घुन्नन जब दफ्तर में आया उस समय मैं अपने सीनियर के दफ्तर में हो रही एक मीटिंग में था. जैसे ही खबर मिली, मैंने तुंरत मीटिंग कैंसल की और अपने दफ्तर पहुंचा. मेरे सीनियर ने मीटिंग कैंसल करते वक्त मुझसे कहा; "मिश्रा जी, मीटिंग कैंसल नहीं करनी चाहिए आपको. बहुत ज़रूरी है."
मैंने उन्हें दो टूक जवाब देते हुए कहा; "सर, अगर बाल-सखा से मीटिंग और आफिसियल मीटिंग के बीच चुनना पड़े तो मैं बाल-सखा से मीटिंग को चुनूँगा."
मेरी बात सुनकर सीनियर डर गए.
कोई नई बात नहीं है. वे ऐसे ही डरते रहते हैं. उन्हें इस बात की चिंता सताती रहती है कि मैं कहीं रिजाइन न कर दूँ. जानकारी के लिए बता दूँ कि मैं बचपन से ही बम्बईया फिल्मों के उस इंस्पेक्टर से प्रभावित रहा हूँ जो इस्तीफा लिखकर जेब में रखता है और बात-बात पर अपने सीनियर को चमकाता रहता है.
दफ्तर आया तो घुन्नन को देखकर लगा जैसे सदियों से बरसात का मुंह न देखे रेगिस्तान में सावन के बादल उमड़ आये. उन्हें अंकवारि भरे पंद्रह मिनट तक भेंटता रहा. इच्छा तो हुई कि एक घंटा तक भेंटे और न जाने कितने वर्षों से घुन्नन को न मिल पाने का मलाल निकाल दें. लेकिन ऐसा हो न सका.
पछतावा हुआ कि घुन्नन से गाँव में क्यों नहीं मिला? गाँव में मिला होता तो कम से कम एक घंटा अंकवारि में भरे रहता घुन्नन को.
खैर, उसके बाद मैंने दफ्तर से पूरे दिन के लिए छुट्टी ले ली. रास्ते से दस किस्म की मिठाइयाँ, तीन पैकेट नमकीन, एक किलो जलेबी पैक करवाई.
जलेबी की कहानी बड़ी मजेदार है. जब मैं और घुन्नन गाँव के प्राईमरी स्कूल में पढ़ते थे, उनदिनों गाँव में जलेबी की गिनती सबसे प्रिय और हमेशा उपलब्ध रहने वाली मिठाई के तौर पर होती थी.
आज भी याद है. स्कूल के पिछवाड़े मोहनलाल हलवाई की दूकान थी. ज्यादा बड़ी नहीं थी. गाँव में हलवाई की दूकान कितनी बड़ी रहेगी? छोटी सी दूकान में कांच के कुछ मर्तबान. किसी में लाई रहती थी तो किसी में चूडा. गट्टा, रेवड़ी और गुड़ से बने सेव के लिए मर्तबान अलग से होते थे. एक मर्तबान में नमकीन रखी रहती थी. मिठाई के नाम पर मोहनलाल जलेबियाँ बनाता था. दो तरह की जलेबी. गुड़ से बननेवाली जलेबी और चीनी से बननेवाली जलेबी. गुड़ से बननेवाली जलेबी को हम चोटिया जलेबी कहते थे. थोड़ी काली होती थी न. अब तो ऐसी जलेबी के दर्शन दूभर हो गए हैं. शहर से नाता क्या जुड़ा, गाँव का सबकुछ पीछे छूट गया. रास्ते तो छूटे ही, चोटिया जलेबी भी छूट गई.
अब तो यादकर के केवल आँखों को नम किया जा सकता है.
मैं और घुन्नन जब क्लास बंक करते तो मोहनलाल की दूकान में बैठकर चोटिया जलेबी खाते. मोहनलाल भी हम दोनों से बहुत प्रसन्न रहता था. उनदिनों जलेबी वजन करके बिकती थी. जब हम ढाई सौ ग्राम जलेबी की फरमाईस करते तो तौलने के बाद मोहनलाल दो जलेबियाँ और रख देता.
सरल-मना मोहनलाल. अब कहाँ मिलेंगे ऐसे लोग?
