खेलने के मैदान को स्कूल का हिस्सा न बनाए जाने के लिए राम अवतार जी ने जो तर्क दिया वो अकाट्य था. सही बात है. पैसे से क्या नहीं किया जा सकता? पैसे से स्कूल बनवाया जा सकता है. पैसे से स्कूल हटवाया जा सकता है. पैसे से स्कूल के लिए मैदान बनवाया जा सकता है और पैसे से ही स्कूल के लिए मैदान नहीं भी बनवाया जा सकता है. शायद इसीलिए राम अवतार जी की बात पर रमेश बाबू भी कुछ नहीं बोले.
वैसे भी उन्हें पता था ढेर सारी बातें होती हैं जिनपर क्लायंट का फैसला ही आखिरी फैसला होता है. लिहाजा वे चुप ही रहे.
बात आगे चली तो स्कूल के लिए तमाम और ज़रूरी बातों के बीच से होते हुए बात ह्यूमन रिसोर्स पर जाकर रुकी. स्कूल के लिए मास्टरों की भर्ती कैसे की जानी चाहिए? क्या जुगत लगाई जाय कि सस्ते और टिकाऊ मास्टर मिलें.
आम आदमी को अक्सर यह कहते हुए सुना जा सकता है कि; "सस्ता रोवे बार-बार, मंहगा रोवे एक बार." लेकिन राम अवतार जी कोई आम आदमी तो हैं नहीं. ऐसे में वे हर उस बात को नहीं मानते जिसे आम आदमी मानता है. अगर उनके अपने बिजनेस मॉडल को देखा जाय तो यही साबित होगा कि उनके हिसाब से सस्ती चीज ही अक्सर टिकाऊ होती है.
उनकी तेल-मिल या फिर दूकान पर काम करने वाले मजदूरों को अगर देखा जाय तो राम अवतार जी के इस सिद्धांत की पुष्टि होती है. उन्होंने नियम बना लिया है कि मुटिया-मजदूरों को मजदूरी जितनी कम दी जा सके, उतना ही अच्छा. इसके पीछे तर्क यह है कि अगर मजदूरों को मजदूरी कम मिले तो वे हमेशा हलकान-परेशान रहेंगे. परेशानी से सराबोर मजदूर आगे की सोच ही नहीं सकता. उसे ये सोचने की फुरसत ही नहीं रहेगी कि मजदूरी कम मिल रही है तो कहीं और देखा जाय.
राम अवतार जी को यह सिद्धांत रुपी जायदाद उनके पिताश्री से विरासत में मिली है. माडर्न बिजनेस प्रैक्टिस जिसमे ये माना जाता है कि न्यायपूर्ण मजदूरी किसी भी मजदूर को खुश रखती है इसलिए वह अच्छा काम करता है, के लिए राम अवतार जी के बिजनेस सिद्धांतों की लिस्ट में कोई जगह नहीं है.
खैर, बात जब सस्ते और टिकाऊ मास्टरों की हुई तो काफी बातचीत और ब्रेन स्टोर्मिंग के बाद रमेश बाबू और राम अवतार जी के बीच इस बात पर आम सहमति बनी कि प्राइवेट स्कूल में कम सैलरी पाने वाले अध्यापकों को थोड़ी ज्यादा सैलरी का लालच देकर फोड़ा जा सकता है.
ऐसे अध्यापक जिनका घर-परिवार ट्यूशन किये बिना नहीं चलता. जो प्राइवेट स्कूलों से मिलने वाली सैलरी बिना किसी ना-नुकर के इसलिए ले लेते हैं क्योंकि इन स्कूलों में पढाने से ही उन्हें ट्यूशन मिलते हैं. ये अध्यापक सुबह-शाम उस महापुरुष की आराधना करते हैं जिसने ट्यूशन नामक प्रोफेशन का आविष्कार किया था.
दोनों इस बात पर सहमत हो गए कि सस्ते और टिकाऊ अध्यापकों की खोज प्राइवेट स्कूलों तक जाकर ख़त्म होती है. वहां से आगे जाने की ज़रुरत ही नहीं.
अध्यापकों के बाद बारी आई चपरासियों की. किसी भी स्कूल के लिए अध्यापक के बाद महत्व के पैमाने पर चपरासी का नंबर आता है. चपरासी घंटा न बजाये तो पढाई की शुरुआत न हो. वहीँ चपरासी घंटा न बजाये तो पढाई बंद भी नहीं होगी. चपरासी के महत्व को आगे रखकर दोनों ने बड़ा गहन चिंतन किया.
