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Wednesday, April 13, 2011

विक्रम की चेन्नई विजिट




कल से बप्पी दा का 'गान' याद आ रहा है; "आना-जाना लगा रहेगा, 'दूख' जाएगा, 'सूख' आएगा...."

दुःख को 'दूख' लिखकर मैं बताना चाहता था कि बाप्पी दा का गाया 'गान' पढ़ने के लिए नहीं बल्कि सुनने के लिए है. आज तक उन्होंने दुःख का उच्चारण दुःख कहकर नहीं किया, हमेशा दूख कहकर ही किया है. इसके पीछे शायद यह कारण भी हो सकता है कि वे दुःख से कभी दुखी न हुए हों. देखा जाय तो उनके दुखी होने का कारण भी नहीं है. बल्कि खुश होने का सबसे बड़ा कारण है सोने के भाव में विकट उछाल. दुनियाँ भर के कमोडिटी एक्सपर्ट्स का मानना है कि पिछले डेढ़-दो साल में सोने के भाव में जो उछाल आया है उसका सबसे बड़ा फायदा उन्हें ही पहुँचा है.

बात चली है तो लगे हाथ बता दूँ कि मैं उनका बहुत बड़ा फैन हूँ. बाथरूम में नहा रहा होता हूँ तो मुँह से अनायास ही फूट पड़ता है; "कहाँ हाम कहाँ तूम हुए तूम कहाँ गूम, आ भी जा आ भी जा एक्के बार..." जब दोस्तों की मीटिंग होती है तो कई मित्र मुझसे बप्पी दा का 'गान' गाने के लिए कहते हैं. मैं गा देता हूँ. वे हँस लेते हैं. बात यह कहते हुए ख़त्म कर दी जाती है कि - तुम ब्लॉगर नहीं होते तो बप्पी दा के सबसे बड़े डुप्लीकेट होते. चेहरे-मोहरे की बात नहीं हो रही. बाप्पी दा के शब्दों में कहें तो "यहा 'सूर' का बात हो रहा है."

मैं क्या करूं? वे यहाँ को 'यहा' और सुर को 'सूर' कहते नहीं थकते.

लीजिये, कहाँ से कहाँ पहुँच गए? बात गाने से शुरू हुई थी और दो-चार गलियों से होते हुए देखिये कैसे शेम-लेस सेल्फ प्रमोशन तक पहुँच गई. केवल ब्लॉगर कहला कर संतोष नहीं है इसलिए समय-समय पर और कुछ बन जाने की इच्छा उछल कर बाहर आ ही जाती है. आदमी कहाँ-कहाँ कंट्रोल करेगा?

हाँ, तो आना-जाना लगा रहेगा नामक गाने की बात हो रही है. दरअसल विक्रम अपने तीन दिन के चेन्नई विजिट के बाद सोमवार को कोलकाता पहुँचा. उसकी चेन्नई और गाँव विजिट पर काफी देर तक बातें हुईं. तमाम जानकारियाँ मिलीं जो इलाके को नज़दीक से देखने वाला ही दे सकता है. इन तमाम बातों की एक पोस्ट लिख दे रहा हूँ. आप भी पढ़िए. चेन्नई विजिट की कहानी विक्रम की जुबानी....

...अरे सर, स्टालिन है लेकिन कमाल का बन्दा. फ्लाईओवर ही फ्लाईओवर बना डाले हैं भाई ने. अगर कहीं एक बस के आने-जाने की भी जगह है तो उसने यह गारंटी दे दी है कि वह बस फ्लाईओवर के ऊपर से ही जायेगी. वैसे भी फ्लाईओवर पर आने-जाने वाली गाड़ियाँ बड़ी क्यूट लगती है. नीचे से देखने पर कई तो एरोप्लेन की फीलिंग देती हैं. कई इस रफ़्तार से भागती हैं जिसे देखकर लगता है जैसे अभी टेक-ऑफ कर जायेंगी. ऊपर से फ्लाईओवर विकास का द्योतक भी होता है........... अगर आप चेन्नई से बाहर भी जा रहे हैं और बीच में कोई टाऊन पड़ गया तो आपको ट्रैफिक जाम से घबराने की ज़रुरत नहीं है. वहाँ आपके लिए फ्लाईओवर रेडी है. अगर आप उस टाऊन में कोई सौदा नहीं करना चाहते तो आप वाया फ्लाईओवर निकल लीजिये. उस टाऊन के लोगों से आपका न उधो का लेना और न माधो का देना...

