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Monday, March 24, 2008

सर्वश्रेष्ठ टीवी न्यूज़ चैनल अभी तक पर ब्लागवीरों की होली

टीवी न्यूज़ चैनल की दुनियाँ भी अद्भुत है. दिवाली पर चैनल के सेट पर ही दिवाली मना लेते हैं. ऐसा ही होली पर भी है. पूरे देश में अपने संवाददाता खड़े कर देते हैं. हालत ये रहती है कि गली मुहल्ले में बच्चे रंग-गुलाल फेंकते हैं तो जाकर किसी न्यूज़ रिपोर्टर को लगता है. कहीं बरशाने की होली दिखाते हैं तो कहीं मथुरा की. नेता की होली दिखाते हैं. जनता की होली दिखाते हैं. विदेशी सैलानियों को होली खेलते हुए दिखाते हैं. लालू जी को कुर्ता-फाड़ होली खेलते हुए देखा जा सकता है. शाहरुख़ खान के बंगले मिन्नत की होली दिखाते हैं. इनका बस चलता तो जन्नत की होली भी दिखा डालते, लेकिन वहाँ से ट्रांशमिशन की सुविधा नहीं है. संवाददाता तो जाने के लिए राजी हो भी जाए लेकिन सरकार ने वहाँ से ट्रांशमिशन पर रोक लगा रखी है.

जैसा कि हम जानते हैं, ये लोग वही दिखाते हैं जो 'जनता देखना चाहती है'. लिहाजा इस बार जनता ने चिट्ठियां लिखकर बताया कि कोई नई होली दिखाईये. अब नए मुद्दे खोजने निकले तो पता चला कि देश में अभी दो ही बातें हैं जिनपर सभी बहस कर रहे हैं. पहला है अमेरिका के साथ न्यूक्लीयर डील और दूसरा है हिन्दी ब्लागिंग. अब अमेरिका में सरकार होली मनाती तो वहाँ की होली दिखा डालते. अब ऐसा नहीं है तो हिन्दी ब्लागर्स की होली दिखाने में जुट गए. जहाँ-जहाँ हमारे ब्लागवीर हैं वहाँ-वहाँ संवाददाताओं की फौज भेज दी गई. अब देखिये क्या-क्या दिखाते हैं....

टीवी न्यूज़ चैनल 'अभी तक' का स्टूडियो. महान एंकर दीपक परदेशिया बैठे हुए हैं. आज चैनल अपना विशेष कार्यक्रम दिखायेगा, ब्लागवीरों की होली. ब्लागवीरों पर बात करने के लिए चैनल ने ब्लागाचार्य श्री दिलकार नेगी को स्टूडियो में बुला रखा है. कार्यक्रम की शुरुआत होती है...

"नमस्काआआआर्, मैं हूँ दीपक परदेशिया और आप देख रहे हैं अभी तक. जी हाँ, भारत का सर्वश्रेष्ठ चैनल अभी तक. आज हम आपको दिखाएँगे, एक बिल्कुल नए तरह के लोगों की होली. जी हाँ, ब्लॉग जगत की होली. हमारे साथ स्टूडियो में हैं, ब्लागाचार्य श्री दिलकार नेगी. जी हाँ, वही दिल्कार नेगी जिन्हें हिन्दी ब्लागिंग का गुरु माना जाता है. नमस्कार, दिलकार जी."

"नमस्कार"; अभी दिलकार जी ने अभिवादन का जवाब दिया ही था कि दो व्यक्ति स्टूडियो में दाखिल हो गए. उन्हें देखकर परदेशिया जी चौंक गए. इनलोगों को देखते ही उनके मुंह से निकला; "माफ़ कीजिएगा, लेकिन कौन हैं आपलोग?"

"मैं दिलकार नेगी हूँ"; उनमें से एक ने कहा. परदेशिया जी अचंभित होते हुए बोले; "ये क्या बात है? दिलकार नेगी तो हमारे साथ पहले से बैठे हैं."

"जो पहले से बैठे हैं, वो काल्पनिक वाले हैं. असली दिलकार नेगी मैं हूँ"; उसने जवाब दिया.

अभी उसने जवाब दिया ही था कि दूसरा बोला; " नहीं-नहीं ये असली वाले हो सकते हैं लेकिन मैं बिल्कुल असली वाला हूँ."

दीपक परदेशिया जी बड़ी मुश्किल में पड़ गए. असली दिलकार नेगी कौन है? अभी सोच ही रहे थे कि स्टूडियो में बैठे दिलकार नेगी जी ने कहा; "देखिये, असली दिलकार नेगी मैं ही हूँ. आप ये भी देखिये न कि मैंने ही अपनी पिछली पोस्ट में ब्लॉग पर टिपण्णी पाने के तरीकों पर सुझाव दिए थे. मैं अपना ब्लॉग खोलकर दिखा सकता हूँ"

परीक्षा हुई. दिलकार नेगी ने अपना ब्लॉग खोलकर दिखा दिया. साबित हो गया कि असली दिलकार नेगी वही हैं. उसके बाद कार्यक्रम शुरू हुआ. परदेशिया जी ने बोलना शुरू किया; "जैसा कि मैं कह रहा था, आज हम आपको ब्लागवीरों की होली के बारे में बताएँगे. आईये चलते हैं कानपुर जहाँ हमारे संवाददाता सुधीर विनोद कानपुर के प्रसिद्ध ब्लागवीर श्री अनूप शुक्ला जी के घर के सामने खड़े हैं. सुधीर, क्या हाल है वहाँ? क्या आपकी मुलाक़ात शुक्ला जी से हुई?..... सुधीर आपको मेरी आवाज आ रही है?..... सुधीर, आप हमें सुन पा रहे हैं?.... सुधीर? ए सुधीर?".....