बातचीत आगे चली तो रमेश बाबू ने सजेस्ट किया कि जैसे अध्यापकों को प्राइवेट स्कूल से खींचा जा सकता है वैसे ही क्यों न चपरासियों को भी वहीँ से खींच लिया जाय. रमेश बाबू के इस विचार को राम अवतार जी ने अपने विचारों की गुलेल चलाकर घायल कर दिया. रमेश बाबू का विचार वहीँ टेबल पर घायल पड़ा बिलबिलाने लगा.
साथ ही अपने विचारों की गुलेल से राम अवतार जी ने एक विचार और दागा. वे बोले; "अरे क्या ज़रुरत है चपरासी बाहर से लाने की? मैं आपको एक तरकीब बताता हूँ. हमारे यहाँ जो मुटिया लोग काम करते हैं, उन्ही में से सात-आठ को चपरासी बना डालते हैं."
उनकी बात सुनकर रमेश बाबू अचंभित. उन्हें समझ में नहीं आया कि राम अवतार जी ऐसा क्यों कह रहे हैं? एक बार के लिए उन्हें लगा कि ऐसा करने से तो राम अवतार जी की तेल-मिलों और दूकानों में काम का हर्ज़ होगा. यही सोचते हुए उन्होंने कहा; "लेकिन फिर आपका काम कैसे चलेगा?"
उनकी बात सुनकर राम अवतार जी मुस्कुरा दिए. बोले; "आप भी न. अरे, मैं इस बात पर ऐसा इसलिए कहा रहा हूँ कि पूरा का पूरा बिजनेस सेंस बनता है यहाँ. अब देखिये, अगर स्कूल के लिए नया चपरासी बाहर से लेने जायेंगे तो उसे चपरासी की सैलरी देनी पड़ेगी. और आप तो जानते ही है कि ऐसा करना कितना मंहगा साबित होगा. ऐसे में अगर दूकान से लाकर किसी मुटिया को चपरासी बना दिया जाय तो दो बातें होंगी. उसकी जगह जिसको भी लेंगे उसे मुटिया की सैलरी मिलेगी. और इसे चपरासी बना देंगे तो ये भी खुश हो जाएगा. एक तरह से इसका प्रमोशन हो जाएगा. मुटिया को अगर चपरासी का काम मिल जाए तो वो इतना खुश हो जाएगा कि सैलरी बढाने की बात करेगा ही नहीं. "
राम अवतार जी की बात सुनकर रमेश बाबू को लगा कि उनके हाथ में होता तो वे राम अवतार जी को चेंबर ऑफ़ कामर्स से गोल्ड मैडल विद सर्टिफिकेट दिला देते. और तो और इनके बिजनेस सिद्धांतों को आई आई एम के पाठ्यक्रम में डलवा देते.
आधे मन से राम अवतार जी को गरियाते और आधे मन से उनकी सराहना करते हुए उन्होंने कहा; " बढ़िया आईडिया दिया आपने."
अध्यापक और चपरासी के बारे फैसला लगभग ले लिया गया. उसके बाद नंबर आया हेडमास्टर साहब का. बात चली तो रमेश बाबू ने कहा; "हेड मास्टर के बारे में आपको चिंता करने की ज़रुरत ही नहीं है. हेड मास्टर तो अपने हाथ में हैं."
उनकी बात सुनकर राम अवतार जी को लगा कि शायद उन्होंने फ़ोन पर बात होने के बाद किसी हेड मास्टर साहब से प्लान के बारे में बात की होगी. यही सोचते हुए उन्होंने रमेश बाबू से पूछा; "आपने किसी हेड मास्टर से बात की है क्या?"
वे बोले; "अरे नहीं. बिना आपसे पूछे मैं किसी से भला कैसे बात कर सकता हूँ? वो तो मैं इसलिए कह रहा था कि अपने एक आरएनपी सर हैं. हायर सेकंडरी में मुझे ट्यूशन पढ़ाते थे. बहुत पुराना सम्बन्ध है अपना. उनका आईटी रिटर्न भी अपने यहीं से मैं ही डलवा देता हूँ. परमेश्वरी विद्यालय में पढ़ाते हैं. एक्सपेरिएंस भी है. काबिलियत भी. वे इस जॉब के लिए परफेक्ट रहेंगे."
अब अगर आपके मन में सवाल उठे कि आरएनपी सर कौन ठहरे तो फिर पढिये.
आरएनपी सर का पूरा नाम राम नारायण पाठक है. अंग्रेजी में एमए किया है. उसके बाद बीएड करके अध्यापन में उतर गए. पूर्वी उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के किसी गाँव के हैं. कलकत्ते में परमेश्वरी विद्यालय में पिछले पचीस साल से पढ़ाते हैं. इन्हें स्कूल से सैलरी उतनी ही मिलती है जितनी प्राइवेट स्कूलों में औरों को मिलती है. घर-परिवार ट्यूशन से चलता है. पाठक सर घर जाकर ट्यूशन पढ़ाते हैं.