आप देखिएगा एक दिन ऐसा आएगा जब भारतवर्ष की तमाम राज्य सरकारें स्टालिन को अपने शहरों के लिए बनने वाले फ्लाईओवर की कंसल्टेंसी के लिए बुलाएंगी. वे दिन भी दूर नहीं जब इंजीनियरिंग कालेजों में सिविल इंजीनियरिंग के कोर्स में स्टालिन के ऊपर एक चैप्टर होगा जिसमें फ्लाईओवर क्षेत्र में दिए गए उनके योगदान के ऊपर सबकुछ लिखा हुआ मिलेगा......एक दिन ऐसा भी आएगा जब...

.... जैसे अपने यहाँ क्या है? एयरकंडीशनर चलाने के लिए आपने स्विच और एम सी बी लगा रखा है. आपने इधर स्विच दबाया और उधर एसी ने अपना काम करना शुरू किया. थोड़ी देर में रूम ठंडा हो जाता है. लेकिन चेन्नई में ऐसा नहीं है. वहाँ मैं जितने घर में भी गया वहाँ यह देखा कि हर एसी का कनेक्शन स्टेबिलाइजर से ज़रूर है. एसी चलाने के लिए पहले स्टेबिलाइजर चलाना पड़ता है. स्टेबिलाइजर का स्विच दबाते ही उसमें करीब दस मिनट तक तरह-तरह की आवाजें आती हैं. कई आवाजें सुनकर लगता है जैसे यह स्टेबिलाइजर किसी मिमिक्री आर्टिस्ट की नक़ल कर रहा है. कई बार कुछ देर तक आने वाली आवाज़ अचानक किसी और आवाज़ में कन्वर्ट हो जाती है जिसे सुनकर लगता है जैसे यह स्टेबिलाइजर अपनी जगह बैठे-बैठे ही टेक-ऑफ कर जाएगा...... चार-चार घंटे चलने के बाद भी कमरा ठंडा नहीं होता है. देखकर लगता है जैसे एसी अपने रोल को लेकर कन्फ्यूज्ड है. जैसे कई बैट्समैन कई-कई बार यह सोचते हुए कन्फ्यूज्ड हो जाते हैं कि उन्हें स्ट्रोक खेलना चाहिए या डिफेंड करना चाहिए.....चेन्नई के एसी को वहाँ की बिजली की ऐसी आदत पड़ चुकी है जिसे देखकर लगता है कि आप वहाँ के एसी को अगर कुछ रिश्वत वगैरह भी दे देंगे तो भी वह चेन्नई की बिजली को छोड़कर कहीं नहीं जाएगा.....

बाद में सड़क पर लगे ट्रांसफॉर्मर देखा तो बात समझ में आई. आप देख लेंगे तो अपना माथा पीट लेंगे. देखकर लगता है जैसे एक्सपेरिमेंट के बाद दुनियाँ में ट्रांसफॉर्मर के कॉमर्शियल प्रोडक्शन की जो पहली खेप थी वह चेन्नई शहर में ही लगी थी और अभी तक चल रही है. कई ट्रांसफॉर्मर के ऊपर कुछ ऐसे आड़े-तिरछे लोहे-लक्कड़ और इक्विपमेंट्स नज़र आये जिन्हें देखकर लगा कि ये माल-असबाब इसलिए लगाये गए ताकि अंतरिक्ष में सैर कर रहे तमाम भारतीय सैटलाइट्स को कंट्रोल किया जा सके...

......लोग़ अस्पताल में खूब भर्ती होते हैं. एक पार्टी में रिश्तेदारों से मिला. उनकी बातें सुनकर इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि यहाँ उपस्थित लोगों में से फिफ्टी परसेंट तो पिछले एक-दो महीने में किसी न किसी बीमारी के बहाने अस्पताल में रह आये हैं. मेरे एक रिश्तेदार वृहस्पतिवार तक अस्पताल में भर्ती थे और शनिवार को पार्टी अटेंड कर रहे थे. देखकर लगा कि ये टीवी और पत्र-पत्रिकाओं में भारत को जो मेडिकल टूरिज्म का महान डेस्टिनेशन बताया जा रहा है उसका पहला प्रयोग लोकल लोगों पर किया जाता है. कई तो बुखार से पीड़ित होकर अस्पताल में भर्ती हो लेते हैं.....