आज जब इतने वर्षों बाद घुन्नन से मिला तो अनायास ही जलेबी की याद आ गई. इच्छा तो हुई कि अगर उपलब्ध होती तो आज चाहे जितनी भी दूर जाना पड़ता, जाते और चोटिया जलेबी खोजकर जरूर लाते. जैसे ही यह बात मन में आई, मैंने दफ्तर के प्यून को फ़ोन किया. जब मैंने उससे पूछा कि चोटिया जलेबी कहाँ मिल सकती है तो उसे समझ में ही नहीं आया कि मैं कैसी जलेबी की बात कर रहा हूँ. जब मैंने उसे पूरी बात बताई तो उसने कहा कि थोड़ी देर में वो बताएगा.
प्यून से बात करके मैंने फ़ोन डिस्कनेक्ट कर दिया.
उसके बाद घुन्नन से उसके घर-परिवार के बारे में पूछा. उसी समय पता चला कि उसका बेटा अब अट्ठारह वर्ष का हो गया है. समय बीतते देर नहीं लगती. सुनकर विश्वास ही नहीं हुआ कि जिस बच्चे को तब देखा था जब वह डेढ़ वर्षों का था, अब अट्ठारह वर्षों का हो गया है.
मुझे याद है. जब घुन्नन का बेटा एक साल का था, मैं घुन्नन के घर उससे मिलने गया था. उसके बेटे को गोद में लिए बैठा था कि बच्चे ने सू-सू कर दिया. पहले के बच्चे सू-सू करते थे तो जिसकी गोद में करते थे उसके कपडे भीग जाते थे. अब तो बच्चे इतने स्मार्ट हो गए हैं कि सू-सू करते हैं तो पता ही नहीं चलता. कभी-कभी सोचता हूँ तो लगता है कि आज भी बच्चे तो बच्चे ही हैं. असल में स्मार्ट माता-पिता हो गए हैं जो बच्चों को हगीज और न जाने क्या-क्या पहना देते हैं.
ज़माने ने बच्चों को भी बच्चा नहीं रहने दिया. हाय रे सभ्यता.
बात ही बात में घुन्नन ने बताया कि लड़के का एम बी ए के एंट्रेंस एक्जाम में सेलेक्शन हो गया था लेकिन आर्थिक तंगी के कारण उसका एडमिशन अभी तक नहीं हो पाया. मैंने तुंरत घुन्नन से कहा कि वो पैसे की चिंता न करे. मैं उसकी पढ़ाई के लिए पैसे का इंतजाम कर दूंगा. घुन्नन को बहुत संकोच हुआ लेकिन मैंने अपनी बात मनवा ली.
अभी घुन्नन से और बात हो ही रही थी कि दफ्तर से प्यून का फ़ोन आया. उसने बताया कि कैसे उसने बड़ी मेहनत की लेकिन किसी दूकान का पता नहीं मिला जहाँ चोटिया जलेबी मिलती हो. मैं उसकी बात सुनकर दुखी होने ही वाला था कि उसने बताया कि उसके पड़ोस में हलवाई की दूकान है और वह हलवाई अलग से चोटिया जलेबी बनाने पर राजी हो गया है.
प्यून की बात सुनकर मुझे लगा जैसे किसी ने मरते हुए को संजीवनी बूटी खिला दी हो. अपनी हालत के बारे में सोचकर मैं कल्पना करने लगा कि श्री राम को कैसा लगा होगा जब उन्होंने हनुमान जी को संजीवनी बूटी वाले पर्वत के साथ देखा होगा.
खैर, मैंने गाड़ी तुंरत दफ्तर की और मोड़ ली. दफ्तर के नीचे ही प्यून खडा मिल गया. मैंने उसे पाने साथ लिया और उस हलवाई की दूकान की तरफ चल दिया. वहां पहुँच कर हलवाई से आधा किलो जलेबी ली. प्यून ने मजाक में कहा भी इस उम्र में इतनी जलेबी खाना ठीक नहीं लेकिन मैं नहीं माना. फिर मन में आया कि जब इतनी मेहनत करके चोटिया जलेबी खरीद ही ली है तो क्यों न फिर शहर से बाहर कोई प्राईमरी स्कूल भी खोज लिया जाय. ड्राईवर को ऐसे एक प्राईमरी स्कूल की जानकारी थी. वह हमदोनों को वहां ले गया. संयोग देखिये कि इस स्कूल के पिछवाड़े भी एक हलवाई की दूकान थी. मैंने पहले से ख़रीदी चीनी वाली जलेबी ड्राईवर के हवाले कर दी.