कोई आवाज नहीं आने पर उन्होंने कहा; "लगता है सुधीर से हमारा सम्पर्क नहीं हो पा रहा. अच्छा चलिए' इसी बीच हमारा सम्पर्क इलाहबाद में मौजूद हमारे संवाददाता नंदन कुमार से हो गया है. नंदन इस समय इलाहबाद के प्रसिद्ध ब्लॉगर ज्ञान दत्त पाण्डेय जी के घर के सामने हैं. आईये उनसे बात करते हैं; "नंदन, आप पाण्डेय जी के घर के सामने खड़े हैं, आपको कैसा लग रहा है?"

परदेशिया जी की बात सुनकर नंदन कुमार कुछ परेशान हो गए. उन्होंने परदेशिया जी से कहा; "दीपक जी, ऐसे सवाल हम जनता से पूछते हैं. 'आपको कैसा लग रहा है' नामक तकिया कलाम केवल जनता के लिए है. चलिए कोई बात नहीं है. वैसे आपकी जानकारी के लिए मैं बता दूँ कि मैं इस समय पाण्डेय जी के घर के सामने नहीं बल्कि महाशक्ति के नाम प्रसिद्ध ब्लॉगर प्रमेन्द्र प्रताप सिंह के घर के सामने हूँ. वही प्रमेन्द्र प्रताप जिन्होंने सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर चुनाव में आलोक पुराणिक जी को हराया था".

"लेकिन नंदन ऐसा क्या हुआ कि आप पाण्डेय जी के घर के सामने नहीं हैं?"; परदेशिया जी ने जानना चाहा.

"हमने पाण्डेय जी से सम्पर्क करने की कोशिश की लेकिन जब से वे मालगाड़ी वाले डिपार्टमेन्ट में गए हैं, न तो उन्हें मानसिक हलचल का समय मिलता है और न ही पोस्ट लिखने का. इसलिए मैंने प्रमेन्द्र प्रताप से सम्पर्क साध लिया"; नन्दन कुमार ने जानकारी देते हुए बताया.

"जी हाँ, अब हमारे साथ हैं इलाहाबाद के प्रसिद्ध ब्लॉगर, महाशक्ति के नाम से मशहूर प्रमेन्द्र जी. आईये, उनसे कुछ सवाल करते हैं. नन्दन, ज़रा महाशक्ति जी से पूछिए, उनका हिन्दी ब्लागिंग का मठाधीश बनने के बारे में क्या ख़याल है?"; परदेशिया जी ने सवाल पूछा.

उनका सवाल सुनकर नंदन कुमार ने महाशक्ति से कहा; "महाशक्ति जी, स्टूडियो से दीपक जी जानना चाहते हैं कि हिन्दी ब्लागिंग का मठाधीश बनने के बारे में आपका क्या ख़याल है?"

"देखिये मैं हमेशा से ही हिन्दी ब्लागिंग में मठाधीशी के ख़िलाफ़ रहा हूँ. मैंने हमेशा ख़ुद को मठाधीश समझने वाले देबाशीष जी का विरोध किया है. वैसे भी मेरे पास मठाधीशी के लिए समय नहीं है. मैं ख़ुद हिंदुत्व का प्रचार करने में व्यस्त हूँ. ऊपर से सामने चुनाव आ रहे हैं. अगर संघ ने मुझे बीजेपी को सहयोग देने के लिए कहा तो मेरे पास समय नहीं रहेगा मठाधीशी के लिए"; महाशक्ति जी ने अपने जवाब से अवगत कराया.

तब तक परदेशिया जी ने महाशक्ति से दूसरा सवाल पूछ लिया. बोले; "नन्दन, जरा महाशक्ति से पूछ कर बताईये उनका होली का क्या प्रोग्राम है?"

नन्दन कुमार जी ने महाशक्ति जी से पूछा; "स्टूडियो से दीपक जी जानना चाहते हैं कि आपका होली मनाने का क्या प्रोग्राम है?"

महाशक्ति ने बताया; "देखिये, जैसा कि आपको मालूम है, महाशक्ति समूह एक बहुत बड़ा समूह है. मैं और मेरे मित्र तारा चंद और राज कुमार ने ठंडाई और भंग का प्रोग्राम रखा है. वैसे आपको बता दें कि ठंडाई पीने से पहले हमलोग संघ द्वारा सुझाई गई प्रार्थना करते हैं."

महाशक्ति अभी अपनी बात कह ही रहे थे कि कानपुर में सुधीर बिनोद से पुनः सम्पर्क स्थापित हो गया. सम्पर्क स्थापित होने से दीपक परदेशिया जी का चेहरा खिल गया. बोले; "इसी बीच हमारा सम्पर्क कानपुर में हमारे संवाददाता सुधीर बिनोद के साथ पुनः हो गया है. चलिए उन्ही से पूछते हैं कि फुरसतिया के नाम से मशहूर अनूप शुक्ला जी का होली मनाने का क्या प्रोग्राम है. सुधीर आपको हमारी आवाज़ आ रही है?"

"जी हाँ दीपक जी अब मुझे आपकी आवाज़ आ रही है. और इस समय हमारे साथ हैं कानपुर को पूरी दुनियाँ में ब्लागिंग के नक्शे पर जगह दिलाने वाले श्री अनूप शुक्ला. अनूप जी स्वागत है आपका हमारे विशेष कार्यक्रम ब्लागवीरों की होली में"; शुक्ला जी का स्वागत करते हुए सुधीर बिनोद ने कहा.

"धन्यवाद"; अनूप जी से कहा.

"अनूप जी आज होली है, आपको कैसा लग रहा है?"; सुधीर बिनोद ने अपना घिसा-पिटा सवाल पूछ डाला.