हाल यह है कि तमाम डाक्टर्स अपने रोगियों को अपने दोस्त, भाई, चचा, ताऊ जैसे ट्रीट करते हैं. मतलब यह कि उन्हें लूटने का कोई मौका हाथ से जाने नहीं देते.

...... बात इलेक्शन की शुरू हुई तो तमाम बातें सुनने को मिलीं. जीजाजी ने बताया कि वोट का रेट इस बार पाँच हज़ार रुपया पर फॅमिली का चल रहा है. पार्टी वाले एडवांस देने पर राजी हैं. नोट लो और वोट दो. वोट का रेट इस बार पर फॅमिली शायद इसलिए बांधा गया क्योंकि करूणानिधि इज अ फॅमिलीमैन...मिक्सर, टीवी, लैपटॉप की बातें पुरानी हो गईं हैं. चावल तो और पुराना हो गया है.... इस बार ३५ किलो पर फॅमिली पर मंथ पर सौदा पक्का हुआ है....चावल की बात पर मुझे ए राजा की याद आ गई. एक इंटरव्यू में टू-ज़ी और थ्री-ज़ी के अंतर को समझाते हुए उन्होंने बताया था कि "त्री ज़ी यिज्ज लइक बासमती रईस येंड टू ज़ी यिज लइक यार्डिनरी रईस." .......

.......जब सभा में पीकर भाषण देने की बात उठी तो विजयकान्त ने सीधा कह दिया कि इस गर्मी में पीयेंगे नहीं तो चुनाव प्रचार कैसे करेंगे?..एक सभा में भाषण दे रहे थे. किसी विरोधी के बारे में मुँह से कुछ उल्टा-सीधा निकल आया. पास खड़े चमचे ने कान में कुछ कहकर उनका ध्यान खीचने की कोशिश की. उन्होंने अपने चमचे को वहीँ धुनक कर धर दिया. जब विरोधी दल वालों ने अपने टीवी चैनलों पर इस मामले को उछाला तो सीधा कह दिया; "मैंने आजतक जिसे भी पीटा वह एम एल ए बन गया. मैंने जिसे पीटा जब उसे कोई प्रॉब्लम नहीं है तो तुम्हारे बाप का क्या जाता है? वह इसलिए पिटना चाहता था ताकि उसका एम एल ए बनना पक्का हो जाए."

......पार्टी में कुछ नेताओं की वल्दियत को लेकर भी बातचीत हुई. एक नेता के बारे में यह कहा गया कि वे उनके (मतलब एक बड़े नेता जिन्हें उनका बाप माना जाता है) पुत्र नहीं हैं. दरअसल ये उनके (मतलब एक नेता जो पहले थे लेकिन अब नहीं हैं) के पुत्र हैं. ध्यान से चेहरा देखो तो पता चलेगा...बाद में यह कहकर बात ख़त्म की गई कि चेहरा कम्पेयर करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी है क्योंकि उनका (मतलब एक नेता जो पहले थे लेकिन अब नहीं हैं) आधा चेहरा काले चश्में में छिपा रहता था...

.....हमारे गाँव में सभी ने अपनी खेती-बाड़ी वाली करीब सौ एकड़ ज़मीन बड़े आराम से ज़मीन के किसी व्यापारी को बेंच दी. उस व्यापारी ने उनके इन जमीनों के कई प्लाट बनवा कर "एक बंगला बने न्यारा" गाने वाले कई खरीददारों को चेंप दिया. बाद में जब ज़मीन के कन्वर्जन के लिए अप्लिकेशन दिया गया तो स्टेट गवर्नमेंट ने यह कहकर सब गुड गोबर कर दिया कि एग्रीकल्चरल लैंड को किसी भी हालत में ......

Thursday, April 7, 2011

रेडियो गाता रहा...




