखिरी दिन रात के बारह बजे तक ख़ुद भी आफिस में थे और सारा स्टाफ भी. दूसरे दिन बता रहे थे; "बहुत परेशानी हो गई कल. कम से कम सौ इन्कम टैक्स का रिटर्न था फाइल करने के लिए. लेकिन टैक्स डिपार्टमेन्ट का साईट पूरा जाम था."

जाम नहीं रहेगा तो क्या रहेगा. मार्च का महीना है. अन्तिम दिन लाखों लोग साईट पर एक साथ आक्रमण कर देंगे तो बेचारा इतना बड़ा आक्रमण कैसे झेल सकेगा?

वैसे अब मार्च चला गया है. मार्च के चले जाने से कुछ लोग खुश हैं. वैसे कुछ निराश भी हैं. जो लोग निराश हैं वे इसलिए निराश हैं कि मार्च का नाम लेकर देर रात तक घर से बाहर रहे लेकिन अब नहीं रह सकेंगे. वैसे उन्हें ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं. समय देखते देखते कट जाता है. मार्च फिर आएगा.

Wednesday, April 2, 2008

दुर्योधन की डायरी - पेज २७८०




समय बदला. विकास हुआ. हर क्षेत्र में विकास हुआ. जनसंख्या बढ़ी. बेरोजगारी बढ़ी. आर्थिक विकास हुआ. सामाजिक बदलाव दिखाई दिया. पुण्य घटा, पाप बढ़ा. न्याय घटा, अन्याय बढ़ा. हिन्दी घटी, अंग्रेज़ी बढ़ी. जनता नारे लगाती ही रह गई कि फलाने तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ है. और फलाने जनता का साथ छोड़कर आगे बढ़ गए. बदलाव अगर कहीं नहीं दिखाई दिया तो वो है भारतीय किसानों की हालत में. आप ख़ुद ही देखिये. पाँच हज़ार साल पुरानी दुर्योधन जी की डायरी में भी किसानों के बारे में उन्होंने कुछ लिखा है. आप पढिये.

दुर्योधन की डायरी - पेज २७८०

आज किसानों का एक प्रतिनिधिमंडल विदुर चचा से मिला. किसानों का कहना था कि उनकी फसल इस बार ठीक नहीं हुई. लिहाजा उनके ऊपर मालगुजारी का भार न डाला जाय. मैं कहता हूँ, फसल ठीक नहीं हुई तो इसमें राजमहल का क्या दोष? और फिर अगर फसल नष्ट होने का डर था तो किसान ही क्यों बने? और कुछ कर लेते. चाय-पान की दुकान खोल लेते. वैसे भी ये किसान पांडवों का बहुत समर्थन करते थे. अब जाएँ न उन्ही पांडवों के पास और उन्हीं से माफी की बात करें.

और विदुर चचा को भी क्या कहूं. मुझे समझ में नहीं आता कि इन्हें किसानों की तरफदारी करने की क्या जरूरत है? किसानों के नेता से मुलाक़ात करने के बाद पिताश्री से कहने लग गए कि किसानों की मालगुजारी माफ़ कर दी जाय. मैं पूछता हूँ क्यों माफ़ करें? ऊपर से कह रहे थे कि किसानों की माली हालत में सुधार के लिए उन्हें माफी वाला कर्ज दिलवा दिया जाय तो अच्छा रहेगा.

इस तरह से तो इन किसानों की आदत बिगड़ जायेगी. देखेंगे कि फसल दो-चार की ख़राब हुई लेकिन राजमहल से मिलने वाली सुविधाएं सबको मिल रही हैं.

गुप्तचर बता रहे थे कि नहर में पानी न होने की वजह से किसान नाराज हैं. उनकी नाराजगी इसलिए और बढ़ गई है कि नहर बनाने के लिए उनकी जमीन तो ले ली गई लेकिन नहर बनने की बाद उसमें पानी के दर्शन आजतक नहीं हुए. और तो और ये किसान इस बात से भी नाराज हैं कि राजमहल के योद्धा जहाँ-तहां बाण चलाकर जमीन से पानी निकालते रहते हैं तो थोडी कृपा करके वैसा ही बाण नहर में चला देते तो किसानों को पानी मिल जाता. अरे मैं कहता हूँ राजमहल ने नहर बनवा दिया इतना कम है क्या? अब इस नहर में पानी भी राजमहल के लोग डालें?