"देखिये, होली है तो अच्छा ही लगेगा. अभी-अभी मैं बारह दोहों की एक पोस्ट चढाकर आया हूँ. आपसे बात करने के बाद घर में जाकर गुझिया खाऊँगा. ठंडाई पीऊँगा. मौज लूंगा. आपको बता दूँ कि मुझे कायदे से मौज लेने आता है इसलिए मुझे होली अच्छी लगती है"; अनूप जी ने बताया.

"और होली मनाने का कोई ख़ास प्रोग्राम है आपका?"; सुधीर बिनोद ने पूछा.

शुकुल जी अभी कुछ कहते उसी समय स्टूडियो में बैठे दिलाकार नेगी ने परदेशिया जी को बताया; "शुक्ला जी बढ़िया मौज लेते हैं. आप उनसे पूछिए कि मुम्बई जाकर अज़दक जी के साथ होली खेलने का जो उनका प्लान था, उसका क्या हुआ?"

परदेशिया जी ने तुरंत सुधीर बिनोद से कहा; "सुधीर, शुक्ला जी को बताईये कि इस समय हमारे साथ ब्लागाचार्य दिलकार नेगी जी बैठे हैं और पूछ रहे हैं कि शुकुल जी का मुम्बई जाकर अज़दक जी के साथ होली मनाने के प्रोग्राम का क्या हुआ."

सवाल सुनकर शुकुल जी के चेहरे पर हंसी आ गई. उन्होंने कहा; "देखिये, मैंने सोचा तो था कि मुम्बई जाकर अज़दक जी के साथ होली मनाऊँगा लेकिन चूंकि मुम्बई जाने के लिए टिकट उपलब्ध नहीं था इसलिए मैंने सोचा कानपुर में ही बैठकर ब्लॉग पोस्ट पर ही होली मना लूंगा. इसलिए मैंने आज जो बारह दोहे पोस्ट किए हैं, उनमें से एक दोहा अज़दक जी के लिए भी है."

शुकुल जी का जवाब सुनकर परदेशिया जी ने एक सवाल और पूछा; "सुधीर, शुक्ला जी से पूछा जाय कि इलाहबाद में ज्ञान दत्त पाण्डेय जी की होली मनाने के प्लान के बारे में उन्हें क्या कहना है."

सुधीर बिनोद ने शुकुल जी तक सवाल पहुंचाया; "स्टूडियो में दीपक जी जानना चाहते हैं कि इलाहाबाद के ज्ञान दत्त पाण्डेय जी की होली के बारे में आपका क्या कहना है."

सवाल सुनकर शुकुल जी को हंसी आ गई. बोले; "ज्ञान जी क्या होली मनायेंगे, वे तो इतने व्यस्त हैं कि उन्हें समय नहीं मिल रहा. वैसे भी वे कायदे से मौज नहीं ले पाते तो होली कैसे मनायेंगे. आजकल व्यस्तता का हवाला देते हुए पोस्ट भी नहीं लिख रहे. कभी-कभी मोबाइल कैमरे से एक दो फोटो डाल कर चार लाइन लिख देते हैं. वैसे भी उनकी इस बात के लिए मैं दिलकार नेगी जी को भी दोषी मानता हूँ. न तो नेगी जी वो किताब लिखते और न ज्ञान जी लिखना बंद करते."

शुकुल जी की बात सुनकर स्टूडियो में बैठे दिलाकार नेगी जी को हंसी आ गई. ठीक उसी समय स्टूडियो में बैठे परदेशिया जी ने कहा; "और अब चलते हैं जबलपुर जहाँ हमारे साथ उपस्थित हैं हमारे संवाददाता विजय सोनवलकर. विजय क्या हाल है वहाँ? आपकी मुलाकात समीर लाल जी से हुई कि नहीं?"

"जी हाँ. दीपक जी इस समय मैं उड़न तश्तरी के नाम से प्रसिद्ध ब्लॉगर समीर लाल के घर पर हूँ. आईये उन्ही से पूछते हैं कि होली मनाने के बारे उनका प्लान क्या है. समीर स्वागत है आपका हमारे विशेष कार्यक्रम में. आप बतायें, होली मनाने के लिए आपका क्या प्लान है.?"; सोनवालकर ने पूछा.

"देखिये, छ महीने हो गए मुझे भारत आए हुए. आने के बाद बहुत सारी घटनाएं हुईं. कुछ बातों को लेकर दुःख भी हुआ. जैसे, दुःख तब हुआ जब पता चला कि लोटा अब लुप्त-प्राय हो गया. उसके बाद सबसे ज्यादा दुःख तब हुआ जब मुझे अलेक्सा की रैंकिंग में अपना नाम नहीं मिला. उस समय लगा कि धरती फटती तो समा जाता. लेकिन फिर लगा कि धरती इतनी भी नहीं फट सकती कि मैं समा सकूं"; समीर जी ने कुछ पुरानी बातें बताते हुए कहा.:-)

"लेकिन मैं पूछ रहा था कि होली मनाने के बारे में आपका क्या प्लान है?"; सोनवलकर ने पूछा.

"हाँ मैं उसपर आ ही रहा था. देखिये पहले ज़माना ठीक था तो हम लोग भेंडाघाट चले जाते थे. वहाँ पानी में रंग घोल देते थे और दोस्तों के साथ कूद जाते थे. अब दोस्तों को शिकायत है कि ज़माना ख़राब हो गया है. समय के साथ साथ मैं भी 'बड़ा' हो गया हूँ. दोस्तों को शिकायत है कि मुझे भिगोने के लिए पूरे पाँच बाल्टी रंग लगता है. इसलिए इस बार दोस्तों ने ड्रम में रंग घोल रखा है. लेकिन एक समस्या और है. वे मुझे उठाकर ड्रम में रख नहीं पाते. इसलिए मैं ख़ुद ही उन्हें आराम देते हुए ड्रम में बैठ जाता हूँ. वहाँ से निकल कर हमसब मिलकर गुझिया खाते हैं और ठंडाई पीते हैं. पत्नी गुझिया कम खाने के लिए कहती हैं लेकिन अब ऐसा तो हो नहीं सकता. है कि नहीं?"; समीर भाई ने पूरी बात बताई.