जानकार लोग बताते हैं कि साहित्य समाज का दर्पण होता है. साहित्य रुपी इस दर्पण में समाज अपनी तस्वीर देख सकता था लेकिन सच्चाई यह है कि कभी देखा नहीं. तस्वीर में ख़ुद को देखकर तकलीफ होती होगी इसीलिए साहित्य को समाज ने देखना ही बंद कर दिया. साहित्यकार कहते रह गए कि; "हम दर्पण लाये हैं, देख लो" लेकिन समाज कहाँ सुनने वाला? उसे मालूम था कि दिनों-दिन उसका चेहरा ख़तम होता जा रहा है. ऐसे में देखना उचित नहीं रहेगा. डर जाने का चांस रहता था.

उन दिनों के दर्पण भी ऐसे थे कि झूठ बोलना नहीं जानते थे. समाज को भी मालूम था कि ये विकट ईमानदार दर्पण हैं, झूठ नहीं बोलते. असली कांच के बने थे. पीछे में सॉलिड सिल्वर कोटिंग. ऐसे में इसे देखेंगे तो तकलीफ नामक बुखार के शिकार हो जायेंगे. साहित्यकार भी ढिंढोरा पीटते रह गए. वे ख़ुद ईमानदार भी थे. समाज को लगा कि ईमानदार साहित्यकार का दर्पण मिलावटी नहीं होगा. ऐसे में इस दर्पण को घूस देकर हम इससे झूठ नहीं बुलवा सकते. ऐसे में ये दर्पण तो हमें सुंदर दिखाने से रहा. हटाओ, क्या मिलेगा देखने से? कौन अपना ख़तम होता चेहरा देखना चाहेगा? दर्पण की बिक्री बंद. साहित्य का साढ़े बारह बज गया.

वैसे साहित्य समाज का दर्पण है, यह बात पहले के जानकार बताते थे. बाद के जानकारों ने बताया कि अब भारत आगे निकल चुका है. अब सिनेमा समाज का दर्पण है. इतिहास गवाह है कि हर थ्योरी की काट भी पेश की जाती है. काट पेश न की जाए तो इतिहास का निर्माण नहीं हो सकेगा. इसी बात को ध्यान में रखकर बड़े ज्ञानियों और जानकारों ने बताया कि सिनेमा समाज का नहीं बल्कि समाज सिनेमा का दर्पण होता है. विकट कन्फ्यूजन.

जानकारों का काम ही है कन्फ्यूजन बनाए रखना.

बाद में सिनेमा के गानों को समाज का दर्पण बनाने की कवायद शुरू हुई. मनोरंजन का साधन? आकाशवाणी. बिनाका गीतमाला. रात को खाना मिले या न मिले, रेडियो लेकर तकिया के पास ज़रूर रख सकते हो. इसलिए रख लो, मनोरंजन होता रहेगा.

रेडियो चालू हुआ और इधर खटिया पर आकर जानकार जी बैठ गए. देश में भ्रष्टाचार की बात शुरू ही होती कि तीन हफ्ते से तीसरे पायदान पर बैठा गाना बज उठता; "मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे-मोती. मेरे देश की धरती."

सुनने वाला भौचक्का! सोचता; "देश की धरती इतना सोना और हीरा-मोती उगल रही है तो वो जा कहाँ रहा है?"

लेकिन किससे करे ये सवाल? अब ऐसे में कोई बुद्धिजीवी और जानकार टाइप आदमी आ जावे तो उससे पूछ लेता; " अच्छा ई बताओ, ये देश की धरती इतना सोना, हीरा वगैरह उगल रही है तो ये कहाँ जा रहा है?"

जानकार के पास कोई जवाब नहीं. कुछ देर सोचने की एक्टिंग करता होगा और बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचे कह देता होगा; "अरे सोना, हीरा वगैरह उगल रही है, यही क्या कम है? तुमको इस बात से क्या लेना-देना कि किसके पास जा रहा है. तुम तो यही सोचकर खुश रहो कि उगल रही है. आज जाने दो जिसके पास जा रहा है. कल तुम्हारा नंबर भी आएगा. रहीम ने ख़ुद कहा है कि; रहिमन चुप हो बैठिये देख दिनन के फेर...."