पाठक सर की बड़ी तमन्ना थी कि वे किसी दिन परमेश्वरी विद्यालय के हेड मास्टर बनें. जब तक त्रिपाठी जी वहां के हेड मास्टर थे, तब तक पाठक सर को लगता था कि त्रिपाठी जी के बाद वही हेड मास्टर बनेंगे. इस आशा में इन्होने करेसपांडेंस के जरिये इतिहास विषय में भी एमए किया. इन्हें लगा कि डबल एमए करने हेड मास्टर पद के लिए इनकी दावेदारी और पुख्ता हो जायेगी. पाठक सर पूरी तैयारी किये बैठे थे कि त्रिपाठी जी के रिटायरमेंट के बाद यही हेड मास्टर बनेंगे. लेकिन हाय री किस्मत.
इस किस्मत ने इनका साथ छोड़ दिया. इन्हें नहीं पता था कि त्रिपाठी जी के रिटायरमेंट प्लान में एक चैप्टर यह भी था कि वे जब रिटायर होंगे तब अपने रिश्तेदार दूबे जी, जिनकी नौकरी उन्होंने इस स्कूल में लगवाई थी, उन्हें हेड मास्टर बनाकर जायेंगे.
दूबे जी भी हेडमास्टर केवल इसलिए नहीं बने थे कि वे त्रिपाठी जी के रिश्तेदार थे बल्कि इसलिए बन पाए थे कि वे स्कूल के हेड ट्रस्टी सोमानी जी के घर सुबह-शाम रामचरित मानस का सस्वर पाठ करते थे. रामचरित मानस का यह सस्वर पाठ ही उनके हेडमास्टर बनने में सहायक सिद्ध हुआ.
दूबे जी के हेडमास्टर बनने के बाद मानो पाठक जी का परमेश्वरी विद्यालय में अध्यापन से दिल ही उठ गया.
जारी रहेगा....
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२१ मई, २००७ को मैंने पहली पोस्ट लिखी थी. मजे की बात यह कि उसी दिन पब्लिश भी कर दी थी. इस लिहाज से देखें तो आज ब्लागिंग में दो साल पुराने हो लिए हम.
आपने क्या कहा? ये सब मैं क्यों बता रहा हूँ?
अजी साहब, बधाई तो बनती है न.
Thursday, May 21, 2009
सेंट मोला मेमोरियल - भाग ५
Wednesday, May 20, 2009
सेंट मोला मेमोरियल स्कूल - भाग ४
पंकज सिंह जी के बारे में याद आते ही राम अवतार जी आश्वस्त हो गए. उन्हें याद आया कि न जाने कितनी बार वे पंकज सिंह जी को रमेश जी के आफिस में देख चुके हैं. जितनी बार उन्होंने पंकज सिंह जी को वहां देखा, हर बार रमेश बाबू ने राम अवतार जी के सामने सिंह जी की तारीफों के पुल ही बांधे थे. उनकी काबिलियत की चर्चा करते हुए रमेश बाबू ने हर बार यही बताया था कि कैसे दिल्ली के मंत्रालय वगैरह में काम करवाना पंकज सिंह जी के बायें हाथ का खेल है.
पंकज सिंह जी की काबिलियत को साबित करने के लिए रमेश बाबू ने न जाने कितनी कहानियां सुनाई होंगी. तरह-तरह की कहानियां. तरह-तरह की उनकी परेशानियां. हर परेशानी का पंकज सिंह जी के द्बारा तरह-तरह से इलाज किया जाना.
कभी कंपनी अफेयर मिनिस्ट्री में कोई काम फंस गया था तो कभी फायनांस मिनिस्ट्री में. कभी सामाजिक न्याय मंत्रालय में तो कभी पंचायत मंत्रालय में. लेकिन हर बार पंकज सिंह जी ने रमेश बाबू को संकट से उबार दिया था.
संकट से हनुमान छोडावें, मन-क्रम बचन ध्यान जो लावें....टाइप हिसाब था दोनों के बीच.
बात आगे बढ़ी तो राम अवतार जी को लगने लगा कि सारी बातें फ़ोन पर नहीं की जा सकतीं. आखिर मामला भी तो कोई छोटा-मोटा नहीं था. धंधे के डाईवर्शीफ़िकेशन की बात थी. सालों से चले आ रहे उनके विश्वास कि तेल के धंधे से बढ़िया और कोई धंधा नहीं है को इस स्कूल के धंधे ने हिला डाला था. और जो बात राम अवतार जी के विश्वास को हिला दे वो किसी भी तरह से छोटी नहीं हो सकती थी. लिहाजा उन्होंने सोचा कि रमेश बाबू के आफिस जाकर ही बाकी की बातें हो सकती हैं.
यही सोचते हुए उन्होंने रमेश बाबू से पूछा; "अच्छा एक बात बताईये. आज शाम को क्या कर रहे हैं?"