समीर भाई की बात सुनकर सब संतुष्ट हुए. स्टूडियो में बैठे परदेशिया जी ने कहा; "जी हाँ, अभी आपने देखा कि किस तरह से समीर लाल जी होली मनाते हैं. चलिए अब आपको लेकर चलते हैं छतीसगढ़ की राजधानी रायपुर.

जारी रहेगा...अभी तक होली ख़त्म नहीं हुई है.

Saturday, March 22, 2008

अज़दक, ईराक और अमरीका


जैसा मेरा सोचना है; और उस सोचने का ३६ का आंकड़ा है अज़दक के साथ; मुझे ईराक से रत्ती भर भी सहनुभूति नहीं। तेल के पैसे पर इतराता देश तबाह हुआ। एक तानाशाह को पोषित करता, अपने ही देश की माइनॉरिटी को रौंदता, जब रौंदा गया तो मुझे कोई अफसोस नहीं हुआ। उस देश में जज्बा होगा तो खड़ा होगा जापान की तरह। नहीं तो टिलटिलायेगा।

वह तो यह हुआ कि बैठे ठाले अज़दक जी का ईराक पर बुद्धिवादी पॉडकास्ट सुन लिया। कण्टेण्ट से पूरी तरह असहमति है। पर जिस प्रकार से अज़दक जी ने प्रस्तुत किया है, उस विधा से मन मयूर हो गया है।

अब हम ठहरे रेल के गाड़ीवान। उसकी बुद्धि भी गाड़ियों और वैगनों का जोड़-घटाना समझती है। मेरी नौकरी के लिये तो गुणा और भाग करना आने की भी जरूरत नहीं। लिहाजा इस तरह श्रव्य रचना करना अपने बस का नहीं है। अपन तो बस यही कह सकते हैं कि पॉडकास्ट सुनना अच्छा लगा। पर उससे विचार का परिवर्तन नहीं हुआ।

अमेरिका को लतियायें - मेरी बला से। वह तो इत्ता दूर है कि वहां तक लात पंहुचती ही नहीं। आपका बैलेन्स जरूर बिगड़ सकता है। ईराक को खपच्ची लगा कर खड़ा करें - करते रहें। असल में खड़ा तो तब होगा जब पैरों में ताकत आयेगी। बाकी जित्ता मर्जी सेण्टीमेण्टलियाते रहें युद्ध के बाद के पांच साल ले कर!

खैर, मेरे लिखने का ध्येय मात्र इतना है कि जवानी के दिनों से अज़दक की रचनाधर्मिता के फैन थे। यह पोस्ट पढ़-सुन कर वह फैनियत कण्टीन्यू कर रही है।

और यह ज्वॉइण्ट ब्लॉग पर इसलिये पोस्ट कर रहा हूं कि बुद्धिवादी गोल के लोग अगर फनफनायें तो झेलने का काम पण्डित शिवकुमार मिश्र करें।


ज्ञान दत्त पाण्डेय की पोस्ट।


 

Thursday, March 20, 2008

दुर्योधन की डायरी- पेज ३३६७

काकेश जी ने कल अपने ब्लॉग पर मेरे लिए एक डिमांड रखी थी. डिमांड ये थी कि मैं दुर्योधन जी की डायरी से उनके होली पर लिखे गए पेज को प्रस्तुत करूं. जैसा की आपको ज्ञात है, डायरी इतनी पुरानी है कि पेज बिखरे पड़े हैं. बहुत खोजने के बाद ये पेज मिला. काकेश जी के साथ आपलोग भी पढ़िए.

दुर्योधन की डायरी- पेज ३३६७

कल होली है. अभागे मेरे जैसे ही होते हैं. सबसे बड़ा भाई होने का सबसे बड़ा डिसएडवान्टेज ये है कि भौजाई की कमी खलती है. जेठ होना होली के मौके पर बहुत दुःख देता है. पांडवों को अज्ञातवास नहीं दिया होता तो भी होली के मौके पर देवर बनने का चांस रहता. जैसा कि एक महान गीतकार ने लिखा है;'गिले शिकवे भूल कर दोस्तों, दुश्मन भी गले मिल जाते हैं...' तो एक दिन दुश्मनी भूलकर द्रौपदी भाभी के साथ ही होली खेल आता. लेकिन क्या करूं, दुविधा वहाँ भी रहती. हो सकता है वहाँ भी होली नहीं खेल पाता क्योंकि भाभी को कन्फ्यूजन रहता कि मुझे देवर समझे या जेठ.आख़िर जहाँ वे युधिष्ठिर भइया की पत्नी हैं, वहीं दूसरी तरफ़ नकुल और सहदेव की पत्नी भी वही हैं.

जबसे इनलोगों को अज्ञातवास का टिकट थमाया है, होली के मौके पर जरूर याद आ जाते हैं ये लोग. लेकिन क्या कर सकता हूँ. होली खेलता भी हूँ तो कर्ण के साथ. वो भी कर्ण की होली बहुत बोरिंग होती है. ठंडाई में भंग मिलाने ही नहीं देता. पता नहीं ऐसा क्यों है. वैसे भी इन्द्र का पुत्र होता तो इन्द्र की आदतें रहतीं इसके अन्दर. लेकिन ये तो ठहरा सूर्य-पुत्र इसलिए हमेशा तना रहता है. बोर आदमी है. बोर क्या महाबोर है. आता है और अबीर-गुलाल लगाते हुए गले मिलकर चला जाता है. रुकने के लिए कहता हूँ तो एक ही बहाना बनाकर निकल भागता है. कहता है धनुष बाण साफ करना है और बाण चलाने की प्रैक्टिस करनी है. पता नहीं कब युद्ध शुरू हो जाए.