सवाल को दफना दिया? नहीं. डाऊट करने वाले इतनी जल्दी हार नहीं मानते. अगला सवाल दाग देता होगा; "अच्छा, ये गेंहूं की बड़ी किल्लत है. अमेरिका से जो गेहूं आया है, वो खाने लायक नहीं है. क्या होगा देश का?"

जानकार कुछ कहने की स्थिति में आने की कोशिश शुरू ही करता होगा कि रेडियो में दूसरे पायदान का गाना बज उठता होगा; 'मेरे देश में पवन चले पुरवाई...हो मेरे देश में.'

जानकार को सहारा मिल जाता होगा; "ले भैये गेहूं की चिंता छोड़ और इस बात से खुश हो जा कि तेरे देश में पुरवाई पवन चलती है. बाकी के देशों में पछुआ हवा धूम मचाती है. वे साले निकम्मे हैं. भ्रष्टाचारी हैं. पश्चिमी सभ्यता वाले. देख कि हम कितने भाग्यवान हैं जो हमारे देश में पुरवाई पवन चलती है. ये गेंहूं की चिंता छोड़ और इस पुरवाई पवन से काम चला. इसी को खा जा."

डाऊट करने वाले के पास एक और सवाल है. पूछना चाहता होगा कि लोगों के रहने के लिए मकान नहीं है. सरकार कुछ कर दे तो मकान मिल जाए. सोच रहा है कि बुद्धिजीवी ज़ी से ये बात पूछे कि नहीं? अभी सोच ही रहा है कि रेडियो का रंगारंग कार्यक्रम चालू हो गया. गाना सुनाई दिया; 'जहाँ डाल-डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा, वो भारत देश है मेरा...' वगैरह-वगैरह.

डाऊट करने वाला हतप्रभ. मन में सवाल पूछ रहा है कि गुरु भारत देश में चिड़िया डाल-डाल पर बसेरा करती है. और बाकी के देशों में? वहां क्या चिड़िया के रहने के लिए दस मंजिला इमारत होती है?

ये वे दिन थे जब भ्रष्टाचार अपनी जड़ें जमा रहा था. लेकिन देशवासी गाने सुनकर खुश थे. देश में पवन पुरवाई चलती थी और देश की धरती सोना वगैरह उगल रही थी. किसी को नहीं मालूम कि उगला हुआ इतना सोना वगैरह कौन दिशा में गमनरत है?

कोई अगर किसी दिशा की तरफ़ तर्जनी दिखा देता तो चार बोल उठते; "छि छि. ऐसा सोचा भी कैसे तुमने? जिस दिशा को तुमने इंगित किया है, उस दिशा में सारे ईमानदार लोगों के घर हैं. उनकी गिनती तो बड़े त्यागियों में होती है. तुम्हें शर्म नहीं आती ऐसे त्यागियों को इस तरह से बदनाम करते? देशद्रोही कहीं के."

यह नहीं देखा कि त्यागियों ने भवन देकर देश ही हथिया लिया.

उसी समय रेडियो पर बज उठता होगा; 'है प्रीत जहाँ की रीत सदा, मैं गीत वहां के गाता हूँ.........'

ऐसे ही रेडियो गाता रहा और हम ..........आज भी गा रहा है. फर्क सिर्फ इतना कि आज आई पी एल के स्कोर बताता है.

Saturday, April 2, 2011

जिससे पूरा भारत बोरियत से बचे




डियर माही,

इससे पहले कि 'डियर माही' जैसा संबोधन तुम्हारे मन में किसी तरह की गलतफहमी को जन्म दे, मैं साफ़-साफ़ बता देना चाहता हूँ कि मैं कोई 'टीनेजर गर्ल' नहीं बल्कि एक पुरुष हूँ. मेरे इस स्पष्टीकरण के पीछे कारण यह है कि तमाम टीवी चैनलों के संवाददाताओं ने मेरे सामान्य ज्ञान में बढ़ोतरी करते हुए मुझे न जाने कितनी बार बताया है कि ज्यादातर लड़कियां ही तुम्हें माही कहकर पुकारती हैं. वैसे भी अगर मैं डियर महेंद्र सिंह धोनी जैसे किसी संबोधन का इस्तेमाल करता तो उसे देखकर मुझे ही नहीं बल्कि औरों को भी लगता जैसे मैं तुम्हें कानूनी नोटिस भेज रहा हूँ. पढ़ने में भी यह संबोधन 'कूल' नहीं लगता.