राम अवतार जी द्बारा अचानक पूछे गए इस सवाल से रमेश बाबू को जरा भी आश्चर्य नहीं हुआ. न जाने कितनी बार वे राम अवतार जी द्बारा अचानक पूछे गए ऐसे सवालों को झेल चुके थे. उन्हें पता था कि जब भी राम अवतार जी का कोई काम होता है तो वे फ़ोन पर बात करते हुए अचानक ऐसे ही सवाल दाग देते थे. ऐसे सवालों का मतलब यह होता था कि राम अवतार जी किसी भी हालत में आज शाम को मिलकर रहेंगे. रमेश बाबू का पहले से बनाया हुआ कोई प्रोग्राम रहे या न रहे.
खैर, राम अवतार जी के सवाल के जवाब में रमेश बाबू ने कहा; "मैं शाम को खाली ही हूँ. आप आ जाइये. बाकी बातें यहीं आफिस में करेंगे."
रमेश बाबू ने ये कह तो दिया लेकिन इतना कहने के बाद उन्हें बड़ा पछतावा हुआ. उन्होंने खुद को मन ही मन धिक्कारा. उन्हें लगा कि एक बार में ही मान जाना और राम अवतार जी को आफिस बुलाना ठीक नहीं हुआ. ऐसा करने से इम्पार्टेंस घट जाता है.
उन्हें लगा कि वे कम से कम राम अवतार जी के ऊपर एहसान जताते हुए यह तो कह ही सकते थे कि; "प्लान तो ये था कि आज घर ज़रा जल्दी चला जाऊं. हमारे साले साहब आ रहे हैं शाम को. लेकिन कोई बात नहीं. आपका का काम सबसे से पहले. बाकी काम बाद में होता रहेगा."
लेकिन अब तो बात निकल गई थी. अचानक उनकी नज़र अपने चेंबर की दीवार पर चिपके उस स्टिकर पर गई जिसपर कई चीजों की लिस्ट बनी थी. वे चीजें जो वापस नहीं आतीं. लिस्ट लम्बी थी. हरिद्वार बेस्ड किसी धार्मिक मठ ने यह स्टिकर बनवाया था.
आखिर देश में सामजिक चेतना को जगाने की जिम्मेदारी मठों के ऊपर है.
इस लम्बी लिस्ट में तमाम चीजों का जिक्र था जो वापस नहीं आतीं. इन चीजों की लिस्ट में लिखा था;
तीर कमान से
बात जुबान से
स्टिकर देखकर वे खिसिया गए. उन्हें लगा कि सालों से स्टिकर उनके चेंबर की दीवार पर चिपका है लेकिन इसके बावजूद उनसे गलती हो गई और बात जुबान से निकल गई.
उनके चेहरे पर "धिक्कार है" टाइप भाव उभर आये.
खैर, अब कुछ किया नहीं जा सकता था. अब उनके हाथ में कुछ नहीं था. वैसे भी, उन्हें इस बात से कोई ऐतराज नहीं था कि शाम को राम अवतार जी उनके आफिस में आयेंगे और उन्हें झेलना पड़ेगा. उन्हें ऐतराज इस बात से था कि एहसान जताने के एक मौका उनके हाथ से जाता रहा.
गुस्से में उन्होंने चपरासी को झाड़ दिया. चपरासी की गलती केवल इतनी थी कि वो गिलास में रखे पानी को ढांकना भूल गया था.
उधर राम अवतार जी ने फैसला कर ही लिया था कि बाकी की बातें रमेश बाबू के आफिस जाकर करनी हैं. वे शाम को दूकान से जल्दी निकलने की तैयारी करने लगे. अपने मैनेजर याने मौसी के बेटे को बुलाया.
आप मन ही मन ज़रूर खिसिया रहे होंगे कि;"क्या मैं हर बार "मौसी का बेटा-मौसी का बेटा" लिखता रहता हूँ. अरे, इस मैनेजर याने मौसी के बेटे का कोई नाम भी तो होगा?"
आपका खिसियाना जायज है. मौसी के इस बेटे का ज़रूर एक नाम है.
जैसे पूरी दुनियाँ के माँ-बाप शेक्सपीयर बाबू से प्रभावित नहीं हुए और उनकी ये बात नहीं मानी कि; "नाम में क्या रक्खा है?" वैसे ही मौसी के इस बेटे के माँ-बाप भी शेक्सपीयर बाबू से बिलकुल प्रभावित नहीं हुए.
लिहाजा उन्होंने अपने बेटे का नाम रख कर शेक्सपीयर बाबू के इस सदुपदेश की ऐसी-तैसी कर डाली. नाम रक्खा सुशील.
तो अब से मौसी के इस बेटे को हम सुशील के नाम से जानेंगे.