राजमहल से बाहर निकल कर लोगों को होली खेलते हुए देखने की बड़ी इच्छा होती है. लेकिन राजपुत्र होने का भी अपना डिसएडवांटेज है. लोगों के बीच में जाकर होली भी नहीं खेल सकता. कई बार संजय को फुसलाया कि हस्तिनापुर में खेली जानेवाली होली का लाईव टेलीकास्ट ही दिखा दे. लेकिन वो तो पिताश्री को छोड़कर किसी की बात ही नहीं मानता. कहता है उसके चैनल पर होनेवाले हर टेलीकास्ट का एक्सक्लूसिव राईट्स पिताश्री के पास है. पिछले साल दु:शासन भेष बदलकर लोगों की भीड़ में घुस गया था और अपने सेल फ़ोन के कैमरे से फोटो खींच लाया था. दो-चार फोटो देखने को मिली थी. इस साल तो ये भी नहीं हो सकेगा. भीम ने ऐसी धुनाई की है कि अब बाहर निकलने से डरता है.

लेकिन क्या किया जा सकता है. ऐसे ही दरबार में रहना पड़ेगा और हास्य कवि सम्मेलन में 'कवियों' के चुटकुले सुनकर होली मनानी पड़ेगी. मजे की बात ये है कि ये लोग पिछले दस सालों से एक ही चुटकुला सुनाते आ रहे हैं. ऊपर से कहते हैं कि कविता सुना रहे हैं. कोई-कोई कवि एकाध बार कविता भी सुना बैठता है. परसों के कवि सम्मेलन में किसी कवि ने ये कविता सुनाई थी. मुझे अच्छी लगी. लिख देता हूँ, आख़िर कलियुग में कोई ब्लॉगर अपने ब्लॉग पर डायरी छापेगा तो ये कविता भी छप जायेगी. कवि का नाम तो याद नहीं क्योंकि मैं भंग के नशे में था लेकिन कविता यूं थी...

क्या फागुन की ऋतु आई है
डाली-डाली बौराई है
हर और सृष्टि मादकता की
कर रही फ्री में सप्लाई है

धरती पर नूतन वर्दी है
खामोश हो गई सर्दी है
कर दिया समर्पण भौरों ने
कलियों में गुंडागर्दी है

मनहूसी मटियामेट लगे
खच्चर भी अप टू डेट लगे
फागुन में काला कौवा भी
सीनियर एडवोकेट लगे

फागुन पर सब जग टिका लगे
सेविका परम प्रेमिका लगे
बागों में सजी-धजी कोयल
टीवी की उदघोषिका लगे

जय हो कविता कालिंदी की
जय रंग-बिरंगी बिंदी की
मेकप में वाह तितलियाँ भी
लगती कवियित्री हिन्दी की

पहने साड़ी वाह हरी-हरी
रस भरी रसों से भरी-भरी
नैनों से डाका डाल गई
बंदूक दाग गई धरी-धरी

हर और मची हा-हा, हू-हू
रंगों का भीषण मैच शुरू
साली की बालिंग पर देखो
जीजा जी हैं एल बी डब्ल्यू

भाभी के रन पक्के पक्के
हर ओवर में छ छ छक्के
कोई भी बाल न कैच हुआ
सब देवर जी हक्के-बक्के

गर्दिश में वही बेचारे हैं
बेशक जो बिना सहारे हैं
मुंह उनका ऐसा धुआं-धुआं
ज्यों अभी इलेक्शन हारे हैं

क्या फागुन की ऋतु आई है
मक्खी भी बटरफिलाई है
कह रहे गधे भी सुनो-सुनो
इंसान हमारा भाई है

नाराज हैं राखी सावंत

"मे को बाईट के लिए मत बोलो. बाईट के लिए जाओ उस खली के पास. उसी से बाईट मांगो"; हिन्दी न्यूज़ चैनल वालों से नाराज राखी सावंत पत्रकारों को झिड़क रही थीं. उन्हें शिकायत है कि पिछले एक महीने से हर न्यूज़ चैनल पर उनकी जगह खली को दिखाया जा रहा है. उनकी शिकायत सही भी है. सुबह खली, शाम को खली, रात को खली. सिर्फ़ खली खली खली.

न न, सुनकर ये मत समझियेगा कि राखी जी सरसों के तेल निकालने के बाद उसके बायप्रोडक्ट खली की बात कर रही हैं जिसे भिगोकर गाय और भैसों को खिलाया जाता है ताकि वे ज्यादा दूध दें. राखी जी तो इस पृथ्वी के नौवें अजूबे खली पहलवान की बात कर रही हैं. उनका कहना ठीक भी है. पिछले एक महीने से हर चैनल खली को ही दिखा रहा है. ये चैनल नहीं होते तो हमें तो पता ही नहीं चलता कि खली न सिर्फ़ नूरा-कुश्ती लड़ता है बल्कि खाना खाता है. हंसता है. कपड़े पहनता है. पहलवानी की रिंग में नाचता है. अमेरिका में रहता है.

कुछ दिन पहले ही एक टीवी न्यूज़ चैनल खली को दिखाते हुए भीम के पुत्र घटोत्कच के बारे में बता रहा था. ये जानकारी दे रहा था कि घटोत्कच का जन्म भी हिमाचल प्रदेश में ही कहीं हुआ था. जी हाँ, वही सुखराम जी वाला हिमाचल प्रदेश. मुझे लगा कि कहीं चैनल का इशारा इस बात की तरफ़ तो नहीं कि ये खली घटोत्कच का अवतार है. इससे पहले कि एंकर इसका रहस्योद्घाटन करता, मैं आगे बढ़ लिया.

खैर, राखी जी की बात से परेशान संवाददाता अपने न्यूज़ एडिटर को समझा रहा है. "देखिये सर, राखी ने तो मना कर दिया. कह रही थी, टीवी कैमरा के सामने कुछ नहीं बोलेगी. जो बोलना होगा, अब से केवल घर में बोलेगी."