नतीजा यह हुआ कि मैं तुम्हें डियर माही लिखकर संबोधित कर रहा हूँ.

तो डियर माही, मेरे इस पत्र लिखने के पीछे एक कारण है. नहीं-नहीं, जो तुम सोच रहे हो, वह कारण नहीं है. वर्ल्डकप फाइनल से पाँच घंटे पहले तुम्हारे सामने कोई डिमांड रखकर मैं तुम्हें नर्वस नहीं करना चाहता. दरअसल कारण यह है कि, मैं यह चिट्ठी लिखकर अपने ब्लॉग पर लगाना चाहता हूँ जिससे मुझे एक अदद ब्लॉग पोस्ट की प्राप्ति हो जाए. आखिर एक ब्लॉगर को और क्या चाहिए? एक पोस्ट, और क्या?

वैसे मैं चाहता तो तुम्हारी टीम और क्रिकेट वर्ल्ड कप पर सवा सौ ग्राम की अशुद्ध तुकबंदी वाली एक चवन्नी कविता लिख डालता और किसी हिंदी न्यूज़ चैनल को फोन कर देता तो वे मेरी कविता कवर करने तुरंत आ जाते और वह तुम्हारे पास पहुँच जायेगी, मैं यह सोचकर अपने मन में दर्जन भर लड्डू फोड़ लेता. शायद तुम्हें पता न हो लेकिन एक अनुमान के अनुसार इस प्रोसेस से हमारे हिंदी न्यूज चैनलों ने पिछले दस वर्षों में करीब चार हज़ार सात सौ अट्ठावन हिंदी कवि पैदा किये हैं.

लेकिन मैंने सोचा कि ऐसा कुछ किया जाय जिससे मुझे एक ब्लॉग पोस्ट भी मिल जाए और तुम्हारा मोटिवेशन भी हो जाए. माही, मुझे पता नहीं कि भारत जब पिछली बार २००३ वर्ल्डकप के फाइनल में पहुँचा था तो हमारे कोच जॉन राइट ने कप्तान सौरव गांगुली को कैसे मॉटिवेट किया था? मुझे यह भी नहीं पता कि जब इसबार हम फिर से फाइनल में पहुँच गए हैं तो गैरी कर्स्टन क्या कर रहे हैं? मैं तुम्हें बताना चाहता हूँ कि तुम्हरी टीम के लिए वर्ल्डकप जीतना क्यों ज़रूरी है? वे कौन से कारण हैं जिनके लिए १२१ करोड़ भारतीय तुम्हें आशीर्वाद और प्यार देंगे.

तो हे अधिनायक, ध्यान लगाकर सुनो;

जैसा कि तुम्हें मालूम है हम २५ जून, १९८३ में क्रिकेट वर्ल्डकप जीते थे. वैसे कुछ चिरकुटों ने पिछले २-३ दिनों से यह भ्रम फैला रखा है कि हमें उस वर्ल्डकप में विजयश्री की प्राप्ति २ अप्रैल १९८३ के दिन हुई थी लेकिन यह सही नहीं है. खुद गूगलदेव ने यह बात कन्फर्म की है. और हे अधिनायक, आज की तारीख में गूगल से बढ़कर कौन है?

तो मैं कह रहा था कि २५ जून, १९८३ के दिन हम वर्ल्डकप जीते थे और उसके बाद केवल स्पोर्ट्स चैनलों पर लगातार जीतते जा रहे हैं. हाल यह है कि एक अनुमान के अनुसार हम स्पोर्ट्स चैनलों पर १९८३ का वर्ल्डकप १९८३ बार जीत चुके हैं. वैसे कुछ सूत्रों का मानना है कि यह आंकड़ा करीब आठ हज़ार दो सौ तक पहुँच सकता है. हम अगर इन दो सख्याओं का औसत भी निकालें तो हे अधिनायक, हम स्पोर्ट्स चैनलों पर करीब पाँच हज़ार बार वर्ल्डकप जीत चुके हैं. और तो और स्पोर्ट्स चैनलों के फुटेज के सहारे हमारे हिंदी न्यूज चैनल भी करीब ढाई हज़ार बार टीवी पर हमें वर्ल्डकप दिलवा चुके हैं.