मैंने और घुन्नन ने उस दूकान पर बैठकर चोटिया जलेबी खाई. न जाने कितने वर्षों बाद ऐसा लगा कि बिना किसी मशीन का इस्तेमाल किये ही बचपन में पहुँच गए.
शाम को घुन्नन ट्रेन पकड़कर गाँव चला गया. अब मैं उसके वापस आने की बाट जोह रहा हूँ.
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बाल-सखा के मिलन पर ब्लाग पोस्ट यहाँ पढ़ सकते हैं. यह तो साहित्यिक पोस्ट है.
Tuesday, July 14, 2009
घुन्नन-मिलन
Friday, July 10, 2009
वही बात...ब्लॉग को साहित्य कहा जा सकता है या नहीं?
ब्लॉग को साहित्य कहा जाय या नहीं, इस बात पर बहस अब पुरानी हो चुकी है. आज बालसुब्रमण्यम जी ने भी एक लेख पब्लिश किया है. उनके लेख में तमाम बातों का जिक्र किया है जिसकी वजह से साहित्य को साहित्य की मान्यता दी जाती है. उन बातों में से एक बात है;
"यदि आज ब्लोगों में जो लिखा जा रहा है, वह बीस-पच्चीस साल बाद भी पढ़ा जाता रहे, तब इस पर विचार किया जा सकता है कि वह साहित्य कहलाने लायक है या नहीं।"
इसपर दो मत नहीं हो सकता कि ऊपर लिखी गई बात भी साहित्य को नापने का एक पैमाना है. लेकिन यह मान्यता कब की है? पुरानी है. जब साहित्य के बारे में यह मान्यता उभरी, उनदिनों में और आज के दिनों में बहुत अंतर है. पहले शिक्षा और ज्ञान की उम्र बहुत लम्बी होती थी. लेकिन आज ऐसा नहीं है. तकनीक के विकास की वजह से ज्ञान या शिक्षा की उम्र धीरे-धीरे घटती जा रही है.
एक शिक्षा या ज्ञान लेकर शिक्षण संस्थाओं से निकलने वाला छात्र देखता है कि कुछ ही वर्षों में उसके ज्ञान को तकनीकी विकास के दौर में किसी और ज्ञान ने रिप्लेस कर दिया.इसके अलावा ज्ञान और शिक्षा के माध्यम भी बदल गए हैं.
आप कंप्यूटर को ही ले लीजिये. कंप्यूटर के क्षेत्र में हर एक-दो वर्ष में कोई नई भाषा आकर पुरानी भाषा को रिप्लेस कर रही है. कंप्यूटर के अलावा आप शिक्षा के किसी भी और डिसिप्लिन को ले लीजिये, वह चाहे इंजीनियरिंग हो, मेडिकल हो,अकाऊंटिंग हो, आर्ट हो, सिनेमा हो, या फिर कुछ और, हर क्षेत्र में बदलाव बड़ी तेजी से हो रहे हैं.
ऐसे में बदलाव से साहित्य अछूता कैसे रह सकता है?
बालसुब्रमण्यम जी ने खुद लिखा है कि कैसे पहले राहुल साकृत्यायन और किपलिंग के साहित्य की गिनती अच्छे साहित्य के तौर पर होती थी लेकिन बाद में पुनर्विचार के बाद इन लोगों की कृतियों को खारिज कर दिया गया. मेरा प्रश्न यह है कि अगर इन साहित्यकारों की कृतियों पर पुनर्विचार के बाद इन्हें खारिज किया जा सकता है तो फिर साहित्य की मान्यताओं पर क्या पुनर्विचार भी नहीं किया जा सकता?
पहले साहित्य को सहेजने के साधन क्या थे? किताब की शक्ल में साहित्य लिखा जाता था. शोध-कार्यों को भी सहेज कर रखने का जरिया भी किताबें ही थीं. वहीँ दूसरी तरफ ब्लॉग जहाँ पर लिखा जाता है वह माध्यम ही रोज बदलता रहता है. हो सकता है कि हमें कल कोई और माध्यम मिले जिसपर लोग ब्लॉग लिखें. हम विचार करें तो शायद इस निष्कर्ष पर पहुंचें कि असल में ब्लॉग का आईडिया ही व्यावसायिक है. और चूंकि व्यवसाय के काम में लाया जानेवाला आईडिया समय-समय पर बदलता रहता है इसलिए हो सकता है कि कल ब्लॉग का आईडिया ही पूरी तरह से डिस्कार्ड कर दिया जाय. ब्लॉग को कोई और माध्यम रिप्लेस कर दे.