"लेकिन घर में उसकी बात सुनेगा कौन? और फिर घर में बोलकर उसे भी कोई फायदा नहीं होगा और हमें भी. तुमने पूछा नहीं, घर में उसकी बात कौन सुनेगा"; न्यूज़ एडिटर ने संवाददाता से जानकारी मांगी.

"मैंने पूछा था सर. राखी ने कहा कि उसने नर्सरी में पढ़ा था कि दीवारों के भी कान होते हैं. इसलिए वो दीवारों को अपनी बात सुनाएगी लेकिन टीवी न्यूज़ चैनल वालों को नहीं"; संवाददाता पूरी बात बताते हुए बोला.

न्यूज़ एडिटर सोच में पड़ गया. कुछ देर सोचने के बाद मुस्कुराने लगा और बोला; "लेकिन एक बार तुम्हें राखी को मनाना चाहिए था. उसे समझाना हाहिये था कि खली भी तो हमारे लिए इम्पार्टेन्ट है. कुछ दिन हम उसे और चलायेंगे फिर उसे ड्राप कर देंगे."

"मैंने कहा था सर. मैंने उसे मनाया भी था. लेकिन वो बहुत गुस्से में थी. मेरी बात सुन ही नहीं रही थी. कह रही थी, 'आज तुम लोग भी जानते हो. राखी के अन्दर जो अदा है वो उस खली के अन्दर नहीं है. राखी के अन्दर आग है आग. मे को मालूम है, तुम लोग वापस मे पास ही आओगे. ये खली से कितने दिन धंधा चलेगा तुमलोगों का? ख़ुद शाहरुख़ कह रहा था कि मेरे अन्दर अदा है. ये राखी जहाँ जाती है, सबको अपने बस में कर लेती है. जाओ खली को दिखाओ, लेकिन ज्यादा दिन तक नहीं दिखा सकोगे. वापस मे पास ही आना पड़ेगा"; संवाददाता ने सारी बात एडिटर को बताई.

सारी बात सुनकर एडिटर सोच में पड़ गया. कुछ देर सोचने के बाद उसने कहा; "अच्छा, क्या किया जा सकता है कि राखी को वापस चैनल पर ला सकें. आख़िर उसका कहना भी ठीक ही है. हालांकि हम वही दिखाते हैं जो जनता देखना चाहती है लेकिन जनता जिस दिन हमें चिट्ठी लिखकर बता देगी कि वो खली को देखकर बोर हो चुकी है, तो हमें तो ये खली-दर्शन बंद करना ही पड़ेगा"

"हां सर, आपकी बात सोलह आने सच है"; संवाददाता ने जानकारी दी.

एडिटर कुछ देर तक सोचता रहा. फिर अचानक बोला; "अच्छा, अगर हम राखी सावंत को खली के बारे में बात करते हुए एक प्रोग्राम बना डालें, तो कैसा रहेगा?"

संवाददाता का चेहरा खिल गया. उसने कहा; "मान गए सर आपको. क्या दिमाग चलता है आपका. वाह, क्या धाँसू आईडिया दिया है आपने. हमारे राईवल चैनल वालों के दिमाग में ये आईडिया आ ही नहीं सकता. और फिर सर, राखी ही तो है. इतना बोलती है कि उसे पता ही नहीं कि क्या बोल रही है. क्या पता, बात बात में अपने चैनल पर ही खली को चैलेन्ज कर दे. ये कहते हुए वो खली से कुश्ती लड़ेगी. सोचिये सर, अपनी तो निकल पड़ेगी."

दोनों ने एक दूसरे को देखा और खुश होते हुए उठ गए. जा रहे थे ऐड बनवाने कि "टेलीविजन के इतिहास में पहली बार, देखिये राखी सावंत को खली के बारे में बोलते हुए........सबसे पहले हमारे चैनल पर."

Saturday, March 15, 2008

दुर्योधन की डायरी - पेज ३३५५

ये दु:शासन तो हाथ से निकला जा रहा है. मेरी ही गलती है, इसे छूट नहीं देनी चाहिए थी. हमलोगों के साथ जब तक रहता है तो कंट्रोल में रहता है. बाहर गया नहीं कि कुछ न कुछ बखेड़ा खड़ा कर आता है. जब से जयद्रथ के साथ में ज्यादा रहना शुरू किया है, आदतें ख़राब होती जा रही हैं इसकी. कल जयद्रथ के साथ बिना बताये निकल गया. रात को जयद्रथ हांफते हुए आया. बता रहा था कि शेर-ए-पंजाब ढाबा पर भीम से कहा-सुनी हो गई और भीम ने दु:शासन की पिटाई कर दी है. मुंह और नाक से खून बह रहा है.

जयद्रथ ने यह भी बताया कि गलती दु:शासन की नहीं बल्कि उस भीम की थी. जयद्रथ भी कम झूठा नहीं है. मुझे पता है न. जब वो ये घटना बयान कर रहा था तो उसके मुंह से मदिरा की दुर्गन्ध आ रही थी. मेरे धमकाने पर उसने असली बात बताई कि कैसे वहाँ पहुँच कर दु:शासन ने बीयरपान किया. थोडी देर बाद भीम वहाँ आ पहुँचा. भीम को देखते ही दु:शासन ने फब्ती कस दी. दु:शासन ने भीम को भिखारी कहा तो भीम को गुस्सा आ गया. उसके बाद बीयर के नशे में चूर दु:शासन ने भीम को गालियाँ दीं. भीम का गुस्सा बढ़ा तो उसने दु:शासन की जम कर धुनाई कर दी.