हाँ, तो राम अवतार जी ने सुशील को बुलवाया. सुशील जब उनके चेंबर में दाखिल हुआ तो उन्होंने कहा; " सुन, आज शाम को मैं नहीं रहूँगा. हावड़ा वाले गोदाम में सरसों गिरेगी आज. उसको देख लेना. और टू चालान पर साइन मत करना. बोलना भैया कल करेंगे."
जैसे अदालतों में जज साहब लोग अपना फैसला सुनाते हैं, वैसे ही राम अवतार जी ने अपना फैसला सुना डाला.
इसके अलावा उन्होंने सुशील को दो-चार और हिदायतें दी जो किसी लिहाज से ज़रूरी नहीं थीं. मालिक द्बारा दी गई हिदायतें ज़रूरी हों, ये किसी बिजनेस-शास्त्र की किताब में नहीं लिखा है. आफिस से निकलने के पहले मालिकों द्बारा दी जाने वाली ज्यादातर हिदायतें गैर-ज़रूरी ही होती हैं. मालिक ऐसी हिदायतें केवल इसलिए देता हैं क्योंकि उसे मालिक-धर्म का पालन करना रहता है.
कई समाज-शास्त्री भाइयों की मानें तो मालिक अगर हिदायत न दे तो उसके पेचिस से पीड़ित होने का चांस रहता है. ऐसे में यही श्रेयस्कर है कि मालिक उठते-बैठते ज़रूरी-गैर ज़रूरी हिदायतें देता रहे. उसका स्वास्थ ठीक रहता है.
राम अवतार जी तो इस सिद्वांत को आँख मूंदकर फालो करते हैं. लिहाजा वे हमेशा स्वस्थ रहते हैं.
खैर, शाम को राम अवतार जी पहुँच गए रमेश बाबू के आफिस. मिलते ही दुआ-सलाम का बाजा बजा. बात आगे चली तो रमेश बाबू ने कहा; "ठीक सोचा है आपने. आज के डेट में इससे बढ़िया कोई धंधा नहीं है."
रमेश बाबू की बात सुनकर राम अवतार जी ने मन ही मन अपना कालर ऊपर कर डाला. मुस्कुराते हुए बोले; "अरे, मेरा तो दिमाग ही फिर गया. सनी का एडमिशन करवाने न जाता तो ये आईडिया तो आता ही नहीं. फिर सोचा कि बड़ा झमेले वाला काम होगा. ऐसे में इसके बारे में सोचना ठीक नहीं होगा. वो तो उस दिन आपसे बात की तब जाकर थोड़ा कांफिडेंस आया कि इस बिजनेस में उतरा जा सकता है."
उनकी बात सुनकर रमेश बाबू ने उन्हें एक बार फिर अस्योर करते हुए कहा; "आप तो अपने आदमी हैं. मैंने तो उस दिन भी कहा कि बस आप सारा काम मेरे ऊपर छोड़ दीजिये. अरे सबसे बड़ा काम है मंत्रालय से मान्यता दिलवाना. दिल्ली वाला सारा काम पंकज कर ही देगा. आप कहें तो उसको कल ही बुलवा लूँ."
राम अवतार जी एक बार फिर से आश्वस्त हुए. मालिक टाइप लोग समय-समय पर आश्वस्त होते रहें तो आस-पास के कई लोगों की उम्र बढ़ जाती है.
कुछ सोचते हुए बोले; "आप तो हैं ही. फिर मुझे किस बात की चिंता? मुझे तो इतना मालूम है कि स्कूल बनेगा तो केवल मेरा नहीं होगा. स्कूल तो आप का ही होगा. सारा क्रेडिट आपका. मेरा क्या है, मैं तो केवल इतना मानता हूँ कि भगवान ने समाज के लिए कुछ करने लायक बनाया है तो अपना भी धरम बनता है कि जो कुछ बन पड़े किया जाए."
इतना कहकर वे रमेश बाबू की तरफ देखने लगे. शायद उन्हें रमेश बाबू के रिएक्शन का इंतजार था. दोनों की नज़रें मिलीं तो दोनों ठहाका लगाकर हंसने लगे.
हंसी रुकी तो रमेश बाबू बोले; "बिल्कुल जी बिल्कुल. मैंने तो आपको कहा ही कि दिल्ली का काम आप मेरे ऊपर छोड़ दें. आप तो बस ज़मीन वगैरह का इंतजाम कीजिये. वैसे आप कहेंगे तो स्टेट गौव्मेंट से ज़मीन की बात भी चलाई जा सकती है. चैनल सब है अपने पास. हाँ, लेकिन एक बात है. स्टेट गौव्मेंट के पास गए तो थोडी देर हो सकती है. जानते ही हैं सरकारी काम इतने जल्दी तो होने से रहा."