हे अधिनायक, मुझे तो लगता है कि पिछले कई वर्षों में इन स्पोर्ट्स चैनलों के ट्रांसमिशन सेंटर में कुछ इस तरह का वार्तालाप होता होगा;

क्लर्क अपनी कुर्सी छोड़कर नीचे रतिराम चौरसिया की पान दूकान पर पान खाने जा रहा है. बीच में प्रोग्राम डायरेक्टर मिल जाता है. डायरेक्टर पूछता हा; "कहाँ जा रहे हो?"

क्लर्क'; "पान खाने नीचे जा रहा हूँ. आधे घंटे में वापस आता हूँ."

डायरेक्टर; "तो एक काम करो न. जाने से पहले वो १९८३ वर्ल्डकप फाइनल की सीडी लगाते जाओ. तुम जबतक पान खाकर वापस आओगे इंडिया फाइनल जीत जाएगा."

हे अधिनायक, हाल यह है कि बाथरूम में जाने से पहले एक भारतीय देख रहा है कि स्पोर्ट्स चैनल इंग्लिश प्रीमियर लीग का हाइलाइट्स दिखा रहा है और जब वह बाथरूम से बाहर आता है तो देखता क्या है कि मोहिंदर अमरनाथ माइकल होल्डिंग्स को एल बी डब्लू करके स्टंप लिए भागे जा रहे हैं. देख कर लगता है जैसे अगर वे आज इतनी जोर से न भागेंगे तो उन्हें स्टंप चोरी के इल्जाम में अरेस्ट कर लिया जाएगा. हे अधिनायक, तुम्हें यह जानकार आश्चर्य होगा कि १९८३ वर्ल्डकप फाइनल टीवी पर देखने की वजह से बेटा माँ के बार-बार कहने के बावजूद सब्जी लेने बाज़ार नहीं जाता और घर वालों को उस दिन केवल दाल-रोटी से गुज़ारा करना पड़ता है. वैसे सत्य यह है कि बेटा सोचता है कि क्या पता स्पोर्ट्स चैनल कल से भारत को जितवाना ही बंद कर दे. ऐसे में जब तक जितवा रहा है तब तक तो जीतते रहो.

हे अधिनायक माही, १२१ करोड़ लोग़ अट्ठाइस वर्षों से कपिल देव को दौड़ कर रिचर्ड्स का कैच लेते हुए देख रहे हैं. मानता हूँ कि गावस्कर के अनुसार; "कपिल वाज अ ग्रेट एथिलीट" लेकिन अब उनकी उमर भी तो देखो. पचास के पार पहुँच गए हैं. ऐसे में जब वे आजकल हाइलाइट्स में दौड़ते हैं तो धड़का लगा रहता है कि इस बार वे कैच नहीं पकड़ सके तो? अगर इस बार कैच छूट गया तो फिर रिचर्ड्स बड़ी दुर्गति करेगा हमारी. अभी तक तो कपिल कैच पकड़ते आये हैं लेकिन हे अधिनायक, यह क्रिकेट ही तो है. क्या पता अगली हाइलाइट्स में उनसे कैच छूट जाए और उसके बाद रिचर्ड्स ऐसा मारे कि आउट ही न हो? बीस ओवर भे नहीं लगेंगे वेस्ट- ईंडीज को मैच जीतने में.

और फिर हे अधिनायक, तुम्हें तो पता ही है कि हमारी संस्कृति और दर्शन में ऐसा बताया गया है कि हर चीज में जान होती है. अगर हम इस लिहाज से देखें तो क्या तुम्हें नहीं लगता कि हमें गोर्डन ग्रीनिज के उस स्टंप की रक्षा करनी चाहिए जिसे पिछले अट्ठाइस वर्षों से बलविंदर सिंह संधू अपने इन-स्विंगर से उखाड़ते आ रहे हैं. एक बार ठहरो और सोचो कि हर बार बॉल से धक्का खाने के बाद उस स्टंप की क्या दशा होती होगी? और फिर यह भी तो सोचो कि क्या होगा अगर अगली हाइलाइट्स में संधू का बॉल स्विंग ही न किया? क्या होगा तब? ग्रीनिज हमारी बड़ी दुर्गति करेगा. १९८३ में ही उसके पास बड़ा अनुभव था अब तो पूरे अट्ठाइस वर्षों का अनुभव उसमें जुड़ गया है. ऐसे में अगर वह अगले हाइलाइट्स में स्क्वायर ड्राइव लगाकर चौका मार दे तो? पता नहीं तुम्हें मालूम है कि नहीं लेकिन मुझे मालूम है कि उसने एक इंटरव्यू में कहा था कि; "अगर बॉल मेरे बैट पर ठीक से नहीं आती तो चौका हो जाता है. अगर आ जाती है तो फिर छक्का तो है ही."