मुझे चिंता हो रही है. दु:शासन के साथ घटी इस घटना का पता अगर हस्तिनापुर के लोगों को चला तो वे कहेंगे कि भीम ने जो किया ठीक किया. दु:शासन यही डिजर्व करता है. लोगों को अगर पता चलेगा कि दु:शासन ने भीम को गाली दी है तो लोगों के मन में हमारे लिए घृणा बढ़ जायेगी और भीम के लिए सहानुभूति. समझ में नहीं आ रहा था कि इस घटना का विवरण बाहर जाने से कैसे रोका जा सके. लेकिन एक बात और है. अगर दु:शासन ख़ुद बाहर गया तो उसके मुंह और नाक के घाव को देखकर लोग पूछेंगे ही कि क्या हुआ?

मैं अभी सोच ही रहा था कि मामाश्री आ पहुंचे. मुझे चिंतित देख मेरी चिंता का कारण पूछ लिया. मैंने उन्हें अपनी समस्या के बारे में बताया तो बोले कि मैं दु:शासन के बारे में इतनी चिंता नहीं करनी चाहिए. वो राजपुत्र है तो राजपुत्रों के गुण उसके अन्दर रहेंगे ही. जब मैंने मामाश्री से इस घटना को लेकर ये सलाह मांगी कि प्रेस वाले पूछेंगे तो क्या बोलना है तो मामाश्री ने कहा कि प्रेस को बता दिया जाय कि पास वाले राज्य के जासूसों ने दु:शासन के ऊपर हमला कर दिया था.

लेकिन यहाँ एक समस्या है. पिछली बार जब दु:शासन किसी लड़की को छेड़ने के चक्कर में पिटा था तब भी यही बहाना बनाया गया था. एक ही कारण बार-बार बताने से तो लोगों को शक हो जायेगा.काफी सोच-विचार के बाद मामाश्री की बुद्धि का ज्वालामुखी फूटा. बोले; "ऐसा करो, प्रेस कांफ्रेंस बुलाकर पत्रकारों को बता दो कि दु:शासन के ऊपर अज्ञात लोगों ने हमला किया है और हम उन अज्ञात लोगों की तलाश कर रहे हैं." मामाश्री की सलाह मुझे पसंद आई. कल सुबह ही प्रेस कांफ्रेंस बुलाकर पत्रकारों को यही बता दूँगा. ऐसा करने से कम से कम लोगों की सहानुभूति तो मिलेगी.

दु:शासन को सहानुभूति तो मिलेगी ही, जनता के मन में कन्फ्यूजन भी बढेगा. राज परिवार को और क्या चाहिए?

Wednesday, March 12, 2008

होली मनाने के बारे में राजधानी के चिट्ठाकार लिखते हैं....

(सं) वैधानिक अपील: जैसा कि मैंने कहा था, होली के मौसम पर मौसम बूझने के लिए मैंने कोटा बढ़वा लिया है. ये पोस्ट उसी बूझने का नतीजा है. इसलिए ऐसी बौड़म पोस्ट को ऐसे वैसे ही देखा जाय. इसे फील न किया जाय.

होली आ पहुँची है. होली मनाने के बारे में हमारे मूर्धन्य चिट्ठाकार क्या सोचते हैं? अगर उसपर पोस्ट लिखें, तो शायद कुछ ऐसा लिखेंगे


काकेश जी

होली आ पहुँची. वैसे आजकल व्यस्तता इतनी बढ़ गई है कि साँस लेने की भी फुरसत नहीं है. आज परुली से मुलाक़ात नहीं हुई होती तो पता भी न चलता कि होली आ गई है. आज आफिस से घर लौट रहा था तो देखा, कि परुली रंग, अबीर और गुलाल खरीदने के बारे में अपनी सहेलियों से बात कर रही थी. मुझे देखा तो मुस्कुरा दी. मैंने पूछा; "क्या परुली, बेटा किस बात का प्लान बना रही हो?"

बोली; "मैं न, अपनी सहेलियों के साथ होली खेलने का प्लान बना रही हूँ." उसकी बात सुनकर मुझे ध्यान आया कि होली आ पहुँची है.

मैंने कहा; "बेटा, तुम्हें अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए. तुम्हें डॉक्टर जो बनना है."

मेरी बात सुनकर मुस्कुरा दी. बोली; "तो क्या हुआ, डॉक्टर भी तो होली खेलते हैं."

उसकी बात सुनकर मुझे लगा कितनी सहजता है इस बच्ची के अन्दर. हर बात को सहज ढंग से कह लेना सचमुच बहुत बड़ा गुण है. ये बच्ची अपने बाबू से भी जब कुछ कहती है तो बड़े सहजता से अपनी बात कह जाती है. जब यह कहती है कि "मैं ब्या नहीं करूंगी", तो भी कितनी सहजता होती है इसकी बातों में.

परुली के बारे में सोचते-सोचते मैं घर में दाखिल हुआ. उसकी मासूमियत और सहजता से इतना प्रभावित कि मैंने भी गोल्ज्यू से मन ही मन कहा; "गोल्ज्यू, परुली के ऊपर अपनी कृपादृष्टि रखियेगा. उसे इतनी शक्ति दीजियेगा कि वो रास्ते में आई सारी रुकावटें टाल कर डॉक्टर बन जाए. अगर ऐसा हो गया तो मैं आपके थान आकर आपको सवा रुपये का प्रसाद चढाऊंगा."

मैं यही बुदबुदाते घर में घुसा. पत्नी ने पूछा; "क्या ख़ुद से बात कर रहे थे? क्या हुआ?"

मैंने कहा; "नहीं, ऐसी बात नहीं है. मैं तो भगवान से कुछ मांग रहा था."