रमेश बाबू की बात सुनकर राम अवतार जी बोले; " वो तो ठीक रहेगा. अरे अपने अप्लाई तो कर ही देते हैं. देर से ही सही, ज़मीन तो मिल ही जायेगी. जब मिल जायेगी तो स्कूल का काम आगे बढा देंगे. एक और ब्रांच खोल देंगे. हाँ जब तक गौव्मेंट से ज़मीन नहीं मिलती, तबतक पहले स्कूल के लिए अपने पास जगह की कमी नहीं है."
रमेश बाबू उनकी बात सुनकर खुश हो गए. बोले; "मतलब ज़मीन है आपके पास?"
राम अवतार जी ने उनकी बात का जवाब देते हुए कहा; "ज़मीन तो नहीं है, हाँ वो अपना बी टी रोड वाला गोदाम है न, अरे वही बड़ा वाला गोदाम. वैसे ही पड़ा है सालों से. किसी काम तो आता नहीं. इसी काम में आ जायेगा. पिताजी ने बड़े सस्ते में काबाडा था उसे."
रमेश बाबू ने पूछा; "क्या एरिया होगा उसका?"
राम अवतार जी ने बताया कि गोदाम करीब बारह हज़ार स्क्वायर फीट का है. पूरा खाली. आगे बोले; "बस स्ट्रक्चर ही तो चेंज करना है. गोदाम को स्कूल बनाने में कितना समय लगेगा?"
रमेश बाबू को इस गोदाम के बारे में जानकारी थी. राम अवतार जी का गोदाम को स्कूल में बदलने का आईडिया उन्हें अच्छा तो लगा लेकिन उनके मन में कुछ सवाल भी आये.
वे बोले; "लेकिन वो तो बड़े कंजेस्टेड जगह में है. सामने तो बिलकुल भी जगह नहीं है. मेरे कहने का मतलब है कि स्टूडेंट्स के खेलने-कूदने के लिए भी तो कुछ जगह रहनी चाहिए?"
राम अवतार जी को ये सवाल बिलकुल नहीं भाया. मन ही मन सोचने लगे कि स्कूल में बच्चों के खेलने-कूदने की क्या ज़रुरत है? अरे बच्चे वहां पढने आयेंगे कि खेलने-कूदने? पता नहीं किस जाहिल ने स्कूल में खेल-कूद को प्राथमिकता देने की बात कही? क्या ज़माना आ गया है कि लोग पढाई-लिखाई से ज्यादा खेल-कूद को महत्व देने लगे हैं.
ऐसे में तो देश का फ्यूचर पूरी तरह से बरबाद हो जाएगा.
उन्हें यह भी लगा कि जितनी जगह बच्चों के खेलने के लिए छोड़ी जाती है, उसमें एक पूरा हाऊसिंग काम्प्लेक्स डेवलप हो सकता है. खेलने-कूदने के लिए जगह छोड़ना तो करोडों रूपये की बरबादी है. पता नहीं लोगों को बिजनेस सेंस कब आएगा?
खैर, यही सोचते हुए वे बोले; "अरे क्या ज़रुरत है खेल-कूद की? वैसे अगर खेल-कूद के लिए जगह न होना स्कूल की मान्यता प्राप्त करने के रास्ते में रुकावट बनेगी तो अन्दर एक रूम बनवा देंगे. एक टेबल टेनिस का टेबल और कैरम वगैरह का प्रबंध करवा देंगे. क्या है? वैसे भी हर काम पैसे से होता है. वो सब ठीक हो जाएगा."
जारी रहेगा......
Thursday, May 14, 2009
सेंट मोला मेमोरियल स्कूल - भाग ३
भाग १ पढने के लिए यहाँ क्लिकियायें...
भाग २ पढने के लिए यहाँ क्लिकियायें
रमेश बाबू राम अवतार जी को झेलने के लिए कमर कस चुके थे. और कर भी क्या सकते थे? राम अवतार जी को झेलने का उनका अनुभव हमेशा उनके काम आता है. वैसे भी राम अवतार जी जैसे ट्रेडर के साथ 'ट्रेडरई' कैसे की जाती है, उन्हें बखूबी पता है.
इंस्टीच्यूट ने अपने सिलेबस में नहीं रक्खा तो क्या हुआ, ऐसे क्लाइंट के साथ बात करके सब सीख जाते हैं.
खैर, राम अवतार जी के सवाल कि; "बच्चे कैसे हैं?" के जवाब मेंने
चोखानी जी ने कहा; बच्चे तो ठीक-ठाक हैं. पिछले पंद्रह दिनों से छोटे वाले के एडमिशन के लिए बहुत बिजी था."