पुराने साहित्य-लेखन पर व्यावसायिक होने का तमगा कभी नहीं लगा सिवाय इसके कुछ प्रकाशक और लेखक साहित्य को कोर्स की किताबों के तौर पर चलवाने के लिए कुछ करते रहते थे. वहीँ आज के साहित्यकारों को देखिये, कितना पैसा मिलता है इन्हें. तो क्या व्यावसायिक होने का बहाना बनाकर इनके साहित्य को खारिज कर दिया जाय?
कोई भी कह सकता है कि जो कुछ पहले लिखा गया और अभी तक पढ़ा जा रहा है, वही असली साहित्य है और आज के साहित्यकार जो लिख रहे हैं, चूंकि उसके आज से पचास साल बाद भी पढ़े जाने की गारंटी नहीं है, लिहाजा उनके द्बारा लिखे जाने वाले साहित्य को साहित्य ही न माना जाय. कालजयी लेखन के चक्कर में आज का साहित्यकार अपने समय के समाज और अपने समय की राजनीति के बारे में बात ही न करे तो फिर उसके साहित्य का समाज के लिए क्या फायदा?
हिंदी ब्लागिंग में ही न जाने कितने लोग हैं जिन्होंने लिखना शुरू किया तो देखकर लगा कि बहुत अच्छा लिखते हैं. लेकिन वही लोग अब लिखते ही नहीं. ऐसे में उनका लिखा हुआ लोग आज से बीस साल बाद भी याद रखेंगे, इस बात की कोई गारंटी नहीं है. लेकिन ब्लागिंग छोड़ने से पहले उन्होंने जो कुछ भी लिखा, उसे न सिर्फ किताब की शक्ल दी जा सकती है बल्कि यह भी कहा जा सकता है कि वह सारा कुछ लोक हितकारी है और शायद आज से बीस साल बाद भी लोग उसे पढ़ना चाहें. ऐसे में ब्लागिंग छोड़ने से पहले उनलोगों ने जितना लिखा, उसे क्या साहित्य नहीं कहा जा सकता?
इसके अलावा शिक्षा के माध्यमों में जिस तरह का बदलाव आ रहा है, हो सकता है कल को शिक्षण संस्थायें कुछ ब्लॉग लेखकों के ब्लॉग को अपने पाठ्यक्रम में ले आयें. आखिर जब फिल्मों को साहित्य के पाठ्यक्रम में रखा जा सकता है तो उसी तरह ब्लॉग को भी तो रखा जा सकता है.
ब्लॉग को साहित्य कहा जाय या नहीं, इस बात पर बहस करना शायद अभी ठीक नहीं होगा. हाँ, जैसा कि हाल ही में सुना गया है, कुछ संस्थायें इन्टरनेट पर हिंदी साहित्य को उपलब्ध कराने के लिए प्रयासरत हैं. जब हिंदी साहित्य का एक बड़ा भाग नेट पर उपलब्ध होगा और जब ब्लॉग और साहित्य के पाठक एक ही होंगें, तब शायद यह बहस ही बेमानी हो जाय. तब पाठक खुद ही पता लगा लेगा और एक निर्णय पर पहुंचेगा कि ब्लॉग पर जो कुछ भी लिखा जा रहा है वह सब साहित्य है या नहीं? या फिर उसका एक हिस्सा ऐसा है जिसे साहित्य की श्रेणी में रखा जा सकता है.
आखिर सच तो यही है न कि आज साहित्य और ब्लॉग के पाठक बहुत हद तक अलग-अलग हैं.
Saturday, July 4, 2009
काहे नहीं एक शायर रिक्रूट कर लेते?
ममता बनर्जी जी ने रेल बजट पेश कर दिया. करना ही था. बजट होता ही है पेश करने के लिए सो उन्होंने कर दिया. बजटीय परंपरा निभाते हुए उन्होंने बजट के साथ-साथ शेर भी पेश किया. शेर था;
रोशनी चाँद से होती है सितारों से 'नेहीं'
मोहब्बत कामयाबी से होती है जुनून से 'नेहीं'
ममता जी शेर से बिलकुल 'नेहीं' डरीं. सीधा उसे पेश कर दिया. वैसे भी अब शेरों से कम ही लोग डरते हैं. ऐसे में ममता जी क्यों डरें?