अरुण अरोरा जी (पंगेबाज)

होली आ गई जी. बिल्कुल आ गई जी. इस बार होली अलग तरीके से मनाऊँगा. अब तो मुझे कोई टेंशन भी नहीं है. जब से शिव कुमार जी को दुर्योधन की डायरी सौंपी है, तब से केवल तरह-तरह के शोधकार्य में लगा हूँ. हाल ही में तमाम शोध समाप्त किए और उसकी जानकारी भी आपलोगों को पोस्ट लिखकर दी. रसिक बलमा के ऊपर मेरा शोध तो पढ़ा ही होगा आपने. अब अगर रसिक बलमा होली खेल सकता है तो ऐसे बलमा पर शोध करने वाला किस तरह की होली खेलेगा, आप अंदाजा लगा ही सकते हैं.

इस बार ऐसी होली खेलने का प्लान बनाया है जो मुझे प्रसिद्धि भी दिला सके. प्रसिद्धि के बारे में शोध करते हुए मुझे पता चला की कबीर और रहीम जी ने केवल 'चमचत्व' पर ही नहीं बल्कि होली खेलने की विधियों पर भी दोहे लिखे. ऐसे दोहों का समग्र संकलन करने के बाद मुझे ख्याल आया कि ऐसे दोहों के सहारे ब्लॉग की मार्केटिंग की जाय तो ब्लॉग उद्योग को बहुत आगे ले जाया जा सकता है.

मैंने 'बड़े भइया' सुयोधन के सपने में आने की बात आपको बताई थी. जब से उन्होंने सपने में मुझे बताया है कि अलोक पुराणिक जी मेरे लिखे हुए कितने ही निबंध अपने ब्लॉग पर छापते रहते हैं, और उसके लिए मुझे क्रेडिट नहीं देते, तब से मैंने सोच लिया है कि मैं निबंध प्रतियोगिता में भाग तो लूंगा लेकिन फर्स्ट नहीं आऊँगा. इसका फायदा यह होगा कि मैं अपने निबंध अपने ब्लॉग पर पब्लिश कर सकूंगा.

ये तो गड़बड़ हो गया. कहाँ से शुरू किया था और कहाँ पहुँच गया. हाँ तो मैं आपलोगों को बता रहा था कि कबीर और रहीम के ऐसे दोहे भी लिखे जिनमें होली खेलने की विधि बताई गई है. प्रस्तुत है ऐसे ही कुछ दोहे...

रहिमन होली वहि भली, जो एकहि दिन की होय
सुबह लगा के रंग सब, शाम भये तो धोय

कह रहीम पक्का वही, जेहि रंग प्रीति समाय
रंग लगा के भंग पी, साथ में गुझिया खाय

कबीर लिखते हैं;

ऐसी होली खेलिए, जो कभी सके न भूल
हॉकी की एहि हार को, न दे ज्यादा तूल

खेलन होली मैं चला, मन का आपा खोय
जिसके रंग लगाय दिन, रहे सदा वो रोय

होली को त्यौहार में, जीत-जीत नहि हार
रंग बिके, रौनक दिखे, बना रहे बाज़ार

कबीर और रहीम जी ने होली पर जितने भी दोहे लिखे, उसे मैं पूरा का पूरा नहीं लिख रहा हूँ. कॉपीराईट की बात अभी चल रही है. हो सकता है शिव कुमार जी की तरह कोई और ब्लॉगर अगर ये दोहे लेना चाहे, तो उससे वसूली करने का चांस तो रहेगा.

Tuesday, March 11, 2008

और होली मनाने के बारे में ये लिखते हैं....

(सं) वैधानिक अपील: जैसा कि मैंने कहा था, होली के मौसम पर मौसम बूझने के लिए मैंने कोटा बढ़वा लिया है. ये पोस्ट उसी बूझने का नतीजा है. इसलिए ऐसी बौड़म पोस्ट को ऐसे वैसे ही देखा जाय. इसे फील न किया जाय.

होली आ पहुँची है. होली मनाने के बारे में हमारे मूर्धन्य चिट्ठाकार क्या सोचते हैं? अगर उसपर पोस्ट लिखें, तो शायद कुछ ऐसा लिखेंगे


श्री दिनेश राय द्विवेदी

हमारा परिवार होली मनाता है. मैं भी मनाता हूँ. मेरे होली मनाने के दो कारण हैं. पहला कारण यह कि ये त्यौहार हमारी संस्कृति का हिस्सा है. दूसरा कारण है होली मनाने में कोई कानूनी अड़चन नहीं है. वैसे मेरा मानना है कि होली मनाते समय हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि हमारे इस कर्म की वजह से कॉपीराईट कानून का उलंघन न हो.

मेरा मानना है कि किसी ख़ास तरह की होली पर उनलोगों का कॉपीराईट है जिनके क्षेत्र में ऐसी ख़ास तरह से होली मनाई जाती है. जैसा कि हम सभी जानते हैं, होली मनाने के लिए हम भारतीय तमाम चीजों का इस्तेमाल करते हैं. जैसे रंग, गुलाल, अबीर, कीचड़, गोबर, फूल, लाठी वगैरह वगैरह. इन चीजों के साथ हम गानों का इस्तेमाल करते हैं.

ऐसी स्थिति में होली मनाने से पहले हमें इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि हम होली मनाकर कॉपी राईट कानून का उल्लंघन तो नहीं कर रहे. जैसे अगर मथुरा और वृन्दावन में फूलों से होली मनाई जाती है तो बाकी की जगहों और क्षेत्रों के लोगों को फूलों से होली नहीं मनानी चाहिए. अगर वे ऐसा करते हैं तो निश्चित तौर पर कॉपीराईट क़ानून का उलंघन होगा. कॉपी राईटकानून केवल लेखन, कला की तमाम विधियों और वैज्ञानिक आविष्कारों तक सीमित नहीं है. ये होली मनाने के तमाम तरीकों पर भी लागू होता है. जैसे बरसाने की होली केवल वहाँ के लोगों के लिए है. ऐसे में अगर बंगाल के लोग बरसाने की विधि से होली मनात