उनका जवाब सुनकर मानो राम अवतार जी की बांछे खिल गईं. उन्होंने प्लान बनाकर रखा था कि अगला सवाल वे श्याम बाबा के कीर्तन समारोह में उनकी अनुपस्थिति के बारे में पूछेंगे लेकिन जैसे ही चोखानी जी ने बच्चे के एडमिशन की बात की, उन्होंने सवाल को ड्राप करना ही उचित समझा.
इससे पहले कि बात कहीं और खिसके वे तुंरत बोल पड़े; "अरे मत पूछिए. मैं भी उसी चक्कर में फंसा था. क्या ज़माना आ गया है. एक हम लोग थे जो बीस रूपये फीस देकर बी कॉम तक पढ़ लिए और एक आज का हाल है कि दूसरी क्लास में एडमिशन के लिए पचीस हज़ार तो डोनेशन देना पड़ता है."
चोखानी जी ने भी शायद अपने बेटे की एडमिशन कथा अभी तक किसी के साथ शेयर नहीं की थी. लिहाजा दोनों ने एक साथ करीब पांच मिनट तक एडमिशन को लेकर अपने अनुभव शेयर किये. दोनों के मन में रखी भड़ास धीरे-धीरे करके मुंह के रास्ते बाहर हो रही थी.
जैसे ही राम अवतार जी को लगा कि कहीं बात खिसक कर जमाने के खराब होने पर पहुंचे वैसे ही उनका व्यापारी दिमाग बोल पड़ा; "अब असली मुद्दे पर आ जाओ."
दिमाग का सुझाव मानते हुए वे चोखानी जी से बोले; "लेकिन एक तरह से देखें तो सरकार भी कितना करेगी शिक्षा के लिए? वैसे भी सरकार मदद ही तो कर रही है. मैं कह रहा हूँ, जिसके पास पैसा है, उसके स्कूल के धंधे में जाने का रास्ता तो दिखा ही दिया है सरकार ने."
राम अवतार जी की बात सुनकर रमेश बाबू मन ही मन सोचने लगे कि असली व्यापारी इसे कहते हैं. आखिर जो आदमी विषम परिस्थियों में भी व्यापार का आईडिया निकाल ले, उससे बड़ा व्यापारी और कौन है? न जाने कितने उद्योगपति और व्यापारी इस बात का इंतजार करते हैं कि कोई सूखा आये...कोई बाढ़ आये...और कुछ नहीं तो कहीं युद्ध वगैरह ही शुरू हो जाए.
ऐसी विषम परिस्थितियां मौजूदा व्यापारियों को सुदृढ़ तो करती ही हैं, नए लोगों को भी व्यापार वगैरह करने का मौका देती हैं.
खैर, रमेश बाबू कुछ सोचते हुए बोले; "एक दम सही बात कह रहे हैं. मैं तो कहता हूँ कि इस बारे में आपको खुद भी सोचना चाहिए. कोई बहुत बड़ी बात नहीं है स्कूल खोलना. अरे मैं कहता हूँ, पैसा है तो आदमी कुछ भी कर सकता है."
राम अवतार जी को रमेश बाबू की बात खूब जमी. लेकिन कहीं रमेश बाबू को उनके प्लान और उनकी उत्सुकता के बारे में पता न चल जाए इसलिए वे बोले; "अरे क्या बात कह रहे हैं आप? मैं और स्कूल के धंधे में! नहीं-नहीं ये काम हमसे नहीं होगा. भाई अपना जमा-जमाया काम ही काफी है."
रमेश बाबू बोले; "अरे क्यों नहीं होगा? आप क्या समझते हैं, जिन लोगों के स्कूल हैं वे क्या पहले से स्कूल चलाते थे? आखिर बिड़ला जी भी तो पहले एम्बेसडर ही बनाते थे. सीमेंट ही तो बनाते थे. जब वे कर सकते हैं तो आप क्यों नहीं कर सकते? वैसे भी आपको क्या करना है? आप तो बस हाँ कीजिये. बाकी का काम तो मुझपे छोडिये."
राम अवतार जी को लगा कि अब ज्यादा फूटेज खाने की जरूरत नहीं रही. फिर भी आखिरी मनौव्वल का रास्ता साफ़ करते हुए उन्होंने पूछ लिया; "आपको लगता है मैं इस धंधे में जा सकता हूँ?"
रमेश बाबू को लगा कि इन्हें कांफिडेंस देने की ज़रुरत है. वे बोले; "अरे मैंने कहा न कि बाकी का काम आप मेरे ऊपर छोडिये. आप तो बस हाँ कीजिये उसके बाद देखिये. आपका हर काम तड-तड होगा."
दोनों एक दूसरे को उकसा रहे थे.