लेकिन एक बात समझ में नहीं आई. वे तो पश्चिम बंगाल से चुनकर गई हैं. ऐसे में उन्हें गुरुदेव की कोई कविता सुनानी चाहिए थी. गुरुदेव की कविता क्यों नहीं सुनाई उन्होंने? शायद उन्हें गुरुदेव की कविता याद न हो. चलिए माना कि उन्हें गुरुदेव की कविता याद नहीं थी तो उन्होंने नहीं सुनाई लेकिन कवि सुकान्त की ही कविता सुना देतीं.
मैंने अपने एक मित्र से कहा; "और कुछ नहीं तो कवि सुकांत की ही कविता सुना देनी चाहिए थी उन्हें."
मित्र बोले; "अरे तुम्हें मालूम नहीं क्या? कवि सुकांत बुद्धदेव बाबू के चाचा जी थे. ऐसे में ममता जी उनकी कविता क्यों सुनाएं? वैसे भी ममता जी बंगाल के किसी कवि की कविता सुनाती तो लालू जी उनके ऊपर आरोप लगा देते कि वे भारत की रेलमंत्री होकर ऐसे काम कर रही हैं जिसे देखकर लग रहा है कि वे भारत की नहीं बल्कि पश्चिम बंगाल की रेलमंत्री हैं."
मुझे समझ मे आ गया कि उन्होंने शेर क्यों पेश किया.
लेकिन ऐसा शेर?
इससे बढ़िया शेर तो हमारे मोहल्ले के पप्पू जी सुनाते हैं. ममता जी पप्पू जी से ही शेर लिखवा लेतीं. वैसे भी बजट चाहे वित्तमंत्री पढ़ते हों या रेलमंत्री, वे कविता या शेर जरूर पढ़ते हैं. अपने इस कर्म से बाज तो आयेंगे नहीं. ऐसे में तो उन्हें मंत्रालय के लिए शायर और कवि रिक्रूट कर लेने चाहिए. भाई, अगर आप पुराने कवियों या शायरों की रचनाएँ बजट के साथ नहीं पेश करना चाहते तो कम से कम इतना तो करें कि अपने मंत्रालय में कुछ कवि और शायर रिक्रूट कर लें. संसद और देश इस तरह के शेर सुनने से तो बच जाएगा.
लेकिन जो शेर ममता जी ने पढ़ा उसका मतलब क्या हो सकता है?
अब शेर और कविता का मतलब सबके लिए समान हो तो फिर साहित्यिक झमेले ही न हों. आलोचकों की ज़रुरत ही न पड़े. कविताओं और शेरों के भावार्थ-उद्योग पर ताला लग जाए.
तो पेश है ममता जी के पढ़े गए शेर का मतलब जो अलग-अलग लोगों के लिए बिलकुल अलग-अलग है.
प्रधानमंत्री जी के विचार:
देखो जी, ममता जी ने जो शेर पढ़ा, वो हमारी पिछली सरकार के रवैये को बिलकुल साफ़ करते हुए उसे आगे बढ़ाता है. आपको याद हो तो मैंने अपने एक भाषण में कहा था कि देश के संसाधनों पर माइनोरिटी कम्यूनिटी का हक़ सबसे पहले है. अब आप अगर ममता जी के शेर की पहली लाइन पढेंगे तो आपको पता चल जाएगा कि चाँद माइनोरिटी में है और तारे मेजोरिटी में. लेकिन रोशनी की बात होती है तो चाँद का ही बोलबाला रहता है. तारे कितने भी हों, वे रोशनी नहीं फैला सकते. जहाँ तक दूसरी लाइन की बात है तो मैं इतना ही कहना चाहूँगा मोहब्बत होनी ही चाहिए. मोहब्बत रहने से कामयाबी मिलती रहेगी. क्योंकि कामयाबी के रास्ते में अगर जुनून आ गया तो हम देखेंगे कि कोई जुनूनी नेता ने सरकार की कामयाबी से जलते हुए सपोर्ट वापस ले लिया. सरकार गिर जायेगी..... चंगा शेर पढ़ा है जी ममता जी ने.
भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता
यात्री किराए और माल भाड़े में कोई वृद्धि ही नहीं हुई. हम बहुत निराश हो गए थे. हमें चिंता सताने लगी थी कि हम किस मुद्दे पर विरोध करेंगे? वो तो भला हो ममता जी का जिन्होंने यह शेर पढ़कर हमें उबार लिया. शेर की दोनों लाइन पर हमें आपत्ति है. पहली लाइन पढ़कर हमें गुस्सा आया कि चाँद माइनोरिटी में है लेकिन पूरी रोशनी पर कब्ज़ा किये बैठा है. वहीँ तारे मेजोरिटी में हैं लेकिन उनकी कोई सुनवाई नहीं है. उन्हें रोशनी के लिए जिम्मेदार माना ही नहीं जा रहा है. यह किस तरह की सोच है? और दूसरी लाइन पढिये. मोहब्बत कामयाबी से होती है....यह कहकर हमारे ऊपर फब्ती कसी जा रही है कि हम २००४ के चुनावों में कामयाब नहीं हुए इसलिए हमारे सहयोगी दलों ने हमसे मोहब्बत तोड़ ली थी...इस शेर की वजह से हम इस रेल बजट का विरोध करते हैं.
कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता
ममता जी ने जो शेर पढ़ा है उसका भावार्थ यह है कि हमारी पार्टी और उनकी पार्टी मिलकर काम कर रहे हैं. मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि उनके शेर की पहली लाइन में लिखा है कि रोशनी चाँद से होती है सितारों से नहीं.......कहने का मतलब यह कि इस गठबंधन में कांग्रेस ही चाँद है. तृणमूल कांग्रेस, पवार जी की कांग्रेस, डी एम के वगैरह सब तारे हैं. मतलब यह कि सरकार जितनी रोशनी बिखेरेगी, वो सारी रोशनी कांग्रेस पार्टी की है. तारे तो ऐं वें ही हैं जी...उनका कोई खास रोल नहीं है. वैसे भी इस शेर को पढ़कर ममता जी ने बता दिया है कि उन्हें समझ में आने लगा है कि चाँद कौन है और सितारे कौन...जहाँ तक दूसरी लाइन की बात है तो उसका अर्थ यह है कि कांग्रेस पार्टी कामयाब है इसलिए समर्थन देने वाली पार्टियों को उससे मोहब्बत है. बी जे पी वाले जुनूनी लोग हैं इसलिए ममता जी को उनसे मोहब्बत नहीं हुई
लालू प्रसाद जी
ममता बनर्जी को रेल के बारे में का मालूम है? उनको का मालूम कि शेर का होता है. ई भी कोई शेर है? पिछला साल जब हम रेल बजट पढ़े थे तो बोले थे कि होल इंडिया कह रहा है चक दे रेलवे....आज कोई नहीं कह रहा है कि चक दे रेलवे...ई शेर पढने से मंत्रालय चलता है?...पढ़ने से नहीं चलता बल्कि पढ़ाने से चलता है...देखा नहीं था का हमको, आई आई एम में पढ़ाने गए थे हम...तब जाकर पांच साल रेल मंत्रालय चला था...का कहा? ई शेर पर हमारा का विचार है...धुत्त...इससे बढ़िया शेर तो हमारा ऊ कवि लिखता है...अरे उहे जो हमारे ऊपर चालीसा लिखा था...का नाम था उसका...हाँ, रतिराम...का बताएँगे इहाँ...बाईटे में शेर का मतलब बता दें?...शेर का मतलब जानना है त स्टूडियो में बुलाओ..ओइसे भी आजकल तुमलोग बोलाता नहीं है...
एक रेलयात्री के विचार
ममता जी ने बढ़िया शेर पढ़ा है. इस शेर को पढ़कर उन्होंने अपनी और अपने सरकार की स्थिति स्पष्ट कर दी है. उनके कहने का मतलब है कि रोशनी चाँद से होती है, इसका मतलब यह है कि रेलवे चाँद की तरह चमके, ऐसा होने का कोई चांस नहीं है. उनके कहने का तात्पर्य है कि रोशनी चाँद से होती है लेकिन चाँद बहुत दूर है. कोई-कोई प्रेमी जैसे प्रेमिका से वादा करता है कि तुम्हारे लिए सितारे तोड़ लाऊँगा वैसे ही ममता जी स्पष्ट कर रही हैं कि सितारे तो ला दूं लेकिन उससे कोई रोशनी नहीं होगी. कोई फायदा नहीं होगा तारे लाने से और चाँद हम ला नहीं सकते. बहुत वजन होता है चाँद का. ऐसे में आपलोग रेलवे के साथ मोहब्बत से रहे. मोहब्बत है तो हमें भी कामयाब समझा जाएगा. गाड़ी-वाड़ी लेट चलने से आपलोग जुनूनी मत हो जाइयेगा......