हे अधिनायक, कभी तुमने माइकल होल्डिंग्स के पैड की दुर्गति के बारे में सोचा है? मोहिंदर अमरनाथ की बॉल पिछले अट्ठाइस वर्षों से उसके पैड पर एक ही जगह लग रही है. उसके पैड की दुर्दशा के बारे में सोचते हुए लगता है जैसे बेचारा पैड न जाने कितनी बार मरा होगा. उसके बाद मोहिंदर जिस तरह से भागते हैं और भीड़ उनका पीछा करती है वह देखकर लगता है जैसे अगर भीड़ इनके ऊपर टूट पड़ी और ये घायल हो गए तो फिर अगले हाइलाइट्स में कौन जेफरी डुजों को बोल्ड करेगा और कौन मार्शल को आउट करेगा? जिस तरह से डुजों टिक गया था, वह तो अगली हाइलाइट्स में मैच जीत ले जाएगा और हमारा जीता हुआ एक मात्र वर्ल्डकप हमसे छिन जाएगा.

और फिर अब समय आ गया है कि हम भारतीय मोहिंदर की उमर का लिहाज करे और उन्हें बार-बार लगातार दौड़ने की जिम्मेदारी न दें. अब तो उनके लिए यही सही रहेगा कि वे किसी टीवी स्टूडियो में बैठकर अपनी बेसुरी आवाज़ में मैच के दिन "मेरा रंग दे बसंती चोला" की गुहार लगायें और पूरे भारत का मनोरंजन करें.

हे अधिनायक, अगर ध्यान से देखो तो लॉर्ड्स की बालकोनी पर वर्ल्डकप उठाये हुए कपिल देव फबते तो बहुत हैं लेकिन हर बार मुझे ये खटका लगा रहता है कि इतनी भीड़ में कहीं कोई वेस्टइंडियन धक्का-मुक्की करके उनके हाथ से कप लेकर भाग न ले. आजकल चूंकि राजा लोग़ किसी एक्सक्लूसिव जगह पर कप उठाकर जीतने वाले कैप्टन के हाथ में नहीं रखते इसलिए ये डर नहीं रहता कि कोई धक्का-मुक्की में कप लेकर निकल लेगा. आजकल तो बाकायदा मैदान के बीच में कप दिया जाता है जहाँ भीड़-भाड़ कम रहती है.

इसलिए हे अधिनायक, और किसी बात के लिए नहीं तो कम से १२१ करोड़ भारतीयों को पिछले इतने वर्षों की बोरियत से तो बचाओ. किसी को केवल ख़ुशी देना ही महान काम नहीं होता. मैं तो समझता हूँ कि उसे बोरियत से बचाना महानतम काम होता है और आज पूरा भारत तुमसे यह चाहता है कि तुम और तुम्हारी टीम उसे ख़ुशी तो दे ही साथ ही आनेवाले वर्षों में उसे बोरियत से भी बचाए. मेरा तो ऐसा मानना है कि हमारे पूर्व राष्ट्रपति ए पी ज़ी अब्दुल कलाम के ट्वेंटी-ट्वेंटी मिशन (क्रिकेट से मत जोड़ लेना इसे) को अचीव करने के लिए यह भी महत्वपूर्ण है कि पूरा भारत बोरियत से बचा रहे.

इसलिए हे अधिनायक, पूरे भारत की शुभकामनाएं तुम्हारे और तुम्हारी टीम के साथ हैं. कप जीतो हमें बोरियत से उबारो.

May God of cricket save us from this boriyat!!