राम अवतार जी अब तक आश्वस्त हो चुके थे कि उनका निशाना ठीक जगह लगा. फिर भी रमेश बाबू को थोड़ा और उकसाने के लिए उन्होंने फिर कहा; "बड़ा झमेला है रमेश जी. स्कूल की मान्यता वगैरह दिलाना. हेड मास्टर खोजना. मास्टर खोजना.....सबसे बड़ा झमेला है सरकारी मान्यता दिलाना."
उनकी बात सुनकर रमेश जी को लगा कि कहीं सरकारी मान्यता मिलने या फिर सी बी एस ई से एफिलियेशन न मिलने के डर से कहीं ये अपना प्लान त्याग न दें. वे तुंरत बोल पड़े; "अरे राम अवतार जी, मैंने कहा न कि आपको चिंता करने की ज़रुरत नहीं है. ये सारा काम मेरे ऊपर छोडिये."
राम अवतार जी को लगा कि रमेश बाबू के मन को एक बार फिर से टटोलने की ज़रुरत है. उन्होंने पूछा; "तो क्या कोई आदमी है आपके पास जो दिल्ली में सी बी एस ई वाला काम वगैरह करा दे?"
"अरे मैंने कहा न कि आप मुझपे छोडिये. वो अपना पंकज है न, अरे वही पंकज सिंह, आपका दिल्ली से रिलेटेड हर काम करवा कर देगा. उसके रहते आप को किस बात की चिंता?"; रमेश बाबू ने राम अवतार जी को फिर से आश्वस्त किया.
अब अगर आपके मन में यह सवाल उठा रहा है कि पंकज सिंह कौन हैं, तो फिर पढिये कि वे कौन हैं.
पंकज सिंह जी को बोल-चाल की भाषा में 'बहुत पहुँची हुई चीज' कहा जाता है. ग्रेजुयेशन तक की पढ़ाई की है सिंह जी ने. ग्रेजुयेशन के दौरान तो क्या उससे न जाने कितने पहले से दुनियाँदारी की सारी बातें वे सीख चुके थे. ग्रेजुयेशन की पढ़ाई तो इसलिए की क्योंकि माँ-बाप चाहते थे कि ग्रैजुएट हो जाएँ तो शादी-व्याह में कोई असुविधा नहीं होगी.
जब राजनीतिशास्त्र से बीए की पढ़ाई कर रहे थे तभी इन्होने सबसे बड़े सामाजिक सत्य का पता लगा लिया था. और वो ये था कि पढ़ाई-लिखाई का काम बेवकूफ करते हैं. पढ़-लिख कर पैसा ही तो कमाना है. ऐसे में अगर कोई अपनी प्रतिभा के दम पर बिना पढ़े-लिखे ही पैसा कमाने की काबिलियत रखता हो तो क्या ज़रुरत है पढाई-लिखाई की?
कालेज के दिनों से ही छात्र राजनीति के आधार स्तंभ बन चुके थे. छात्रों की भलाई का काम इन्होने अपने मज़बूत कन्धों पर ले लिया था. जैसे-जैसे भलाई करते गए इनके कंधे मज़बूत होते गए. कालेज में एडमिशन लोलुप छात्रों का पैसे लेकर एडमिशन करवाने का धंधा इन्होने छात्र जीवन में ही शुरू कर दिया था. कद धीर-धीर बढ़ने लगा तो मार-पीट जैसा पूण्य कार्य भी करने लगे.
आज के एक 'राजनेता' से पंकज सिंह जी बहुत बहुत प्रभावित रहते थे. हमेशा कहते थे कि उनको देखो. पहले क्या थे? छात्र नेता ही तो थे. कलकत्ते के ही थे. अरे यहीं सेंट्रल एवन्यू में जाम वगैरह करवाने का काम करते थे. और आज देखो. हिन्दुस्तान की सरकार बनेगी कि बिगडेगी, इस बात का निर्धारण वही करते हैं.
इन राजनेता से प्रभावित पंकज सिंह जी उन्ही के पदचिन्हों पर चल रहे हैं. महीने में पचीस दिन कलकत्ते से दिल्ली आते-जाते रहते हैं. एक पाँव कलकत्ते में तो दूसरा राजधानी एक्सप्रेस में रहता है. किसी भी मंत्रालय में कोई भी काम करवाने का दावा करते हैं. कंपनी अफेयर मिनिस्ट्री हो या फिर फायनांस मिनिस्ट्री, स्टील मिनिस्ट्री हो या फिर ह्युमन रिसोर्स मिनिस्ट्री, हर मिनिस्ट्री में कोई भी काम करवा सकते हैं.
जब कलकत्ते में रहते हैं तब हनुमान जी के मंदिर में शाम को जाना नहीं भूलते. वहां जाते हैं, इस बात का पता इनके माथे पर सिन्दूर वाले चन्दन को देखने से लग जाता है. लगता है जैसे भगवान जी को धंधे में पार्टनर बना रक्खा है इन्होने.
जारी रहेगा...