कुछ किसान तो आत्महत्या करने पर उतारू हैं. कह रहे हैं कि जिस महाजन से कर्ज लिया था वे कर्ज वसूल करने के लिए परेशान करते हैं. इन किसानों को अगर पता चल जाए कि ये सारे महाजन हमारे ही आदमी हैं तो आफत आ सकती है. मैंने फैसला किया है कि सबसे पहले अपने गुप्तचरों के द्वारा व्हिस्पर कैम्पेन चलाना पड़ेगा कि इनकी फसल इसलिए नष्ट हुई है क्योंकि इन्होने जिस बीज का इस्तेमाल किया वो पास वाले राज्य से इंपोर्ट किया गया था. इसलिए अगली बार जब वहाँ के महाराज हस्तिनापुर आयें तो ये किसान बड़े-बड़े धिक्कार पोस्टर लेकर उनका विरोध करें. इससे दो बातें होंगी. एक तो इस राजा की बेइज्जती होगी और दूसरा किसानों का ध्यान पानी और महाजन के कर्ज से अलग चला जायेगा.

किसानों का इन्कम बढ़ाने के लिए मामाश्री ने कितना अच्छा सुझाव दिया था. उसे ठुकरा दिया गया. मैं कहता हूँ क्या बुराई थी मामाश्री के सुझावों में? उन्होंने चौसर का कैसीनो खोलने के लिए कहा था लेकिन विदुर चचा के चलते मामाश्री का प्लान रिजेक्ट कर दिया गया. एक बार कैसीनो खुल जाता और किसान वहाँ जाते तो उन्हें इन्कम का एक नया जरिया मिल जाता. आगे चलकर मामाश्री इस कैसीनो का फारवर्ड इंटीग्रेशन करते हुए कमोडीटीज फ्यूचर्स की ट्रेडिंग शुरू कर सकते थे. अनंत संभावनाएं थीं लेकिन विदुर चचा के चलते कुछ भी नहीं हुआ.

मामाश्री ने एक सुझाव और भी दिया था. उनका कहना था कि जिस तरह से उनके राज्य गांधार में अफीम की खेती होती है वैसी ही खेती हस्तिनापुर के किसान करें तो उन्हें बहुत फायदा होगा. एक तरह से उनकी बात ठीक भी थी. क्या जरूरी है कि गेंहूं और धान ही उपजाया जाय? अफीम की डिमांड बहुत है. तो ऐसे में क्यों न ये किसान अफीम की खेती करें. लेकिन यहाँ भी विदुर चचा ने टांग अड़ा दी. कहते हैं ये बात हमारी संस्कृति के ख़िलाफ़ है. अब इनको कौन समझाए कि संस्कृति-वंस्कृति कुछ नहीं होती. जो कुछ भी है वो पैसा है. लो, अब मामाश्री की बात नहीं मानी तो भुगतो.

विदुर चचा किसानों के हिमायती बन बैठे हैं. इन्हें इनकी औकात बतानी पड़ेगी. मुझे मामाश्री का सुझाव अच्छा लगा. उन्होंने सुझाव दिया है कि अगली बार जब किसानों का प्रतिनिधिमंडल विदुर चचा से मिले तो किसानों के साथ में कुछ अपने गुप्तचर भी भेज दिए जांय जो सबके सामने विदुर चचा पर आरोप लगा देंगे कि इन्होंने किसानों से सौदा कर रखा है कि कर्ज माफ़ी से हुए फायदे से इन्हें भी दस परसेंट मिलने वाला है.

मान गए मामाजी की खोपड़ी को. कभी-कभी सोचता हूँ कि ये साथ नहीं रहते तो मैं लाइफ में क्या करता.